मंगलवार, 29 सितंबर 2020

भास्कर के स्तंभकार

यह समय कोई साठ या सत्तर के दशक का नहीं है, जब फिल्म प्रेमी स्क्रीन, फिल्मफेयर, माधुरी या शमा जैसी फ़िल्मी पत्रिकाओं में छपी ख़बरों से ही अपनी जिज्ञासा शांत कर लेते थे ! अपने चहेते कलाकारों पर इतना विश्वास था कि पत्रिकाओं में लिखी सच्ची-झूठी बातों को ही पत्थर की लकीर समझ लिया जाता था, बिना यह जाने कि कलाकार जो चाहता था वही लिखा जाता है ! पर आज दर्शकों और फिल्म प्रेमियों के पास जानकारी जुटाने के अनगिनत साधनों के कारण सिर्फ अच्छाई ही नहीं सच्चाई भी सामने आने लगी है ! इस बात का हर फ़िल्मी लेखक को ध्यान रखना जरुरी है यदि ऐसा नहीं होता है तो मीडिया के साथ जो ''बिकाऊ विशेषण'' जोड़ दिया गया है उसको और हवा ही मिलेगी .....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

दैनिक भास्कर के ''आपस की बात'',  ''परदे के पीछे'' और ''मैनेजमेंट फंडा'' उत्कृष्ट और जानकारी युक्त स्थाई स्तंभ रहे हैं। पसंद भी बहुत किए जाते रहे हैं। क्योंकि बिना किसी लाग-लपेट अपने-अपने क्षेत्र की सीधी-सच्ची जानकारी प्रस्तुत करते रहे हैं। पर अब जहां आपस की बात फिल्मों का एक तरह से प्रमाणिक दस्तावेज का रूप ले चुका है ! मैनेजमेंट फंडा अपने सकारात्मक विचारों, बातों और जानकारियों के साथ दिन प्रति दिन लाजवाब होता चला जा रहा है ! जिसके मुकाबले उस जैसे विषय पर शायद ही कोई आर्टिकल खड़ा रह पाता हो ! वहीं बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि परदे के पीछे का लेखन किसी दुविधा, पूर्वाग्रह व नकारात्मकता के वशीभूत हो दिन पर दिन कुंठाग्रस्त होता चला जा रहा है ! ऐसा लगने लगा है कि लेखक को हर सफल चीज से नफ़रत है ! उनकी अपनी भूतकालीन विफलताएं अब लेखन पर हावी होती जा रही हैं ! इधर तो तकरीबन हर दूसरे-तीसरे अंक में गलत जानकारियां थोप दी जा रही हैं ! फिर वह चाहे किसी फिल्म के सीन का जिक्र हो, किसी फिल्म की कथावस्तु हो या फिर किसी प्रोग्राम की शुरआत की जानकारी ! फिल्मों और फ़िल्मी कलाकारों से संबंधित इस स्तंभ का समापन, बिना व्यवस्था को कोसे नहीं किया जाता ! जबकि इस लोकप्रिय पत्र को पढ़ने वाले हर तरह के लोग हैं !    

यह समय साठ या सत्तर के दशक का नहीं है, जब फिल्म प्रेमी स्क्रीन, फिल्मफेयर, माधुरी या शमा जैसी फ़िल्मी पत्रिकाओं में छपी ख़बरों से ही अपनी जिज्ञासा शांत कर लेते थे ! अपने चहेते कलाकारों पर इतना विश्वास था कि पत्रिकाओं में लिखी सच्ची-झूठी बातों को ही पत्थर की लकीर समझ लिया जाता था, बिना यह जाने कि कलाकार जो चाहता था वही लिखा जाता है ! पर आज दर्शकों और फिल्म प्रेमियों के पास जानकारी जुटाने के अनगिनत साधनों के कारण सिर्फ अच्छाई ही नहीं सच्चाई भी सामने आने लगी है ! इस बात का हर फ़िल्मी लेखक को ध्यान रखना जरुरी है ! 

पत्रकारिता का पहला फर्ज देश और समाज के प्रति बनता है ! इसलिए निष्पक्ष पत्रिकारिता के लिए यह जरुरी है कि अपनी सोच, अपनी पसंदगी, अपने हानि-लाभ को दरकिनार कर, सिक्के के दोनों पहलुओं के बारे में ईमानदारी के साथ बिना भेद-भाव के, बिना पक्षपात किए पूरा खुलासा किया जाए ! यदि ऐसा नहीं होता है तो मीडिया के साथ जो ''बिकाऊ विशेषण'' जोड़ दिया गया है उसको और हवा ही मिलेगी !   

इधर कुछ  हफ़्तों से जानी-मानी, नामचीन फिल्म लेखिका भावना सोमाया जी के स्तंभ ''टॉकिंग पाइंट'' को उपलब्ध करवाया जा रहा है ! भावना जी विदुषी हैं, अपने विषय की पूरी और गहन जानकारी रखती हैं, फिल्म जगत में अच्छी पैठ है। पर यहां भी निष्पक्ष लेखन या जानकारी का अभाव खटकता है ! चाहे वह जया जी का पक्ष हो ! चाहे करीना की बात या फिर शबाना की प्रशंसा ! 

इतिहास में किसी की सिर्फ स्तुति या खूबियों का ही वर्णन नहीं होता ! इस दस्तावेज में किसी से भी जुडी हर बात का विवरण लिखा जाता है। भावना जी लेखिका के साथ इतिहासकार भी हैं। उनसे आशा की जाएगी कि अपने विषय का स्याह और सफ़ेद दोनों का सम-भाव से, बिना भेद-भाव बरते चित्रण करें। क्या भावना जी फिल्म इंडस्ट्री की असलियत से अनभिज्ञ हैं ! सभी नहीं, पर क्या एक अच्छी-खासी तादाद द्वारा गलत काम नहीं होते ! तो फिर जया बच्चन का स्तुति गान क्यों ! क्यों उनकी भड़ास को क्रांतिकारी कदम का रूप दे दिया गया ! 

उधर करीना की बात करते हुए शायद वे भूल गईं कि जिस बात के लिए वे उसकी प्रशंसा में पुल बांधें जा रही हैं वह काम काफी अर्सा पहले नूतन कर चुकी थीं ! फिर वे डिंपल को कैसे भूल गईं, जो बेटी के जवान होने और फिल्मों तक पहुंचने के बावजूद, मुख्य किरदार निभाती रही ! उसका तो शायद यह विश्व कीर्तिमान हो कि एक ही समय में माँ (डिंपल) और बेटी (ट्विंकल} अपनी-अपनी  फिल्मों में नायिका की भूमिका निभा रहीं थीं। वैसे भी इनकी इस पसंदीदा अभिनेत्री ने अभिनय के रूप में या पर्दे पर ऐसा कुछ भी तो नहीं किया है, जो इसे विशेष सम्मान दिया जाए ! 

रही शबाना की बात तो उसके बारे में लिखते समय उसके भूत-वर्तमान का पूरा ख्याल रख कर ही उसकी उपलब्धियों का ब्योरा प्रस्तुत किया जाना चाहिए ! अवाम की यादाश्त बहुत कमजोर होती है, इसलिए लोगों को यह याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि कुछ सालों पूर्व हुए चुनावों के दौरान इस सम्मानित महिला ने किस-किस के लिए, कैसे-कैसे असम्म्मानित वाक्यों का प्रयोग किया था और अपने मनमुताबिक चुनाव परिणाम ना आने पर देश छोड़ कर चले जाने की बात कही थी। आज महिलाओं की सुरक्षा, उनके अधिकार, उनके विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते समय क्या इनके मन में एक बार भी हनी ईरानी का ख्याल आता है ! आदमी अपने गुमान में भले ही अपनी ''करनियाँ'' भूल जाए पर उसका भूत सदा उसके साथ चिपका रहता है ! 

पत्रकारिता का पहला फर्ज देश और समाज के प्रति बनता है ! इसलिए निष्पक्ष पत्रिकारिता के लिए यह जरुरी है कि अपनी सोच, अपनी पसंदगी, अपने हानि-लाभ को दरकिनार कर, सिक्के के दोनों पहलुओं के बारे में ईमानदारी के साथ बिना भेद-भाव के, बिना पक्षपात किए पूरा खुलासा किया जाए ! यदि ऐसा नहीं होता है तो मीडिया के साथ जो ''बिकाऊ विशेषण'' जोड़ दिया गया है उसको और हवा ही मिलेगी !   

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सरकारी सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो क्यों ना खर्च भी उसी से वसूला जाए

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है तो उस पर होने वाला खर्च भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग     

है ना विडंबना ! देश के तकरीबन 21 हजार वीआईपी लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 57 हजार जवान तैनात हैं। जबकि आम इंसान जो अपनी गाढ़ी कमाई के एक हिस्से से इन महानुभावों की रक्षा का खर्च उठाता है, उस जैसे साढ़े छह सौ से भी ज्यादा लोगों की देख-भाल की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ एक पुलिस वाला उपलब्ध होता है !

रोजमर्रा की जिंदगी का दवाब, परिवार की परवरिश, दो जून की रोटी, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा-दारु, खुद की हारी-बिमारी के उधड़ते तानों-बानों को सरियाने में उलझा होने के बावजूद उस आम इंसान के मन में तब और भी क्षोभ और आश्चर्य उत्पन्न हो जाता है, जब वह ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे इंसानों को सुरक्षा के घेरे में चलते देखता है ! उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनसे दूसरों को सुरक्षा की जरुरत होती है ! कुछ ऐसे धनाढ्य होते हैं, जिनके पालतू पशु भी इंसानों से बेहतर जिंदगी जीते हैं ! उनके कारवां को गुजरते देख यह भला आदमी किनारे खड़ा सोचता है कि इनको किससे सुरक्षा चाहिए और क्यूँ  ! और चाहिए तो सक्षम होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखने का उपाय खुद ही क्यों नहीं करते ! देश पर, समाज पर, सरकार पर क्यों बोझ बने हुए हैं ! और फिर सरकार ही, जो इन्हें सुरक्षा मुहैय्या करवाती है, वह इनसे इन्हें सुरक्षित रखने की कीमत क्यों नहीं वसूल करती ! यह सही है कि देश हित में जुटे लोगों को सही मायने में सुरक्षा की जरुरत होती है ! उन्हें मिलनी भी चाहिए ! वैसे समर्पित लोगों लिए तो पूरा देश अपना सब कुछ समर्पण कर सकता है। पर किसी को भी, कभी भी, किसी भी बात पर सुरक्षा दे देना तो हर किसी को नागवार गुजरता है और गुजरना चाहिए भी !  

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आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है

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हालांकि सुरक्षा किसे दी जाए या किसे मिलनी चाहिए, इसके लिए केंद्र और राज्यो में कमेटियां बनाई गई हैं, पर वहां भी रसूख और राजनीति की गहरी दखलंदाजी पैठी हुई है। वैसे ही हमारे देश में पुलिस बल बहुत कम है और ऐसे कामों से संख्या में और क़तर-ब्योंत हो जाती है ! जरुरी  कामों और जगहों में पुलिस बल की कमी आम आदमी द्वारा भी वर्षों से महसूस की जाती रही है ! ऐसे में किसी को भी सुरक्षा प्रदान कर देने वाली ख़बरें सवाल खड़े करने लगी हैं। 

करीब तीन साल पहले संसद में वीआईपी की परिभाषा पूछे जाने पर तात्कालिक गृहराज्य मंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसी कोई आधिकारिक नामावली नहीं है। इसके बावजूद इस गरीब देश में वीआईपी संस्कृति या कहिए ख़ास लोग और उनका दबदबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसी हिसाब से उनकी सुरक्षा भी बढ़ रही है। धीरे-धीरे यह सुरक्षा कम, स्टेटस सिम्बल यानी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता चला जाने लगा है ! इसीलिए इस सुविधा के हटाए जाने पर बवाल भी मचने लगे हैं ! जिन जवानों ने देश के हित, सेवा और सुरक्षा की चाह में अपना खून-पसीना एक कर, कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय किसी की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे। वह भी तब जब उस आदमी की हकीकत भी उन्हें मालुम हो ! 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है। 

मारे देश में किसी को सुरक्षा प्रदान करने की पांच श्रेणियां हैं। सबसे ऊँची श्रेणी SPG है। फिर Z+ की श्रेणी आती है। उसके बाद Z, फिर Y, और फिर X कैटेगरी का नंबर आता है। इन्हें खुफिया विभाग की सूचना और सलाह पर गृह मंत्रालय द्वारा मुहैय्या करवाया जाता है। इसकी समय-समय पर सुरक्षा समीक्षा भी की जाती है। अलग-अलग श्रेणी के हिसाब से इनमें जवानों की संख्‍या तय होती है। खतरे का आकलन कर इन श्रेणियों को पाने वाले लोगों में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, वर्तमान और पूर्व जज, वर्तमान और सेवा निवृत सरकारी अफसर, व्यापारी, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार और धार्मिक गुरु, कोई भी हो सकता है।  

SPG, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप, यह सर्वोच्च सुरक्षा श्रेणी है। इसमें पैरामिलिट्री फ़ोर्स के जवान होते हैं। फिलहाल यह सुरक्षा अभी सिर्फ प्रधान मंत्री को ही उपलब्ध है। इसकी रोज की लागत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से भी ऊपर आती है। परन्तु यदि इसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर की जाने वाली राशि से की जाए तो यह राशि उसके आस-पास भी नहीं पहुंचती, जो तकरीबन 36.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रूपए, रोज की है।

Z+, इस श्रेणी में 10 एनएसजी कमांडो सहित 36 जवान होते हैं। इसके अलावा पुलिस ऑफिसर भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होते हैं। परंतु पहला सुरक्षा घेरा एनएसजी कमांडो ही बनाते हैं। ये जवान मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित होते है और बिना किसी हथियार के भी दुश्मन से लड़ने में सक्षम होते हैं। यह सुरक्षा वीवीआईपी को उपलब्ध करवाई जाती है। परन्तु जब वह व्यक्ति राज्य से बाहर जाता है तो कुछ ही जवान उसके साथ रहते हैं, बाकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस राज्य की होती है, जहाँ वह व्यक्ति जा रहा होता है। इसके लिए दौरे की पूर्व सूचना राज्य को देनी होती है। इसका खर्च करीब एक करोड़ रूपए प्रति माह प्रति व्यक्ति का है !

Z, इसमें 22 जवान, स्थानीय पुलिस के कुछ लोग चार-पांच कमांडो होते हैं। इस पर हर माह करीब 20 लाख रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होते हैं। 

Y, इस श्रेणी में 11 जवान, स्वचालित हथियारों के साथ निजी सुरक्षा कर्मी, आवास पर पांच गार्ड के अलावा एक एस्कॉर्ट वाहन भी उपलब्ध करवाया जाता है। इन सब पर प्रति व्यक्ति करीब 12 लाख रूपए प्रति माह का खर्च आता है।  

X, इस कैटेगरी में दो सुरक्षा कर्मी और एक पीएसओ उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें कोई कमांडो नहीं होता। ऐसी व्यवस्था पर  प्रति माह करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च होते हैं।  

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो उस पर होने वाला खर्च  भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदहारण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा।   

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

सवाल पूछना हक है, तो जवाब सुनने का धैर्य भी रखिए

थापर जी यदि आपकी दृष्टि में अशोक इसलिए महान नहीं है क्योंकि उसके द्वारा लडे गए कलिंग युद्ध में एक लाख सैनिक हताहत हुए थे, तो क्या अकबर ने जो दसियों युद्ध लड़े उसमें सैनिकों से गलबहियां डाली गई थीं या उनमें कुश्ती से फैसला हुआ था ! उसमें मरे सैनिकों की मौत क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखती  ? आपकी कसौटी के अनुसार तो फिर उसे भी महान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा लडे गए युद्धों में मरने वाले सैनिकों की संख्या  कहीं ज्यादा थी .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जब सफलता, सम्मान और प्रतिष्ठा कुछ लोगों के सर पर पालथी मार कर जम जाते हैं, तब उन्हें संभालना सब के बस की बात नहीं रह जाती ! ऐसे में उन्हें हर इंसान गौण नजर आने लगता है। अपनी अक्ल और ज्ञान के गुमान के सामने उन्हें दूसरों की हर बात गलत लगने लगती है। इनके विचार, इनके ख्याल, इनकी मान्यताएं इनकी अपनी श्रेष्ठता की भावना के साथ घुल-मिल कर इनके दिलो-दिमाग पर बुरी तरह काबिज हो इन्हें विवेकहीन बना डालती हैं। इन्हें अच्छे-बुरे, सही-गलत का भान ही नहीं हो पाता। या कहा जाए तो दूसरों की बात काट कर ऐसे लोग अपने आप को बेहतर साबित कर आत्मसुख की अनुभूति करने लगते हैं। ऐसा इंसान यदि पत्रकार हो तो वह करेले के स्वाद सरीखा हो जाता है और यदि खुदा ना खास्ता संपन्न पृष्ठभूमि से हो तब तो ''वह'' कहावत भी चरितार्थ हो जाती है ! आजकल ऐसे बहुतेरे अखबारनवीस बोलने की आजादी की आड़ का गलत फ़ायदा उठा, किसी पर भी कुछ भी छींटाकसी कर अपनी दूकान चलाने में मशगूल हैं।  

स्वतंत्रता के बाद भी देश में एक जमात ऐसी बची रह गई, जो कभी भी अंग्रेजियत के मोह से उबर नहीं पाई ! इनमें से ज्यादातर की तालीम कॉन्वेंटों में उस भाषा हुई, जो दुनिया के सिर्फ चार-या पांच देशों की भाषा है या फिर हमारे और पाकिस्तान जैसे कुछ गुलाम मानसिकता वाले देशों की ! जहां वही पढ़ाया-सिखाया जाता था जिसमें अंग्रेजों की सहूलियत और मर्जी होती थी ! इतिहास भी उनके अनुसार ही चलता चला आ रहा है, जो विदेशियों द्वारा अपने आकाओं की स्तुति में लिखा गया ! जिसमें आक्रांताओं को नायक बनाया गया, देश के वीरों को बदनामी सौंपी गई ! दशकों तक ऐसी ही विचारधारा देश के सिंहासन पर भी काबिज रही ! आज जब सच्चाई पर से सैंकड़ों सालों से जमा धूल को हटाए जाने की कोशिश हो रही है, तो उस विचारधारा द्वारा पोषित कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, जो अब तक अपना एक गुट बना चुके हैं और जिनका एकमात्र एजेंडा सिर्फ विरोध का है, उन्हें यह सब नागवार गुजरने लगा ! 

अभी पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री आदित्यनाथ योगी जी ने बताया कि आगरा में निर्माणाधीन मुगल म्यूजियम, छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर स्थापित होगा। उन्होंने कहा कि गुलामी की मानसिकता के प्रतीक चिन्हों को छोड़, राष्ट्र के प्रति गौरवबोध कराने वाले विषयों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। हमारे नायक मुगल नहीं हो सकते ! शिवाजी महाराज हमारे नायक हैं, इसलिए यह म्यूजियम छत्रपति शिवाजी के नाम पर होगा।   

इस बात पर कुछ लोगों का भड़कना लाजिमी था। ऐसा ही एक नाम है करन थापर का। जो मुख्य मंत्री को उनका काम समझाने में आ जुटे। उनके अनुसार मुख्य मंत्री के पास हमें शासित करने का अधिकार हो सकता है लेकिन हमारे मूल्यों को निर्धारित करने और हमारे आदर्शों को आकार देने का नहीं। यह उनकी ओर से अहंकार है कि हमें यह बताएं कि किसको देखना है और हमारे अतीत के शासकों को महान मानना ​​है। उनका काम सिर्फ गवर्नमेंट चलाना है, हमारे मूल्यों और हमारे आदर्शों के बारे में दखलंदाजी का नहीं ! ये महाशय आगे कहते हैं कि हालाँकि मैं योगी को नहीं जानता (?) फिर भी मैं एक कदम आगे जाऊँगा। मुझे संदेह है कि उनके सवाल से या तो पूर्वाग्रह या अज्ञानता का पता चलता है, संभवतः दोनों। अगर मैं सही हूं, तो यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है और एक मुख्यमंत्री के रूप में असंतुलित है। 

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मुझे या मुझ जैसों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विचार क्या है या आपका चहेता कौन है ! आप जैसों की पसंद-नापसंद से भी हमें कोई लेना-देना नहीं है ! ना हीं हम जैसों को आप लोगों के अकबर, हुमायूं या औरंगजेब जैसों को नायक मानने से कोई दिक्कत है ! क्योंकि इस देश में हर इंसान को, बोलने की आजादी के दुष्परिणाम देखते हुए भी, अपनी बात कहने-मानने का पूरा हक़ दिया गया है ! परन्तु यदि पूर्वाग्रहों से ग्रसित और कुंठित हो अपनी ही बात का औचित्य ठहराते रहेंगे, तब दिक्कत आएगी और फिर जवाब तो देना ही पडेगा  !

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इसके बाद थापर जी अपनी पसंद बताते हुए अकबर का नाम लेते हैं जो उनके अनुसार देश का और उनका सर्वकालीन महान शासक था और रहेगा ! फिर योगी जी की अकबर के बारे में जानकारी बढ़ाने हेतु अपने जैसी एक लेखिका इरा मुखोटी का उद्धहरण  देते हुए अकबर की दसियों खूबियां भी गिनाते हैं। पर कहीं ना कहीं उनको दाढ़ी में तिनके का आभास जरूर होता है जिसकी वजह से उनको सम्राट अशोक का नाम लेना पड़ जाता है पर तुरंत उस नाम को इसलिए नापसंद कर खारिज भी कर देते हैं क्योंकि उसने कलिंग के युद्ध में एक लाख के ऊपर सैनिकों की ह्त्या की थी ! 

ऐसे लोग एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सिर्फ सवाल पूछना पसंद करता है ! कोई इनसे पलट कर कुछ पूछ ले तो इन सब की भृकुटियां तन जाती हैं ! इन्होंने योगी जी से अनेकों सवाल पूछे ! पर क्या ये कुछ सवालों का जवाब देंगे ! इन्होंने जिस विस्तार से अकबर की बात की है क्या उतनी गहराई से अशोक को पढ़ा है ? अकबर तो भारत तक में ही सिमित रहा, उस पर भी पूरा राज नहीं कर पाया ! जबकि अशोक ने ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया। विदेशों तक में बौद्ध धर्म की अहिंसा का ज्ञान फैलाया ! अशोक तो फिर भी कलिंग के युद्ध के बाद शांतिप्रिय हो गया था पर अकबर को युद्धों में लिप्त रहना ही पड़ा था ! अशोक ने अपने पुत्रों को दूसरे देशों में अहिंसा और ज्ञान के प्रसार के लिए भेजा, जबकि अकबर के बेटे-पोते आपस में ही लड़ने मरने में लगे रहे। थापर जी यदि आपकी दृष्टि में अशोक इसलिए महान नहीं है क्योंकि उसके द्वारा लडे गए कलिंग युद्ध में एक लाख सैनिक हताहत हुए थे, तो क्या अकबर ने जो दसियों युद्ध किए उसमें सैनिकों से गलबहियां डाली गई थीं या उनमें कुश्ती से फैसला था ? उसमें मरे सैनिकों की मौत क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखती ? आपकी कसौटी के अनुसार तो फिर उसे भी महान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा लडे गए युद्धों में मरने वाले सैनिकों की संख्या  कहीं ज्यादा होगी !  

मुझे या मुझ जैसों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विचार क्या है या आपका चहेता कौन है ! आप जैसों की पसंद-नापसंद से भी हमें कोई लेना-देना नहीं है ! ना हीं हम जैसों को आप लोगों के अकबर, हुमायूं या औरंगजेब जैसों को नायक मानने से कोई दिक्कत है ! क्योंकि इस देश में हर इंसान को, बोलने की आजादी के दुष्परिणाम देखते हुए भी, अपनी बात कहने-मानने का पूरा हक़ दिया गया है ! परन्तु यदि पूर्वाग्रहों से ग्रसित और कुंठित हो अपनी ही बात का औचित्य ठहराते रहेंगे, तब दिक्कत आएगी और फिर जवाब तो देना ही पडेगा  !

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

क्या और क्यों होता है अधिकमास

भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किया था । परंतु सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुए इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता राजी नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का अधिपति बन, इसका भार वहन कर इसे सुचारु रूप दें।भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि अपना एक नाम पुरुषोत्तम भी इसे दे दिया ! इस तरह यह मासिक समय पुरुषोत्तम मास भी कहलाया जाने लगा.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अपने जीवन, कार्यकलाप, गणना, गतिविधि, प्रबंधन को सुचारु रूप से संचालित, प्रमाणिक व व्यवस्थित करने के लिए इंसान ने समय की कल्पना की, जिसकी ना कोई शुरुआत थी और ना ही कोई अंत ! जो सिर्फ आगे की ओर चलता है कभी भी पीछे की ओर नहीं लौटता ! मानव ने उसे अमली जामा पहनाया तो जरूर ! परंतु अस्तित्व में आने के बाद लाख कोशिशों के बावजूद वह किसी के हाथ नहीं आया ! कोई किसी भी तरह उसे बांध नहीं पाया। इसीलिए पूरे संसार में उसकी गति संबंधी गणनाओं में फेर-बदल करने पड़ते रहते हैं ! जिनका परिणाम कभी लीप ईयर के रूप में सामने आता है तो कभी अधिकमास  के रूप में, जिसे  पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। यह एक अनोखा संयोग ही है कि ये दोनों गणनाएं एक साथ इसी साल, यानी 2020 में हो रही हैं। ऐसा संयोग 160 साल के बाद बन पाया हैै। 

यूरोपीय कैलंडर के अनुसार, लीप ईयर उस वर्ष को कहते हैं, जिसमें साल का फरवरी महीना 28 के बजाय 29 दिन का होता है। इसलिए लीप वर्ष में 365 दिनों की जगह 366 दिन का एक वर्ष होता है। लीप ईयर का दिन चार साल में एक बार आता है। क्योंकि पृथ्वी को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने के लिए 365 दिन 6 घंटे 48 मिनट 45.51 सेकेंड का समय लगता है। अब इसमें 365 दिन के अतिरिक्त लगने वाला समय प्रत्येक चौथे साल में लगभग एक दिन के बराबर हो जाता है। इस बढ़े हुए दिन को हर चौथे साल के फरवरी माह में जोड़ दिया जाता है जिससे उस साल की फरवरी 29 दिनों की हो गणना तकरीबन ठीक कर देती है। 

हमारा हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। इसमें अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इस मास के समय का उपयोग सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के अंतर का संतुलन बनाने के लिए किया जाता है। भारतीय ज्योतिष गणना के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पूरा करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।

सूर्य जब बृहस्पति की राशि मे प्रवेश करते हैं तो दोनों ग्रहों के आपसी प्रभाव से दोनों ही कुछ निस्तेज हो जाते हैं ! दोनों ग्रहों का बल व प्रभाव कम हो जाता है। दोनों की दशा कुछ मलिन हो जाती है ! इसके अलावा वर्ष का समय भी अतिरिक्त हो जाता है, इसीलिए यह माह खर या मल मास भी कहलाता है। 

अधिकमास को भगवान विष्णु के नाम  पुरुषोत्तम मास  के रूप में भी जाना जाता है। जिसके बारे में पुराणों में एक कथा का विवरण मिलता है। जिसके अनुसार भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। परंतु सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुए इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता राजी नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का अधिपति बन, इसका भार वहां कर इसे सुचारु रूप दें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि अपना एक नाम पुरुषोत्तम भी इसे दे दिया ! इस तरह यह मासिक समय पुरुषोत्तम मास भी कहलाया जाने लगा।


@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 16 सितंबर 2020

शिखरारूढ के लिए जिम्मेदारी निभाना जरूरी है

आजकल किसी भी समारोह, सम्मान, उपाधि आदि को सदी से जोड़ देने का चलन चल पड़ा है ! सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा विशेष के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में जीवित हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के .............................................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रजतपट पर अदाकारी दिखाने वाले कलाकारों का दबदबा समाज पर सदा से ही रहा है। पर्दे पर बुराई, अन्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले, असत्य पर सत्य को विजय दिलाने वाले इनके किरदार अपार लोकप्रियता हासिल कर इन्हें असल जीवन में भी अवाम का नायक बना देते हैं। भले ही अपने निजी जीवन में वे अपने निभाए हुए किरदारों के बिल्कुल विपरीत ही क्यों न हों ! मध्यम-निम्न-सर्वहारा वर्ग के लोग, जो व्यवस्था से, समाज के सशक्त वर्ग से या भ्रष्टाचारी संतरी-मंत्री के जुल्मों का शिकार होते हैं और निर्बल होने के कारण उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते, ऐसे लोग जब पर्दे पर अपने जैसे एक आम इंसान को उनको दंड देते, प्रताड़ित करते या अपना हक़ छींन कर लेते देखते हैं तो उस किरदार को निभाने वाले शख्स को सर-माथे पर बैठा लेते हैं ! उसमें अपनी छवि देखने लगते हैं ! उससे खुद को इस हद तक जोड़ लेते हैं कि उसे भगवान तक का दर्जा दे देते हैं। इसी लिए कभी सुदूर किसी दूसरे देश में भी यदि इनके नायक के साथ कानूनन भी कोई कार्यवाही हो जाए तो उसके चाहने वाले देश में हंगामा बरपा देते हैं। 

पर्दे पर के नायकों का प्रभाव लोगों पर इतना गहरा होता है कि इनकी हर बात को ब्रह्मवाक्य मान उस पर विश्वास कर लिया जाता है। जनता की इसी कमजोरी का लाभ उठा, विज्ञापनदाता अपने उत्पादों के प्रचार के लिए इनका "उपयोग'' करते आ रहे हैं। इस श्रेणी में अपवाद स्वरुप दो-चार लोग, अलग क्षेत्र से जरूर शामिल हैं, पर वे सब दूसरी पायदान पर ही बने रह पाए हैं। सोच कर देखिए कि यदि कोई प्रभावशाली धर्मगुरु या कोई नेता या उद्योगपति किसी चीज की सिफारिश करे तो क्या लोग उनकी बात मान उस ओर उतना आकर्षित होंगें जितना किसी दूसरे या तीसरे दर्जे के अभिनेता या अभिनेत्री के कहने से हो जाएंगे !  कभी नहीं ! 

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एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि

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पर विडंबना क्या है ? वही भगवान बने बैठे लोग, कुछेक को छोड़, उन करोड़ों लोगों, जिन्होंने उन्हें सर माथे पर बैठाया, जिनकी बदौलत उन्हें नाम-दाम-यश-शोहरत-सम्मान मिला, उनकी ही कभी फ़िक्र नहीं करते ! उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की ''सेहत'' की चिंता रहती है। अवाम से जुडी या समाज को प्रभावित करने वाली बात पर ये लोग चुप्पी साध लेते हैं ! कौन पचड़े में पड़े ! कौन खतरा मोल ले ! पता नहीं, कोई बात क्या बिगाड़ कर रख दे ! कल बातों ही बातों में कुछ ऊक-चूक हो जाए तो काम-धंधा ही ठप्प ना पड़ जाए ! और ये वे लोग हैं जो पैसा मिलने पर बेझिझक किसी के शादी-ब्याह में नाचने या किसी गलत और बेतुकी चीज का ब्रांड एम्बेस्डर बनने में पीछे नहीं रहते ! यह बात सही है कि देश के हर नागरिक की तरह इन्हें अपनी मर्जी का काम करने का अधिकार है ! पर शिखर पर पहुंचते ही कुछ जिम्मेदारियां खुद ब खुद झोली में आ गिरती हैं ! प्रशंसकों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं ! देश-समाज इनकी तरफ देखने लगता है ! तब आप का जीवन सिर्फ आपका नहीं रह जाता ! पर रील की जिंदगी के ये हीरो रियल जिंदगी में जीरो ही साबित होते हैं ! हमारे ये तथाकथित नायक सब कुछ अनदेखा-अनसुना कर निरपेक्ष भाव से आँखें मूंदे पड़े रहते हैं। इस बात में हमारे दक्षिणी भारतीय अदाकार अपने कर्त्वयों और समाज की जिम्मेदारी के प्रति फिर भी कुछ जागरूक हैं। 

अभी ताजा हालातों पर ही गौर किया जाए तो यही पाया जाएगा की शीर्ष पर बैठे, अवाम के तथाकथिक ''आदर्श'' अपने मुंह पर टेप लगाए रहे, किसी ने चूँ तक नहीं की ! दो-चार थकी-दबी ध्वनियां उठीं भी, तो ऐसे लोगों की जो इस सुअवसर को ख़बरों में आने का मौका मान चौका लगाना नहीं चूके ! ऐसे लोगों का बोलना जनता को नहीं बल्कि अपने क्षेत्र के दिग्गजों को सुना, अपने अस्तित्व का भान कराना था।  हाशिए पर बैठे ऐसे लोग क्या और उनकी बातों का वजन क्या ! सब मौकापरस्ती और अवसरवादिता का खेल ! शायद कोई छींका टूट ही जाए। 

इधर एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को मशहूर करने के लिए उसे सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सदी यानी सौ वर्ष !!

सवाल यह उठता है कि ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है क्या ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के !

सोमवार, 14 सितंबर 2020

कोरोना ने समझाया परिवार का महत्व

एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान  शुरू हो गया था। जो इस कोरोना संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं। उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान -दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जगत में घटने वाली हर बात में अच्छाई और बुराई, दोनों ही निहित रहती हैं। अब जैसे इस कोरोना आपदा को ही लें जो मानवमात्र के अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व संकट के रूप में जाना जाता तो रहेगा, परंतु इसके भी कुछ परोक्ष और अपरोक्ष फायदे तो मिले ही हैं। जैसे जल-थल-वायु का साफ़ होना ! पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार ! इंसान का संयमित होना ! कम संसाधन वाले देशों के प्रति सक्षम देशों का मैत्रीपूर्ण व्यवहार इत्यादि ! परन्तु सबसे बड़ी बात है कि इसी बीच इंसानों की सोच-आचार-व्यवहार में भी बदलाव दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिका की, जिसके तौर-तरीके और जीवन शैली अपनाने के लिए हम लालायित रहते हैं, खबर है कि वहां के लोग अब अपने माता-पिता या अभिवाककों के पास जा कर रहने लगे हैं। एकल के बनिस्पत संयुक्त परिवारों में रहना लोग पसंद करने लगे हैं। उनको समझ में आ गया है कि उसकी सुरक्षा, प्रेम, अपनापन अन्यत्र हासिल नहीं हो सकता। बच्चों को बेहतर, नेक और भला इंसान बनाने में भी संयुक्त परिवार और उसके बुजुर्ग सदस्यों का बहुत बड़ा योगदान रहता है। 

कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन के तहत भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक आए ठहराव, बीमार होने के डर, अकेलेपन के तनाव ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इससे उत्पन्न चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता के माहौल से दिन-रात जूझते लोगो को परिवार की याद सताने लगी ! उन युवाओं के अलावा, जो किसी भी तरह की खलल से दूर रह कर अपनी जिंदगी जीना चाहते थे ! वे दम्पत्ति जो पहले अपनी स्वतंत्र्ता में किसी की टोका-टाकी ना चाहते हुए अकेले रहना चाहते थे, या जो किसी भी कारणवश सिर्फ अपने लिए जीने का ख्वाब पाले बैठे थे ! ऐसे लोगों को इस विपदा ने परिवार की अहमियत समझा दी। वे अब अपने माँ-बाप, यहां तक की बुजुर्ग दादा-दादी के पास जा कर रहने में सकून पाने लगे हैं ! एक मोटे अनुमान के अनुसार इस साल के मार्च से मई तक के समय में करीब 29 से 30 लाख लोगों ने संयुक्त परिवार  को फिर से अपना लिया है। ये रुझान दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसमें पढ़ाई करने वाले युवाओं की संख्या शामिल नहीं है जो मजबूरी में परिवार से दूर रह रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो संयुक्त परिवार का माहौल उन्हें फिर मुआफ़िक लगने लगा है।  

वैसे यह बदलाव कोरोना संकट के पहले से ही आकार लेने लगा था। एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान शुरू हो गया था। जो इस संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं।उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान-दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं। 

हमारी इस मनोवृत्ति की आंच को हवा दे, अपनी रोटी सेकने में बाजार भी पीछे नहीं रह रहा ! आए दिन ऐसे विज्ञापन परदे पर दिखाई देते रहते हैं जो ढके-छिपे, द्विअर्थी शब्दों के जाल फैला, एकल परिवार की वकालत करने से बाज नहीं आते ! जितना लोग अलग और अकेले रहेंगे, उतनी ही इनकी खपत बढ़ेगी ! इन पर ध्यान और लगाम कसना जरुरी है ! पर हमारा चलन है कि जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता तब तक हम और हमारी सरकार नशे में गाफिल ही रहते हैं। कुछ दिनों पहले एक बैंक भी ऐसा ही कुछ एकल परिवार के फायदों के बारे में समझा रहा था ! आजकल एक बाहरी कंपनी Disney+hotstar  का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें पता नहीं किस मध्यम वर्गीय परिवार की अजीबोगरीब तस्वीर दिखा कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! #सरकार_तक_बात_पहुंचाने_की_कोशिश_के_बावजूद_धड़ल्ले_से_यह_विज्ञापन_प्रसारित_हो_रहा_है। 

विडंबना ही तो है कि दुनिया में परिवार एकजुट होने की ओर तत्पर हैं और हम टूटन में अच्छाई खोज रहे हैं !

@संदर्भ, दैनिक भास्कर 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

हमें तो खबर चाहिए, सिर्फ टीआरपी के लिए

अभी हफ़्तों तक एक रहस्यमयी, ''ह्त्या या आत्महत्या'' नामक नौटंकी का प्रसारण हर टी वी चैनल पर होता रहा है ! जिसमें लोगों की दिलचस्पी मरने वाले पात्र से ज्यादा उसके धन और संबंधों के खुलासे पर थी। चैनलों ने इसे नेशनल इश्यू बना डाला था ! रोज इसकी पर्दे पर बखिया उधेड़ी जाती रही ! इन दिनों लगता ही नहीं था कि देश दुनिया में ऐसी कोई और खबर भी है जो देशवासियों को सुननी-जाननी चाहिए ! यहां तक कि कोरोना भी सहम कर दूसरे-तीसरे पन्नों पर जा दुबका था ! सरहद पर घिरती अशांति से ज्यादा इन खबरनवीसों को नौटंकी के पात्रों को तरजीह देने की फ़िक्र थी। फिर नायिका के जेलग्रस्त होते ही यवनिका का पटाक्षेप हो गया ! पर तब तक चैनलों के भाग्य से एक और सनसनी हवा में तैरनी शुरू हो चुकी थी ..........................!   

#हिन्दी_ब्लागिंग    

देखते-देखते समय कितना बदल गया है ! बीते दिनों में अपनी भाषा को सुधारने के लिए, शब्दों के सही उच्चारण के लिए या भाषा पर पूरा अधिकार पाने के लिए हमसे अखबार पढ़ने और रेडिओ पर ख़बरें सुनने को कहा जाता था ! टी वी के शुरूआती दिनों में भी उस पर प्रसारित होने वाली ख़बरों को, चाहे वे किसी भी भाषा में हों, बहुत सोच समझ कर प्रसारित किया जाता था ! उन्हें पढ़ने वालों का उस भाषा पर पूरा नियंत्रण होता था। टी आर पी नामक सुरसा का जन्म नहीं हुआ था। अवाम पूरी तरह इन माध्यमों पर विश्वास करता था ! 

आज क्या हम अधोगति को प्राप्त इन माध्यमों पर लेश मात्र भी भरोसा कर सकते हैं ! जो आज सिर्फ और सिर्फ दर्शकों को जुटाने के लिए कुछ भी, कैसा भी दिखा-सुना-समझा, अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर रहते हैं ! तोताचश्म तो इतने की सुबह की बात दोपहर और दोपहर की बात रात को बिना किसी झिझक के बदलते रहते हैं। सच को झूठ और झूठ को सच बनाने में इन्हें महारथ हासिल है। सीधी सी जगजाहिर बात है कि हर चैनल, हर अखबार अपना पेट भरने के लिए किसी ना किसी गुट में शामिल हो चुका है ! उस पर वही दिखाया-सुनाया-समझाया जाता है, जैसा उसको निर्देश मिलता है ! जाने-अनजाने उसके अपने-अपने श्रोता और पाठक बन गए हैं ! उन्हें उनके स्वादानुसार भोजन परोसा जाता है। इन्हें ना समाज से मतलब है नाही अवाम से, नाहीं किसी की भावनाओं से ! इन्हें सिर्फ अपने विज्ञापनों की संख्या से मतलब है, वह चाहे जैसा भी हो ! इसीलिए आज छोटे परदे पर ऊल-जलूल, फूहड़, अनर्गल, भदेश संदेशों की बाढ़ सी आई हुई है ! उनसे बच्चों के अपरिपक्व दिलो-दिमाग पर क्या असर पड़ता है, इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है !   

''अपने आप को ख़बरों में बनाए रखने को आतुर, ख्याति की चकाचौंध में बने रहने की लालसा में एक अदाकारा उल्टा-सीधा बयान दे देती है ! चिढ कर और अपनी राजनीती चमकाने-बचाने के लिए  तथाकथित नेता उसे धमकी दे देते हैं ! मौका देख अदाकारा को केंद्र की तरफ से सुरक्षा प्रदान कर दी  जाती है ! बाजार की कभी ना मिटने वाली भूख को कुछ और दिनों के लिए रसद मिल जाती है !'' 

अभी हफ़्तों तक एक रहस्यमयी, ह्त्या या आत्महत्या नामक नौटंकी का प्रसारण हर टी वी चैनल पर होता रहा ! जिसमें लोगों की दिलचस्पी मरने वाले पात्र से ज्यादा उसके धन और संबंधों के खुलासे पर थी। चैनलों ने इसे नेशनल इश्यू बना डाला ! दिन-रात बस वही और वही ! दर्शकों में से कुछ ने मजबूरन ना चाहते हुए भी देखा क्योंकि हर जगह उसका ही आलाप लिया जा रहा था ! कुछ ने न्यूज़ देखना ही बंद कर दिया ! पर अधिकांश ऐसे थे जो इस कथानक में पूर्णरूपेण डूब इसका रसास्वादन करते थे ! इन्हीं की शह पर रोज इसकी पर्दे पर बखिया उधेड़ी जाती रही ! इन दिनों लगता ही नहीं था कि देश दुनिया में कुछ अघटित भी घट रहा है ! कोई ऐसी खबर ही नहीं है जो देशवासियों को सुननी-जाननी चाहिए ! यहां तक कि कोरोना भी सहम कर दूसरे-तीसरे पन्नों पर जा दुबका था ! सरहद पर घिरती अशांति से ज्यादा इन खबरनवीसों को नौटंकी के पात्रों को तरजीह देने की फ़िक्र थी। फिर नायिका के जेलग्रस्त होते ही यवनिका का पटाक्षेप हो गया ! पर तब तक चैनलों के भाग्य से एक और सनसनी हवा में तैरनी शुरू हो गई थी ! 

वैसे इन सब में किसी का दोष नहीं है ! जैसी मांग रहती है बाज़ार वही सप्लाई करता है ! आज हमारी मानसिकता ही अपने तक सिमट कर रह गई है ! जैसे हम हैं वैसे ही हमारे नेता हो गए हैं। आज जब हमारे सामने अभूतपूर्व चुन्नोतियां ख़म ठोक रही हैं ! त्रिमुखी संकट हमें घेरने की फिराक में हैं ! ऐसे में भले ही हमारे आपसी कितने भी मतभेद हों, सारे देश को एकजुट हो, सरकार को सकारात्मक समर्थन देने की जरुरत है ! अपनी हैसियत और सहूलियत के अनुसार अपना योगदान देने की आवश्यकता है। राष्ट्र तो सदा ही पहले रहता है, हम सब और हमारे दल बाद में आते हैं।    

पर हो क्या रहा है ! हमारे कुछ तथाकथित नेता एक फ़िल्मी अदाकारा से जुमलेबाजी में उलझे हैं ! एक दूसरे की हद समझाई जा रही है ! अपने ही देश में अपने ही राज्यों में एक-दूसरे के आने-जाने पर देख लेने की धमकी दी जा रही है ! कारण....! एक फ़िल्मी अदाकारा अपने आप को ख़बरों में बनाए रखने की खातिर, ख्याति की चकाचौंध में बने रहने की लालसा में उल्टा-सीधा बयान दे देती है ! चिढ कर और अपनी राजनीती चमकाने-बचाने के लिए कुछ तथाकतित नेता उसे धमकी दे देते हैं ! मौका देख अदाकारा को केंद्र की तरफ से सुरक्षा प्रदान कर दी  जाती है ! बाजार की कभी ना मिटने वाली भूख को कुछ और दिनों के लिए रसद मिल जाती है ! 

इस कर्म-काण्ड को देख ऐसा नहीं लगता कि गलत समय पर गलत जगह निवेश कर दिया गया हो। जिस समय सारी पार्टियों को मिल कर आसन्न संकट के समय दुश्मन को अपनी एकजुटता का संदेश देना चाहिए ! वहां एक फ़िल्मी अदाकारा के साथ तू-तू-मैं-मैं कर अपनी अदाकारी दिखाई जा रही है ! दूसरी ओर जो संसाधन या पैसा, भले ही वह कितना भी हो, इस आपाद स्थिति में देश हित में काम आता, कोरोना को ख़त्म करने का हेतु बनता, उत्पादन बढ़ाने में प्रयुक्त होता, मुसीबतजदा लोगों की सहायता का सबब बनता उसे एक छद्म अदाकारी के गैर उत्पादक डिबेंचर पर लगा दिया गया ! इस खेल में यदि किसी का भला होगा तो सिर्फ और सिर्फ उस अदाकारा का ! जो शायद भविष्य में राजनेता बन अपना भविष्य सुरक्षित कर ले और हम आप जैसे उसको आता-जाता देख तालियां बजाते रहें। पहले भी तो कमोबेश हर पार्टी के द्वारा उसके जैसे कई ''शो-पीस" सदनों को सजाने के लिए भेजे जाते रहे हैं, जिनमें इक्के-दुक्के को छोड़ प्राय: सभी के कारनामे हम देख ही चुके हैं !   

शनिवार, 5 सितंबर 2020

बहुत हो गया परिवार

आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी  नकेल विदेशी  हाथों में है,  ऐसे ही ऊल - जलूल,  तर्कहीन, अतिरेक  से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन O.T.T. का शुरू हो गया है,  जिस पर किसी का  भी नियंत्रण नहीं है और  कुछ  भी दिखाने की आजादी है !  जिसके फलस्वरूप  मौकापरस्त  अपने लाभ  के लिए  कुछ  भी बना  कर यहां रिलीज  कर छोटे - छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल टीवी पर  Disney+hotstar  का एक विज्ञापन आ रहा है।  जिसमें पता नहीं कैसी-कैसी  कल्पना कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! विज्ञापन के  अनुसार अगर आप परिवार में रह कर क्रिकेट का मैच देखेंगे तो घर के सदस्यों की भदेस हरकतों और गतिविधियों (अतिरेक) की वजह से बेहाल हो जाएंगे ! यदि अकेले देखेंगे तो सुकून से सब कुछ देख पाएंगे ! विज्ञापन दाताओं ने  बड़ी चालाकी और कुटिलता से क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता को  भुनाते हुए उसके कंधे  पर रख दो निशानों पर गोली चलाई है !  पहला अभीष्ट तो अपने सीरियल वगैरह के लिए भीड़ जुटाना है ! दूसरा परिवार का विघटन करना !  जिससे काम  से लौटे इंसान को मनोरंजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़े बजाए, परिवार के ''झमेलों'' के ! 

आज जब पहले ही पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हों ! देश में परिवारों का विघटन हो रहा हो ! एकल परिवारों का ''फैशन'' जोर पकड़ रहा हो ! रिश्ते-नाते सब ताक पर धरे जा रहे हों ! बच्चों को बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, काका-ताऊ जैसे शब्द अजूबा लगने लगे हों ! छोटे-छोटे शहरों में वृद्धाश्रमो की बाढ़ सी आ गई हो ! शादी-ब्याह जैसी रस्मों को भूल युवा, यूज एंड थ्रो जैसी सुगम पर अनैतिक लीव इन रिलेशन जैसा चलन अपना रहे हों ! तब इस तरह के विज्ञापन तो उत्प्रेरक का ही काम करेंगें ! सबसे नागवार बात तो यह है कि विदेशी आका और उसकी स्थानीय कठपुतलियों ने पता नहीं किस घर की तस्वीर पेश की है ! क्या भारत के मध्यम वर्ग के घर ऐसे होते हैं ! 

आज बाहरी शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, देश में अस्थिरता लाने की ! यह विज्ञापन भी उन्हीं के षड्यंत्र का एक हिस्सा लगता है ! पहले इंसान फिर समाज, फिर उसकी आस्था-मान्यता-रीति-रिवाज को तोड़ो, अस्थिरता अपने आप आ जाएगी ! आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी नकेल विदेशी हाथों में है, ऐसे ही ऊल-जलूल, तर्कहीन, अतिरेक से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन OTT का शुरू हो गया है, जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और कुछ भी दिखाने की आजादी है ! जिसके फलस्वरूप मौकापरस्त अपने लाभ के लिए कुछ भी बना कर यहां रिलीज कर छोटे-छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे !

आशा तो यही है कि #सरकार, #सूचना_तथा_संचार_मंत्रालय इस तरफ ध्यान देंगें और इस तरह के, अवाम, समाज, देशहित विरोधी चलन पर सख्ती से रोक लगाएंगे। 

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

राम मंदिर और सोमपुरा परिवार

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से जुडा सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ  हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी थी । उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था.......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

राम मंदिर ! सदियों से करोड़ों-करोड़ लोगों की आँखों में पलता एक सपना ! जिसे पूरा होता देखने की चाह में अनगिनत पीढ़ियां दिवंगत हो गईं। जिसको साकार करने की चाह में हजारों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए ! जिसकी राह में अपनों ने ही रोड़े अटकाए ! तुच्छ राजनीती के तहत श्री राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए गए ! बेबुनियाद तर्कों का माया जाल रचा गया ! कुछ अवसरवादियों ने अपने मतलब के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक विवाद बना दिया ! अमन-शान्ति के नाम पर रुकावटें खड़ी की गईं ! पर आखिरकार अनगिनत पीढ़ियों का संघर्ष, प्रभु के भक्तों का बलिदान और करोड़ों लोगों की आस्था रंग लाई और सारी बाधाओं को पार कर अब वह सपना साकार होने की ओर अग्रसर हो गया है। 

अब ऐसे महान, चिरप्रतीक्षित, देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ देश-विदेश के करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक को साकार करने हेतु कुछ ऐसा रूप देना, जो संसार में अप्रतिम, अनूठा, नायाब और अपने आप में मिसाल हो, कोई आसान काम नहीं था ! वह भी तब, जबकि सारे संसार की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई थीं ! कमोबेस सभी देशों को इस फैसले का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार था ! इसकी भव्यता, विशालता और सुंदरता के लिए कौतूहल था ! सभी बड़ी आतुरता के साथ इसका निर्माण होते देखना चाहते थे ! इसे सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना था। एक उदाहरण स्थापित करना था ! एक ऐसा निर्माण जिसे देश की पहचान बनना था ! बहुत कठिन परीक्षा की घडी थी। ऐसे में खोज जा कर ख़त्म हुई, महान शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा के पास !                         
चंद्रकांत सोमपुरा
                        
गुजरात राज्य के भावनगर जिले के पालिताणा नगर में रहने वाला सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी है। गुजरात के इस परिवार के द्वारा अब तक 200 से भी ज्यादा मंदिरों के डिजाइन तैयार किए जा चुके हैं। उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। देश-विदेश में बिरला परिवार के लिए कई मंदिर इस परिवार ने बनवाए हैं। अक्षरधाम और अंबाजी जैसे कई आस्था स्थल सोमपुरा परिवार के डिजाइन पर ही बने हैं। मथुरा के मंदिर के निर्माण में भी इनका योगदान रहा है। 

बड़ी अनोखी बात है कि भव्य राम मंदिर का मॉडल तैयार करने वाले श्री चंद्रकांत सोमपुरा के पास वास्तुकला की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है ! इन्होंने जो भी सीखा, अपने पिता से ही सीखा है। इसके बावजूद इनके हुनर के बल पर इन्हें देश-दुनिया से बड़े-बड़े मंदिरों का मॉडल बनाने के लिए बुलाया जाता रहा है।  खुद सोमपुरा अपने-आप को मंदिर का वास्तुविद कहलाना पसंद करते हैं। इन्होने ना सिर्फ अपने देश बल्कि दुनिया में भी नागर शैली के मंदिरों का नक्शा तैयार किया है। लंदन के सुप्रसिद्ध अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, जो अपने स्थापत्व और भव्यता के लिए दुनिया में सर्वोपरि माना जाता है, उसका नक्शा भी इन्होंने ही बनाया था।  

अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, लंदन 
अपने परिवार के मुखिया श्री चंद्रकांत सोमपुरा बताते हैं कि घनश्यामदास बिरला जी ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल जी से मिलवाया था। जिनके आग्रह पर 1987 में उन्होंने राम मंदिर की रूप-रेखा तैयार की थी और उनके साथ मिल कर मंदिर पर काम शुरू किया था। इसमें लगने वाले पत्थरों के लिए बंसी पहाड़पुर के बलुआ-पत्थरों का चुनाव किया गया था, जिनकी उम्र 1500 साल मानी जाती है। बंसी पहाड़पुर, राजस्थान के भरतपुर जिले की एक तहसील रूपबास के रुदावल क्षेत्र का छोटा सा गांव है। जो अपने गुलाबी पत्थरों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इस पत्थर की उम्र हजारों साल की मानी जाती है। इसके अलावा इसकी खासियत है कि ना तो यह चटकता है, नाहीं इसमें सीलन आती है और तो और जैसे-जैसे इस पर पानी पड़ता है, वैसे-वैसे इसकी चमक और भी बढती जाती है। इसीलिए इसका चुनाव इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण हेतु किया गया। हालांकि मंदिर के मुख्य द्वार पर जगत्प्रसिद्ध मकराना का सफ़ेद संगमरमर लगाया जाएगा।  


अब 77 साल के हो चुके चंद्रकांत सोमपुरा ने अपनी उम्र और कोरोना संकट के चलते अपने बेटे आशीष को यह भार सौंपा है। जो अनुबंध प्राप्त कंपनी लार्सन एंड टर्बो के साथ मिलकर अयोध्या में राम मंदिर पर काम कर रहे हैं। इस महान और ऐतिहासिक कार्य में उनके छोटे भाई निखिल उनके सहायक हैं। आशीष को यह कला अपने पिता और दादा से मिली है। पूरा परिवार ही बहुत रोमांचित और उत्साहित है। उनका मानना है कि आदिकाल से ही उनके परिवार पर सदा ईश-कृपा बनी रही है। यह प्रभु का आशीर्वाद ही है कि श्री राम मंदिर के साथ ही उनका नाम भी जुड़ गया है। अब राम मंदिर के निर्माण के साथ ही उनके जीवन में एक और नए अध्याय की शुरुआत होगी।

@अंतर्जाल का आभार 

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

बोया पेड़ बबूल का तो.....!!

क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, इस पेड़ को ही चुन कर लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही हो.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत पुरानी कहावत है, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय ! भले ही इसकी अन्तर्निहित सीख यही है कि बुरे काम का अच्छा नतीजा नहीं मिल सकता। पर दूसरी तरफ इस मुहावरे को सुन कुछ ऐसा नहीं लगता कि जैसे बबूल का पेड़ लगाने वाले ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो और आम जैसे महत्वपूर्ण, फलदार वृक्ष की जगह इस बेकार, कंटीले व अनुपयोगी से पेड़ को लगा दिया हो ! चलो, यदि लगा भी दिया, तो फिर वह इससे आम की उम्मीद क्यों करेगा ! फिर सवाल यह भी उठता है कि ऐसा कह कौन रहा है, और किससे कह रहा है, और वह कौन है जो चुपचाप सुने जा रहा है ! कहता क्यों नहीं कि बबूल अपनी जगह आम के पेड़ से किसी भी तरह कमतर नहीं है ! 

सोचने की बात है, क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, चुन कर ही इस पेड़ को ही  लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग, पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही रहा हो ! जिसने इंसान, समाज और पशुओं तक की भलाई को ध्यान में रख अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए इस बहूपयोगी वृक्ष का रोपण किया हो ! अगर ऐसा है तो वह इस वृक्ष से आम की उम्मीद क्यों करेगा ! 

 
यदि मान लें  कि पौधा लगाने  वाला  कोई भोला बंदा था. जिसे  वनस्पतियों के  बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  इसी  लिए वह अपने बबूल के पेड़ से  आम के फल की आस लगाए बैठा रहा  तो  उसे आम का  बतला कर बबूल का पौधा  किसने थमाया !  फिर वर्षों उसे  जलील  कर नसीहतें देता रहा !  इस पर  भी यदि  वह भोला बंदा अपने बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद लगाए बैठा रहा,  तो उसके आस - पास के  किसी  भलेमानुष  ने  उसे  सच्चाई क्यों  नहीं बताई !  क्यों उसे  प्रताड़ित  करवा, उदाहरण बना  दूसरों को ज्ञान बांटना शुरू कर दिया गया ! 

                                      
वैसे तो दोनों की पेड़ों की तुलना करना ही उचित नहीं है। दोनों वृक्षों की अपनी-अपनी खूबियां हैं, अपनी-अपनी विशेषताएं हैं ! बबूल में जो औषधीय गुण हैं वे आम में नहीं हैं और जो स्वाद, मिठास व दूसरी खूबियां आम में हैं वे बबूल में नहीं हैं। कायनात ने बनाया ही इस तरह है कि जो बात आम में है वह बबूल में नहीं हो सकती और जो खासियतें बबूल में हैं उन्हें किसी दूसरे वृक्ष में खोजना तो नासमझी ही होगी ! मरू-भूमि में उगने वाले काँटेदार बबूल की अहमियत जाननी हो तो वहाँ के स्थानीय निवासियों से इसके बारे में पूछ कर देखें, जिनके लिए यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है।फिर आम और बबूल ही क्यों, संसार की किसी भी वनस्पति की एक दूसरे से तुलना करना या किसी को कम आंकना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सब अपनी-अपनी विशेषताएं, गुण तथा उपयोगिताएं लिए होते हैं। सबकी अपनी अलग-अलग पहचान होती है ! 

                           
ऐसी मान्यता है कि बबूल के पेड़, जिसे कीकर भी कहा जाता है, पर देवताओं का वास होता है। प्राचीन काल में इसकी पूजा की जाती रही है। इसको अत्यंत शुभ, पावन और वैभवदाई माना जाता है। इसका प्रत्येक भाग किसी न किसी उपयोग में जरूर आता है। इसकी लकड़ी औरों की बनिस्पत काफी मजबूत व क्षयरोधी होती है। चाहे मरुभूमि का फैलाव हो या पानी का कटाव इसके होते इन दोनों से बचाव हो जाता है। इसीलिए इसको काटना या नष्ट करना निषेद्ध माना गया है। ऐसे पेड़ की किसी दूसरे वृक्ष से तुलना कर इसे हेय करार देना नादानी ही मानी जानी चाहिए ! अब यह दूसरी बात है कि महान संत, समाज सुधारक को बुराई की तुलना के लिए यही पादप मिला ! 

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