रविवार, 17 जनवरी 2021

आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट सिकदर करना

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!

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आजकल एक न्यूज़ चैनल पर माउंट एवरेस्ट के नाम को बदलने को ले कर चर्चा चल रही है। उनके अनुसार जब इसकी ऊँचाई की सटीक गणना राधानाथ सिकदर नाम के भारतीय ने की थी, तो क्यों ना दुनिया के इस सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा जाए ! यदि ऐसा हो जाता है तो यह हम सारे भारतीयों के लिए बड़े ही गर्व की बात होगी। पर क्या यह जटिल कार्य इतना आसान है !

1831 में भारत के सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट ने राधानाथ सिकदर की अप्रतिम, बहुमुखी प्रतिभा को पहचान उन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग में बाबू यानी क्लर्क के रूप में काम दिलाया था। एवरेस्ट, राधानाथ सिकदर के काम से इतने प्रभावित थे कि जब सिकदर को डिप्टी कलेक्टर बनने का मौका मिला तो एवरेस्ट ने हस्तक्षेप कर उन्हें अपने विभाग से जाने की अनुमति ही नहीं दी ! 1843 में जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हो गए और कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ को उनके स्थान पर नियुक्त किया गया। इधर सिकदर को भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अलावा कलकत्ता के मौसम विज्ञान विभाग का भी अधीक्षक बना दिया गया।

कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया 

उन्हीं दिनों कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ के आदेश पर सिकदर ने दार्जिलिंग के पास बर्फ से ढके हुए पहाड़ों को मापने का काम शुरू किया। उस समय तक सभी चोटियों का नामकरण नहीं हुआ था। सुविधा के लिए चोटियों के स्थानीय नामों को ही मान लिया जाता था। ऐसे में शिखर 15 की ऊंचाई नापने के दौरान छह अलग-अलग स्थानों से तरह-तरह से इकठ्ठा किए गए आंकड़ों से सिकदर ने यह निष्कर्ष निकाला कि हिमालय तथा दुनिया की सबसे ऊँची चोटी 15 है। यह एक क्रांतिकारी खोज थी। उस समय तक इसे नेपाल में सगरमाथा और तिब्बत में चोमोलंगमा के नाम से जाना जाता था। 

राधानाथ सिकदर
सिकदर की रिपोर्ट पर कुछ वर्षों तक शोध होता रहा ! गहन निरिक्षण, परिक्षण, बारीक जांच-पड़ताल के उपरान्त, पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया ! इस प्रकार दुनिया की सबसे ऊंची इस चोटी का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट रख दिया गया पर साथ ही राधानाथ सिकदर के अमूल्य योगदान को भी भूला दिया गया। 

आज वर्षों बाद उनके काम को ले कर जागरूकता फैलाई जा रही है। उनको श्रेय दिलवाने की बात उठ रही है ! उनके नाम पर माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जो चाहें रख लें ! इसलिए ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी ! लिए सबसे पहले भारत सरकार को कूटनीतिक शुरुआत करनी होगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल है ! यह जानते-समझते हुए ही कोई नेता, लोक-लुभावन प्रस्ताव होने के बावजूद इससे जुड़ता हुआ नहीं लगता ! 

जॉर्ज एवरेस्ट
नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल है। एक तो यह शिखर अपने देश में नहीं है ! दूसरे दुनिया में ऐसी कोई एजेंसी भी नहीं है कि वहां अपनी बात रख आवेदन कर दें और सही पाए जाने पर नाम बदल जाए ! भले ही हिमालय से हमारा भावनात्मक जुड़ाव सदियों से है पर उसकी यह चोटी नेपाल में स्थित है। इसका एक हिस्सा चीन में पड़ता है ! सो इन दोनों की सहमति सबसे जरुरी है। पर दुखद स्थिति यह है कि इन दोनों के साथ ही हमारे संबंध उतने मधुर नहीं हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों यथा पकिस्तान, बांग्ला देश और म्यांमार की रजामंदी की भी जरुरत पड़ेगी। जिसमें पकिस्तान से आशा रखना गलत ही होगा ! इनके अलावा यूनेस्को की भी इजाजत की जरुरत पड़ेगी, क्योंकि यह एक World Heritage Site है ! फिर ब्रिटेन ही क्यों राजी होगा, विश्व प्रसिद्ध जगह से जुड़े, अपने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, जुड़े नाम को हटाने के लिए ! सो अड़चनें तो बेशुमार हैं ! पर यदि उन पर पार पाया जा सके तो फिर क्या कहने !

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

उन्हें जननी जन्मभूमिश्च....नहीं , वसुधैव कुटुम्बकम् का ख्याल भाया, क्योंकि..

वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए, पर उन्हें ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि जब सारी दुनिया ही हमारा परिवार है, तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ...........! 

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प्रकृति की विकास यात्रा के दौरान जानवर परिष्कृत होते हुए इंसान बन गए ! उनकी सोच में भी फर्क आया ! जहां जानवर सिर्फ अपने लिए जीते हैं वहीं इंसान में इंसानियत जैसी खूबी भी पनप गई। इसी इंसानियत या मानवता के तहत वह अपने साथ-साथ अपने हमजीवों का भी ख्याल रखने लगा। धीरे-धीरे विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग देशों का निर्माण हो गया। पर सब में भाईचारा, सहयोग, स्नेह इत्यादि बना रहे इसलिए हमारे विज्ञ-जनों ने, जो पहले जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी जैसा उपदेश दे चुके थे, एक और ख्याल वसुधैव कुटुम्बकम् को जन्म दे डाला, ताकि समस्त मानव जाति मिल-जुल कर सहयोगी बन एक परिवार की तरह सुख-चैन से रह सके ! 

इंसान आकार-प्रकार में तो जानवरों से बेहतर हो गया था ! पर इस प्रक्रिया के दौरान कायनात कुछ लोगों की बुद्धि और विचारों को नहीं बदल पाई ! ऐसे लोगों को दूसरों से कुछ लेना-देना नहीं था ! उन्हें सिर्फ अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कार्य प्रणाली ही सर्वोत्तम लगती रही ! वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए पर उन्हें वसुधैव कुटुंबकम का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि इतना बड़ा परिवार है तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ! शुरुआत में तो ऐसे लोगों की गिरफ्त में आधी से ज्यादा दुनिया आ गई, पर धीरे-धीरे जैसे ही इस हलाहल का दुष्परिणाम लोगों की समझ में आया तो इसका अंत होना आरंभ हो गया। 

जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है 

सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में ऊँच-नीच नहीं  होनी चाहिए ! सब इंसान बराबर हैं ! हर इंसान का हक़ है कि उसे भरपेट भोजन और छत मिले ! जिसके पास कुछ अतिरिक्त है, उसे सर्वहारा की सहायता करनी चाहिए ! वैसे यह विचार बाहर का था, क्योंकि अपने देश में तो जानवरों की भूख तक का ख्याल रखा जाता रहा है, पर फिर भी चल गया !  युवावस्था में कालेज के जमाने में ऐसे विचार खूब भाते थे। पर समय के साथ असलियत ने सामने आ कर दिलो-दिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया ! 

मुफ्तखोरी ऐसा दीमक है, जो पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाता। ये उस अमर बेल की तरह होती है जिसकी अपनी जड़ नहीं होती ! ये परजीवी पौधा दूसरे पेड़ों पर आश्रित होता है, पर समय के साथ अपने आश्रयदाता का रस चूस-चूस कर उसे ही निष्प्राण कर देता है ! मानव समाज में भी उस पौधे जैसे लोगों के बारे में आम धारणा है कि इनका जमावड़ा जिस संस्थान पर हो जाता है वहां तब तक रहता है जब तक कि उसकी चिमनी से धुंआ निकलना बंद ना हो जाए ! इसका जीता-जगता उदहारण, हमारा कभी सोने के रंग सा चमकता बंगाल आज पीलियाग्रस्त नज़र आने लगा है। इसी  बिमारी का एक नया संस्करण आज दिल्ली को घेरे बैठा है।              

सदा से ही सारा देश चाहता रहा है कि सदियों से पीड़ित किसानों को खुशहाली मिले ! कम से कम उनके हक़ का पैसा उन तक पहुंचे। पर आजादी के दसियों साल बाद तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हो पाई। फिर भी बेकाबू रूप से बढ़ती हुई जन संख्या के लिए उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की ! सबके लिए अन्न मुहैया करवाया, पर उनकी स्थिति जस की तस रही ! अब यदि उनकी हालत को बेहतर करने का भरोसा दिया जा रहा है, तो क्यों नहीं उस को एक बार आजमा लिया जाता ! जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है ! पछताने से तो बेहतर है, एक बार आजमा कर देखना ! इस में कोई हर्ज नहीं है ! क्यों पिछली स्थितियों से चिपके रहना बेहतर लगता है, एक काल्पनिक डर के तहत !  

पर तटस्त अवाम की हार्दिक इच्छा तथा चाहने के बावजूद लगता नहीं कि किसान आंदोलन जल्द ख़त्म होने दिया जाएगा ! क्योंकि अफवाहें सच होती नज़र आ रही हैं ! ख़बरों में है कि भोले-भाले किसानों के हित को पीछे धकेल अब उस पर कोई और ही हावी हो गया है ! कोर्ट द्वारा चार सदस्यों की समिति का गठन होते ही यह कह कर विरोध हो गया कि ये चारों सदस्य कृषि कानून के हिमायती हैं ! चलो ठीक है मान लेते हैं ! पर विरोध करनेवालों में कौन प्रमुख हैं - दर्शन पाल सिंह, जोगेन्दर सिंह ओगराहा, सुरजीत सिंह फुल, सुखदेव सिंह, अजमेर संघ लोखोवाल, बूटा सिंह गिल, निर्भय सिंह कीर्ति, सतनाम सिंह अजनाला, जिन सबका सीपीएम, सीपीआई, माले इत्यादि वामपंथी पार्टियों से गहरे ताल्लुकात हैं। इनके अलावा कविता कुरुगांती, ग्रीन पीस इंडिया से 27 साल का नाता, जिस पर भारत सरकार ने बैन लगाया हुआ है, अक्षय कुमार, मेधा पाटेकर के करीबी, जैसे बीसियों लोगों के अलावा और ''जो'' हैं उनका तो सभी को पता है ! तो हल कौन निकलने देगा !!

फिर भी सबकी दिली तमन्ना है कि जो भी धरने पर बैठे हैं, आवेश में आए हुए लोग-महिलाएं-बच्चे-युवा, हैं तो इंसान ही, हमारे भाई-बंधु ही ! क्यों इतनी विपरीत परिस्थितियों में उन्हें कष्ट सहना पड़ रहा है। क्यों नहीं उनको उनका भला पचास दिनों बाद भी समझाया जा सक रहा है ! यदि बरगलाए ही जा रहे हैं तो क्यों नहीं वैसे लोगों पर शिकंजा कैसा जा रहा ! क्या समझाने वाले बरगलाने वालों से किसी तरह कमतर हैं, जो अपनी बात ठीक से नहीं रख पा रहे ! जो भी हो यह मामला अब सिमटना चाहिए, पर दोषियों को, देश के विरुद्ध षडयंत्र करने वालों को सबक सिखाते हुए ! क्योंकि देश के आगे कुछ नहीं..कोई भी नहीं !!!  

रविवार, 10 जनवरी 2021

अरे ! बासी भात तो छुपा रुस्तम निकला

हमारे देश के कई भागों में चावल के उपयोग की प्राथमिकता पीढ़ियों से चली आ रही है। चूँकि हमारे यहां संयुक्त परिवार तथा मेहमानवाजी का चलन भी सदा से  रहा है, इसलिए कुछ अतिरिक्त चावल बनाना एक नियम सा बन गया था, जिससे किसी के देर से या अचानक आने पर उसे तुरंत भोजन करवाया जा सके। ऐसे में कुछ ना कुछ भोजन बच जाना स्वाभाविक ही था। उस समय में मितव्यतता के साथ-साथ अन्न का बहुत आदर होता था ! इसी के चलते इस खाद्य का आविष्कार हुआ

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अंग्रेजी राज में थौमस् बैबिंग्टन् मैकाॅलेऽ की असीम अनुकम्पा से हम सब इतने शिक्षित हो गए कि हमें अपना सारा अतीत, गौरव, संस्कृति, परम्पराएं दकियानूसी लगने लगीं। हमें अपने रहन-सहन, खान-पान, परंपराएं अपनाने में शर्म आने लगी ! अपने रीती-रिवाज पिछड़ेपैन की निशानी लगने लगे ! कभी खेती के तरीकों के लिए जो पश्चिम अपने को हमारा ऋणी मानता था, हम अब उसी के पदचिन्हों पर चलने की भूल कर बैठे ! हमें ध्यान ही नहीं रहा कि हर देश-प्रदेश का पहनना-ओढ़ना, भोजन इत्यादि वहां की आबो-हवा, मौसम और प्रकृति के अनुसार होता है ! पश्चिम की नक़ल की अंधी दौड़ में हमने कई जीवनोपयोगी रोजमर्रा की घर में उपयोग होने वाली वस्तुओं को नजरंदाज तो किया ही, अपने सेहतमंद, पौष्टिक खाद्यों को भी तब तक हेय नजर से देखते रहे जब तक पश्चिम से उस चीज की उपयोगिता, गुणवत्ता, लाभ, उपादेयता आदि पर मोहर लग कर ना आ जाए। इसी हीन भावना के कारण हमने अपनी कई दिव्य, अमूल्य ओषधियों, जड़ी-बूटियों, मसालों पर उन्हें पेटेंट करने का मौका दे दिया ! 

आज एक ऐसे ही खाद्य पदार्थ की चर्चा ! जिसको हमारे तथाकथित पढ़े-लिखे आधुनिक नगरनिवासी, गांव के गरीबों व मजबूर लोगों द्वारा मजबूरी और बेहाली में पेट भरने का  बासी  खाना कह, समझ कर हिकारत की दृष्टि से देखा करते थे। उसी तिरस्कृत खाद्य को अमेरिकन न्यूट्रीशियन एसोसिएशन (ANA) ने महिमांडित करते हुए उसके अनेकों फायदों को दुनिया के सामने उजागर किया है। हमारे देश के कई भागों में चावल के उपयोग की प्राथमिकता पीढ़ियों से चली आ रही है। चूँकि हमारे यहां संयुक्त परिवार तथा मेहमानवाजी का चलन भी सदा से  रहा है, इसलिए कुछ अतिरिक्त चावल बनाना एक नियम सा बन गया था, जिससे किसी के देर से या अचानक आने पर उसे तुरंत भोजन करवाया जा सके। ऐसे में कुछ ना कुछ भोजन बच जाना स्वाभाविक ही था। उस समय में मितव्यतता के साथ-साथ अन्न का बहुत आदर होता था ! इसी के चलते इस खाद्य का आविष्कार हुआ जिसे बंगाल में पांथा भात, ओडिसा में पखाल, छत्तीसगढ़ में भोर बासी, तमिलनाडु और दक्षिणी क्षेत्र में पयड़दु या तथा बिहार अंचल में  'पानी भात' कहा जाता है। देश के दक्षिणी, पूर्वी और कुछ उत्तरी भागों के अलावा इसे म्यांमार, नेपाल और बांग्ला देश जैसी जगहों में भी खाया जाता है।

यह शरीर को ऊर्जावान बनाता है ! थकान महसूस नहीं होने देता ! सुस्ती दूर करता है ! शरीर में लाभकारी बैक्टेरिया की बढ़त होती है ! शरीर की बढ़ी हुई गर्मी कम होती है ! पेट के लिए बहुत मुफीद है ! रक्तचाप को नियंत्रित करता है 

है क्या यह ! यह रात के बचे हुए चावल का दूसरे दिन बनाया गया एक व्यंजन है ! जिसके लिए कुछ ज्यादा उठा-पटक भी नहीं करनी पड़ती। सिर्फ रात के बचे भात को पानी में डुबो कर रख दिया जाता है ! रखने के लिए यदि मिटटी का बर्तन हो तो और भी बेहतर है, जिससे इसका स्वाद काफी बढ़ जाता है। रात भर पानी में रहने से यह किण्वित याने फर्मेन्टेड हो जाता है अर्थात इसमें खमीर की उत्पत्ति हो जाती है। सुबह इसका पानी निकाल चावल को दही, अचार, चटनी या सिर्फ नमक-मिर्च के साथ अपनी सुविधा और स्वादानुसार खाया जा सकता है। इस सुपाच्य और पौष्टिक खाद्य की तासीर ठंडी होती है इसलिए गर्मी और उमस के मौसम के लिए यह बहुत लाभकारी होता है। इसका निकला हुआ पानी भी काफी सुपाच्य होता है।

अमेरिकन न्यूट्रीशियन एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार यह शरीर को ऊर्जावान बनाता है ! थकान महसूस नहीं होने देता ! सुस्ती दूर करता है ! शरीर में लिए लाभकारी बैक्टेरिया की बढ़त होती है ! शरीर की बढ़ी हुई गर्मी कम होती है ! पेट के लिए बहुत मुफीद है ! चूँकि फायबर युक्त होता है, इसलिए कब्ज वगैरह से भी निजात दिलाता है ! रक्तचाप को नियंत्रित करता है ! टेंशन दूर करता है ! इसका विटामिन B12 का भंडार एलर्जी, त्वचा की बीमारियों और झुर्रियों वगैरह को दूर रखता है। 


योरोपियन तो इसके इतने भक्त हो गए हैं कि इसकी वहां बाकायदा ''मॉर्निंग राइस'' ब्रांड नाम से बिक्री होनी भी शुरू हो चुकी है। अब हमारे यहां भी इस पर और शोध के लिए प्रोजेक्ट बनने आरंम्भ हो चुके हैं। चलिए, देर आए दुरुस्त आए ! जागे तो सही ! अपनी धरोहरों की कीमत पहचानी तो सही ! यदि ऐसा एक कदम उठा है: तो आशा है भविष्य में हम अपने अनमोल पर हाशिए धकेल दिए गए अनुपम ज्ञान का फिर मानव कल्याण के लिए उपयोग कर सकेंगे। पर पहले हमें अपने अंदर गहरे तक पैठ चुकी हीन भावना और अपने ही प्रति सहेजी हुई नकारात्मकता को निकाल फेंक, अपने ऋषि - मुनियों द्वारा बताए - सुझाए गए आहारों, उनके गुणों और उनको अपनाने के कारणों को अपनी आगे की पीढ़ियों को समझाना पडेगा ! जिससे वे सिर्फ चलन के कारण कुछ भी खाने के पहले उसके गुण-दोषों को ठीक से समझ सकें और भोजन विकार से खुद को बचा सकें।   

आभार - अंतर्जाल तथा मैनेजमेंट फंडा    

बुधवार, 6 जनवरी 2021

मानव खुद को जहान का मालिक ना समझ, सिर्फ रखवाला ही माने तभी बेहतरी है

सृष्टि की  सृजन क्रिया में  जीवाणु से  लेकर मनुष्य  तक, तथा  एल्गी-कवक से  लेकर वृक्ष-वनस्पतियों तक करोड़ों  तरह के उत्पाद  अस्तित्व में आए। जिनके संरक्षण के लिए जल-थल -आकाश-अग्नि -वायु का सहयोग लिया गया। इन सब में संतुलन बनाए रखने के लिए एक सुसम्बद्ध चक्र का निर्माण किया गया।  जिसके  लिए  अपने आप में  महत्वपूर्ण  करोड़ों  जीव-जंतुओं की श्रृंखला बनी। जिनमें सिरमौर रहा, इंसान !

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कायनात ने इस धरा को खूबसूरत बनाने के लिए  कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। तरह-तरह के पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे !  उनके  अनुसार हवा-पानी, खान-पान, रहन-सहन का पूरा इंतजाम !  हरेक अपने आप में  पूर्ण रूप से एक स्वतंत्र इकाई ! फिर भी सबकी अपनी  अहमियत,  खासियत  व  हैसियत ! सभी का इस वसुंधरा को सुरक्षित, खुशहाल, सुन्दर तथा पूर्ण बनाने में किसी ना किसी तरह का सहयोग। प्रकृति ने  मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे व पर्यावरण सब  को एक दूसरे का पूरक बनाया, जिससे संतुलन बना रहे। इस काम के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सभी प्राणियों से  कुछ ज्यादा समझदार  बनाया और अपनी  बनाई हुई दुनिया की बागडोर उसके हाथों सौंप दी।  जिससे वह अपने ''साथियों'' की देख-भाल तो  कर ही सके, साथ ही उसकी बनाई इस अद्भुत कृति की भी ठीक तरह से सार-संभार हो सके।  

प्रकृति ने अपनी बगिया को सजाने के लिए तरह - तरह की  करोड़ों  नेमतों की रचना  की। विभिन्न  तरह के उत्पादों का सृजन किया। जिसके लिए छोटे से छोटे जीवाणु से लेकर मनुष्य, एल्गी-कवक से ले कर वृक्ष-वनस्पतियों तक अस्तित्व में आए। जिनके संरक्षण के लिए जल - थल - आकाश -अग्नि-वायु का सहयोग लिया गया। इन सब में संतुलन बनाए रखने के लिए एक ''सुसम्बद्ध चक्र'' का निर्माण किया गया। इसके लिए अपने आप में महत्वपूर्ण करोड़ों जीव-जंतुओं की श्रृंखला बनी: जिनमें सिरमौर रहा, इंसान !

इंसान कुदरत की बेहतरीन रचना तो है, पर संतुलन बनाए रखने के लिए, उसे दिमागी तौर पर तो सर्वश्रेष्ठ बनाया पर उतनी  शारीरिक क्षमता नहीं दी। समस्त चराचर  की जीवन प्रणाली देखी जाए तो  शायद ही कोई जीव अपने  सृजनकर्ताओं पर इतना  निर्भर होता है जितना कि इंसान !  जहां जन्म के कुछ  ही समय के बाद सब, अपने लिए ही सही, स्वछंद जिंदगी जीना आरंभ कर देते हैं ! वहीं  इसके उलट मानव को अपने पैरों पर खड़े होने, अपनी हिफाजत करने, सोचने - समझने लायक होने में वर्षों लग जाते हैं। परन्तु  इसीलिए वह एक पारिवारिक - सामाजिक जीव भी बन पाता है। जो  ता-उम्र अपनी  संतति की  चिंता में  अपने आप को डुबाए रखता है। पहले अपने बच्चों और फिर उनके बच्चों की परवरिश में अपने को उलझाए-उलझाए जीवन गुजार देता है। पर इन्हीं उलझावों से ही लगाव,  स्नेह जैसी भावनाएं ! प्रेम,  दया, करुणा,  ममता,  त्याग,  परोपकार, सहानुभूति,  जैसे सद्विचार भी पनप पाते हैं ! जो  मानव को उत्कृष्ट और सर्वोपरि बनाते हैं।  उसको दूसरों का सुख - दुःख समझने की  लियाकत देते हैं। उसे मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों, पेड़-पौधे, पर्यावरण को बचाने की भी समझ प्रदान करते हैं। सिर्फ अपने लिए ही नहीं समस्त जगत के लिए जीने का हौसला देते हैं।

यह सही है  कि जहां  अच्छाई होती है, वहां कुछ ना कुछ बुराई  भी होती है ! पर साथ ही यह भी सच्चाई है कि दुनिया में अच्छाई  की बहुलता है और उसी के प्रयासों से  ही यह संसार भी कायम है ! हालांकि कुछ भ्रष्ट लोगों ने पृथ्वी पर उपलब्ध  जल,  अनाज,  पशु-पक्षी,  पेड़-पौधे व ऊर्जा  के स्त्रोतों पर अपना मालिकाना हक़ समझ, उनका असंतुलित  दोहन कर लिया। जिसका  खामियाजा दुनिया भर के लोगों को अपने जान-माल से करना पड़ा !  प्रकृति से नसीहत मिलते ही आदमी  को अपनी औकात समझ में आ गई और वह आखिरकार अपनी भूल सुधारने के लिए मजबूर भी हुआ ! 

अब तो यही आशा करनी चाहिए कि हाल में आन पड़ी जानलेवा, बेकाबू आपदाओं से  सबक सीख समस्त मानव जाति अपने आप  को ही जहान भर का मालिक ना समझ, सिर्फ रखवाला  ही मानेगी और अपने साथ-साथ पृथ्वी और पृथ्वीवासियों  के हक़ का सम्मान  कर उन्हें भी अपनी तरह से जीने और रहने का हक़ प्रदान करेगी ।     

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आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट सिकदर करना

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है  ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प...