यात्रा वृतांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
यात्रा वृतांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

कोचीन, चाइनीज फिशिंग नेट, यात्रा का समापन,

क्रूज, जो कि एक बड़ा द्वितलीय बजरा ही था, में लंबे मोल-भाव के बाद सवारी साध ली गई। अंधेरा घिरने लगा था, इतने में बोट वाले ने गाने लगा दिए, कुछ देर तो सबने गीत-संगीत व सागर का आनंद लिया पर उसके बाद ''बुजुर्ग युवाओं'' का जोश नृत्य में बदल गया जिसमें उन्होंने अपने ग्रुप के अलावा अन्य सहयात्रियों को भी सम्मिलित कर लिया। घंटा-डेढ़ कब बीत गया पता ही नहीं चला.............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग     
जनकपुरी के #Retired_&_Senior_Citizens_Brotherhood (RSCB) के सौजन्य से 29 फरवरी से सात मार्च तक की केरल यात्रा का अंतिम चरण आ गया था। आज सुबह मुन्नार से चल कर कोचीन पहुंचना था, जहां से कल सात तारीख को सुबह साढ़े नौ बजे विस्तारा का विमान हमें वापस दिल्ली पहुंचाने वाला था। रोज की तरह सब निपटा कर अपनी बस ''रानी" में सवार हो, प्रभु का ध्यान कर हल्के-फुल्के माहौल में सब कोचीन की ओर रवाना हो गए ! माहौल मस्ती भरा जरूर था पर सभी के मन में कहीं ना कहीं इस खुशगवार, आनंदमयी, रोचक सफर के समापन का मलाल भी था ! पर जो भी चीज शुरू होती है उसका कभी ना कभी अंत भी होता ही है !
एशिया का सबसे बड़ा मॉल, लु लु 

कोचीन एयरपोर्ट 
इस बार यह तय पाया गया था कि होटल में ''चेक इन'' करने से पहले कोचीन दर्शन किया जाएगा ! यह शायद हमारे ट्रिप आयोजक #Riya_Travel की चूक थी कि उनको इस बात का ध्यान नहीं रहा कि शुक्रवार होने की वजह से सारे मुख्य चर्च और सिनागॉग बंद थे ! मायूसी होना लाजिमी था, कुछ गर्माहट भी आई इस लापरवाही पर, परंतु जल्दी ही सब नॉर्मल हो गया और कोचीन तट पर पुराने समय से प्रयोग में चले आ रहे मछलियां पकड़ने वाले जालों को देखने अग्रसर हो गए !


चाइनीज फिशिंग नेट - चीन से आई, मछली पकड़ने की यह तकनीक अपने आप में एक अजूबा सा ही है। जो चीन के अलावा सिर्फ कोचीन में ही प्रचलित है। इसे लिफ्ट नेट या कैंटीलिवर नेट के नाम से भी जाना जाता है ! ऐसा मानना है कि 1350 में कुबलाई खान के समय के सौदागरों के साथ यह विधि भारत आई थी। कुछ विद्वानों के अनुसार चीन के खोजकर्ता झेंग-हे ने इसे भारतवासियों से परिचित करवाया था ! चीन से जुड़े होने के कारण ही इसे मलयालम भाषा में चीनीवाला कहते हैं। विशाल झूले की तरह टंगे गोलाकार थैलेनुमा जाल को पानी में कुछ देर डुबो कर फिर ऊपर ले आते हैं, तब तक इसमें सैंकड़ों मछलियां फंस चुकी होती हैं। कोच्चि-फोर्ट के सागर तट पर लगे ऐसे अनेकों जाल आजकल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं। इसीलिए वहां के मछुआरे अपने जाल की कार्यप्रणाली दिखाने के पैसे वसूलने लग गए हैं।
कोच्चि डॉक यार्ड 


उस दिन गर्मी बहुत थी सो कुछ देर ठहर कर हम सब होटल आ गए। कुछ अपनी शॉपिंग का अंतिम डोज पूरा करने निकल गए और कुछ हम जैसे जिन्होंने अभी तक बैक वॉटर या झील में ही जलविहार किया था, वे पहुंच गए कोचीन सागर तट ! क्रूज, जो कि बड़ा द्वितलीय बजरानुमा ही था, में लंबा मोल-भाव कर सवारी साध ली गई। अंधेरा घिरने लगा था, इतने में बोट वाले ने गाने लगा दिए, कुछ देर तो सबने गीत-संगीत व सागर का आनंद लिया पर उसके बाद ''बुजुर्ग युवाओं'' का जोश नृत्य में बदल गया जिसमें उन्होंने अपने ग्रुप के अलावा अन्य सहयात्रियों को भी सम्मिलित कर लिया। घंटा-डेढ़ कब बीत गया पता ही नहीं चला। निश्चित जगह सब मिल कर होटल लौट आए ! दूसरे दिन दोपहर एयर पोर्ट पर मिलते रहने का वादा कर,सुखद यादों और भरे मन से सब अपने-अपने घरौंदों को हो लिए। 
क्रूज पर 
क्रूज से 

मिसेज वालिया 
इस सफर में एक से एक उम्दा, नेक, खुशदिल, हिम्मती और उम्र के इस पड़ाव पर भी बुलंद हौसले वाले इंसानों से मिलने का सुयोग प्राप्त हुआ ! पर सबसे ज्यादा किसी ने मुझे ही नहीं, सबको प्रभावित किया वह हैं  वालिया ! बैंक से अवकाश प्राप्त इस महिला की जीजीविषा अनुकरणीय है ! हालांकि उनका जिस्म उनको पूरी आजादी नहीं देता खुल कर चलने की फिर भी पूरी यात्रा में उनका जोश, उनकी जिज्ञासा, उनका कौतुहल किसी से भी किसी मायने में कम नहीं ! नाहीं उनकी वजह से यात्रा की निर्धारित रूप-रेखा में कोई व्यवधान आया ! इस मिलनसार, हंसमुख, जिंदादिल महिला के लिए हैट्स ऑफ ! वे सदा ऐसी ही स्वस्थ और प्रसन्न रहें ! उनके साथ ही सभी हमसफ़रों को भी शुभकामनाएं ! सभी स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें ! सबसे जल्द मिलना हो इसी कामना के साथ समय आ गया है विदा लेने का, गुड़बाय कहने का........सायोनारा, सी यू अगेन ! 

शनिवार, 28 मार्च 2020

केरल का नंदनकानन, यात्रा मुन्नार की

मुन्नार का अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम, केरल के इडुक्‍की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग जैसा रूप प्रदान करते हैं। हमारी इस यात्रा की यह खासियत थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इन तीन रूपों को देखने का अवसर समय के कुछ ही अंतराल में प्राप्त हो गया था .....!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देखते-देखते 29 फरवरी को सुबह सात बजे की विस्तारा की फ्लाइट से शुरू हुई आठ दिवसीय केरल की यात्रा का पांचवां दिन कब आ पहुंचा पता ही नहीं चला ! आज हमें पेरियार से 90 की.मी. दूर, सागर तल से करीब 5900 फिट की ऊंचाई पर बसे, दक्षिण के एकमात्र पहाड़ी इलाके के शहर मुन्नार पहुंचना था। सो सुबह सारे जरुरी कार्यों को निपटा, आठ बजते-बजते बस में बैठ, सदा की तरह परंपरानुसार प्रभु का स्मरण कर यात्रा के अगले चरण की ओर बढ़ लिया गया। इस यात्रा की खासियत यह थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इस तीन रूपों को देखने का सुअवसर समय के कुछ ही अनिराल में प्राप्त हो गया था !              




टाटा चाय संग्रहालय के सामने 
मुन्नार केरल के इडुक्की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के मनमोहक ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग सा रूप प्रदान करते हैं। मुन्नार एक मलयालम शब्द है'; जिसका अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम ! जो यहां की तीन नदियों मधुरपुजहा, नल्लाथन्नी और कुंडली के संगम के कारण पड़ा है।   


संग्रहालय 


चाय प्रसंस्करण, पुराने तरीके से  


पुराने उपकरण 




सूर्यास्त 
हालांकि हमें सौ की.मी. से कम दूरी ही तय करनी थी, पर पहाड़ी रास्ते की वजह से काफी समय लग गया। रास्ते में ही टाटा ग्रुप के नलथन्नी टी इस्टेट संग्रहालय को देखने के लिए रुके। इसकी स्थापना चाय उत्पादन के लिए टाटा ग्रुप द्वारा 1880 में की गई थी। आज भी यहां इतिहास को ज़िंदा रखने के लिए पुराने तरीके से ही चाय का प्रसंस्करण किया जाता है। एक छोटे से संग्रहालय में संजो कर रखी गई पुराने समय से जुड़ी निशानियों, उपकरणों तथा तस्वीरों और आधे घंटे के एक सिनेमा शो द्वारा शुरुआत में सामने आई कठिनाइयों, मुश्किल परिस्थियों, दिक्कतों को बताया जाता है। इसके साथ ही उस समय की टी प्रोसेसिंग ईकाई में चाय बनने की पूरी प्रक्रिया को दिखाया और समझाया जाता है। यहीं पर उनके द्वारा चालित टी शॉप में अपनी नॉर्मल टी दस रूपए में, ग्रीन टी बीस और व्हाइट टी पचास रूपए में उपलब्ध थी, हमने 'अपनी' चाय ली और फिर होटल की ओर बढ़ लिए। कुछ देर पहले ही रिम-झिम हो चुकी थी। मौसम खुशहाल था ! होटल का परिवेश भी मनोनुकूल होने और कुछ-कुछ थकान के एहसास के कारण ज्यादातर लोग वहीं सिमट गए। जिनके मनोरंजन के लिए होटल में ही तंबोला का प्रावधान था। पांच-सात लोगों ने बाहर टहलने को तवज्जो दी। 
कुण्डला झील 






झील परिसर 




होटल में 
दूसरे दिन सुबह सदल-बल मुन्नार से 20 की.मी. की दूरी पर स्थित कुण्डला झील पहुंचे। यह झील पर्वत शृंखलाओं के बीच बने बांध के कारण निर्मित, एक कृत्रिम जलाशय है। बस की पार्किंग से परिसर में प्रवेश करने पर करीब पचास फिट की उतराई के बाद जलाशय तक पहुंचना हो पाता है। परिसर बेहद साफ़-सुथरा और अति सुंदर फूलों से आच्छादित होने के कारण मन मोह लेता है। वहीं महिलाओं और बच्चों के वस्त्रों और अन्य सजावटी सामानों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाने वाला एक आउटलेट भी है, जहां खरीदारी करना स्वाभाविक हो जाता है। नीचे जलाशय में स्पीड बोट और बड़ी बजरेनुमा नौका द्वारा जलविहार की सुविधा का प्रावधान भी है, जो कि यहां का मुख्य आकर्षण है। अब जब आए ही थे तो उसका अनुभव उठाना तो बनता ही था। सो घूम-फिर, जेब हल्की करवाने के बाद ही ईको प्वाइंट देखने का मुहूर्त बन पाया !  







ईको प्वाइंट 


मुन्नार से पंद्रह की.मी. के फैसले पर नदी के किनारे ढलान पर खड़े हो कर जोर से आवाज लगाने पर सामने घने जंगल से परावर्तित हो लौटती ध्वनि को सुनना, एक अलहदा ही अनुभव प्रदान करता है। हमारे पहुंचने पर हवा की दिशा जंगल से हमारी ओर होने के कारण प्रतिध्वनि उत्पन्न नहीं हो रही थी पर कुछ देर बाद सुनना संभव हो गया था। यहीं प्रोफेशनल लोगों से फोटो भी खिंचवा, नारियल पानी से गला तर करने बाद वापसी हुई। होटल के पहले पड़ते बाजार से स्थानीय मसालों को खरीदने का लोभ संवरण कर पाना, वह भी दुनिया के मसालों के सबसे बड़े केंद्र केरल में, मुश्किल था ! सो कुछ अनिक्षुक लोगों को बस से होटल, जो बाजार के नजदीक ही था, भेज ज्यादातर लोग अपने शॉपिंग के शौक को पूरा करने में जुट गए। रात हंसी-ख़ुशी, मस्ती-मजाक में गुजरी। दूसरे दिन यात्रा का अंतिम पड़ाव था, कोचीन। जहां से एक दिन बाद वापस दिल्ली के लिए लौटने की हवाई यात्रा मुकर्रर थी।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

केरल का पेरियार, जहां कायनात अपने अछूते रूप के साथ विराजमान है

इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद मसालों की खूब खरीदारी हुई...!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिल्ली के ''RSCB'' के तत्वाधान में 29 फरवरी से सात मार्च तक की केरल यात्रा के दौरान चौथे दिन, अलेप्पी से करीब 140 की.मी. की दुरी पर स्थित थेकाड्डी, जिसे पेरियार के नाम से भी जाना जाता है, जाना तय था। वैसे थेकाड्डी कस्बे का नाम है और पेरियार वह जगह है जहां वन्य जीव अभयारण्य स्थित है। तमिलनाडु की सीमा से लगती, दक्षिणी-पश्चिमी घाट की कार्डामम और पेंडलाम नामक पहाड़ियों, घने वनों और सुंदर झीलों से घिरी यह जगह अपने खूबसूरत वन-विहार के लिए जगत्प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध राजनेता इरोड वेंकट नायकर रामासामी, जिन्हें सम्मान के साथ पेरियार यानी सम्मानित व्यक्ति कहा जाता था, के नाम पर इस जगह का नामकरण किया गया है।   
पेरियार झील 
चार मार्च की सुबह नाश्ता-पानी निपटा अपनी बस ''रानी'' में हमनें अपनी सीटें संभाल लीं। प्रत्येक सदस्य पिछले तीन दिनों के ''हेक्टिक शड्यूल'' के बावजूद खुद को बिल्कुल तारो-ताजा महसूस कर रहा था। हो सकता है इसका कारण यहां की साफ़ आबो-हवा और चिंता-तनाव मुक्त वातावरण का भी असर हो ! यात्रा की परंपरा के अनुसार हमारे कप्तान श्री नरूला जी ने तीन बार गायत्री पाठ किया ! फिर माइक प्रेमी खेमानी जी ने जगह संभाली और फिर वही भजनों, गानों, चुटकुलों का वह लंबा दौर शुरू हो गया, जिसमें अन्नू जी, खन्ना जी, श्रीमती और श्री मेहरा जी, श्रीमती और श्री बेदी जी के साथ-साथ कदम जी और मैंने भी पूरे जोशोखरोश के साथ भाग लिया ! पर सबसे ज्यादा समां बांधा नीरू जी ने जिनका गायन, वाद्य संगीत के साथ एक अलग ही अंदाज के साथ सामने आता रहा। कहते हैं ना कि खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है, तो तीन दिन से अलग चुप से रहे सिद्दार्थ और जीनु को भी जोश आ गया और वे भी इस महफ़िल का हिस्सा बनने से अपने को नहीं रोक पाए।


सबसे युवा और कर्मठ सदस्य, नरूला जी 




पेरियार के रास्ते में ही वनौषधि उत्पादन केंद्र पर रुक कर पहली बार उन मसालों, जिनका उपयोग रोज ही हमारी रसोई में होता है, के पौधों, लताओं और वृक्षों को देखने का सुयोग मिला। इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद खूब खरीदारी हुई। करीब घंटे-डेढ़ के बाद ही आगे चलना संभव हो पाया।   
इलायची 



लौंग 
काली मिर्च 

चीकू 

वनीला, दुनिया की दूसरी सबसे मंहगी उपज 


दालचीनी 

अच्छे-खासे नियमानुसार चलते प्रोग्राम में एक छोटा सा व्यवधान तब महसूस हुआ जब पेरियार पहुंच कर यह पता चला कि जीप सफारी बंद है और वन-विहार नहीं हो सकेगा ! अब कर भी क्या सकते थे, सो जो उपलब्ध था उसी सरकारी बस में पेरियार झील तक गए। 


पोज़ ऐसे भी दिए जाते हैं 

सब कुछ बंद होने के बावजूद वहां प्रकृति अपने मनोहारी अनुपम रूप साक्षात उपस्थित थी। यादगार के लिए फोटो वगैरह ली गयीं और सर्वसम्मति से वापस होटल आने का प्रस्ताव पास हो गया। पिछली थकान उतारने का एक मौका या कहिए बहाना मिल गया था।
थेकाड्डी में भी एक रात का ही स्टे था। दूसरे दिन मनोहारी मुन्नार हमारा इंतजार कर रहा था ! जिसकी हरी-भरी चाय की वादियों में दो दिन का समय गुजरना था, जो कम तो था पर कार्यक्रम के समय की पाबंदी भी तो थी !  

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...