मंगलवार, 26 सितंबर 2017

.....बच बच के, बच के कहाँ जाओगे !

लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है; भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए.........
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक पुरानी फिल्म, यकीन, का गाना है, "बच बच के, बच के, बच बच के, बच के कहाँ जाओगे" ! जो आज पूरी तरह देश के मध्यम वर्ग पर लागू हो फिर मौंजूं है ! उस गाने के बोलों को बिना जुबान पर लाए, आजमाया जा रहा है, देश के इस शापित वर्ग पर।  देश की जनता समझ तो सब रही है ! फिलहाल चुप है। पर उसकी चुप्पी को अपने हक़ में समझने की भूल भी लगातार की जा रही है। आम-जन के धैर्य की परीक्षा तो ली जा रही है, पर शायद यह सच भुला दिया गया है कि हर चीज की सीमा होती है। नींबू चाहे कितना भी सेहत के लिए मुफीद हो, ज्यादा रस पाने की ललक में अधिक निचोड़ने पर कड़वाहट ही हाथ लगती है....। 

किसके बूते ?
अभी बैंकों की सर्कस चल ही रही है।  जिसके तहत पैसे जमा करने, रखने, कितने रखने, निकालने, कितने निकलने जाइए करतब दिखाए जा रहे हैं। तंग हो कर भी लोगों ने शो चलने दिया है ! क्योंकि रोजी-रोटी की कशमकश के बाद थके-टूटे इंसान के पास यह सब सोचने का समय ही कहाँ छोड़ा गया है ! पर विरोध का ना होना भी अन्याय का समर्थन ही है। इसी विरोध के ना होने से साथ ही बारी आ गई किरायों की; लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है;
भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए। आम नागरिक फिर कड़वा घूंट पी कर रह गया। लोगों ने इसका तोड़, कार-स्कूटर पूल कर निकाला तो फिर इस बार सीधे पेट्रोल पर ही वार कर दिया गया। उस पर तरह-तरह के टैक्स, फिर टैक्स पर टैक्स, फिर सेस, पता नहीं क्या-क्या लगा उसकी कीमतों को अंतर्राष्ट्रीय कीमतों से भी दुगना कर दिया गया। हल्ला मचा तो हाथ झाड़ लिए !

सरकारी, गैर-सरकारी कंपनियों की कमाई कहाँ से आती है; मध्यम वर्ग से ! देश भर में मुफ्त में अनाज, जींस, पैसा बांटा जाता है उसकी भरपाई कौन करता है; मध्यम वर्ग। सरकारें बनाने में किसका सबसे ज्यादा योगदान रहता है; मध्यम वर्ग का। फिर भी सबसे उपेक्षित वर्ग कौन सा है; वही मध्यम वर्ग !! अब तो उसे ना किसी चीज की सफाई दी जाती है नाहीं कुछ बताना गवारा किया जाता है। तरह-तरह की बंदिशों के फलस्वरूप इस वर्ग के अंदर उठ रहे गुबार को अनदेखा कर उस पर  धीरे-धीरे हर तरफ से शिकंजा कसा जा रहा है कि कहीं बच के ना निकल जाए ! ऐसा करने वाले उसकी जल्द भूल जाने वाली आदत और भरमा जाने वाली फितरत से पूरी तरह वाकिफ हैं, इसीलिए अभी निश्चिंत भी हैं। पर कब तक ???

शनिवार, 23 सितंबर 2017

रंभ पुत्र महिषासुर, जिसका दो बार वध किया माँ भवानी ने !

एक बार अपने विजय अभियान से लौटते हुए असुर रंभ ने एक सरोवर में एक भैंस को जल-क्रीड़ा करते हुए देखा तो उस पर मोहित हो उसने प्रणय निवेदन किया, जिसके स्वीकार होते ही उसने भैंसे का रूप धर उस श्यामला नामक महिष-कन्या से विवाह कर लिया और वहीं रहने लगा। ऐसा उल्लेख भी  मिलता है कि श्यामला एक राजकुमारी थी जिसे श्रापवश भैंस का रूप मिला था। इन्हीं के संयोग से महिषासुर का जन्म हुआ.....
#हिन्दी_ब्लागिंग          
पौराणिक काल में देव - दानवों के बीच अक्सर युद्ध होते रहते थे। इसी  बीच कश्यप ऋषि और दक्ष-पुत्री  दनु के
असुर वंश में दो पराक्रमी भाइयों, रंभ और करंभ का जन्म हुआ। जब वे दोनों युवावस्था में पहुंचे और असुरों की दयनीय अवस्था और हालत देखी तो उन्होंने शक्तिशाली होने के लिए तपस्या करने की ठानी।  रंभ ने अग्नि में बैठ कर अग्निदेव की, और करंभ ने पानी में जा कर वरुणदेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करना शुरू किया। उनकी तपस्या को अपने आसन के लिए ख़तरा मान देवराज इंद्र ने उन पर आक्रमण कर दिया। उसने मगर का रूप धर पानी में जा करंभ को मार डाला; पर अग्निदेव द्वारा रंभ की रक्षा करने के कारण वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। समय के साथ रंभ की तपस्या पूर्ण हुई और अग्निदेव ने उसे वरदान दिया कि वह देव-दानव-मनुष्य किसी से भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा उसकी मौत सिर्फ मरे हुए इंसान द्वारा ही होगी। अब मरा हुआ इंसान किसी को कैसे मार सकता है यह सोच रंभ को अपने अमर होने का गुमान हो गया। धीरे-धीरे वह शक्तिशाली होने के साथ-साथ अराजक भी होता चला गया। उसने अनेक सिद्धियां भी प्राप्त कर लीं. चहुँ ओर उसकी तूती बोलने लगी। 

एक बार अपने विजय अभियान से लौटते हुए रंभ ने एक सरोवर में एक भैंस को जल-क्रीड़ा करते हुए देखा तो उस पर मोहित हो उसने प्रणय निवेदन किया जिसके स्वीकार होते ही उसने भैंसे का रूप धर उस त्रिहायणी नामक महिष-कन्या से विवाह कर लिया और वहीं रहने लगा।ऐसा उल्लेख भी  मिलता है कि श्यामला एक राजकुमारी थी जिसे श्रापवश भैंस का रूप मिला था। इधर देवासुर संग्राम तो चलता ही रहता था। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर विजय पाने के लिए तरह-तरह के उपाय खोजते रहते थे। समय के साथ-साथ देताओं ने रंभ की मौत का जरिया भी खोज निकाला। ऋषि दाधीच की हड्डियों से बने अस्त्र, वज्र से उस पर हमला कर उसे मौत के घात उतार दिया। अग्निदेव के वरदानानुसार एक मृत व्यक्ति ही रंभ की मौत का कारण बना। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि उसका पुनर्जन्म रक्तबीज के रूप में हुआ था जो शुंभ-निशुंभ की सेना का सेनापति बना था। इस बार उसे वरदान प्राप्त था कि यदि उसके खून की एक बूँद भी धरती पर गिरेगी तो वह पुन: जीवित हो जाएगा। इस तरह उसने फिर एक तरह से अमरत्व पा लिया था। उसके आतंक को ख़त्म करने के लिए माँ दुर्गा ने माँ काली का अवतार ले उसका अंत किया था। 

उधर रंभ और त्रिहायणी के संयोग से महिषासुर का जन्म हुआ, जिसको  यह शक्ति  प्राप्त  थी कि  वहअपनी
इच्छानुसार कभी भी असुर  या  महिष का रूप धर सकता था।  महिषासुर ने  ब्रम्हा जी की कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया था कि कोई भी देवता, दानव,मनुष्य, पशू-पक्षी  उसपर विजय प्राप्त नहीं कर सकेगा। इस तरह वह उच्श्रृंखल हो तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा। स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया  तथा सभी देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया। देवगण परेशान होकर ब्रम्हाविष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। पर सारे देवता मिल कर भी उसे परास्त नहीं कर पाए। तब सबने मिल कर आर्त स्वर में माँ दुर्गा का आह्वान किया। उनके प्रकट होने पर उनकी पूजा-अर्चना कर अपनी विपत्ति से छुटकारा दिलवाने की प्रार्थना की। माँ भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया। माँ के दिलासा देने पर सभी देवों ने अपने-अपने आयुध उन्हें सौपें। महामाया हिमालय पर पहुँचीं और अट्टहासपूर्वक घोर गर्जना की। उस भयंकर शब्द को सुनकर दानव डर गये और पृथ्वी काँप उठी। भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके महिषासुर के सभी सेनानी देवी के हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुए। महिषासुर का भी भगवती के साथ भयंकर
युद्ध हुआ। उसने नाना प्रकार के मायाविक रूप बनाकर महामाया के साथ युद्ध किया, पर उसकी एक ना चली। जब उसे लगने लगा कि अंत नजदीक है तो उसने माँ से अपने कृत्यों के लिए क्षमा मांगी। माँ ने उसे क्षमा करते हुए वरदान भी दिया कि आने वाले समय में उनके साथ उसकी भी पूजा की जाएगी। इसीलिए आज भी नवरात्रों में माँ दुर्गा की प्रतिमा के साथ ही महिषासुर की मूर्ति भी बनती है। माँ भगवती द्वारा महिषासुर के वध से देवताओं में ख़ुशी व्याप्त गयी, उन्होंने माँ की स्तुति की और भगवती महामाया प्रत्येक संकट में देवताओं का सहयोग करने का आश्वासन देकर अंतर्धान हो गयीं। 

बुधवार, 20 सितंबर 2017

भाषा में मुहावरों का तड़का

हिंदी में तो मुहावरों की भरमार है। इसमें  मनुष्य के सर से लेकर पैर तक हर अंग के ऊपर एकाधिक मुहावरे बने हुए है। इसके अलावा खाने-पीने, आने-जाने, उठने-बैठने, सोने-जागने, रिश्ते-नातों, तीज-त्योहारों, हंसी-ख़ुशी, दुःख-तकलीफ, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, कथा-कहानियों, स्पष्ट-अस्पष्ट ध्वनियों, शारीरिक-प्राकृतिक या मनोवैज्ञानिक चेष्टाओं तक पर मुहावरे गढ़े गए हैं; और तो और हमने ऋषि-मुनियों-देवों तक को इनमे समाहित कर लिया है....
#हिन्दी_ब्लागिंग 
संसार की हर समृद्ध भाषा में मुहावरों का अपना एक अलग स्थान है। जिस तरह किसी पुरुष या नारी के व्यक्तित्व में थोड़े से साज-श्रृंगार व उचित परिधान से और निखार आ जाता है; या जिस तरह भोजन-व्यजंन, मिर्च-मसालों  के प्रयोग से और स्वादिष्ट हो जाते हैं; जिस तरह बाग़-बगीचे में फूलों की क्यारियां उसे और मनोहर बना देती हैं, उसी प्रकार किसी भी भाषा को मुहावरों का प्रयोग और रुचिकर बना देता है। उसमें एक गहराई, एक अलग प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने कभी इनका प्रयोग किया-देखा-सुना ना हो !  

इसका प्रयोग कैसे और कब शुरू हुआ इसकी जानकारी मिलना बहुत मुश्किल है, पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य ने शारीरिक चेष्टाओं, अस्पष्ट ध्वनियों और बोलचाल की किसी शैली का अनुकरण या उसके आधार पर उसके सामान्य अर्थ से भिन्न कोई विशेष या विशिष्ट अर्थ देने वाले वाक्य, वाक्यांश या शब्द-समूह को मुहावरे का नाम दिया होगा। ऐसे वाक्य जन-साधारण के अनुभवों, अनुभूतियों, तजुर्बों से अस्तित्व में आते रहे होंगे। जिनमें व्यंग्य का पुट भी मिला होता था। इन्हें लोकोक्ति के नाम से भी जाना जाता है। इनके बिना तो भाषा की कल्पना भी मुश्किल लगती है।    

किसी भी भाषा में मुहावरों का प्रयोग भाषा को सुंदर, प्रभावशाली, संक्षिप्त तथा सरल बनाने के लिए किया जाता है। हिंदी में तो मुहावरों की भरमार है। इसमें  मनुष्य के सर से लेकर पैर तक हर अंग के ऊपर एकाधिक मुहावरे बने हुए है। इसके अलावा खाने-पीने, आने-जाने, उठने-बैठने, सोने-जागने, रिश्ते-नातों, तीज-त्योहारों, हंसी-ख़ुशी, दुःख-तकलीफ, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, कथा-कहानियों, स्पष्ट-अस्पष्ट ध्वनियों, शारीरिक-प्राकृतिक या मनोवैज्ञानिक चेष्टाओं तक पर मुहावरे गढे गए हैं; और तो और हमने ऋषि-मुनियों-देवों तक को इनमे समाहित कर लिया है। पर इसके साथ ही एक बात ध्यान देने की यह भी है कि मुहावरे किसी-न-किसी तरह के अनुभव पर आधारित होते हैं। इसलिए उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन या उलटफेर नहीं किया जाता है।जैसे गधे को बाप बनाना या अपना उल्लू सीधा करना; इनमें गधे की जगह बैल या उल्लू की जगह कौवा कर देने से उनका अनुभव-तत्व नष्ट हो जाता है और वह बात नहीं रह जाती। 

इनकी कुछ विशेषताएं भी हैं, जैसे - ये वाक्यांश होते हैं। मुहावरे का प्रयोग वाक्य के प्रसंग में ही होता है, अलग नहीं। मुहावरा अपना असली रूप कभी नही बदलता कार्टून चरित्रों की तरह ये सदैव एक-से रहते हैं, अर्थात उसे पर्यायवाची शब्दों में अनूदित नही किया जा सकता। इनका प्रयोग करते समय इनका शाब्दिक अर्थ न लेकर विशेष अर्थ लिया जाता है। इनके विशेष अर्थ भी कभी नहीं बदलते। ये लिंग, वचन और क्रिया के अनुसार वाक्यों में प्रयुक्त होते हैं; हाँ समय, समाज और देश की तरह नए-नए मुहावरे भी बनते रहते हैं। आज के मशीनी युग के मुहावरों और पुराने समय के मुहावरों तथा उनके प्रयोग में भी अंतर साफ़ दिखलाई पड़ता है 

उदाहरण के तौर पर आज कुछ मुहावरों को यहां आमंत्रित करते हैं, जो खान-पान संबंधित चीजों से अटे पड़े हैं। पता नहीं विशेषज्ञों से कोई पदार्थ छूटा भी है कि नहीं, देखिए ना, कहीं "खिचड़ी अलग पक रही है" तो "कहीं अकेला चना भाड़ फोड़ने की बेकार कोशिश में लगा हुआ है।" तो "कहीं लोहे के चने चबवा दिए जाते हैं।" फलों की बात करें तो यहां "आम के आम गुठली के भी दाम" मिलते हैं ! कहीं "खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है" तो "किसी के अंगूर ही खट्टे होते हैं।" किसी की "दाल नहीं गलती" तो "कहीं दाल में कुछ काला हो जाता है।" कहीं कोई "घर बैठा रोटियां तोड़ता है," तो "किसी की दांत काटी रोटी होती है" तो "किसी का आटा ही गीला हो जाता है।" कोई "मुंह में दही जमाए बैठ जाता है" तो "कोई अपने दही को खट्टा भी नहीं कहता।" सफलता के लिए किसी को "पापड बेलने पड़ जाते हैं" तो किसी का "हाल बेहाल हो जाता है" ऐसे में "ये मुंह और मसूर की दाल सुनना" पड़ता है। कुछ लोग "गुड़ खाते हैं पर गुलगुले से परहेज कर" "गुड़ का गोबर कर देते हैं।' कहीं कोई "ऊँट के मुंह में जीरा" देख "राई का पहाड़" और "तिल का ताड़ बना कर", "जले पर नमक छिड़कने" से भी बाज नहीं आता है। किसी के "दांत दूध के होते हैं" तो कुछ "दूध से नहाए होते हैं।" वहीँ कुछ लोग "दूध का दूध पानी का पानी" कर "छठी का दूध याद दिला" कर किसी को "नानी की याद दिलवा देते हैं।" हमारे यहां मिठाइयों से भी तरह-तरह की अजीबोगरीब उपमाएं रच दी गयी हैं ! जैसे किसी टेढ़े व्यक्ति को "जलेबी की तरह सीधा" बता कर उसकी असलियत बताई जाती है तो किसी मुश्किल काम को "टेढ़ी खीर" कहा जाता है ! किसी के अच्छे वचनों के लिए उसके "मुंह में घी शक्कर" भर दी जाती है तो किसी की सफलता पर उसके "दोनों हाथों में लड्डू।" थमा दिए जाते हैं। किसी की "पाँचों उंगलियां घी में होती हैं" तो किसी की "खिचड़ी में ही घी गिरता है।"  इसी कारण हम "खाते-पीते घर के लगते हैं।"   औरों की तो क्या कहें, हमारे यहां तो "अंधे भी रेवड़ियां बांट" कर "दाल-भात में मूसरचंद बन जाते हैं।" इन मुहावरों की दुनिया तो इतनी विशाल है जैसे "सुरसा का मुंह" कि इन पर "पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है।" यह भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि "मुहावरे अनंत मुहावरा कथा अनंता"। 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मच्छर भी "हाईटेक" और "लाइफ कॉन्शस" हो गए हैं

अब यह पहले की तरह ज्यादा गुंजार नहीं करता। इसका आकार भी कुछ छोटा हो गया है। उड़ने की शैली भी कुछ बदल कर सुरक्षात्मक हो गयी है। रक्त रूपी आहार भी कम लेने लगा है। इन सब परिवर्तनों का फायदा इस प्रजाति को मिलने भी लगा है। पहले गले तक रक्त पी, उड़ने से लाचार हो, यह आपके आस-पास ही पड़ा रहता था, चाहे बिस्तर पर या फिर तकिए पर या फिर पास की दिवार पर और देखते-देखते हाथ के एक ही प्रहार से वहीँ चिपक कर रह जाता था। पर अब बदलाव के कारण यह जरुरत के अनुसार भोग लगा.. यह-जा ! वह-जा ! होने लगा है........   
#हिन्दी_ब्लागिंग      
हम इंसान अपनी उपलब्धियों पर ही इतना इतराते और मग्न रहते हैं कि हम अपने आस-पास के जीव-जंतुओं, कीड़े-मकौड़े-कीटाणु-जीवाणुओं की उपलब्धियों पर ध्यान ही नहीं देते। हालांकि हमारी ज्यादती से सैकड़ों प्रजातियां इस दुनिया से विदा ले चुकी हैं और अनेकों का अस्तित्व खतरे में हैं। फिर भी जहां मानव दसियों बीमारियों से ग्रसित हो दम तोड़ देता है वहीँ जीव-जंतु अपने को परिस्थियों के अनुसार ढाल लेते हैं ! कभी सोचा है कि तिलचिट्टा (Cockroach) हजारों हजार साल से, एक से एक विकट परिस्थियों के बावजूद कैसे बचा हुआ है ! कैसे कछुआ दशकों तक जीवित रह जाता है। कैसे हीमांक के नीचे या जानलेवा तपिश में भी प्राणी जिंदगी को गले लगाए रखते हैं, बिना किसी अप्राकृतिक साधन के ! कैसे प्राकृतिक आपदाओं में मनुष्यों की मौत ज्यादा होती है बनिस्पत दूसरे प्राणियों के ! कैसे छोटे-छोटे तुच्छ कीटाणु-जीवाणु कीट नाशकों के प्रति प्रतिरक्षित हो जाते हैं।  है ना आश्चर्य की बात !!

मच्छर को ही लें ! एक-डेढ़ मिलीग्राम के इस दंतविहीन कीड़े ने वर्षों से हमारे नाक में दम कर रखा है। करोड़ों-अरबों रूपए इसको नष्ट करने के उपायों पर खर्च करने के बावजूद इसकी आबादी कम नहीं हो पा रही है। तरह-तरह की सावधानियां, अलग-अलग तरह के उपाय आजमाने के बावजूद साल में करीब चार लाख के ऊपर मौतें इसके कारण हो जाती हैं। इतने लोग तो मानव ने आपस में लडे गए युद्धों में भी नहीं खोए ! मच्छर तथा मलेरिया पर वर्षों से इतना लिखा पढ़ा गया है कि एक अच्छा खासा महाकाव्य बन सकता है। 1953 में इस रोग की रोकथाम के उपायों की शुरुआत की गयी, जिसे 1958 में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप दे दिया गया। पर नतीजा शून्य बटे सन्नाटा ही रहा। सरकारें थकती नहीं नियंत्रण की बात करने में और उधर मच्छर भी डटे हैं रोगियों की संख्या बढ़ाने मेँ। अब तो यह भी खबर है कि ज़िंदा तो जिंदा मरे हुए मच्छर के रोएं इत्यादि भी इंसान की सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर तरह-तरह की एलर्जी से ग्रसित करवा देते हैं। 

मच्छर तथा मच्छरी दोनों फूल-पत्ती इत्यादि का रस पी कर ही जीते हैं; पर मादा को प्रोटीन की आवश्यकता
होती है जिसे वह मानव व दूसरे जीवों के रक्त से पूरा करती है। वैसे एक कहावत है "नारी ना सोहे नारी के रूपा" मच्छरी इस बात की हिमायतिन है, वह अपनी सम-लिगिंयों से ख़ास बैर रखती है। वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं के पसीने में एक विशेष गंध होती है। वही मच्छरों को अपनी ओर आकर्षित करती है और  इसके साथ ही लाल रंग या रोशनी भी इन्हें बहुत लुभाती है।  
 पर इधर अपने भार से तीन गुना ज्यादा रक्त पी, कुछ समय के लिए अजगर के समान पड जाने वाले इस कीट में कुछ बदलाव सा नजर आने लगा है। खासकर दिल्ली में। तटीय क्षेत्रों में शायद यह "वैज्ञानिक बदलाव" अभी नहीं पहुंचा है ! अब लग रहा है कि यह पहले की तरह ज्यादा गुंजार नहीं करता। इसका आकार भी कुछ छोटा हो गया है। उड़ने की शैली भी कुछ बदल कर सुरक्षात्मक हो गयी है। एक बार में रक्त रूपी आहार की खुराक भी कम लेने लगा है। इन सब परिवर्तनों का फायदा इस प्रजाति को मिलने भी लगा है। पहले गले तक रक्त पी कर, उड़ने से लाचार हो, यह आपके आस-पास ही पड़ा रहता था, चाहे बिस्तर पर या फिर तकिए पर या फिर पास की दिवार पर और देखते-देखते हाथ के एक ही प्रहार से वहीँ चिपक कर रह जाता था। पर अब बदलाव के कारण यह
जरुरत के अनुसार, भोग लगा यह-जा ! वह-जा ! होने लगा है। लगता है इन्होंने भी अपने को बचाने के लिए काफी शोध किए हैं। जिससे ये  "हाईटेक" और "लाइफ कॉन्शस" हो गए हैं। पहले "फ्लिट" की एक ही बौछार से इसके सैंकड़ों साथी भू-लुंठित हो जाया करते थे; वहीँ अब इस पर किसी भी धूम्र, द्रव्य या क्रीम का उतना प्रभाव नहीं पड़ता। कोई माने या ना माने पर जिस कीट को इतनी समझ है कि अपने डंक के साथ एक ऐसा रसायन अगले के शरीर में छोड़ता है जिससे रक्त अपने जमने की विशेषता कुछ समय के लिए खो बैठता है और उतनी देर में यह खून चूस, किटाणु छोड़ हवा हो जाता है ! तो क्या, उसने समय के साथ-साथ अपनी सुरक्षा के बारे में शोध नहीं किया होगा !      

जितना पैसा दुनिया भर की सरकारें इस कीट से छुटकारा पाने पर खर्च करती हैं; वह यदि बच जाए तो दुनिया में कोई इंसान भूखा नंगा नहीं रह जाएगा। इससे बचने का उपाय यही है कि खुद जागरूक रह कर अपनी सुरक्षा आप ही की जाए। क्योंकि ये महाशय "देखन में छोटे हैं पर घाव करें गंभीर"।  

शनिवार, 9 सितंबर 2017

भजनों, आरतियों, गीतों से छेड़-छाड़ !

हमारे देश में, गीता को छोड़ दीजिए, वह तो प्रभू की वाणी है। पर जिस तरह मानव-रचित रामायण व महाभारत, सदियों से हमारे सबसे पवित्र, सम्माननीय व लोकप्रिय ग्रंथ हैं; उसी तरह विष्णु जी की सबसे जनप्रिय, घर-घर में गायी जाने वाली, सबसे पमुख, प्रमाणिक मानी जाने वाली आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है। उसको भी इन कुंठित दिमाग वालों ने नहीं बक्शा।  जिस तरह के वस्त्र पहना कर एक प्रतिस्पर्द्धी से इसे पाप संगीत (पॉप म्युजिक) में गवाया गया है उसे किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पता नहीं ऐसा क्यूँ है कि जब हमारे सामने कुछ गलत होता है तो हम उसे चुपचाप देखते रहते हैं और जब उसकी बुराई पूरी तरह खुल कर सामने आती है तो फिर हफ़्तों हाय-तौबा मचाए रखते हैं। इधर जितनी भी बड़ी  घटनाएं हुई हैं वे सब इस बात का प्रमाण हैं। वैसा ही कुछ एक तथाकथित "रिएलिटी शो" में, जो अपनी सफाई में भजन
विधा को नई ऊंचाइयों और लोगों में स्थापित करने के दावे के साथ शुरू हुआ है, जिस तरह भजनों-आरतियों की बखिया उधेड़ी जा रही है, उस के बारे अभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही; पर जैसे ही एक बड़ा जनमत इसका विरोध करेगा तब सभी इसके विरोध में बोलना शुरू कर देंगे। इस पर एक पोस्ट पहले भी लिखी थी; पर उस पर भी लोगों की प्रतिक्रिया, सब चलता है, जैसी ही थी।  

बाबा रामदेव को ढाल बना इस शो में जिस तरह भजनों को "फ्यूज" कर अन्धकार को लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न हो रहा है वह किसी भी तरह ग्राह्य नहीं है। आश्चर्य है कि इतने दिनों बाद भी किसी तरह की आलोचनात्मक आवाज नहीं उठी है ! हो सकता है बाबा रामदेव के इससे जुड़े होना ही कारण हो और यही इस शो
शो के जज 
के आयोजकों का उद्देश्य और उनकी सफलता है। जबकि   इस    शो    की गंभीरता इसके मंचन, यहां की भाषा, वहाँ उपस्थित ख्यातिप्राप्त हस्तियों, उनके उपक्रमों, विवरणों से ही लग जाती है।

हमारे देश में, गीता को छोड़ दीजिए, वह तो प्रभू की वाणी है। पर जिस तरह मानव-रचित रामायण व महाभारत, सदियों से हमारे सबसे पवित्र, सम्माननीय व लोकप्रिय ग्रंथ हैं; उसी तरह विष्णु जी की सबसे जनप्रिय, घर-घर में गायी जाने वाली, सबसे पमुख, प्रमाणिक मानी जाने वाली आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है। उसको भी इन कुंठित दिमाग वालों ने नहीं बक्शा।       जिस तरह के वस्त्र पहना कर एक प्रतिस्पर्द्धी से इसे  पाप संगीत
(पॉप म्युजिक) में गवाया गया है उसे किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए। पर  विडंबना है कि मंच पर उपस्थित बाबा रामदेव सहित तथाकथित जज व अन्य, तालियां बजा - बजा कर उसे,   भक्ति-गायन को एक अलग तरह की ऊंचाइयों पर ले जाने की उपलब्धि मान रहे हैं।  कम से कम बाबा रामदेव से ऐसे मंच पर उपस्थित होने की उम्मीद नहीं थी जबकि उन्होंने बड़ी मेहनत से अपनी छवि एक देशभक्त, योग-गुरु, स्वदेशी और अपनी परंपराओं का सम्मान करने वाले के रूप में बनाई है।  

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

ब्रह्मदेश, बर्मा या म्यांमार का काली माता का मंदिर

बर्मा का भारतीय फ़िल्मी दुनिया से भी संबंध काफी पुराना है। फ़िल्मी जगत की सबसे सफल नर्तकी-अभिनेत्री हेलेन मूल रूप से बर्मा की ही हैं। वर्षों पुराना सदाबहार गीत "मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून" को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। बर्मा को लेकर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं 
#हिन्दी_ब्लागिंग
म्यांमार, हमारे पड़ोसी देशों में से एक; पर जिसके बारे में हम शायद सबसे कम जानते हैं। इतना कम कि हमें यह भी नहीं मालुम कि 1937 के पहले भारत का ही एक अंग हुआ करता था, जिसे ब्रह्मदेश के नाम से जाना जाता था। पर 1937 के बाद अंग्रेजों ने इसे भारत से अलग कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस पर जापान ने कब्जा कर लिया; जिससे 1945 में इसे मुक्ति मिली। 1948 में यह स्वतंत्र देश बन गया। पर इसके बारे में जानकारी इतनी कम है कि अधिकाँश को इसकी आज की राजधानी का नाम नाएप्यीडॉ (Naypyidaw) भी मालूम नहीं होगा। कारण भी है, यह देश सालों साल मिलिट्री शासन के कारण एक लौह-कपाट के पीछे ही रहा है। अब दुनिया के साथ चलने के लिए जैसे ये नींद से जागा है। पिछले दिनों भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी की यहां की यात्रा के बाद लोगों की इसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है।



पहले म्यांमार को बर्मा के नाम से जाना जाता था। जो यहां की बर्मी आबादी के कारण पड़ा था। तब इसकी राजधानी का नाम रंगून था, जिसे बाद में यांगून कहा जाने लगा। यह 2006 तक यहां की राजधानी रहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का मुख्यालय यहीं बनाया था। भारत के बौद्ध प्रचारकों के प्रयासों से यहाँ बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी। वैसे भी यहां भारत से लोग अलग-अलग कारणों से आते रहते थे।  जिन्होंने यहां रह कर अनेक मंदिरों का निर्माण किया। सही संख्या तो नहीं मालुम पर पचास से ज्यादा मंदिर अभी भी यहां हैं। पिछले दिनों अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान उन्हीं में से एक, माँ काली के प्राचीन मंदिर में जा नरेंद्र मोदी जी ने पूजा-अर्चना की थी। 

म्यांमार के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण शहर यांगून में स्थित इस मंदिर को अट्ठारवीं शताब्दी में भारत से गए तमिल लोगों ने बनवाया था। यह मंदिर अपनी कलात्मकता और खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। खासकर इसकी छत पर उकेरी गयी देवी-देवताओं की मूर्तियां मन मोह लेती हैं। अभी इसका रख-रखाव का जिम्मा वहां के भारतीय समुदाय के लोगों पर है।

 यहीं पर विश्व-प्रसिद्ध  श्वेडागोन पैगोडा तथा भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह, बहादुर शाह जफ़र का मकबरा भी है, जिन्हें अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह के बाद भारत से लाकर यहां दफना दिया था। बरसों बाद बाल गंगाधर तिलक को भी यहां की मांडले जेल में कैद रखा गया था। रंगून और मांडले की जेलें अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की गवाह हैं। 

यहां बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजदूर ब्रिटिश शासन की गुलामी के लिए ले जाए गए जो लौट कर नहीं आ सके। इनके अलावा रोज़गार और व्यापार के लिए गए भारतियों की भी बड़ी संख्या यहां निवास करती है। 1962 के दंगों के दौरान हिंदुओं द्वारा बड़ी संख्या में बर्मा छोड़ देने और अभी कुछ प्रतिबधों के बावजूद भी करीब दस लाख हिंदू यहां के नागरिक हैं; जिनके पूर्वज वर्षों-वर्ष पहले आ कर यहाँ बस गए थे। उन्हें यह अपना ही देश लगता है। 
बर्मा का भारतीय फ़िल्मी दुनिया से भी संबंध काफी पुराना है। फ़िल्मी जगत की सबसे सफल नर्तकी-अभिनेत्री 'हेलेन' बर्मा की ही हैं। वर्षों पुराना सदाबहार गीत "मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून" को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। बर्मा को लेकर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं। 

छोटा होने के बावजूद बर्मा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह हमारे और चीन के बीच पड़ता है इसलिए भी उसकी स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। वैसे भी वह पहले हमारा ही अंग रह चुका है सो हमसे जुड़ाव होना नैसर्गिक है; हमें आशा करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में अपने इस पड़ोसी से हमारी नजदीकियां और भी बढ़ेंगी। 

"चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से" 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

#एक्सिस_बैंक.....परिवारों को जोड़ने का काम कीजिए, तोड़ने का नहीं !!

#एक्सिस_बैंक_अपने_विज्ञापन_को_सकारात्मक_नजरिये_से_भी_बनवा_सकता_था, जिससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परिलक्षित हो जातीं। माँ अपने बेटे को ऐसे भी समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और #बैंक_बिना_सोचे-समझे #उल्टी_सीख देने पर उतारू हैं ! 
                       
आए दिन टूटते परिवारों, बिगड़ते संबंधों, दरकते रिश्तों की ख़बरें पढ़ते-सुनते-देखते हुए मन बेचैन सा हो जाता है। पर जहां इस ओर परिवार, समाज व सरकारों को ध्यान देने की जरुरत है वहीँ कुछ संस्थाएं अपने  जरा से लाभ के लिए जाने-अनजाने इस किले में सेंध लगाने से नहीं चूकतीं ! इन दिनों #एक्सिस_बैंक का एक इश्तहार टी.वी. पर आ रहा है जिसमें एक माँ अपने अविवाहित बेटे को भविष्य में शादी के बाद घर में होने वाली पारिवारिक कलह का डर दिखा पहले ही अपना अलग घर लेने की सलाह देती है !  माँ होते हुए भी सिर्फ इसलिए 
क्योंकि अभी बैंक की होम-लोन पर ब्याज दरें  बहुत कम हैं ! सतही तौर पर एड ठीक लगता है; माँ-बेटे का प्यार भी जाहिर होता है; पर संदेश क्या है ? क्या माँ को अपने या अपने बेटे पर विश्वास नहीं है ? क्या वह अपने साम्राज्य में किसी और का दखल नहीं चाहती ? क्यों उसके दिमाग में सास-बहू के झगड़ों का डर बना हुआ है ? क्यों वह घर बसने से पहले उसे तोड़ना चाहती है ? आज जैसे परिवार टूट रहे हैं उसमें कमी लाने की बजाए ऐसे विचार तो आग में और घी का ही काम करेंगे ! 

एक्सिस बैंक अपने इस विज्ञापन को सकारात्मक नजरिये से भी बनवा सकता था ! इससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परलक्षित हो जातीं। वह अपने बेटे को समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और बैंक बिना सोचे-समझे उलटी सीख देने पर उतारू हैं !

आजकल के माहौल में एकल परिवार के बढ़ते चलन, उसके परिणाम  अंजाम को देख जब अपने ददिहाल और ननिहाल के परिवारों की ओर नजर डालता हूँ तो किसी भी तरफ दूर-दूर तक कोई भी ऐसा कुटुंब नहीं दिखता जिसमें बड़े-बुजुर्गों का साथ न हो, उनका प्रेमल साया घर के सदस्यों पर ना हो। यहां तक कि मेरे दोस्त-मित्रों में भी कोई ऐसा नहीं है जिनके माता-पिता परिवार से अलग रहते हों; यदि घर का कोई सदस्य मजबूरीवश, रोजगार के सिलसिले में कहीं दूर भी चला गया है तब भी बड़ों का ख्याल रखने के लिए घर का कोई ना कोई सदस्य उनके साथ ही रहता है। ऐसे संयुक्त परिवारों से मिल, उनके साथ समय गुजार , पग-पग पर उनकी सलाह, उनके आशीर्वाद, उनकी ममता से सकून तो मिलता ही है साथ ही एक ,मानसिक संबल भी बना रहता है। हमें तो गर्व होना चाहिए अपनी संस्कृति पर, अपने संस्कारों पर, अपने ऋषि-मुनियों-गुरुओं पर जिन्होंने संयुक्त परिवार की महत्ता को समझते हुए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई। रोजगार की मजबूरीवश घर के सदस्यों के बाहर जाने से तो रोका नहीं जा सकता पर सिर्फ अहम, संपत्ति या आपसी तालमेल ना बैठने के कारण लाचार वयोवृद्धों को उनके हाल पर छोड़ देना अत्यंत दुखद है। क्योंकि अपनी पारी खेल चुकी इस पीढ़ी के पास अपने अनुभवों की वह अनमोल संपत्ति है जो अपने खजाने से हमें हमारी जिंदगी में आने वाली हर मुश्किलों, हर अड़चनों, हर कठिनाइयों का सामना करने की राह और हौसला प्रदान करने की क्षमता रखती है। समाज को इनके अनुभवों की सदा सहायता लेनी चाहिए।   
#हिन्दी_ब्लागिंग    

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

रियलिटी शो (!) और बाबा रामदेव

मेरी सोच है कि जिस तरह आयोजकों ने रामदेव जी के हाथों में एक पाश्चात्य वाद्य यंत्र थमा कर चित्र को मुख्य आकर्षण बनाना चाहा है उससे बाबा जी की वर्षों की मेहनत से बनी उनकी छवि शायद निखरेगी तो नहीं ! उल्टा लोगों को और बातें बनाने का मौका मिल जाएगा। हम कितना भी कहें कि हमें किसी की परवाह नहीं पर कुछ बातों का कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ असर तो पड़ता ही है !!

देश-दुनिया में हरेक इंसान को अपनी मन-मर्जी से जीने का, काम करने का, व्यवसाय को आगे बढ़ाने का, अपने भले-बुरे को समझने का पूरा हक़ है। पर जब कोई इंसान समाज में ख़ास पद, ख़ास मुकाम या किसी क्षेत्र में ख़ास दर्जा हासिल कर लेता है तो उससे आम जनता की कुछ और अघोषित अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं। ज्यादातर लोगों के मानस में नेता, अभिनेता, आध्यात्मिक गुरुओं, साधू-संत-महात्मा इत्यादि की एक छवि बनी हुई है उसी के अनुसार लोग उनसे एक आदर्श और उच्च आचरण की अपेक्षा रखते हैं। हालांकि इन दिनों हर छवि खुद को खंडित करने पर तुली हुई है फिर भी अपेक्षाएं पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई हैं। पर जब इन ख़ास लोगों को आम आदमी की तरह हरकतें करते पाया जाता है तो मन में अंदर ही अंदर ठेस तो लगती ही है, मोह-भंग भी हो जाता है। पता नहीं यह बात कुछ लोगों की समझ में क्यों नहीं आती जबकि उनके सामने इसके दुष्परिणामों के दसियों उदाहरण मौजूद होते हैं !!

इसी के तहत जो एक नाम जेहन में आता है वह है, बाबा रामदेव का। ढेरों विरोध, आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद उनमें लोगों की आस्था और विश्वास बना हुआ है; यूँही उनके उत्पाद दिनों-दिन लोकप्रिय नहीं होते चले जा रहे हैं। पर कभी-कभी उनका प्रदर्शन के प्रति मोह दिलों में कहीं ना कहीं ठेस जरूर पहुंचा जाता है। कुछ दिनों "ॐ" का उच्चारण किया जाता हो: पर उसका स्तर किसी भी आम शो से ज्यादा नहीं है। हाँ यदि देश के अव्वल दर्जे के गायक, दिग्गज संगीतकार, निष्णात कलाकार इस आयोजन से जुड़े होते तो भी बात समझ में आती कि सचमुच भजन जैसी विधा को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है। पर लगता है कि सिर्फ विषय-वस्तु ही बदली गयी है बाकी सब कुछ जस का तस ही है।

पहले एक भौंडे हास्य मंच, जो द्विअर्थी संवादों और छिछले हास्य के लिए जाना जाता है, पर उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी और फूहड़ता से बच नहीं पाए थे। अभी फिर एक तथाकथित रियल्टी शो में उनका प्रमुख स्थान है। भले ही शो पर आयोजकों ने भक्ति की चाशनी चढ़ा दी हो, कोशिश कर के हिंदी शब्दों को प्रमुखता से बोला जाता हो, हर शुरुआत के पहले



आज जिस जगह पर रामदेव जी हैं वहां उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं है। उन्हें यह समझना चाहिए कि उल्टी-सीधी किसी भी जगह पर जा कुछ भी करने से सिर्फ और सिर्फ उस आयोजन को आयोजित करने वालों को ही फ़ायदा होता है इनको तो नुक्सान के सिवा कुछ नहीं मिलने वाला ! किसी शो का हिस्सा बनने में भी कोई बुराई नहीं है पर उस मंच का एक स्तर होना चाहिए, उस विधा के लिए समर्पित कलाकारों की उपस्थिति होनी चाहिए। नाटकबाजी, फूहड़ता, दिखावे, नकली संवेदनाओं की जगह नहीं होनी चाहिए। आप एक जानी-मानी हस्ती हैं। करोड़ों लोगों की निगाहें आप पर लगी रहती है। लाखों की आस्था का आप केंद्र बिंदु है। कुछ ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे लोगों की आपके प्रति आस्था, विश्वास, आदर के साथ-साथ आपकी गरिमा में भी कमी आए।

ये मेरे अपने विचार हैं ! मेरी सोच है कि जिस तरह आयोजकों ने रामदेव जी के हाथों में एक पाश्चात्य वाद्य यंत्र थमा कर चित्र को मुख्य आकर्षण बनाना चाहा है उससे बाबा जी की वर्षों की मेहनत से बनी उनकी छवि शायद निखरेगी तो नहीं ! उल्टा लोगों को और बातें बनाने का मौका मिल जाएगा। हम कितना भी कहें कि हमें किसी की परवाह नहीं पर कुछ बातों का कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ असर तो पड़ता ही है !!
#हिन्दी_ब्लागिंग 

विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...