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मंगलवार, 14 जनवरी 2025

पत्रकारिता, लोकतंत्र का चौथा बंबू

पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है, तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ..............!!         

#हिन्दी_ब्लागिंग                                     

कुछ साल पहले तक समाचार पत्रों में छपी खबरों पर आम इंसान आँख मूँद कर विश्वास कर लिया करता था ! क्योंकि उसे मालूम था कि इन समाचारों को उन तक पहुंचाने वाले इंसान निर्भीक, निष्पक्ष, निडर व सत्य  के पक्षधर हैं ! रेड़िओ पर पढ़ी जाने वाली सरकारी खबरें भी बहुत हद तक दवाब-विहीन ही होती थीं ! पर धीरे-धीरे इस विधा में भी मतलबपरस्त, चापलूस, धन-लोलूप खलनायकों का दखल शुरू हो गया और आज हालत यह है कि संप्रेषण के किसी भी माध्यम पर, चाहे वह छपने वाला हो या दिखने वाला, किसी को भी पूर्ण विश्वास नहीं है ! इसी बीच व्हाट्सएप, युट्यूबर जैसी एक और खतरनाक मंडली भी उभर कर आई हुई है ! जिसका भ्रामक असर अति व्यापक, घातक और मारक है !

आज के समय में तकरीबन हर अखबार, हर टीवी चैनल, किसी ना किसी राजनैतिक दल का भौंपू बन कर रह गया है ! उनकी भी अपनी मजबूरी है ! आज कौन चाहेगा निष्पक्ष पत्रकारिता या सच को उजागर करने के चक्कर में अपना तंबू-लोटा समेट घर बैठना और तन-धन को जोखिम में डालना ! जबकि जरा सी चापलूसी, जी-हजूरी के बदले गाड़ी, घोड़ा, बंगला, जमीन, विदेशयात्रा, संरक्षता, मान-सम्मान, पुरस्कार, प्रतिष्ठा सभी कुछ हासिल हो रहा हो ! इसीलिए ऐसी गंगा में सभी हाथ धोने की बजाय पूरी डुबकियां लगाने से परहेज नहीं करते !

आम जनता भी अब जानकारी के लिए नहीं बल्कि समय गुजारने या मनोरंजन के लिए खबरिया चैनलों के सामने बैठने लगी है ! पर वहां की स्तरहीन, मक्कारी भरी, तथ्यहीन वार्ता और उसमें विभिन्न दलों के तथाकथित वार्ताकारों का ज्ञान, उनकी मानसिकता, उनकी शब्दावली, उनकी कुंठा, उनकी चारणिकता, उनके पूर्वाग्रहों को देख दर्शकों का रक्त-चाप ही  बढ़ता है ! मेहमान पर नहीं मेजबान पर कोफ्त होती है !
    
अर्से से पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है ! तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ! सो एक मंच तैयार किया गया, पर वही आज सच्चाई, विश्वास, नैतिकता, निष्पक्षता यहां तक कि देशहित को भी भस्मासुर की तरह स्वाहा करने पर उतारू है ! 

एक कहावत है कि हर चीज के बिकने की एक कीमत होती है ! तो कीमत लगी, माल खरीदा गया और उसे तरह-तरह के नाम और अलग-अलग तरह की थालों में रख, दुकानों में सजा दिया गया ! इधर पब्लिक अपनी उसी पुरानी भेड़चाल के तहत, अपने-अपने मिजाजानुसार उन दुकानों पर बिकते असबाबों की परख किए बगैर, उनकी गुणवत्ता को नजरंदाज कर, उनके रंग-रूप-चकाचौंध पर फिदा हो अपने सर पर लाद अपने-अपने घरों तक लाती रही ! भले ही बाद में पछताना ही पड़ रहा हो !

घोर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह आशा बनी हुई है कि अभी भी  ऐसे लोग जरूर होंगे, जिनमें अभी भी जिम्मेवारी का एहसास बचा हुआ होगा ! जिनकी आत्मा रोती होगी आज के हालात देख कर ! जिनकी कर्त्तव्यपरायणता अभी भी सुप्तावस्था में नहीं चली गई होगी ! क्या ऐसे लोगों का जमीर उन्हें कभी कचोटता नहीं होगा ? क्या उनकी बची-खुची गरिमा उन्हें सोने देती होगी ? क्या कभी उन्हें अपनी उदासीनता पर ग्लानि नहीं होती होगी ? क्या उन्हें कभी ऐसा विचार नहीं आता होगा कि जिस विधा का काम समसामयिक विषयों पर लोगों को जागरूक करने और उनकी राय बनवाने में बड़ी भूमिका निभाना है और जिस कारणवश आज विश्व में मीडिया एक अलग शक्ति के रूप में उभरा है, उसी का अभिन्न अंग होते हुए भी वे उसका दुरूपयोग होते देख रहे हैं ! ऐसे लोगों को तो आगे आना ही पड़ेगा ! इस घोर अंधकार को मिटाने के लिए सच का दीपक प्रज्ज्वलित करना होगा ! छद्म संप्रेषण का चक्रव्यूह नष्ट कर निडर, निर्भीक, निर्लेप, विश्वसनीय निष्पक्षता का आलम फिर से स्थापित करना होगा !  

पर क्या ऐसा होगा ? क्या कोई ऐसी हिम्मत जुटा पाएगा ? क्या वर्तमान ताकतों का मायाजाल छिन्न-भिन्न हो सकेगा ? ऐसे बहुत सारे क्या हैं ! क्या इन क्याओं का उत्तर मिल पाएगा ? क्या अपने हित को दरकिनार कर, अपने नुक्सान की परवाह ना कर, देश, समाज, अवाम के हितार्थ सच के पैरोकार आगे आएंगे ? सुन तो रखा है कि बुराई पर अच्छाई की और झूठ पर सच की सदा विजय होती है ! 
देखें.........!!

बुधवार, 26 मई 2021

चैनलिया घालमेल

देश में पहला प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल ला खबरों को रोचक बनाने का श्रेय पूरी तौर से जाता है प्रणय रॉय को ! यही वो शख्स है जिसने भारत में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों को टीवी पर सबसे पहले लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपार सफलता पाने के बाद इन्होंने 1988 में जिस NDTV नाम के अपने प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की थी, वह अब एक बड़े मीडिया घराने में बदल गया है और इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके उद्घोषक या संचालक बिना किसी हिचक या संकोच के सरकार, उसके सदस्यों, उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं की सरे-आम, दिन-रात छीछालेदर करने से बाज नहीं आते ! ऐसा क्यूँ ..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

भारत में टीवी का उद्भव, प्रयोगात्मक तौर पर ''टेलीविजन इंडिया'' के नाम से 1959 के सितम्बर महीने की 15 तारीख को हुआ था ! जिसे 1975 में ''दूरदर्शन'' का नाम दिया गया। बेहतरीन गुणवत्ता, जबरदस्त लोकप्रियता, लोगों के प्रेम व उत्सुकता के बावजूद इसका सही उपयोग नहीं हो पाया। कारण ! वही सरकारी नियंत्रण, लाल फीताशाही, अदूरदर्शी सरकारी हाकिम, बंधा-बंधाया रवैया और अनगिनत बदिशें ! जिन्होंने कभी इसे उबरने ही नहीं दिया ! इसीलिए दूरदर्शन को देश भर के शहरों तक पहुँचने और रंगीन होने में 21 साल लग गए ! फिर भी वह जैसा भी था, अच्छा था। सदा सरकारी नियंत्रण में रहने के बावजूद उसने विरोधी दलों और उनके नेताओं पर अनर्गल कुछ नहीं कहा। जो भी टिपण्णी होती थी, सब मर्यादित। भाषा का संयम सदा बरकरार। पर फिर एक सुनामी आई तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ! जिसके तहत तरह-तरह के चैनल उग आए ! जिन्होंने अपना अस्तित्व बनाए व बचाए रखने के लिए या अपने पर हुए अहसानों का बदला चुकाने के लिए किसी ना किसी छाते के नीचे शरण ले ली ! फिर ना कोई मर्यादा रही ! ना किसी का सम्मान ! ना हीं कोई गरिमा ! 

दूरदर्शन के समय में ही एक शख्स ने इस विधा की असीमित ताकत, क्षमता, पहुंच व सम्मोहिनी शक्ति को पहचाना और उसे एक अलग दिशा दे डाली। जिसकी बदौलत देश में पहले प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल का पदार्पण हुआ। इसका श्रेय पूरी तौर से जाता है प्रणय रॉय को जिन्होंने दूरदर्शन की एक ही शैली-पद्यति-ढाँचे में ढली, दूरदर्शन की खबरों से बाहर निकल कर उन्हें रोचक बना ''वर्ल्ड दिस वीक'' और ''न्यूज टुनाइट'' के नाम से पेश करना शुरू किया। कहना ना होगा कि इस प्रयोग को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। यही वो शख्स है जिसने भारत में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों को टीवी पर सबसे पहले तथ्यों से परिपूर्ण, रोचक और लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपार सफलता पाने के बाद इन्होंने 1988 में जिस NDTV नाम के अपने प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की थी, वह अब एक बड़े मीडिया हाउस में बदल चुका है और इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके उद्घोषक या संचालक बिना किसी हिचक के सरकार, उसके सदस्यों, उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं की सरे-आम, दिन-रात छीछालेदर करने से बाज नहीं आते ! ऐसा कैसे और क्यूँ हो गया !

जाहिर है यह सब बिना किसी के संरक्षण के कतई संभव नहीं है ! इसके लिए जरा पीछे मुड़ कर देखने से ही सब साफ़ हो जाता है ! प्रणय रॉय की तत्कालीन सरकार से बहुत घनिष्टता थी। इसीलिए NDTV की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री के निवास से हुई थी और उसने अपना 25वां जन्मदिन राष्ट्रपति भवन में मनाया था ! इसी से प्रणय रॉय की पहुंच, उनकी साख, उनके दबदबे का अंदाजा लगाया जा सकता है। लाजिमी है कि जिसकी बदौलत इतनी इज्जत-शोहरत-कामयाबी-दौलत मिली हो उसका वफादार रहा जाए ! और यह वफादारी यह मीडिया हॉउस आँख बंद कर निभा रहा है !

यदि एक नजर इससे जुड़े लोगों पर डाल ली जाए तो बात और भी साफ़ हो जाती है ! शुरू से ही देखें तो प्रणय रॉय का विवाह, CPI(M) के पूर्व प्रमुख प्रकाश कारत की पत्नी वृंदा कारत की बहन राधिका रॉय के साथ हुआ है।  

प्रणय रॉय, अरुंधति रॉय के चचेरे भाई (cousin) हैं। प्रणय के बंगाली पिता ने क्रिश्चियन धर्म अपना कर एक आयरिश महिला से विवाह किया था और एक ब्रिटिश कंपनी में ही कार्यरत थे। 

NDTV में कार्यरत बरखा दत्त ने जम्मू-कश्मीर की पीडीपी पार्टी के सदस्य हसीब अहमद द्राबू के साथ दूसरा निकाह किया है जबकि उनकी पहली शादी भी कश्मीर के ही एक युवक मीर से हुई थी। 

NDTV की निधि राजदान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला की बहुत ख़ास दोस्त हैं। 

NDTV की ही सोनिया सिंह की शादी, आरपीएन सिंह, जो कांग्रेस से जुड़े हैं और यूपीए के मंत्रिमंडल के सदस्य भी रह चुके हैं, के साथ हुई है !
 
राजदीप सरदेसाई, जो पहले NDTV में हुआ करते थे, का विवाह सागरिका घोष के साथ सम्पन्न हुआ है, जो पहले CNN में कार्यरत थीं ! ये वही सागरिका घोष हैं जिनके पिता भास्कर घोष को दूरदर्शन में कांग्रेस की सरकार द्वारा डायटेक्टर जनरल का पद दिया गया था ! जिन पर बाद में NDTV को आर्थिक लाभ पहुंचाने का इल्जाम भी लगा था ! जो उनके दामाद के मालिक की कंपनी थी !

NDTV ने उन विष्णु सोम को अपने यहां एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी, जिनके पिता हिमाचल सोम को कांग्रेस सरकार ने इटली का राजदूत बनाया था और जिनकी माताश्री रेबा सोम ने नेहरूजी और कांग्रेस की विरदावली में अनेक पुस्तकें लिख डाली थीं। 

इन सब के देखने-समझने के बाद NDTV  की कार्यप्रणाली या उसके उद्देश्य या उसकी विचारधारा के बारे में कुछ कहने-सुनने की जरुरत रह जाती है क्या  ? 

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