मंगलवार, 31 मार्च 2020

यहां सपत्नीक पूजे जाते हैं हनुमान

राम-रावण युद्ध के समय निर्णायक भूमिका निभाने वालीं, नौ अति दिव्य शक्तियों की प्राप्ति के लिए हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देव ने भी भविष्य को देखते हुए अपने इस बेहद प्रतिभाशाली शिष्य को उन दिव्य नौ विद्याओं का ज्ञान देने का संकल्प कर लिया था । पर पांच विद्याएं देने के बाद उनके समक्ष एक संकट आ खड़ा हुआ ! क्योंकि शेष चार विद्याएं उसी पात्र को दी जा सकती थीं जो विवाहित हो ! क्योंकि उन दिव्य शक्तियों के तेज को वहन करना किसी अकेले के बस की बात नहीं थी ¡ पर हनुमान जी ठहरे बाल ब्रह्मचारी................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
रामायण, निर्वादित रूप से देश का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ ! जिसकी लोकप्रियता सागर लांघ विदेशों तक फ़ैल गयी ! जिसका अनेकों विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ ! संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण के अलावा जिसको कई-कई विद्वानों ने अपनी भाषा में अपनी सोच और श्रद्धा के अनुसार लिखा ! इसी कारण समय-काल-परिवेश के अनुसार मुख्य कथा के साथ ना जाने कितनी उपकथाएं फिर उनकी उपकथाएं जुड़ती चली गयीं। यही कारण है कि हमें यदा-कदा मुख्य किरदारों से जुड़े कुछ अलग से आख्यान अपनी  निशानियों सहित देखने-पढ़ने को मिल जाते हैं।
रामायण में श्री राम के बाद सबसे लोकप्रिय, पूजनीय और आदरणीय पात्र हनुमान जी का है। उनके बारे में निर्विवाद धारणा यही है कि उन्होंने कभी विवाह नहीं किया। वे सदा ब्रह्मचारी ही रहे ! इसलिए उनकी पूजा भी इस बात को ध्यान में रखकर की जाती है।हालांकि राम-रावण युद्ध के दौरान एक जगह उनके पुत्र मकरध्वज का नाम आता जरूर है पर उनके विवाह का जिक्र नहीं मिलता। परंतु कुछ कथाओं में उनके विवाह का जिक्र मिलता है ! ऐसी ही एक जगह है खम्मम ! तेलंगाना में हैदराबाद से करीब सवा दो सौ की.मी. की दूरी पर स्थित इस जिले के एक प्राचीन मंदिर में हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा भी स्थापित है ! यहां भक्त पूरी श्रद्धा के साथ दोनों की पूजा करते हैं। 
पाराशर संहिता में हनुमान जी के विवाह का जिक्र मिलता है ! जिसके अनुसार हनुमान जी ने नौ अति दिव्य विद्याओं की प्राप्ति के लिए सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। ये नौ विद्याएं आने वाले समय में राम-रावण युद्ध के समय निर्णायक भूमिका निभाने वालीं थीं।सूर्य देव ने भविष्य को देखते हुए अपने इस बेहद प्रतिभाशाली शिष्य को उन दिव्य नौ विद्याओं का ज्ञान देने का संकल्प कर लिया था। पर पांच विद्याएं देने के बाद उनके समक्ष एक संकट आ खड़ा हुआ ! क्योंकि शेष चार विद्याएं उसी पात्र को दी जा सकती थीं जो विवाहित हो ! क्योंकि उन दिव्य विद्याओं के तेज को वहन करना किसी अकेले के बस की बात नहीं थी। सूर्य देव ने हनुमान जी को बताया कि मेरी मानस पुत्री सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी है उसका तेज तुम ही सहन कर सकते हो, और उससे विवाहोपरांत तुम दोनों उन चार विद्याओं के तेज को संभाल पाओगे ! उससे विवाह के बाद तुम इस योग्य हो जाओगे कि शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सको। इसके अलावा और कोई उपाय उन विद्याओं को हासिल करने का नहीं है ! अब हनुमान जी भी धर्म संकट में पड़ गए, क्योंकि वो सूर्य देव से विद्याएं लेना तो चाहते थे, लेकिन साथ ही वो ब्रह्मचारी भी बने रहना चाहते थे। तब सूर्य देव ने उन्हें समझाया कि विवाह होते ही सुवर्चला तपस्या में लीन हो जाएगी। इससे तुम्हारे संकल्प पर कोई आंच भी नहीं आएगी और तुम्हें सारी विद्याएं भी प्राप्त हो जाएंगी। यह सुन काफी सोच-विचार के बाद आखिर हनुमान जी विवाह के लिए मान गए। उनकी रजामंदी मिलने पर सूर्य देव ने अपने तेज से सुवर्चला का आह्वान किया और इस तरह हनुमान जी का विवाह सम्पन्न हुआ और उन्होंने अपना ब्रह्मचर्य अटूट रखते हुए उन दिव्य शक्तियों को हासिल किया। 
तेलंगाना के खम्मम जिले में बना यह पुराना मंदिर सालों से लोगों का आकर्षण का केंद्र रहा है। शेष भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह जगह किसी आश्चर्य से कम नहीं है क्योंकि उधर लोगों का विश्वास इस बात में ज्यादा है कि हनुमान जी ब्रह्मचारी थे ! पर स्थानीय लोग ज्येष्ठ शुद्ध दशमी, भारतीय पंचांग के अनुसार तृतीय माह की दसवीं तिथि, को हनुमान जी के विवाह के रूप में मनाते हैं। इस मंदिर से जुड़ी मान्‍यता के अनुसार जो भी हनुमानजी और उनकी पत्नी के यहां आ कर दर्शन करता है, उन भक्तों के वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है।      

शनिवार, 28 मार्च 2020

केरल का नंदनकानन, यात्रा मुन्नार की

मुन्नार का अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम, केरल के इडुक्‍की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग जैसा रूप प्रदान करते हैं। हमारी इस यात्रा की यह खासियत थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इन तीन रूपों को देखने का अवसर समय के कुछ ही अंतराल में प्राप्त हो गया था .....!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देखते-देखते 29 फरवरी को सुबह सात बजे की विस्तारा की फ्लाइट से शुरू हुई आठ दिवसीय केरल की यात्रा का पांचवां दिन कब आ पहुंचा पता ही नहीं चला ! आज हमें पेरियार से 90 की.मी. दूर, सागर तल से करीब 5900 फिट की ऊंचाई पर बसे, दक्षिण के एकमात्र पहाड़ी इलाके के शहर मुन्नार पहुंचना था। सो सुबह सारे जरुरी कार्यों को निपटा, आठ बजते-बजते बस में बैठ, सदा की तरह परंपरानुसार प्रभु का स्मरण कर यात्रा के अगले चरण की ओर बढ़ लिया गया। इस यात्रा की खासियत यह थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इस तीन रूपों को देखने का सुअवसर समय के कुछ ही अनिराल में प्राप्त हो गया था !              




टाटा चाय संग्रहालय के सामने 
मुन्नार केरल के इडुक्की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के मनमोहक ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग सा रूप प्रदान करते हैं। मुन्नार एक मलयालम शब्द है'; जिसका अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम ! जो यहां की तीन नदियों मधुरपुजहा, नल्लाथन्नी और कुंडली के संगम के कारण पड़ा है।   


संग्रहालय 


चाय प्रसंस्करण, पुराने तरीके से  


पुराने उपकरण 




सूर्यास्त 
हालांकि हमें सौ की.मी. से कम दूरी ही तय करनी थी, पर पहाड़ी रास्ते की वजह से काफी समय लग गया। रास्ते में ही टाटा ग्रुप के नलथन्नी टी इस्टेट संग्रहालय को देखने के लिए रुके। इसकी स्थापना चाय उत्पादन के लिए टाटा ग्रुप द्वारा 1880 में की गई थी। आज भी यहां इतिहास को ज़िंदा रखने के लिए पुराने तरीके से ही चाय का प्रसंस्करण किया जाता है। एक छोटे से संग्रहालय में संजो कर रखी गई पुराने समय से जुड़ी निशानियों, उपकरणों तथा तस्वीरों और आधे घंटे के एक सिनेमा शो द्वारा शुरुआत में सामने आई कठिनाइयों, मुश्किल परिस्थियों, दिक्कतों को बताया जाता है। इसके साथ ही उस समय की टी प्रोसेसिंग ईकाई में चाय बनने की पूरी प्रक्रिया को दिखाया और समझाया जाता है। यहीं पर उनके द्वारा चालित टी शॉप में अपनी नॉर्मल टी दस रूपए में, ग्रीन टी बीस और व्हाइट टी पचास रूपए में उपलब्ध थी, हमने 'अपनी' चाय ली और फिर होटल की ओर बढ़ लिए। कुछ देर पहले ही रिम-झिम हो चुकी थी। मौसम खुशहाल था ! होटल का परिवेश भी मनोनुकूल होने और कुछ-कुछ थकान के एहसास के कारण ज्यादातर लोग वहीं सिमट गए। जिनके मनोरंजन के लिए होटल में ही तंबोला का प्रावधान था। पांच-सात लोगों ने बाहर टहलने को तवज्जो दी। 
कुण्डला झील 






झील परिसर 




होटल में 
दूसरे दिन सुबह सदल-बल मुन्नार से 20 की.मी. की दूरी पर स्थित कुण्डला झील पहुंचे। यह झील पर्वत शृंखलाओं के बीच बने बांध के कारण निर्मित, एक कृत्रिम जलाशय है। बस की पार्किंग से परिसर में प्रवेश करने पर करीब पचास फिट की उतराई के बाद जलाशय तक पहुंचना हो पाता है। परिसर बेहद साफ़-सुथरा और अति सुंदर फूलों से आच्छादित होने के कारण मन मोह लेता है। वहीं महिलाओं और बच्चों के वस्त्रों और अन्य सजावटी सामानों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाने वाला एक आउटलेट भी है, जहां खरीदारी करना स्वाभाविक हो जाता है। नीचे जलाशय में स्पीड बोट और बड़ी बजरेनुमा नौका द्वारा जलविहार की सुविधा का प्रावधान भी है, जो कि यहां का मुख्य आकर्षण है। अब जब आए ही थे तो उसका अनुभव उठाना तो बनता ही था। सो घूम-फिर, जेब हल्की करवाने के बाद ही ईको प्वाइंट देखने का मुहूर्त बन पाया !  







ईको प्वाइंट 


मुन्नार से पंद्रह की.मी. के फैसले पर नदी के किनारे ढलान पर खड़े हो कर जोर से आवाज लगाने पर सामने घने जंगल से परावर्तित हो लौटती ध्वनि को सुनना, एक अलहदा ही अनुभव प्रदान करता है। हमारे पहुंचने पर हवा की दिशा जंगल से हमारी ओर होने के कारण प्रतिध्वनि उत्पन्न नहीं हो रही थी पर कुछ देर बाद सुनना संभव हो गया था। यहीं प्रोफेशनल लोगों से फोटो भी खिंचवा, नारियल पानी से गला तर करने बाद वापसी हुई। होटल के पहले पड़ते बाजार से स्थानीय मसालों को खरीदने का लोभ संवरण कर पाना, वह भी दुनिया के मसालों के सबसे बड़े केंद्र केरल में, मुश्किल था ! सो कुछ अनिक्षुक लोगों को बस से होटल, जो बाजार के नजदीक ही था, भेज ज्यादातर लोग अपने शॉपिंग के शौक को पूरा करने में जुट गए। रात हंसी-ख़ुशी, मस्ती-मजाक में गुजरी। दूसरे दिन यात्रा का अंतिम पड़ाव था, कोचीन। जहां से एक दिन बाद वापस दिल्ली के लिए लौटने की हवाई यात्रा मुकर्रर थी।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

लायर बर्ड, संसार के सबसे सुंदर पक्षियों में से एक

नक़ल के हुनर में पारांगत लायर बर्ड के नर की सोलह हिस्सों वाली बेहद लंबी और बहुत ही  खूबसूरत पूंछ होती है। जिसके फैलाए जाने पर उसका आकार वाद्ययंत्र वीणा की तरह का हो जाता है। इसके शरीर का रंग तकरीबन भूरा तथा गले का कुछ लालिमा लिए हुए होता है।स्वभाव से बहुत ही शर्मिला होने के कारण यह आसानी से दिखाई नहीं पड़ता ! इसकी आवाज से ही इसकी उपस्थिति का अंदाज लगाना पड़ता है।  मादा पक्षी भी आवाज की नकल करने में बहुत कुशल होती है पर महिलाओं के स्वभाव के विपरीत वह बहुत कम बोलती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
लायर बर्ड, जिसे हिंदीं में वीणा पक्षी के नाम से जाना जाता है। ज्यादातर आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में पाए जाने वाले इस पक्षी के नर की विचित्र पर खूबसूरत वीणा वाद्ययंत्र के बनावट वाली पूंछ के कारण ही इसको वीणा पक्षी कहा जाता है। हमारे तीतर से इसका आकार बहुत मिलता जुलता है। संसार के सबसे सुंदर पक्षियों में से एक, इस प्राणी की सबसे बड़ी खूबी इसकी आवाजों की नकल करने की क्षमता है। यह दूसरे पक्षियों की आवाजों, उनके कलरव, कुत्तों के भौंकने, कारों के हॉर्न की नक़ल तो करता ही है साथ ही यह सीटी की आवाज भी निकालने में अति कुशल होता है। 



मादा पक्षी से नर पक्षी लंबा एवं बड़ा होता है। नर पक्षी की सोलह हिस्सों वाली बेहद लंबी पूंछ बहुत ही खूबसूरत होती है और ये जब उसे फैलाता है तो उसका आकार वाद्ययंत्र वीणा की तरह का हो जाता है। इसके शरीर का रंग तकरीबन भूरा तथा गले का कुछ लालिमा लिए हुए होता है। स्वभाव से बहुत ही शर्मिला होने के कारण यह आसानी से दिखाई नहीं पड़ता है ! इसकी आवाज से ही इसकी तत्काल उपस्थिति को जाना जा सकता है। मादा पक्षी भी आवाज की नकल करने में बहुत कुशल होती है पर महिलाओं के स्वभाव के विपरीत वह बहुत कम बोलती है। वह एक बार में एक ही अंडा देती है, जिससे 50 दिनों के बाद बच्चा निकलता है। जिसकी देख-भाल का जिम्मा माँ ही सम्हालती है। इनका भोजन कीट-पतंगेकेंचुऐमकडियां, दीमक इत्यादि हैं।


हालांकि फिलहाल इनकी प्रजाति पर कोई खतरा नहीं है पर प्रकृति की इस सुंदरतम नेमत पर ध्यान देने और रखने की बहुत जरुरत है।

@सभी चित्र अंतरजाल के सौजन्य से    

मंगलवार, 24 मार्च 2020

केरल का पेरियार, जहां कायनात अपने अछूते रूप के साथ विराजमान है

इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद मसालों की खूब खरीदारी हुई...!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिल्ली के ''RSCB'' के तत्वाधान में 29 फरवरी से सात मार्च तक की केरल यात्रा के दौरान चौथे दिन, अलेप्पी से करीब 140 की.मी. की दुरी पर स्थित थेकाड्डी, जिसे पेरियार के नाम से भी जाना जाता है, जाना तय था। वैसे थेकाड्डी कस्बे का नाम है और पेरियार वह जगह है जहां वन्य जीव अभयारण्य स्थित है। तमिलनाडु की सीमा से लगती, दक्षिणी-पश्चिमी घाट की कार्डामम और पेंडलाम नामक पहाड़ियों, घने वनों और सुंदर झीलों से घिरी यह जगह अपने खूबसूरत वन-विहार के लिए जगत्प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध राजनेता इरोड वेंकट नायकर रामासामी, जिन्हें सम्मान के साथ पेरियार यानी सम्मानित व्यक्ति कहा जाता था, के नाम पर इस जगह का नामकरण किया गया है।   
पेरियार झील 
चार मार्च की सुबह नाश्ता-पानी निपटा अपनी बस ''रानी'' में हमनें अपनी सीटें संभाल लीं। प्रत्येक सदस्य पिछले तीन दिनों के ''हेक्टिक शड्यूल'' के बावजूद खुद को बिल्कुल तारो-ताजा महसूस कर रहा था। हो सकता है इसका कारण यहां की साफ़ आबो-हवा और चिंता-तनाव मुक्त वातावरण का भी असर हो ! यात्रा की परंपरा के अनुसार हमारे कप्तान श्री नरूला जी ने तीन बार गायत्री पाठ किया ! फिर माइक प्रेमी खेमानी जी ने जगह संभाली और फिर वही भजनों, गानों, चुटकुलों का वह लंबा दौर शुरू हो गया, जिसमें अन्नू जी, खन्ना जी, श्रीमती और श्री मेहरा जी, श्रीमती और श्री बेदी जी के साथ-साथ कदम जी और मैंने भी पूरे जोशोखरोश के साथ भाग लिया ! पर सबसे ज्यादा समां बांधा नीरू जी ने जिनका गायन, वाद्य संगीत के साथ एक अलग ही अंदाज के साथ सामने आता रहा। कहते हैं ना कि खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है, तो तीन दिन से अलग चुप से रहे सिद्दार्थ और जीनु को भी जोश आ गया और वे भी इस महफ़िल का हिस्सा बनने से अपने को नहीं रोक पाए।


सबसे युवा और कर्मठ सदस्य, नरूला जी 




पेरियार के रास्ते में ही वनौषधि उत्पादन केंद्र पर रुक कर पहली बार उन मसालों, जिनका उपयोग रोज ही हमारी रसोई में होता है, के पौधों, लताओं और वृक्षों को देखने का सुयोग मिला। इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद खूब खरीदारी हुई। करीब घंटे-डेढ़ के बाद ही आगे चलना संभव हो पाया।   
इलायची 



लौंग 
काली मिर्च 

चीकू 

वनीला, दुनिया की दूसरी सबसे मंहगी उपज 


दालचीनी 

अच्छे-खासे नियमानुसार चलते प्रोग्राम में एक छोटा सा व्यवधान तब महसूस हुआ जब पेरियार पहुंच कर यह पता चला कि जीप सफारी बंद है और वन-विहार नहीं हो सकेगा ! अब कर भी क्या सकते थे, सो जो उपलब्ध था उसी सरकारी बस में पेरियार झील तक गए। 


पोज़ ऐसे भी दिए जाते हैं 

सब कुछ बंद होने के बावजूद वहां प्रकृति अपने मनोहारी अनुपम रूप साक्षात उपस्थित थी। यादगार के लिए फोटो वगैरह ली गयीं और सर्वसम्मति से वापस होटल आने का प्रस्ताव पास हो गया। पिछली थकान उतारने का एक मौका या कहिए बहाना मिल गया था।
थेकाड्डी में भी एक रात का ही स्टे था। दूसरे दिन मनोहारी मुन्नार हमारा इंतजार कर रहा था ! जिसकी हरी-भरी चाय की वादियों में दो दिन का समय गुजरना था, जो कम तो था पर कार्यक्रम के समय की पाबंदी भी तो थी !  

शनिवार, 21 मार्च 2020

जान लेवा संकट के समय तो मतभेद भुला, एकजुट हों

हमारे यहां के लोग इस वायरस के प्रकोप से बचने के बजाए उसका और उससे सावधान करने वालों का मजाक उड़ाने को ही अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं ! खुदा ना खास्ता यदि उस समय  ऐसे विरोध करने, मजाक उड़ाने, सावधानी के लिए अपनाए जाने वाले कदमों को नकारने वाले, बहके हुए लोगों के परिवार का कोई सदस्य इस महामारी की चपेट में आ जाता है तो इनकी सारी अक्लमंदी, अपने आकाओं के प्रति वफादारी, कुंठित मानसिक प्रवृत्ति सब धरी की धरी रह जाएंगी

#हिन्दी_ब्लागिंग
विपदा दरवाजे पर दस्तक दे रही है और कुछ बेअक़्ल उसे वाद्य संगीत समझ रहे हैं, मजाक उड़ा रहे हैं, घोर पूर्वाग्रहों से ग्रसित ऐसे लोग, उनके ही भले के लिए प्रसारित हिदायतों में मीन-मेख निकाल रहे हैं ! कोरोना से भी खतरनाक ऐसे लोग खुद तो मौत को दावत दे ही रहे हैं बाकियों के लिए भी घोर विपत्ति का वायस बन रहे हैं ! 

एक समय था जब देश-समाज पर आन पड़ी मुसीबत के समय सारा अवाम, अपना धर्म, जाति, भाषा सब दरकिनार कर एकजुट हो जाता था ! चाहे 1962 हो, 65 हो या 71 हर बार देश गवाह रहा कि उस पर विपदा आते ही पक्ष-विपक्ष, नेता-अभिनेता, मंत्री-संत्री सब अपना स्वार्थ, मतभेद, राग-द्वेष भूल उसके हित के लिए कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते थे ! ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ, जब पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण सिर्फ भारत नजर आता था। आज ना वैसे नेता रहे ना हीं वैसा माहौल ! 

आज लगभग पूरे विश्व से रोज ही दिल दहला देने वाली ख़बरें आ रही हैं ! खासकर चीन और इटली, जहां हालात बेकाबू हो चुके हैं ! हज़ारों-हजार शवों को बिना शिनाख्त किए कहीं भी दफनाया जा रहा है ! शवों को कंधा देने के लिए कोई नहीं मिल रहा है ! लाश में तब्दील हो चुके ऐसे लोग मौत से पहले भी अकेले थे बाद में तो होना ही था ! वह भी लावारिस रूप में ! आज ही अखबार में था कि हम इटली जैसी स्थिति से एक माह और अमेरिका से सिर्फ 15 दिन दूर हैं। यह भी गौरतलब है कि इटली, अमेरिका, जर्मनी, स्पेन जैसे देशों में शुरूआती लापरवाही बहुत भारी पड़ी थी, जहां अब यह आशंका हो गयी है कि यदि जल्दी ही हालत काबू में नहीं आए तो अमेरिका में 22 तथा ब्रिटेन में 5 लाख लोगों की मौत हो सकती है ! जबकि ये देश प्रगति में हमसे कई गुना आगे हैं। फिर भी हमारी तैयारी की प्रशंसा के बदले कुंठित आत्मश्लाघि विद्वान निंदा और मजाक बनाने से बाज नहीं आ रहे ! यह हंसी-ठिठोली उस बात से बिलकुल अलग है जो हमारे ग्रंथों में विपदा का सामना निर्भीक और हंसते हुए करने को कही गयी है। यहां सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत द्वेष नजर आ रहा है। ऐसे मूढ़मति और उनके तथाकथित नेता अपनी ओछी मानसिकता और स्वार्थ के तहत अभी भी समय की भयावकता को समझ नहीं पा रहे हैं, या यूं कहिए समझना ही नहीं चाहते ! जबकि भारत तथा राज्यों की सरकारें और उनके स्वास्थ्य महकमें धीरे-धीरे स्कूल, कॉलेज, रेल, मॉल, धर्मस्थल और भीड़-भाड़ वाली जगहों को बंद करते जा रहे हैं। 

आज हमारी सरकार भविष्य के खतरे को देखते हुए जो एहतियाद बरत रही है उससे हम अभी इलाज के मामले में कई देशों से आगे हैं। इस स्थिति को बरकरार रखते हुए लोगों को पूरी तरह रोग और चिंता मुक्त करने के लिए जरुरी है कि हम बताई, सुझाई जा रही सावधानियों पर पूरी गंभीरता से अमल करें। लोगों को भी समझाएं, जागरूक बनाएं ! सुरक्षित रहने के तरीकों का सपरिवार पालन करें ! उसे किसी भी तरह हलके में ना लें !  क्योंकि लापरवाही से यदि इसके ''तीसरे स्टेज'' की स्थिति आ गयी तो उन विषम परिस्थियों को संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा ! क्योंकि हमारे यहां के लोग इस वायरस के प्रकोप से बचने के बजाए उसका और उससे सावधान करने वालों का मजाक उड़ाने को ही अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं ! खुदा ना खास्ता यदि उस समय  ऐसे विरोध करने, मजाक उड़ाने, सावधानी के लिए अपनाए जाने वाले कदमों को नकारने वाले, बहके हुए लोगों के परिवार का कोई सदस्य इस महामारी की चपेट में आ जाता है तो इनकी सारी अक्लमंदी, अपने आकाओं के प्रति वफादारी, कुंठित मानसिक प्रवृत्ति सब धरी की धरी रह जाएंगी और इन्हें भी बदहवास हो उन्हीं सरकारी अस्पतालों की ओर दौड़ना पडेगा जिनका आज ये मजाक बना रहे हैं ! अभी भी समय है निर्देशों का कड़ाई से पालन करें, सावधान रहें, खुद भी सुरक्षित रहें दूसरों को भी रहने दें।    

बुधवार, 18 मार्च 2020

प्रभु कभी अपने बच्चों को नहीं बिसारते

आज  कोरोना की भयावकता को देख युद्ध स्तर पर इसके खिलाफ मुहीम छेड़ी जा चुकी है ! जिसके तहत कई मंदिरों को बंद कर दिया गया है तो कुछ में अत्यधिक सावधानी बरती जा रही है। इस पर कुछ अति बुद्धिमान तथा आत्मश्लाघी विद्वान भगवान का मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आ रहे ! इसी पर एक पुरानी कहानी याद आ गयी...............! 

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देश के एक हिस्से में बरसात के दिनों में तूफ़ान आ जाने से हाहाकार मचा हुआ था ! सैलाब ने हर ओर तबाही मचा दी थी ! बड़े-बड़े घर जमींदोज हो गए थे ! धन-जन की बेहिसाब क्षति हुई थी। इंसान-पशु-मवेशी सब बाढ़ की चपेट में आ जान गंवा रहे थे। ऐसे में भगवान में गहरी आस्था रखने वाला एक आदमी किसी तरह खुद को बचाते हुए एक पेड़ पर बैठा प्रभु से खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि भगवान् उसकी रक्षा जरूर करेंगे। तभी उधर से एक नाव गुजरी और उसे देख उन्होंने पुकार कर कहा कि नौका में आ जाओ ! पर उसने जवाब दिया कि आप जाओ, मुझे मेरे भगवान बचा लेंगे। उसे ना आता देख नाव आगे बढ़ ली। कुछ देर बाद वहां से लोगों को पानी से बचा सुरक्षित जगह तक ले जाता हुआ एक स्टीमर गुजरा, उसमें बैठे कर्मियों के उसे बुलाने पर उसने उनको भी वही जवाब दिया, कि उसे उसके प्रभु बचा लेंगे ! उसको समझाने का कोई असर ना होते देख वे भी आगे चले गए। इधर शाम घिरने लगी थी, ऐसे में कुछ देर बाद उधर से सेना के जवान अपनी मोटर बोट से निकले और इसे देख बोले कि इधर के सभी लोगों को बचा लिया गया है, यह अंतिम प्रयास है ! तुम ही बचे हो आ जाओ ! पर इस भोले भक्त ने फिर वही राग अलाप कर ईश्वर की दुहाई दी ! लाख समझाने पर भी उसके ना मानने और अपने राहत कार्य में विलंब होता देख वे लोग भी आगे बढ़ गए।

रात घिर आई, पानी का वेग बढ़ गया और वह पेड़ जिसका सहारा उस आदमी ने लिया था उखड कर पानी में जा गिरा ! दिन भर के भूखे-प्यासे, थके-हारे उस आदमी की पानी से संघर्ष ना कर पाने से मौत हो गयी। मरणोपरांत जब वह ऊपर भगवान के सामने हाजिर हुआ तो गुस्से से भरा हुआ था ! उसने चिल्ला कर शिकायत की कि मैं तुम्हारा भक्त, मुसीबत में पड़ा, गहरी आस्था से तुम्हें पुकार रहा था ! मुझे पूरा विश्वास था कि तुम मुझे बचा लोगे ! पर तुमने तो मेरी एक ना सुनी और मुझे मार ही डाला, ऐसा क्यों ?
प्रभु बोले, अरे मुर्ख ! मैंने तो तेरी हर पल सहायता करनी चाही ! पहले एक नाव भेजी, तूने उसे नकार दिया ! फिर मैंने स्टीमर भेजा, तू उसमें भी नहीं चढ़ा ! फिर मैंने सेना के जवानों को तुझे बचाने भेजा, पर तू कूढ़मगज तब भी नहीं माना ! तो क्या मैं खुद गरुड़ पर सवार हो तुझे बचाने आता ? चल जा अपने लेखे-जोखे का हिसाब होने तक अपने अगले जन्म का इंतजार कर !

मंगलवार, 17 मार्च 2020

पूरब का वेनिस. केरल का अलेप्पी नगर।

बैक वाटर नौका विहार के दौरान लैगूनों पर रहने वालों को अपने काम-काज में रत देखा। उनके मुख्य स्थल पर आने-जाने के लिए शहरों की बस सेवा की तरह वहां छोटे-बड़े स्टीमरों की फेरी की सेवा उपलब्ध है, पर तक़रीबन हर घर के सामने हैसियत के अनुसार छोटी-बड़ी-सामान्य-सुंदर-मोटर चालित हर तरह की नौकाएं बंधी दिखाई पड़ती हैं। जैसी मैदानी इलाकों में स्कूटर,बाइक या कारें खड़ी रहती हैं...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग 
केरल का एक छोटा सा नगर अलेप्पी, जिसे अलाप्पुझा के नाम से भी जाना जाता है। यह त्रिवेंद्रम से तक़रीबन डेढ़ सौ की.मी. की दुरी पर समुद्र के किनारे स्थित है। इसका मुख्य आकर्षण हरे-भरे वृक्षों, पौधों, गुल्मों, लताओं, जिनमें नारियल के पेड़ों की प्रमुखता होती है, के किनारे ठहरे हुए पानी में धीमी गति से नौका विहार है। जिसका एक अलग ही रोमांच है। यह केरल के बैक वॉटर पर्यटन का सबसे लोकप्रिय केंद्र है। 
केरल की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक विश्व प्रसिद्ध सालाना "स्नेक बोट रेस" का आयोजन यहीं किया जाता है। ''नेहरू ट्रॉफ़ी बोट रेस'', जिसे स्थानीय भाषा में वल्लमकली कहलाने वाला यह एक भव्य आयोजन है, जिसे अगस्त और सितंबर माह के बीच आयोजित किया जाता है। ये नौका दौड़ आमतौर पर फसल के मौसम के दौरान आयोजित की जाती है। 


धान के खेत में खड़ा रेस्त्रां 
गदा नुमा वातानुकूलन 
इसमें कई नाविक एक साथ सम्मोहित करने वाले समन्वय के साथ पूरे वेग से कतारबद्ध होकर लगभग 100 फिट लंबी नौकाओं का संचालन करते हैं।पुन्नमडाकायल झील पर बड़ी तादाद में देश -विदेश के लोग एकत्रित हो इस अनोखी रेस का आनंद उठाते हैं। 1952 से शुरू हुआ यह रोमांचकारी खेल आज भी उतने ही जोशो-खरोश से खेला और देखा जाता है।
होटल 



लैगून पर बसे घर 
हमारा जाना तो मार्च में हुआ था सो हमने बैक वॉटर में क्रूज और नौका के मिले-जुले रूप तथाकथित हाउसबोट में सवार हो करीब डेढ़ घंटे तक मंथर गति से घूमते हुए प्रकृति के इस अनोखे रूप का आस्वादन किया। इसी सफर के दौरान लैगूनों पर रहने वालों को अपने काम-काज में रत देखा। उनके मुख्य स्थल पर आने-जाने के लिए शहरों की बस सेवा की तरह वहां छोटे-बड़े स्टीमरों की फेरी की सेवा उपलब्ध है पर तक़रीबन हर घर के सामने हैसियत के अनुसार छोटी-बड़ी-सामान्य-सुंदर-मोटर चालित हर तरह की नौकाएं बंधी दिखाई पड़ती हैं। जैसी मैदानी इलाकों में स्कूटर,बाइक या कारें खड़ी रहती हैं। अभी तो स्वच्छ हवा-पानी और प्रकृति की गोद में उनका रहन-सहन बहुत लुभावना और मनभावक लग रहा था पर हम में से कोई भी उस समय की कल्पना नहीं कर सकता था जब यही कायनात बरसात के मौसम में अपना रौद्र रूप धारण कर कहर बरपाने लगती है !  


घर का वाहन 
त्रिवेंद्रम से पिछले दिन की कन्याकुमारी की यात्रा की तरह ही सुबह जल्द निकलना हुआ। यात्रा की शुरुआत गायत्री मंत्र की तीन आवृतियों और कुछेक भजनों के बाद गानों का तथा अंतराक्षरी का जो दौर शुरू हुआ वह तीन घंटे के बाद दोपहर के भोजन की आवश्यकता को देखते हुए ही थमा। हमारे लिए अलेप्पी में तीन बजे नौका, जिसे द्वितलीय बजरा कहना ज्यादा मुनासिब होगा, इंतजार कर रहा था। आज की रात अलेप्पी में ही बितानी तय थी सो होटल में ''चेक इन'' कर कुछ दूर खड़े बजरे पर सवार हो गए। हालांकि नौका विहार का मौका विभिन्न शहरों में कई बार मिल चुका है पर यहां यही कहा जा सकता है कि यह अनुभव अद्भुत था। 


सूर्यास्त होने वाला था ! 6.45 पर क्षितिज पर सूर्य और सागर के मिलन के उस अलौकिक, दर्शनीय व अद्भुत प्राकृतिक लम्हे को अपनी आँखों और कैमरों में कैद करने के  करने के लिए हर कोई बेचैन था ! सो पहुंच गए अलेप्पी ''सी बीच'', उस अस्मरणीय पल का गवाह बनने।



विदाई 
ग्रहाधिराज की भाव-भीनी विदाई हुई ! मस्ती की गई ! चाय वगैरह छकी गई और लौटना हुआ होटल ! अभी आठ भी नहीं बजे थे तो सिद्दार्थ ने रात्रिभोज के पहले एक राउंड ''म्यूजिकल चेयर'' का प्रपोजल रखा जो सहर्ष स्वीकार हुआ। फिर डिनर और निद्रा का आह्वान ! 
कल फिर पेरियार जो जाना था ! 

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