हम सब धर्मपरायण लोग हैं ! आस्थावान हैं ! धर्म-भीरु भी हैं ! हम अपने-अपने तरीके से अपने इष्ट की आराधना करते हैं ! पर साथ ही साथ, कहीं ना कहीं मतलबी और स्वार्थी भी हैं ! इसके अलावा एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो अनिष्ट के डर से, किसी अनहोनी की आशंका से ही धर्म का पालन करते हैं ! यह बात दुनिया के सभी धर्मों-पंथों में समान रूप से पाई जाती है और बचपन से ही मन में बिठा दी जाती है कि यदि सर्वोच्च सत्ता की आराधना नहीं की तो अनिष्ट हो जाएगा.........................😞
#हिन्दी_ब्लागिंग
म नुष्य एक मतलबपरस्त, स्वार्थी तथा आशंकित जीव है ! उसे हर समय कुछ पाने की लालसा के साथ-साथ किसी न किसी अनहोनी का डर भी लगा रहता है ! इसीलिए उसे एक संबल की तलाश रहती है। उसके पूजा, इबादत या उपासना करने का सबसे बड़ा कारण यही भावनाएं हैं ! पर जहां डर होता है वहां श्रद्धा नहीं होती ! इसीलिए वह विभिन्न धर्मस्थानों की शरण में जाता रहता है ! कुछ महान हस्तियों, दिव्य पुरुषों-महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो ऐसी भावनाएं कमोबेश संसार के सभी इंसानों में व्याप्त है !
अ नहोनी के डर के बाद धार्मिक होने का दूसरा बड़ा कारण है, अपनी विभिन्न कामनाओं की पूर्ति की चाह! हमें लगता है कि अगर हम ईश्वर की आराधना करेंगे तो वे खुश हो कर हमारी मनोकामनाएं पूरी कर देंगे ! यह सोच भी हर धर्म में मौजूद है। कोई मन्नत मांगता है, कोई चढ़ावा चढ़ाता है, कोई दान देता है, कोई विशेष कर्मकांड करता है। हम भूल जाते हैं कि प्रभु सर्वज्ञानी है, निष्पक्ष है, न्यायप्रिय है ! वे हमें हमारे कर्मों के अनुसार फल देंगे नाकि कर्मकांडों की वजह से ! हमारे लिए पूजा या इबादत एक सौदा या व्यापार बन जाते हैं कि हम ये करेंगे तो वो ये कर देगा ! इसी सौदेबाजी में जब हमारी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं तो हमारा विश्वास भी डगमगाने लगता है तो हमारी अस्थिरता और खुदगर्ज दिलोदिमाग कोई और ठीहा ढूँढ़ने लगते हैं ! आशंका
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