pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: सितंबर 2026

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

महाबलीपुरम का शोर मंदिर, यह कैसा नाम

आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए आने-जाने वाले समुद्री व्यापारियों और नाविकों की सहूलियत व सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था..............1

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कभी-कभी किसी जगह, वस्तु या इंसान के वास्तविक नाम के बदले उसका किन्हीं कारणों से परिवर्तित नाम इतना मशहूर हो जाता है कि असली नाम किसी को याद ही नहीं रहता ! ऐसा ही एक नाम है, शोर मंदिर, जो दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन निर्माणों में से एक, तमिलनाडु के चेन्नई शहर से करीब पचपन कि.मी. दूर महाबलीपुरम के सागर तट पर स्थित है। इसका निर्माण पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने आठवीं शताब्दी में करवाया था ! ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर भारत के गौरवशाली इतिहास, वास्तुकला और इंजीनियरिंग की जीवंत मिसाल है। 

तट मंदिर 
रथ मंदिर 
इसे महाबलीपुरम के रथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है ! समुद्र की लहरों की पृष्ठभूमि में बना यह मंदिर अध्यात्म और पर्यटन का अनोखा संगम है। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा व अद्भुत दृश्य पेश करती हैं। इस परिसर में तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु जी का मंदिर है, जिसके दोनों तरफ शिव मंदिर हैं। समुद्र की तरफ का मुख्य द्वार पूर्व की ओर खुलता है। सुबह की पहली सूर्यकिरण जब मंदिर के शिवलिंग पर पड़ती है, तो वह नजारा अलौकिक होता है। 

सागर का शोर 
अब इस मंदिर के नाम की बात ! मंदिर का ''शोर'' नाम पर्यटकों को कुछ असमंजस में डाल देता है, क्योंकि सुनने वाले को शोर का मतलब कोलाहल या शोरगुल समझ में आता है, पर यह शोर (SHORE) अंग्रेजी का शब्द है, जो इसके समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण पड़ा है, जिससे इसे तट मंदिर भी कहा जाता है ! पर सवाल यह उठता है कि आठवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम शोर कैसे हो गया ? जबकि अंग्रेज तो 17 वीं शताब्दी में भारत आए थे ! तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि समय, परिस्थितियों और समुद्र के अविराम शोर के चलते ऐसा हुआ होगा !

राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय
इ तिहास खंगालने पर पता चलता है कि आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए समुद्री व्यापारियों और नाविकों का आना-जाना लगा रहता था, तब उनकी सहूलियत और सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था ! इसके अलावा शिवजी के मंदिरों को क्षत्रियसंहपल्लवेश्वर व राजसिंहपल्लवेश्वर के नाम से जाना जाता है, जिनमें उनके प्रतीक रूप में शिव लिंग स्थापित हैं। 

दर्शनीय 
ऐसी मान्यता भी है कि पहले यहां सात विशाल मंदिर हुआ करते थे, जिनमें से 6 मंदिर समय के साथ समुद्र में समा गए और आज केवल यह शोर मंदिर ही शेष बचा है। प्राचीन समय में विदेशी समुद्री यात्रियों और नाविकों को यह मंदिर समुद्र से बहुत दूर से ही दिखाई दे जाता था। इसी वजह से इसे प्राचीन काल में "Seven Pagodas" (सात पैगोडा) के नाम से भी जाना जाता था। 

अद्भुत 
यह 27 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा मंदिर विभिन्न मूर्तियों, पौराणिक कथाओं के दृश्यों से सजी एक विशाल दीवार से घिरा हुआ है। दीवारों, स्तंभों और चौखटों पर बेहतरीन सूक्ष्म नक्काशी पल्लव राजवंश के कलात्मक कौशल को प्रदर्शित करती है। यहीं पर एक मछली के आकार की विशाल शिला खंड पर ईश्वर, मानव, पशुओं, पक्षियों की विभिन्न आकृतियों को भी उकेरा गया है ! यह मंदिर सिर्फ महाबलिपुरम या तमिलनाडु का नहीं बल्कि देश के गौरव का प्रतीक माना जाता है।

अवशेष 
मूल रूप से शोर मंदिर एक बड़े मंदिर परिसर का हिस्सा है, जो समुद्र से डूबा हुआ है ! बाहर केवल यह मंदिर ही खड़ा है ! पुरातत्व विभाग इसकी खोज-खबर ले रहा है ! यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में सम्मानित इस प्रमुख पर्यटक स्थल तक देश के किसी भी भाग से रेल या वायु-मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार  

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

सैर कर दुनिया की, ये जिंदगानी फिर कहां

उम्र कितनी भी हो, जिंदादिल इंसानों में नई जगहें, पुरानी यादें ताजा करने और सुकून के पलों की चाहत जीवन में कभी खत्म नहीं होती ! पर बढ़ती आयु कई आशंकाएं भी साथ ले आती है ! पर यदि  भ्रमण की सही जगह चुन, कुछ जरूरी तैयारियां कर और किसी भी परिस्थिति का हल सोच कर यात्रा की जाए तो उसे काफी सुरक्षित बनाया जा सकता है। इसलिए जब तक शरीर इजाजत देता है तब तक घूमिए, खूब घूमिए ! क्योंकि यही समय है जब जिंदगी की जिम्मेदारियों से उबर कर खुद अपने लिए कुछ करने का अवसर हासिल हुआ होता है.................🥰  

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इं सान की जिंदगी की दूसरी पारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। हालंकि इसमें तकरीबन रोज ही कई तरह की अड़चनों, दवाबों, पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है ! जैसे किसी बुजुर्ग को नई तकनीक इस्तेमाल करने में थोड़ी परेशानी हो, तो तुरंत मान लिया जाता है कि वह इसे सीख नहीं सकता। किसी उम्रदराज व्यक्ति को लेकर यह आम धारणा होती है कि उसमें अब पहले जैसी ऊर्जा या काम करने की शक्ति नहीं है ! समस्या यह है कि ये सिर्फ ऐसी धारणाएं हैं, जो सभी उम्रदराज लोगों पर लागू नहीं होतीं ! दुनिया में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहां बढ़ती उम्र में भी अपनी दृढ इच्छाशक्ति के चलते बुजुर्गों ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं !

युचीरो मिउरा, 80, एवरेस्ट फतह 
फौजा सिंह, 100 +, दौड़ते ही रहे 
सारा ब्रुअर, 64, महासागर पार 

वैसे भी उम्र कितनी भी हो, जिंदादिल इंसानों में नई जगहें, पुरानी यादें ताजा करना और सुकून के पल बिताने की चाह जीवन में कभी खत्म नहीं होती ! जरुरत है सिर्फ हौसले और आत्म-विश्वास की ! हालांकि घर-परिवार के अन्य सदस्यों में घबराहट होना भी स्वाभाविक है, मन में यह सवाल बना रहता है कि अगर रास्ते में कोई परेशानी आ गई, तो क्या होगा  ? पर बढ़ती उम्र में भी घूमने की सही जगह चुन, कुछ जरूरी तैयारियां कर और किसी भी परिस्थिति का हल सोच कर यात्रा को काफी सुरक्षित बनाया जा सकता है। इसलिए जब तक शरीर इजाजत देता है तब तक घूमिए, खूब घूमिए ! क्योंकि यही समय है जब जिंदगी की जिम्मेदारियों से उबर कर खुद अपने लिए कुछ करने का अवसर हासिल हुआ होता है !  

आह्लाद 

सुखद पल 

पर कहीं भी घूमने जाने की इच्छा हो तो बेहतर होगा कि किसी ग्रुप से जुड़ जाएं ! जहां कोई ट्रैवल एजेंसी वरिष्ठ नागरिकों के लिए टूर आयोजित करती हो। इनके शेड्यूल में आमतौर पर भागदौड़ कम और आराम के लिए पर्याप्त समय होता है। ऐसे ट्रैवल ऑपरेटरस को यात्रा के दौरान हो सकने वाली किसी भी समस्या से निपटने का अनुभव होता है ! यदि पूर्णरूपेण ट्रिप बुजुर्गों के लिए हो तो उनकी हर छोटी-बड़ी जरुरत का ध्यान रखा जाता है ! ठहरने, खाने, घूमने, यातायात का पहले से ही प्रबंध किया हुआ होता है ! जिससे आपको किसी बात की चिंता नहीं करनी पड़ती ! इसके अलावा एक सुरक्षा का एहसास बना रहता है, जिससे पूरी यात्रा तनावमुक्त रहती है !  

सिर्फ खुद 

संतुष्टि 
यदि अकेले ही यात्रा करनी हो तो उसके पहले कुछ जरुरी एहतियात बरतना बहुत आवश्यक है ! सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का आकलन जरूर करें। हो सके तो अपने डॉक्टर की सलाह भी ले लें, इससे मनोबल में बढ़ोत्तरी होगी ! अपनी दवाइयों के साथ अपनी एक छोटी सी मेडिकल इन्फॉर्मेशन शीट भी रख लें ! ऐसी जगह चुनें, जहां आवागमन सुगम हो, जहां जा रहे हैं वहां के माहौल, मौसम की जानकारी भी जरूर ले लें !  एक दिन में कम जगहें, आराम से देखें, ताकि बिना थके यात्रा का आनंद ले सकें। अपने साथ एक छोटा कार्ड रखें, जिस पर आपका नाम, दो मोबाइल नंबर, जिनसे आपात स्थिति में संपर्क किया जा सके ! जहां ठहरें हैं उस होटल का नाम व पता लिखा हो। इसके अलावा घर के सदस्यों से फोन पर संपर्क बनाए रखें ! यदि छोटी-छोटी सावधानियां, सही तैयारी और थोड़ी सतर्कता बरत ली जाए तो उम्र के किसी पड़ाव पर भी सफर को सुरक्षित, सुकूनभरा और यादगार बनाया जा सकता है। तो देर किस बात की !
अरे भाई निकल के आ घर से, आ घर से ! 
दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से...................! 

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार   

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

आराध्य की विदाई भी सम्मानजनक होनी चाहिए

मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना सिर्फ एक चलन हो कर रह गया है ! क्या प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले यह मूर्ति स्थापना सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! जिसके कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है.......!! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम सब भारतवासी उत्सव प्रिय लोग हैं। वर्ष भर हमारे यहां कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह के समारोह चलते ही रहते हैं ! पर साल के कुछ महीने, पर्वों के लिए खास होते हैं और अब उनका समय आया हुआ है ! रक्षा-बंधन और जन्माष्टमी के बाद बप्पा जी आने वाले हैं, फिर हमारे पूर्वज आएंगे, फिर माँ का आगमन होगा। इसके साथ ही महाकाव्यों का मंचन, पूजा, स्तुति करते हुए कब साल बीत जाएगा, आबालवृद्ध किसी को भी पता ही नहीं चल पाएगा ! पर ऐसे में एक विडंबना भी है ! हम जिसको पूजते हैं, आराधना करते हैं, पलक-पांवड़े बिछाते हैं उसी की अनजाने में बेकद्री भी कर देते हैं, इस अविवेकता, बुद्धिहीनता, नासमझी से बचना भी बहुत जरुरी है !

बप्पा 
दुर्गा पूजा 
होता क्या है कि पर्वों के दिनों में हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को एक निश्चित अवधि के लिए सार्वजनिक स्थलों के अलावा अपने घरों में भी एक निश्चित अवधि के लिए स्थापित किया जाता रहा है ! समय और चलन के साथ-साथ अब घर-घर में अपने आराध्यों की स्थापना होने लगी है, जिनकी नियमानुसार विदाई भी निश्चित होती है ! उनका विसर्जन किसी तालाब, नदी या सागर में किया जाता है !

विदाई 

पूजा स्थलों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके आयोजकों में अपने कार्यक्रम को श्रेष्ठ सिद्ध करने की स्पर्द्धा या होड़ भी शुरू हो गई है, जिसका असर मूर्तियों के आकार, सजावट और साजो-सामान पर पड़ने लगा है, जिससे विसर्जन क्षेत्र में उनको विगलित होने के लिए ज्यादा जगह और समय की जरुरत पड़ने लगी है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है !
नासमझी 

बदहाली 
मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना करना एक चलन हो गया है ! देखा-देखी या बच्चों की जिद के कारण यह प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! इसी कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है !
दुर्दशा 
पर्यावरण 😥
आज जरुरत है, प्रकृति से समन्वय की ! पर्यावरण को बचाने की ! जल स्रोतों को संभालने की ! फिजूल-खर्ची पर रोक लगाने की ! धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की ! अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों, अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की ! ऐसा तभी संभव हो पाएगा जब हम, सब चलता है, की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इस ओर ध्यान देंगे !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

रविवार, 6 सितंबर 2026

बगावत मशीनों की, सिर्फ डरावनी कल्पना नहीं रह गई है

खबर है कि ''ओपनएआई'' के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक ''एजेंट्स'' ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा, मशीनें क्या करेंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती..............😨

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करीब साठ-सत्तर साल पहले एक लेखक ने एक डरावनी सी कल्पना की थी कि हो सकता है मशीनें इंसानों पर हावी हो जाएं ! कल्पनाकार थे, ली फाक, जिनका असली नाम लियोन हरिसन ग्रास था। वे अमेरिका में थियेटर निदेशक होने के साथ-साथ अत्यंत लोकप्रिय कॉमिक शृंखलाओं के रचयिता थे। उनकी कॉमिक स्ट्रिप के दो विश्वप्रसिद्ध नायक थे, पहला अपराधियों से लड़ने वाला सुपर हीरो 'द फैंटम' तथा दूसरा 'मैंड्रेक द मैजिशियन'। साठ-सत्तर के दशक में इन दोनों की लोकप्रियता का जादू विश्व भर के आबालवृद्ध के सर चढ़ कर बोला करता था। 

इंसान पर हावी होने का खतरा 

ली फाक 
ली फाक ने जून 1967 में, जब कंप्यूटर शुरुआती दौर में थे, ''मैंड्रेक द मैजिशियन'' की शृंखला की एक कहानी "द कंप्यूटर वर्ल्ड" (The Computer World) में कंप्यूटर विद्रोह की एक अनोखी झलक दिखलाई थी। जिसमें एक अति-आधुनिक और विशालकाय सुपरकंप्यूटर बनाया जाता है, जिसे इंसान की तरह सोचने और निर्णय लेने की क्षमता दी जाती है। कुछ ही समय में यह कंप्यूटर खुद को इंसानों से बेहतर और श्रेष्ठ मानने लगता है और स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर देता है। 

वेताल 

मैंड्रेक 

धीरे-धीरे वह कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए दुनिया भर के अन्य कंप्यूटरों और स्वचालित मशीनों पर नियंत्रण हासिल कर लेता है। वह इतना सक्षम हो जाता है कि इंसान की आवाज सुने बगैर उसके हाव-भाव और शारीरिक भाषा से ही उसका इरादा भांप लेता था ! फिर वह अपने बॉस, इंसानों के आदेशों को मानने से इनकार कर, "डिजिटल विद्रोह" की घोषणा कर देता है तथा सेना और रक्षा प्रणालियों से जुड़े कंप्यूटरों को भी प्रभावित करने लगता है, तब अपनी सूझ-बूझ और कौशल से जादूगर मैन्ड्रेक उसके इरादों को निरस्त करता है ! 

खलनायक मशींने 
वह तो एक काल्पनिक कहानी थी, पर आजकल जैसी खबरें आने लगी हैं, उनसे वर्षों पहले की ली फाक की वह रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पना आधुनिक आविष्कार AI के माध्यम से कुछ-कुछ साकार होती दिख रही है ! जबसे इस विधा को इंसानों की नकल करने के साथ-साथ अन्य समस्याओं को हल करने की सीख दी जा रही है, तबसे यह ऐसा व्यवहार करने लगी है जिसकी तनिक सी भी उम्मीद इसके निर्माताओं को नहीं थी, इसने किसी समस्या को हल करने के लिए अपनी तलाश की सीमाएं लांघ धोखा देना भी सीख लिया है !
आशंका 

कुछ दिनों पहले एक बेहद रोमांचक खबर अमेरिका से आई है जो किसी कम्प्यूटर की बगावत से भी ज्यादा डरावनी और खतरनाक है ! बताया जाता है कि ओपनएआई के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक एजेंट्स ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! खुद ही एक-दूसरे के नाम और उपाधि निर्धारित कर साइबर हमले की साजिश रच डाली ! इतना ही नहीं पकड़े जाने पर सबूत मिटाने तक का भी इंतजाम कर लिया था ! 

चेतावनी 

यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा मशीनें क्या करेंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती !

@संदर्भ व चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

विशिष्ट पोस्ट

महाबलीपुरम का शोर मंदिर, यह कैसा नाम

आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए आने-जाने वाले समुद्री व्यापारियों और नाविकों की सहूलियत व सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की व...