pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: 2026

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

खौफ बिस्कुटों का 😧

सच मानिए उन बिस्कुटों का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी.............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

क हते हैं कि दुनिया की हर चीज में आत्मा होती है ! सजीव का तो ठीक है पर क्या निर्जीव में भी ? पर यह भी तो हो सकता है कि जो हमारे लिए निर्जीव हो, वह खुद में सजीव हो ! दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो पैरा-नेचुरल या पैरानॉर्मल बातों पर विश्वास करते हैं ! फिल्मों में भी पुतले, पेड़, कार आदि की आत्माओं के कारनामे सभी ने देख ही रखे हैं ! यदि ऐसा है तो क्या निर्जीव बिस्कुटों में भी ऐसा कुछ होता है ? मेरा तो अनुभव है कि ऐसा कुछ जरूर होता है ! आप माने या ना माने, पर भई मैं तो मानता हूँ, भुग्तभोगी जो हूँ !

यही थे वे 

च लिए पूरी बात बताता हूँ ! आजकल बाजार के डराने-धमकाने की वजह से हम सब कुछ ज्यादा ही स्वास्थ्य-जागरूक हो गए हैं ! उसी के निर्देशानुसार खाने-पीने की चीजें घरों में जगह बनाने लगी हैं ! भले ही वह आपको अच्छी लगें या नहीं ! अब बाजार ने बताया कि बाकि बिस्कुटों की बजाय फलानि कंपनी का फलाना डाइजेस्टिव बिस्कुट सेहत के लिए उत्तम है ! उसके बताने की देर थी कि अगली खेप में घर में उसी ब्रांड के ढेर सारे ''पैकेट्स'' आ गए ! अब आप ही बताइए एक ही चीज रोज-रोज कब तक खाई जा सकती है ? मैंने उसके खिलाफ विद्रोह किया और अपनी पसंद का उसका दूसरा भाई ले आया ! 

शा यद यह बात पहले वाले को पसंद नहीं आई, हो सकता है कि इससे उसकी भावनाओं और सम्मान को ठेस पहुंची हो ! फिर क्या था उसकी आत्मा ने अपना रंग दिखाया, एक-दो दिन बाद ऑफिस में जो रिफ्रेशमेंट का सामान आया, उसमें वही बिस्कुट भाई साहब मुझे मुंह चिढ़ाते हुए शामिल थे ! मुझे लगा ऐसा संयोगवश हुआ होगा ! पर बंदे को क्या पता था कि यह सब सुपर-नैचुरल पॉवर का खेल है ! और फिर मेरे सिवाय वहां सभी को वे पसंद भी थे ! अपने वश का तो इतना ही था कि उसका सेवन ही ना किया जाए ! ऐसा ही करता भी रहा, या ज्यादा से ज्यादा किसी के अनुरोध पर एक-आध कुतर लिया ! 

इसी बीच अपने छोटे भ्राता निहार के यहां नागपुर जाने का मौका मिला ! अब विडंबना देखिए, झटका यहां जैसे मेरा इंतजार  ही कर रहा था ! अगले दिन सुबह की चाय के साथ बिस्कुटों के डिब्बे का जैसे ही मैंने ढक्कन खोला तो देखा उसी ब्रांड के वही महाशय मुझे देख, आँख मारते हुए वहां भी विराजमान थे ! जैसे कह रहे हों बेटा, कहां-कहां भागोगे, जहां भी जाओगे मुझे ही पाओगे ! एक अदना सा बिस्कुट इंसान को कितना निरीह बना देता है ! 

सच मानिए उस बिस्कुट का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''तेरे मन कुछ और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी !

वा पसी मद्रास-निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस से थी ! सुबह जब वेंडर चाय लाया तो उसके साथ भी वही दो डाइजेस्टिव बिस्कुट फिर किसी साये की तरह मेरे सामने उपस्थित थे ! लगने लगा था कि एक तरह से मिडास हो गया हूँ, जिस बिस्कुट को छूता हूँ वही ''वह'' बन जाता है ! समझ नहीं आ रहा था कि रोऊं या उस बिस्कुटिया आत्मा से माफी मांगू ............!

अब आप बताएं, आपको क्या लगता है ! क्या यह सब संयोग था, या फिर......................😨

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद, मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर गया तो वहां उस रचना को भी विचरते पाया ! असमंजस और गहरा गया ! पर तभी मेरी नजर उस रचना के प्रकाशित होने की तारीख पर पड़ी, जो मेरे ब्लॉग के दूसरे यानी अगले दिन की थी ! मन से बोझ सा उतर गया ! लौट कर अमित जी के उस प्रशंसक की टिपण्णी पर टिप्पणी की कि "महोदय वह रचना मेरी नहीं थी, मैंने इस बात को इंगित भी किया है ! पर वह अमित जी की भी नहीं थी, उन्होंने भी उसे मेरे ब्लॉग पर छपने के बाद दूसरे दिन संकलित ही  किया है ! तो किसने किस की............😕" 

व्यक्ति पूजा का जैसा हाल वर्तमान में है, वैसा शायद ही कभी रहा हो ! आज अधिकांश लोग किसी के भी नाम, दाम या व्यक्तित्व के मायाजाल में फंस कर उसके मुरीद बन जाते हैं ! उन्हें सामने वाले की मानसिकता, उसकी नैतिकता, उसके चरित्र से कोई मतलब नहीं होता, उनके लिए अपने आदर्श के मुख से निकली बात ही ब्रह्म-वाक्य होती है !  ये लोग उसके विरुद्ध कोई सच्ची बात भी सुनना भी गवारा नहीं करते ! इतना ही नहीं अपने अगड़े का प्रतिद्वंद्वी उन्हें दुश्मन सरीखा नजर आने लगता है। यह बात आज चहूं ओर नजर आ रही है !   

पराकाष्ठा 
"निज प्रशस्ति, केहि लाग न नीका !" इसीलिए ऐसे चाटुकारों की वजह से सामने वाला भी अपने को कुछ का कुछ समझ, एक अलग ही जगत में विचरने लगता है ! अपने चेले-चपाटियों के मनगढ़ंत, मिथ्या आख्यानों को ही सच मान बैठता है ! झूठ के कोहरे में सच उससे कोसों दूर हो जाता है ! उसे अपने  सिवा सब हेय  नजर आने लगते हैं ! हालांकी अंततोगत्वा यही उसके पतन का कारण भी बनता है ! 

परजीवी 

आज के प्रसंग से कुछ-कुछ मेल खाता हुआ अपने ब्लॉगिंग से संबंधित एक प्रसंग याद आ गया ! बहुत समय पहले मैंने एक मित्र द्वारा भेजी गई एक सुंदर रचना को अपने ब्लॉग पर भी डाल दिया था ! दूसरे ही दिन उस पर अमिताभ जी के एक प्रशंसक ने टिप्पणी कर आपत्ति जाहिर कर दी थी कि वह रचना अमित जी की है, उसे आपने कैसे ले लिया ?  मैं भी असमंजस में पड़ गया कि ऐसी गलती कैसे हो गई ! हालांकि लेखक का नाम ज्ञात ना होने की वजह से मैंने अंतर्जाल का आभार प्रगट किया भी था !

ब्लॉगिंग 

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन मैंने जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर गया तो वहां उस रचना को भी विचरते पाया, असमंजस और गहरा गया ! पर तभी मेरी नजर उस रचना के प्रकाशित होने की तारीख पर पड़ी, जो मेरे ब्लॉग के दूसरे यानी अगले दिन की थी ! मन से बोझ सा उतर गया ! लौट कर अमित जी के उस प्रशंसक की टिपण्णी पर टिप्पणी की कि "महोदय वह रचना मेरी नहीं थी, मैंने इस बात को इंगित भी किया है ! पर वह अमित जी की भी नहीं थी, उन्होंने भी उसे मेरे ब्लॉग पर छपने के बाद दूसरे दिन संकलित ही  किया है ! तो किसने किस की............?

यहां जरा प्रसंगवश मुख्य विषय से भटकना हो गया है ! इसलिए बताता चलूं कि अमित जी का मैं भी प्रशंसक रहा हूँ ! उनकी विद्वता, उनकी हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अद्भुत पकड़, उनकी विनम्रता जैसी खासियतें उनमें तथा अन्य अभिनेताओं में फर्क दर्शाती हैं ! इस प्रसंग से उपरोक्त विषय का भी कोई खास संबंध नहीं है, उनको तो ऐसी बातों का आभास भी नहीं होगा ! पर उनके दीवाने फैन, मुरीद कुछ-कुछ ऊपर वालों जैसे ही हैं, जिन्हें लगता है कि बॉस ने जो लिख दिया, वहीं से लिखाई शुरू होती है 😇😀

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

महाबलीपुरम का शोर मंदिर, यह कैसा नाम

आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए आने-जाने वाले समुद्री व्यापारियों और नाविकों की सहूलियत व सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था..............1

#हिन्दी_ब्लॉगिंग     

कभी-कभी किसी जगह, वस्तु या इंसान के वास्तविक नाम के बदले उसका किन्हीं कारणों से परिवर्तित नाम इतना मशहूर हो जाता है कि असली नाम किसी को याद ही नहीं रहता ! ऐसा ही एक नाम है, शोर मंदिर, जो दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन निर्माणों में से एक, तमिलनाडु के चेन्नई शहर से करीब पचपन कि.मी. दूर महाबलीपुरम के सागर तट पर स्थित है। इसका निर्माण पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने आठवीं शताब्दी में करवाया था ! ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर भारत के गौरवशाली इतिहास, वास्तुकला और इंजीनियरिंग की जीवंत मिसाल है। 

तट मंदिर 
रथ मंदिर 
इसे महाबलीपुरम के रथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है ! समुद्र की लहरों की पृष्ठभूमि में बना यह मंदिर अध्यात्म और पर्यटन का अनोखा संगम है। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा व अद्भुत दृश्य पेश करती हैं। इस परिसर में तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु जी का मंदिर है, जिसके दोनों तरफ शिव मंदिर हैं। समुद्र की तरफ का मुख्य द्वार पूर्व की ओर खुलता है। सुबह की पहली सूर्यकिरण जब मंदिर के शिवलिंग पर पड़ती है, तो वह नजारा अलौकिक होता है। 

सागर का शोर 
अब इस मंदिर के नाम की बात ! मंदिर का ''शोर'' नाम पर्यटकों को कुछ असमंजस में डाल देता है, क्योंकि सुनने वाले को शोर का मतलब कोलाहल या शोरगुल समझ में आता है, पर यह शोर (SHORE) अंग्रेजी का शब्द है, जो इसके समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण पड़ा है, जिससे इसे तट मंदिर भी कहा जाता है ! पर सवाल यह उठता है कि आठवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम शोर कैसे हो गया ? जबकि अंग्रेज तो 17 वीं शताब्दी में भारत आए थे ! तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि समय, परिस्थितियों और समुद्र के अविराम शोर के चलते ऐसा हुआ होगा !

राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय
इ तिहास खंगालने पर पता चलता है कि आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए समुद्री व्यापारियों और नाविकों का आना-जाना लगा रहता था, तब उनकी सहूलियत और सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था ! इसके अलावा शिवजी के मंदिरों को क्षत्रियसंहपल्लवेश्वर व राजसिंहपल्लवेश्वर के नाम से जाना जाता है, जिनमें उनके प्रतीक रूप में शिव लिंग स्थापित हैं। 

दर्शनीय 
ऐसी मान्यता भी है कि पहले यहां सात विशाल मंदिर हुआ करते थे, जिनमें से 6 मंदिर समय के साथ समुद्र में समा गए और आज केवल यह शोर मंदिर ही शेष बचा है। प्राचीन समय में विदेशी समुद्री यात्रियों और नाविकों को यह मंदिर समुद्र से बहुत दूर से ही दिखाई दे जाता था। इसी वजह से इसे प्राचीन काल में "Seven Pagodas" (सात पैगोडा) के नाम से भी जाना जाता था। 

अद्भुत 
यह 27 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा मंदिर विभिन्न मूर्तियों, पौराणिक कथाओं के दृश्यों से सजी एक विशाल दीवार से घिरा हुआ है। दीवारों, स्तंभों और चौखटों पर बेहतरीन सूक्ष्म नक्काशी पल्लव राजवंश के कलात्मक कौशल को प्रदर्शित करती है। यहीं पर एक मछली के आकार की विशाल शिला खंड पर ईश्वर, मानव, पशुओं, पक्षियों की विभिन्न आकृतियों को भी उकेरा गया है ! यह मंदिर सिर्फ महाबलिपुरम या तमिलनाडु का नहीं बल्कि देश के गौरव का प्रतीक माना जाता है।

अवशेष 
मूल रूप से शोर मंदिर एक बड़े मंदिर परिसर का हिस्सा है, जो समुद्र से डूबा हुआ है ! बाहर केवल यह मंदिर ही खड़ा है ! पुरातत्व विभाग इसकी खोज-खबर ले रहा है ! यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में सम्मानित इस प्रमुख पर्यटक स्थल तक देश के किसी भी भाग से रेल या वायु-मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार  

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

सैर कर दुनिया की, ये जिंदगानी फिर कहां

उम्र कितनी भी हो, जिंदादिल इंसानों में नई जगहें, पुरानी यादें ताजा करने और सुकून के पलों की चाहत जीवन में कभी खत्म नहीं होती ! पर बढ़ती आयु कई आशंकाएं भी साथ ले आती है ! पर यदि  भ्रमण की सही जगह चुन, कुछ जरूरी तैयारियां कर और किसी भी परिस्थिति का हल सोच कर यात्रा की जाए तो उसे काफी सुरक्षित बनाया जा सकता है। इसलिए जब तक शरीर इजाजत देता है तब तक घूमिए, खूब घूमिए ! क्योंकि यही समय है जब जिंदगी की जिम्मेदारियों से उबर कर खुद अपने लिए कुछ करने का अवसर हासिल हुआ होता है.................🥰  

#हिन्दी_ब्लॉगिंग   

इं सान की जिंदगी की दूसरी पारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। हालंकि इसमें तकरीबन रोज ही कई तरह की अड़चनों, दवाबों, पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है ! जैसे किसी बुजुर्ग को नई तकनीक इस्तेमाल करने में थोड़ी परेशानी हो, तो तुरंत मान लिया जाता है कि वह इसे सीख नहीं सकता। किसी उम्रदराज व्यक्ति को लेकर यह आम धारणा होती है कि उसमें अब पहले जैसी ऊर्जा या काम करने की शक्ति नहीं है ! समस्या यह है कि ये सिर्फ ऐसी धारणाएं हैं, जो सभी उम्रदराज लोगों पर लागू नहीं होतीं ! दुनिया में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहां बढ़ती उम्र में भी अपनी दृढ इच्छाशक्ति के चलते बुजुर्गों ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं !

युचीरो मिउरा, 80, एवरेस्ट फतह 
फौजा सिंह, 100 +, दौड़ते ही रहे 
सारा ब्रुअर, 64, महासागर पार 

वैसे भी उम्र कितनी भी हो, जिंदादिल इंसानों में नई जगहें, पुरानी यादें ताजा करना और सुकून के पल बिताने की चाह जीवन में कभी खत्म नहीं होती ! जरुरत है सिर्फ हौसले और आत्म-विश्वास की ! हालांकि घर-परिवार के अन्य सदस्यों में घबराहट होना भी स्वाभाविक है, मन में यह सवाल बना रहता है कि अगर रास्ते में कोई परेशानी आ गई, तो क्या होगा  ? पर बढ़ती उम्र में भी घूमने की सही जगह चुन, कुछ जरूरी तैयारियां कर और किसी भी परिस्थिति का हल सोच कर यात्रा को काफी सुरक्षित बनाया जा सकता है। इसलिए जब तक शरीर इजाजत देता है तब तक घूमिए, खूब घूमिए ! क्योंकि यही समय है जब जिंदगी की जिम्मेदारियों से उबर कर खुद अपने लिए कुछ करने का अवसर हासिल हुआ होता है !  

आह्लाद 

सुखद पल 

पर कहीं भी घूमने जाने की इच्छा हो तो बेहतर होगा कि किसी ग्रुप से जुड़ जाएं ! जहां कोई ट्रैवल एजेंसी वरिष्ठ नागरिकों के लिए टूर आयोजित करती हो। इनके शेड्यूल में आमतौर पर भागदौड़ कम और आराम के लिए पर्याप्त समय होता है। ऐसे ट्रैवल ऑपरेटरस को यात्रा के दौरान हो सकने वाली किसी भी समस्या से निपटने का अनुभव होता है ! यदि पूर्णरूपेण ट्रिप बुजुर्गों के लिए हो तो उनकी हर छोटी-बड़ी जरुरत का ध्यान रखा जाता है ! ठहरने, खाने, घूमने, यातायात का पहले से ही प्रबंध किया हुआ होता है ! जिससे आपको किसी बात की चिंता नहीं करनी पड़ती ! इसके अलावा एक सुरक्षा का एहसास बना रहता है, जिससे पूरी यात्रा तनावमुक्त रहती है !  

सिर्फ खुद 

संतुष्टि 
यदि अकेले ही यात्रा करनी हो तो उसके पहले कुछ जरुरी एहतियात बरतना बहुत आवश्यक है ! सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का आकलन जरूर करें। हो सके तो अपने डॉक्टर की सलाह भी ले लें, इससे मनोबल में बढ़ोत्तरी होगी ! अपनी दवाइयों के साथ अपनी एक छोटी सी मेडिकल इन्फॉर्मेशन शीट भी रख लें ! ऐसी जगह चुनें, जहां आवागमन सुगम हो, जहां जा रहे हैं वहां के माहौल, मौसम की जानकारी भी जरूर ले लें !  एक दिन में कम जगहें, आराम से देखें, ताकि बिना थके यात्रा का आनंद ले सकें। अपने साथ एक छोटा कार्ड रखें, जिस पर आपका नाम, दो मोबाइल नंबर, जिनसे आपात स्थिति में संपर्क किया जा सके ! जहां ठहरें हैं उस होटल का नाम व पता लिखा हो। इसके अलावा घर के सदस्यों से फोन पर संपर्क बनाए रखें ! यदि छोटी-छोटी सावधानियां, सही तैयारी और थोड़ी सतर्कता बरत ली जाए तो उम्र के किसी पड़ाव पर भी सफर को सुरक्षित, सुकूनभरा और यादगार बनाया जा सकता है। तो देर किस बात की !
अरे भाई निकल के आ घर से, आ घर से ! 
दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से...................! 

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार   

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

आराध्य की विदाई भी सम्मानजनक होनी चाहिए

मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना सिर्फ एक चलन हो कर रह गया है ! क्या प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले यह मूर्ति स्थापना सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! जिसके कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है.......!! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम सब भारतवासी उत्सव प्रिय लोग हैं। वर्ष भर हमारे यहां कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह के समारोह चलते ही रहते हैं ! पर साल के कुछ महीने, पर्वों के लिए खास होते हैं और अब उनका समय आया हुआ है ! रक्षा-बंधन और जन्माष्टमी के बाद बप्पा जी आने वाले हैं, फिर हमारे पूर्वज आएंगे, फिर माँ का आगमन होगा। इसके साथ ही महाकाव्यों का मंचन, पूजा, स्तुति करते हुए कब साल बीत जाएगा, आबालवृद्ध किसी को भी पता ही नहीं चल पाएगा ! पर ऐसे में एक विडंबना भी है ! हम जिसको पूजते हैं, आराधना करते हैं, पलक-पांवड़े बिछाते हैं उसी की अनजाने में बेकद्री भी कर देते हैं, इस अविवेकता, बुद्धिहीनता, नासमझी से बचना भी बहुत जरुरी है !

बप्पा 
दुर्गा पूजा 
होता क्या है कि पर्वों के दिनों में हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को एक निश्चित अवधि के लिए सार्वजनिक स्थलों के अलावा अपने घरों में भी एक निश्चित अवधि के लिए स्थापित किया जाता रहा है ! समय और चलन के साथ-साथ अब घर-घर में अपने आराध्यों की स्थापना होने लगी है, जिनकी नियमानुसार विदाई भी निश्चित होती है ! उनका विसर्जन किसी तालाब, नदी या सागर में किया जाता है !

विदाई 

पूजा स्थलों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके आयोजकों में अपने कार्यक्रम को श्रेष्ठ सिद्ध करने की स्पर्द्धा या होड़ भी शुरू हो गई है, जिसका असर मूर्तियों के आकार, सजावट और साजो-सामान पर पड़ने लगा है, जिससे विसर्जन क्षेत्र में उनको विगलित होने के लिए ज्यादा जगह और समय की जरुरत पड़ने लगी है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है !
नासमझी 

बदहाली 
मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना करना एक चलन हो गया है ! देखा-देखी या बच्चों की जिद के कारण यह प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! इसी कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है !
दुर्दशा 
पर्यावरण 😥
आज जरुरत है, प्रकृति से समन्वय की ! पर्यावरण को बचाने की ! जल स्रोतों को संभालने की ! फिजूल-खर्ची पर रोक लगाने की ! धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की ! अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों, अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की ! ऐसा तभी संभव हो पाएगा जब हम, सब चलता है, की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इस ओर ध्यान देंगे !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

रविवार, 6 सितंबर 2026

बगावत मशीनों की, सिर्फ डरावनी कल्पना नहीं रह गई है

खबर है कि ''ओपनएआई'' के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक ''एजेंट्स'' ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा, मशीनें क्या करेंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती..............😨

#हिन्दी_ब्लॉगिंग    

करीब साठ-सत्तर साल पहले एक लेखक ने एक डरावनी सी कल्पना की थी कि हो सकता है मशीनें इंसानों पर हावी हो जाएं ! कल्पनाकार थे, ली फाक, जिनका असली नाम लियोन हरिसन ग्रास था। वे अमेरिका में थियेटर निदेशक होने के साथ-साथ अत्यंत लोकप्रिय कॉमिक शृंखलाओं के रचयिता थे। उनकी कॉमिक स्ट्रिप के दो विश्वप्रसिद्ध नायक थे, पहला अपराधियों से लड़ने वाला सुपर हीरो 'द फैंटम' तथा दूसरा 'मैंड्रेक द मैजिशियन'। साठ-सत्तर के दशक में इन दोनों की लोकप्रियता का जादू विश्व भर के आबालवृद्ध के सर चढ़ कर बोला करता था। 

इंसान पर हावी होने का खतरा 

ली फाक 
ली फाक ने जून 1967 में, जब कंप्यूटर शुरुआती दौर में थे, ''मैंड्रेक द मैजिशियन'' की शृंखला की एक कहानी "द कंप्यूटर वर्ल्ड" (The Computer World) में कंप्यूटर विद्रोह की एक अनोखी झलक दिखलाई थी। जिसमें एक अति-आधुनिक और विशालकाय सुपरकंप्यूटर बनाया जाता है, जिसे इंसान की तरह सोचने और निर्णय लेने की क्षमता दी जाती है। कुछ ही समय में यह कंप्यूटर खुद को इंसानों से बेहतर और श्रेष्ठ मानने लगता है और स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर देता है। 

वेताल 

मैंड्रेक 

धीरे-धीरे वह कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए दुनिया भर के अन्य कंप्यूटरों और स्वचालित मशीनों पर नियंत्रण हासिल कर लेता है। वह इतना सक्षम हो जाता है कि इंसान की आवाज सुने बगैर उसके हाव-भाव और शारीरिक भाषा से ही उसका इरादा भांप लेता था ! फिर वह अपने बॉस, इंसानों के आदेशों को मानने से इनकार कर, "डिजिटल विद्रोह" की घोषणा कर देता है तथा सेना और रक्षा प्रणालियों से जुड़े कंप्यूटरों को भी प्रभावित करने लगता है, तब अपनी सूझ-बूझ और कौशल से जादूगर मैन्ड्रेक उसके इरादों को निरस्त करता है ! 

खलनायक मशींने 
वह तो एक काल्पनिक कहानी थी, पर आजकल जैसी खबरें आने लगी हैं, उनसे वर्षों पहले की ली फाक की वह रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पना आधुनिक आविष्कार AI के माध्यम से कुछ-कुछ साकार होती दिख रही है ! जबसे इस विधा को इंसानों की नकल करने के साथ-साथ अन्य समस्याओं को हल करने की सीख दी जा रही है, तबसे यह ऐसा व्यवहार करने लगी है जिसकी तनिक सी भी उम्मीद इसके निर्माताओं को नहीं थी, इसने किसी समस्या को हल करने के लिए अपनी तलाश की सीमाएं लांघ धोखा देना भी सीख लिया है !
आशंका 

कुछ दिनों पहले एक बेहद रोमांचक खबर अमेरिका से आई है जो किसी कम्प्यूटर की बगावत से भी ज्यादा डरावनी और खतरनाक है ! बताया जाता है कि ओपनएआई के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक एजेंट्स ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! खुद ही एक-दूसरे के नाम और उपाधि निर्धारित कर साइबर हमले की साजिश रच डाली ! इतना ही नहीं पकड़े जाने पर सबूत मिटाने तक का भी इंतजाम कर लिया था ! 

चेतावनी 

यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा मशीनें क्या करेंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती !

@संदर्भ व चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर करने में अपना जीवन लगा देते हैं ! पर यह बहुत ही जटिल और दुरूह कार्य है ! अपार समय, पैसे और धैर्य की जरुरत होती है ! साथ ही घोर विरोध का भी सामना करना पड़ता है ! विरोध का होना तो लाजिमी है ! जो लोग सत्ता सुख पाने के लिए कुछ भी कर सकते हों, उनके लिए तो उनके सच का आम हो जाना किसी परमाणु विस्फोट से कम नहीं हो सकता.........!     

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम यदि अपने पुराने ग्रंथों, महाकाव्यों, इतिहास की सुप्रसिद्ध कथाओं-कहानियों को देखें तो उनमें बहादुर, निडर जननायकों के साथ ही उस समय के खलनायकों के षड्यंत्रों, कारस्तानियों, उनकी दुरभिसंधियों का भी विस्तृत विवरण मिल जाता है ! पर बदलते समय के साथ, जब खलनायक भी नायक बन सत्तानशीन होते चले गए और उनके चाटुकार, मौकापरस्त चारणों द्वारा उनके कुकर्मों पर पर्दा डाल, उनके चरित्र को पाक-साफ दिखाने, उनकी छवि को महिमामंडित करने हेतु इतिहास को ही तोड़-मरोड़ डाला गया, तो सच भी रसातल जा पहुंचा ! 

झूठ के मकड़जाल में फंसा सच 

आज जरूरत है उसी परंपरा को जीवित कर सज्जनों के साथ-साथ दुर्जनों की वंशावलियों की भी पूरी कुंडली को जनता-जनार्दन के सामने लाने की ! उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए सारे कारनामों को जिनके अतीत के सच पर झूठ का चमकीला आवरण चढ़ा, असलियत छिपा, उनको महिमामंडित कर, अवाम को सच के सिवा कुछ और ही दिखा-समझा कर पीढ़ी दर पीढ़ी जो गलत इतिहास पढ़ाया-समझाया गया, उसका पर्दाफाश करने की ! वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के सामने सच रखने की ! उनके दिलों में राष्ट्र प्रथम की भावना सुदृढ़ करने की ! जिससे किले के दरवाजे की सुरक्षा पुख्ता हो जाए, अभेद्य हो जाए !

राष्ट्र प्रथम 

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर करने में अपना जीवन लगा देते हैं ! पर यह बहुत ही जटिल और दुरूह कार्य है ! अपार समय, पैसे और धैर्य की जरुरत होती है ! साथ ही घोर विरोध का भी सामना करना पड़ता है ! विरोध का होना तो लाजिमी है ! जो लोग सत्ता सुख पाने के लिए कुछ भी कर सकते हों, उनके लिए तो उनके सच का आम हो जाना किसी परमाणु विस्फोट से कम नहीं हो सकता ! 

भावना 

इस वर्ग के लोगों को अपने समाज, अपनी संस्कृति, अपने देश और उसके गौरवशाली अतीत से कोई सरोकार नहीं होता ! उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने सुख, ऐश-ओ-आराम और अपने भविष्य की चिंता होती है! ऐसे लोग आज से नहीं सदियों से इस देश में फलते-फूलते रहे हैं ! वर्षों-वर्ष से ये लोग अपने ही देश के किले का दरवाजा अंदर से खोलते रहे हैं ! इनके कुत्सित प्रयासों के बावजूद देश तरक्की की राह पर चलने की कोशिश करता रहा है ! 

भविष्य 

कभी-कभी एक विचित्र सी सोच भी मन में उभरती है कि यदि ऐसे लोग विदेशी ताकतों के झांसे में ना आ, देश हित के प्रयासों में जुट जाएं, तो क्या अमेरिका, क्या चीन, क्या योरोप, क्या सारी दुनिया सिर्फ भारत के नाम से नहीं जानी जाने लग जाएगी.................काश ऐसा हो पाता !

जय हिन्द ! वंदे मातरम !!  

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया.............!      

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

ह मारा राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों देश की पहचान और गौरव का विदेशों में भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें सभी राष्ट्रीय अवसरों और कार्यक्रमों पर बजाया और गाया जाता है ! इससे हम सब में देशभक्ति और एकता की भावना जागृत होती है ! पिछले दिनों वंदे मातरम गीत को ले कर देश में काफी चर्चा चली ! इससे संबंधित कानून भी संसद में पारित करवाया गया ! इसका पाठ पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में श्री रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था !

वंदे मातरम 
इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया ! इसका उपयोग एक राजनीतिक नारे के रूप में पहली बार 7 अगस्त, 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान किया गया था ! हालांकि दोनों ही संगीत रचनाएं देश के गौरव, एकता और देशभक्ति की भावना को जागृत करने का काम करती हैं, पर दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं ! 

बंकिम चंद्र जी 
ह मारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" देश की पहचान और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बोल देश के इतिहासिक, मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को व्यक्त करते हैं। यह कानून द्वारा निर्दिष्ट है और देश के आधिकारिक प्रतीकों के रूप में पहचाना जाता है। इसे सभी राष्ट्रीय पर्वों और खेल आयोजनों जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। इसमें कुछ खास बाते हैं, जैसे इसे निर्दिष्ट अवधि जो 52 सेकंड की है, तय लयबद्धता यानी इसकी धुन को बदला नहीं जा सकता, ऐसा करना दंडनीय अपराध की गिनती में आता है और सम्मानजनक स्थिति में विशेष प्रोटोकॉल के तहत ही बजाया या गाया जा सकता है ! 

हमारी पहचान 
अ पना वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता और गौरव की गाथा है, जिसका अर्थ है कि मैं भारत माता की वंदना और स्तुति करता हूं। यह एक तरह से अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और देशभक्ति की अभिव्यक्ति है। जो हर भारतीय में राष्ट्रवाद की भावना को जगाती है। इसे सांस्कृतिक  आयोजनों और देशभक्ति के कार्यक्रमों में गाया जाता है। वंदे मातरम गीत में समय, धुन या लयबद्धता जैसी कोई बाध्यता नहीं है। इसके तीन विभिन्न संस्करण बहुत लोकप्रिय हैं ! पर इसकी भी राष्ट्र गान की तरह ही किसी भी प्रकार की अवमानना, असम्मानजनक स्थिति या अवहेलना करना अपराध के दायरे में आता है। 

कविगुरु 
हम सभी ने महसूस किया है कि जब भी ये दोनों कहीं भी, कभी भी प्रसारित होते हैं तो तन-बदन में एक ऊर्जा सी भर जाती है ! दिल-ओ-दिमाग गौरवान्वित हो उठते हैं ! तन-बदन में एक लोमहर्षक रोमांच का अनुभव होने लगता है ! ना जाने क्या जादू छिपा है इनके शब्दों में कि पूरे शरीर में  देशभक्ति की लहर सी दौड़ जाती है ! हर देशवासी का फर्ज है, कर्तव्य है कि उसे तो ये दोनों रचनाएं कंठस्त हों ही, यह भी सुनिश्चित हो कि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे पूर्णतया परिचित हों ! 

जय हिन्द ! वंदे मातरम !!

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार सड़क पर यूंही डंडा पटक दे तो हुड़दंगी भागते नजर आएं ! एक बार डपट दे तो किसी की चूँ तक करने की हिम्मत ना हो ! वही जवान, समाज और देश हित खातिर अपनी बेकद्री, अपनी बेइज्जती, अपनी जिल्लत को सहते हुए मौन खड़े रहे ! इतना धीरज, इतनी सहनशीलता, इतना सब्र.........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

पु लिस क्या है, कैसी है, क्या करती है, यह सभी जानते हैं ! इसके बिना अवाम, समाज, देश या सरकार एक कदम भी नहीं चल सकते, यह भी सभी को मालूम है ! पर विडंबना कि यह महकमा कितना भी जोर लगा ले, कितनी भी मेहनत कर ले, कितनी भी सफलता पा ले, कितना भी मर-खप जाए, पर ज्यादातर उसके हिस्से में बदनामी ही आती है ! इस बात को, इस प्रथा को, इस परिपाटी को हमें बदलना पडेगा ! वे भी इंसान हैं ! उन्हें भी दर्द-तकलीफ-कष्ट होता है ! उनके भी मनोभाव हैं, जज्बात हैं, वे भी संवेदनशील हैं ! 

मुस्तैदी व सजगता 

अभी जो कुछ पिछले दिनों दिल्ली में हुआ जहां बेकाबू-निरंकुश-पाशविक भीड़ ने दरिंदगी की हद पार कर दी, जहां महिला पुलिस कर्मियों तक को नहीं बक्शा गया ! जहां सुरक्षाकर्मियों की जान पर बन आई ! जहां धक्का-मुक्की, हाथा-पाई, गाली-गलौच, बेइज्जती की सारी सीमाएं लांघ दी गईं ! वहीं माहौल को संभालने में जिस धैर्य, जिस संयम, जिस परिपक्वता का उदाहरण दिल्ली की पुलिस ने दिया वह दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिले ! 

प्रतीक 
पु लिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार सड़क पर यूंही डंडा पटक दे तो हुड़दंगी भागते नजर आएं ! एक बार डपट दे तो किसी की चूँ तक करने की हिम्मत ना हो ! वही जवान, समाज और देश हित खातिर अपनी बेकद्री, अपनी बेइज्जती, अपनी जिल्लत को सहते हुए मौन खड़े रहे ! इतना धीरज, इतनी सहनशीलता, इतना सब्र.........! आपकी आज्ञाकारिता तो सेना के समकक्ष हो गई ! नमन है आपको !
गौरव 
स रकार से विनम्र निवेदन है कि इन दिनों जंतर-मंतर पर जितने भी महिला-पुरुष पुलिस कर्मियों ने, अपनी जान की परवाह ना कर अपना कर्तव्य निभाया उन्हें सार्वजनिक तौर पर सम्मानित और पुरस्कृत किया जाए! जिससे उनके काम की जटिलता का आभास हो सभी को ! हर अखबार, हर टीवी चैनल, हर सोशल मिडिया पर उनकी चर्चा हो, ताकि लोगों में, समाज में, पुलिस के प्रति गर्व और आदर का भाव पैदा हो ! उनका सम्मान हो ! लोग उनसे मिलें, डर कर नहीं बल्कि प्रेम से !  

जय हिंद ! वंदे मातरम !! 

@चित्र अंतर्जाल से साभार 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡

लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी की अनुपलब्धि सबसे बड़ी और विकट समस्या रही है ! अप्रैल और मई के महीनों में जब खेतों में बुआई का समय होता है, तब एक-एक बूंद पानी के लिए किसानों को तरसना पड़ता रहा है ! क्योंकि हिमनद पहाड़ के ऊपर, लगभग 18,000 फुट की ऊंचाई पर रहते हैं और जाड़े का मौसम खत्म होने पर जून में जा कर उनका पिघलना आरंभ होता है, तब तक खेती का सही समय निकल जाता था ! फलस्वरूप अधिकांश भूमि बंजर होती जा रही थी !

बंजरता 

बर्फ का रेगिस्तान 
एक इंसान बचपन से ही यह विषमता देखता चला आ रहा था ! वह अपने लोगों, अपने परिवार, अपने समाज की इस अभिशप्तता को दूर करने के लिए बेचैन था ! वह बड़ा हुआ, इजीनियर बना ! तभी 1987 की सर्दियों आईं ! एक दिन वह नदी किनारे अपने घर के बाहर खड़ा था, उसने देखा कि नल से पानी की बूंद टपक कर जमीन पर गिरी और बर्फ बन गई ! उधर नदी का पानी बेकार बह कर बर्बाद हुआ जा रहा था ! उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि इस पानी को किसी तरह जमा दिया जाए तो लद्दाख में पानी की किल्लत दूर हो सकती है ! 

चेवांग नॉरफेल 
व्याकुलता 
निर्माण 
उसने अपनी योजना का खाका तैयार किया और गांव वालों को साथ ले, उसे मूर्त रूप देने में जुट गया ! सबने मिल कर वहीं के मिटटी-पत्थरों का उपयोग कर, छोटी-छोटी नहरें बना, नदी के पानी का रास्ता बदल उसे पास की छायादार घाटी में बांध बना संग्रहित कर दिया ! कड़ाके की सर्दी में वह पानी जम कर, बर्फ के विशाल ढेर में बदल वहां स्थित हो गया ! इस तरह इंसान ने प्रकृति से होड़ ले, पहाड़ की छोटी से काफी नीचे अपना एक कृत्रिमिक ग्लेशियर बनाने में सफलता पा ली ! तापमान में फर्क होने की वजह से इस हिमनद का पिघलना मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाने लगा और यह वही समय होता था जब यहां के किसानों और निवासियों को पानी की सबसे ज्यादा जरुरत होती थी ! 

निरर्थकता 
उपक्रम 
संग्रह 
एक इंसान के बुद्धि-कौशल, लगन और जिद ने लद्दाख के एक हिस्से की सूखी, बंजर जमीन को हरा-भरा कर शस्य=श्यामला बना दिया ! कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले किसानों, रहवासियों के लिए वह इंसान भगवान स्वरूप हो गया ! लोग उन्हें "आइस मैन ऑफ इंडिया" कहने लगे ! उन्होंने करीब 15 छोटे-बड़े हिमनद बनाए, जिनमें सबसे बड़ा हिमनद लगभग 2 कीमी का था ! लद्दाख की भूमि की रंगत बदलने और समाज के उत्थान के लिए किए गए उनके इस अनूठे प्रयास का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार ने भी 2015 में उन्हें पद्म-पुरस्कार से नवाज कर सम्मानित किया ! 

पद्म सम्मान 

मानव निर्मित ग्लेशियर 
स्वप्न साकार 
पर सुदूर बसे लद्दाख में हुए ऐसे क्रांतिकारी आविष्कार, जिसने लाखों लोगों की जिंदगियों को प्रभावित किया, समाज की दशा बदल दी, समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया, वह प्रयास, उन्नत संचार व्यवस्था और आज जैसा सोशल मीडिया ना होने के कारण बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं हो पाया ! फिर समय बदला, हर हाथ में फोन आ गया ! खबरें विद्युत गति से चलने लगीं ! दुनिया सिकुड़ गई ! लद्दाख भी अब वैसा अनजान नहीं रहा और इसी बात का फायदा, एक चालाक, धूर्त, कुटिल व्यक्ति ने उठाया और उन हिमनदों को अपनी उपलब्धि बता, संसार में अपने को वैज्ञानिक सिद्ध कर दिया ! लोग उसके दीवाने हो गए ! देश-विदेश में उसकी उपलब्धियों की बातें होने लगीं, बुलावा व सम्मान मिलने लगा ! धन का नियमित प्रवाह भी शुरू हो गया और वह एक जानी-मानी हस्ती बन जगह-जगह अपनी टांग अड़ाने की कोशिश करने लगा ! देश विरोधी गतिविधियों की वजह से उसे सजा भी मिली ! पर...................!

समर्पण 

मक्कारी 
अब उन दोनों व्यक्तियों की पहचान ! पहला वह जिसे आज भी  लद्दाखवासी कृतज्ञता से याद करते हैं ! जो लद्दाख और लद्दाखवासियों का गर्व है ! उसका नाम है ''चेवांग नॉरफेल'' ! और दूसरा है, अपने ही देशवासी की उपलब्धि को चुरा कर छद्म लोकप्रियता हासिल करने वाला, एक नौटंकीबाज, कुटिल, मौकापरस्त सोनम वांगचुक ! जो आज विदेशी ताकतों का मोहरा बन, देश के देशद्रोही, सनातन विरोधी, मक्कार, धूर्त नेताओं का हमजोली बना हुआ है ! गूगल से प्रमाणित होने के बाद ही किसी बात को मानने वाले, वहां जा कर इस बात की सच्चाई जान सकते हैं !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार !

@''शख्स किसी और के कांधे.....'' वाली पंक्ति प्रख्यात शायर श्री मदन लाल सेठी ऊर्फ मायकश अम्बालवी जी की है। 

विशिष्ट पोस्ट

खौफ बिस्कुटों का 😧

सच मानिए उन बिस्कुटों का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! प...