सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

कटारमल, कोणार्क के बाद दूसरा सबसे बड़ा सूर्य मंदिर

पहाड़ में स्थित यह देश का अकेला सूर्य मंदिर है जो कुमांऊॅं के विशालतम ऊँचे मन्दिरों में से एक  है तथा  उत्तर भारत में विलक्षण  स्थापत्य एवम् शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण है। मंदिर की दीवारों और इनके खम्भों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। पर वर्षों पहले हुई मूर्ति चोरी के कारण  मंदिर के  नक्काशीयुक्त दरवाजे और चौखट को दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रख दिया गया है और छोटे मंदिरों की मूर्तियों को भी सुरक्षित रखने के लिए हटा दिया गया है

वेदों में  सूर्य  को जगत  की आत्मा कहा गया  है।  सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है,  आज यह एक सर्वमान्य सत्य है। पुराणों में सूर्य को परमात्मा स्वरूप माना गया है। प्रसिद्ध  गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। वैदिक काल से

ही भारत में  सूर्योपासना का  प्रचलन रहा है।  पहले सूर्योपासना मंत्रों से होती थी, बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ, तो यत्र - तत्र सूर्य मन्दिरों  का  निर्माण भी  हुआ।  जिनमें ओडिसा का  कोणार्क मंदिर विश्व-प्रसिद्ध है। पर यह  बहुत कम लोगों को मालूम  है कि उसके  बाद   उत्तराखंड के अल्मोड़ा शहर से करीब  16 - 17 कि.मी दूर दूर कटारमल सूर्य मंदिर सूर्य भगवान को समिर्पत देश का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। 


यह  प्राचीन  पूर्वाभिमुख मंदिर  सूर्य भगवान  वर्धादित्य या बड़ादित्य को समर्पित है।मुख्य मंदिर का परिसर करीब 800 साल पुराना है। हालांकि यहां मंदिर की जानकारी देता शिलालेख लगा हुआ है पर उसकी लिखावट भी अब पढ़ी नहीं जाती है। यह प्राचीन तीर्थ स्थल आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है, इसके बावजूद  यह अल्मोड़ा का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। मंदिर अपने आप में वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है समुद्र तल से 2116 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी के राजा कटारमल्ल ने 9वीं शताब्दी में करवाया था। इसमें कमलासीन सूर्य देव् की मूर्ति करीब एक मीटर ऊँची है। उनके सिर पर मुकुट तथा पीछे प्रभामंडल है। यह शायद अकेला सूर्य मंदिर है जहां सूर्य भगवान की पूजा आज भी होती है। 


पहाड़ में स्थित यह देश का अकेला सूर्य मंदिर है जो कुमांऊॅं के विशालतम ऊँचे मन्दिरों में से एक  है तथा  उत्तर भारत में विलक्षण  स्थापत्य एवम् शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण है। मंदिर की दीवारों और इनके खम्भों पर
खूबसूरत नक्काशी की गई है। पर वर्षों पहले हुई मूर्ति चोरी के कारण  मंदिर के  नक्काशीयुक्त दरवाजे और चौखट को दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रख दिया गया है और छोटे मंदिरों की मूर्तियों को भी सुरक्षित रखने के लिए हटा दिया गया है। आजकल यह भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के अंतर्गत संरक्षित है।  

कटारमल अल्मोड़ा जिले का एक छोटा सा गांव है। जहाँ पहुँचने के लिए अल्मोड़ा से रानीखेत सड़क मार्ग से
जाना होता है। अल्मोड़ा से तकरीबन 12 कि.मी. दूर कोसी गांव पड़ता है जहां से कटारमल के लिए रास्ता कटता है। वहाँ से करीब दो की.मी. तक गाडी से जाने के बाद तक़रीबन एक की.मी. की चढ़ाई है। यह कच्चा-पक्का कहीं-कहीं पगडंडी जैसा रास्ता है जो ज्यादातर बदहाल है। अब सुनने में आया है कि इसे बेहतर बनाने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। प्रमाण स्वरूप एक-दो जगह काम होते दिखा भी। 


ऊपर एक बहुत बड़े चबूतरे पर मुख्य मंदिर के साथ-साथ 45 विभिन्न छोटे मंदिर भी बने हुए हैं। जिनमें शिव-पार्वती, गणेश, विष्णु-लक्ष्मी इत्यादि देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हुआ करती थीं जिन्हें अब सुरक्षा की दृष्टि से हटा दिया गया है। पहले मंदिर का मुख्य-द्वार उत्तर दिशा की ओर से था जिसे बंद कर अब पूर्व की तरफ कर दिया गया है। जबसे पुरातत्व विभाग ने इसकी देख-रेख करनी शुरू की है तब से परिसर काफी साफ़-सुथरा और व्यवस्थित हो गया है। इतनी ऊंचाई से पहाड़ों का विंहगम दृश्य मन मोह लेता है। पर ऐसी महत्वपूर्ण जगहों पर जा कर भी फोटो खींचने की मनाही के कारण उनकी यादें ना संजो पाना दुखद रहता है।  

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

एक खूबसूरत रेलवे स्टेशन, काठगोदाम

#चौहान_पट्टा, अंग्रजों के समय में यह एक छोटा सा गांव हुआ करता था। पहाड़ों से पेड़ काट कर यहां ला कर इकट्ठे किए जाते थे, फिर यहां से सुविधानुसार उन्हें अलग-अलग जगहों पर भेजा जाता था। लकड़ियों का डिपो होने के कारण इस जगह का नाम काठगोदाम पड़  गया था........
#हिन्दी_ब्लागिंग  
#काठगोदाम, देश के सबसे सुंदर, साफ़-सुथरे, शांत, व्यवस्थित, खूबसूरत रेलवे स्टेशनों में से एक। नाम तो वर्षों से सुना, जाना-पहचाना हुआ था पर कभी वहाँ रुकना नहीं हो पाया था क्योंकि उधर जाने के लिए सदा बसों का ही सहारा लिया गया था। इस बार जब अल्मोड़ा का कार्यक्रम बना तो ट्रेन को प्राथमिकता दी गयी। जाने के लिए दिल्ली-काठगोदाम सम्पर्क क्रान्ति और लौटने के लिए काठगोदाम-नई दिल्ली शताब्दी में आरक्षण करवाया गया। जाने पर पाया कि उसके बारे में जितना सुना था वह उससे कुछ ज्यादा ही अनुरूप था। 
काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

    
   
साफ़-सुथरा प्लेटफार्म 
  
प्रकृति की गोद में 

सीढ़ियों पर संदेश 

शहीदों की यादगार
चौहान पट्टा इसका असली नाम है, जो आज भी जमीन के कागजों-दस्तावेजों में दर्ज है।  अंग्रजों के समय में यह एक   छोटा  सा गांव हुआ करता था।   पहाड़ों से   पेड़ काट कर यहां ला कर इकट्ठे किए जाते थे, फिर यहां से सुविधानुसार उन्हें अलग-अलग जगहों पर भेजा जाता था।  लकड़ियों का डिपो  होने के कारण  इस जगह का नाम काठगोदाम  पड़  गया था।  फिर 1884 में जब रेल हल्द्वानी से बढ़ कर यहाँ तक पहुंच गयी तो इस जगह कीअहमियत भी  बढ़ गयी । यह  उत्तराखंड में शिवालिक की  पहाड़ियों की तलहटी में,  गौला  नदी के किनारे, मैदान में बसा कस्बानुमा शहर है जो कुमाऊं अंचल का प्रवेश द्वार है। पूर्वोत्तर रेलवे का यह अंतिम स्टेशन है। पंतनगर नजदीक का हवाई-अड्डा है। पर यहाँ से चहुँ ओर के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध है। जिनसे नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ आदि कहीं भी जाया जा सकता है।  
शताब्दी एक्सप्रेस 





प्रतीक्षा
19वीं सदी में ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सुविधा के लिए  एक 66 मील लम्बी रेलवे लाइन  बिछाई थी. जो रोहिलकुण्ड-कुमाऊं रेलवे के नाम से जानी जाती थी और काठगोदाम को बरेली से जोड़ती थी। बाद में इसे 1943 में इसे भारत सरकार की अवध-तिरहुत रेलवे में मिला दिया गया। आजादी के बाद यह आसाम रेलवे  और  बम्बई के कानपूर-अछनेरा सेक्शन का हिस्सा हो गयी।  जो  आज  नॉर्थ-ईस्टर्न रेलवे  का अंग है।  काठगोदाम  रेलवे स्टेशन,  जो नैनीताल से  करीब 35 की.मी. दूर है,  तीन प्लेटफार्म और एक ब्रॉड-गेज की लाइन वाला, देश  के  खूबसूरत,  साफ़ - सुथरे रेलवे स्टेशनों में से एक है।  यहां  अभी सिर्फ डीजल इंजन के सहारे ही गाडी आती है।  पर जल्द ही  यहाँ  विद्युतीकरण होने वाला है। जिससे प्रदूषण में भी कमी आएगी। यह सच है कि सड़क मार्ग से अपने गंतव्य तक सीधे पहुंचा जा सकता है पर फिर भी एक बार यहां उतर कर इसके सौंदर्य को जरूर महसूस करना चाहिए। 

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

दिवाली पर जुआ खेलने वालों के अपने तर्क हैं !

पता नहीं कैसे और कब दिवाली पर जुआ खेलने की प्रथा आ जुडी ! जबकि माँ लक्ष्मी खुद कहती हैं कि वे धन का अपव्यय करने वाले और दूसरे का धन हड़पने वाले लोगों से हमेशा दूर रहती हैं तथा वहाँ रहना पसंद करती हैं, जहाँ मधुर बोलने वाले, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक पूरा करने वाले,  ईश्वर भक्त,  इन्द्रियों को वश में रखने वाले,  व्यवहार से उदार,  माता - पिता की सेवा करने वाले, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों का वास होता है .....
#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिवाली, प्रकाश का पर्व। बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार। खुशियां बांटने-पाने का समय। सुख-समृद्धि के
लिए माँ लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर उनका  आशीर्वाद पाने का अवसर।  छोटा - बड़ा,  अबाल - वृद्ध,  स्त्री - पुरुष, अमीर-गरीब,  दिवाली के त्यौहार को लेकर हर कोई बहुत उत्साहित रहता है।  पूरे वर्ष भर इसका इंतजार  रहता है सब को। इसके आने के काफी समय पहले इसके स्वागत की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं।   

पर जैसे हर अच्छाई के साथ कोई न  कोई बुराई भी जुडी रहती है वैसे ही पता नहीं कैसे इस पावन पर्व के साथ जुआ खेलने की प्रथा भी जुड़ती चली गयी। जुआ खेलने वालों के अपने तर्क हैं। उनके अनुसार इसी दिन शिव-पार्वती ने भी द्युत-क्रीड़ा की थी। इसीलिए इस दिन लोग जुआ खेलते हैं जबकि किसी भी पौराणिक ग्रंथ में इस बात की पुष्टि नहीं होती। यह विडंबना ही है कि लोग पुराणों में लिखी अच्छाइयों को अंगीकार नहीं करते पर सुनी-सुनाई बुराई को अपनाने में जरा भी नहीं सोचते। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि दिवाली पर जुआ खेलने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और आपके पास से कहीं नहीं जातीं।  लेकिन क्या ऐसा संभव है कि देवी-देवता किसी बुराई वाली चीज पर खुश होते हों ? उल्टा इस दिन जुआ खेलने से घर की लक्ष्मी के साथ-साथ सुख शांति भी चली जाती है। क्या ही अच्छा हो कि इन पैसों से किसी बच्चे के चेहरे पर हंसी ले आई जाए।पर हम सब पाखंडी लोग हैं ! गोष्ठियों में वैसे तो बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, ब्लॉगों में त्योहारों की ऐसी की तैसी कर मारेंगे ! सभा-सोसायटियों में लम्बे-चौड़े भाषण देंगे. समाज-पर्यावरण पर रोना-धोना मचाएंगे ! पर जब खुद पर बात आएगी तो वही करेंगे जिसका सार्वजनिक विरोध कर वाह-वाही लूटते रहे हैं !   

माँ लक्ष्मी खुद कहती हैं कि वे वहीं रहना चाहती हैं, जहाँ मधुर बोलने वाले, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक पूरा
करने वाले,  ईश्वर भक्त,  इन्द्रियों को वश में रखने वाले,  व्यवहार से उदार,  माता - पिता की सेवा करने वाले, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों का वास होता है। धन का अपव्यय
करने वाले और दूसरे का धन हड़पने वाले लोगों से मैं हमेशा दूर रहती हूँ. 


वैसे तो जुए को एक खेल ही माना जाता है पर यह ऐसा खेल है जो घर-परिवार को अशांति ही प्रदान करता है।सामाजिक बुराइयों का प्रतीक होने के बावजूद लाखों लोग इसे खेलते हैं। हालाँकि हर युग में इसकी बुराई ही सामने आई है। महाभारत के जुए के परिणाम को कौन नहीं जानता ? एक चक्रवर्ती सम्राट हुए थे नल, उन्हें भी जुए से बहुत लगाव था और उसी के कारण वे महलराजपाठ और यहाँ तक कि अपनी सेना भी हार गए थे। उनकी हालत ऐसी हो गई कि उन्हें अपने तन के कपडे भी दांव पर लगाने पड गये और वे सब कुछ हार चक्रवर्ती सम्राट से रंक बन गए। इसी तरह एक और कथा से पता चलता है कि श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को भी जुआ खेलने और हारने पर अपमान का सामना करना पड़ा था। भले ही यह अनंत काल से खेला जाने वाला खेल हो पर इससे आज तक किसी का भला नहीं हुआ; उल्टे
घर-परिवार, हर काल में, बर्बाद जरूर हुए हैं। इसलिए सभी को अधर्म-मय आचरण से बच कर ही रहना चाहिए, जिससे घर-परिवार में सुख-शांति का स्थाई निवास बना रहे।
    
हम सब को अपने तीज-त्योहारों के साथ आ जुडी या जोड़ दी गयीं तरह-तरह की बुराइयों को दूर कर अपने उत्सवों की गरिमा को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध होना ही होगा। जिससे आने वाली पीढ़ियां भी उनके महत्व को समझ सकें। 

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

मार का डर भी ना रोक पाता था, खेलने जाने से !!

क्या दिन थे ! इधर बाबूजी जाते, बाहर से दरवाजा बंद कर, उधर मैं किसी तरह खींचते-खांचते खिड़की से निकल पहुंच जाता प्रकृति की गोद में। उस समय पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, कीड़े-मकौड़े ही मेरे साथ होते थे। खूब बातें किया करता था उनसे, इस विश्वास के साथ कि वे भी मेरी बात को समझते-बूझते हैं। यह सब तब तक चलता था जब तक और बच्चे नहीं आ जाते थे मानवीय खेल खेलने। उनके आने की भनक लगते ही मैं अपने इन दैवीय दोस्तों को विदा कह देता था क्योंकि मेरे अंदर यह डर भी था कि कहीं कोई मेरे इन मासूम दोस्तों को हानि या चोट ना पहुंचा दे..........
#हिन्दी_ब्लागिंग
उम्र बढ़ने के साथ-साथ जब काम का बोझ कुछ कम हो गया है, थोड़ी सी निश्चिंतता साथ रहने लगी है, दिन भर में कुछ समय नितांत अपना होने लगा है तब उस सिर्फ अपने समय में पुरानी, बहुत पुरानी यादें साकार सी होने लगती हैं। पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही हो रहा है कि सभी के साथ होता है ! अक्सर लौट जाता हूँ और खोने लगाता हूँ, वर्षों पुराने बचपन की ओर ! भोलापन, मासूमियत, शरारतें सब सामने आ-आ कर मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं। यादें तो ढेर सारी हैं, पर  सब मुक्तक रूपी, टुकड़े-टुकड़े में, सिलसिलेवार न होकर एक से दुसरी तक कूद लगाती हुईं। ऐसे में सब को एक समय में एक साथ लिखना नाहीं संभव है और नाहीं मुनासिब ! फिर भी कुछेक को बंदी बनाने की चेष्टा का प्रलोभन रोका नहीं जा पाता !

उन दिनों गर्मियों में स्कूल सुबह के हो जाते थे तथा दस-साढ़े दस तक छुट्टी हो जाया करती थी। उस समय उम्र रही होगी सात-आठ साल की। पिताजी बंगाल में कलकत्ता से करीब 10-12 की.मी. दूर कोननगर नामक जगह में लक्ष्मीनारायण जूट मिल में उच्च पद पर कार्यरत थे। फर्म की तरफ से मिल के अंदर मिले बंगले में हम सिर्फ तीन जने। बाबूजी, माँ तथा मैं। दोपहर को लंच बाद माँ कुछ देर के लिए आराम करती थीं, इसलिए जब बाबूजी फिर काम पर जाते थे तो मैं धूप में बाहर ना चला जाऊं, इसलिए दरवाजे में बाहर से कुंडी लगा कर जाते थे जिसे घर में काम करने वाला जीतू, अपने आने पर खोल कर आ जाता था।

मुझे घर पर रखने का हर तरह का इंतजाम किया जाता रहता था। तरह-तरह खिलौने, उस समय उपलब्ध हर तरह की बाल-पत्रिकाएं, जिनके कुछ के नाम मुझे अभी भी याद हैं, मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू, फिर पराग आदि। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी तथा इलस्ट्रेडेड वीकली तो अलग थीं, जिनका शौक व चस्का बाद में लगा और उनके बंद हो जाने तक रहा। हालांकि कादम्बिनी अभी भी लेता हूँ पर वो वाली बात अब कहीं नहीं रही। यह सब कुछ देर के लिए ही मुझे बाँध पाते थे। प्रकृति सदा मुझे आकर्षित करती रही है।

घर के आस-पास दसियों तरह फल और फूलदार पेड़-पौधे थे। जामुन से लेकर नारियल के पेड़, एक एकड़ में देसी-विदेशी गुलाब की नस्लों के अलावा इतने ढेर सारे फूल, चाहे बिस्तर बना लो। उस समय बिना मनाही के भी कोई बेकार में फूल-पत्तियाँ नहीं तोड़ता था। तरह-तरह के पक्षियों से भी तब सच-मुच का दोस्ताना था। कबूतर-गौरैया इत्यादि तो मेरे पास तक आ कर दाना चुगा करते थे। ढेर सारी रंग-बिरंगी, छोटी-बड़ी तितलियाँ आ-आकर मेरे सर-कंधों पर बैठ जाया करती थीं। घर में एक शीशे का दरवाजा हुआ करता था, मैं हौले-हौले, उस उम्र में भी इसका ध्यान रखते हुए कि उस कोमल जीव को कोई हानि या तकलीफ ना पहुंचे, उन्हें उस दरवाजे के पीछे कुछ देर के लिए छोड़ देता था ! पचासों तितलियाँ वहाँ उड़ कर स्वर्गिक दृश्य को साकार कर देती थीं।

उन दिनों हम बच्चों के लिए हर काम का समय निश्चित किया हुआ होता था। जिस में शाम को खेलने का समय करीब चार-साढ़े चार का तय था। पर जब हवा कुछ तेज होती थी तो मुझे लगता था कि पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट, दसियों फिट ऊँचें नारियल के पेड़ों का झूमना, फूलोंकी सुगंध, चिड़ियों का कलरव सब मुझे बाहर बुला रहे हैं। अपनी ओर खींचते से लगते थे, ये सब ! अफ़सोस होता है आज के बच्चों को इन नेमतों से दूर होते देख !

हमारे घर में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं जिनमें सलाखें लगी हुई थीं। उनमें से एक खिड़की की सबसे आखिरी सलाख में इतने जगह थी कि मैं उस में से बाहर निकल सकूँ ! बस इधर बाबूजी जाते, उधर मैं किसी तरह खींचते-खांचते खिड़की से निकल पहुंच जाता प्रकृति की गोद में। उस समय पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, कीड़े-मकौड़े ही मेरे साथ होते थे। खूब बातें किया करता था उनसे, इस विश्वास के साथ कि वे भी मेरी बात को समझते-बूझते हैं। यह सब तब तक चलता था जब तक और बच्चे नहीं आ जाते थे मानवीय खेल खेलने। उनके आने की भनक लगते ही मैं अपने इन दैवीय दोस्तों को विदा कह देता था क्योंकि मेरे अंदर यह डर भी था कि कहीं कोई मेरे इन मासूम दोस्तों को हानि या चोट ना पहुंचा दे।

हानि और चोट तो मुझे मिलती थी, दुलारा होने के बावजूद, जब माँ द्वारा बाबूजी के आने पर मेरी शिकायत होती थी, खिड़की से भागने की !  

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

मंदिर, जहां अमिताभ के जूते पूजे जाते हैं !!

इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं....... 
#हिन्दी_ब्लागिंग       
कोलकाता में बालीगंज के तिलजला इलाके का एक संकरा सा मार्ग श्रीधर राय रोड। यहीं के एक अपार्टमेंट में रहता है संजय पाटोदिया परिवार। इस परिवार के लोग "ऑल बेंगाल अमिताभ बच्चन फैंस एसोसिएशन (ABABF) के मेंबर हैं और इनके घर में भगवान की नहीं एक इंसान की पूजा की जाती है जो और कोई नहीं हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन हैं। इन लोगों का मानना है कि कोई अलौकिक शक्ति तो जरूर है अमिताभ में, जिसके कारण तक़रीबन पचास साल (48) से वे सबके चहते बने हुए हैं। इसीलिए यहां उनकी पूजा की जाती है।   

हालांकि कोलकाता में ही अधिकाँश लोगों को इस जगह का पता नहीं है, इसके साथ ही, देश में एकाधिक व्यक्तियों के मंदिर होने के बावजूद, लोग व्यक्ति पूजा को उचित नहीं मानते और इसे पागलपन या मजाक का विषय समझते हैं। पर इन सब से किसी की रूचि को तो बदला नहीं जा सकता ! शायद इसीलिए पाटोदिया परिवार ने अपने घर के एक हिस्से में एक मंदिर नुमा म्यूजियम बना रखा है जिसमें अमिताभ की एक प्रतिमा स्थापित है। अमिताभ की रियल लम्बाई से भी कुछ ऊँची, फायबर से बनी 25 किलो की इस मूर्ति को सुब्रत बोस नाम के कारीगर ने तीन महीने में बनाया है। इसकी लागत करीब एक लाख रुपये आई है।

पर इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं। 

पर इस सब से पाटोदियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मंदिर के द्वार पर फ्लोरोसेंट लाइट से "जय अमिताभ बच्चन" जगमगाता रहता है और अंदर किसी देवता की तरह झांझ-मजीरे-घंटियों के साथ उनके भजन और आरती पूरे विधि-विधान व अनुष्ठान और पूरे जोशो-खरोश के साथ गयी जाती है। संजय पाटोदिया ने तो पूरे नौ पेज की अमिताभ चालीसा भी लिख रखी है, जिसका "हर-हर अमिताभ" और "जय श्री अमिताभ" छपा शाल ओढ़ कर, सस्वर पाठ किया जाता है। इन सब के बाद प्रसाद का वितरण भी होता है।                               

मंदिर के अगले हिस्से की दीवारें, वाल-पेपर पर लिखे "जय अमिताभ" से पटी हुई हैं जिन पर अमिताभ की फिल्मों के पोस्टर, उनकी तस्वीरों की भरमार है। इसी के साथ वहीँ एक कांच के बॉक्स में फिल्म "अग्निपथ" में उनके द्वारा पहने गए सफ़ेद चमड़े के जूते भी रखे हुए हैं, जिन्हें इन लोगों के अनुसार अमिताभ ने इनके निवेदन पर यहां भिजवाया था। ये लोग इसकी तुलना भरत की खड़ाऊं से करते हैं। रोज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ इनकी भी पूजा की जाती है। साल में दो दिन यहां ख़ास कार्यक्रम भी होते हैं। पहला 11 अक्टूबर, अमिताभ के जन्म दिन पर और दुसरा, 2 अगस्त, जब फिल्म "कुली" के हादसे के बाद उन्होंने स्वास्थ्य लाभ किया था।  जिसे उनका दुसरा जन्म माना जाता है। इस दिन ख़ास पूजा वगैरह के बाद रक्त दान के साथ-साथ  वस्त्र वितरण तथा अमिताभ से जुडी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।    

संजय पाटोदिया अपने-आप को अमिताभ का फैन नहीं भक्त कहलाना पसंद करते हैं। उनका जनून तो इतना बढ़ गया है कि उन्होंने मंदिर में लिख रखा है कि "हे प्रभू ! क्षमा करें ! हम आपसे ज्यादा अमिताभ को पूजते हैं।" उनके अनुसार कोलकाता में अमिताभ की हर फिल्म की रिलीज  पर वह उसकी  सफलता  के लिए प्रार्थना करते

हैं, उनके जैसे कपडे पहन कर हॉल पर जा मिठाई का प्रसाद बांटते हैं। अमिताभ की हर एक गतिविधि का लेखा-जोखा रखा जाता है। इन लोगों के लिए उनकी हर बात प्रभू का आदेश है सिवा इसके कि उनको इंसान माने भगवान नहीं।

कोलकाता के लोगों के मन में एक प्रश्न अक्सर सर उठता है कि पाटोदिया परिवार का यह सारा ताम-झाम कहीं खुद को प्रचारित करने के लिए तो नहीं ? कुछ ऐसा अलग सा करना कि देश-विदेश में नाम हो ? लोग जानें, जगह-जगह उनकी चर्चा हो ! जिसमें वे पूरी तौर पर तो नहीं पर कुछ तो सफल हो ही गए हैं। क्योंकि कोई भी हस्ती पूजा करवाने की हद तक तब पहुंचती है, जब बिना अपने स्वार्थ के उसका समाज के उत्थान में बहुत बड़ा हाथ हो, देश के लिए परिवार समेत समर्पण हो, बहुत ही ख़ास आध्यात्मिक, चारित्रिक या बौद्धिकता की मिसाल कायम की गयी हो ! शायद अमिताभ जी को भी तथाकथित मंदिर को लेकर यहां के अधिकाँश लोगों में उसके बारे में उनकी सोच, मानसिकता और उदासीनता का पता है, इसीलिए दसियों साल बीत जाने पर भी उन्होंने अभी तक यहां आना उचित नहीं समझा है !  आगे की भगवान् जाने !!!     

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

आपको लोग नाम से जानते हैं कि घर के नंबर से ?

आज कालोनी में एक अजीब सी स्थिति आ खड़ी हुई ! एक घर में गमी छाई हुई थी; आंसुओं, सिसकियों से भरा उदासी-गम का माहौल था ! ना पूरी होने वाली क्षति हुई थी ! दूसरी तरफ एक ने नया घर लिया था, इस उपलब्धि पर उसका अपने परिवार-परिजनों के साथ खुश होना वाजिब था। बैंड, ढोल, ताशे बज रहे थे ! इस खुशी और गम के बीच सिर्फ दो मकान थे !! 

शहरों को कंक्रीट का जंगल कहा जाता है ! पर प्रकृति निर्मित जंगल फिर भी बेहतर हैं। भले ही वहाँ जंगल राज चलता हो पर वहां के रहवासी एक-दूसरे को, उनकी प्रकृती को जानते-समझते तो हैं ! इन शहरी कंक्रीट के जंगलों में तो इंसान अपने परिवार तक ही सिमट कर रह गया है। समय ही नहीं है किसी के पास किसी के लिए। पहले छोटे शहरों-गावों में अधिकाँश लोग एक परिवार जैसे हुआ करते थे। सब का सुख-दुख तक़रीबन साझा हुआ करता था।

समय काफी बदल गया है; गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है जो अपने साथ-साथ लोगों की आँख का पानी भी बहा कर ले गया है ! अब तो मौहल्ले, कालोनी को छोड़िए लोग अपने पड़ोसी तक को पहचानने से गुरेज करने लगे हैं ! आस-पड़ोस के लोगों की पहचान भी घरों के नंबर से होने लगी है, किसी से पूछिए मल्होत्रा जी कहाँ रहते है तो छूटते ही उलटा पूछेगा, कौन 312 वाले ? जो गंजे से हैं ? किसी कालोनी में जा किसी बच्चे से कोई पूछे कि शर्मा जी को जानते हो तो पलट कर वही पूछेगा, घर का नंबर क्या है ? यदि बताया जाएगा कि 162 में ग्राउंड फ्लोर; तो वह घर की दिशा ही बता पाएगा। यदि गलती से दो-तीन लोगों के बीच जा, पूछा जाए कि सदानंद वर्मा जी कहाँ रहते हैं तो पहले वे आपस में ही तसल्ली करेंगें; वही, जिनका हार्ट का ऑपरेशन हुआ था ? अरे नहीं वे तो थर्ड फ्लोर पर हैं अग्रवाल, वर्मा जी उनके नीचे रहते हैं, 224 में। तीन साल हो गए, एक-दो बार दुआ-सलाम ही हुई है, बस !!

अब ऐसे में जब जान-पहचान ही नहीं है तो कौन किसके सुख-दुःख में शामिल होगा ! क्या कोई किसी के काम आएगा ! क्या किसी के प्रति किसी की संवेदना रहेगी ! ऐसे में क्या ठीक है क्या नहीं या कौन सही है कौन गलत; इसका फैसला करना भी मुश्किल है।   

कल मेरे बगल वाले मकान में एक सज्जन का देहांत हो गया। सारा क्रिया-कर्म संध्या तक जा कर हो पाया। उनके घर से ठीक दो मकान छोड़ तीसरी बिल्डिंग में गृह-प्रवेश था। वहाँ आज सुबह से ही उत्सव का माहौल बना हुआ था। नौ बजे से ही बैंड-बाजे के साथ नाच-गाना शुरू हो गया। कुछ अजीब सी स्थिति लगी। घंटे-पौन घंटे के बाद शोर थमा तो लगा कि अगले की भी तो अपनी ख़ुशी मनाने का पूरा हक़ है, चलो घंटे भर ही सही शोर बंद तो हुआ। पर कुछ देर बाद फिर वहीँ ढोल बजना शुरू हो गया जिसके साथ-साथ फिर वैसा ही शोर-शराबा ! कुछ देर बाद ताशे बजने लगे; फिर तुरही-शहनाई जैसा कुछ !! यानी अगले ने अपने आने की घोषणा पूरे जोशो-खरोश से सबके कानों तक पहुंचाई। किसी के दुःख-दर्द का बिना एहसास किए; और यह सब करीब दोपहर एक बजे तक चलता रहा ! खुशी और गम के बीच सिर्फ दो मकान थे !! 

यह सब सही था या गलत इसके लिए कोई पैमाना तो है नहीं। एक के घर गमी थी; ना पूरी होने वाली क्षति ! उदासी-गम का माहौल ! दूसरी तरफ एक ने नया घर लिया था, इतनी बड़ी उपलब्धि पर उसका, परिवार-परिजनों के साथ खुश होना वाजिब था। बाकी के लोगों का दोनों घरों से कोई रिश्ता भी नहीं है, निरपेक्ष हैं सभी।पर क्या नवागत से, दूसरा परिवार कभी मन की कसक दूर कर पाएगा ? क्या दोनों एक-दूसरे से सहज हो पाएंगे ? कुछ तो कहीं था जो कचोट रहा था, ऐसा क्यों लग रहा था जैसे संवेदनाएं खत्म हो चुकी हैं, क्या उत्सव को बिना शोर-शराबे के संयमित हो नहीं मनाया जा सकता था ? 
#हिन्दी_ब्लागिंग    

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