अपने मद में चूर, सारा श्रेय खुद हड़पने और सत्ता की लालसा में इस इंसान को यह भी नहीं दिखा कि सिर्फ उसे ही झाड़ पर क्यों चढ़ाया गया है ! वहां मौजूद कोई भी रंग-बिरंगा जीव, पाव दिन के लिए भी उसके साथ खड़ा होने को तैया नहीं था ! उलटे वहां दिन-रात पिकनीक मनाई जाती रही, नाच-गाना होता रहा ! सुबह-शाम दावतें उड़ती रहीं, वह भी ठीक उसकी नाक के नीचे ! उन्हें रोज तरह-तरह के व्यंजनों को भकोसता देख वह उन्हें कोसता रहा, बेबस हो गरियाता रहा, यहां तक कि शाप भी देता रहा, पर उधर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा.............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
ब हुत दिनों पहले एक फिल्म आई थी ''बीस साल बाद'' ! उस रहस्यात्मक फिल्म में खलनायक की भूमिका एक ऐसे अभिनेता ने निभाई थी, जिनकी छवि सदा नेक, प्रेमल, दयावान पात्र की रही थी। इसीलिए उन पर दर्शकों को शक नहीं होता है और फिल्म का रहस्य अंत तक बना रहता है ! पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भी कुछ ऐसा ही हुआ और उसने एक माहौल की दशा और दिशा ही बदल कर रख दी !
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| नैरेटिव स्थल |
नै रेटिव गढ़ने में विपक्ष सदा दो कदम आगे रहा है और यह सदा उसका अमोघ अस्त्र भी रहा है ! पर पिछले पखवाड़े बाजार में एक खबर चल पड़ी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में बहुत जल्द फेर-बदल होने वाला है, जिसमें दो-तीन वरिष्ठ मंत्रियों के साथ-साथ विवादित शिक्षा मंत्री की विदाई भी तय है ! सबसे पहले यह खबर एक ऐसे चैनल से आई, जिसकी विश्वसनीयता पर कभी किसी को कोई संदेह नहीं रहा ! फिर यह खबर कुछ अन्य यू-ट्यूब चैनलों पर भी वायरल हो गई ! ऐसा माहौल बन गया कि फेर-बदल अब हुआ ही हुआ !
| अभिशप्त ? |
ऐसे सुनहरे मौके पर चूक न हो जाए, इसलिए वांग, सारा श्रेय लेने के लिए दिल्ली आ धमका और बिना किसी के कहे खुद ही आमरण अनशन का ऐलान कर दिया ! उसे लगा था कि उधर ''वह'' हटा और इधर ''ये'' अन्ना बना ! अपनी अति मत्वाकांक्षाओं, अहम और विदेशी आकाओं की शह से भ्रमित हो वह अपनी पिछली करतूतों, बयानों, कारस्तानियों को तो भूला ही, साथ ही दस-बारह सालों में देश में चली जा रही सटीक शतरंजी चालों से भी सबक ना ले, उन्हें बिलकुल नजरंदाज कर बैठा ! नतीजा सामने था ! अब ना उगलते बन रहा था, ना हीं निगलते !
| भ्रमजाल |
जं तर-मंतर के जादूई मायाजाल में फंसे इस बंदे को यह नहीं दिखा और ना हीं समझ आया कि क्यों दसियों विपक्षी पार्टियां इस तथाकथित नौटंकी रूपी मुहिम से किनारा किए हुए हैं ? क्यों नहीं तिकड़म में महारत हासिल किए हुए नेतागणों ने इस मौके का फायदा उठाने के लिए, खुद ना सही, अपने सौ-पचास कार्यकर्ता ही यहां भेज, भीड़ बढ़ाने का छद्म प्रयास किया ? यदि इस मुद्दा-विहीन जमावड़े के प्रति जनमानस की लेश मात्र भी सहानुभूति होती, तो अभी तक तो हारे-थके, हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों ने इस अवसर को हथियाने के लिए कब का अपना झंडा-डंडा यहां गाड़ दिया होता !
| गुबार देखते रहे |
अ पने मद में चूर, सारा श्रेय खुद हड़पने और सत्ता की लालसा में इस इंसान को यह भी नहीं दिखा कि सिर्फ उसे ही झाड़ पर क्यों चढ़ाया गया है ! वहां मौजूद कोई भी रंग-बिरंगा जीव, पाव दिन के लिए भी उसके साथ खड़ा होने को तैया नहीं था ! उलटे वहां दिन-रात पिकनीक मनाई जाती रही, नाच-गाना होता रहा ! सुबह-शाम दावतें उड़ती रहीं ! वह भी ठीक उसकी नाक के नीचे ! उन्हें रोज तरह-तरह के व्यंजनों को भकोसता देख वह उन्हें कोसता रहा, बेबस हो गरियाता रहा, यहां तक कि शाप भी देता रहा, पर उधर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा !
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| बचा लो |
फिर जब कोई चारा नहीं बचा, हालत हद से गुजर गई और जान के लाले पड़ने लगे, तो किसी तरह इज्जत बचाने और यहां से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं से दुहाई की गई ! उनके कारकुनों से सोशल मीडिया पर अपील करवाई जाने लगी ! कुछ फुंके कारतूसों और भीगी दियासलाइयों ने उपस्थिति भी दर्ज भी करवाई ! पर ऐसे प्रयास अवाम के लिए प्रहसन जैसे ही रहे ! सुनने में आया है कि जल्द ही उन्हें उन्हीं जैसे लोगों द्वारा उबार लिया जाएगा !
@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार
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