बुधवार, 29 दिसंबर 2021

यात्रा अंडमान की

कुटिल अंग्रेजों ने वीर सावरकर जी को जानबूझ कर ऐसी कोठरी में रखा था जिसके सामने फांसी और दंडस्थल थे ! जिससे सजायाफ्ता कैदियों को क्रूरता से दंड पाते देख वे टूट जाएं, पर उनकी यह मंशा कभी पूरी नहीं हुई ! आज तो इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है। बिजली-पानी की सुविधा, उच्च कोटि के रखरखाव, साफ़-सफाई, लॉन और फूलों की क्यारियों से सुसज्जित होने के कारण जेल दर्शनीय हो गई है ! पर पुराने चित्रों और वर्णनों में इसकी जो तस्वीर उभरती है वो ह्रदय-विदारक है...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा के बनिस्पत, सुदूर स्थित, अंडमान जाना कुछ अलग मायने रखता है ! वर्षों से वहाँ जाने का सपना पलने के बावजूद विभिन्न कारणों से वह साकार नहीं हो पा रहा था ! पर पिछले दिनों महामारी से कुछ हद तक उबरने के पश्चात अपनी #RSCB (Retired and Senior Citizen Brotherhood) संस्था द्वारा उपलब्ध अवसर को, काफी इट्स-बट्स, शंका-कुशंका, हाँ-ना, फेर-बदल, कुछ-कुछ विपरीत हालात-परिस्थितियों के बावजूद, बेजा ना जाने देने का निर्णय ले ही लिया ! इसमें दो साल पहले की केरल यात्रा के साथी श्री और श्रीमती बेदी जी तथा सुश्री कैलाश जी का साथ भी मिल गया। यात्रा 11 दिसम्बर से 16 दिसंबर तक की थी।

अंतरिक्ष में बाल रवि की अंगड़ाई 

बादलों का अद्भुत रेगिस्तान 

पहला दिन -

जेनिथ हॉस्पिटालिटी ट्रैवल एजेंसी द्वारा संचालित इस पर्यटन के लिए गो-एयर की सुबह छह बजे की फ्लाइट निश्चित की गई थी ! जिसके लिए रात के तीन बजे एयर पोर्ट पर सभी 28 सदस्यों को इकट्ठा होना था ! यह उड़ान बैंगलुरु होते हुए पोर्टब्लेयर जाती है जिसमें तकरीबन सात घंटे लग जाते हैं ! करीब सवा एक बजे पोर्टब्लेयर पहुंचने पर कोरोना की वजह से गहन जांच के कारण निकलते-निकलते तीन बज गए ! दिल्ली के ठंड के विपरीत यहां का तापमान 30*c को छू रहा था ! काफी गर्मी थी ! एयर पोर्ट से होटल नजदीक ही था फिर भी जब सेलुलर जेल देखने के लिए निकले, तब घड़ी चार का आंकड़ा पार कर ही गई थी। अच्छी बात यह थी कि यहां कहीं भी आने-जाने में 10-15 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता।




परिसर 

संग्रहालय 

सेलुलर जेल यानी कालापानी ! इसमें पानी के रंग का नहीं बल्कि काल का भाव समाहित है ! काल, यानी मृत्यु या मौत ! कालापानी शब्द का अर्थ मृत्यु जल या मृत्यु के स्थान से है, जहाँ से कोई वापस नहीं आ पाता है ! अंग्रेजों ने अपने विरोधियों, देशभक्त क्रांतिकारियों और दुर्दांत अपराधियों के लिए इस जगह जेल का निर्माण किया था ! किसी को कालेपानी की सजा का मतलब ही था कि उसको अपने बचे हुए जीवन में कठोर और अमानवीय यातनाएँ सहन करते हुए यहीं प्राण त्याग देने हैं ! यहां की सजा नरक तथा मौत की सजा से भी बदतर थी ! कई तो इस सजा को पाने पर यहां आने के पहले ही इसके खौफ से आत्महत्या कर लेते थे ! 






दस सालों में बनी इस सात विंग्स और तीन मंजिला इमारत के लिए ईंटें बर्मा से तथा बाकी लोहे इत्यादि का सामान इंग्लॅण्ड से लाया गया था। इस जेल में कुल 698 कोठरियां बनी थीं और प्रत्येक कोठरी 15×8 फीट की थी। इन कोठरियों में तीन मीटर की ऊंचाई पर रोशनदान बनाए गए थे ताकि कोई भी कैदी दूसरे कैदी से बात न कर सके। कोठरी में ताला कुछ इस ढंग से लगाया जाता था कि कितनी भी कोशिश कर ली जाए अंदर से उस तक हाथ नहीं पहुँच सकता था ! कहते हैं कि कोठरी में ताला लगा चाबियां अंदर ही फेंक दी जाती थीं पर उनको अंदर से ताले तक पहुँचाना नामुमकिन होता था। इसके अलावा हर पक्ष या खंड के सामने दूसरे खंड का पिछवाड़ा बनाया गया था जिससे कोई भी कैदी न एक दूसरे को देख सके ना हीं इशारों में बात कर सके ! नृशंसता की हद यह थी कि द्वीप के चारों ओर सैंकड़ों मीलों तक पानी होने और भागने की जरा सी भी गुंजायश न होने के बावजूद कैदियों को हथकड़ी-बेड़ी से जकड कर रखा जाता था ! पशुओं से भी ज्यादा बुरा बर्ताव और खाने के नाम पर रेत और कंकड़ मिला भोजन ! रोजमर्रा के कार्यों का लक्ष्य ऐसा जो पूरा हो ही ना पाए और इसी बहाने फिर कैदियों को अमानुषिक दंड देने का स्वनिर्मित विधान ! न्याय-अन्याय की कोई परिभाषा नहीं ! ना कोई पूछने वाला ना कोई देखने वाला ! कितनों को ही मार कर समुद्र में फेंक दिया जाता था, जिसका कोई हिसाब नहीं !

जेल की छत 

छत से दिखता सागर 


प्रयुक्त होने वाले ताला-चाबी 

एक साथ तीन जनों को फांसी दी जा सकती थी 

इसी लिवर को खींच फांसी दी जाती थी  

फर्श की तख्तियां
 

फांसी गृह के नीचे 8 x 8 का कमरा 
कुटिल अंग्रेजों ने वीर सावरकर जी को जानबूझ कर ऐसी कोठरी में रखा था जिसके सामने फांसी और दंड स्थल थे ! जिससे सजायाफ्ता कैदियों को क्रूरता से दंड पाते देख वे टूट जाएं, पर उनकी यह मंशा कभी पूरी नहीं हुई ! आज तो इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है। बिजली-पानी की सुविधा, उच्च कोटि के रखरखाव, साफ़-सफाई, लॉन और फूलों की क्यारियों से सुसज्जित होने के कारण जेल दर्शनीय हो गई है ! पर पुराने चित्रों और वर्णनों में इसकी जो तस्वीर उभरती है वो ह्रदय-विदारक है !

जेल की कोठरियां 

इसी गलियारे के अंत में सावरकर जी की कोठरी है 



अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ढाए गए अत्याचारों का सिलसिलेवार विवरण जब यहां आयोजित  ''लाइट और साउंड शो'' में सामने आता है, तो उपस्थित दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और आँखें नम हो जाती हैं ! खेद होता है कुछ पूर्वाग्रहों से ग्रसित लोगों की अक्ल और विचारों को देख-सुन कर, जिन्हें ना यहां के इतिहास की और ना ही यहां की परिस्थितियों की कोई जानकारी है पर सिर्फ अपना मतलब सिद्ध करने हेतु किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य कर अमर्यादित टिप्पणियां करने से बाज नहीं आते !

साउंड और लाइट शो 


करीब सात बजे शो खत्म होने पर दो दिनों की थकान से निढाल तन और शहीदों की कुर्बानियों की गाथा से भारी मन को लेकर होटल पहुंचे ! किसी तरह भोजन निपटा सभी सदस्य साढ़े आठ, नौ बजे तक गहरी निद्रा की गोद में बेसुध हो चुके थे ! दूसरे दिन रॉस आइलैंड तथा नॉर्थ बे टापू तक जाने के लिए तरो-ताजा होने हेतु !

रविवार, 26 दिसंबर 2021

यदि सावन के अंधे को हरा-हरा ही दिखता है तो पतझड़ के अंधे को.........

कुछ लोग अपनी काबिलियत दिखाने के लिए बात-बात पर विदेशों के उदाहरण दे कर अपने को विद्वान साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं ! वैसे विडंबना ही है कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अभी भी सदा विदेशियत से चौंधियाए रहते हैं ! देश और देशवासियों को कमतर आंकना उनके संस्कारों में शामिल हो चुका होता है ! वे भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व यहीं की मिट्टी-पानी-खाद से ही बना है ! पर ऐसे वसन-विहीन लोगों के पास आस्तीन ही कहाँ है, जो उसमें झाँक कर देख सकें..........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

गलत बोलने-करने वाला यह अच्छी तरह जानता है कि यदि उनके कदाचरण का विरोध सौ जने करेंगे तो उसके पक्ष में भी दस लोग आ खड़े होंगे ! उन्हीं दस लोगों की शह पर वह अपनी करनी से बाज नहीं आता ! पत्र-पत्रिकाओं में ''ये उनके निजी विचार हैं'', लिख औपचारिक खानापूर्ति कर देने से समाज में फैलाई जाने वाली कडुवाहट कम नहीं हो जाती ! इसीलिए ऐसे लोगों और उनकी बातों को बिलकुल नजरंदाज करने की बजाए बीच-बीच में गलत बातों का विरोध होना बहुत जरुरी है ! यह विडंबना है कि हमारे देश में कुछ भी बकने की आजादी तो है, पर अपना फर्ज-नैतिकता निभाने की कोई विवशता नहीं है !

पंजाबी में एक कहावत है ''मुड़-मुड़ खोती बौड़ हेठां'' ! इन जैसे ''सज्जनों'' का भी यही हाल है ! कुछ भी हो जाए, कितना भी अच्छा हो जाए, पर इनका रेकॉर्ड अपनी पुरानी धुन पर ही किर्र-किर्र करता रहता है ! अपने विचारों से असहमत हर व्यक्ति इनको अपना विरोधी और मूर्ख लगता है पर साथ ही अपनी बुद्धि और अपने शब्द वेदमंत्र सरीखे महसूस होते हैं
अपना दही (काम-गुण-आचरण-व्यवहार) सभी को मीठा लगता है, पर उसकी गुणवत्ता का आंकलन दूसरों के द्वारा ही होता है ! यदि दूसरे उसे नकार देते हैं तो इस पर अपनी नाकामी और असफलता से कुंठित हो दूसरे सफल, कामयाब, सम्मानित लोगों को कमतर आंकना उस की आदत बन जाती है ! ऐसे लोग अपनी काबिलियत दिखाने के लिए बात-बात पर विदेशों के उदाहरण दे कर अपने को विद्वान साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं ! भले ही उसका औचित्य ना हो ! वैसे विडंबना ही है कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अभी भी सदा विदेशियत से चौंधियाए रहते हैं ! देश और देशवासियों को कमतर मानना उनके संस्कारों में शामिल हो चुका होता है ! वे भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व यहीं की मिटटी-पानी-खाद से बना है ! पर ऐसे वसन-विहीन लोगों के पास आस्तीन ही कहाँ है, जो उसमें झाँक कर देखें !    

इस श्रेणी का इंसान यदि तथाकथित लेखक या स्तंभकार होगा तो वह जब तक किसी बाहरी फिल्म, पुस्तक, लेखक या फिर उनके रीति-रिवाजों का महिमामंडन नहीं कर देगा उसका स्तंभ कृतार्थ नहीं होता ! यदि शो बिजनेस में होगा तो अपने फूहड़ शो में देशी-विदेशी, अमीर-गरीब की तुलना कर अपनी भड़ास निकालता रहेगा ! गलती से वह नेता हो गया तो उसके लिए तो देश की आम जनता भेड़-बकरी से ज्यादा अहमियत नहीं रखेगी ! ऐसे लोगों को अपने यहां की हर सफल शख्शियत, परंपरा, रीति-रिवाज, मान्यता से प्रत्यूर्जता रहती है ! हर विदेशी चीज का महिमामंडन उनका शगल होता है ! अच्छाई किसी की भी हो उसे अपनाने में कोई बुराई नहीं है ! पर उसके सामने अपने इतिहास को नकार देना, अपने लोगों को कमतर आंकना, अपनी उपलब्धियों को भुला देना किसी भी मायने में क्षम्य नहीं हो सकता !  

एक आत्मश्लाघि अखबार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त अपनी असफलताओं से कुंठित स्तंभकार द्वारा क्रिसमस के अवसर पर लिखे गए लेख में यीशु को दिए गए कष्टों को विस्तार से याद किया गया है ! अच्छी बात है ! संसार को राह दिखाने वालों को कभी भूलना भी नहीं चाहिए ! पर अपने महापुरुषों, महानायकों, शहीदों को समयानुसार क्यों नहीं उतने ही विस्तार से याद किया जाता, जिन्हें जिंदा रूई में लपेट कर जला दिया गया ! खौलते तेल में डाल कर मार डाला गया ! आरे से चिरवा दिया गया ! अपनी बात ना मानने पर उनकी बोटी-बोटी काट डाली गई ! मासूमों को जिंदा दीवारों में चिनवा दिया गया ! असमय हजारों-हजार इंसानों को असमय मौत के मुंह में धकेल दिया गया ! जिनके कारण, जिनकी बदौलत हम आज हम कुछ भी "बकने" को आजाद हैं ! क्या उनके प्रति हमारा-इनका कोई फर्ज नहीं है  ? 

इसी उपरोक्त तथाकथित बुद्धिजीवी द्वारा विदेशों में क्रिसमस के दूसरे दिन मनाए जाने वाले ''बॉक्स डे'' का जिक्र कर विदेश में डाकिए और अखबार बांटने वालों को उपहार देने को महिमामंडित करते हुए अपने लोगों पर सवाल दागा गया है कि क्या हमारे यहां ऐसा होता है ! इन महाशय के यहां शायद किसी को कभी कुछ भी देने की प्रथा ना हो, इसीलिए शायद इन्हें इस बात का ज्ञान भी नहीं है कि बाहर के देशों में यदि किसी को उपहार देने के लिए सिर्फ एक दिन निर्धारित है तो हमारे यहाँ साल भर मनाए जाने वाले अनगिनत त्योहारों पर सदा से ''सब को'' मेरा मतलब है ''सब को'' उपहार बांटने का चलन है ! घर में हाथ बंटाने वाले सहायकों को तो घर का ही सदस्य माना जाता है ! उनके अलावा खासकर होली, दशहरे और दीपावली पर तो आस-पास के सफाई, टेलीफोन, डाकिए, दूकान से घर तक सौदा पहुँचाने वाले कर्मचारी, चौकीदार यहां तक की रोज कपड़ों को प्रेस करने वाले भी स्नेहभाजन बनते हैं ! यदि इन महाशय ने ऐसा कभी कुछ ना किया हो, किसी खास मौके पर भी किसी को कुछ ना दिया हो तो उन्हें नेक सलाह है कि वे किसी को कुछ दे कर देखें, अच्छा ही लगेगा !    

पंजाबी में एक कहावत है ''मुड़-मुड़ खोती बौड़ हेठां'' ! इन जैसे ''सज्जनों'' का भी यही हाल है ! कुछ भी हो जाए, कितना भी अच्छा हो जाए, पर इनका रेकॉर्ड अपनी पुरानी धुन पर ही किर्र-किर्र करता रहता है ! अपने विचारों से असहमत हर व्यक्ति इनको अपना विरोधी और मूर्ख लगता है पर साथ ही अपनी बुद्धि और अपने शब्द वेदमंत्र सरीखे महसूस होते हैं ! 

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

रविवार, 5 दिसंबर 2021

कुछ तो है, जो समझ से बाहर है

अचानक देश के दक्षिणी भाग से, दक्षिण अफ्रीका से आया एक आदमी खतरे का वायस बन जाता है ! सवाल यहीं से सर उठाता है कि जब सारी दुनिया खबरदार थी ! सभी जगह कड़ी एहतियात बरती जा रही थी तो वह शख्स भारत कैसे पहुंचा ? क्या जहाज पर चढ़ते समय उसकी चेकिंग नहीं हुई ? यदि उस समय वह ठीक था तो क्या यात्रा के दौरान वह संक्रमित हुआ ? हुआ तो कैसे ? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या वह अकेला ही बीमार हुआ ? सच्चाई क्या है, आम जनता को कोई भी बताना नहीं चाहता, अपने-अपने स्वार्थों के तहत .........!      

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ तो है..! कुछ ऐसा, जिसका एहसास तो हो रहा है पर साफ-साफ समझ नहीं आ रहा ! महामारी के दो सालों बाद, जब लग रहा था कि दुनिया की दिनचर्या फिर ढर्रे पर आ रही है, सब कुछ, कुछ-कुछ नॉर्मल हो रहा है, तभी फिर एक नई डरावनी खबर संसार पर तारी होने लगती है, एक नए नाम और व्यवहार के साथ ! शुरुआत तो कोरोना की भी ऐसे ही हुई थी ! पर तब दुनिया उससे बिलकुल अनजान थी ! कोई राह नहीं थी ! कोई इलाज नहीं था ! अँधेरे में हाथ-पैर मार कर किसी तरह पार पाया गया था ! पर अब तो देश-दुनिया सभी के सचेत रहते, फिर कैसे खतरा मंडराने लगा !!

मजे की बात यह कि इस ज्यादा खतरनाक और तेज नए अवतार से पीड़ित व्यक्ति दो ही दिन में ठीक हो बैडमिंटन भी खेलने लगता है ! अब जो धुंधली तस्वीर बनती है, उसे कोई भी साफ करने की जहमत नहीं उठाता ! सिर्फ डराने पर जोर दिया जाता है

अचानक देश के दक्षिणी भाग से, दक्षिण अफ्रीका से आया एक आदमी खतरे का वायस बन जाता है ! सवाल यहीं से सर उठाता है कि जब सारी दुनिया खबरदार थी ! सभी जगह कड़ी एहतियात बरती जा रही थी तो वह शख्स भारत कैसे पहुंचा ? क्या जहाज पर चढ़ते समय उसकी चेकिंग नहीं हुई ? यदि उस समय वह ठीक था तो क्या यात्रा के दौरान वह संक्रमित हुआ ? हुआ तो कैसे ? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या वह अकेला ही बीमार हुआ ? वैसे ही फिर खबर आती है कि अमेरिका से आए दो कोरोना पॉजिटिव देश के मध्य तक पहुँच गए ! क्या अमेरिका, जो महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा था, वहाँ भी लापरवाही बरती जा रही है ? क्या वहाँ यात्रियों का परिक्षण नहीं किया जाता ? उस पर भारत आने पर क्या उनकी जांच नहीं हुई ? यदि सब ठीक था, तो वे कहां और कैसे संक्रमित हुए ?   


ये तो बाहर से आए लोगों की बात थी ! अपने ही देश में उसी दक्षिणी भाग से फिर एक व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है ! वह तो कहीं बाहर भी नहीं गया था ! तो क्या जीवाणु यहां पहले से मौजूद था ? यदि हाँ, तो क्या वह कोरोना की पारी खत्म होने का इन्तजार कर रहा था कि वह हटे तो मैं आऊँ ! या फिर उस अकेले आदमी की प्रतिरोधक क्षमता ही सबसे कमजोर थी ! वैसे इन जीवाणुओं को दक्षिण का डोसा-सांभर ही क्यूँ सुहाता है ! जो वहीं से अपना शिकार चुनते हैं ! मजे की बात यह कि इस ज्यादा खतरनाक और तेज नए अवतार से पीड़ित व्यक्ति दो ही दिन में ठीक हो बैडमिंटन भी खेलने लगता है ! अब जो धुंधली तस्वीर बनती है, उसे कोई भी साफ करने की जहमत नहीं उठाता ! सिर्फ डराने पर जोर दिया जाता है ! सच्चाई क्या है आम जनता को कोई भी बताना नहीं चाहता, अपने-अपने स्वार्थों के तहत !

पिछले दिनों क्रिकेट के मैचों के दौरान खचाखच भरे स्टेडियम में बिना मास्क और दूरी बनाए बैठे लोग ! बेपरवाह नेताओं की बेतरतीब रैलियां ! दूषित वातावरण, अस्वच्छ माहौल में महीनों से रह रहे किसान ! त्योहारों के दौरान बाजार में एक दूसरे के कंधे छीलती हजारों की भीड़ ! इन सबके बावजूद कोरोना के घटते आंकड़े ! फिर अचानक सुस्त पड़े, मुद्दा-विहीन खबरिया चैनल सक्रीय हो उठते हैं, एक नए वैरिएंट ओमिक्रान का डोज पी कर !!       

शनिवार, 27 नवंबर 2021

जिसे भी हम पूजते हैं, उसकी ऐसी की तैसी कर डालते हैं

कभी ध्यान गया है किसी मंदिर में लगे किसी अभागे वृक्ष की तरफ ? उसके तने या जड़ के पास अपनी मन्नत पूरी करने के लिए दीया जला-जला कर उसकी लकड़ी को कोयला कर, हमें लगता है कि वृक्ष महाराज हमारी मनोकामनाएं जरूर पूरी करेंगें ! कोई कसर नहीं छोड़ते हम, अपनी आयु बढ़ाने के लिए उसकी जड़ों में अखाद्य पदार्थ डाल-डाल कर उसको असमय मृत्यु की ओर ढकेलने में.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

हम एक धार्मिक देश के वाशिंदे हैं। हम बहुत भीरू हैं ! इसी भीरुता के कारण हम अपने बचाव के लिए तरह-तरह के टोने-टोटके करते रहते हैं ! हमें जिससे डर लगता है, हम उसकी पूजा करना शुरु कर देते हैं ! हमने अपनी रक्षा के लिए पत्थर से लेकर वृक्ष, जानवर और काल्पनिक शक्तियों को अपना संबल बना रखा है ! पर जैसे-जैसे हमारी सुरक्षात्मक भावना पुख्ता होती जाती है, हम अपने आराध्यों की ऐसी की तैसी करने से बाज नहीं आते !

पूजा-अर्चना कर ली, कार्य सिद्ध हो गया तो फिर तुम कौन तो मैं कौन
घर से ही शुरु करें ! जब तक मतलब निकलना होता है, हमें अपने माँ-बाप से ज्यादा प्यारा और कोई नहीं होता ! पर जैसे ही, उन्हीं कि बदौलत, अपने पैरों पर खड़े होने की कुव्वत आ जाती है, तो उनके लिए वृद्धाश्रम की खोज शुरु हो जाती है !
हमारे यहां यह बात काफी ज्यादा प्रचलित है कि जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं ! देख लीजिए जहां देवता वास करते हैं, वहां नारी का क्या हाल है ! अरे देवता ही जब नारी की कद्र नहीं कर पाए, तो हम तो गल्तियों के पुतले, इंसान हैं ! कभी सुना है कि देवताओं ने अपना मतलब सिद्ध हो जाने पर किसी देवी को इंद्र का सिंहासन सौंप दिया हो ? 
हम नदियों को देवी या माँ का दर्जा देते आए हैं ! पर क्या हमने किसी एक भी नदी के पानी को पीने लायक छोड़ा है ! कहीं पीना पड़ जाता है, तो वह मजबूरी वश ही होता है ! प्रकृति द्वारा मुफ्त में प्रदान इस जीवनदाई द्रव्य की हमने कभी कद्र नहीं की ! उसी का परिणाम है जो उस पर हजारों रूपए खर्चने पड़ रहे हैं ! जल देवता कहते-कहते हमारा मुंह नहीं थकता ! पर आज जैसी इस देवता की दुर्दशा कर दी गई है, तो लगता है जैसे इसके भी देवता कूच कर चुके हैं !
यही हाल वायुदेव का है ! आम इंसान की तो क्या ही कहें, खुद उनकी भी सांस हमारे यहां आ कर फूलने लगती है ! पर हमें और हमारे तथाकथित नेताओं को कोई परवाह नहीं है ! ना हीं चिंता है ! एक आश्वासन देते नहीं थकता दूसरा अपनी करनियों से बाज नहीं आता ! 
गाय को सदा माँ के समकक्ष माना गया है ! उसकी नेमतों का तो कोई सानी ही नहीं है ! ना हीं उसके उपकारों का कोई बदला है ! पर क्या कभी उनके जिस्म को निचोड़ने के अलावा उनकी सेहत का ख्याल रखा है, किसी ने ? जगह-जगह घूमती, कूड़ा खाती मरियल सी गायें, शायद ही दुनिया में कहीं और दिखती हों !
पेड़-पौधों,  लता-गुल्मों की तो बात ही ना की जाए तो बेहतर है ! जीवन देने वाली इस प्रकृति की नेमत की कैसी पूजा आज कल हो रही है जग जाहिर है ! कभी ध्यान गया है किसी मंदिर में लगे किसी अभागे वृक्ष की तरफ ? उसके तने या जड़ के पास अपनी मन्नत पूरी करने के लिए दीया जला-जला कर उसकी लकड़ी को कोयला कर, हमें लगता है कि वृक्ष महाराज हमारी मनोकामनाएं जरूर पूरी करेंगें ! कोई कसर नहीं छोड़ते हम, अपनी आयु बढ़ाने के लिए उसकी जड़ों में अखाद्य पदार्थ डाल-डाल कर उसको असमय मृत्यु की ओर ढकेलने में ! 

समय-समय पर देव प्रतिमाओं की तो और भी बुरी गत हमारे द्वारा बना दी जाती है ! पूजा-अर्चना के बाद मूर्ति और उसमें इस्तमाल हुई सामग्री, किसी पेड़-पार्क या झाड़ियों में पड़ी अपनी दुर्गत पर आँसू भी नहीं बहा पाते ! किसी बड़े-विशाल पूजा समारोह के बाद नदी-नालों, झीलों-तालाबों की हालत देख लीजिए, हमारे भक्तिभाव की सारी पोल खुल कर रह जाती है !   

यानी कि हम इतने खुदगर्ज हैं कि मतलब निकल जाने के बाद किसी भी पूज्य की ऐसी की तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! पूजा-अर्चना कर ली, कार्य सिद्ध हो गया तो फिर तुम कौन तो मैं कौन !  

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

लौटना गब्बर का फिर रामगढ़

धीरे-धीरे चल कर गब्बर अपने पुराने अड्डे के पास पहुंचा तो वहाँ का नक्शा भी बिलकुल बदला हुआ मिला ! लोगों ने प्लॉट काट-काट कर घर बनाने की तैयारियां कर रखी थीं ! फिलहाल वक्त, आशिकों ने उस महफूज जगह को अपना आशियाना बना डाला था। इक्का-दुक्का जोड़े तो इस भरी दुपहरिया में भी चट्टानों के पीछे दुबके नजर आ रहे थे ! गब्बर, जिसके नाम से पचास-पचास कोस दूर रोते बच्चे डरा कर चुप करवा दिए जाते था, उसी गब्बर की नाक के नीचे आज के छोकरे प्रेम का राग अलाप रहे थे....... !

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रामगढ़ की एतिहासिक लड़ाई के बाद सब कुछ मटियामेट हो चुका था। अब ना डाकुओं का दबदबा रहा, ना वो हुंकार कि कितने थे ? आदमी ही ना रहे तो गिनती क्या पूछनी ! ले दे कर सिर्फ सांभा बचा था, वह भी चट्टान के ऊपर किसी तरह छिपा रह गया था, इसलिए ! 

वर्षों बाद जेल काट तथा बुढ़ापा ओढ़, गब्बर वापस आया था रामगढ़। मन में एक आशा थी कि शायद छूटा हुआ  लूट का माल हासिल हो ही जाए ! पर वह भौंचक सा रह गया था यहाँ आ कर ! बीते सालों में रामगढ़ खुशहाल हो चुका था ! अब वहाँ तांगे नहीं, तिपहिया और टैंपो चलने लग गए थे। सड़कें भी पक्की हो गई थीं ! बिजली आ चुकी थी। लालटेनें इतिहास का हिस्सा बन चुकी थीं। बीरू-बसंती के प्यार को विवाह के गठबंधन में बदलने में सहयोगी उस समय की बिना पाइप की पानी की टंकी में अब पाइप और पानी दोनों उपलब्ध हो गए थे ! पुलिस का थाना बन गया था। एक डिग्री कालेज भी खुल गया था, जिससे अब किसी अहमद को अपनी जान पर खेल, शहर जा पढाई नहीं करनी पड़ती थी ! यह सारा बदलाव यहां से ठाकुर के चुनाव जीतने का नतीजा था। 

बात हो रही थी गब्बर के लौटने की ! समय की मार, अपने समय के आतंक गब्बर को आज कोई पहचानने वाला ही नहीं था ! इक्के-दुक्के लोगों ने तो भिखारी समझ उसके हाथ में एक-दो रुपये तक पकड़ा दिए थे ! उसने उनको भी अपनी खैनी की पोटली के साथ अपनी कमीज की जेब में ठूंस लिया। उसे तो एक ही चिंता सता रही थी कि पुलिया, जिसे जय ने उड़ा दिया था, के बगैर वह खाई कैसे पार करेगा। पर कमजोर होती आँखों के बावजूद उसे उस सूखे नाले पर एक पक्का मजबूत पुल दिखाई पड़ गया ! दिल जल उठा गब्बर का, यह पुल उस समय होता तो...........! 

खैर धीरे-धीरे चल कर गब्बर अपने पुराने अड्डे के पास पहुंचा तो वहाँ का नक्शा भी बिलकुल बदला हुआ मिला ! लोगों ने प्लॉट काट-काट कर घर बनाने की तैयारियां कर रखी थीं ! फिलहाल वक्त, आशिकों ने उस महफूज जगह को अपना आशियाना बना डाला था। इक्का-दुक्का जोड़े तो इस भरी दुपहरिया में भी चट्टानों के पीछे दुबके नजर आ रहे थे ! गब्बर, जिसके नाम से पचास-पचास कोस दूर रोते बच्चे डरा कर चुप करवा दिए जाते था, उसी गब्बर की नाक के नीचे आज के छोकरे प्रेम का राग अलाप रहे थे ! 

थका-हारा, लस्त-पस्त गब्बर वहीं एक पत्थर पर बैठ जेब से खैनी निकाल हाथ पर रगड़ रहा था। तभी उसे एक चट्टान के पीछे से एक सिर नमूदार होते दिखा। माथे पर हाथ रख आँखे मिचमिचा कर ध्यान से देखा तो खुशी से चीख उठा "अरे सांभा !!!" उधर सांभा जो और भी सूख कर बेंत की तरह हो चुका था, अपने उस्ताद को सामने पा एक साथ परेशान, चिंतित और चिढ़ गया ! कारण भी जायज था ! वह अपने पेट को भरने का इंतजाम तो ठीक से कर नहीं पाता था, ऊपर से यह आ गया था ! पर किया भी क्या जा सकता था ! मन मार कर, गुस्सा दबा, कुशल-क्षेम पूछी ! फिर सबेरे मांग कर लाई रोटियों में से चार उसके सामने एक प्याज के साथ रख दीं ! भूखे गब्बर ने झट से उनका सफाया कर डाला। 

किसी तरह शाम ढली, रात बीती, सुबह हुई ! आदतानुसार गब्बर ने ऐसे ही पूछ लिया "होली कब है, कब है होली ?'' इतना सुनना था कि सांभा के तनबदन में आग सी लग गई  ! ऐसा लगा जैसे नेपोलियन को किसी ने वाटरलू याद दिला दिया हो ! एक तो वह तो इसके आने से वैसे ही परेशान हो रात भर सो नहीं पाया था ! ऊपर से फिर वही सवाल ! वह फूट पडा ! उस्ताद, होली, दिवाली सब भूल जाओ ! मंहगाई का कोई इल्म भी है तुम्हें ? अपनी टेंट में दो दाने दाल और पाव भर आटा खरीदने को भी कुछ नहीं है ! यहाँ ना कुछ खाने को है ना पकाने को !  एक-दो बार, इधर जो लौंडे-लफाड़िए आते हैं  उन्हें डरा-धमका कर कुछ ऐंठने की कोशिश की तो उलटा वे मुझे ही हड़का गए ! वह तो हफ्ते दस दिन में मंदिर, गुरुद्वारे के लंगर से चार-पांच दिन का बटोर लाता हूँ, तो जिंदा हूँ ! तुमसे तो वह भी नहीं होगा ! हमारे विगत को जानते हुए कोई हमारा हमारा स्मार्ट कार्ड या आधार कार्ड भी नहीं बनाएगा ! तुमने जो किया है, उससे बुढापे की पेंशन भी मिलने से रही ! इसलिए पर्वों-त्योहारों खासकर होली को तो  भूल ही जाओ, जिसने हमारी यह गत बना दी थी ! यह सोचो कि आज खाओगे क्या और कैसे ?

इतनी डांट तो गब्बर ने अपनी पूरी जिन्दगी में भी कभी किसी से नहीं खाई थी ! वह सांभा जो उसके डर के मारे कभी पहाड़ी से नीचे नहीं उतरता था, आज उसे नसीहत दे रहा था ! सब समय का फेर है ! पर यह भी सच है कि तभी से  गब्बर सब भूल-भाल कर अब सिर्फ भोजन जुगाड़-चिंतन  में जुटा हुआ है ! 

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी ! ऐसा क्यों ?

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेंट को ले कर मामला फंस गया हो ! वहां ग्रामीण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों, पर राधा के सचिव ने पूरा कैश लेना चाहा हो ! बात बनते ना देख उसने इतने तेल की डिमांड रख दी हो, जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो ! वैसे किस तेल की फर्माईश की गई थी, इसका भी पता नहीं चल पाया है......!

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कुछ अजीब सा नहीं लगता ! नाच और तेल का आपस में क्या संबंध ! फिर यह कैसी शर्त ! नौ मन तेल तो नहीं, पर दिमाग का तेल निकालने के बाद कुछ ऐसा समझ में आया कि हो सकता है कि ये राधा जी कोई बड़ी जानी-मानी डांसिंग स्टार होंगी और किसी अप्रख्यात जगह से उन्हें बुलावा आया होगा। शायद उस जगह अभी तक बिजली नहीं पहुंची हो और वहां सारा कार्यक्रम मशाल वगैरह की रोशनी में संम्पन्न होना हो। इस बात का पता राधा एण्ड पार्टी को वेन्यू पहुंच कर लगा हो और अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल किसी चीज ना पा कर आर्टिस्टों का मूड उखड़ गया हो ! किसी भी तरह के बखेड़े से बचने के लिए ऐसी शर्त रख दी गई हो, जिसे तत्काल पूरा कर पाना गांव वालों के बस की बात ना हो ! पर फिर यह सवाल उठता है कि नौ मन तेल ही क्यूं ? राउंड फिगर में दस या पंद्रह मन क्यों नहीं ? तो हो सकता है कि यह आंकड़ा काफी दर-मोलाई के बाद फिक्स हुआ हो !

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेंट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामीण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की डिमांड रख दी हो, जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो !

ऐसे में मुहावरे का लब्बो-लुआब यही निकलता है कि एक ख्यातनाम ड़ांसिंग स्टार अपने आरकेस्ट्रा के साथ किसी छोटे से गांव में अपना प्रोग्राम देने पहुंचीं। उन दिनों मैनेजमेंट गुरु जैसी कोई चीज तो होती नहीं थी सो गांव वालों ने अपने हिसाब से प्रबंध कर लिया था और यह व्यवस्था "राधा एण्ड कंपनी" को रास नहीं आई। पर उन लोगों ने गांव वालों को डायरेक्ट मना करने की बजाय अपनी एण्ड-बैण्ड शर्त रख दी होगी। जो उस हालात और वहां के लोगों के लिये पूरा करना नामुमकिन होगा। इस तरह वे जनता के आक्रोश और अपनी बदनामी दोनों से बचने में सफल हो गए होंगे।

वैसे किस तेल की फर्माईश की गई थी, इसका भी पता नहीं चल पाया है ! पर इस घटना के बाद इस तरह के समारोह करवाने वाले अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ नौ-दस मन तेल का भी इंतजाम कर रखने लग गए होंगे ! क्योंकि फिर कभी राधा जी और तेल के नए आंकड़ों की खबर सुनने में नहीं आई है !
इस बारे में नई जानकारियों का स्वागत है ! 

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

मूल से अधिक प्यारा ब्याज, ऐसा क्यों

जो लोग अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह जाते हैं, उनके लिए अपने नाती-पोते-पोतियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है, जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है ! फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही परम पिता ने इस मोह की माया को रचा हो............!    

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किसी इंसान के दादा-दादी बनने पर उनके अपने नाती-पोते-पोतियों से स्नेह-अनुराग को लेकर, ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत है कि ''मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।'' इसका कतई यह मतलब नहीं है कि उसे अपने बच्चों से लगाव नहीं होता ! पर काम का बोझ, पारिवारिक दायित्व व जिम्मेदारियां, जीवन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिशें, चाहते हुए भी, उसे इतना समय ही नहीं देतीं कि वह प्रभु-प्रदत्त इस नियामत के बढ़ने-फलने-फूलने का पूरा आनंद उठा सके। पर अपनी इस तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक दायित्वमुक्त हो चुका होता है। काफी कुछ हासिल कर चुका होता है ! पहले की तरह जीवन में आपाधापी नहीं रह जाती ! सो अफरात समय भी उपलब्ध रहता है। इसी से जब वह प्रभु की इस अद्भुत, अप्रतिम, सर्वोत्तम कृति को शिशु रूप में अठखेलियां करते देखता है, जो वह अपने समय में नहीं देख पाया थाा, तो वह अचंभित, मुग्ध व चित्रलिखित सा हो मोह में बंध कर रह जाता है। 

सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो 

कहा जाता है कि बच्चे प्रभु का रूप होते हैं ! पर प्रभु को भी इस धरा को, प्रकृति को, सृष्टि को बचाने के लिए कई युक्तियों तथा नाना प्रकार के हथकंडों का सहारा लेना पड़ा था ! पर निश्छल व मासूम शैशव, चाहे वह किसी भी प्रजाति का हो, छल-बल, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा सबसे परे होता है, इसीलिए वह सबसे अलग होता है, सर्वोपरि होता है। भगवान को तो फिर भी इंसान को चिंतामुक्त करने में कुछ समय लग जाता होगा, पर घर में कैसा भी वातावरण हो, तनाव हो, शिशु की एक किलकारी सबको उसी क्षण तनावमुक्त कर देती है। गोद में आते ही उसकी एक मुस्कान बड़े से बड़े अवसाद को तिरोहित करने की क्षमता रखती है। उसकी बाल सुलभ हरकतें, अठखेलियां, जिज्ञासु तथा बड़ों की नक़ल करने की प्रवृति, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी होती हैं। उसकी अपने आस-पास की चीजों से तालमेल बैठाने की सफल-असफल कोशिशें कठोर से कठोर चहरे पर भी मुस्कान की रेख खिंच देने में कामयाब रहती हैं। 

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो !   

मैं भी उसी श्रेणी से संबद्धित हूँ, इसीलिए यह कह पा रहा हूँ ! अपनी डेढ़ वर्ष की पौत्री की बाल चेष्टाओं, उसकी गतिविधियों, उसकी मासूमियत भरी हरकतें देख यह अहसास होता है कि जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कुछ खो दिया था ! किस नियामत से वंचित रह गया था ! उपलब्धियों की चाहत में कितना कुछ अनुपलब्ध रह गया था ! पर आज दिल की गहराइयों से प्रभु का शुक्रगुजार हूँ कि समय रहते उन्होंने मुझे इस दैवीय सुख से परिचित करवा दिया ! सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो ! पर इसके साथ ही कभी-कभी एक अजीब सी ,बेचैनी, एक अलग सा भाव, कुछ खो जाने का डर भी महसूसने लगता हूँ ! क्योंकि यह तुतलाती जुबां, डगमगाती चाल, अठखेलियां, मासूम हरकतें समय के चंगुल से कहाँ बच पाएंगी ! फिर वही पाठ्यक्रमों का बोझ, स्कूलों की थकान भरी बंदिशें, दुनियावी प्रतिस्पर्द्धा और ना जाने क्या-क्या हावी होती चले जाएंगे ! पर कुछ किया भी तो नहीं जा सकता जग की इस रीत के विपरीत...............!! 

जी तो करता है कि इसकी मासूमियत, निश्छलता, भोलापन यूँ ही बने रहें ! इसी तरह अपनी तोतली भाषा में हमसे बतियाती रहे ! इसी तरह सुबह डगमगाती हुई आ गोद में चढने की जिद करती रहे ! यूँ ही इसकी किलकारियों से घर गुंजायमान रहे ! पर समय.....! किसका वश चल पाया है उस पर ! इसीलिए कोशिश करता हूँ कि इन पलों को बाँध के रख लूँ ! या फिर जितना ज्यादा हो सके, समेटता ही चला जाऊं, समेटता ही चला जाऊं, और सहेज के रख लूँ दिलो-दिमाग के किसी बहुत ही सुरक्षित कोने में, धरोहर बना कर ! 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

नरक चतुर्दशी, नरकासुर वध

समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

इंसान के लिए जो बात या घटना अप्रत्याशित, असंभावित या आकस्मिक होती है वही बात जगत रचयिता के विधि लेखन का पूर्वनियोजित हिस्सा होती है ! हमारी पृथ्वी की गोलाई की तरह ही यहां पर घटने वाली हर बातें, विषय, घटनाएं, वाकये सब सुनियोजित हो किसी ना किसी तरह, गोल-गोल एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इंसान जिस घटना पर अवाक रह जाता है वह वर्षों पहले नियंता द्वारा रची जा चुकी होती है !

अब नरकासुर की ही बात लें, जिसे ब्रह्मा जी द्वारा वरदान मिला हुआ था कि उसका अंत उसकी माँ के ही हाथों होगा ! अब अपने बच्चे को कौन माँ मार सकती है ! इसी से निश्चिंत हो नरकासुर यानी भौमासुर ने सत्ता और ताकत के नशे में चूर हो, सभी राजाओं और देवताओं को तो पराजित किया ही, इंद्र को हरा कर अमरावती पर भी अपना कब्जा कर लिया। उसने देवताओं की माता अदिती की बालियां चुराने और 16000 राजकुमारियों का अपहरण करने तक की धृष्टता कर डाली ! उस समय वह प्राग्ज्योतिष यानी कामरूप नगर का राजा था ! इस जगह ब्रह्मा जी ने नक्षत्रों का निर्माण किया था, इसीलिए यह प्राक् (प्राचीन या पूर्व) और ज्योतिष (नक्षत्र) कहलाती थी, जो आज असम के गुवाहाटी के नाम से जानी जाती है। 

कथा लेखक को तो अपनी कहानी का हर पहलू ज्ञात होता है पर पढ़ने-सुनने वाले को उसके उतार-चढ़ाव का कुछ भी अंदाजा नहीं होता ! जब नरकासुर को उसकी तपस्या के एवज में वरदान दिया गया था, तभी साथ ही उसके अंत की भी व्यवस्था कर दी गई थी ! पर कथानक इतना सीधा-सपाट नहीं था ! पेच ओ खम से भरा हुआ था ! कई तरह के उतार-चढ़ाव थे ! तरह-तरह की विषम परिस्थितियों का समावेश था। कथा में माँ-बेटे के संघर्ष के द्वारा इंसान को समझाने की कोशिश है कि पृथ्वी ही हमारी माता है ! वही हमारा पोषण करती है ! हमें जीवनयापन में सहयोग करती है ! इसलिए हमें उस पर अपना अधिकार या स्वामित्व नहीं जताना चाहिए ! बल्कि उसके आदर-सम्मान के साथ ही उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी मानवता की ही बनती है !     

नरकासुर कोई मामूली या साधारण राक्षस नहीं था। वह श्री विष्णु और भू देवी का पुत्र था। पुराणों में विवरण है कि एक बार राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी देवी का अपहरण कर उन्हें समुद्र तल में ले जा कर कैद कर लिया था। तब विष्णु जी ने वराह का अवतार ले उनका उद्धार किया था ! सागर तल से ऊपर आने के दौरान उन दोनों के संयोग से भौमासुर का जन्म हुआ था ! देवी ने तभी से विष्णु जी को अपना पति मान लिया था ! समय के साथ पृथ्वी देवी के एक अवतार ने सत्यभामा के रूप में राजा सत्राजित के घर जन्म लिया। स्यमंतक मणि को ले कर काफी जद्दोजहद हुई ! इसी के लिए श्री कृष्ण को जामवंत जी की बेटी जामवंती से विवाह भी करना पड़ा ! पर अंततोगत्वा उनका विवाह सत्यभामा से भी हुआ, जो होना ही था !

इधर जब नरकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जा उनसे नराकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ! चूँकि नरकासुर को अपनी माँ के हाथों ही मरना था, इसलिए प्रभु ने अपनी पत्नी सत्यभामा को भी, जो पृथ्वी का अवतार थीं, युद्ध में साथ ले लिया ! समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है !
उत्तर भारत में नरक चतुर्दशी को "छोटी दिवाली" के रूप में मनाया जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में नरक चतुर्दशी, दीपावली पर्व का मुख्य त्योहार है। पर जहां उत्तर भारतीय अवाम, सीता जी के साथ श्री राम की वापसी का जश्न मनाता है, वहीं दक्षिण भारतीय नागरिक नरकासुर वध के उपलक्ष्य में उत्सव मनाते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और मनाने की  शैली एक होने के बावजूद दिन अलग-अलग होते हैं !

श्रीकृष्ण जी ने कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी ! उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए, आतिशबाजी की, खुशियां मनाईं ! तभी से नरक चतुर्दशी पर दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा। 

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