pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: धूर्त
धूर्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धूर्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 16 जून 2026

बरगलाए जाते "जेंजी'' 😞

अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग            

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम दर्ज हैं, जो उम्र में भले ही छोटे थे, लेकिन उनके हौसलों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी !  ऐसे किशोर और युवा, जिन्होंने अपने लहू से वतन की मिटटी को सींचा, बिना जुल्म-ओ-अत्याचार की परवाह किए -

बाजी राउत 
*बाजी राउत, सिर्फ 12 साल का बच्चा, सबसे कम उम्र का शहीद, जिसे अंगेजों का हुक्म ना मानने की वजह से गोली मार दी गई थी ! 

*खुदी राम बोस, युवा क्रान्तिकारी, 18 साल की उम्र में फांसी दे दी गई ! 

*करतार सिंह सराभा - 19 साल की उम्र में फांसी।  

*प्रफुल्ल चंद्र चाकी - उम्र 19 साल। पर अंग्रेजी हुकूमत उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी ! 

*भगत सिंह, * सुख देव, *शिवराम राजगुरु - इन्हें कौन नहीं जानता, जिन्हें सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था ! 

*चंद्र शेखर आजाद ! जिन्हें सपने में भी देख कर अंग्रेजों को पसीना आ जाता था ! धोखे से घेरा गया, पर कोई जिंदा नहीं पकड़ पाया ! जब देश को प्राण अर्पण किए तो उम्र थी महज 24 साल !  

 *मदन लाल ढींगरा - 25 साल, अंग्रेजों पर गोली चलाने के लिए फांसी ! 

*राजेंद्र लाहिरी - 26 साल, काकोरी केस में फांसी।  

*अशफाक उल्ला खां - 27 साल,  काकोरी केस में फांसी। 

*पंडित राम प्रसाद बिस्मिल - 30 वर्ष, मैनपुरी और काकोरी केस में फांसी  

*चेत राम जाटव - 30 साल। अंग्रेजों की खिलाफत के कारण गोली मार दी गई ! 

*मंगल पांडे - 30 साल की उम्र में फांसी। 

*जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, युवावस्था में एक बाघ से भिड़ कर मार डालने के कारण नाम पड़ा. ''बाघा जतिन'', 35 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए ! कनक लता बरुआ 15 साल, बादल गुप्ता 18 वर्ष, हेमू कालाणी 19 साल, अनंत लक्ष्मण 19 साल, प्रफ्फुल चाकी 19 साल, बसंत कुमार विश्वास 20 साल, कन्हाई  लाल दत्त 20 वर्ष.........कितने गिनाएं, कहां तक गिनाएं, स्याही खत्म हो जाएगी, कागज कम पड़ जाएंगे !  

अपने ऐसे शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! जिनको क्रांति का सही अर्थ ही मालूम ना हो ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा !  

क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! जो अवाम और देश के हित में हो ! ऐसी स्थिति के लिए मुख्य कारण जनमानस में अंसतोष का होना होता है, जो समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी  मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न हुआ हो ! परंतु ऐसा बदलाव या परिवर्तन लाने के लिए ठोस कारण का होना बेहद जरुरी है ! इसके साथ ही दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना का होना भी बहुत जरुरी है। 

@वंदे मातरम ! राष्ट्र प्रथम 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

शुक्रवार, 22 मई 2026

हल्की आंच पर भुनते खोवे के धुएं ने कइयों के भूत उतार दिए

जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा, तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! कर्कशता की जगह जुबान में चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां-संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग   

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया ! 

ताड़ना भी जरुरी है 
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 
दिनचर्या 
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी ! 

आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम 
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बदजुबान वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! 
 

फिजा में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां, संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी, पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं होता.........!

@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

रॉबिन्सन क्रूसो का मैन फ्राइडे, क्या से क्या हो गया

अपने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! वह आज तक आते-आते पूर्णतया रीढ़-विहीन, मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

 भी-कभी साहित्य का कोई शब्द, वाक्य, मुहावरा या चरित्र वर्षों बाद पुस्तक के पन्नों से निकल साक्षात देह धारण कर लेता है ! ऐसे कई उदाहरणों में से एक है, वर्षों पहले लिखे गए एक उपन्यास 'रॉबिन्सन क्रूसो' का एक काल्पनिक पात्र ''मैन फ्राइडे'' ! हम में से अधिकांश ने वह रोचक उपन्यास जरूर पढ़ा होगा। 

अपने मैनफ्राइडे के साथ क्रूसो  
ज से तकरीबन आठ सौ साल पहले एक अंग्रेज लेखक डैनियल डेफो या डैनियल फ़ो​ ने एक उपन्यास की रचना की थी, जिसका नाम था रॉबिन्सन क्रूसो। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि 1719 में ही इसके चार संस्करणों ने छप कर इतिहास रच दिया। केवल पुस्तक रूप में ही नहीं बल्कि फिल्म, टेलीविजन और रेडियो तक में भी इसका रूपांतरण हुआ ! आज भी उसकी कहानी उतनी ही लोकप्रिय है। 

सका नायक क्रूसो अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध इंग्लैंड से समुद्री यात्राओं पर निकल पड़ता है। अपनी कई रोमांचक, खतरनाक समुद्री यात्राओं में से एक कठिन उथल-पुथल भरी यात्रा में उसका जहाज तूफान में नष्ट हो जाता है और वह एक टापू में शरण लेता है ! वही उसकी भेंट एक स्थानीय व्यक्ति से होती है, पर दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते ! पर इसके बावजूद वह स्थानीय जंगली व्यक्ति क्रूसो का वफादार सेवक व सखा बन उसकी हर संभव मदद करता है, उसे हर खतरे से यहां तक कि खुद को जोखिम में डाल नरभक्षियों से भी बचाता है ! चूंकि जिस दिन इनकी भेंट होती है वह दिन शुक्रवार का था, इसलिए क्रूसो ने संवाद हीनता की वजह से उसे, मेरा आदमी शुक्रवार यानी मैन फ्राइडे का नाम दे दिया !

आज का शुक्रु 
पने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! परंतु समय के साथ अब वह एक अपमान सूचक शब्द सा बन गया है ! तक आते-आते उसका अर्थ  पूर्णतया रीढ़-विहीन,  मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में  उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड, राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.......! 

@आभार अंतर्जाल 

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...