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रविवार, 22 मार्च 2026

जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)

माडूं के मंदिर का यह शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं...........!!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मांडू या मांडवगढ़ अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध, एक प्राचीन नगर है। यह मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्र में, धार शहर से 35 किमी और इंदौर से लगभग 100 किमी की दूरी पर एक चट्टानी इलाके में बसा हुआ है। इसकी ज्यादातर ख्याति बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंगों और उससे जुड़े प्राचीन भवनों के कारण जानी जाती है ! इसी मांडू नगरी की सुंदर वादियों में, मांडू बस अड्डे से करीब पांच किमी और मांडू रोड से तीन किमी की दूरी पर भगवान शिव का एक प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है ! सड़क से कुछ ही दूर, पत्थरों से निर्मित करीब सत्तर सीढ़ियां उतरने के बाद गहरी खाई के साथ एक आंगन के चबूतरे पर मुगल शैली की इमारत में यह मंदिर बना हुआ है ! 

नीलकंठेश्वर 


इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !

चबूतरे पर निर्माण 
सीढ़ियां 
श्रमसाध्य 

मुद्र-मंथन के बाद शिवजी ने हलाहल को अपने गले में धारण किया और वे नीलकंठ कहलाए ! भोलेनाथ ने हलाहल विष की ज्वाला को शांत करने के लिए जिस-जिस जगह पर धूनी रमाई, वही जगह नीलकंठेश्वर के नाम से विख्यात हो गई ! उस कथा से मांडू की पावन जगह का नाम जुड़ा है, तो जाहिर है कि वर्तमान शिवलिंग की स्थापना बहुत पहले हो चुकी होगी ! कुछ लोगों का मानना भी है और वे दबे स्वर में बताते भी हैं कि वर्तमान निर्माण भगवान शिव के पुराने मंदिर पर ही बना है ! जिम्मेदार लोगों, पुरातत्ववेताओं और संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि यहां के इतिहास को खंगाल कर यहां की सच्चाई सामने लाई जाए ! 

दुर्गमता 

दीवाल पर खुदी आयतें 

दरवाजे के ऊपर लिखा संदेश 

नश्रुति कहती है कि नीलकंठ महल को मांडू के मुगल गवर्नर शाह बदगाह ने 1574 AD में अकबर की प्रिय मुगल महारानी मरियम-उज-ज़मानी के लिए बनवाया था, जिसे आम बोलचाल में जोधाबाई के नाम से जाना जाता है। शाही मुगल कागजों में इस महल का नाम इमारत-ए-दिलखुशा लिखा मिलता है। पर यह स्थान आज भी सुनसान और कुछ-कुछ निर्जन ही है। उस समय तो और भी दुर्गम रहा होगा ! उस पर यहां की उबड़-खाबड़ पत्थर की सीढ़ियों से उतर कर पहुंचना भी आसान नहीं है, खासकर महिलाओं के लिए, भले ही वह पालकी में आएं ! इसलिए यह जगह महल कम शिकारगाह ज्यादा लगती है !

नमस्कार 

यहां आ कर ऐसा अनुमान और आभास होता है कि पहले यह महल भगवान शिव के पुराने मंदिर के पास बनाया गया होगा, जिसके खंडहर अभी भी मौजूद हैं, फिर किसी सूबेदार ने आदतानुसार अपने आका को खुश करने के लिए शिवलिंग को घेर कर उस पर भी इमारत खड़ी कर दी होगी ! ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं ! 

गर्भगृह 
                                       

जैसा कि भ्रम फैलाया गया है कि यह मंदिर किसी मुगल रानी के लिए बनवाया गया है। तो यदि श्रद्धा से मंदिर बनवाया जाएगा तो उस पर कलश की स्थापना होनी चाहिए, जो यहां नहीं है ! सोचने की बात है यदि कोई मंदिर, चर्च या मस्जिद बनवाएगा तो उसी के वास्तुनुसार निर्माण होगा ! चर्च और मस्जिद पर कलश नहीं बनवा दिया जाएगा ना हीं घंटे-घड़ियाल लटका दिए जाएंगे ! तो यदि मंदिर बनवाना था तो इस मंदिर का दरवाजा मस्जिदनुमा क्यों है ? दरवाजे के ऊपर के हिस्से में और बगल की दीवारों पर आयतें क्यों कुरेदी गई हैं ? पुरातत्व विभाग ने भी एक आधा-अधूरा सा शिलालेख लगा अपने कर्तव्य की खानापूर्ति कर दी है, कौन झंझट मोल ले ! 

पुरातत्व विभाग का शिलालेख 
मंदिर के गर्भगृह में शिव लिंग के पीछे से कुदरती झरने का पानी बहता रहता है और मंदिर के सामने एक टैंक में इकट्ठा होता है। पास के एक कमरे में भी शिव परिवार स्थापित है ! आंगन के बीच में एक कुंड है, जिसका पानी उसके किनारे बनी एक पानी की भूलभुलैया से गुजरता है ! मान्यता है कि कोई यदि उसमें एक पत्ता रख दे और वह पत्ता भूलभुलैया से बाहर निकल जाए,  तो उस व्यक्ति की इच्छा पूर्ण हो जाती है ! 

भूलभुलैया सी संरचना 
श्रद्धा-भक्ति-आस्था से ओतप्रोत जब कोई श्रद्धालु, अपने मन में एक शिव मंदिर की तस्वीर की कल्पना लिए यहां पहुंचता है तो अपनी सोच के ठीक विपरीत यहां मुगलिया निर्माण के अंदर स्थित शिवलिंग को देखता है तो स्तब्ध, परेशान और हैरान हो कर रह जाता है और बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हो जाता है !

रविवार, 18 मई 2025

भगत, किसिम-किसिम के

भक्त ! यह शब्द सुनते ही जो तस्वीर दिमाग में उभरती है वह होती है किसी ऐसे इंसान की जो प्रभु के प्रति पूर्णतया समर्पित हो ! जो अपने इष्ट के प्रति आस्था, समर्पण तथा अटूट श्रद्धा रखता हो !द्वापर में प्रभु ने भक्तों के चार प्रकार बताए थे ! आज द्वेष-भावना तथा कुंठित मनोदशा के चलते, भक्त जैसे सुंदर शब्द का अर्थभक्ष्य कर, एक  उपसर्ग लगा तीर बना, वक्रोक्ति की तरह अपने राजनितिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा है , आज के तथाकथित ऐसे भक्तों के भी चार ही प्रकार हैं.............!                            

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

भक्त ! यह शब्द सुनते ही जो तस्वीर दिमाग में उभरती है वह होती है किसी ऐसे इंसान की जो प्रभु के प्रति पूर्णतया समर्पित हो ! जो अपने इष्ट के प्रति आस्था, समर्पण तथा अटूट श्रद्धा रखता हो ! प्रभु के बाद गुरु इस श्रेणी में आते हैं ! वैसे तो पूजा, वंदना, कीर्तन, अर्चना करने वाले सभी लोग भक्त कहलाते हैं। गीता में इनके चार प्रकारों का उल्लेख है ! इनमें सच्चा भक्त वह कहलाता है जो निष्काम होता है, उसे अपने प्रभु को छोड़ और कुछ नहीं चाहिए होता ! यह तो हुआ भक्त शब्द का असली अर्थ या उसकी परिभाषा ! 

अपने यहां सदा से ही अलग-अलग विचारधाराओं के राजनितिक दल अपने विपक्षियों को नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करते रहे हैं ! उन्हीं में से एक है शब्द-बाण यानी बातों के तीर ! आज द्वेष-भावना तथा कुंठित मनोदशा के चलते, भक्त जैसे सुंदर शब्द का अर्थभक्ष्य कर, एक उपसर्ग लगा तीर बना, वक्रोक्ति की तरह अपने राजनितिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा है ! द्वापर में प्रभु ने भक्तों के चार प्रकार बताए थे ! आज के भक्तों के भी चार ही प्रकार हैं ! उन्हीं का विश्लेषण !

आधुनिक भक्त 
अंधभक्त - ये उन लोगों के लिए वितृष्णा के साथ प्रयोग में लाया जाता है, जिन्हें तथाकथित रूप से सत्ता पर काबिज दल के हिमायती के रूप में देखा जाता है ! पर असलियत में ऐसा है नहीं ! कुछेक को छोड़ कर हमारे देश के लोग, जब तक मोह-भंग न हो जाए या असलियत सामने ना आ जाए, तब तक हर उस इंसान या दल का साथ देने को तत्पर रहते हैं, जिसको वह देश-हितैषी समझते हैं ! आजादी के बाद से कई बार इसके उदाहरण मिलते रहे हैं ! ऐसे लोग बहुत भावुक होते हैं। देश के लिए समर्पित। इसीलिए कभी-कभी भावनाओं के वश में हो धूर्तों के वाग्जाल में फंस, धोखे में आ, उनको भी सर पर बैठा लेते हैं ! पर सच सामने आते ही उन्हें धूल चटाने से भी बाज नहीं आते ! कुछ लोग इन्हीं लोगों की भावनाओं से कुंठित और लगातार अपनी अवनति के चलते, उन्हें व्यंग्यात्मक शब्दों का निशाना बना लेते हैं ! पर सच्चाई यही है कि इस श्रेणी के भक्तों के लिए कोई इंसान नहीं, देश सबसे पहले और सर्वोपरि होता है !

बेशर्मभक्त - ये वे अनुयायी होते हैं, जो अपने इष्टों के भूतकालीन कुकर्मो, दुष्कर्मों को जानते हुए भी उसके दुर्गुणों का, उसके दुष्कर्मों का बेशर्मी से बचाव करते नहीं शरमाते ! अपने स्वामी की दुर्बुद्धि को भी विश्वस्तरीय अक्लमंदी स्थापित करने में जी-जान से लगे रहते हैं ! चारणाई में इनका विश्व में कोई सानी नहीं होता ! मालिक बैठने को बोले तो ये लेटने को तत्पर रहते हैं ! इनकी अपनी कोई जमीन नहीं होती, इसलिए अपने स्वामी की दूकान को चलायमान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! इनके लिए अपने मालिक की झूठी ही सही, आन-बान के सामने किसी भी चीज यानी किसी भी चीज की कीमत कोई मायने नहीं रखती ! वैसे भक्त की जगह इन्हें जर-खरीद गुलाम कहा जाना ज्यादा सही है !

निर्लज्जभक्त - इनका तो कहना ही क्या ! इनका मालिक यदि नर संहार भी करवा दे तो भी ये मरने वालों को ही दोषी ठहरा उन्हीं को गरियाते रहेंगे ! इनके द्वारा अपने आका को, दुनिया का हर कुकर्म करने के बावजूद सबसे बुद्धिमान, चतुर, सच्चा तथा ईमानदार स्थापित करने का गुर आता है ! ये सदा अपने विरोधी पक्ष को संसार का सबसे बड़ा दुराचारी, भ्रष्टाचारी, देशद्रोही निरूपित करते रहते हैं ! इनके आत्ममुग्ध बॉस के दो चेहरे होते हैं। सार्वजनिक जीवन में वह सदा मुखौटा लगाए रहता है ! दोगलेपन का वह शातिर खिलाड़ी होता है ! इनके चेले अपने विरुद्ध हुए हर दोष का कारण विपक्षी को साबित करने में दिन-रात एक कर देते हैं ! साथ ही दुनिया के किसी भी अच्छे काम का श्रेय खुद लेने और सच को झूठ बनाने में इनका कोई जवाब नहीं होता !  

* स्वार्थी या मतलबीभक्त - जैसा नाम है वैसा ही इनका काम है ! ये किसी के नहीं होते ! इनका मालिक कोई इंसान नहीं, कुर्सी यानी सत्ता होती है ! जिसका प्रभुत्व होता है ये उसी का राग गाते हैं ! इनको सिर्फ अपने हित, अपने स्वार्थ से मतलब रहता है ! जिसकी सत्ता, ये उसी के ये भक्त होते हैं ! दिन में दो बार सत्ता बदल जाए तो ये भी तुरंत तोते की तरह आँख फेर लेते हैं !

इनके अलावा भी एक प्रजाति होती है पर उसे भक्त नहीं कहा जा सकता ! वे पेड कारकून होते हैं ! कई बार सड़कों पर उलटी-सीधी मांगों वाली तख्तियां उठाए ये नजर आ जाते हैं ! कहीं भीड़ इकट्ठी करनी हो ! बवाल मचाना हो ! अराजकता फैलानी हो ! जुलुस निकालना हो ! किसी की जय-जयकार करवानी हो तो इनका ''उपयोग'' किया जाता है ! इनको सिर्फ अपनी तनख्वाह या नोटों से मतलब होता है उसके लिए इनसे कुछ भी करवाया जा सकता है !  

आज की पोस्ट सिर्फ एक निष्पक्ष विश्लेषण है, जो अनुभव के आधार पर किया गया है ! इसमें कोई दुर्भाव, पूर्वाग्रह या किसी से द्वेष का रंचमात्र भी स्थान नहीं है, इसलिए अन्यथा ना लें ! यदि ले भी लेंगे तो भी सच्चाई तो सच्चाई ही रहेगी 😇   

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 2 जून 2024

Deepfake, चरम नकली

अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

समय के साथ-साथ विज्ञान प्रकृति के रहस्यमयी परदे के पीछे से तरह-तरह की अनोखी चीजें हमारे सामने लाता रहा है, यह क्रम जारी है और सदा जारी रहेगा ! कुछ दिनों पहले तक नकली वीडियो, ऑडियो, तस्वीरें वगैरह काफी प्रसारित- प्रचारित होते रहे थे ! वहीं अब एक नई विधा Deep Fake, जिसके लिए अभी हिंदी का उपयुक्त शब्द ईजाद नहीं हुआ है, सामने आई है ! यह एक प्रकार की वीडियो या इमेज है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे से बदल दिया जाता है। डीपफेक वीडियो बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद ली जाती है। डीपफेक वीडियो और ऑडियो दोनों रूपों में हो सकता है ! इस उच्च कोटी की संपादित तकनीकी की खासियत यह है कि इसमें नकली और असली में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल होता है ! पर आज का यह लेख इस विधा से संबंधित एक दूसरी बात को सामने लाने के लिए है !  

हमारे प्राचीन ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले आठ सिद्धियों, नौ निधियों तथा दस गौण सिद्धियों के बारे में विस्तार से बताया गया है ! उन्हीं गौण सिद्धियों में परकायाप्रवेशनम् तथा कामरूपम्: नाम की दो सिद्धियां भी हैं !  परकायाप्रवेशनम् की सहायता से जहां किसी भी शरीर में प्रवेश किया जा सकता है। वहीं कामरूपम: सिद्धि को सिद्ध कर साधक अपनी इच्छा अनुसार कोई भी रूप धारण कर सकता है। देखा जाए तो ये आज की डीपफेक तकनीक के बहुत ही परिष्कृत और बेहद उच्च स्तरीय संस्करण हैं ! आज का डीपफेक जहां अभी तक सिर्फ यंत्रों में आभासी स्तर तक ही सिमित है, वहीं इन सिद्धियों का प्रयोग और उपयोग रामायण-महाभारत के अलावा अन्य ग्रंथों के अनुसार सुर-असुर, देवता, राक्षस, गंधर्व इत्यादि के द्वारा, वास्तविक रूप में, अच्छा-बुरा लाभ उठाने या गुप्तचरी करने की कोशिश में किए जाने का उल्लेख मिलता है ! 

गौतम ऋषि के वेश में छल करता इंद्र 
अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण ही तो था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था ! कितना और कहां तक गिनाया जाए........! 

साधू वेश में हनुमान जी का राम मिलाप 
हमारे ग्रंथों में वर्णित ज्ञान के सामने आज का विज्ञान नवजात शिशु रूप में ही है ! जो अभी तक उस समय के मुकाबले ऐसी इक्का-दुक्का उपलब्धियां ही हासिल कर पाया है ! इसके बावजूद दिक्कत हमारे साथ ही है ! हम खुद ही अपने गौरवान्वित इतिहास पर विश्वास नहीं करते ! ग्रंथों में लिखी बातों को वामपंथ विचारधारा के षड्यंत्र के तहत कपोल कल्पना मात्र मान उसको दरकिनार तो करते ही हैं, वक्त बेवक्त उसका मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आते ! गलती पूर्णतया हमारी भी नहीं है, पीढ़ी दर पीढ़ी जो बताए-पढ़ाए के नाम पर थोपा गया, उस पर विश्वास तो करना ही था ! खैर अब समय आ गया है कि हम वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराएं ! पुरानी कथा-कहानियों में वर्णित बातों को वैज्ञानिक आधार दे समझाएं ! गौरवान्वित महसूस करवाएं !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 15 मई 2024

एक पत्र, खुला-खुला सा

नवनिर्मित राम मंदिर में देश के हर कोने से रोजाना लाखों लोग दर्शन करने आ रहे हैं ! जाहिर है वहां से वे अपने घरों को भी लौटते होंगे ! चुनाव का समय है, घर लौट कर वे वोट देने भी जाते होंगे ! आपको क्या लगता है कि वे इस वैभवशाली अयोध्या को भूल पाएंगे ? सैंकड़ों सालों के बाद बने इस मंदिर में पहुंच, ऐसी भव्यता को देख, पुराने इतिहास को याद कर, क्या वे उन लोगों को वोट देंगे जो राम के अस्तित्व को ही नकार रहे थे ? उन लोगों को क्षमा करेंगे जो अयोध्या में मंदिर की जगह अस्पताल और शौचालयों को तरजीह दे रहे थे ?  सनातन धर्म को गाली दे रहे थे.........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

श्रीमान खड़गे जी !  

नमस्कार !

पहले तो क्षमा चाहता हूँ यदि आपके नाम के अक्षरों को गलत लिख गया होऊँ तो ! वो क्या है ना कि देश के आधे से ज्यादा लोगों को तो आपका सही नाम ही नहीं मालूम है, कोई खरगे लिखता है तो कोई खड़गे ! आशा है मैंने ठीक लिखा होगा ! 

खैर ! कल आपने शर्त लगाई थी कि भाजपा इस बार दो सौ सीटें भी प्राप्त नहीं कर सकेगी ! ठीक है अच्छी बात है दिल बहलाने को कुछ दिनों के लिए ! पर आपने यह नहीं बताया कि यदि आप शर्त हार जाओगे तो क्या करोगे ? संन्यास ले लोगे या अध्यक्ष बने रहोगे ? अब यह अलग और सोचने की बात है कि अध्यक्ष किसके रहोगे ! 

चलिए छोड़िए यह शर्त-वर्त की कल्पना, यथार्थ को देखते हैं ! आप इतने बड़े नेता हैं, आपको तो देश-दुनिया की पूरी खबर रहती होगी ! इसलिए शायद आपको पता ही होगा कि नवनिर्मित राम मंदिर में देश के हर कोने से रोजाना लाखों लोग दर्शन करने आ रहे हैं ! जाहिर है वहां से वे अपने घरों को भी लौटते होंगे ! चुनाव का समय है, घर लौट कर वे वोट देने भी जाते होंगे ! आपको क्या लगता है कि वे इस वैभवशाली अयोध्या को भूल पाएंगे ? सैंकड़ों सालों के बाद बने इस मंदिर में पहुंच, ऐसी भव्यता को देख, पुराने इतिहास को याद कर, क्या वे उन लोगों को वोट देंगे जो राम के अस्तित्व को ही नकार रहे थे ? उन लोगों को क्षमा करेंगे जो अयोध्या में मंदिर की जगह अस्पताल और शौचालयों को तरजीह दे रहे थे ?  सनातन धर्म को गाली दे रहे थे ? इस सच्चाई से मुंह मत फेरिएगा नाहीं बुरा मत मानिएगा, सिर्फ सोच के देखिएगा !

एक आदमी ने, नाम तो आप जानते ही हैं, थाली बजाने को कहा, लोग कटोरी-चम्मच तक बजाने लगे ! कोरोना के समय उसने डॉक्टरों का सम्मान करने को कहा, लोग उन पर फूल बरसाने लगे ! उसने एक दिया जलाने को कहा, लोगों ने दीयों की कतार लगा दी ! विश्व-रिकॉर्ड बना दिया ! हालांकि वह भी जानता था और जनता भी कि दिए के जलने से कोरोना नहीं जाएगा, पर यह एक तरह से लोगों को तनाव से बाहर लाने का उपक्रम था ! गहरी मुसीबत में एक आसरे का सहारा सा देने की इच्छा थी ! दूसरी तरफ आपने सिर्फ उसका उपहास किया, मजाक बनाया, गालियां दीं ! कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! इतिहास से भी सबक नहीं लिया जो चीख-चीख कर बताता रहा है कि देश के आमजन को, आवाम को, किसी की लगातार बेकद्री कभी भी रास नहीं आती ! 

लगे हाथ एक और परिक्षण कर लेते हैं ! इसी बात पर आप का आकलन भी हो जाएगा ! उसके कहने पर तो थाली, कटोरी, फूल, दिया सब हो गया ! राम लहर चल ही रही है, अब आप एक बार आह्वान कीजिए कि अमुक तारीख पर, अमुक समय देश के सभी लोग सिर्फ ग्यारह बार श्री राम का नाम जपेंगे ! देखिए कितने लोग आते हैं ! दूध का दूध, चार सौ का चार सौ हो जाएगा !    

मेरी किसी बात को अन्यथा मत लीजिएगा ! यह सब किसी पूर्वाग्रह या दुर्भावना से नहीं कहा गया है ! खेद होता है जब व्यक्तिगत स्पर्धा देश के विरुद्ध जाने लगती है ! पढ़े-लिखे लोगों को एक दूसरे के प्रति हलके शब्दों का सहारा लेते देखना पड़ता है ! अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण देश-समाज को बांटने की बात होने लगती है ! सच कहता हूँ, बहुत दुःख होता है.............!    

:

आपका ही एक देशवासी 

गगन 

बुधवार, 20 सितंबर 2023

घुटने में अभी भी हेड़ेक है

अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई, कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था, तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था इसमें पूरी सच्चाई निहित थी........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बात कुछ दिनों पहले की है ! दोपहर करीब दो बजे का समय था ! रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं ! सो उनका आनंद लेने के लिए पैदल ही ऑफिस से घर की ओर निकल पड़ा ! यही बात इंद्रदेव को पसंद नहीं आई कि एक अदना सा इंसान उनसे डरने की बजाय खुश हो रहा है ! बस, फिर क्या था ! उन्होंने उसी समय अपने सारे शॉवरों का मुंह एक साथ पूरी तरह खोल दिया। अचानक आए इस बदलाव ने मुझे अपनी औकात भुलवा मुझसे सौ मीटर की दौड़ लगवा दी ! उस समय तो कुछ महसूस नहीं हुआ, पर रात गहराते ही घुटने में दर्द ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी !  जिसने मेरे नजरंदाजी रवैये के कारण अगले कुछ दिनों का अवकाश लेने पर मजबूर कर दिया ! पर इलाज करने और मर्ज बढ़ने के मुहावरे को मद्दे नजर रख, मैंने किसी ''डागदर बाबू'' को अपनी जेब की तलाशी नहीं लेने दी ! जुम्मा-जुम्मा करते 12-13 दिन हो गये पर दर्द महाशय घुटने के पेचो-ख़म में ऐसे उलझे कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे थे ! 
अब जैसा कि रिवाज है, तरह-तरह की नसीहतें, हिदायतें तथा उपचार मुफ्त में मिलने शुरू हो गए ! अधिकाँश सलाहें तो दोनों कानों में आवागमन की सुविधा पा हवा से जा मिले, पर कुछ अपने-आप को सिद्ध करने के लिए, दिमाग के आस-पास तंबू लगा बैठ गए ! सर्व-सुलभ उपायों को आजमाया भी गया ! ''फिलिप्स'' की लाल बत्ती का सेक भी दिया गया ! अपने नामों से मशहूर मलहमें भी खूब पोती गईं ! सेंधा नमक की सूखी-गीली गरमाहट को भी आजमाया गया,पर हासिल शून्य बटे सन्नाटा ही रहा ! फिर आए बाबा रामदेव अपनी ''पीड़ांतक" ले कर, उससे कुछ राहत भी मिली, हो सकता है कि शायद अब तक दर्द भी एक जगह बैठे-बैठे ऊब गया हो ! वैसे उसे और भी घुटने-कोहनियां देखनी होती हैं ! खाली-पीली मेरे यहां जमे रह कर उसकी दाल-रोटी भी तो नहीं चलने वाली, सो अब पूर्णतया तो नहीं पर काफी कुछ आराम है। 
अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था, इसके पीछे पूरी सच्चाई निहित थी !सवाल उठता है, कैसे ? तो जनाब, इन 12-13 दिनों में बहुत कोशिश की ! बहुतेरा ध्यान लगाया ! हर संभव-असंभव उपाय कर देख लिया पर एक अक्षर भी लिखा ना जा सका। जिसका साफ़ मतलब था कि यह सब करने का जिसका जिम्मा है वह तो हालते-नासाज को लिए घुटने में बैठा था  १ इस हालत में वह अपनी चोट संभालता कि मेरे अक्षरों पर ध्यान देता ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि कभी, किसी के घुटने में दिमाग का जिक्र आए तो उसे हलके में मत लें ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 9 अगस्त 2023

सच्चाई का बीज पनपता जरूर है

सच्चाई का बीज ! उसे चाहे कितनी भी  गहराई में क्यों न दबा दिया जाए, परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, सतह चाहे कितनी भी कठोर हो, वह पनपता जरूर है। हो सकता है इसमें समय लग जाए पर वह दफन नहीं होता और असत्य को अपनी करनी का फल भोगना ही पडता है। इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जीवन को तरह-तरह से परिभाषित किया गया है। कोई इसे प्रभू की देन कहता है, कोई सांसों की गिनती का खेल, कोई भूल-भुलैया, कोई समय की बहती धारा तो कोई ऐसी पहेली जिसका कोई ओर-छोर नहीं। कुछ लोग इसे पुण्यों का फल मानते हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसे पापों का दंड समझते हैं। 

कोई चाहे कितना भी इसे समझने और समझाने का दावा कर ले, रहता यह अबूझ ही है। यह एक ऐसे सर्कस की तरह है जो बाहर से सिर्फ एक तंबू नज़र आता है पर जिसके भीतर अनेकों हैरतंगेज कारनामे होते रहते हैं। ऐसा ही एक कारनामा है इंसान का सच से आंख मूंद अपने को सर्वोपरि समझना।
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ad'
आँख की शल्य-चिकित्सा का बेहतरीन संस्थान 
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इंसान जब पैदा होता है तो अजब-गजब भविष्य-वाणियों के बावजूद कोई नहीं जानता कि वह बडा होकर क्या बनेगा या क्या करेगा, पर यह निर्विवादित रूप से सबको पता रहता है कि उसकी मौत जरूर होगी। इतने बडे सत्य को जानने के बाद भी इंसान इस छोटी सी जिंदगी में तरह-तरह के हथकंडे अपना कर अपने लिए सपनों के महल और दूसरों के लिए कंटक बीजने में बाज नहीं आता। कभी कभी अपने क्षण-भंगुर सुख के लिए वह किसी भी हद तक गिरने से भी नहीं झिझकता। लोभ, लालच, अहंकार, ईर्ष्या उसके ज्ञान पर पर्दा डाल देते हैं। वह अपने फायदे के लिए किसी का किसी भी प्रकार का अहित करने से नहीं चूकता। वह भूल जाता है कि बंद कमरे में बिल्ली भी अपनी जान बचाने के लिए उग्र हो जाती है। मासूम सी चिडिया भी हाथ से छूटने के लिए चोंच मार देती है। नीबूं से ज्यादा रस निकालने की चाहत उसके रस को कडवा बना डालती है। यहां तक कि उसे भगवान की उस लाठी का डर भी नहीं रह जाता जिसमें आवाज नहीं होती। उस समय उसे सिर्फ और सिर्फ अपना हित नजर आता है। असंख्य ऐसे उदाहरण हैं कि ऐसे लोगों को उनके दुष्कर्म का फल मिलता भी जरूर है पर विडंबना यह है कि उस समय उन्हें अपनी करतूतें याद नहीं आतीं। 

ऐसे लोगों के कारण मानव निर्मित न्याय व्यवस्था भी अब निरपेक्ष नहीं रह गयी है। कोई कितना भी कह ले कि हम मानव न्याय का सम्मान करते हैं तो सम्मान भले ही करते हों मानते नहीं हैं। उसमें इतने छल-छिद्र बना दिए गये हैं कि आदमी कभी-कभी बिल्कुल बेबस, लाचार हो जाता है अन्याय के सामने। न्याय को पाने के लिए समय के साथ-साथ पैसा पानी की तरह बहता तो है पर मिली-भगत से उसका हश्र भी वैसा ही होता है जैसे शुद्ध पीने का पानी गटर में जा गिरे। यूंही किस्से-कहानियों में या फिल्मों में न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं बनाया जाता। ज्यादातर झूठ तेज तर्रार वकीलों की सहायता से सच को गलत साबित करने में सक्षम हो जाता है। सच कहीं दुबक जाता है झूठ के विकराल साये में। सामने वाला इसे अपनी जीत समझने लगता है, भूल जाता है समय चक्र को, भूल जाता है इतिहास को, भूल जाता है अपने ओछेपन को। पर सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए, असत्य को अपनी करनी का फल भोगना जरूर पडता है। इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है।
और फिर अंजाम कुछ ऐसा होता है कि..........!

रविवार, 5 दिसंबर 2021

कुछ तो है, जो समझ से बाहर है

अचानक देश के दक्षिणी भाग से, दक्षिण अफ्रीका से आया एक आदमी खतरे का वायस बन जाता है ! सवाल यहीं से सर उठाता है कि जब सारी दुनिया खबरदार थी ! सभी जगह कड़ी एहतियात बरती जा रही थी तो वह शख्स भारत कैसे पहुंचा ? क्या जहाज पर चढ़ते समय उसकी चेकिंग नहीं हुई ? यदि उस समय वह ठीक था तो क्या यात्रा के दौरान वह संक्रमित हुआ ? हुआ तो कैसे ? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या वह अकेला ही बीमार हुआ ? सच्चाई क्या है, आम जनता को कोई भी बताना नहीं चाहता, अपने-अपने स्वार्थों के तहत .........!      

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ तो है..! कुछ ऐसा, जिसका एहसास तो हो रहा है पर साफ-साफ समझ नहीं आ रहा ! महामारी के दो सालों बाद, जब लग रहा था कि दुनिया की दिनचर्या फिर ढर्रे पर आ रही है, सब कुछ, कुछ-कुछ नॉर्मल हो रहा है, तभी फिर एक नई डरावनी खबर संसार पर तारी होने लगती है, एक नए नाम और व्यवहार के साथ ! शुरुआत तो कोरोना की भी ऐसे ही हुई थी ! पर तब दुनिया उससे बिलकुल अनजान थी ! कोई राह नहीं थी ! कोई इलाज नहीं था ! अँधेरे में हाथ-पैर मार कर किसी तरह पार पाया गया था ! पर अब तो देश-दुनिया सभी के सचेत रहते, फिर कैसे खतरा मंडराने लगा !!

मजे की बात यह कि इस ज्यादा खतरनाक और तेज नए अवतार से पीड़ित व्यक्ति दो ही दिन में ठीक हो बैडमिंटन भी खेलने लगता है ! अब जो धुंधली तस्वीर बनती है, उसे कोई भी साफ करने की जहमत नहीं उठाता ! सिर्फ डराने पर जोर दिया जाता है

अचानक देश के दक्षिणी भाग से, दक्षिण अफ्रीका से आया एक आदमी खतरे का वायस बन जाता है ! सवाल यहीं से सर उठाता है कि जब सारी दुनिया खबरदार थी ! सभी जगह कड़ी एहतियात बरती जा रही थी तो वह शख्स भारत कैसे पहुंचा ? क्या जहाज पर चढ़ते समय उसकी चेकिंग नहीं हुई ? यदि उस समय वह ठीक था तो क्या यात्रा के दौरान वह संक्रमित हुआ ? हुआ तो कैसे ? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या वह अकेला ही बीमार हुआ ? वैसे ही फिर खबर आती है कि अमेरिका से आए दो कोरोना पॉजिटिव देश के मध्य तक पहुँच गए ! क्या अमेरिका, जो महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा था, वहाँ भी लापरवाही बरती जा रही है ? क्या वहाँ यात्रियों का परिक्षण नहीं किया जाता ? उस पर भारत आने पर क्या उनकी जांच नहीं हुई ? यदि सब ठीक था, तो वे कहां और कैसे संक्रमित हुए ?   


ये तो बाहर से आए लोगों की बात थी ! अपने ही देश में उसी दक्षिणी भाग से फिर एक व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है ! वह तो कहीं बाहर भी नहीं गया था ! तो क्या जीवाणु यहां पहले से मौजूद था ? यदि हाँ, तो क्या वह कोरोना की पारी खत्म होने का इन्तजार कर रहा था कि वह हटे तो मैं आऊँ ! या फिर उस अकेले आदमी की प्रतिरोधक क्षमता ही सबसे कमजोर थी ! वैसे इन जीवाणुओं को दक्षिण का डोसा-सांभर ही क्यूँ सुहाता है ! जो वहीं से अपना शिकार चुनते हैं ! मजे की बात यह कि इस ज्यादा खतरनाक और तेज नए अवतार से पीड़ित व्यक्ति दो ही दिन में ठीक हो बैडमिंटन भी खेलने लगता है ! अब जो धुंधली तस्वीर बनती है, उसे कोई भी साफ करने की जहमत नहीं उठाता ! सिर्फ डराने पर जोर दिया जाता है ! सच्चाई क्या है आम जनता को कोई भी बताना नहीं चाहता, अपने-अपने स्वार्थों के तहत !

पिछले दिनों क्रिकेट के मैचों के दौरान खचाखच भरे स्टेडियम में बिना मास्क और दूरी बनाए बैठे लोग ! बेपरवाह नेताओं की बेतरतीब रैलियां ! दूषित वातावरण, अस्वच्छ माहौल में महीनों से रह रहे किसान ! त्योहारों के दौरान बाजार में एक दूसरे के कंधे छीलती हजारों की भीड़ ! इन सबके बावजूद कोरोना के घटते आंकड़े ! फिर अचानक सुस्त पड़े, मुद्दा-विहीन खबरिया चैनल सक्रीय हो उठते हैं, एक नए वैरिएंट ओमिक्रान का डोज पी कर !!       

विशिष्ट पोस्ट

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...