गुरुवार, 21 नवंबर 2019

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने...! कौन थी ये भानुमती ?

भानुमती ! कहीं की ईंट कहीं के रोडे को इकठ्ठा कर अपना कुनबा बना लेने वाली भानुमती ! किसी जादुयी पिटारे की स्वामिनी भानुमति ! दुर्योधन, कर्ण तथा अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बनाने वाली भानुमति ! कौन थी ये महिला, जिसके नाम के मुहावरे उससे ज्यादा प्रसिद्ध हैं ? उसके बारे में विस्तार से जानने के लिए महाभारत काल में ताक-झांक करनी पड़ेगी, जहां उसके बारे में अच्छी-खासी जानकारी उपलब्ध है.......! 

#हिन्दी_ब्लागिंग   
प्राचीन काल में भारत के महाजनपदों में से एक था कंबोज। जिसका क्षेत्र आधुनिक पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मिलता था। उस समय कंबोज पर राजा चन्द्रवर्मा का राज था। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम था भानुमती। उसके रूप और गुणों के सामने स्वर्ग की अप्सराएं भी कहीं नहीं ठहरती थीं। उसके विवाह योग्य होने पर राजा चंद्र्वर्मा ने भानुमती के विवाह के लिए स्वयंबर का आयोजन किया। भानुमती ना सिर्फ बहुत रूपवान थी, अत्यंत बुद्धिमती होने के साथ-साथ वह शारीरिक रूप से भी अति बलिष्ठ थी। इन्हीं गुणों की ख्याति सुन उसके स्वयंबर में दुर्योधन, कर्ण, जरासंध, शिशुपाल जैसे पराक्रमी, वीर और ख्यातिप्रद राजा उससे विवाह की अभिलाषा लेकर आये थे।

जब स्वयंबर स्थल पर भानुमती पूरे श्रृंगार के साथ आई तो वहां उपस्थित सभी राजाओं के मुंह खुले के खुले रह गए। ऐसा अप्रितम सौन्दर्य ना किसी ने देखा था ना किसी ने सोचा था। जब दुर्योधन की नज़र भानुमती पर पड़ी तो उसका मन मचल उठा और उसने ठान लिया कि भानुमती से वही विवाह करेगा। परंतु भानुमती को दुर्योधन पसंद नहीं था। इसीलिए वह वरमाला ले उससे आगे बढ़ गयी। यह देख दुर्योधन अत्यंत क्रोधित हो गया और भानुमती को पकड कर जबरन उससे माला अपने गले में डलवा ली। वहां उपस्थित बाकी राजाओं में आक्रोश फ़ैल गया तथा उन्होंने इस बात का विरोध किया तो दुर्योधन ने सभी योद्धाओं को कर्ण से युद्ध करने की चुनौती दे डाली ! कुछ ने युद्ध की चुनौती स्वीकार की भी तो उन्हें कर्ण ने पलक झपकते ही हरा दिया। उसके इस शौर्य से भानुमती भी बहुत प्रभावित हुई। इसी कारण विवाहोपरांत हस्तिनापुर आने पर उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना बहुत भाता था। 

भानुमती को हस्तिनापुर ले आने के बाद दुर्योधन ने भानुमती के अपहरण को यह कह कर, अप ने आप को सही ठहराया, कि भीष्म पितामह भी अपने सौतेले भाइयों के लिए अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण करके ले आए थे। इस तर्क से भानुमती भी मान गई और दोनों ने विवाह कर लिया। इनके लक्ष्मण तथा लक्ष्मणा नामक एक पुत्र तथा एक पुत्री हुई। कालांतर से लक्ष्मणा ने कृष्ण पुत्र साम्ब से भाग कर विवाह कर लिया और लक्ष्मण युद्ध में अभिमन्यु द्वारा मारा गया। फिर भी  भानुमती ने युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु के बाद अर्जुन से विवाह कर लिया था। 

भानुमती ! जिसने दुर्योधन को पति नहीं चुनना चाहा था ! स्वयंबर के समय वह किसी और को वरमाला पहनाना चाहती थी ! पर उसे मजबूरन दुर्योधन से ब्याह रचाना पड़ा ! भले ही बाद में वह राजी हो गयी हो ! स्वयंबर के वक्त हुए युद्ध में वह कर्ण से भी प्रभावित थी ! हस्तिनापुर आने के बाद उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना पसंद था ! फिर महाभारत युद्ध के पश्चात दुर्योधन की मृत्यु के उपरांत उसने अर्जुन से विवाह कर लिया ! समय, परिस्थियों और मौकापरस्ती के चलते, समयानुसार अपना मतलब सिद्ध करते रहने और दुर्योधन, कर्ण, अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बना बार-बार अपने अलग-अलग कुनबे गढने की वजह से ही शायद यह कहावत चलन में आई - 
''कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा'' !

शनिवार, 16 नवंबर 2019

देहरादून का प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर, जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है

मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो लगता है कि शायद आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो चारों ओर फैलती गंदगी पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ...............?

#हिन्दी_ब्लागिंग 
देहरादून दूसरा दिन ! जैसा की तय किया गया था, सुबह साढ़े नौ बजते-बजते शहर भ्रमण का दौर शुरू हो गया। सबसे पहले मसूरी रोड पर, घंटाघर से करीब बारह कि.मी. दूर. कुठाल गेट के पास सड़क के किनारे स्थित #प्रकाशेश्वर_महादेव_मंदिर पर रुकना हुआ। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। हर रोज मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। स्फटिक का शिवलिंग यहां का मुख्य आकर्षण है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है। लाल और नारंगी  रंगों से सजे इस मंदिर की छत पर शिव जी के त्रिशूल सजे हुए हैं। मंदिर की दीवारों को लाल और नारंगी रंग में चित्रित किया गया है। आने वाले श्रद्धालुओं को दिन भर खीर का प्रसाद मिलता है। किसी शिव भक्त के द्वारा निर्मित इस मंदिर का इतिहास फिलहाल अज्ञात है। हालांकि मुख्य द्वार पर बंगला भाषा में सूचना पट पर एक "फरमान" जरूर लिखा हुआ है जिसमें किसी भी तरह के चढावे की मनाही का निर्देश दिया गया है। 

मंदिर के अंदर किसी पूजा सामग्री या मिठाई वगैरह की दूकान नहीं है। अलबत्ता मोती-रत्नों-रुद्राक्ष-माला वगैरह की बिक्री के लिए खासी बड़ी जगह घेर कर बिक्री की जाती है। उसी तरह मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ ही खाने-पीने की दूकान खोल दी गयी है। वहीं एक बात और महसूस हुई कि मंदिर से जुड़े अधिकांश लोग तनावग्रस्त से लगे बाहर की दूकान पर उपस्थित सज्जन तो जैसे ग्राहकों पर एहसान सा कर रहे थे। सच कहूं तो किसी धर्मस्थल के अंदर जाते समय जो एक श्रद्धा की भावना उपजती उसका यहां तनिक अभाव सा लगा ! 

इस प्रसिद्ध मंदिर को देखने की लालसा लिए जैसे ही मंदिर के मुख्य द्वार के सामने उतरे वैसे ही मन खिन्नता से भर उठा। मुख्य द्वार के सामने ही दो बड़े-बड़े ऊपर तक कूड़े से भरे कूड़ा पात्र रखे हुए थे ! जिनके पूरे भरे होने की वजह से कूड़ा निकल-निकल कर मंदिर के अंदर-बाहर गंदगी फैला रहा था। मंदिर के अंदर भी एक कूड़ादान रखा हुआ था ! ऊपर से रही-सही कसर वहां घूमते बंदर पूरी कर रहे थे। दरवाजे पर ही एक नल भी लगा हुआ था जिसकी वजह से जूते उतारने की जगह भी गीली थी। कूड़ा और पानी दोनों मिल कर गंदगी का कहर ढा रहे थे। जबकि मंदिर के सामने जहां गाड़ियां खड़ी होती हैं वहां अफरात जगह है। वैसे भी मंदिर की काफी बड़ी जगह है, कूड़ेदान कहीं और भी बिना परेशानी रखे जा सकते हैं। 


उस समय तो संकोचवश किसी से कुछ नहीं कहा पर लौटते समय रहा ना गया ! श्रीमती जी की भी इच्छा थी एक बार और दर्शन करने की ! सो इस बार पुजारी जी से अति नम्रता से अपने मन की बात कही ! पहले तो वे मेरा मुंह ही देखते रह गए ! फिर उन्होंने सारा इल्जाम बंदरों पर थोप दिया ! जिस पर मैंने कहा कि चूँकि कूड़ादान ठीक दरवाजे पर मंदिर के सामने है तो बंदर तो आऐंगे ही और वे यहीं गंदगी फैलाएंगे, इसमें जानवरो का क्या कसूर है ? कूड़ादान को ही कहीं और रखा जाए तो ही बात बनेगी। मेरी बात कुछ समझ में आने पर उन्होंने मुझे प्रबंधक से बात करने को कहा। ये महोदय भी कुछ असमंजस में घिर गए ! बोले इस ओर ध्यान ही नहीं गया ! फिर आपकी बात पर जरूर कार्यवाही करेंगे, ये आश्वासन जरूर दिया। 


ये सब देख यही लगता है कि मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो इतनी बड़ी बात पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ? 

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

दिल्ली-देहरादून-लाखामंडल

दिनों-दिन बढ़ती आबादी का बोझ महानगरों से निकल अब छोटे शहरों को भी अपने चंगुल में लेने लगा है। पहाड़ की गोद में  बसा सुंदर प्यारा सा शहर देहरादून भी इसकी चपेट में आ चुका है। आबादी के साथ ही बढ़ते निर्माण, धुंआ उगलते बेलगाम वाहन, बेतरतीब यातायात,  घटती हरियाली, उड़ती धूल यहां भी लोगों को मास्क लगाने को मजबूर कर रहे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
लाखामंडल :- यहां जाने की इच्छा एक लंबे अरसे के बाद इस बार नवम्बर में जा कर पूरी हुई। जब किसी तरह आठ से बारह नवम्बर का समय दायित्वों-परिस्थितियों से समझौता कर निकाला गया। पूरा खाका और ताना-बाना फिट कर आठ की सुबह देहरादून शताब्दी की सीट पर जा जमे। साथ में श्रीमती जी और बड़े बेटे चेतन का साथ भी था। देहरादून के होटल में चार दिनों की बुकिंग की जा चुकी थी। पर पहले दिन ही जब मित्र दीक्षित जी को हमारे वहां होने का पता चला तो उन दोनों द्वारा आग्रह युक्त इतना स्नेहिल दवाब पड़ा कि लाख झिझक और संकोच के बावजूद अगले दिन शहर से दूर साफ़-सुथरे वातावरण में उनके बड़े से, 5BHK एपार्टमेंट की चाबी लेने को बाध्य हो गए। पर शर्त यह रही कि हमारा सिर्फ और सिर्फ रहना ही होगा। उनका अपना दूसरा फ़्लैट भी उसी परिसर में बगल में ही था। 

घर की छत से नजर आता विहंगम दृश्य 
पहला दिन :- होटल स्टेशन के पास ही था। आठ की दोपहर बाद का समय भीड़-भाड़ वाले पलटन बाजार की गश्त, घडी मीनार की छाया में हलकी-फुलकी उदर पूजा करते और अगले दिनों का कार्यक्रम तय करने तथा टैक्सी वगैरह के इंतजाम में ही निकल गया। आज की रेल यात्रा की थकान को देखते हुए यह तय रहा कि दूसरे दिन यानि नौ को देहरादून का कम थकाने वाला भ्रमण कर दस को लाखामंडल की ओर निकला जाए, क्योंकि वहां की करीब सवा सौ कि.मी. की दूरी तक आने-जाने में आठ घंटे तथा वहां तक़रीबन दो घंटे यानी कुल दस-ग्यारह घंटों के लिए तारो-ताजा होना बेहद जरुरी था। इसी यात्राक्रम को ध्यान में रख वाहन उपलब्ध करवाने वालों से जानकारी हासिल की और दो दिनों के लिए अपनी आवश्यकताएं बता घूमने की जिम्मेदारी एक को सौंप दी। 
पलटन बाजार 
वही भीड़-भाड़ वही अफरा-तफरी 

पलटन बाजार, 1820 में अंग्रेजों को देहरादून में जब अपनी छावनी स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई तो उन्होंने  ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी को यहां ला तैनात किया। अब जब लोग आ बसे तो उनकी रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति के लिए दुकानों की भी आवश्यकता पड़ी। इस तरह एक बाजार अस्तित्व में आया, जहां सेना, जिसे पलटन कहते थे, के जवान ही अधिकतर खरीदारी किया करते थे, इसलिए उस बाजार का नाम पलटन बाजार पड़ा जो आज भी उसी नाम से प्रसिद्ध है। यह यहां का सर्वाधिक पुराना और व्यस्त बाजार है। स्थाई निवासियों तथा पर्यटकों सबकी खरीदारी करने के लिए पहली पसंद तो है ही इसके साथ ही युवाओं के लिए यह मौज और समय बिताने की जगह की रूप में भी जाना जाता है। आज इस बाजार में फल, सब्जियां, सभी प्रकार के कपड़े, तैयार वस्त्र, जूते और घर में प्रतिदिन काम आने वाली प्रत्येक वस्तु सहज उपलब्ध हैं।
घंटाघर :- यह देहरादून की सबसे व्यस्त राजपुर रोड के मुहाने पर स्थित है और यहाँ की प्रमुख व्यवसायिक गतिविधियों का केन्द्र है। ईंटों और पत्थरों से निर्मित इस षट्कोणीय ईमारत का निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था। जिसके शीर्ष के हर मुख पर छः घड़ियां लगी हुई हैं। इसके हर पहलू में एक दरवाजा बना हुआ है जिसके अंदर की सीढ़ियां ऊपर तक जाती हैं जहां अर्द्ध वृताकार खिड़कियां बनी हुई हैं। देहरादून का यह घंटाघर नगर की सबसे सौन्दर्यपूर्ण संरचना तो है ही इसका षट्कोणनुमा ढाँचा एशिया में भी अपने प्रकार का विरला ही है।
इधर से निश्चिन्त हो होटल लौटे ही थे कि क्षमा जी का फोन आ गया और जैसा पहले बता चुका हूँ उनका आग्रह टाला नहीं जा सका। दूसरे दिन सुबह कुछ तामझाम के बाद होटल की बुकिंग निरस्त कर, गाडी वहीं बुला, सामान को उनके घर छोड़ते हुए देहरादून से परिचित होने निकल पड़े।

@दूसरा दिन - देहरादून के दर्शनीय स्थल 

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