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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

प्रणाम करें और सिखाएं भी

छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लें, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! क्योंकि बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का जरा सा भी अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। सिर्फ प्रयास करना है, अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण का .............!!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्रणाम का अर्थ होता है विनीत होना ! किसी के सामने सर झुकाना ! अपने से बड़ों को, अपने गुरुजनों को सम्मान देना ! प्राचीन काल से ही यह हमारी परंपरा रही है ! जब हम किसी के सामने झुक कर उसका चरण स्पर्श करते हैं तो हमारे में विनम्रता का भाव आ जाता है और सामने वाले की सकारात्मक ऊर्जा, आशर्वाद के रूप में हमारी नकारात्मक ऊर्जा का स्थान ले लेती है ! पर इसके लिए हमारे मन में सामने वाले के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव होना भी जरुरी है !

प्रणाम 

प्रणाम कोई दैनिक मशीनी क्रिया नहीं है ! प्रणाम अनुशासन है, जो हमें विनम्र बनाता है, आदर करना सिखाता है, हमारे अंदर का अहम मिटाता है, सुविचारों को स्थान देता है। घर में सुख-शांति स्थापित करता है, आपसी प्रेम बढ़ाता है ! आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही नहीं आएगी !

आशीर्वाद 
यदि कोई व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, तो उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती चली जाती है। पर चरण स्पर्श भी नियमानुसार करना चाहिए ! इसके लिए हमेशा शांत भाव से बिना किसी जल्दीबाजी के दोनों हाथों से अपने श्रद्देय के दोनों पैरों का स्पर्श करना चाहिए ! घुटने तक या एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है। इसके साथ ही जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, उनका भी फर्ज है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे तो लाभ प्राप्त होता ही है, आशीर्वाद देने वाले का भी पुण्य बढ़ जाता है। 

परंपरा 
प्रणाम की महत्ता का तो रामायण हो या महाभारत सभी ग्रंथों में विवरण उपलब्ध है ! रामायण में तो खुद प्रभू ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए, पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।  महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा, उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा, पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं, तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता ! इसी प्रणाम की क्रिया के प्रभाव से ऋषि मार्कण्डेय जी का अल्पायु योग खत्म हो गया था। ऐसे असंख्य उदाहरण सर्व-सुलभ हैं !

नियम 
इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

भारत रत्न !...ताकि अहमियत बनी रहे

जिस तरह किसी भी रत्न को दाग, जाल, रेखा या किसी भी अशुद्धि से परे जा कर ही अनमोल माना जाता है, नहीं तो उसका मोल कम हो जाता है, ठीक उसी तरह चयनित होने जा रहे भारत रत्न का भी हर तरह की कसौटी पर खरा उतरना लाजिमी होना चाहिए ! पर आज के माहौल में, राजनीतिक तुष्टिकरण में, जाति -बिरादरी में साख की खातिर, हैसियत जताने के लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए या अपनी महत्वकाक्षों के चलते, कोई भी अपनी पसंद के किसी के नाम को भी इस सम्मान हेतु प्रस्तावित करता नजर आने लगा है............!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में की गई थी। इसके लिए चयनित व्यक्ति विशेष का चयन ज्यादातर सर्वमान्य रहा, पर कुछेक बार अनुत्तरित प्रश्न भी खड़े हुए, इसकी चयनित शख्सियत को ले कर ! इधर भी एक चलन कुछ ज्यादा ही देखने में आने लगा है, कोई भी अपनी जाति-बिरादरी, धर्म-पंथ के नेता के लिए इसकी मांग उठाने लग पड़ा है ! यदि इसकी रेवड़ी बंटने लगी तो फिर भविष्य में इसकी महत्ता का सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है !  

रत्न, प्रकृति प्रदत्त एक मूल्यवान निधि है। यह आकर्षक, चिरस्थायीव, दुर्लभ तथा अपने गुणों की खातिर अनमोल बन जाता है। जब कुछ तत्व जटिल परिस्थियों में, विपरीत वातावरण में, विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा आपस में मिलते हैं तब जा कर इसका निर्माण होता है। इसीलिए इसमें कई अद्भुत गुणों का समावेश भी हो जाता है। इन पर ऋतुओं के परिवर्तन, मौसम का प्रभाव या प्रकृति की भीषण उथल-पुथल का कभी असर नहीं पड़ता। 

इन्हीं  सब गुणों को देखते हुए सर्वोच्च नागरिक सम्मान के नामकरण के लिए इसके स्वप्नकारों के दिमाग में ''रत्न'' नाम आया होगा। यानी एक ऐसा इंसान जो देश से जुड़ा हुआ हो ! जो मन-कर्म-वचन से देश और देशवासियों के उत्थान के लिए समर्पित हो ! समय के थपेड़े, विपरीत परिस्थियां, जटिल समस्याएं भी उसे विचलित या पथ-भ्रष्ट ना कर पाती हों ! संयम, विनम्रता, समर्पण, लगन, जिजीविषा, परोपकारिता, निरपेक्षिता जैसे गुण उसमें चिरस्थाई हों। जैसे  रत्न आभूषणों के रूप में शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, साथ ही अपनी दैवीय शक्ति के प्रभाव के कारण रोगों का निवारण भी करते हैं; उसी तरह इस सम्मान को पाने वाले के गुण भी देश की शोभा में इजाफा करने वाले और उसकी कर्मठता, अवाम के हालात को सुधारने और उसकी मुश्किलों का हल निकालने में सक्षम होनी चाहिए । एक ऐसा इंसान जिसकी मिसाल दी सके ! जो सर्वोपरि हो, अपने समय में ! 

इसके समकक्ष एक और अलंकरण बना दिया जाए और उसका नाम भारत भूषण रख दिया जाए ! अब भूषण यानी गहने वगैरह को टिकाऊ बनाने के लिए उसमें कुछ खोट मिलाने की छूट और मान्यता तो है ही 

जिस तरह किसी भी रत्न को दाग, जाल, रेखा या किसी भी अशुद्धि से परे जा कर ही अनमोल माना जाता है, नहीं तो उसका मोल कम हो जाता है, ठीक उसी तरह चयनित होने जा रहे भारत रत्न का भी हर तरह की कसौटी पर खरा उतरना लाजिमी होना चाहिए ! पर आज के माहौल में, राजनीतिक तुष्टिकरण में, जाति-बिरादरी में साख की खातिर, हैसियत जताने के लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए या अपनी महत्वकाक्षों के चलते, कोई भी अपनी पसंद के किसी के नाम को भी इस सम्मान हेतु प्रस्तावित करता नजर आने लगा है। 

अब ना तो पहले जैसे लोग रहे ना हीं ऊसूल ! ऐसे में याद आती है, भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री श्री अबुल कलाम आज़ाद की ! जब उनको भारत रत्न देने की बात आई तो उन्होंने खुद जोर देकर मना कर दिया, क्योंकि वे खुद इसकी चयन समिति के सदस्य थे ! हालांकि बाद में मरणोंपरांत 1992 में उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया ! आज तो खुद ही अपना नाम प्रस्तावित करवाया जाने लगा है ! आज जरुरत है पद्म पुरुस्कारों जैसी अवनति से इसे बचाए रखने की। 

वैसे इसकी मर्यादा को बचाए रखने के लिए एक विकल्प निकाला जा सकता है ! इसके समकक्ष एक और अलंकरण बना दिया जाए और उसका नाम भारत भूषण रख दिया जाए ! अब भूषण यानी गहने वगैरह को टिकाऊ बनाने के लिए उसमें कुछ खोट मिलाने की छूट और मान्यता तो है ही ! इससे देने-लेने में आने वाली हर तरह की मुश्किल और किसी धर्म संकट से बचने से छुटकारा पाया जा सकेगा ! तू भी खुश, मैं भी खुश ! 

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प्रणाम करें और सिखाएं भी

छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लें, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, क...