सोमवार, 29 जून 2020

एक था धीरेंद्र ब्रह्मचारी

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे, पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो आज के बाबा पहली क्लास के शिशु नजर आते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे नेता या राजनितिक पार्टियां चाहे कितना भी अपने को धर्मनिरपेक्ष कह लें या दिखाने की कोशिश करें पर सच्चाई यह है कि यह सब कहने को ही होता है। धर्म और धार्मिक बाबाओं का राजनेताओं से सदा ही चोली-दामन का साथ रहा है। हमारे यहां ऐसे बाबाओं की लम्बी फेहरिस्त रही है। ये लोग अपने अनुयायियों की विशाल संख्या और आम जनता पर अपने प्रभाव का उपयोग या दुरुपयोग सत्ता में बैठे लोगों के हितों के लिए कर बदले में जमीन, रसूख, अनुदान, विदेश में पैठ आदि अनेकानेक सहूलियतें हासिल करते रहे हैं ! एक तरह से ये एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं।इस भाईचारे की शुरुआत सही मायने में सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के शासन काल में हुई। जब एक विवादित योग गुरु ने पूरे गांधी परिवार को अपने प्रभाव में ले भारतीय राजनीती तक को प्रभावित कर डाला था। 

दिल्ली की फ्रेंड्स कालोनी ! राजधानी के पॉश इलाकों में से एक ! उस समय जब ज्यादातर दिल्ली सायकिलों पर चलती थी तब भी इस कॉलोनी में एक से बढ़कर एक विदेशी लग्‍जरी कारें खड़ी नजर आती थीं। उसी कालोनी की ए-50 नंबर की कोठी में नेताओं, अभिनेताओं, उद्योगपतियों का दिनभर आना-जाना लगा रहता था। यह निवास था एक योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी का ! उससे ज़रा सी भेंट ही लोगों को उपकृत व धन्य महसूस करवा देती थी। इस आदमी का सितारा बुलंदी पर था ! पूरी दिल्ली में उसके जलवे थे। कारण उसने अपनी तिकड़मों से नेहरू जी को प्रभावित कर इंदिरा का योग गुरु होने का सम्मान प्राप्त कर लिया था। पर धीरे-धीरे इंदिरा पर ऐसा प्रभाव डाल दिया कि कहते हैं इसके कारण बाप-बेटी में भी झड़प हो जाती थी। जब वे प्रधान मंत्री बनीं तब तो उसका तकरीबन रोज ही प्रधानमंत्री आवास, 1 सफदरजंग रोड, में आना-जाना होने ला गया था। 1975 के आपादकाल में इनके रिश्तो को लेकर कुछ अटकलों का बाज़ार भी गर्म हुआ था। इमरजेंसी के दिनों में इसकी ताकत इतनी बढ़ गई थी कि मंत्रियों को अपने पोजीशन को बचाने के लिए ब्रह्मचारी की जी हुजूरी करनी पड़ती थी। इसका जीता-जागता उदाहरण आई. के. गुजराल का था. जो इसकी ताकत का अंदाजा ना लगा पा कर अपनी कुर्सी गंवा बैठे थे। उन्हीं दिनों कुछ पत्रकारों ने बाबा को ‘भारतीय रास्पुतिन'' का नाम दे दिया था।
इस आदमी ने कभी अपने जन्म और जन्मस्थान का खुलासा नहीं किया। लोगों के लाख पूछने पर भी कभी अपने परिवार की बात नहीं की ! बस यही कहता रहा कि योगी की कोई उम्र नहीं होती, मैंने 13-14 साल की उम्र से ही योग अपना लिया है। पर अटकलें यही थीं कि बिहार के गांव चानपुरा के इस इंसान का असली नाम धीरचन्द्र चौधरी था जो समय के बलवान होते ही स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बन गया और उसके शिष्यों में प्रधानमंत्री से लेकर छोटे बड़े बहुत से सामर्थ्यवान लोग और नेता शामिल होते चले गए ! उसका रहन-सहन उस दौर के बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज से भी इक्कीस हुआ करता था ! उस समय जब देश के गिने-चुने लोग ही हवाई सफर कर पाते थे उस समय इसके पास अपना लग्जरी जेट विमान था। जो आज भी गुड़गांव के एक हैंगर में पड़ा जंग खा रहा है। 

यह ठीक है कि योग का प्रचार करने में उसकी अहम् भूमिका रही। दूरदर्शन पर योग की क्रियाएं दिखाने की शुरुआत भी उसी ने की थी, भले ही उसके शिष्यों के वस्त्रों या कैमरे के कोणों से वे आलोचित भी रहीं। इसके साथ ही यह योग गुरु रहस्यमय ढंग से विवादित और चर्चित भी रहा। धीरे-धीरे वह इंदिरा गांधी का सलाहकार और राजदार भी बन गया। आपातकाल में तो उसके जलवे देखने लायक थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदिरा गांधी के लगभग सभी बड़े फैसलों में उसकी अहम् भूमिका रहती थी ! कहा तो यहां तक जाने लगा था कि इंदिरा गांधी संजय गांधी के बाद सबसे ज्यादा भरोसा इसी पर किया करती थीं। यह विश्वास इतना बढ़ गया था कि कैबिनेट के फैसलों में भी इस ब्रह्मचारी की भूमिका रहने लगी थी ! मंत्रियों का बनना, हटना भी इसके इशारे पर होने लगा था। संजय की मृत्योपरांत तो इंदिरा जी की निर्भरता उस पर और भी बढ़ गई थी। 
रास्पुतिन
अब सत्ता के पावर के साथ जो ''गुण'' आते है, वे आए और धीरे-धीरे इस स्वामी की असलियत लोगों के सामने आने लगी। उस पर जमीन हड़पने से लेकर अवैध हथियार रखने जैसे कई आपराधिक आरोप लगने लगे ! इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ''इंडिया ऑफ्टर नेहरू'' में उसे बड़ा बिजनेसमैन निरूपित किया है। जिसके अनुसार जम्‍मू के गांधी नगर इंडस्ट्रियल एस्‍टेट में शिव गन नाम से इसकी फैक्‍ट्री हुआ करती थी। जिसका टर्नओवर उस समय लाखों में था ! यह योग गुरु उस दौर का सबसे बड़ा आर्म डीलर माना जाने लगा था। गुहा के मुताबिक, उस दौर के लगभग सभी बड़े रक्षा सौदों में उसकी भूमिका अहम होती थी. उस दौर में स्वीडन की कई कंपनियों से उसके संबंध भी थे। 1990 के दौर में धीरेंद्र ब्रह्मचारी के ऊपर अपनी गन फैक्ट्री में अवैध विदेशी हथियार रखने के आरोप लगे। पुलिस ने ब्रह्मचारी समेत उनके कई करीबियों पर मुकदमा दर्ज किया पर रसूख के कारण उसे अदालत से जमानत पर रिहाई मिल गई। हालांकि जैसा चलन है ब्रह्मचारी इसे खुद को बदनाम करने की साजिश करार देता रहा। यही नहीं गैर कानूनी कार्यों के चलते उसके जम्मू स्थित अपर्णा आश्रम के साथ-साथ और अनेकों सम्पत्तियों को भी सन 2000 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीज कर दिया गया था। उससे जुड़े कुछ राज अभी भी राज ही बने हुए हैं। 

इंदिरा गांधी की ह्त्या, दैवयोग से जिसका कारण भी एक विवादास्पद बाबा ही था, के बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के सितारे भी गर्दिश में आ गए ! कानून का शिकंजा भी कसता जा रहा था ! धीरे-धीरे सब कुछ मिटने लगा। और फिर 9 जून 1994 कोअपने कस्बे मानतलाई को सिंगापुर बनाने का अधूरा सपना लिए इस बाहुबली, विवादास्पद बाबा की मृत्यु भी संजय गांधी की दुर्घटना की तरह ही हो गई, जब उसका प्राइवेट प्लेन उसके मानतलाई आश्रम की हवाई पट्टी पर उतरने के दौरान पेड़ों से टकरा गया ! इस दुर्घटना में उसके साथ उसका पायलेट भी मारा गया था ! विडंबना रही कि अपने और संजय के दोनों विमानों को इसी के द्वारा ऐशो-आराम के लिए बाहर से आयात किया गया था।  

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना जाता है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो ये लोग पहली क्लास के शिशुओं की तरह हैं। आजके बाबाओं का व्यापार विदेशी कंपनियों को खुली चुन्नौती दे रहा है, जो उनके दलालों के गले की हड्डी बन गई है। शायद इसीलिए बिना जांचे-परखे सिर्फ विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है।  
@संदर्भ अंतरजाल   

सोमवार, 22 जून 2020

दुर्वासा ऋषि का क्रोध बना था समुद्र मंथन का कारण

यह अपने समय का, या यूं कहें कि सर्वकालीन एक अकल्पनीय व अभूतपूर्व उपक्रम था ! कोई सोच सकता था भला कि दुर्वासा के एक श्राप से सारे जगत में कैसी उथल-पुथल मच जाएगी। शिव को विष पान करना पड़ जाएगा ! देवता अमर हो जाएंगे ! सूर्य-चंद्र ग्रहण होने लगेंगे ! अयप्पा का जन्म होगा ! राक्षसी महिषि का असंभव सा वध भी संभव हो पाएगा ! धरा तरह-तरह की नेमतों से अलंकृत हो जाएगी ! कुंभ जैसे वृहद एवं चिरस्थाई उत्सवों का आयोजन होने लगेगा ! इत्यादि....इत्यादि....इत्यादि....!
   
#हिन्दी_ब्लागिंग 
संसार में घटने वाली बड़ी घटनाओं या वाकयात के पीछे महीनों पहले निर्मित हुई परिस्थितियों या कारणों का हाथ जरूर होता है। कभी-कभी तो ये इतने मामूली होते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता कि इनके कारण भविष्य में सारे जगत को प्रभावित करने वाली कोई घटना भी घट सकती है। फिर चाहे दुर्वासा का क्रोध हो जो देवासुर संग्राम का जरिया बन गया ! चाहे मंथरा की जिद जिसने राम-रावण युद्ध की भूमिका रच डाली ! द्रौपदी की एक हंसी ने सारे आर्यावर्त को रुदन के सागर में डुबो दिया ! आर्चड्यूक फ़र्डिनेंड की हत्या प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बन गई या फिर विश्व की 1929-30 की आर्थिक मंदी ने द्वितीय महायुद्ध का आह्वान कर डाला हो ! कौन सोच सकता था कि ऐसी बातों से भी सारा संसार आपस में एक-दूसरे के खून का प्यासा हो जाएगा ! पौराणिक काल में भी एक ऐसी ही छोटी सी बात आज तक की सबसे विस्मयकारी, अद्भुत, अकल्पनीय घटना, समुद्र मंथन का कारण बन गई थी।  
यह उस समय की बात है जब अभी पृथ्वी का विकास और निर्माण पूरा नहीं हुआ था। सिर्फ सुमेरु पर्वत के आस-पास का इलाका ही रहने योग्य हो सका था बाकी चारों ओर सब जगह पानी ही पानी था। उसको रहने लायक और मानव योग्य बनाने का उपक्रम चल रहा था। इसलिए अभी देवता, अपने दायाद बंधु, असुरों के साथ ही धरती पर रहते थे। परन्तु यह काम उनके अकेले के वश का नहीं था। इस विशाल, महान, श्रमसाध्य कार्य के लिए कई दैवीय शक्तियों और उपकरणों की आवश्यकता थी। दैवीय उपकरण सागर मंथन से ही उपलब्ध हो सकते थे और इसके लिए यह जरुरी था कि दैत्य-दानव जैसी आसुरी शक्तियों का भी सहयोग लिया जाए। पर सुर और असुर एक दूसरे के जानी दुश्मन थे ! इस समस्या को सुलझाने के लिए त्रिदेवों ने काफी सोच विचार कर एक योजना बनाई और असुरों को साथ लाने का कारण गढ़ा गया। 
एक बार दुर्वासा ऋषि को, विश्राम के दौरान, उनके आश्रम में कुछ विद्याधरों ने दिव्य संतानक पुष्पों की माला अर्पित की। माला की सुगंध दूर-दूर तक फैल रही थी। उसी समय उधर से गुजरते हुए, अपने हाथी पर आरूढ़ इंद्र ने ऋषि को प्रणाम किया। दुर्वासा ने खुश हो कर वह माला इंद्र को दे दी। पर इंद्र ने उपेक्षा पूर्वक उसे हाथी के गले में डाल दिया। पुष्पों की तेज गंध से गजराज ने परेशान माला को तोड़ अपने पैरों से कुचल डाला। अपने उपहार का तिरस्कार होता देख दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने इंद्र को श्राप देते हुए कहा कि, ''हे इंद्र ! जिस वैभव का तुम्हें इतना अभिमान है वह ख़त्म हो जाएगा और उसके साथ ही तुम भी श्री हीन हो जाओगे !'' इंद्र की किसी भी अनुनय-विनय का ऋषि पर कोई असर नहीं हुआ। श्राप के कारण इंद्र निस्तेज हो गया ! उसके साथ ही अमरावती और देवों की शक्तियों का भी ह्रास हो गया। इस बात की खबर मिलते ही असुरों ने अपने शक्तिशाली राजा बलि के नेतृत्व में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर उसे वहां से निष्काषित कर दिया। इंद्र सहित सारे देवता विष्णु जी के पास गए और उनसे अपनी विपदा कही। तब विष्णु ने उन्हें दानवों की मदद से समुद्र मंथन करने की सलाह दी। दानवों को मनाने के लिए उन्हें अमृत का लालच देने की सलाह भी दी। अमरत्व की लालसा में असुर राजी हो गए।
क्षीरसागर, जो आज हिंद महासागर कहलाता है, को मंथन के लिए चुना गया ! मदरांचल पर्वत को, जो आज के बिहार के बांका जिले में स्थित है, मथानी  का रूप तो दे दिया गया पर अथाह सागर में उसको टिकाना सबसे बड़ी समस्या बन गई ! तब फिर विष्णु जी ने देवताओं की सहायता के खातिर कच्छप का रूप ले सागर के बीचोबीच अपने को स्थिर कर मदरांचल को अपनी पीठ पर टिका लिया। नेती के रूप में वासुकि नाग की सहायता ली गई। उसके घोर कष्ट को देखते हुए उसे गहन निद्रा का वरदान दिया गया। फिर भी विष्णु जानते थे कि मंथन के दौरान रगड़ से वासुकि को अपार कष्ट होगा जिससे उसकी जहरीली फुफकार निकलेगी उससे देवताओं की रक्षा जरुरी होगी। इसलिए उन्होंने इंद्र से कहा कि मंथन के पहले तुम सब आगे बढ़ कर वासुकि के मुंह को थाम लेना और असुरों से कहना कि हम तुमसे श्रेष्ठ हैं, इसलिए हम मुंह की ओर रहेंगे। इंद्र ने जब ऐसा किया तो असुर भड़क गए और बोले, अरे इंद्र ! तुझे अभी भी लाज नहीं आती जो हमसे हारने के बाद भी अपने आप को श्रेष्ठ समझता है ! तुम सब अधम हो और अधम ही रहोगे। इसलिए पूंछ वाला हिस्सा ही तुम्हारा उचित स्थान है। देवता तो चाहते ही यही  थे, वे बिना ना-नुकुर किए दूसरी तरफ चले गए। जैसा कि विष्णु जी ने सोचा था वैसा ही हुआ कुछ ही देर में वासुकि की फुफकार से असुरों पर कहर टूट पड़ा। फिर जैसे-तैसे मंथन पूरा हुआ। देवताओं की कुटिलता से असुर फिर मात खा गए ! फिर जो कुछ भी हुआ वह जग तो जाहिर है ही। 

यह अपने समय का एक अकल्पनीय उपक्रम था ! कोई सोच सकता था भला कि दुर्वासा के एक श्राप से सारे जगत में कैसी उथल-पुथल मच जाएगी। शिव को विष पान करना पड़ जाएगा ! देवता अमर हो जाएंगे ! सूर्य-चंद्र ग्रहण होने लगेंगे ! अयप्पा का जन्म होगा ! राक्षसी महिषि का वध संभव हो पाएगा ! इत्यादी...इत्यादी...इत्यादि.......!

@चित्र अंतर्जाल से, साभार 

शुक्रवार, 19 जून 2020

संकट काल में तो देश की सोच लो, अपने हित साधने के मौके तो आते रहेंगे

अपनी समझ से तो ये सरकार की नाकामी को उजागर कर अपनी उपयोगिता और प्रसांगिकता सिद्ध करना चाहते थे, पर इनको और इनके मूढ़मति सलाहकारों को इस बात का कतई इल्म नहीं रहा कि युद्ध के मंडराते खतरे में अवाम सदा सरकार का साथ देता है, फिर चाहे उसकी आस्था किसी भी पार्टी या नेता में भले ही क्यूँ ना हो ! ऐसा हर बार के युद्ध काल में हुआ है...................!

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पहले लाल ने फिर उसकी लाली देख लाल हुई मां ने जब अपने उद्गार उगले तो देश उनके इस अपरिपक्व, अव्यवहारिक, राजनितिक अदूरदर्शिता और बचकानेपन से तो लाल हुआ ही, पार्टी की गिरती-ढहती छवि को भी एक और धचका लग गया ! अपनी समझ से तो ये सरकार की नाकामी को उजागर कर अपनी उपयोगिता और प्रसांगिकता सिद्ध करना चाहते थे, पर इनको और इनके मूढ़मति सलाहकारों को इस बात का कतई इल्म नहीं रहा कि युद्ध के मंडराते खतरे में अवाम सदा सरकार का साथ देता है, फिर चाहे उसकी आस्था किसी भी पार्टी या नेता में भले ही क्यूँ ना हो ! ऐसा हर बार के युद्ध काल में हुआ है। 

आजादी के इतने सालों में हमने कभी ऐसा चौतरफे संकट का सामना नहीं किया ! एक बार में एक,अलग-अलग पड़ोसी से झड़प जरूर हुई पर ऐसा सम्मिलित षड्यंत्र कभी सामने नहीं आया। पाक तो खैर हमारा जन्मजात विरोधी रहा है पर इधर चीनी हथकंडों से ग्रसित और उसके ''एहसानों'' से मजबूर नेपाल भी हमारे आपसी रिश्तों, भाईचारे और सहारे को भूल कुछ अकड़ने लगा है ! उस पर महामारी का कहर ! चारों तरफ से विपदा से घिरे देश को इस समय एकजुटता की जरुरत है ना कि ओछी राजनीति की, इतनी समझ तो आत्मश्लाघि दलों को होनी ही चाहिए ! पर यहां देश की नहीं सत्ता की ज्यादा चिंता महसूसी जा रही है। 

यह समय गहरे चिंतन और सावधानी का है। एक भी गलत या भावावेश में उठाया गया कदम देश और उसके करोड़ों देशवासियों के लिए हादसा सिद्ध हो सकता है। ऐसे में किन्हीं नेता-दव्यों द्वारा बार-बार कोंचा लगा कुछ बोलने और जमीन की जानकारी मांगनेको मजबूर करना, अपरिपक्वता ही कहलाएगी। यहां पुरानी बातों को दोहराना कुछ हल्कापन लग सकता है पर उनकी प्रासांगिकता जरुरी है, यह याद दिलाने को कि बासठ की लड़ाई में इसी चीन ने हमारी करीब पंद्रह हजार वर्ग की.मी. जमीन दखल कर ली थी तो हमारे सर्वकालीन महान नेता ने बड़ी उपेक्षा और लापरवाही से कह दिया था कि उस जमीन की कोई कीमत नहीं है उस पर घास का तिनका तक नहीं उगता ! इस पर काफी लानत-मलानत भी हुई थी उनकी ! हो सकता है कि इन सब बातों का काफी बाद में बाहर से आई महिला को ज्ञान ना हो और शाही रख-रखाव में पले उनके पुत्र को भी शायद वही पता हो जो उन्हें राजमहल में बताया, सिखाया गया था ! 

संकट काल में यह जरुरी है कि सरकार हर बात को सार्वजनिक ना करे ! साथ ही विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए, सिर्फ विरोध के लिए सरकार की हर बात का विरोध ना कर सावधानी पूर्वक अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए ! समय फिरते ही अपनी भड़ास निकालने का अवसर तो मिल ही जाएगा। फिर क्यूँ फिजूल में अभी जनता के आक्रोष और मजाक का वॉयस बनना, जिससे खुद का ही नुक्सान होता हो ! पर देखा गया है यह बात किसी के समझ में नहीं आती या हो सकता है चापलूस या अवसरवादी छुटभईए अपना हित साधने के लिए आने ही नहीं देना चाहते हों ! जो भी हो ऐसी बातें हैं तो आत्मघाती ही !! 

गुरुवार, 18 जून 2020

कुनबा-परस्ती, स्वजन पक्षपात, भाई-भतीजावाद के गह्वर में सुशांत सिंह

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली ....................!      
 
#हिन्दी_ब्लागिंग
टी.वी. से फिल्मों में आए सुशांत सिंह ने किन्हीं अज्ञात कारणों से ख़ुदकुशी कर ली। एक हसमुख उभरते कलाकार का ऐसा अंत सभी को हिला कर रख गया ! पर साथ ही यह मार्मिक व दुखद घटना हमारे फिल्म जगत की चकाचौंध के पीछे छिपी उसकी व्यवस्था, उसकी मानसिकता, उसकी संवेदनशीलता पर भी कई प्रश्न चिन्ह लगा गई ! उनकी मृत्यु के दिन से ही लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आई हुई है। हर कोई विशेषज्ञ बना अपनी राय, अपने विचार थोपे जा रहा है ! जिनमें संवेदनाएं कम अपनी पसंद-नापसंद के लोगों पर कुंठायुक्त पूर्वाग्रही आक्षेप ज्यादा सामने आने लगे हैं। कुछ अपने नाम को सुर्ख़ियों में रखने के लिए इस पर शोध की बातें करने लगे हैं !
 
यह बात बिल्कुल सही है कि मुंबईया फ़िल्मी जगत में स्वजन-पक्षपात बहुत ज्यादा है ! वहां अपनी-अपनी पसंद है !अपने-अपने गिरोह हैं ! अपने-अपने खेमे हैं ! जिसके खोल में हर कोई सुरक्षित रहना चाहता है। फिल्म निर्माण इतना खर्चीला हो गया है कि अधिकांश फिल्मों की लागत भी नहीं निकल पाती। एक फिल्म का पिटना कई घरों का दिवाला निकाल देता है ! इसीलिए सभी निरापद और सक्षम घोड़े पर दांव लगाना पसंद करते हैं। पर इसके साथ-साथ यह भी सच है कि यहां रिश्ते तभी तक निभाए जाते हैं जब तक अपना फ़ायदा हो रहा हो। दुनिया में इतना निष्ठुर, मतलबी, बेमुरौवत, बेवफा, तोताचश्म व्यवसाय शायद ही कोई और हो ! यहां सदा से ही चढ़ते सूरज को सलाम ठोका जाता रहा है। पर यह तो सदा से ही रहा है। कोई नई बात नहीं है।

कहा जा रहा है कि सुशांत की करण जौहर गाहे-बगाहे बेइज्जती करता, करवाता रहता था ! उसके एक कॉफी वाले शो में भी उसका काफी मजाक वगैरह बनाया गया था ! जौहर और उसके दोस्त उसे काम देने में भी काफी टाल-मटोल किया करते थे ! तो ऐसा क्या था जो इस ''गैंग'' को ना छोड़ पाने को उसे मजबूर कर रखा था ! इतने सबके बावजूद फिर क्यों उसकी ही स्तर हीन फिल्म ''ड्राइव'' में काम करने का लोभ संवरण नहीं हो पाया ! ऐसे कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं !  
   
इधर आज फिर कुछ लोग भाई-भतीजा वाद को लेकर कुछ लोगों को निशाना बना रहे हैं। आज फिर कुछेक को मौका मिल गया है अपनी नापसंदगी पर आक्रोषित होने का ! जिन पर आरोप लग रहे हैं वे कोई बहुत महान फिल्मकार नहीं हैं ! ना हीं उन्होंने इस विधा का कुछ भला किया है । वे कला के बल पर नहीं सिर्फ अपने रिश्तों और भाग्य के कारण मशहूर हो पाए हैं। जो पांच-छह नाम लिए जा रहे हैं, उनमें कोई एक भी अपनी ऐसी उपलब्धि दिखा दे जिसे गौरव के साथ फिल्मों के इतिहास में जगह मिल सकती हो। जिसे लोग वर्षों बाद भी याद रख सकें। फिर ऐसा भी नहीं है कि मुंबई में सिर्फ यह लोग फिल्म बनाते हों ! ये लोग सत्यजीत रे, हृषिकेश मुखर्जी या राजकपूर के पासंग भी नहीं हैं कि इनकी फिल्म में काम कर के गौरवान्वित महसूस किया जाए या इनके साथ काम कर के कोई विशेष सम्मान या पहचान बन जाती हो ! तो फिर यदि ऐसे लोग किसी का बहिष्कार करते हैं तो करें, क्यूँ मरे जाना उनके ही साथ काम करने को ! लियाकत है, खुद पर विश्वास है तो काम देर-सबेर खुद चल कर आता है और सफलता मिलते ही ऐसे लोग आगे-पीछे घूमते हुए दुम हिलाने लगते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं ! 

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली !!

सुशांत ! काश तुमने कर्मठ लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! तुम्हारे सामने तो सबसे बड़ा उदाहरण अमिताभ बच्चन का था ! क्या-क्या नहीं सहा, देखा, उन्होंने यहां ! काम मिलना बंद हो गया था ! कर्ज के मारे दिवालिया होने तक की नौबत आ गई थी ! पर अगले ने हर समस्या का सामना किया और आज इस उम्र में उनको केंद्र में रख फ़िल्में रची जा रही हैं। उसी एकता कपूर, जिसने तुम्हें अपने सीरियल में काम दिया और तुम उसके इस एहसान के बदले पता नहीं क्या-क्या सहते रहे, उसी के पिता को जब यहां सबने नकार दिया था तो उसने हार ना मानते हुए मद्रास का रुख किया और बाद की बात सभी जानते हैं ! काश तुम देखते कि तकरीबन हर बड़े कलाकार ने कैसी-कैसी मुसीबतों का सामना करने के पश्चात अपना मुकाम हासिल किया ! ऐसे एक नहीं दर्जनों नाम हैं, जिन्हें इस निष्ठुर नगरी ने दुत्कारा पर जब उनने अपनी जीजीविषा की बदौलत सफलता पाई तो यही उनके चरणों में लोटने को मजबूर हो गई। काश ! तुम देखते कि आज अपनी चमक बिखेरने वाले सितारों को कभी किसी ''गॉड फादर'' की जरूरत महसूस नहीं हुई। उन्होंने जो हासिल किया अपने बलबूते पर किया। काश ! तुमने अपने पर, अपनी लियाकत पर और विश्वास किया होता ! कुछ और धैर्य रखा होता ! लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! भावनाओं से निकल यथार्थ को स्वीकार किया होता !

सोमवार, 15 जून 2020

गुलाबो-सिताबो खूब लड़े हैं, आपस मा

किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

अभी पिछले दिनों अमिताभ-आयुष्मान की एक फिल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है गुलाबो-सिताबो। फिल्म चाहे जैसी भी बनी हो पर उसने दो महत्वपूर्ण कार्यों को तो अंजाम दिया ही है। इस फिल्म ने OTT (Over The Top) पर प्रदर्शित होने वाली पहली हिंदी फिल्म के रूप में अपना नाम तो दर्ज करवाया ही साथ ही साथ गुमशुदगी के अंधेरे में विलोपित होती उस कठपुतली कला का नाम भी आमजन को याद दिलवा दिया, जिसे कम्प्यूटर गेम्स जैसे साधनों के आने के बाद लोग तकरीबन भूल ही गए थे। गुलाबो-सिताबो इसी कला की दो महिला दस्ताना कठपुतलियों (Glove Puppets) के नाम हैं, जिन्होंने एक समय उत्तर प्रदेश में धूम मचा रखी थी और वहां की कला व संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गयी थीं।   

गुलाबो-सिताबो, किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था। इनके किस्से प्रदेश में एक लम्बे अरसे तक छाए रहे थे। 

निरंजन लाल श्रीवास्तव और उनकी कठपुतलियां 

नवाब वाजिद अली शाह के समय ये कठपुतलियां कला का पर्याय बन गईं थीं। गुलाबो-सिताबो का सफर भले ही आजादी से पहले शुरू हुआ था, लेकिन इन्हें पुख्ता पहचान 1950 के दशक में जा कर मिल पाई, जब प्रतापगढ़ निवासी राम निरंजनलाल श्रीवास्तव, बी.आर. प्रजापति और जुबोध लाल श्रीवास्तव सरीखे कलाकारों ने कठपुतली कला का भलीभांति प्रशिक्षण ले उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा, उसका देश के विभिन्न नगरों में प्रदर्शन कर उसे व्यापक ख्याति दिलवाई। हालांकि इनकी कठपुतलियों के पहरावे, रंग-रोगन में काफी बदलाव आया था पर उन किरदारों का नाम स्थाई रूप से गुलाबो-सिताबो कर दिया गया। कारण भी था, इन नामों की प्रसिद्धि और लोकप्रियता लगातार बढ़ती ही जा रही थी। लोग उन्हीं नामों को देखना-सुनना पसंद करने लगे थे। इनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई थी कि गुलाबो-सिताबो के जरिए सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा था। यहां तक कि अग्रिम मोर्चों पर तैनात जवानों के मनोरंजन के लिए भी इनको भेजा जाने लगा था।


शूजित सरकार द्वारा निर्देशित इस फिल्म का नाम गुलाबो-सिताबो प्रतीतात्मक है, क्योंकि इसमें झगड़ने वाले पात्र महिला न हो कर पुरुष हैं और उनकी भाषा भी व्यंग्यात्मक होने के बावजूद बहुत संयमित और सधी हुई है। पर क्या यह मात्र एक संयोग है या कुछ और कि उत्तर प्रदेश के जिस प्रतापगढ़ जिले के एक कायस्थ परिवार ने गुलाबो-सिताबो को देश-विदेश में व्यापक पहचान और प्रसिद्धि दिलवाई; उन्हीं किरदारों के नाम से जब एक फिल्म बनी तो उसमें मुख्य किरदार निभाने वाले कायस्थ कलाकार के पूर्वजों का संबंध भी उसी जिले से है ! चलो चाहे जो हो मतलब तो गुलाबो-सिताबो की नोक-झोंक और उनकी तनातनी से है, -

''जहां साग लायी पात लायी और लायी चौरैया, दूनौ जने लड़ै लागीं, पात लै गा कौआ'' 

शनिवार, 13 जून 2020

चीन की बंदूक, नेपाल की गोली और गुर्गों की बोली

चैनहीन के पालतू गुर्गे और खरीदे हुए  गुलाम अपने आकाओं  को खुश करने के लिए अपने ही गांव  में  वैमनस्य फैलाने में  जुटे हुए  थे ! भाराव  के लोगों के हर  काम की  आलोचना, उसकी बुराई, उसकी नाकामी की अफवाहें फैलाना ही उनका धर्म बन गया था। ऐसे ही माहौल में एक दिन खबर आई कि ढाणी  के लोगों ने  भाराव के  कुछ बच्चों  को  पीट दिया है !  खबर मिलनी थी  कि  चैनहीन  के गुर्गों  को मौका  मिल गया भाराव के करता - धर्ताओं के विरुद्ध विष वमन करने का ! उन्होंने  चिल्लाना शुरू कर दिया कि  वह ढाणी वाले जिनकी  हिम्मत नहीं होती थी  हमारे सामने आँख  उठा कर  बात  करने की, वही आज हमारे बच्चों पर हाथ उठा रहे हैं......!

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पहाड़ों की  सुरम्य वादियों और लोहित नदी  के अंचल में अलग-अलग आस्थाओं को मानने वाले कई गांव बसे हुए हैं। जिनमें  सबसे बड़े, विशाल और रसूखदार गांवों का नाम भाराव और चैनहीन है। दोनों के पुरातन  होने के बावजूद  उनकी आपस  में कभी नहीं बन पाई। इधर आबादी का विस्फोट व उसके मुखियों की  महत्वकांक्षाएं चैनहीन  गांव के लिए मुसीबत बन चुकी थीं। इसीलिए वह बार - बार भाराव के क्षेत्रों में आ कर अतिक्रमण और लूट-पाट की हरकतें करता रहता था।अपने  मंसूबों को पूरा करने और अपने  नापाक इरादों  को पूरा करने  हेतु उसने  भाराव में अपने गुर्गे भी  पाल रखे थे !  जो पनपते, खाते-पीते, रहते तो भाराव में थे पर माल कमाते थे, पड़ोसी से ! इन लोगों का काम था, गलत - सलत अफवाहें फैला, अस्थिरता, असंतोष, अशांति, असहिष्णुता का  कुचक्र रच  लोगों को आक्रोषित गांव में विरोध और विद्रोह का माहौल बनाए रखने का !  इधर भाराव गांव का काम जबसे नए सरपंचों ने संभाला था, तब  से  चैनहीन  की नापाक हरकतें  और  भी बढ़ गईं  थीं। भाराव  गांव  के  लोगों  की अपनी परेशानियां  ही कुछ  कम नहीं  थीं,  सो वे  चैनहीन वालों के कुचक्रों का विरोध तो करते थे, पर कोई नई मुसीबत मोल लेने से कतराते भी थे। उनका कतराना ही द्वेषियों का संबल बन गया था !    
 
पहाड़ी की तराई में इन दोनों बड़े गांवों के बीच एक ढाणी भी बसी हुई है। जो राजपाल की ढाणी कहलाती है। इसमें थोड़े से मेहनती, शांतिप्रिय पर कुछ-कुछ मतलबपरस्त लोगों का बसेरा है। उनके अपने संसाधन बहुत ही कम हैं, इसलिए वे दूसरे गांवों में जा मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह अपना गुजारा करते हैं। एक तरह से उनकी निर्भरता अपने पड़ोसी गांवों पर ही टिकी हुई है। यही कारण भी था कि वे किसी को भी नाराज ना कर कुल्हाड़ी से अपने पैर बचाए रखने में ही विश्वास करते थे। पर उनका झुकाव या दोस्ताना, भाराव वालों के साथ ही ज्यादा रहा है । इस बात से भी चैनहीन के आका चिढ़े रहते थे, और सदा इस नाते में दरारें डालने की कोशिश करते रहते थे। इधर कुछ दिनों से उनके प्रमुख जमींदारों ने ढाणी के लोगों को तरह-तरह के प्रलोभन दे अपने प्रभाव में कर लिया था। सो उनके कुछेक लोग भाराव के लोगों से कुछ उखड़े-उखड़े से रहने लगे थे। इन मुठ्ठी भर लोगों का उदाहरण दे भाराव और ढाणी के बिगड़ते संबंधों की खबरें उड़ाई जाने लगीं थीं। जिससे भाराव की लोकप्रियता, बढ़ते प्रभाव था उसकी शांतिप्रियता पर सवाल खड़े किए जा सकें।  

इसी बीच एक बार सारे इलाके में भयंकर अकाल पड़ गया ! सारी फसलें नष्ट हो गईं ! अन्न और चारे की कमी से चारों ओर मनुष्यों-पशु-पक्षियों की मौतें होने लगीं। चहूँ ओर त्राहि-त्राहि मच गई ! ऐसी हालत में भी भाराव गांव वालों द्वारा, जिस से जितना और जैसा बन पड़ रहा था, जैसे भी हो रहा था, आस-पास के सब लोगों की सहायता करनी शुरू कर दी। पर इस विषम और संकट की घडी में भी चैनहीन के पालतू गुर्गे और खरीदे हुए गुलाम अपने आकाओं को खुश करने के लिए अपने ही गांव में वैमनस्य फैलाने में जुटे हुए थे ! भाराव के लोगों के हर काम की आलोचना, उसकी बुराई, उसकी नाकामी की अफवाहें फैलाना ही उनका धर्म बन गया था। ऐसे ही माहौल में एक दिन खबर आई कि ढाणी के लोगों ने भाराव के कुछ बच्चों को पीट दिया है ! खबर मिलनी थी कि चैनहीन के गुर्गों को मौका मिल गया भाराव के करता-धर्ताओं के विरुद्ध विष वमन करने का ! उन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया कि वह ढाणी वाले जिनकी हिम्मत नहीं होती थी हमारे सामने आँख उठा कर बात करने की, वही आज हमारे बच्चों पर हाथ उठा रहे हैं। बात उतनी गंभीर नहीं थी पर विरोधियों ने उसे अलग ही रंग देना शुरू कर दिया था ! लोगों में गलत संदेश जा रहा था, चिंता की बात यह भी थी। 

भाराव वालों का मानना था कि बच्चे शैतानी करते ही हैं उन्होंने कुछ गलत किया होगा तो ढाणी वाले किसी बुजुर्ग ने डांट लगा दी होगी ! पर जब गुर्गों ने अधिक शोर मचाया तो सरपंचों द्वारा एक निरपेक्ष तथा माननीय बुजुर्ग को पूरी बात का पता लगाने ढाणी भेजा गया। तो वहां के जिम्मेदार लोगों ने जो बात बताई वह इस तरह थी कि, ''पिछले दिन नदी में नहा कर आए, भाराव तथा ढाणी के कुछ लड़कों को गीले बदन और कपड़ों सहित खलिहान में खेलने के लिए रोका  गया था ! पर लड़के तो लड़के; मना करने पर भी नहीं माने तो दो-तीन को पकड़ कर चपतियाना पड़ा ! उनमें हमारे भी बच्चे थे। अब आप ही बताइए, इस संकट के समय में अनाज कैसे खराब होने देते और वह भी आपके द्वारा ही भेजा हुआ है। हमने किसी दुर्भावनावश ऐसा नहीं किया। हमारा आपका नाता तो सदियों पुराना है ! हम कभी अपने संबंध बिगड़ने नहीं देंगे ! आपके उपकारों को हम कैसे भूल सकते हैं। फिर भी कोई भूल हुई हो तो हम सब क्षमाप्रार्थी हैं।" 
 
यह सब सुन विघ्नसंतोषियों के गाल पर करारा चांटा तो जरूर पड़ा पर वे सब चिकने घड़े ठहरे ! उन पर बेइज्जत या जलील होने का कोई असर नहीं होता ! क्योंकि उनकी इज्जत-आबरू- मान-सम्मान-धर्म, सब सिर्फ पैसा ही है। सो कुछ दिन चुप रह वे फिर किसी मौके की तलाश में जुट जाएंगे ! 

शुक्रवार, 12 जून 2020

मिर्च अनंत, तीखापन अनंता

हमारे देश में सबसे तीखी मिर्च असम की भूत जोलोकिया मानी जाती है, जिसे  घोस्ट पेप्पर, यू मोरक  या  लाल नागा  भी कहा जाता है !  शायद  इसके तीखेपन के  कारण  ही  इसका नाम भूतिया पड़ गया हो ! आम मिर्चों से जिनका ''एसएचयू'' तकरीबन 5000 के आस-पास होता है, इसका  तीखापन  है, करीब  चार सौ गुना  ज्यादा होता है। जबकि  इस जाति की सबसे शरीफ मिर्च है हमारी शिमले वाली, जिसके नाम में ही सिर्फ मिर्च है, उसका आंकड़ा शून्य ही होता है, है ना गजब..........! 

#हिन्दी_ब्लगिंग 
मिर्च,  हमारे ग्रंथों में  वर्णित षटरसों में  से एक का प्रमुख स्रोत, हमारी  रसोई और खान - पान में मौजूद  रहने   वाले  पहले पांच अहम   कारकों   में  से  एक !   जिसके  बिना  भोजन  में  जायके  की शायद कल्पना भी नहीं  की जा सकती !  जिसकी दसियों तरह की किस्मों का देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पाद  किया जाता है।  वैसे  इस  बेरी की झाडी जैसे  पौधे का  मूल स्थान  तो दक्षिण अमेरिका है पर आज  यह सारे   संसार में  जायके का पर्याय बन लोगों  की रसना पर राज करता हुआ पाया जाने लगा है।   हमारे यहां भी इसकी दसियों तरह की किस्मों की खेती देश के विभिन्न हिस्सों में की जाती है।  जिनमें से  कइयों को अपने   स्वाद और तीखेपन के  कारण गिनीज बुक में स्थान  पाने का   गौरव भी  प्राप्त हो  चुका है।  विटामिन ''ए'' से भरपूर  इसके फलों  की कुछ  किस्में, जैसे शिमला मिर्च जो अपने जो एकाधिक रंगों में उपलब्ध होती है, को सब्जी  के रूप में; लाल, काली और सफ़ेद मिर्च को मसालों या दवा की तरह तथा  हरी मिर्च को चटनी, अचार, सलाद या अन्य सब्जियों के साथ मिला पका कर खाया जाता है।  मिर्च के तीखेपन का  कारण इसमें मौजूद कैप्सेसिन और इसकी लालिमा इसमें पाए जाने वाले एक पदार्थ केप्सेन्थिन के कारण होती है। 
भूत जोलोकिया 
हमारे देश में सबसे तीखी मिर्च आसाम की भूत जोलोकिया मानी जाती है, जिसे घोस्ट पेप्पर, यू मोरक या लाल नागा भी कहा जाता है ! शायद इसके तीखेपन के कारण ही इसका नाम भूतिया पड़ गया हो ! आम मिर्चों से इसका तीखापन करीब चार सौ गुना ज्यादा होता है। इसीलिए इसका उपयोग खाने की बजाय दवा बनाने में, सूखी मछलियों सुरक्षित रखने में, फ्यूम बम बनाने में अधिक किया जाता है। असम और उत्तर-पूर्वीय राज्यों के स्थानीय लोग हाथियों के उत्पात से बचने के लिए अपने घर की दीवारों पर इसका लेप चढ़ा देते हैं। 2007 में दुनिया की  सबसे तीखी मिर्ची के रूप में इसका नाम गिनीज बुक में शामिल किया गया था ! वैसे हर साल यह सम्मान किसी ना किसी अन्य प्रजाति के नाम होता रहता है। 
कैरोलिना रीपर
दुनिया की सबसे तीखी मिर्च की बात करें तो यूनाइटेड किंगडम में पाई जाने वाली ड्रेगन्स ब्रेथ नाम की मिर्च का तीखापन इतना प्रलयंकारी माना जाता है कि उसके खाने से पहले चेतावनी ज्ञापित की जाती है कि इस मिर्च का सेवन जानलेवा हो सकता है। इसीलिए इसका प्रयोग दवा बनाने के लिए ही किया जाता है। इनके अलावा दुनिया की अन्य तीखेपन में सिरमौर मिर्चियों में कैरोलिना रीपर, जो आजकल गिनीज रेकॉर्ड में सबसे तीखी होने का गौरव हासिल किए बैठी है. के साथ-साथ नागा वाइपर, सेवन पॉट डुगलाह और ट्रिनीडेड स्कॉर्पियन जैसे नाम प्रमुख हैं। 
आम हरी मिर्च, ज्वाला 

शिमला मिर्च 
अब सवाल यह उठता है कि इस तीखे, चरपरे और कड़वेपन की पहचान कैसे की जाती है ! तो इस विधि की खोज सबसे पहले 22 जनवरी 1865 को जन्मे अमेरिकी फार्मासिस्ट विल्बर स्कोविल ने 1912 में विकसित कर दुनिया को तीखेपन की विभिन्न श्रेणियों से अवगत कराया। इस विधि से मिर्च में स्थित स्पाइसनेस को मापा जाता है और इस स्पाइसनेस या तीखेपन का स्कोविल हीट यूनिट यानी एसएचयू से पता कर उन्हें श्रेणीबद्ध किया जाता है। आज किसी चीज के तीखेपन को मापने के लिए यही तरीका इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले तक मिर्च के तीखेपन का पता लगाने का कोई तरीका मौजूद नहीं था। एसएचयू जितना ज्यादा होगा उस चीज का तीखापन भी उतना ज्यादा होगा। वैसे आम मिर्च का एसएचयू तकरीबन 5000 के आस-पास होता है। जबकि आज की सिरमौर मिर्च कैरोलिना रीपर का एसएचयू करीब 1569300 पाया गया है ! वहीं इस जाति की सबसे शरीफ मिर्च हमारी शिमले वाली है जिसका आंकड़ा शून्य ही होता है। 
अचारी मिर्च 
लाल मिर्च 
किसी मिर्च का एसएचयू जानने के लिए उसका Capsaicinoid अलग कर उसे तब तक डायल्यूट करते हैं जब तक टेस्ट में भाग लेने वाले पांच लोगों को चरपरापन लगना बंद ना हो जाए। उदहारण स्वरुप एक कप Capsaicinoid को विरल करने में जितने कप पानी लगेगा वही उस मिर्च का एसएचयू होगा। पर कुछ लोगों को यह विधि पूरी सटीक नहीं लगती ! क्योंकि परीक्षण करने वाले हर इंसान की जीभ की क्षमता अलग-अलग होती है, इसलिए एक जैसा परिणाम तो नहीं पाया जा सकता।फिर हर मिर्च का द्रव्यांक अलग-अलग होता है जो उसकी विरलता को प्रभावित कर सकता है। पर जो भी हो आज संसार यह जानने में सक्षम तो है कि किसी चीज का तीखापन क्या होता है।
मुंडू मिर्च 
काली मिर्च
जो भी हो पता नहीं मुझे कुदरत की यह अनोखी दें कभी भी रास नहीं आई ! कोई भी मिर्च हो, मुझे ना के बराबर पसंद है फिर वह चाहे दुनिया की सबसे कम तीखी शिमला मिर्च ही क्यूँ ना हो ! काली मिर्च कभी-कभार जरूर काम में ले लेता हूँ, वह भी औषधि के रूप में। इधर घर में कमोबेस सभी हरी मिर्च का उपयोग करते हैं। कभी-कभी मुझसे भी कहा जाता है कि खा कर देखो यह वाली बिल्कुल घास की तरह की है, और वाकई वह होती भी वैसी ही है ! तब लगता है कि कैसे और कितनी विविधता से भरपूर है यह मिर्ची रानी। गुगलिया सागर खंगाला तो कई बातें साझा करने को सामने आईं। आशा है रोचक लगेंगी। 
@अंतर्जाल का हार्दिक शुक्रिया  

मंगलवार, 9 जून 2020

उम्र, संख्या पर भले ही नहीं पर उसके तकाजे पर जरूर ध्यान रखें

अगली बॉल को बॉलर ने अपनी तर्जनी और मध्यमा में फंसा कर जबरदस्त फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने वाला खिलाड़ी फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली को कटोरे का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........


#हिन्दी_ब्लागिंग 
इस कोरोना कालखंड में हमारी छत पर अक्सर संध्या समय करीब आधे घंटे का, टेनिस गेंदी, दर्शक विहीन, एक सदस्यी, त्रिकोणी क्रिकेट मुकाबले का आयोजन हो जाता है। इसकी पॉपुलर्टी इतनी है कि घरवाले ही ध्यान नहीं देते। फिर भी कभी-कभी घर की वरिष्ठ महिला सदस्य अनुग्रहित करने हेतु आ तो जाती हैं पर उनकी रुचि खेल में नहीं, अपने फोन पर प्रसारित होते पचासवें और साठवें दशक के गानों में ही ज्यादा रहती है। खैर !
बात है, पिछले रविवार की! इस दिन मुकाबला द्विपक्षीय ही था। आखिरी मैच के अंतिम ओवर में एक टीम  को तीन बॉलों  में सिर्फ एक रन  की जरुरत थी। तभी चौथी बॉल खाली गयी। अगली  बॉल को  बॉलर ने  अपनी तर्जनी और  मध्यमा में  फंसा कर एक जबरदस्त  फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी  किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने  वाला  खिलाड़ी  फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली  को कटोरे  का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........धम्म......थड्ड.....!

ठीक चार सेकेंड बाद छत की मुंडेर से टकराया खिलाड़ी उठता है और पूछता है कि बॉल कहां है ? बॉल कहां है ? तभी दर्शक दीर्घा से तेज आवाज आती है, ''बॉल छड्डो, देक्खो खून बै रेया ऐ ! लग्ग गई ?'' यह सुनने पर खिलाड़ी का ध्यान अपने हाथ पर जाता है, जहां दो छिद्रों से रक्त बाहर आ रहा था। नीचे जा धो-पौंछ कर डेटॉल-क्रीम वगैरह लगा निवृति पाई गई ! पर कुछ देर बाद ही कुछ अस्वाभाविक सा लगने पर जब मुआयना हुआ तो पाया गया कि दाएं पैर की तीसरी और चौथी उंगलियां कालिमा युक्त नीले रंग में रंग गई हैं ! दोनों घुटनों ने पुरानी चमड़ी को त्याग नई पाने का उपक्रम कर लिया है। दोनों हथेलियों में सूजन आ गई है ! अंगूठों के जोड़ पीड़ाग्रस्त हो चुके हैं ! ठुड्डी के टकराने से जबड़े में कुछ दर्द तो है ही उस टकराहट से उठी तरंगों ने पीठ और कमर के बीच रीढ़ की हड्डी को भी बगावत के लिए उकसा दिया है !

इन सब के साथ ही रात गहराती गई पर नींद ने भी विद्रोह कर दिया ! पूरी रात जागते ही बीती। दूसरे दिन भी उठा नहीं गया। शाम को दर्द तो था पर कुछ हिम्मत कर हिलने-डुलने, चलने-फिरने की हिम्मत जुटाई जा सकी ! इसीलिए कहता हूँ जो लोग कहते हैं ना कि उम्र सिर्फ एक संख्या है; ये वे लोग होते हैं जो अभी चोटग्रस्त या बीमार नहीं हुए होते ! उनकी बात मान जो अति उत्साही ''वरिष्ठ युवा'' नंबर-नंबर खेलने लग जाते हैं, वे समझ लें कि खुदा ना खास्ता कभी कुछ ऐंड-बैंड हो जाता है तो वह संख्या उतने ही किलोग्राम में बदल सिर पर सवार हो जाती है .............सुन रहे हैं ना !!

शुक्रवार, 5 जून 2020

पाताल भुवनेश्वर, मान्यता है कि यहां गणेश जी का असली सिर स्थापित है

बातचीत के दौरान ही उन्होंने अचानक पूछ लिया, ''भैया, क्या आपको इस बारे में कोई जानकारी है कि गणेश जी के जिस सिर को काट कर शिशु हाथी का सिर लगाया गया था; फिर उस असली सिर का क्या हुआ ?'' 
प्रश्न अप्रत्याशित था ! ना हीं कभी इस बारे में कभी मेरे कुछ पढ़ने या सुनने में आया था ! मैंने कहा, ''हो सकता है कि उसका अग्निदाह कर दिया गया हो ! वैसे मुझे इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं है !''

#हिन्दी_ब्लागिंग 
लॉकडाउन के इस कालखंड में दूरभाष ही एकमात्र मेल-जोल का साधन बचा रह गया है। इसी माध्यम पर कुछेक दिन पहले मित्र ठाकुर जी ने सम्पर्क किया। बातचीत के दौरान ही उन्होंने अचानक पूछ लिया, ''भैया, क्या आपको इस बारे में कोई जानकारी है कि गणेश जी के जिस सिर को काट कर हाथी का सिर लगाया गया था; फिर उस असली सिर का क्या हुआ ?'' 
प्रश्न अप्रत्याशित था ! ना हीं कभी इस बारे में मेरे कभी कुछ पढ़ने या सुनने में आया था ! मैंने कहा, ''हो सकता है कि उसका अग्निदाह कर दिया गया हो ! वैसे मुझे इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं है !''

मेरे इंकार करने पर ठाकुर जी ने बताया कि पता चला है कि उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर भुवनेश्वर नामक गांव में एक गुफा है, जिसे पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। मान्‍यता है कि इस गुफा में गणेश जी का असली सिर भगवान शिव द्वारा स्थापित किया गया था ! आप इस बारे में विस्तृत जानकारी का कुछ पता कीजिए। 
हमारे ग्रंथों में पौराणिक काल की असंख्य कथाएं, उपकथाएं ऐसे हमारे मानस में रच-बस गयी हैं कि हम सब धर्मभीरुता के तहत सब पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं। यह बात तकरीबन हर धर्म में लागू होती है। इन सब का चतुरों द्वारा फ़ायदा भी उठाया जाता रहा है। खैर ! वह एक अलग विषय है। ठाकुर जी से इस नई बात का पता चलते ही लॉकडाउन में कुछ सुस्त पड़ा ब्लॉगर जागा और चल दिया गुगलिया सागर को खंगालने ! जिससे कुछ ऐसा संज्ञान मिला -
कथा कुछ इस प्रकार है कि जब शिव जी द्वारा उद्दंड बालक का सिरच्छेद कर उस पर शिशु हाथी का मस्तक आरोपित कर दिया गया तब यह सवाल उठा कि उस कटे हुए सिर का क्या किया जाए ! वहां सभी उपस्थित लोगों का मत था कि उसका ससम्मान अग्निदाह कर दिया जाना चाहिए। परन्तु माँ गौरी ममतावश इस राय से सहमत नहीं थीं ! बालक का शरीर तो पुनर्जीवित हो चुका था ! समस्त देवी-देवताओं की सहमति से उसे गणपति बना, प्रथम पूजित होने का सम्मान भी प्रदान कर दिया गया था ! पर माँ का ह्रदय किसी प्रकार की तसल्ली से भी शांत नहीं हो पा रहा था। तब भोलेनाथ ने उनकी ममता को सर्वोपरि मान, शरीर की भाँति मस्तक को भी आदरांजलि देते हुए, उसमें जीवनी शक्ति प्रतिरोपित कर उसे एक गुफा में स्थापित कर उसे आदि गणेश नाम दिया और अंबे को आश्वासन दिया कि उसकी देख-भाल-रक्षा वे सदा खुद तो करेंगे ही, बाकी देवी-देवता भी पूजा-अर्चन के लिए वहां आते रहेंगे। ऐसा विवरण स्कंदपुराण में मिलता है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। 
ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले इस गुफा का पता त्रेता युग में सूर्य वंश के अयोध्यापति राजा ऋतुपर्ण के द्वारा लगाया गया था। कलयुग में जगत गुरु आदिशंकराचार्य ने 722 ई. के आसपास इस गुफा की खोज की और यहां तांबे के शिवलिंग की विधिवत स्थापना की। वैसे यह कोई एक गुफा नहीं है ! गुफा के अंदर गुफा और उसके अंदर फिर गुफा; जैसे गुफाओं का जाल बिछा हो। कोई भी दर्शनार्थी बहुत अंदर तक नहीं जा सकता। फिसलन होने से गिरने का डर, उमस और आक्सीजन की कमी कुछ भी अघटित घटा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह जगह अभी भी निर्माण के दौर में है। 
पाताल भुवनेश्वर चूना पत्थर से बनी प्राकृतिक गुफा है। जिसमें चूने और पानी के मिलन से विविधरूपा आकृतियां बन गई हैं। धार्मिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से भी कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक कलाकृतियों के दर्शन होते हैं। यह गुफा भूमि से 90 फ़ीट की गहराई में लगभग 160 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली हुई है। इसकी दीवारों से पानी रिसने के कारण रास्ता काफी रपटीला है, इसलिए अंदर जाने के लिए लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। इस गुफा की सबसे खास बात तो यह है कि यहां एक ऐसा शिवलिंग है जो लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में शिवलिंग की ऊंचाई 1.5 फिट की है और ऐसी मान्यता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब दुनिया खत्म हो जाएगी। गुफा के अंदर कई कलाकृतियों के साथ ही एक हवनकुंड भी बना हुआ है; जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी हवनकुंड में राजा जनमेजय ने सर्पों का नाश करने के लिए नाग यज्ञ किया था। पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर दुनिया भर में एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन का पुण्य प्राप्त हो जाता है। यह पवित्र व रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है।

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

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