सोमवार, 17 मई 2021

एक था बुधिया, द मैराथन रनर

अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है। हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक, अति अपेक्षा और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में भी सामान्य  बच्चों से पिछडता चला गया....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

याद है आपको, वह पांच साल का बच्चा, बुधिया ! जिसने ओडिसा में 2006 के मई महीने की तपती दोपहरी में लगातार सात घंटे दो मिनट दौड़ कर पुरी से भुवनेश्वर तक की 65 किलोमीटर की दूरी को नाप कर दुनिया का सबसे कम उम्र का मैराथन धावक बनने का गौरव हासिल कर, सब को आश्चर्यचकित कर रख दिया था ! जिसका उत्साहवर्धन करने और मनोबल बनाए रखने के लिए रिजर्व पुलिस बल के दो सौ जवान भी उसके साथ दौड़े थे। जो रातों-रात हर अखबार और टेलीविजन चैनल की सुर्खियों में छा दुनिया भर में मशहूर हो गया था ! जबकि उस समय उसकी उम्र चार वर्ष से कुछ ही ज्यादा थी ! इस हैरतंगेज कारनामे के लिए उसका नाम ''लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस" में  भी शामिल किया गया था। बुधिया ने महज 5 साल की उम्र में 48 मैराथन पूरे कर लिए थे ! नन्हें बुधिया के चर्चा में आते ही विभिन्न संस्थाओं ने उसके लिए ढेरों कोष बनाने की घोषणाएं भी की थीं। उसके नाम के साथ Budhiya Born to Run ! Budhiya the Wonder Boy जैसे तरह-तरह के विशेषण जुड़ने लग गए थे ! पर फिर क्या हुआ ? कहां गुम हो गया, वह नन्हा मैराथन धावक ?

 


बुधिया सिंह ! एक अत्यन्त गरीब परिवार का बेटा ! गरीबी इतनी कि दूसरों के घर काम करती, उसकी माँ सुकांति सिंह ने अपने इस बच्चे को सिर्फ आठ सौ रूपए में एक परिवार को बेच दिया ! पर फिर भाग्य को कुछ तरस आया और एक दिन खेलते हुए इस बच्चे पर दौड़ाक और जुडो कोच बिरंची दास की नजर पड़ी ! उन्होंने प्रतिभा को भांप लिया और बुधिया को गोद ले अपने निरक्षण में दौड़ने का प्रसिक्षण देने लगे। पर भाग्य का फेर ! बुधिया का कुछ नाम होते ही उसकी माँ ने, जिसने चंद रुपयों के लिए उसे बेच डाला था, कोच बिरंची दास पर ना केवल गलत व अनर्गल आरोप लगाये बल्कि बुधिया को बंधक बनाने तक के मुकदमे भी दर्ज करा दिए ! इसी तनातनी के बीच बिरंची दास की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गई ! इसके साथ ही बुधिया के दुर्दिन फिर शुरू हो गए !

कोच बिरंची दास के साथ बुधिया 


हालांकि उसकी प्रतिभा के चलते सरकार ने उसे भुवनेश्वर के SAI होस्टल मे रख, लंबी दूरी का धावक बनाने का प्रयास विधिवत रूप से शुरू किया भी था ! मगर इस सब से उचाट बुधिया हाॅस्टल से ही भाग निकला ! अपनी माँ की महत्वाकांक्षा और लालच के चलते एक विलक्षण प्रतिभा का वो हश्र हुआ, जो नही होना चाहिये था ! यह एक कटु सत्य है कि जो बच्चे अपने बचपन में ही अनायास मिली ख्याति, प्रसिद्धि और स्टारडम का स्वाद चख लेते हैं, आगे चल कर असफलता उनकी नियति बन जाती है ! हमारे आस-पास ऐसे लाखों उदाहरण मौजूद हैं ! इसमें उन मूर्ख अभिभावकों का भी बहुत बड़ा हाथ  होता है जो अपने अधूरे सपनों को अपने मासूम बच्चों की मार्फ़त पूरा करने की भूल किए जाते हैं ! जिंदगी की दौड़ में अपने बच्चे के पिछड़ जाने के बेफिजूल डर से वे अपने बच्चों से उनका बचपन, मासूमियत, भोलापन छीन बेवजह पैसा लुटा उसे सफल बनाने पर तुले रहते हैं ! वे भूल जाते हैं कि पौधा प्राकृतिक रूप से ही बड़ा हो पेड़ बनता है ! ज्यादा खाद-पानी उसे नष्ट भी कर सकते हैं ! पर नहीं ! सबके सब अपने बच्चों को बिना उनकी लियाकत या रुझान जाने, नायक, गायक, खिलाड़ी बनाने पर आमादा रहते हैं ! एक अँधी दौड चल रही है ! एक छलावा भ्रमित किए हुए है ! यही बुधिया के साथ हुआ !

बुधिया सिंह, अब 
आज वो वंडर ब्वाॅय बुधिया सिंह जवान हो चुका है। उस पर एक फिल्म भी बन चुकी है ! पर अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या, कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है । हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! जबकि उसे हर सहूलियत, विधिवत प्रशिक्षण और सरकारी मदद भी मिली पर फिर भी वह जीवन मे कुछ खास नही कर पाया ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की अति अपेक्षा, उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं मे भी सामान्य बच्चो से पिछडता चला गया । उसका कैरियर बनने से पहले ही ढह कर रह गया !
यह एक बानगी, एक चेतावनी, एक नसीहत भी है उन अभिभावकों के लिए, जो अपने अधूरे सपनों, अपनी ख्वाहिशों को मूर्त रूप  देने के लिए, वक्त से पहले ही अपने बच्चों को क्षणिक प्रसिद्धि और बिना मतलब की ख्याति दिलाने हेतु अपने बच्चों के भविष्य को अँधकारमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! ऐसे अभिभावकों से इतना ही कहा जा सकता है कि वे अपने बच्चों को नैसर्गिक तौर पर ही खेलने-कूदने-बढ़ने-फलने-फूलने दें ! उनसे उनका बचपन ना छीने ! उनके कोमल कंधों पर अपनी आकंक्षाओं को ना लादें ! वे जो चाहते हैं, करने दें ! आप सिर्फ उनका हौसला बढ़ाइए ! मीडिया पर छाए, बेवकूफ बनाते विज्ञापनों, तरह-तरह के उटपटांग सीरियलों के झांसे में ना आ कर, उन्हें प्राकृतिक तौर पर सीखने-समझने का मौका दीजिए ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 15 मई 2021

बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता था, पर.......

मेरी जिंदगी भर एक ही कामना रही कि आपसे कह सकूँ कि बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ! पर कभी भी कह नहीं पाया ! जबकि आप अपने रुतबे को कभी घर नहीं लाए। सदा गंभीर रहते हुए भी सरल, निश्छल, प्रेमल बने रहे ! पर पता नहीं दोष किसका रहा ! मेरी झिझक का, मेरे संकोच का या आज से बिल्कुल विपरीत उस समय का जब पिता के सामने पड़ने के लिए भी काफी हिम्मत की जरुरत होती थी। सारे काम, जरूरतें, संवाद माँ के जरिए ही संपन्न होते थे.................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बाबूजी सादर प्रणाम ! 14 मई, आपका जन्मदिन ! पर वर्षों तक ना कभी आपने बताया और ना हीं मनाया ! वह तो भला हो कनिष्ठा पूनम का, जिसने देर से ही सही इस दिशा में पहल की ! अलबत्ता अपना ना सही पर आपने दूसरों का मनाया और मनवाया भी ! पर उन लोगों ने भी कभी जरुरत नहीं समझी, सिर्फ शुभकामना देने तक की ! सिर्फ अपना मतलब सिद्ध करते रहे ! आप जान कर भी अनजान रहे ! कैसा समय हुआ करता था ! कितनी दूरी होती थी इस पीढ़ी के बीच ! प्यार-स्नेह-ममता-लगाव सब कुछ तो था ! पर जताया नहीं जाता था कभी, पता नहीं क्यूँ ? 
मेरी जिंदगी भर एक ही कामना रही कि आपसे कह सकूँ कि बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ! आप मेरे आदर्श है ! पर कभी भी कह नहीं पाया ! जबकि आप अपने रुतबे को कभी घर नहीं लाए। सदा गंभीर रहते हुए भी सरल, निश्छल, प्रेमल बने रहे ! पर पता नहीं दोष किसका रहा ! मेरी झिझक का, मेरे संकोच का या आज से बिल्कुल विपरीत उस समय का जब पिता के सामने पड़ने के लिए भी काफी हिम्मत की जरुरत होती थी। सारे काम, जरूरतें, संवाद माँ के जरिए ही संपन्न होते थे ! क्या आज की पीढ़ी सोच भी सकती है वैसे हालात के बारे में !  
जब एकांत में आपकी बेपनाह याद आती है ! जब आपसे एकतरफा बात करता हूँ ! तब लाख कोशिशों के बाद भी आँखें किसी भी तरह काबू में नहीं रहतीं 
हर बच्चे के लिए उसका पिता ही सर्वश्रेष्ठ व उसका आदर्श  होता है ! पर आप तो सबसे अलग थे ! मैंने जबसे होश संभाला तब से आपको अपनी नहीं सिर्फ दूसरों की फ़िक्र और उनकी बेहतरी में ही लीन देखा ! यहां तक कि छोटी सी उम्र से ही अपने पालकों को भी पालते रहे ता-उम्र आप ! अपने भाई बहन का तो बहुत से लोग जीवन संवारते हैं, पर आपने तो उनके साथ ही माँ के परिवार को भी सहारा दिया ! वह भी बिना किसी अपेक्षा के या कोई अहसान जताए या चेहरे पर शिकन लाए ! यह जानते हुए भी कि बहुत से लोग आपका अनुचित फ़ायदा उठा रहे हैं, आप अपने कर्तव्य पूर्ती में लगे रहे ! आखिर वह दिन भी आ ही गया जब आपको भी आराम की जरुरत महसूस होने लगी ! तब मतलब पूर्ती का स्रोत सूखता देख कइयों ने अपना पल्ला झाड़ रुख बदल लिया ! पर आप नहीं बदले ! जितना भी बन पड़ता था, दूसरों की सहायता करते रहे ! कहने-सुनाने को तो मेरे पास अनगिनत बातें हैं, इतनी कि पन्नों के ढेर लग जाएं पर स्मृतियाँ शेष ना हों !
जब भी पुरानी यादें मुखर होती हैं, तो बहुत से ऐसे वाकये भी याद आते हैं जब आप मुझसे नाराज हुए ! पर सही मायनों में बताऊँ तो आज तक समझ नहीं पाया कि जिस बात को मैं सोच भी नहीं सकता वैसा कैसे और क्यूँ हुआ ! सब गैर-इरादतन होता चला गया ! किसी दुष्ट ग्रह की वक्र दृष्टि और कुछ विघ्नसंतोषी लोगों का षड्यंत्र, कुछ का कुछ करवाता चला गया ! याद आता है तो बहुत दुःख और अजीब सा लगता है, अपने को सही साबित ना कर पाना और दूसरों के कुचक्र को ना तोड़ सकना ! पर जब कुछ-कुछ कोहरा छंटने लगा था तभी आप भी मुझे छोड़ गए !  

आज जब एकांत में आपकी बेपनाह याद आती है ! जब आपसे एकतरफा बात करता हूँ ! तब आँखें फिर किसी भी तरह काबू में नहीं रहतीं !  बाबूजी मैं (हम सब) आपसे बहुत प्यार करता था, हूँ और रहूंगा........! 

मंगलवार, 11 मई 2021

कण्वाश्रम, बाल भरत की क्रीड़ास्थली

चारों ओर सघन, सुनसान पर सुरम्य अरण्य से घिरे इस स्थल का मुख्य आकर्षण, सुन्दर चित्रों से सुसज्जित चार दीवारी से घिरा भरत स्मारक है जिसका निर्माण 1956 में हुआ बतलाते हैं। इस गोल इमारत के निचले हिस्से में भरत से संबंधित चित्रावली है ! ऊपर पहले खंड में देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित है ! मूर्ति का चेहरा और आँखें इतनी सजीव हैं कि लगता है अभी सचल हो उठेंगी। उस के ऊपर कण्व ऋषि की प्रतिमा है पर वहां जाने का रास्ता नहीं है...............!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री शकुंतला की कथा का वर्णन महाभारत में भी आता है ! पर इसको अमर किया महाकवि कालिदास के संस्कृत नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम ने ! इसकी कथा तो तक़रीबन सभी को ज्ञात ही है कि कैसे दुष्यंत-शकुंतला का गंधर्व विवाह हुआ, और कैसे शकुंतला को दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण कण्वाश्रम में ही रहना पड़ा था ! जहां उनके पुत्र भरत का जन्म हुआ ! भरत के बल के बारे में ऐसा माना जाता है कि वह बाल्यकाल में वन में सिंह जैसे हिंस्र जानवरों के बीच निर्भय-निडर हो उनके साथ खेला करते थे ! खेल ही खेल में अनेक जंगली जानवरों को पकड़कर उन्हें पेड़ों से बांध देते थे या फिर उनकी सवारी करने लगते थे। इसी कारण ऋषि कण्व के आश्रम के निवासियों ने उनका नाम सर्वदमन रख दिया था। जो आगे चल कर एक महान प्रतापी सम्राट बने ! उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।


कण्व वैदिक काल के महान ऋषि थे। माना जाता है कि उनका आश्रम आज के उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कोटद्वार भाबर क्षेत्र में एक पहाड़ी की तराई में मालिनी नदी के किनारे स्थित था। जहां सामान्य शिक्षा में उत्तीर्ण उन छात्रों को, अलग-अलग निकायों में विभिन्न तरह की, उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई जाती थी, जो अपने क्षेत्र में पारंगत होना चाहते थे। कण्वाश्रम में चारों वेदों, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिक्षा तथा कर्मकाण्ड इन छ: वेदांगों के अध्ययन-अध्यापन का प्रबन्ध था। यहां ऋषि कण्व के साथ ही ऋषि कश्यप भी विद्या दान किया करते थे।  




यज्ञ स्थान 
आज यह कोई धार्मिक स्थल या दैवी स्थान भले ही न हो ! पर आज भी यह हमारे समृद्ध इतिहास, हमारे राष्ट्र की आत्मा को जरूर संभाले-समेटे पड़ा है। कण्वाश्रम उत्तराखंड के कोटद्वार शहर से 14 कि.मी. की दूरी पर हेमकूट और मणिकूट पर्वतों की गोद में स्थित है। ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पर कुछ-कुछ उपेक्षित इस पर्यटन स्थल पर काफी ध्यान देने की जरुरत है !





विचार-विमर्श 
हजारों वर्ष पहले घटनाक्रम का आज कोई ठोस प्रमाण तो है नहीं ! जनश्रुति और ग्रंथों के विवरण के अनुसार ही इस जगह को कण्वाश्रम माना जाता है। पर यह अति मतवपूर्ण, विशाल भू-भाग भी अब वर्चस्व के लिए आपसी खींच-तान, ढुल-मुल राजनितिक रवैये और अवाम की उदासीनता के कारण दो हिस्सों में बंट कर रह गया है ! कोटद्वार से आते वक्त मालिनी नदी के पुल को पार करते ही सामने ऊपर करीब तीस फुट की ऊंचाई पर स्थित समतल भूभाग को लेकर एक पक्ष का दावा है कि यहीं दुष्यंत-शकुंतला विवाह संपन्न हुआ था। वहां एक छोटा सा पिंजरेनुमा मंदिर बना हुआ है, जिसमें दुष्यंत-शकुंतला हार पहने खड़े हैं। दो ऋषियों कण्व व कश्यप की प्रतिमाओं के साथ बाल भरत की मूर्ति भी है जो शेर के दांत गिनते दिखाए गए हैं ! चारों ओर बियाबान और सुनसान परिसर में उसी के कुछ ऊपर इस जगह के केयर टेकर महंत जी का निवास स्थान है। जिनका इस जगह को लेकर अपना दावा है ! 


धन्वन्तरी जी की सजीव सी प्रतिमा 

ऊपर चढ़ने का घुमावदार पथ 

मालिनी नदी के पुल को पार कर दाहिनी ओर करीब पौन किमी दूर, बेतरतीब सड़क द्वारा एक विशाल और कुछ-कुछ व्यवस्थित क्षेत्र, जहां बहुत कुछ निर्माणाधीन है तक पहुंचा जाता है ! इसी स्थल को वास्तविक कण्वाश्रम बताया जाता है ! मान्यता के अनुसार यहीं भरत का लालन-पालन हुआ और उनका बचपन बीता ! यहां के महंत, जो गुरूजी कहलाते हैं, उनके अनुसार कभी-कभी, कुछ-कुछ सरकारी सहायता मिल तो जाती है पर वह ऊँट के मुंह में जीरा ही साबित हो पाती है ! दैनिक खर्चे ही पूरे नहीं हो पाते ! इसलिए उन्होंने हर आने वाले पर्यटक से दस रूपए की राशि लेनी शुरू कर दी है ! वैसे यहां आने वालों के लिए मुफ्त में भोजन की भी व्यवस्था है। वर्तमान में गढ़वाल मंडल विकास निगम, कण्वाश्रम विकास समिति तथा शासकीय प्रयासों से इस स्थल की देख-रेख होती है।

कार पार्किंग से भरत स्मारक जाने का मार्ग 
                                
 रॉकेट के बेस जैसा विचित्र पेड़ का तना 

चारों ओर सघन, सुनसान पर सुरम्य अरण्य से घिरे इस स्थल का मुख्य आकर्षण, सुन्दर चित्रों से सुसज्जित चार दीवारी से घिरा भरत स्मारक है ! जिसका निर्माण 1956 में हुआ बतलाते हैं। इस गोल इमारत के निचले हिस्से में भरत से संबंधित चित्रावली है ! ऊपर पहले खंड में देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित है ! मूर्ति का चेहरा और आँखें इतनी सजीव हैं कि लगता है अभी सचल हो उठेंगी। उस के ऊपर कण्व ऋषि की प्रतिमा है, पर वहां जाने का रास्ता नहीं है। 

ध्यान कक्ष 
                                    

भ्रमण पर आईं स्कूली बालिकाऐं 
इसके अलावा कण्व ऋषि, भरत की मूर्तियों के साथ-साथ पुरातात्विक महत्त्व की अनेक मूर्तियाँ संरक्षित हैं। इसके साथ ही एक ध्यान केंद्र जिसे जबरदस्ती एक तंग सुरंग से गुजरने के बाद बनाया गया है ! वहीँ भोजन कक्ष, दवाखाना, ध्यान कक्ष, यज्ञ स्थान, पर्यटकों के रात्रि निवास के लिए अलग-अलग शुल्क धारी कुछ कमरे भी उपलब्ध हैं। पर लोगों की आवाजाही बहुत कम है और इस जगह को लोकप्रिय बनाने की अति जरुरत है जिसके लिए धन और जन दोनों की बहुत आवश्यकता है। वैसे हमारे रहते ही वहां किसी स्थानीय स्कूल की अनेक बालिकाएं अपनी शिक्षिकाओं के साथ पहुंची ! उनका उत्साह और जोश देखते ही बनता था ! जरुरत है ऐसी जगहों और उनसे जुडी कथाओं को जन-जन तक पहुंचाने की ! उनके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करवाने की ताकि हमारे गौरवशाली इतिहास की पूरी और सच्ची जानकारी आज की पीढ़ी तक भी पहुँच सके।

रविवार, 9 मई 2021

गांव से माँ का आना

अधिकतर संतान द्वारा बूढ़े माँ-बाप की बेकद्री, अवहेलना, बेइज्जती इत्यादि को मुद्दा बना कर कथाएं गढ़ी जाती रही हैं ! होते होंगे ऐसे नाशुक्रे लोग ! पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो आज की विषम परिस्थितियों में, जीविकोपार्जन की मजबूरियों के चलते चाह कर भी संयुक्त परिवार में नहीं रह सकते ! अलग रहने को मजबूर होते हैं ! ऐसी ही एक कल्पना है यह ! जहां ऐसा नहीं है कि अलग रहते हुए बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उसका आना-जाना अच्छा नहीं लगता ! वे तो उन्हें बेहद प्यार करते हैं ! उन्हें सदा माँ के सानिध्य की जरूरत रहती है ! पर फिर भी वे चाहते हैं कि माँ  इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दी वापस चली जाए  उतना ही अच्छा ! पर क्यूँ ...........?

(मातृदिवस पर एक पुरानी रचना का पुन: प्रकाशन)

#हिन्दी_ब्लागिंग 
गांव से माँ आई है। गर्मी पूरे यौवन पर है। गांव शहर में बहुत फर्क है। पर माँ को यह कहां मालुम है। माँ तो शहर आई है, अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के पास, प्यार, ममता, स्नेह की गठरी बांधे। माँ को सभी बहुत चाहते हैं पर इस चाहत में भी चिंता छिपी है कि कहीं उन्हें किसी चीज से परेशानी ना हो। खाने-पीने-रहने की कोई कमी नहीं है, दोनों जगह न यहां, न वहां गांव में। पर जहां गांव में लाख कमियों के बावजूद पानी की कोई कमी नहीं है, वहीं शहर में पानी मिनटों के हिसाब से आता है और बूदों के हिसाब से खर्च किया जाता है ! यही बात दोनों जगहों की चिंता का वायस है। भेजते समय वहां गांव के बेटे-बहू को चिंता थी कि कैसे शहर में माँ तारतम्य बैठा पाएगी ! शहर में बेटा-बहू इसलिए परेशान कि यहां कैसे माँ बिना पानी-बिजली के रह पाएगी ! पर माँ तो आई है प्रेम लुटाने ! उसे नहीं मालुम शहर-गांव का भेद। 

पहले ही दिन मां नहाने गयीं। उनके खुद के और उनके बांके बिहारी के स्नान में ही सारे पानी का काम तमाम हो गया। बाकी सारे परिवार को गीले कपडे से मुंह-हाथ पोंछ कर रह जाना पडा। माँ तो गांव से आई है। जीवन में बहुत से उतार-चढाव देखे हैं पर पानी की तंगी !!! यह कैसी जगह है ! यह कैसा शहर है ! जहां लोगों को पानी जैसी चीज नहीं मिलती। जब उन्हें बताया गया कि यहां पानी बिकता है तो उनकी आंखें इतनी बडी-बडी हो गयीं कि उनमें पानी आ गया।

माँ तो गांव से आई हैं उन्हें नहीं मालुम कि अब शहरों में नदी-तालाब नहीं होते जहां इफरात पानी विद्यमान रहता था कभी। अब तो उसे तरह-तरह से इकट्ठा कर, तरह-तरह का रूप दे तरह-तरह से लोगों से पैसे वसूलने का जरिया बना लिया गया है। माँ को कहां मालुम कि कुदरत की इस अनोखी देन का मनुष्यों ने बेरहमी से दोहन कर इसे अब देशों की आपसी रंजिश तक का वायस बना दिया है। उसे क्या मालुम कि संसार के वैज्ञानिकों को अब नागरिकों की भूख की नहीं प्यास की चिंता बेचैन किए दे रही है। मां तो गांव से आई है उसे नहीं पता कि लोग अब इसे ताले-चाबी में महफूज रखने को विवश हो गये हैं। 

माँ जहां से आई है जहां अभी भी कुछ हद तक इंसानियत, भाईचारा, सौहाद्र बचा हुआ है। उसे नहीं मालुम कि शहर में लोगों की आंख तक का पानी खत्म हो चुका है। इस सूखे ने इंसान के दिलो-दिमाग को इंसानियत, मनुषत्व, नैतिकता जैसे सद्गुणों से विहीन कर उसे पशुओं के समकक्ष ला खडा कर दिया है।

माँ तो गांव से आई है जहां अपने पराए का भेद नहीं होता। बडे-बूढों के संरक्षण में लोग अपने बच्चों को महफूज समझते हैं ! पर शहर के विवेकविहीन समाज में कोई कब तथाकथित अपनों की ही वहिशियाना हवस का शिकार हो जाए कोई नहीं जानता।

ऐसा नहीं है कि बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उन्हें उनका आना-रहना अच्छा नहीं लगता। उन्हें भी मां के सानिध्य की सदा जरूरत रहती है पर वे चाहते हैं कि माँ  इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दी वापस चली जाए  उतना ही अच्छा........!!

शनिवार, 8 मई 2021

...........तो फिर कोरोना का कोई दोष नहीं है

कभी अपने शरीर की  पुकार को सुनने की चेष्टा करें ! उसकी आवाज को समझने की कोशिश करें ! ध्यान रखें कि विश्व में आपके रहने की एकमात्र जगह आपका शरीर ही है ! वही नहीं रहा तो आप भी कहीं के नहीं रहोगे ! अगर आप उसका दस प्रतिशत भी ध्यान रखेंगे, तो उसमें इतनी क्षमता है कि वह आपका सौ प्रतिशत ख्याल रख सके। जिससे आपका वजूद है, जिसकी  वजह से आप दुनिया भर के सुख भोग पा रहे हैं, जिंदगी जी रहे हैं, नाते-रिश्ते निभा पा रहे हैं, तरह-तरह के अनुभव ले पा रहे हैं, उसके साथ ज्यादती ना करें  ! यदि आपने अपने पिछले अनुभवों  से भी कोई सबक नहीं लिया है, तो फिर यदि कुछ होता है तो इसमें कोरोना का कोई दोष नहीं है................!!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दुश्मन यदि जाना-पहचाना हो, उसके तौर-तरीके, शक्ति, आक्रमण शैली आदि का पहले से कुछ आभास हो तो खुद का बचाव तो संभव होता ही है, जीत भी मिल सकती है ! पर दुश्मन पूरी तरह अनजान हो तो यह एक तरह से हमारे ग्रंथों में वर्णित मायावी युद्धों की तरह हो जाता है ! जिससे पार पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है ! यदि पार पा भी लिया जाए तो उसमें इतना समय और जान-माल का नुक्सान होता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज कोरोना वैसे ही मायावी, छल-छद्म से भरपूर खतरनाक दुश्मन की तरह हमारे सामने है। जब तक उसकी कमजोरियों का पता नहीं चल जाता तब तक हमें सौ प्रतिशत सावधान रहने की जरुरत है। पर ऐसा हो नहीं पा रहा ! युवा पीढ़ी के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली में आए बदलावों, उनकी लापरवाहियों और कुछ-कुछ गैर जिम्मेदाराना रवैये से हालात काबू में नहीं आ पा रहे हैं ! कारण भी साफ़ हैं ! 

* यदि आप देर रात जागने के आदी हैं ! रात डेढ़-दो बजे के पहले आप को नींद नहीं आती हो ! 
* घर के खाने की बजाय आप रात को एक-डेढ़ बजे मैगी, पास्ता और नूडल्स का सेवन करते हों ! 
* आपकी सुबह दोपहर 11-12 बजे होती हो !
* खाने-नाश्ते का कोई निश्चित समय ना हो ! 
* देर रात चाय कॉफी की लत हो ! 
* आपके 10 x 8 के बंद कमरे में कोई हो न हो फिर भी आपका 45'' टीवी 16-16 घंटे विकिरण फैलाए रखता हो ! 
* आपका मोबाइल सिर्फ नहाते समय आपसे अलग होता हो ! वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक नई बिमारी का कारण भी बनने जा रहा है !
* साफ़-सफाई का ध्यान ना रख पाते हों !
* गैर जरुरी चीजों यथा सौंदर्य प्रसाधनों, खिलौनों या विभिन्न कंपनियों की छूट के लालच में आप ऑनलाइन खरीदी करने से खुद को रोक नहीं पाते हों !
* दोस्तों की पार्टियों में जाने से रुक ना पाते हों !
* बिना मतलब बिना काम रात-विरात गाडी में घूमने निकल जाते हों ! 

तो समझ लीजिए कि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कोरोना क्या किसी भी बिमारी को रोकने में सक्षम नहीं होगी ! छोटे-मोटे रोगों के लिए भी आप एक सॉफ्ट टारगेट हैं ! कभी अपने शरीर की  पुकार को समझने की चेष्टा करें ! उसकी आवाज को सुनने की कोशिश करें ! ध्यान रखें कि विश्व में आपके रहने की एकमात्र जगह आपका शरीर ही है ! वही नहीं रहा तो आप भी कहीं के नहीं रहोगे ! उसका आप दस प्रतिशत ध्यान रखेंगे तो उसमें इतनी क्षमता है कि वह आपका सौ प्रतिशत ख्याल रख सके ! जिससे आपका वजूद है जिसकी  वजह से आप दुनिया भर के सुख भोग पा रहे हैं, जिंदगी जी रहे हैं, नाते-रिश्ते निभा पा रहे हैं, तरह-तरह के अनुभव ले पा रहे हैं  उसके साथ ज्यादती ना करें ! यह साबित भी हो चुका है कि अपनी क्षति से हुए नुक्सान की शरीर खुद भरपाई कर सकता है। हल्की-फुल्की कसरत या टहलने से ही रक्तचाप काबू में आ जाता है ! खान-पान सुधरते ही लोग स्वस्थ महसूस करने लगते हैं ! जंकफूड छोड़ते ही पाचन ठीक होने लगता है ! धूम्रपान से दूरी बनाते ही फेफड़े अपनी पूरी ताकत से काम करने लग जाते हैं ! पुरानी आदतें और आरामपरस्ती छूटना आसान काम नहीं है पर यह नामुमकिन भी नहीं है ! सिर्फ दृढ इच्छाशक्ति की जरुरत है ! वह भी अपने भले के लिए !

परंतु यह सब जानने-बूझने के बावजूद यदि आप अपने ही शरीर का ख्याल रखने में कोताही बरतते हैं ! उस पर बदस्तूर ज्यादतियां करने से बाज नहीं आते हैं ! आप बिमारी की गिरफ्त में आ ठीक हो जाते हैं पर ठीक होने के बावजूद अपनी पुरानी आदतों को नहीं छोड़ पाते हैं ! ऐसा कर आप अपने शरीर के प्रति अन्याय तो करते ही हैं साथ ही खुद और अपने परिवार के भी गुनहगार साबित होते हैं ! यदि ऐसा ही रहा तो यह निश्चित मानिए कि आपका शरीर आपके ही विरुद्ध विद्रोह करेगा !  क्योंकि यदि -  

* आपका देर से सोने और उठने का समय अभी भी वैसा ही है ! 
* नहाने-खाने का कोई समय व ठिकाना नहीं है ! 
* सुबह सूर्य कब निकलता है आपको नहीं पता, ना हीं आप उसका कोई फायदा उठाते हैं ! 
* वैसे ही आप दिन भर फोन से चिपके रहते हैं ! 
* टीवी फिर वैसे ही चलता रहता है ! 
* भोजन के समय नाश्ता, शाम चाय के समय भोजन और देर रात कुछ भी उटपटांग अभी भी खाते हैं !
* बाहर से विभिन्न जगहों और जरिये से सामान बदस्तूर अभी भी घर में वैसे ही आ रहा होता है !  
* आपकी दिनचर्या, आपकी लतें, आपके शौक सब पहले की तरह वैसे के वैसे ही हैं ! 
 
जिंदगी की अधिकांश अव्यवस्था का मुख्य कारण सोने-जागने का अनियमित होना ही है ! ऐसे लोगों की दिनचर्या और स्वास्थय तक़रीबन सदा बिगड़ा ही रहता है ! क्योंकि देर रात जागने खर्च हुई ऊर्जा की भरपाई के लिए शरीर कुछ खाने की इच्छा जागृत करता है और उस समय खाया जाने वाले पदार्थ कैसे हो सकते हैं यह कोई भी बता सकता है ! फिर देर से उठने पर जो हड़बड़ाहट रहती है, वह तन-बदन का भरपूर नुक्सान करने से बाज नहीं आती ! 
 
यदि ऐसा है और पिछली बिमारी से भी आपने कोई सबक नहीं लिया है, तो फिर यदि कुछ होता है तो इसमें कोरोना का कोई दोष नहीं है................!!  

गुरुवार, 6 मई 2021

समय निकाल कर सोचिएगा जरूर, यह आज भी सामयिक है

कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे !सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, छद्म इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

हमारे देश पर सदियों से बाहरी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के लिए हमले होते रहे हैं। उनके आतंक का हमारे वीर, देशभक्त रणबांकुरों ने माकूल जवाब भी दिया है ! पर विडंबना यह भी रही कि वे सब विभिन्न कारणों से कभी भी एकजुट होकर दुश्मन को चुन्नौती नहीं दे पाए ! ऐसे एक-दो नहीं हजारों योद्धा हुए हैं जिनके नाम सुन कर ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। परन्तु विभिन्न षड्यंत्रों के तहत, देसी-विदेशी आकाओं द्वारा पोषित, हमारे छद्म, तथाकथित इतिहासकारों ने अपने आकाओं के झूठे-सच्चे किस्सों की खातिर उन वीरों को गुमनामी के कोहरे के पीछे धकेल कर रख दिया। परन्तु उनके शौर्य, जज्बे, देश के प्रति आत्मोसर्ग को जनमानस की यादों से कभी नहीं हटा पाए।

फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे ! सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा ! जी हाँ ! उस जैसा राणा ना कभी हुआ और अब तो क्या ही होगा ! 

कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया........!

राणा संग्राम सिंह यानी राणा सांगा ! मेवाड़ की धरती जिन्हें जन्म दे कर धन्य हो गई। वे मेवाड़ के सबसे महान शासक थे। उनके राजकाल में मेवाड़ ने आशातीत सफलताएं, शक्ति, समृद्धि और ऊंचाइयां प्राप्त की थीं। उनका साम्राज्य उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में भरतपुर से लेकर पश्चिम में सिंधु तक फैला हुआ था। राणा सांगा पहले और अंतिम भारतीय शासक थे, जो तक़रीबन तमाम राजपूत राजाओं को अपने नेतृत्व में शामिल करने में सफल रहे थे ताकि विदेशी लुटेरों को देश के बाहर खदेड़ दिया जा सके ! उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, शौर्य ही कुछ ऐसा था कि तमाम आपसी भेदभावों के बावजूद तमाम राजा उनके राजनितिक और सैन्य कौशल के कायल थे। उस समय उनके सामने था काबुल से आया एक आक्रांता, बाबर ! उसने भी अपने संस्मरण बाबरनामा में उन्हें उस समय का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है। 

आखिर वह दिन भी आ ही गया ! खानवा में बाबर की सेना के सामने राणा सांगा की सेना आ डटी, जो तक़रीबन अपने विपक्षी से दुगनी थी ! पर उनके पास ना हीं अच्छे घोड़े थे और ना हीं तोपें ! जबकि बाबर की असली ताकत थी उसका तोपखाना ! जिसका कोई जवाब राणा के पास नहीं था।  पता नहीं इस ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया था ! जबकि इसका उपयोग और शक्ति साल भर पहले ही पानीपत के मैदान में बाबर-लोधी युद्ध में सिद्ध हो चुकी थी। क्यों युद्ध में वर्षों से चले आ रहे पारंपरिक तरीके ही अपनाए गए ! क्यों नहीं दुनिया में अपनाई जा रही युद्ध नीतियों को अपनाने में रूचि दिखाई गई ! अस्त्रों-शस्त्रों के आधुनिकरण और उनमें आ रहे बदलावों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ! सैनिकों को देश के लिए निछावर होना जरूर सिखाया गया पर ना उन्हें अच्छे घोड़े उपलब्ध करवाए गए और ना हीं उच्च-कोटि के हथियार ! 

16 मार्च 1527 सुबह नौ बजे भयानक युद्ध शुरू हुआ जो बीस घंटों तक चला। पर वीर, साहसी, पराक्रमी व अच्छे योद्धा होने के बावजूद राजपूत बाबर के तोपखाने का सामना नहीं कर सके ! मुगलों की विजय हुई ! बुरी तरह घायल और बेहोश राणा को उनके सहयोगी उन्हें युद्धक्षेत्र से दूर सुरक्षित जगह पर ले गए ! होश आने पर वे बहुत हताश और निराश हुए। उन्होंने अपने आप को किले में बंद कर लिया। कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया जिसके कारण राणा का 30 जनवरी 1528 को निधन हो गया !  

हमारा इतिहास तरह-तरह के यदि, लेकिन और परंतुओं से भरा पड़ा है। दुर्भाग्य का साया ज्यादातर हम हीं पर छाया भी रहा। उस पर छद्म इतिहासकारों के षड्यंत्रों ने सच्चाइयों पर वर्षों पर्दा डाल रखा ! यदि कभी सच को सामने लाने की कोशिश हुई भी तो ऐसे ही लोगों ने तरह-तरह के बखेड़े खड़े  कर दिए ! कुछ समय निकाल कर, सोचिएगा जरूर ! इतिहास भी गवाह है कि देश को डुबोने में बाहरी तूफानों की जगह घर में जमा गंधाते पानी ने ही ज्यादा अहम् भूमिका  निभाई है ! पर हम भी जब तक पानी सर के बिल्कुल ऊपर हो सांस ही बंद नहीं करने लगता, चेतते तो हैं ही नहीं, समय गुजरते ही उस गंधाते पानी को भी भूल उसे जस का तस पड़ा रहने देते हैं, अगली मुसीबत खड़ी करने के लिए  ! 

@संदर्भ - अहा जिंदगी 
फोटो - अंतर्जाल  

शनिवार, 1 मई 2021

क्रिकेट और कोरोना

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन ही सबसे जरुरी है। आज मीडिया पर हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! ऐसी सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, किसी को भी हार की कगार पर ले जा सकता है.........!

#हिन्दी_ब्लगिंग 

अभी देश में क्रिकेट और कोरोना दोनों का दौर जारी है। कुछ लोग भले ही क्रिकेट को भी एक तरह की बिमारी ही मानते हों पर वैसे इसमें और कोरोना में दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है ! पर कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से बचाव में  क्रिकेट के खेल से समझी या सीखी जा सकती हैं ! 

क्रिकेट में जीतने के लिए सबसे बड़ी अहमियत रन बनाने की होती है। उन्हीं के कमी-बेशी से हार-जीत निर्धारित की जाती है। रन बनाने के लिए जो दो चीजें सबसे जरुरी होती हैं उनमें पहला है चुस्त शरीर ! जो अपनी तेज निगाहें, दिमाग और बाकी शरीर के अवयवों के ताल-मेल, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से खेल को अपने पक्ष में करने में अहम् भूमिका  निभाता है। दूसरा है बैट। विशेषज्ञ द्वारा अच्छी तरह तराशा गया हर मानक पर खरा उतरने वाला बेहतरीन मजबूत लकड़ी से बना बल्ला ! बस इन दोनों के अलावा और जो कुछ भी ताम-झाम होता है वह सब गौण है। फिर वह चाहे ग्लव्स हों ! पैड हों ! गार्ड हों ! हेल्मेट हो ! जूते हों या कुछ भी ! यह कोई मायने नहीं रखता कि आपने किस कंपनी के पैड, ग्लव्स या जूते पहने हैं ! उनकी लाइनिंग कैसी है ! उनकी पैडिंग नरम रबर की है या स्पंज की ! यह सब चीजें एक अतिरिक्त आत्मविश्वास जरूर देती हैं जो निश्चिन्त हो खेलने में सहायक होता है ! पर इनके बिना भी रन बनाए जा सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ बल्ले और शरीर के तालमेल से ही संभव है। 

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन सबसे जरुरी है। इनके अलावा सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, हार की कगार पर ले जा सकता है।आज मीडिया पर कोरोना से लड़ने के सैंकड़ों उपायों की बाढ़ सी आई हुई है ! हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए, डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! आम इंसान इतना डरा और आतंकित है कि वह हर ऐसे इलाज को, बिना उसका परिणाम जाने, बिना उसकी प्रामाणिकता परखे, बिना सोचे-समझे उसे आजमाने को तत्पर हो जाता है ! जबकि ऐसे अभी तक बताए जा रहे नुस्खे, भले ही किसी भी पैथी के हों, रोग को हराने में कारगर नहीं हैं। इनसे शरीर को कुछ अतिरिक्त सुरक्षा भले ही मिल जाती हो ! रोग से लड़ने में सहायक भले ही हो जाते हों, पर रोग मुक्ति दिलाना अभी इनके बस का सिद्ध नहीं हुआ है। आज जब यह भयंकर बिमारी पूरी तरह से अभी तक बेकाबू है तो ऐसे में कुछ भी उपाय कर लेना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। 

इसलिए रोग से मुक्त होने के लिए सरकार और डॉक्टरों द्वारा जारी निर्देश ही एकमात्र उपाय हैं ! यदि आप कोई और भी उपाय कर रहे हैं तो करें, हो सकता है कि उससे आत्मविश्वास में वृद्धि हो पर ''प्रोटोकॉल'' का पालन भी जरूर करते रहें ! किसी भी हालत में उसे दरकिनार ना करें ! क्योंकि यही वह बल्ला है जो इस खेल में आपको जीत दिला सकता है !  

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