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बुधवार, 18 जून 2025

गुरूजी, छतरपुर वाले

छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

अपने देश में समय-समय पर महान विभूतियों का जन्म होता रहा है। जिन्होंने समाज में पसरी बुराइयों को दूर करने और आम इंसान में चेतना जगाने, उनमें ज्ञान का बीजारोपण करने और जीवन का सही मार्ग दिखाने काम किया है। समय के साथ उनमें से कुछ विलक्षण हस्तियों को उनके अनुयायिओं ने अपना गुरु मान ईश्वर स्वरूप सम्मानित पद पर आसीन कर दिया ! ऐसे ही संतों में एक आध्यात्मिक, सम्मानित तथा अपने भक्तों में अत्यंत लोकप्रिय संत थे, छतरपुर वाले गुरूजी ! जिन्हें डुगरी वाले गुरुजी और शुक्राना गुरुजी के नाम से भी जाना जाता है। उनके अनुयायी तो उन्हें शिव जी का अंश मानते हैं !  

गुरु जी 
गुरु जी का असली नाम निर्मल सिंह था। उनका जन्म 7 जुलाई 1954 को पंजाब के मलेरकोटला जिले के डुगरी गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिकता की ओर था, वे साधु-संतों के सान्निध्य में ही अपना समय व्यतीत किया करते थे। पर उनके पिता जी की प्रबल इच्छा थी कि वे खूब पढ़ें, उनकी कामना की कद्र करते हुए गुरु जी ने दो उपाधियां अर्जित कीं। पर उनका ध्येय और लक्ष्य तो कुछ और ही था और उसी के चलते उन्होंने 1975 में गृहत्याग कर खुद को पूर्णतया गहरी आध्यात्मिकता में रमा दिया !

आश्रम, छतरपुर 
दे शाटन पर निकले गुरूजी को उनके आत्मज्ञान और धार्मिक विश्वास ने उन्हें जल्द ही एक महत्वपूर्ण और सम्मानित मार्गदर्शक बना दिया। 1990 के दशक में उन्होंने दिल्ली के छतरपुर के भट्टी माइंस इलाके में एक भव्य शिव मंदिर की स्थापना की ! जिसे आज उनके भक्त बड़ा मंदिर के नाम से जानते हैं। यह मंदिर लाखों लोगों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। भक्त यहां प्रार्थना करने आते हैं, अप्रत्यक्ष रूप में उनका आशीर्वाद प्राप्त कर, उनके उपदेशों पर अमल करते हैं।
शिव जी की भव्य प्रतिमा 
गुरु जी ने हमेशा अपने अनुयायियों को, जिनमें देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां भी शामिल हैं, प्रेमदया, और करुणा का संदेश दिया। उनका मानना था कि सभी धर्म समान हैं और ईश्वर एक ही है। उन्होंने यह सिखाया कि आध्यात्मिकता का असली अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांडों में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के दिल में होता है। उनका कहना था कि हमें अपनी आत्मा के साथ गहरे संबंध बनाने के लिए एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
समाधी 
गुरु जी ने 31 मई 2007 को शरीर त्याग दिया, पर उनके उपदेश आज भी उनके अनुयायियों का सकारात्मक मार्गदर्शन कर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में सहायक हो रहे हैं ! छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है। मंदिर के अंदर-बाहर सैंकड़ों स्वयंसेवक, बिना किसी अपेक्षा के खुशी-खुशी, समर्पित भाव से वहां रोज आने वाले हजारों लोगों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं !  
भीतरी कक्ष 
किसी को भी गुरु, नायक या मार्गदर्शक का दर्जा देने में आम जनता की श्रद्धा-विश्वास तथा आस्था का बड़ा हाथ होता है ! जीवन की आपा-धापी की प्रचंड लपटों में जरा सी ठंडी बयार भी अत्यधिक सकून दे जाती है, भले ही वह प्रकृतिप्रदत्त हो ! पर हताश-निराश सर्वहारा को जब किसी के माध्यम से जरा सी भी राहत का एहसास होता है तो वह आँख मूँद कर उसे ही ईश्वर मान बैठता है ! एक सच्चे मार्गदर्शक, रहबर या समर्पित रहनुमा का मिलना सहरा में जल की उपलब्धि जैसा ही है ! आज के युग में जब कदम-कदम पर छल-कपट-फरेब अपना डेरा डाले बैठे हों तब इंसान को खुद के विवेक का सहारा ले, हंस जैसा होना चाहिए जिससे नीर-क्षीर की पहचान हो सके और प्रभु के सच्चे बंदे का सानिध्य मिल सके !

@संदर्भ व चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 31 मई 2025

बिनोद का मुंगेरी वाला सपना

भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह, देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

डोर बेल बजी ! शाम के सात बजा चाह रहे थे, पर अभी भी बहुत गर्मी थी ! कौन आ गया, सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने बिनोद था ! उसे देख अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद आया था ! उसके प्रणाम का जवाब देते-देते उसे अंदर लिवा लाया ! चाय बन ही रही थी, उस में थोड़ा सा मटेरियल और बढ़ा दिया गया ! सामयिक विषयों पर बातों के दौरान मुझे लग रहा था कि बिनोद के दिमाग में जरूर कुछ ना कुछ चल रहा है जो वह मुझसे साझा करना चाहता है ! 

मेरा अंदाजा बिलकुल सही था। चाय ब्रेक के तुरंत बाद ही वह शुरू हो गया ! 

भइया जी, अभी जो सिंदूर ऑप्रेशन के बाद अल्हदा-अल्हदा पाटी का नेता लोग को ले कर जो डेलिगेशनवा देश का पच्छ रखने के लिए बाहर भेजा गया है, ऊही से एक सवाल मन में उठता है कि देश का भलाई में जब ऐसा किया जा सकता है, तो फिर अपना देश का राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकता ? वैसे भी हम सब लोग देखा ही है कि अपना हित के लिए कई राज्य में घोर विरोधी भी आपस में हाथ मिलाता रहता है ! दुनिया की भलाई को देखते हुए अलग-अलग सोच वाला लोग भी मिल कर काम करने लगता है ! तो पाटी अपनी जगह है, अपना विचार अपनी जगह है पर जब देश का बात आता है तो देश का पाटी काहे एक नहीं हो जाता है ? अगर ऐसा हो जाए तो देश का विकास अऊर तेज हो सकता है ! देश का एकता मजबूत हो सकता है ! सबसे पहले तो देशे ही है ना ?"

मैं एकदम चौंक पड़ा ! आज के युवा की ऐसी सकारात्मक सोच देश के उज्जवल भविष्य की द्योतक है। सामान्य होने में कुछ क्षण लगे, फिर कहा, बिलकुल सही सोच रहे हो, बिनोद ! आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी, पर शायद लालसा, अहम या भिन्न विचारधाराओं के चलते नए-नए दल बनते गए और देश पिछड़ता गया !"

हाँ भइया जी, बहुते दिन से हम एही सोच रहे थे कि यदि ऐसा हो जाए तो टुच्ची राजनीति के दिन खत्मे हो जाएंगे ! मउका-परस्तों का दुकाने बंद हो जाएगा ! भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा, अउर सबसे बड़का बात, पूरण बहुमत हो जाने से देश हित में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा जो ओछी राजनीती के कारण टलता चला जाता रहता है !''

बिनोद ! भगवान करे तुम्हारी यह सोच निकट भविष्य में साकार हो जाए परंतु आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह ही है, क्योंकि आज हमारे देश के हर दल में कुछ ऐसे पूर्वाग्रही लोग विराजमान हैं जो अपने मतलब के ऊपर और कुछ नहीं देखते ! अपनी वर्षों पुरानी लीक छोड़ना नहीं चाहते ! अपनी सोच ही उन्हें सर्वोपरि लगती है ! उनके लिए देश गौण है !"

पर भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

बिनोद ! यह सब कहने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है ! पर यदि ऐसा होने लगेगा तो सत्तारूढ़ दल के अच्छे कामों के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ती ही चली जाएगी और यह बात विरोधी दलों को बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इसीके चलते उनका सत्ता में आने का अवसर कम होता चला जाएगा और आज के समय में सत्ता-विहीन रहना कौन पसंद करता है ! इसके अलावा मौकापरस्तों के द्वारा दल-बदल की संभावना भी बढ़ सकती है !"

(गहरी सांस).....आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, भइया जी ! अच्छाई के साथ दस ठो बुर्रइये भी साथे चला आता है। पर बुड़बक लोग ई नहीं समझता है कि देश है तभी इनका पाटी है !'' 

वही कह रहा हूँ ! रेगिस्तान में तो फिर भी पानी मिलने की उम्मीद हो सकती है पर फिलहाल इस विचार के फलीभूत होने की कोई भी संभावना अभी तो नहीं दिखती ! उस पर खेद इस बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव, हमारी फितरत में कोई ज्यादा फर्क नहीं आ पाया है। 

जकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई का, चाहे इसके चलते खुद की ही  स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए, चाहे देश की प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों ना लग जाए ! ऐसे परिवेश में वैसी एकता की बात तो दूर की क्या कहीं की कौड़ी भी नहीं लगती ! 

आज समय की मांग है कि हमें और सजग हो, समाज को जागरूक करना है ! अपने समर्पित, कर्मठ, योग्य, देश-हितकारी नायकों को पहचानने और उनका साथ देने और खड़े होने की जरुरत है ! आजके अधिकांश एक्सीडेंटल या छप्पर फाडू उपलब्धि वाले लोग नेता होने या कहलाने के लायक ही नहीं हैं ! जरुरत है ऐसे धूर्त और मक्कार लोगों की सच्चाई सामने लाने और उन्हें उनकी वाजिब औकात दिखा उन्हें दरकिनार करने की ! जरुरी नहीं है कि अपराधी को मार ही दिया जाए, उसकी जलालत, उसकी बेकद्री, उसकी अवहेलना, उसके लिए मौत से ज्यादा बदतर साबित हो सकती है !"

मु झको अपने अंदर एक तीखी सी कसमसाहट, एक छटपटाहट, जल्द कुछ ना कर पाने की बेचैनी, दिमाग पर एक अजीब सा बोझ महसूस हो रहा था, जो मेरी साँसों के साथ बाहर निकल कमरे में पसर कर वहां के माहौल में भी एक भारीपन तारी करने लगा था..........!  

इससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय था ! सो फिर अंदर गुहार लगाई एक कड़क चाय के लिए   

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

आम इंसान की समृद्धि में तीर्थों का योगदान,

इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को  व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे, पर्यटन बढ़ेगा, लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा, लोग समृद्ध होंगे, समाज में संपन्नता आएगी, खुशहाली बढ़ेगी, निर्धनता कम होगी। इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी ! जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से प्रचार-प्रसार हो सकेगा............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

देश को अपनी आर्थिक अवस्था को मजबूत करने का एक नया स्रोत मिल गया है और वह है धार्मिक पर्यटन (Religious Tourism), इसका आभास तो तब ही मिल गया था, जब माता वैष्णव देवी की यात्रा में मूलभूत सुविधाओं का इजाफा होने पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ गई थी ! पर तब की तथाकथित धर्म-निरपेक्ष सरकारों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए, इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया था ! पर वर्षों बाद जब काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर बने और उनको जनता का जिस तरह का प्रतिसाद मिला, वह एक नई खोज, एक नए विचार का उद्घोषक था ! राम मंदिर निर्माण ने इस विचार को और भी पुख्ता किया तथा इस महाकुंभ ने तो जैसे उस पर मोहर ही लगा एक नई राह ही प्रशस्त कर दी !

श्रीराम मंदिर 
अब देश की दशा-दिशा निर्धारित करने वालों को अपनी आर्थिक स्थित मजबूत करने के लिए एक अकूत खजाना मिल गया है ! उन्हें समझ आ गया है कि देश की धर्म-परायण जनता को यदि पर्याप्त सुरक्षा और सुख-सुविधा मिले तो वह धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए भी उतनी ही तत्पर रहती है, जितनी अन्य किसी पर्यटन स्थल के लिए ! महाकुंभ में श्रद्धालुओं की अनपेक्षित, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, मर्यादित उपस्थिति इसका ज्वलंत उदाहरण है ! इसी से प्रोत्साहित हो कर अब इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को भी व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे पर्यटन बढ़ेगा ! लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा ! पलायन रुकेगा ! लोग समृद्ध होंगे ! समाज में संपन्नता आएगी ! खुशहाली बढ़ेगी ! निर्धनता कम होगी ! इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी, जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से  प्रचार-प्रसार हो सकेगा ! 
विश्वनाथ मंदिर परिभ्रमण पथ 

महाकाल मंदिर परिसर 
महा कुंभ के दौरान प्रयागराज के हर वर्ग के, हर तबके के लोगों को जो आमदनी हुई वह आँखें चौंधियाने वाली है ! इसमें अब कोई शक नहीं कि सुप्रसिद्ध स्थानों पर होने वाले ऐसे आयोजन या आने वाले समय में उन स्थानों पर बनने वाले एक-एक धार्मिक परिभ्रमण पथ, पर्यटन और मंदिरों की अर्थ-व्यवस्था (Religious Tourism and Temple Economy) देश के वाणिज्य, व्यापार और अर्थव्यवस्था में सुधार की अहम कड़ी होने जा रहे हैं ! कुंभ तिथि तो चार सालों में एक बार आती है पर माघ मेला तो हर साल लगता है ! छठ पूजा तो हर साल होती है ! गंगा दशहरा तो हर साल होता है ! तो ऐसे हर तीज-त्योहारों को भव्य, सुव्यवस्थित व सुरक्षित बना लोगों को आने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा ! 

जन सैलाब 

महाकुंभ 
यह सब जो आगत भविष्य में होने जा रहा है, वही कुछ लोगों के लिए, जो अपनी राजनितिक लड़ाई तो हार ही चुके हैं अपनी पहचान तक गंवाने की कगार तक पहुँच गए हैं, परेशानी का कारण बना हुआ है। उन्हें अपना नामो-निशान मिटता साफ दिखाई पड़ रहा है। इसीलिए वे अपने बचे-खुचे पूर्वाग्रही, भ्रमित वोटरों को बचाए रखने के लिए कुंभ के बहाने सनातन का विरोध कर रहे हैं, अपनी संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, अपने ही धर्म का विरोध कर रहे हैं, ! देश वासियों की आस्था, श्रद्धा, उनके संस्कारों की थाह के सामने हर बार मुंहकी खाने के बावजूद बेशर्मी की हद पार कर अनर्गल झूठ फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। अभी तो ऐसे लोगों की तिलमिलाहट और बढ़ेगी जब संभल जैसे कई नए-नए तीर्थ देश और विश्व के नक्शे पर उभर कर सामने आएंगे ! भगवान ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दे जिससे ये अपने स्वार्थों से ऊपर उठ देशहितार्थ कुछ कर सकें ! 
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से

रविवार, 29 सितंबर 2024

''साहिब'' से छेड़छाड़, कुटिल साजिश अंग्रेजों की

साहिब से साहब, साहब से साहेब ! बात सिर्फ एक शब्द की मात्रा की हेरा-फेरी की नहीं है बल्कि उसमे लाए गए फर्क को आम आदमी को समझाने की है ! साहिब के सामने हर नागरिक श्रद्धा से सिर झुकाता है ! साहब के सामने मजबूरी में सर झुकाना पड़ता है। जबकि साहेब के सामने सर झुकाना नहीं पड़ता बल्कि उनके साथ सर उठाकर खड़े रहने का हक मिलता है ! कमाल की बात तो यह है कि खुद को साहब कहलवाने का शौक रखने वाले तो हवा हुए पर जिनके नाम के साथ साहेब जुड़ा, वे सदा के लिए अमर हो गए, फिर चाहे वे नाना साहेब पेशवा हों ! बाला साहेब देवरस हों ! बाला साहेब ठाकरे हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों या फिर दादा साहेब फाल्के हों...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

कभी-कभी पूरी जानकारी ना होने से कुछ शब्द भ्रमित कर जाते हैं ! वैसा ही एक शब्द है, साहब ! जो अंग्रजों द्वारा खुद को आम जनता से अलग दिखलवाने की लालसा के कारण एक निर्धारित, सोची समझी, श्रेष्ठि और मजदूर वर्ग में भेद-भाव और सम्मान पाने की साजिश के तहत गढ़ा गया ! उस समय यह अंग्रेजों के लिए ही प्रयोग किया जाता था ! जिससे शासक और शासित, मजदूर और मालिक में भेद किया जा सके ! पर समय के साथ-साथ यह भारतीय उच्चाधिकारियों के साथ भी जुड़ता चला गया ! धीरे-धीरे इसका प्रयोग इतना व्यापक और लोकप्रिय हो गया कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारतीय उच्चाधिकारियों, रसूखदारों, आत्मश्लाघि लोगों ने अपनी अहम-तुष्टि के लिए इसे अपने साथ जोड़े रखा !  

अब पूरी जानकारी के अभाव में यह सवाल मन में उठना स्वाभाविक ही था कि जो शब्द सामाजिक अलगाव के लिए उपयोग किया जाता रहा हो ! ऊँच-नीच का भेदभाव दर्शाता हो, उसे हमारे सम्मानित, सामाजिक समरसता के लिए माने जाने वाले, देवतुल्य सिख गुरुओं तथा उनके स्मारकों के साथ कैसे जोड़ दिया गया ! देश के लिए अपनी जान तक की परवाह ना करने वाले, देशहित के लिए जीवन समर्पण करने वालों के साथ कैसे जोड़ दिया गया ! 

विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध विवरणों से जो जानकारियों मिलीं, वे साफ करती हैं कि मूल शब्द ''साहिब'' अरबी भाषा का है। जिसका अर्थ है, ईश्वर के समकक्ष या भगवान के साथी। इसीलिए इसे देवतुल्य गुरुओं के साथ जोड़ा गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी एक-दो जगह इस शब्द को श्री राम जी के लिए उपयोग किया है। अन्य धर्मों के धर्म-ग्रंथों में भी इस शब्द का जिक्र पाया जाता है !

यह भी अंग्रेजों की कुटिलता की एक बानगी है कि उन्होंने साहिब जिसका अर्थ होता है भगवान के साथी, उसका सरकारीकरण कर उसे साहब कर दिया जिसका अर्थ होता है सरकार के प्रतिनिधि ! जिसने बाद में मुखसुख के कारण ''साब'' का रूप अख्तियार कर लिया। लोगों के जेहन में बैठे इस शब्द को शायद इसीलिए चुना गया होगा ताकि लोगों को अपनी औकात और उनकी बात आसानी से नमाझ में आ जाए ! 

अब रही इसी से मिलते-जुलते तीसरे शब्द ''साहेब'' की ! यह शब्द उन स्वाभिमानी देश प्रेमियों द्वारा रचा गया जो अंग्रेजों की मानसिकता को समझते थे। उनकी चाल का जवाब उन्हीं शैली में देने के लिए इसे हथियार बनाया गया ! साहब के खिलाफ साहेब की रचना हुई ! जहां साहब का अर्थ सरकार का साथी मायने रखता था वहीं साहेब शब्द खुद को आम सर्वहारा जनता का साथी या प्रतिनिधि बताता है। कमाल की बात तो यह रही कि खुद को साहब कहलवाने का शौक रखने वाले तो हवा हुए पर जिनके नाम के साथ साहेब जुड़ा, वे सदा के लिए अमर हो गए, फिर चाहे वे नाना साहेब पेशवा हों ! बाला साहेब देवरस हों ! बाला साहेब ठाकरे हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों या फिर दादा साहेब फाल्के हों ! सभी को नमन !

साहिब से साहब, साहब से साहेब ! बात सिर्फ एक शब्द की मात्रा की हेरा-फेरी की नहीं है बल्कि उसमें रची गई साजिश की है ! उस साजिश को नाकाम करने की है ! उसमे लाए गए फर्क को आम आदमी को समझाने की है ! साहिब के सामने हर नागरिक श्रद्धा से सिर झुकाता है ! साहब के सामने मजबूरी में सर झुकाना पड़ता है। जबकि साहेब के सामने सर झुकाना नहीं पड़ता बल्कि उनके साथ सर उठाकर खड़े रहने का हक मिलता है।  

@श्री देवव्रत त्रिपाठी जी, श्री कीरत सिंह जी तथा अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

जो कभी नहीं जाती, उसी को जाति कहते हैं

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे ! उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे ! ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज बहुत दिनों बाद बिनोद आया था ! देखने से स्वस्यचित्त नजर आ रहा था ! पर हाव-भाव से कुछ ऐसा भी महसूस हो रहा था कि कुछ कहना चाह रहा है पर झिझक और संकोच उसे रोक रहे थे ! प्रसंगवश बतला दूँ कि बिनोद मूलतः झारखंड का निवासी है। पूरा नाम बिनोद कुमार झा है। स्नातक है। वर्षों से दिल्ली में आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है ! माँ-बाप गुमला, झारखंड, में रहते हैं ! थोड़ी-बहुत गुजारे लायक जमीन है।  बिनोद सात-आठ साल से मेरे संपर्क में है ! सीधा, सरल, नेक, अविवाहित युवक है ! मुझ से अपने हर मसले को साझा करता रहता है ! हमारे बीच एक अनजाना सा रिश्ता पनप गया है।  पर आज करीब आधे घंटे से मेरे पास बैठे रहने के बावजूद खुल नहीं पा रहा था ! मैंने ऐसे ही उसे कुरेदा,

क्या बात है, सब ठीक है ना ?"                       

हाँ भइया, सब वइसा ही चल रहा है''

पर तुम्हें देख, लग तो नहीं रहा !'' मैं मुस्कुराया, वह कुछ झेंप सा गया ! कुछ देर चुप रहा, फिर जैसे उसने अपने संकोच को परे धकेल दिया, बोला,

भइया जी, हम सोच रहे हैं कि अपना जाति बदल लिया जाए, एस टी या एस सी बन जाऊं ?''

मैं जैसे छत से गिरा ! हक्का-बक्का रह गया ! बोल क्या रहा है यह लड़का ! पगला क्या है क्या ?

क्या कह रहे हो ?''

भईया का है ना, उसमें बहुते तरह का फायदा रहता है ! तरह-तरह का सहूलियत मिलता है ! नौकरी भी लग जाता है ! ई, झा-वा में कुच्छो नहीं रखा !'' 

मुझे तो जैसे सांप सूँघ गया हो ! उसको कैसे समझाऊं, जब खुद ही कुछ नहीं समझ पा रहा था ! बिनोद जवाब के लिए मेरा मुंह जोह रहा था ! कुछ तो मुझे बोलना ही था......! किसी तरह कहा,

अरे ! ऐसा थोड़े ही होता है, यह कोई नाम या धर्म थोड़े ही है, जो जब चाहे बदल लिया ! जाति एक ऐसी व्यवस्था है जो हमारे यहां कर्म से नहीं जन्म से निर्धारित होती है। इसलिए कोई इंसान अपनी जाति कभी भी नहीं बदल सकता ! यदि ऐसा हो जाए तो पूरे समाज का ढांचा बिगड़ जाएगा ! अफरा-तफरी मच जाएगी ! वैसे यह गैर कानूनी भी है !''

पर भइया जी, हमारे जान-पहचान के एक नेता टाइप के मनई हैं, उनका राजनीती में बहुत चलता है ! बड़का-बड़का लोग से जान-पहचान है ! ऊ कह रहे थे, एक रास्ता है ! उससे सब मैनेज हो जाएगा ! थोड़ा खर्चा और समय लगेगा ! हम सोचे पहले भइया जी से पूछ लें, इसीलिए सलाह लेने आए थे !'' 

देखो, बिनोद ! मैं इतना जानता हूँ कि यह काम पूरी तरह से गैर कानूनी है ! पर इसके किसी लूप होल से यदि कोई ऐसा कर भी लेता है तो वह भी हर दृष्टि से गलत ही होगा ! इसलिए मेरी यही सलाह है कि ऐसे किसी पचड़े में मत पड़ना ! समय और पैसा दोनों बर्बाद कर दोगे ! जो भी तुम्हें ऐसा हो जाने का आश्वासन दे रहा है, वह गलत कर रहा है ! हमारे देश में किसी भी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति कितनी ही कोशिश कर ले, अपने रहने की जगह बदल ले, नाम बदल ले या धर्म ही बदल ले, वह अपनी जाति से पीछा नहीं छुड़वा सकता।''

पर भईया जी, यदि कोई अपना धर्म बदल ले, तब तो उसका जाति खत्म ना हो जाता है ?'' 

क्या कहना चाहते हो ?''    

यही कि यदि हम धर्म बदल लें तो हमारा जाति ऑटोमेटेक्लि खत्म हो जाएगा और फिर हम अपना धर्म में वापस आ जाएं तो ?''

मैं समझ गया कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए इसको किसी ने पूरी पट्टी पढ़ा दी है ! अपना हित साधने के लिए इसे मोहरा बना रहा है ! इसलिए इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उसको कहा, 

देखो बिनोद, किसी के बहकावे में मत आ जाना ! यह सब इतना सरल नहीं है ! हर धर्म में उसके कुछ अपने नियम और विभाग होते हैं ! वह एक अलग और गहन विषय है ! पर तुम इतना समझ लो कि यदि कोई इस तरह का उल्टा-सीधा रास्ता अख्तियार करता है, तो भी अपनी मन-मर्जी नहीं कर सकता ! यदि ऐसा कर वह किसी जाति विशेष को अपनाता है, तो पहले यह देखा जाएगा कि उस जाति के लोग उसे स्वीकार करते भी हैं कि नहीं ! दूसरा इस तरह जाति बदलने वाले को पहले खुद को उसी जाति का होने का प्रमाण भी देना पड़ता है ! ऐसे बहुत से केस हो चुके हैं और किसी को भी कानूनी तौर पर सफलता नहीं मिली है ! मैं फिर कहता हूँ कि इस पचड़े में मत पड़ो ! कोई जरुरी नहीं कि यह सब उटपटांग करने के बाद भी भाग्य तुम पर मेहरबान हो ही जाएगा !''

ठिक्के कह रहे हैं आप ! ई सब यदि एतना ही सहज होता तो कोई भी, जब भी चाहता अपनी जाति बदल लिए होता ! तब तो बहुते भसान मच जाता ! पर भईया जी, अपने देश में अइसे बहुते लोग हैं जो सालों से अपना नाम-उपनाम बदल कर मजे से जीवन बिता रहे हैं ! केतना लोग पकड़ा भी गया है ! तिस पर ई भी तो सच्चे है कि रसूखवाला, पइसावाला, ताकतवाला लोग ही ज्यादा गलत काम करता है ! हमको भी हमारे पिताजी मना किए थे ई सब करने से ! बोले थे, बिटवा किसी लालच में आ कर अंधे कूऐं में झलांग मत लगाना ! भगवान जो दिया है, उसमें खुश रहो ! मेहनत करते रहो, उसी से सफलता मिलेगी ! देक्खे रहे हो केतना गरीब-गुरबा का बच्चा लोग अपना मेहनत से कहां का कहां पहुंच गया ! बस, मेहनत से जी मत चुराना !''

फिर भी तुम चल पड़े ?''

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ तो इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे हैं  !उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे !  ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे.....!

बिनोद की आँखें भर आईं थीं ! मैं समझ रहा था, एक बेटे का अपने माता-पिता से लगाव ! उनके प्रति उसका अपना कर्तव्य ! उसका दर्द ! उसकी छटपटाहट ! उसकी मजबूरी ! उसकी हताशा !    

मैंने उसके सर पर हाथ रखा ! वह फफक पड़ा ! कुछ देर बाद अपने को संभाल बोला,

भईया जी, हमको माफ कर दीजिए''

अरे ! किस बात की माफ़ी ? तुमने क्या किया है ? तुम तो खुद ही समझदार हो ! उठो ! मुंह-हाथ धो लो ! फिर एक-एक कप चाय हो जाए, भाभी को बोल दो पकौड़ों के लिए ! 

बाहर बारिश की झमाझम सुखद लगने लगी थी !   

रविवार, 9 जून 2024

कंगना कांड, विरोध की पराकाष्ठता,

बात उस समय की है जब शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजीव गांधी कोलंबो गए थे ! 30 जुलाई 1987 को उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था। तभी एक श्रीलंकाई सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने, जो भारत से शांति सेना को लंका भेजे जाने के फैसले से नाराज था, अपनी बंदूक की बट से उन पर हमला कर दिया था। हालांकि राजीव गांधी जी को ज्यादा चोट नहीं लगी, वे बच गए थे ! किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर विदेशी धरती पर हुआ यह इकलौता हमला है। पर उस समय भारत की किसी विपक्षी पार्टी ने यह नहीं कहा था कि यह तमिलों का आक्रोश है या उनका कांग्रेस के प्रति गुस्सा है ! राजीव जी के धुर विरोधी भी उनके पक्ष में थे...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

कंगना कांड की तपिश कम होती नहीं दिख रही ! पक्ष-विपक्ष दोनों लगे हैं हवा देने में ! जाहिर है विपक्ष की नफरत कंगना रूपी महिला से उतनी नहीं है जितनी भाजपा नेत्री कंगना से है ! उसका बड़बोलापन भी इसका एक कारण हो सकता है ! पर बात है उस सुरक्षा कर्मी कुलविंदर कौर की, जो अपनी भावनाओं पर काबू ना पा सकी ! आज वह जाने-अनजाने पूरे देश में नाम और बदनाम दोनों पा गई ! उसके भविष्य को लेकर चिंतित लोगों ने उसके लिए नौकरियों की बौछार कर दी ! उसका स्तुति गान होने लगा ! इसलिए नहीं कि वह एक महिला है बल्कि इसलिए कि वह भाजपा विरोधी है ! खुद महिला होते हुए भी कई महिलाएं तक इसी बात पर खुशी जाहिर कर रही हैं ! यह बात उनके दिमाग में क्यों नहीं आती कि विवेकहीन, कुंठित, पूर्वाग्रही दिमाग, ऐसा किसी के साथ भी कर सकता है ! अभी कुछ दिनों पहले फेबु का एक आत्मश्लाघि तथाकथित बुद्धिजीवी इस बात से खुश था कि IPL क्रिकेट तमाशे में गुजराती अंबानी की टीम हार गई थी और गुजराती पांड्या की भद पिट रही थी ! कहां ले जा रहा है हमें यह व्यक्तिगत विरोध ? क्या होगा ऐसी सोच का ? कब हमारा विरोध इंसान से उठ, जाति, समाज, धर्म, प्रदेश  तक पहुंच गया पता ही नहीं चला...........!

दुखद व शर्मनाक घटना 
इतिहास भी हमें राह नहीं दिखा पाया ! बात उस समय की है जब शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजीव गांधी कोलंबो गए थे ! 30 जुलाई को उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था। तभी एक श्रीलंकाई सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने, जो सिंहली समुदाय से था और भारत से शांति सेना को लंका भेजे जाने के फैसले से राजीव गांधी से नाराज था, अपनी बंदूक की बट से उन पर हमला कर दिया था। हालांकि राजीव गांधी जी को ज्यादा चोट नहीं लगी, वे बच गए थे ! किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर विदेशी धरती पर हुआ यह इकलौता हमला है। यह व्यक्तिगत विरोध की पराकाष्ठता थी ! पर उस समय भारत की किसी विपक्षी पार्टी ने यह नहीं कहा था कि यह तमिलों का आक्रोश है या उनका कांग्रेस के प्रति गुस्सा है ! राजीव जी के धुर विरोधियों ने भी किसी भी तरह की खुशी जाहिर नहीं की थी ! सभी का मत था कि इस बात की जितनी भी निंदा की जाए वह कम है ! यह भी देखने की बात है कि उस समय भी भारत विरोधी शक्तियों ने रोहन विजेमुनि को हीरो नहीं बना दिया था ! तमिलों ने भी उसे पुरस्कृत नहीं कर दिया था ! क्योंकि गलत बात, गलत है, चाहे किसी के भी प्रति या किसी भी परिपेक्ष्य में की गई हो ! रोहन विजेमुनि को वहां की सरकार ने तत्काल गिरफ्त में लिया, उसका कोर्ट मॉर्शल हुआ और उसे छह साल की सख्त सजा मिली ! हालांकि बाद में राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा ने अढ़ाई साल बाद उसे क्षमा दान दे दिया था !

आपके विचार, आपका मत, आपकी धारणा किसी और से मेल नहीं खाती तो इसका मतलब यह तो नहीं कि आप हिंसा का सहारा ले लें ! क्या इस तरह के क्षणिक आवेश की प्रशंसा करना उचित है ? यदि इस बात को शह दी जाती रही तो अराजकता का क्या हाल होगा, सोचा भी नहीं जा सकता ! कल ऐसा ही कोई सिरफिरा विपक्ष के नेता पर हाथ उठा देगा ! किसी दिन कोई सुरक्षाकर्मी किसी बड़े व्यवसाई का अपमान कर देगा ! ऐसा ही रहा तो आम इंसान के साथ कैसा व्यवहार हो सकता है, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है ! सीधे शब्दों में कहें तो उस सुरक्षा कर्मी की इस हरकत पर गहराई से विचार होना चाहिए ! 

आज यह देख कर खेद होता है कि समाज में असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है ! जरा-जरा सी बात पर लोग उत्तेजित, उद्वेलित हो जाते हैं ! ऐसा होना व्यक्ति, परिवार, समाज और देश, किसी के लिए भी हितकर नहीं है ! ठीक है कि सभी की अपनी-अपनी सोच है, अपने-अपने विचार हैं ! अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं ! अपने-अपने हित हैं ! पर फिर भी हमारी विचारधारा कुछ भी हो ! हम किसी भी दल नेता, जाति, धर्म को मानते हों ! हमारी मान्यता कुछ भी हो, इसका मतलब यह नहीं कि हम ही सही हैं और जो हमारा विरोधी है वह सिरे से गलत है और गलत है तो वो हमारा शत्रु है ! देश हित में तो ऐसा कदापि, कदापि उचित नहीं है ! नेताओं, सामाजिक संगठनों, धर्म के झंडाबरदारों, हमको-आपको सभी के लिए देश, सिर्फ देश ही प्रथम होना चाहिए !   

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सरकारी सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो क्यों ना खर्च भी उसी से वसूला जाए

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है तो उस पर होने वाला खर्च भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग     

है ना विडंबना ! देश के तकरीबन 21 हजार वीआईपी लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 57 हजार जवान तैनात हैं। जबकि आम इंसान जो अपनी गाढ़ी कमाई के एक हिस्से से इन महानुभावों की रक्षा का खर्च उठाता है, उस जैसे साढ़े छह सौ से भी ज्यादा लोगों की देख-भाल की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ एक पुलिस वाला उपलब्ध होता है !

रोजमर्रा की जिंदगी का दवाब, परिवार की परवरिश, दो जून की रोटी, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा-दारु, खुद की हारी-बिमारी के उधड़ते तानों-बानों को सरियाने में उलझा होने के बावजूद उस आम इंसान के मन में तब और भी क्षोभ और आश्चर्य उत्पन्न हो जाता है, जब वह ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे इंसानों को सुरक्षा के घेरे में चलते देखता है ! उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनसे दूसरों को सुरक्षा की जरुरत होती है ! कुछ ऐसे धनाढ्य होते हैं, जिनके पालतू पशु भी इंसानों से बेहतर जिंदगी जीते हैं ! उनके कारवां को गुजरते देख यह भला आदमी किनारे खड़ा सोचता है कि इनको किससे सुरक्षा चाहिए और क्यूँ  ! और चाहिए तो सक्षम होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखने का उपाय खुद ही क्यों नहीं करते ! देश पर, समाज पर, सरकार पर क्यों बोझ बने हुए हैं ! और फिर सरकार ही, जो इन्हें सुरक्षा मुहैय्या करवाती है, वह इनसे इन्हें सुरक्षित रखने की कीमत क्यों नहीं वसूल करती ! यह सही है कि देश हित में जुटे लोगों को सही मायने में सुरक्षा की जरुरत होती है ! उन्हें मिलनी भी चाहिए ! वैसे समर्पित लोगों लिए तो पूरा देश अपना सब कुछ समर्पण कर सकता है। पर किसी को भी, कभी भी, किसी भी बात पर सुरक्षा दे देना तो हर किसी को नागवार गुजरता है और गुजरना चाहिए भी !  

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आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है

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हालांकि सुरक्षा किसे दी जाए या किसे मिलनी चाहिए, इसके लिए केंद्र और राज्यो में कमेटियां बनाई गई हैं, पर वहां भी रसूख और राजनीति की गहरी दखलंदाजी पैठी हुई है। वैसे ही हमारे देश में पुलिस बल बहुत कम है और ऐसे कामों से संख्या में और क़तर-ब्योंत हो जाती है ! जरुरी  कामों और जगहों में पुलिस बल की कमी आम आदमी द्वारा भी वर्षों से महसूस की जाती रही है ! ऐसे में किसी को भी सुरक्षा प्रदान कर देने वाली ख़बरें सवाल खड़े करने लगी हैं। 

करीब तीन साल पहले संसद में वीआईपी की परिभाषा पूछे जाने पर तात्कालिक गृहराज्य मंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसी कोई आधिकारिक नामावली नहीं है। इसके बावजूद इस गरीब देश में वीआईपी संस्कृति या कहिए ख़ास लोग और उनका दबदबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसी हिसाब से उनकी सुरक्षा भी बढ़ रही है। धीरे-धीरे यह सुरक्षा कम, स्टेटस सिम्बल यानी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता चला जाने लगा है ! इसीलिए इस सुविधा के हटाए जाने पर बवाल भी मचने लगे हैं ! जिन जवानों ने देश के हित, सेवा और सुरक्षा की चाह में अपना खून-पसीना एक कर, कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय किसी की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे। वह भी तब जब उस आदमी की हकीकत भी उन्हें मालुम हो ! 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है। 

मारे देश में किसी को सुरक्षा प्रदान करने की पांच श्रेणियां हैं। सबसे ऊँची श्रेणी SPG है। फिर Z+ की श्रेणी आती है। उसके बाद Z, फिर Y, और फिर X कैटेगरी का नंबर आता है। इन्हें खुफिया विभाग की सूचना और सलाह पर गृह मंत्रालय द्वारा मुहैय्या करवाया जाता है। इसकी समय-समय पर सुरक्षा समीक्षा भी की जाती है। अलग-अलग श्रेणी के हिसाब से इनमें जवानों की संख्‍या तय होती है। खतरे का आकलन कर इन श्रेणियों को पाने वाले लोगों में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, वर्तमान और पूर्व जज, वर्तमान और सेवा निवृत सरकारी अफसर, व्यापारी, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार और धार्मिक गुरु, कोई भी हो सकता है।  

SPG, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप, यह सर्वोच्च सुरक्षा श्रेणी है। इसमें पैरामिलिट्री फ़ोर्स के जवान होते हैं। फिलहाल यह सुरक्षा अभी सिर्फ प्रधान मंत्री को ही उपलब्ध है। इसकी रोज की लागत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से भी ऊपर आती है। परन्तु यदि इसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर की जाने वाली राशि से की जाए तो यह राशि उसके आस-पास भी नहीं पहुंचती, जो तकरीबन 36.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रूपए, रोज की है।

Z+, इस श्रेणी में 10 एनएसजी कमांडो सहित 36 जवान होते हैं। इसके अलावा पुलिस ऑफिसर भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होते हैं। परंतु पहला सुरक्षा घेरा एनएसजी कमांडो ही बनाते हैं। ये जवान मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित होते है और बिना किसी हथियार के भी दुश्मन से लड़ने में सक्षम होते हैं। यह सुरक्षा वीवीआईपी को उपलब्ध करवाई जाती है। परन्तु जब वह व्यक्ति राज्य से बाहर जाता है तो कुछ ही जवान उसके साथ रहते हैं, बाकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस राज्य की होती है, जहाँ वह व्यक्ति जा रहा होता है। इसके लिए दौरे की पूर्व सूचना राज्य को देनी होती है। इसका खर्च करीब एक करोड़ रूपए प्रति माह प्रति व्यक्ति का है !

Z, इसमें 22 जवान, स्थानीय पुलिस के कुछ लोग चार-पांच कमांडो होते हैं। इस पर हर माह करीब 20 लाख रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होते हैं। 

Y, इस श्रेणी में 11 जवान, स्वचालित हथियारों के साथ निजी सुरक्षा कर्मी, आवास पर पांच गार्ड के अलावा एक एस्कॉर्ट वाहन भी उपलब्ध करवाया जाता है। इन सब पर प्रति व्यक्ति करीब 12 लाख रूपए प्रति माह का खर्च आता है।  

X, इस कैटेगरी में दो सुरक्षा कर्मी और एक पीएसओ उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें कोई कमांडो नहीं होता। ऐसी व्यवस्था पर  प्रति माह करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च होते हैं।  

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो उस पर होने वाला खर्च  भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदहारण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा।   

बुधवार, 16 सितंबर 2020

शिखरारूढ के लिए जिम्मेदारी निभाना जरूरी है

आजकल किसी भी समारोह, सम्मान, उपाधि आदि को सदी से जोड़ देने का चलन चल पड़ा है ! सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा विशेष के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में जीवित हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के .............................................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रजतपट पर अदाकारी दिखाने वाले कलाकारों का दबदबा समाज पर सदा से ही रहा है। पर्दे पर बुराई, अन्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले, असत्य पर सत्य को विजय दिलाने वाले इनके किरदार अपार लोकप्रियता हासिल कर इन्हें असल जीवन में भी अवाम का नायक बना देते हैं। भले ही अपने निजी जीवन में वे अपने निभाए हुए किरदारों के बिल्कुल विपरीत ही क्यों न हों ! मध्यम-निम्न-सर्वहारा वर्ग के लोग, जो व्यवस्था से, समाज के सशक्त वर्ग से या भ्रष्टाचारी संतरी-मंत्री के जुल्मों का शिकार होते हैं और निर्बल होने के कारण उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते, ऐसे लोग जब पर्दे पर अपने जैसे एक आम इंसान को उनको दंड देते, प्रताड़ित करते या अपना हक़ छींन कर लेते देखते हैं तो उस किरदार को निभाने वाले शख्स को सर-माथे पर बैठा लेते हैं ! उसमें अपनी छवि देखने लगते हैं ! उससे खुद को इस हद तक जोड़ लेते हैं कि उसे भगवान तक का दर्जा दे देते हैं। इसी लिए कभी सुदूर किसी दूसरे देश में भी यदि इनके नायक के साथ कानूनन भी कोई कार्यवाही हो जाए तो उसके चाहने वाले देश में हंगामा बरपा देते हैं। 

पर्दे पर के नायकों का प्रभाव लोगों पर इतना गहरा होता है कि इनकी हर बात को ब्रह्मवाक्य मान उस पर विश्वास कर लिया जाता है। जनता की इसी कमजोरी का लाभ उठा, विज्ञापनदाता अपने उत्पादों के प्रचार के लिए इनका "उपयोग'' करते आ रहे हैं। इस श्रेणी में अपवाद स्वरुप दो-चार लोग, अलग क्षेत्र से जरूर शामिल हैं, पर वे सब दूसरी पायदान पर ही बने रह पाए हैं। सोच कर देखिए कि यदि कोई प्रभावशाली धर्मगुरु या कोई नेता या उद्योगपति किसी चीज की सिफारिश करे तो क्या लोग उनकी बात मान उस ओर उतना आकर्षित होंगें जितना किसी दूसरे या तीसरे दर्जे के अभिनेता या अभिनेत्री के कहने से हो जाएंगे !  कभी नहीं ! 

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एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि

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पर विडंबना क्या है ? वही भगवान बने बैठे लोग, कुछेक को छोड़, उन करोड़ों लोगों, जिन्होंने उन्हें सर माथे पर बैठाया, जिनकी बदौलत उन्हें नाम-दाम-यश-शोहरत-सम्मान मिला, उनकी ही कभी फ़िक्र नहीं करते ! उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की ''सेहत'' की चिंता रहती है। अवाम से जुडी या समाज को प्रभावित करने वाली बात पर ये लोग चुप्पी साध लेते हैं ! कौन पचड़े में पड़े ! कौन खतरा मोल ले ! पता नहीं, कोई बात क्या बिगाड़ कर रख दे ! कल बातों ही बातों में कुछ ऊक-चूक हो जाए तो काम-धंधा ही ठप्प ना पड़ जाए ! और ये वे लोग हैं जो पैसा मिलने पर बेझिझक किसी के शादी-ब्याह में नाचने या किसी गलत और बेतुकी चीज का ब्रांड एम्बेस्डर बनने में पीछे नहीं रहते ! यह बात सही है कि देश के हर नागरिक की तरह इन्हें अपनी मर्जी का काम करने का अधिकार है ! पर शिखर पर पहुंचते ही कुछ जिम्मेदारियां खुद ब खुद झोली में आ गिरती हैं ! प्रशंसकों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं ! देश-समाज इनकी तरफ देखने लगता है ! तब आप का जीवन सिर्फ आपका नहीं रह जाता ! पर रील की जिंदगी के ये हीरो रियल जिंदगी में जीरो ही साबित होते हैं ! हमारे ये तथाकथित नायक सब कुछ अनदेखा-अनसुना कर निरपेक्ष भाव से आँखें मूंदे पड़े रहते हैं। इस बात में हमारे दक्षिणी भारतीय अदाकार अपने कर्त्वयों और समाज की जिम्मेदारी के प्रति फिर भी कुछ जागरूक हैं। 

अभी ताजा हालातों पर ही गौर किया जाए तो यही पाया जाएगा की शीर्ष पर बैठे, अवाम के तथाकथिक ''आदर्श'' अपने मुंह पर टेप लगाए रहे, किसी ने चूँ तक नहीं की ! दो-चार थकी-दबी ध्वनियां उठीं भी, तो ऐसे लोगों की जो इस सुअवसर को ख़बरों में आने का मौका मान चौका लगाना नहीं चूके ! ऐसे लोगों का बोलना जनता को नहीं बल्कि अपने क्षेत्र के दिग्गजों को सुना, अपने अस्तित्व का भान कराना था।  हाशिए पर बैठे ऐसे लोग क्या और उनकी बातों का वजन क्या ! सब मौकापरस्ती और अवसरवादिता का खेल ! शायद कोई छींका टूट ही जाए। 

इधर एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को मशहूर करने के लिए उसे सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सदी यानी सौ वर्ष !!

सवाल यह उठता है कि ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है क्या ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के !

सोमवार, 14 सितंबर 2020

कोरोना ने समझाया परिवार का महत्व

एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान  शुरू हो गया था। जो इस कोरोना संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं। उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान -दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जगत में घटने वाली हर बात में अच्छाई और बुराई, दोनों ही निहित रहती हैं। अब जैसे इस कोरोना आपदा को ही लें जो मानवमात्र के अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व संकट के रूप में जाना जाता तो रहेगा, परंतु इसके भी कुछ परोक्ष और अपरोक्ष फायदे तो मिले ही हैं। जैसे जल-थल-वायु का साफ़ होना ! पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार ! इंसान का संयमित होना ! कम संसाधन वाले देशों के प्रति सक्षम देशों का मैत्रीपूर्ण व्यवहार इत्यादि ! परन्तु सबसे बड़ी बात है कि इसी बीच इंसानों की सोच-आचार-व्यवहार में भी बदलाव दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिका की, जिसके तौर-तरीके और जीवन शैली अपनाने के लिए हम लालायित रहते हैं, खबर है कि वहां के लोग अब अपने माता-पिता या अभिवाककों के पास जा कर रहने लगे हैं। एकल के बनिस्पत संयुक्त परिवारों में रहना लोग पसंद करने लगे हैं। उनको समझ में आ गया है कि उसकी सुरक्षा, प्रेम, अपनापन अन्यत्र हासिल नहीं हो सकता। बच्चों को बेहतर, नेक और भला इंसान बनाने में भी संयुक्त परिवार और उसके बुजुर्ग सदस्यों का बहुत बड़ा योगदान रहता है। 

कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन के तहत भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक आए ठहराव, बीमार होने के डर, अकेलेपन के तनाव ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इससे उत्पन्न चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता के माहौल से दिन-रात जूझते लोगो को परिवार की याद सताने लगी ! उन युवाओं के अलावा, जो किसी भी तरह की खलल से दूर रह कर अपनी जिंदगी जीना चाहते थे ! वे दम्पत्ति जो पहले अपनी स्वतंत्र्ता में किसी की टोका-टाकी ना चाहते हुए अकेले रहना चाहते थे, या जो किसी भी कारणवश सिर्फ अपने लिए जीने का ख्वाब पाले बैठे थे ! ऐसे लोगों को इस विपदा ने परिवार की अहमियत समझा दी। वे अब अपने माँ-बाप, यहां तक की बुजुर्ग दादा-दादी के पास जा कर रहने में सकून पाने लगे हैं ! एक मोटे अनुमान के अनुसार इस साल के मार्च से मई तक के समय में करीब 29 से 30 लाख लोगों ने संयुक्त परिवार  को फिर से अपना लिया है। ये रुझान दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसमें पढ़ाई करने वाले युवाओं की संख्या शामिल नहीं है जो मजबूरी में परिवार से दूर रह रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो संयुक्त परिवार का माहौल उन्हें फिर मुआफ़िक लगने लगा है।  

वैसे यह बदलाव कोरोना संकट के पहले से ही आकार लेने लगा था। एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान शुरू हो गया था। जो इस संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं।उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान-दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं। 

हमारी इस मनोवृत्ति की आंच को हवा दे, अपनी रोटी सेकने में बाजार भी पीछे नहीं रह रहा ! आए दिन ऐसे विज्ञापन परदे पर दिखाई देते रहते हैं जो ढके-छिपे, द्विअर्थी शब्दों के जाल फैला, एकल परिवार की वकालत करने से बाज नहीं आते ! जितना लोग अलग और अकेले रहेंगे, उतनी ही इनकी खपत बढ़ेगी ! इन पर ध्यान और लगाम कसना जरुरी है ! पर हमारा चलन है कि जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता तब तक हम और हमारी सरकार नशे में गाफिल ही रहते हैं। कुछ दिनों पहले एक बैंक भी ऐसा ही कुछ एकल परिवार के फायदों के बारे में समझा रहा था ! आजकल एक बाहरी कंपनी Disney+hotstar  का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें पता नहीं किस मध्यम वर्गीय परिवार की अजीबोगरीब तस्वीर दिखा कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! #सरकार_तक_बात_पहुंचाने_की_कोशिश_के_बावजूद_धड़ल्ले_से_यह_विज्ञापन_प्रसारित_हो_रहा_है। 

विडंबना ही तो है कि दुनिया में परिवार एकजुट होने की ओर तत्पर हैं और हम टूटन में अच्छाई खोज रहे हैं !

@संदर्भ, दैनिक भास्कर 

शनिवार, 5 सितंबर 2020

बहुत हो गया परिवार

आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी  नकेल विदेशी  हाथों में है,  ऐसे ही ऊल - जलूल,  तर्कहीन, अतिरेक  से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन O.T.T. का शुरू हो गया है,  जिस पर किसी का  भी नियंत्रण नहीं है और  कुछ  भी दिखाने की आजादी है !  जिसके फलस्वरूप  मौकापरस्त  अपने लाभ  के लिए  कुछ  भी बना  कर यहां रिलीज  कर छोटे - छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल टीवी पर  Disney+hotstar  का एक विज्ञापन आ रहा है।  जिसमें पता नहीं कैसी-कैसी  कल्पना कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! विज्ञापन के  अनुसार अगर आप परिवार में रह कर क्रिकेट का मैच देखेंगे तो घर के सदस्यों की भदेस हरकतों और गतिविधियों (अतिरेक) की वजह से बेहाल हो जाएंगे ! यदि अकेले देखेंगे तो सुकून से सब कुछ देख पाएंगे ! विज्ञापन दाताओं ने  बड़ी चालाकी और कुटिलता से क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता को  भुनाते हुए उसके कंधे  पर रख दो निशानों पर गोली चलाई है !  पहला अभीष्ट तो अपने सीरियल वगैरह के लिए भीड़ जुटाना है ! दूसरा परिवार का विघटन करना !  जिससे काम  से लौटे इंसान को मनोरंजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़े बजाए, परिवार के ''झमेलों'' के ! 

आज जब पहले ही पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हों ! देश में परिवारों का विघटन हो रहा हो ! एकल परिवारों का ''फैशन'' जोर पकड़ रहा हो ! रिश्ते-नाते सब ताक पर धरे जा रहे हों ! बच्चों को बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, काका-ताऊ जैसे शब्द अजूबा लगने लगे हों ! छोटे-छोटे शहरों में वृद्धाश्रमो की बाढ़ सी आ गई हो ! शादी-ब्याह जैसी रस्मों को भूल युवा, यूज एंड थ्रो जैसी सुगम पर अनैतिक लीव इन रिलेशन जैसा चलन अपना रहे हों ! तब इस तरह के विज्ञापन तो उत्प्रेरक का ही काम करेंगें ! सबसे नागवार बात तो यह है कि विदेशी आका और उसकी स्थानीय कठपुतलियों ने पता नहीं किस घर की तस्वीर पेश की है ! क्या भारत के मध्यम वर्ग के घर ऐसे होते हैं ! 

आज बाहरी शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, देश में अस्थिरता लाने की ! यह विज्ञापन भी उन्हीं के षड्यंत्र का एक हिस्सा लगता है ! पहले इंसान फिर समाज, फिर उसकी आस्था-मान्यता-रीति-रिवाज को तोड़ो, अस्थिरता अपने आप आ जाएगी ! आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी नकेल विदेशी हाथों में है, ऐसे ही ऊल-जलूल, तर्कहीन, अतिरेक से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन OTT का शुरू हो गया है, जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और कुछ भी दिखाने की आजादी है ! जिसके फलस्वरूप मौकापरस्त अपने लाभ के लिए कुछ भी बना कर यहां रिलीज कर छोटे-छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे !

आशा तो यही है कि #सरकार, #सूचना_तथा_संचार_मंत्रालय इस तरफ ध्यान देंगें और इस तरह के, अवाम, समाज, देशहित विरोधी चलन पर सख्ती से रोक लगाएंगे। 

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

हमीं ने दर्द दिया, हमें ही दवा देनी है

कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वे सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी चीज यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी  चीजें भी रैपर में लिपटी मिलने लगी हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि सस्ती खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं ! अब साफ़-सफाई या शुद्धता का तो पता नहीं पर इस चलन से पलास्टिक या पॉलीथिन का कचरा बेलगाम-बेहिसाब बढ़ना ही था सो बढ़ता चला जा रहा है...................! 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ साल पहले तक हमारे कृषि प्रधान देश को भरपूर उपज, खुशहाली, समृद्धि व जलीय आपूर्ति के लिए जीवन दायिनी पावस ऋतु का बड़ी बेसब्री से इन्तजार रहा करता था। पर अब इसकी जरुरत तो है, इन्तजार भी रहता है, पर साथ ही इसकी भयावहता को देख-सुन-याद कर एक डर, एक खौफ भी बना रहता है। अब हर साल बरसात के साथ आने वाला जलप्लावन हमारी नियति ही बन गया है। पता ही नहीं चला कब यह जीवन दायिनी ऋतू, प्राण हरिणी के रूप में बदल गई ! ऐसा भी नहीं है कि यह सबअचानक हो गया हो ! कायनात वर्षों से हमें चेताती आ रही थी पर हम अपने लालच, अपनी महत्वकांक्षाओं, अपनी लिप्सा में अंधे हो उसका शोषण करने से बाज ही नहीं आ रहे थे। विकास की अंधी दौड़ में ऐसी-ऐसी चीजों का आविष्कार कर डाला गया जो प्रकृति को नुक्सान पहुंचाने में अव्वल थीं। इन्हीं चीजों में एक है प्लास्टिक ! जिससे सारा विश्व त्रस्त हो चुका है। दुनिया भर के सागर-नदी-तालाबों में टनों के हिसाब से इस ना गलने-सड़ने-नष्ट होने वाले दानव का जमावड़ा पृथ्वी के अस्तित्व के लिए भी ख़तरा बनता जा रहा है ! इस विश्वव्यापी संकट से हमारा देश भी अछूता नहीं है ! आज जगह-जगह जलभराव होने का यह एक प्रमुख कारण है। 


आज प्लास्टिक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। हमारे जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां इसका दखल नहीं है ! इस बेहद लचीले और मजबूत पदार्थ ने हमें सुविधाएं तो बहुत दीं, पर अब अपनी सैंकड़ों खूबियों और उपयोगिताओं के नावजूद यह हमारी जिंदगी, हमारे वातावरण, हमारे पर्यावरण यहां तक की हमारी पृथ्वी के लिए भी विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। इसमें भी इसका दोष उतना नहीं है जितनी हमारी इस पर निर्भर होते चले जाने की विवेकहीन, अदूरदर्शी निर्भरता ! सुबह टूथ ब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक हम सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहते हैं। इसीलिए घरों से निकलने वाले कचरे में साल-दर-साल प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है। जागरूकता की कमी के चलते इसके अंधाधुंध इस्तेमाल के बाद फेंक दिये जाने वाले प्लास्टिक के रैपर, बोतलें, पॉलीबैग्स, पैकेट्स, डिब्बे और ना जाने कौन-कौन सी चीजों के कचरे से हमारी धरती, हवा, पानी, सागर, नदियां, तालाब सब कुछ प्रदूषित हो गए हैं। जिससे मानव तो मानव, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के जीवन को भी भयानक खतरे का सामना करना पड़ रहा है

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प्लास्टिक को लेकर बहुत गुल-गपाड़ा मचता रहता है ! पर जब हम सुबह टूथब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहेंगें, बाजार से पॉलीथिन में लिपटी चीजें लेते रहेंगें तो इसकी खपत कम कैसे होगी ! इसीलिए घरों से  निकलने वाले कचरे में दिन-प्रति-दिन प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है

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कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। जो कुछ ही समय में अपने को प्रकृति के समरूप कर लेते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वह सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी रोजमर्रा की चीजों के साथ-साथ अनाज, फल, सब्जियां, बेकरी उत्पाद यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी चीजें भी रैपर में लिपटी आने लगी हैं। ड्राइक्लीन करने वाले भी अब कपड़ों को पॉलीथिन के लिफ़ाफ़े में रख देने लगे हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं !! बिना पैकिंग की चीज यानी घटिया स्तर की !! अब जब हर चीज को प्लास्टिक या पॉलीथिन में सजा कर पेश किया जाएगा तो उसका उपयोग तो बढ़ेगा ही ! जितना उपयोग बढ़ेगा उतनी मात्रा में उसका कचरा भी बढ़ना तय है। ध्यान इस ओर देने की भी आवश्यकता है ! सिर्फ रेहड़ी-ढेले वालों पर जोर डालने से तो यह संक्रमण रुकने से रहा !! 


आज इस भयानक समस्या की ओर सभी का ध्यान जरूर गया है पर हमारी लापरवाही, गैर जिम्मेदाराना हरकतों, जागरूकता की कमी और सिर्फ अपने परिवेश का ध्यान, इसका हल नहीं निकलने दे रहे ! आज भी, हमारा घर साफ़ रहे, बाहर का हमें क्या, वाली मानसिकता के तहत अधिकांश घरों से रसोई का कचरा पॉलीथिन में भर आसपास किसी खुले स्थान या सड़क किनारे फेंक देना आम बात है। रास्ते चलते खाली हुए नमकीन के पैकेट, पानी की बोतलें या छोटे-मोटे रैपर को इधर-उधर फेंक देना असभ्यता नहीं माना जाता ! किसी पार्क में या सैर-सपाटे के दौरान अल्पाहार का मजा ले उस जगह को साफ़ कर भी दिया तो उस कूड़े को पास की झाडी इत्यादि के हवाले कर अपने फर्ज की इतिश्री मान ली जाती है ! जबकि अधिकांश जगहों पर कूड़ा पेटी लगी रहती है पर उस तक जाना भी कई लोग गवारा नहीं करते ! ऐसे ही कचरे को जानवर इत्यादि पॉलीथिन समेत निगल रोग ग्रस्त हो जाते हैं ! कई तो अकाल मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं। यही लावारिस कचरा बरसात के दौरान पानी के साथ गलबहियां डाल नालियों और सीवर में पहुँच जाता है। फिर जो होता है, वह तो होना ही होता है। 

जब मुसीबत गले पड़ती है तब हमें यह ज़रा भी ध्यान नहीं आता कि इसका कारण कमो-बेस हम ही हैं ! हमारी लापरवाही हमारे शहर की साफ-सफाई में बाधा डाल, कर्मचारियों पर बोझ तो बढ़ाती ही है साथ ही पर्यावरण को हानि पहुंचाने में भी उसका योगदान कम नहीं होता। इधर बरसात हुई, उधर नाली-सीवर में कचरा फंसा। पानी का दम घुटा ! वह सांस लेने पलटा और बाहर आ कर हमारे साथ-साथ सारे नगर और नगरवासियों का हवा-पानी-खाना-सोना सब हराम कर दिया ! पर इंसान ठहरा इंसान ! उसको कहां अपनी भूल-गलतियों का एहसास रहता है ! वह तो सर झुकाए लग पड़ता है आन पड़ी विपदा से येन-केन पिंड छुड़ाने, उससे किसी तरह पार पाने की जुगत में ! क्योंकि वह एक तरह से मान चुका है कि ऐसा तो होता ही रहता है !

इधर ऐसा सुनहरा सुअवसर पा विपक्ष पिल पड़ता है सरकार पर ! निगम पर ! कर्मचारियों पर ! आरोप-प्रतिरोप का दौर शुरू ! आम आदमी की परेशानियों को दरकिनार कर बात जा पहुंचती है राजनीति के अखाड़े में ! वहां विपक्ष, यह भूल कि चंद दिनों पहले वह भी सत्ता सुख में लिप्त था, को मौका मिल जाता है दुसरों पर आरोपों की बौछार करने का ! वादों के सपने दिखाने का ! अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने का !  पर मूल समस्या से ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं की जाती ! उसे तकरीबन जस का तस रहने दिया जाता है कभी आगे आने वाले समय में सदुपयोग के लिए ! 

इसलिए और किसी पर भरोसा ना कर अवाम को खुद ही समझदार, जागरूक और विवेकशील होने की जरुरत है। हम सब को समझना होगा कि नगर, शहर, परिवेश को साफ रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। इधर -उधर, खाली जगहों में, सड़कों पर कचरा फेंकने के बजाय अगर सभी लोग डस्टबीन में कचरा डालने की आदत बना लें तो सफाई कर्मचारियों को भी अपने काम करने में आसानी होगी। हमें भी बेहतर सेवा मिल पाएगी। इसके साथ ही अब यह कोशिश भी होनी चाहिए कि पॉलीथिन के बजाए कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल किया जाए। ऐसा नहीं है कि इस समस्या से पार नहीं पाया जा सकता ! बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति को मजबूत करने की जरुरत है। एक बार आदत पड़ गई तो फिर शहरों के आस-पास से कुतुबमीनार जितने ऊँचे कचरे के पहाड़ रूपी दानवों से मुक्ति मिलते देर नहीं लगेगी। 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...