सोमवार, 14 मई 2018

कभी-कभी कोई फिल्म आपके साथ घर तक चली आती है

एक दिन पहले ही आलिया की फिल्म "राजी" भी वहीँ लगी हुई थी, पुरानी लत के कीड़े ने जोर मारा ! पारिवारिक सदस्यों के सामने प्रस्ताव पेश किया तो मना किसने करना था, सारे एक से बढ़ कर एक शौकीन; पर शर्त एक ही थी कि पहले पेट-पूजा का प्रसाद ग्रहण कर ही दोबारा हॉल में प्रवेश किया जाएगा। बात तर्क-सम्मत थी, सो सर्व-सम्मति से पारित हो गयी। इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है आलिया भट्ट। इस लड़की ने इतनी कम उम्र और अपनी संक्षिप्त सी फ़िल्मी यात्रा में वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसे पाने के लिए कई अभिनेत्रियों ने अपनी जिंदगी खपा कर भी सफलता नहीं  पाई  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
फिल्मों का का खानदानी शौक तो सदा से ही रहा है। पहले तो अच्छी-बुरी, हिंदी-अंग्रेजी-बांग्ला सभी फ़िल्में देख ली जाती थीं। एकाधिक बार "मज़बूरी" में एक दिन में दो-दो फ़िल्में भी निपटानी पड़ जाती थीं। हर भाषा के हमारे अपने पसंदीदा कलाकार होते थे। धीरे-धीरे पसंदगी सिमटती गयी, फ़िल्में देखने के पहले चयनित होने लगीं, फिर हॉल-संस्कृति के खात्मे और मल्टी-प्लेक्स के युग में यह चयन और भी सख्त हो गया। याद रखने लायक, देखने की ललक पैदा करने वाली, चुनिंदा फ़िल्में बननी कम हो गयीं। पर कभी-कभी साल में दो-तीन तो ऐसी आ ही जाती हैं जिनका टी. वी. पर आने का इंतजार ना कर जा कर देखने की बनती है। 

पिछले हफ्ते शनिवार सपरिवार अमिताभ-ऋषि की "102 नॉट-आउट" देखने जाना हुआ, फिल्म ठीक-ठाक थी, पहले हाफ में कुछ सुस्त व उबाऊ होने के बावजूद अच्छी लगी। पर साथ ही यह भी सच है कि यदि ये दोनों
कलाकार ना होते तो शायद ही चल पाती। खैर फिल्म ख़त्म हुई, बाहर ना निकल परिसर में ही लौट आए। एक दिन पहले ही आलिया की "राजी" भी वहीँ लगी हुई थी, पुरानी लत के कीड़े ने जोर मारा ! प्रस्ताव पेश किया तो मना किसने करना था, सारे एक से बढ़ कर एक शौकीन; पर शर्त एक ही थी कि पहले पेट-पूजा का प्रसाद ग्रहण कर ही दोबारा हॉल में प्रवेश किया जाएगा। बात तर्क-सम्मत थी, सो सर्व-सम्मति से पारित हो गयी और सिनेमा देखने के इतिहास में पहली बार स्क्रीन के सामने पैर फैला कर बैठने की सुविधा वाली सीटों पर बैठ, गर्दन उठा, फिल्म के कलाकारों के बिल्कुल पास जा फिल्म देखी। 

फिल्म शुरू होते ही सारी कठनाइयां भूल सी गयीं। हालांकि "राजी" कोई बहुत ही असाधारण या अनोखी फिल्म नहीं है पर साधारण भी नहीं हैं ! इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है आलिया भट्ट। इस लड़की ने इतनी कम उम्र और अपनी संक्षिप्त सी फ़िल्मी यात्रा में वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसे पाने के लिए कई अभिनेत्रियों ने अपनी जिंदगी खपा कर भी सफलता नहीं पाई। आज आलिया ने हेमा, जीनत, श्रीदेवी जैसी ग्लैमर्स फिल्मों की अभिनेत्रियों के साथ-साथ शबाना, स्मिता जैसी गंभीर फिल्मों की अदाकाराओं को भी पीछे छोड़ वहीदा, नूतन व मधुबाला जैसी कलाकारों की श्रेणी हासिल कर ली है। "राजी" देख कर ही इस लड़की की "डेप्थ" का अंदाज
लगाया जा सकता है। इस कठिन रोल को उसने जिस सहजता के साथ निभाया है वो कबीले-तारीफ़ है। साथ ही इस फिल्म की निर्देशक मेघना भी बधाई की पात्र है जिसने फिल्म को इतनी तन्मयता से बनाया है जैसे कोई मूर्तिकार बुत तराशता है। हरेक कलाकार को संयमित और सहज रखते हुए उनकी कला का शत-प्रतिशत योगदान करवाया है। इसमें उसने कमाल कर दिया है। पर इसी कमाल ने फिल्म के तराजू को ज़रा सा पकिस्तान की तरफ भी झुका दिया है। कहीं-कहीं दर्शक की सहानुभूति पाक के साथ जा खड़ी होती है ! यह शायद पहली फिल्म है जिसमें कोई भी पाकिस्तानी किरदार खलनायक नहीं लगता। जो भी हो यह उस श्रेणी की फिल्म है जो ख़त्म होने पर आपके साथ घर तक चली आती है।            

गुरुवार, 3 मई 2018

काश ! हिंदी फिल्मों को सत्यजीत रे का सहारा मिला होता

अपराजितो फिल्म का एक सीन, जिसमें अपु अपनी माँ से कहता है कि उसे सुबह की ट्रेन पकड़नी है सो जल्दी उठा देना। सीधी व साधारण सी बात है कि अगले दृश्य में माँ, सुबह हो गयी है, अपु उठो कह कर जगा देती। पर उस गरीबी के मारे परिवार में घडी कहाँ थी ! सुबह कब और कितने बजे ट्रेन है कैसे पता चले ? इसलिए रात को अपु "जंत्री" देख कर माँ को बतलाता है कि सुबह सूर्य 5.45 पर उगेगा, उसके साथ ही मुझे उठा देना,,,,,,,,
#हिन्दी_ब्लागिंग  
समय के साथ-साथ इंसान के सोच-विचार, पसंद-नापसंद इत्यादि में फर्क आता चला जाता है। चीजों को गहराई और गंभीरता से देखने समझने की कोशिश होने लगती है। कलकत्ता (तब का) निवास के दौरान बांग्ला
साहित्य और फ़िल्में देखने का काफी सुयोग मिला करता था। वहाँ निर्माता-निर्देशक सत्यजीत रे और नायक उत्तम कुमार के आस-पास भी किसी को नहीं समझा जाता था। पर मुझे सदा ही फिल्म निर्देशक तपन सिन्हा ज्यादा प्रिय थे। कारण यही था कि सत्यजीत जी की फ़िल्में यथार्थवादी होने के कारण कुछ दर्द और धीमापन लिए चलती थीं। शायद उनहोंने भी इसे समझते हुए "गुपि गाईंन बाघा बाईंन" जैसी हल्की-फुल्की फ़िल्में बनाईं।पर तपन सिन्हा की हर फिल्म में संदेश के साथ-साथ मनोरंजन भी खूब होता था। उनकी फिल्मों का हिंदी रूपांतर भी खूब हुआ जैसे काबुलीवाला, अतिथि, आपनजन, सगीना महतो, हाटे बाजारे इत्यादि। उस समय गंभीर फिल्मों के लिए समझदानी भी छोटी ही थी।   
पाथेर पांचाली 
बनारस के घाट पर अपराजितो 


अपुर सोंसार
यह संयोग ही था कि दो मई, सत्यजीत रे की जयंती के तीन-चार दिन पहले ही उनकी पहली फिल्में अपु-त्रयी (Apu-Trilogy) पाथेर पांचाली, अपराजितो और अपुर सोंसार फिर देखीं, दो दिन में एक साथ-लगातार। वर्षों पहले साल-साल भर के अंतराल में देखने और एक साथ देखने में बहुत फर्क था। क्योंकि यह अपु नाम के बालक के बचपन, युवावस्था व बड़े हो दुनियादारी की कहानी है जो एक साथ देखने पर अपनी अलग छाप छोड़ती हैं।  इसीलिए अबकी हफ्ते भर तक दिलो-दिमाग में छाई रहीं। छोटी-छोटी चीज पर उनकी पैनी नजर, हर छोटे-बड़े अदाकार के अभिनय को महत्व, हर टेक पर मजबूत पकड़, समय-काल का पूरा ध्यान और उसके अनुरूप दृश्य व घटना चक्र, सब का समग्र प्रभाव दर्शक को मंत्रमुग्ध कर बांधे रखता है। हिंदी में उन्होंने सिर्फ एक ही फिल्म बनाई थी "शतरंज के खिलाड़ी" जिसका फिल्मों में अपना ही एक स्थान है। 
शतरंज के खिलाडी 

अमजद को दृश्य समझाते हुए 
उनकी की सूक्ष्म दृष्टि का उदहारण है, अपराजितो फिल्म का एक सीन, जिसमें अपु अपनी माँ से कहता है कि उसे सुबह की ट्रेन पकड़नी है सो जल्दी उठा देना। सीधी व साधारण सी बात है कि अगले दृश्य में माँ, सुबह हो गयी है, अपु उठो कह कर जगा देती। पर उस गरीबी के मारे परिवार में घडी कहाँ थी ! सुबह कब और कितने बजे ट्रेन है कैसे पता चले ? इसलिए रात को अपु "जंत्री" देख कर माँ को बतलाता है कि सुबह सूर्य 5.45 पर उगेगा, उसके साथ ही मुझे उठा देना ! इसी तरह एक जगह कपडे सुखाने के लिए जो अलगनी लगाई गयी थी वह एकदम नई थी। शॉट लेने के पहले मुआइना करते समय रे महोदय की नजर उस पर पड़नी ही थी, तुरंत उसे बदलवा कर जीर्ण-शीर्ण रस्सी का इंतजाम कर शॉट लिया गया। इस बाबत पूछने पर उनका कहना था कि दर्शकों का ध्यान जाए ना जाए पर जिस परिवार को दो जून का भोजन जुटाना भी समस्या हो वह नई अलगनी कहाँ से लाएगा। यह है निर्देशक की खूबी ! उनकी छाप, उनकी पकड़, उनकी खासियत, उनका अपने विषय में ज्ञान, उनका नजरिया उनकी हर फिल्म के एक-एक फ्रेम पर साफ़ दृष्टिगोचर होता है। ऐसे ही उनकी गिनती विश्व के अग्रणी फिल्म निर्देशकों में नहीं होती। जब उन्हें फिल्म संसार को योगदान देने के उपलक्ष्य में ऑस्कर देने की घोषणा हुई तो वे अपनी बिमारी के चलते अस्पताल में होने के कारण वहाँ जाने से मजबूर थे तो ऑस्कर कमिटी ने उन्हें वहीँ आ कर सम्मानित किया और पुरस्कार से नवाजा। ऐसा ऑस्कर के इतिहास में पहली बार हुआ था और यही सत्यजीत रे की विश्व में साख को जाहिर करता है। उनकी 97वीं जयंती पर श्रद्धांजलि !

विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...