मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना सिर्फ एक चलन हो कर रह गया है ! क्या प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले यह मूर्ति स्थापना सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! जिसके कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है.......!!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
हम सब भारतवासी उत्सव प्रिय लोग हैं। वर्ष भर हमारे यहां कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह के समारोह चलते ही रहते हैं ! पर साल के कुछ महीने, पर्वों के लिए खास होते हैं और अब उनका समय आया हुआ है ! रक्षा-बंधन और जन्माष्टमी के बाद बप्पा जी आने वाले हैं, फिर हमारे पूर्वज आएंगे, फिर माँ का आगमन होगा। इसके साथ ही महाकाव्यों का मंचन, पूजा, स्तुति करते हुए कब साल बीत जाएगा, आबालवृद्ध किसी को भी पता ही नहीं चल पाएगा ! पर ऐसे में एक विडंबना भी है ! हम जिसको पूजते हैं, आराधना करते हैं, पलक-पांवड़े बिछाते हैं उसी की अनजाने में बेकद्री भी कर देते हैं, इस अविवेकता, बुद्धिहीनता, नासमझी से बचना भी बहुत जरुरी है !
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| बप्पा |
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| दुर्गा पूजा |
होता क्या है कि पर्वों के दिनों में हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को एक निश्चित अवधि के लिए सार्वजनिक स्थलों के अलावा अपने घरों में भी एक निश्चित अवधि के लिए स्थापित किया जाता रहा है ! समय और चलन के साथ-साथ अब घर-घर में अपने आराध्यों की स्थापना होने लगी है, जिनकी नियमानुसार विदाई भी निश्चित होती है ! उनका विसर्जन किसी तालाब, नदी या सागर में किया जाता है !
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| विदाई |
पूजा स्थलों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके आयोजकों में अपने कार्यक्रम को श्रेष्ठ सिद्ध करने की स्पर्द्धा या होड़ भी शुरू हो गई है, जिसका असर मूर्तियों के आकार, सजावट और साजो-सामान पर पड़ने लगा है, जिससे विसर्जन क्षेत्र में उनको विगलित होने के लिए ज्यादा जगह और समय की जरुरत पड़ने लगी है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है !
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| नासमझी |
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| बदहाली |
मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना करना एक चलन हो गया है ! देखा-देखी या बच्चों की जिद के कारण यह प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! इसी कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है ! |
| दुर्दशा |
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| पर्यावरण 😥 |
आज जरुरत है, प्रकृति से समन्वय की ! पर्यावरण को बचाने की ! जल स्रोतों को संभालने की ! फिजूल-खर्ची पर रोक लगाने की ! धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की ! अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों, अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की ! ऐसा तभी संभव हो पाएगा जब हम, सब चलता है, की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इस ओर ध्यान देंगे !
@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार