pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: राधानाथ सिकदर
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रविवार, 17 जनवरी 2021

आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट सिकदर करना

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

आजकल एक न्यूज़ चैनल पर माउंट एवरेस्ट के नाम को बदलने को ले कर चर्चा चल रही है। उनके अनुसार जब इसकी ऊँचाई की सटीक गणना राधानाथ सिकदर नाम के भारतीय ने की थी, तो क्यों ना दुनिया के इस सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा जाए ! यदि ऐसा हो जाता है तो यह हम सारे भारतीयों के लिए बड़े ही गर्व की बात होगी। पर क्या यह जटिल कार्य इतना आसान है !

1831 में भारत के सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट ने राधानाथ सिकदर की अप्रतिम, बहुमुखी प्रतिभा को पहचान उन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग में बाबू यानी क्लर्क के रूप में काम दिलाया था। एवरेस्ट, राधानाथ सिकदर के काम से इतने प्रभावित थे कि जब सिकदर को डिप्टी कलेक्टर बनने का मौका मिला तो एवरेस्ट ने हस्तक्षेप कर उन्हें अपने विभाग से जाने की अनुमति ही नहीं दी ! 1843 में जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हो गए और कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ को उनके स्थान पर नियुक्त किया गया। इधर सिकदर को भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अलावा कलकत्ता के मौसम विज्ञान विभाग का भी अधीक्षक बना दिया गया।

कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया 

उन्हीं दिनों कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ के आदेश पर सिकदर ने दार्जिलिंग के पास बर्फ से ढके हुए पहाड़ों को मापने का काम शुरू किया। उस समय तक सभी चोटियों का नामकरण नहीं हुआ था। सुविधा के लिए चोटियों के स्थानीय नामों को ही मान लिया जाता था। ऐसे में शिखर 15 की ऊंचाई नापने के दौरान छह अलग-अलग स्थानों से तरह-तरह से इकठ्ठा किए गए आंकड़ों से सिकदर ने यह निष्कर्ष निकाला कि हिमालय तथा दुनिया की सबसे ऊँची चोटी 15 है। यह एक क्रांतिकारी खोज थी। उस समय तक इसे नेपाल में सगरमाथा और तिब्बत में चोमोलंगमा के नाम से जाना जाता था। 

राधानाथ सिकदर
सिकदर की रिपोर्ट पर कुछ वर्षों तक शोध होता रहा ! गहन निरिक्षण, परिक्षण, बारीक जांच-पड़ताल के उपरान्त, पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया ! इस प्रकार दुनिया की सबसे ऊंची इस चोटी का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट रख दिया गया पर साथ ही राधानाथ सिकदर के अमूल्य योगदान को भी भूला दिया गया। 

आज वर्षों बाद उनके काम को ले कर जागरूकता फैलाई जा रही है। उनको श्रेय दिलवाने की बात उठ रही है ! उनके नाम पर माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जो चाहें रख लें ! इसलिए ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी ! लिए सबसे पहले भारत सरकार को कूटनीतिक शुरुआत करनी होगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल है ! यह जानते-समझते हुए ही कोई नेता, लोक-लुभावन प्रस्ताव होने के बावजूद इससे जुड़ता हुआ नहीं लगता ! 

जॉर्ज एवरेस्ट
नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल है। एक तो यह शिखर अपने देश में नहीं है ! दूसरे दुनिया में ऐसी कोई एजेंसी भी नहीं है कि वहां अपनी बात रख आवेदन कर दें और सही पाए जाने पर नाम बदल जाए ! भले ही हिमालय से हमारा भावनात्मक जुड़ाव सदियों से है पर उसकी यह चोटी नेपाल में स्थित है। इसका एक हिस्सा चीन में पड़ता है ! सो इन दोनों की सहमति सबसे जरुरी है। पर दुखद स्थिति यह है कि इन दोनों के साथ ही हमारे संबंध उतने मधुर नहीं हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों यथा पकिस्तान, बांग्ला देश और म्यांमार की रजामंदी की भी जरुरत पड़ेगी। जिसमें पकिस्तान से आशा रखना गलत ही होगा ! इनके अलावा यूनेस्को की भी इजाजत की जरुरत पड़ेगी, क्योंकि यह एक World Heritage Site है ! फिर ब्रिटेन ही क्यों राजी होगा, विश्व प्रसिद्ध जगह से जुड़े, अपने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, जुड़े नाम को हटाने के लिए ! सो अड़चनें तो बेशुमार हैं ! पर यदि उन पर पार पाया जा सके तो फिर क्या कहने !

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