कुछ अराजक, उच्श्रृंखल, बददिमाग वाले भूल गए कि निजाम बदल चुका है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़े जाते थे, वे भी कन्नी काट गए और फिर जब अकेलेपन का खोवा धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उसकी परिमलता ने उस बिरादरी के वैसे ही लोगों के दिलो-दिमाग को भी दुरुस्त कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा ! भौंपुओं के सुर बदल गए ! कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानी-चुटकुले आ गए ! अच्छा है, समय रहते समझ आ गई............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया !
 |
| ताड़ना जरुरी है |
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय मानदंड क्यों ?
 |
| दिनचर्या |
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी !
.jpg) |
| आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम |
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बददिमाग वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में ही जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़े जाते थे, वे भी कन्नी काट गए, जैसे पहचानते ही ना हों ! तब जा कर जब अकेलेपन का खोवा धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उसकी सुगंध ने उसी बिरादरी के वैसे ही लोगों के दिलो-दिमाग को पूरी तरह तो नहीं फिर भी कुछ ना कुछ दुरुस्त तो कर ही दिया है !
फिजाओं में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानी-चुटकुले कहे जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं.........!
@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें