pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: श्रद्धा
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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

आराध्य की विदाई भी सम्मानजनक होनी चाहिए

मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना सिर्फ एक चलन हो कर रह गया है ! क्या प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले यह मूर्ति स्थापना सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! जिसके कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है.......!! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम सब भारतवासी उत्सव प्रिय लोग हैं। वर्ष भर हमारे यहां कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह के समारोह चलते ही रहते हैं ! पर साल के कुछ महीने, पर्वों के लिए खास होते हैं और अब उनका समय आया हुआ है ! रक्षा-बंधन और जन्माष्टमी के बाद बप्पा जी आने वाले हैं, फिर हमारे पूर्वज आएंगे, फिर माँ का आगमन होगा। इसके साथ ही महाकाव्यों का मंचन, पूजा, स्तुति करते हुए कब साल बीत जाएगा, आबालवृद्ध किसी को भी पता ही नहीं चल पाएगा ! पर ऐसे में एक विडंबना भी है ! हम जिसको पूजते हैं, आराधना करते हैं, पलक-पांवड़े बिछाते हैं उसी की अनजाने में बेकद्री भी कर देते हैं, इस अविवेकता, बुद्धिहीनता, नासमझी से बचना भी बहुत जरुरी है !

बप्पा 
दुर्गा पूजा 
होता क्या है कि पर्वों के दिनों में हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को एक निश्चित अवधि के लिए सार्वजनिक स्थलों के अलावा अपने घरों में भी एक निश्चित अवधि के लिए स्थापित किया जाता रहा है ! समय और चलन के साथ-साथ अब घर-घर में अपने आराध्यों की स्थापना होने लगी है, जिनकी नियमानुसार विदाई भी निश्चित होती है ! उनका विसर्जन किसी तालाब, नदी या सागर में किया जाता है !

विदाई 

पूजा स्थलों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके आयोजकों में अपने कार्यक्रम को श्रेष्ठ सिद्ध करने की स्पर्द्धा या होड़ भी शुरू हो गई है, जिसका असर मूर्तियों के आकार, सजावट और साजो-सामान पर पड़ने लगा है, जिससे विसर्जन क्षेत्र में उनको विगलित होने के लिए ज्यादा जगह और समय की जरुरत पड़ने लगी है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है !
नासमझी 

बदहाली 
मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना करना एक चलन हो गया है ! देखा-देखी या बच्चों की जिद के कारण यह प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! इसी कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है !
दुर्दशा 
पर्यावरण 😥
आज जरुरत है, प्रकृति से समन्वय की ! पर्यावरण को बचाने की ! जल स्रोतों को संभालने की ! फिजूल-खर्ची पर रोक लगाने की ! धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की ! अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों, अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की ! ऐसा तभी संभव हो पाएगा जब हम, सब चलता है, की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इस ओर ध्यान देंगे !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

आम इंसान की समृद्धि में तीर्थों का योगदान,

इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को  व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे, पर्यटन बढ़ेगा, लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा, लोग समृद्ध होंगे, समाज में संपन्नता आएगी, खुशहाली बढ़ेगी, निर्धनता कम होगी। इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी ! जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से प्रचार-प्रसार हो सकेगा............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

देश को अपनी आर्थिक अवस्था को मजबूत करने का एक नया स्रोत मिल गया है और वह है धार्मिक पर्यटन (Religious Tourism), इसका आभास तो तब ही मिल गया था, जब माता वैष्णव देवी की यात्रा में मूलभूत सुविधाओं का इजाफा होने पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ गई थी ! पर तब की तथाकथित धर्म-निरपेक्ष सरकारों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए, इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया था ! पर वर्षों बाद जब काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर बने और उनको जनता का जिस तरह का प्रतिसाद मिला, वह एक नई खोज, एक नए विचार का उद्घोषक था ! राम मंदिर निर्माण ने इस विचार को और भी पुख्ता किया तथा इस महाकुंभ ने तो जैसे उस पर मोहर ही लगा एक नई राह ही प्रशस्त कर दी !

श्रीराम मंदिर 
अब देश की दशा-दिशा निर्धारित करने वालों को अपनी आर्थिक स्थित मजबूत करने के लिए एक अकूत खजाना मिल गया है ! उन्हें समझ आ गया है कि देश की धर्म-परायण जनता को यदि पर्याप्त सुरक्षा और सुख-सुविधा मिले तो वह धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए भी उतनी ही तत्पर रहती है, जितनी अन्य किसी पर्यटन स्थल के लिए ! महाकुंभ में श्रद्धालुओं की अनपेक्षित, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, मर्यादित उपस्थिति इसका ज्वलंत उदाहरण है ! इसी से प्रोत्साहित हो कर अब इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को भी व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे पर्यटन बढ़ेगा ! लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा ! पलायन रुकेगा ! लोग समृद्ध होंगे ! समाज में संपन्नता आएगी ! खुशहाली बढ़ेगी ! निर्धनता कम होगी ! इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी, जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से  प्रचार-प्रसार हो सकेगा ! 
विश्वनाथ मंदिर परिभ्रमण पथ 

महाकाल मंदिर परिसर 
महा कुंभ के दौरान प्रयागराज के हर वर्ग के, हर तबके के लोगों को जो आमदनी हुई वह आँखें चौंधियाने वाली है ! इसमें अब कोई शक नहीं कि सुप्रसिद्ध स्थानों पर होने वाले ऐसे आयोजन या आने वाले समय में उन स्थानों पर बनने वाले एक-एक धार्मिक परिभ्रमण पथ, पर्यटन और मंदिरों की अर्थ-व्यवस्था (Religious Tourism and Temple Economy) देश के वाणिज्य, व्यापार और अर्थव्यवस्था में सुधार की अहम कड़ी होने जा रहे हैं ! कुंभ तिथि तो चार सालों में एक बार आती है पर माघ मेला तो हर साल लगता है ! छठ पूजा तो हर साल होती है ! गंगा दशहरा तो हर साल होता है ! तो ऐसे हर तीज-त्योहारों को भव्य, सुव्यवस्थित व सुरक्षित बना लोगों को आने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा ! 

जन सैलाब 

महाकुंभ 
यह सब जो आगत भविष्य में होने जा रहा है, वही कुछ लोगों के लिए, जो अपनी राजनितिक लड़ाई तो हार ही चुके हैं अपनी पहचान तक गंवाने की कगार तक पहुँच गए हैं, परेशानी का कारण बना हुआ है। उन्हें अपना नामो-निशान मिटता साफ दिखाई पड़ रहा है। इसीलिए वे अपने बचे-खुचे पूर्वाग्रही, भ्रमित वोटरों को बचाए रखने के लिए कुंभ के बहाने सनातन का विरोध कर रहे हैं, अपनी संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, अपने ही धर्म का विरोध कर रहे हैं, ! देश वासियों की आस्था, श्रद्धा, उनके संस्कारों की थाह के सामने हर बार मुंहकी खाने के बावजूद बेशर्मी की हद पार कर अनर्गल झूठ फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। अभी तो ऐसे लोगों की तिलमिलाहट और बढ़ेगी जब संभल जैसे कई नए-नए तीर्थ देश और विश्व के नक्शे पर उभर कर सामने आएंगे ! भगवान ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दे जिससे ये अपने स्वार्थों से ऊपर उठ देशहितार्थ कुछ कर सकें ! 
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से

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