शनिवार, 26 दिसंबर 2020

बॉक्सिंग डे, जिसका बॉक्सिंग के खेल से कोई लेना-देना नहीं है

बॉक्सिंग डे को मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो  इसे अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है.......................!

भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
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बॉक्सिंग डे, यानी अवकाश दिवस ! इसका बॉक्सिंग के खेल से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है। इसे एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव कहा जा सकता है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है। पर इस दिन कई देशों में तरह-तरह के खेलों की शुरुआत होने और मिलते-जुलते नाम की वजह से ऐसा लगता है कि शायद बॉक्सिंग के खेल से इसका नाता हो। जबकी ऐसा नहीं है ! ब्रिटेन और उसके शासित देशों में इसकी परंपरा रही है। जो अब अन्य जगहों पर भी फ़ैल गयी है।  पहले इस दिन क्रिसमस के दूसरे दिन  जरूरतमंदों, बेसहारा सर्वहारा लोगों के लिए आवश्यक वस्तुओं को डिब्बे में बंद कर चर्चों के सामने रख देने की परंपरा थी। जिससे किसी को किसी के सामने शर्मिंदगी का एहसास ना हो। पर समय के साथ-साथ अब उस परंपरा के साथ-साथ इसने खरीदारी के उत्सव का रूप ले लिया है। इस दिन लोग जम कर सामान खरीदते हैं इसलिए दुकानदार भी लुभावने प्रस्ताव पेश करने में पीछे नहीं रहते। एक तरह से यह दिन  शॉपिंग डे में तब्दील हो गया है।  

तक़रीबन रोमन काल से चली आ रही इस परिपाटी के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है, पर इस दिन हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है। इस दिन चर्चों के बाहर जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं को डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरतमंद-बेसहारा लोगों के लिए रख दिए जाता था। इन्हीं के साथ वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं बॉक्सों या डिब्बों के लेन-देन के कारण इस दिन को बॉक्सिंग डे के नाम से जाना जाने लगा है। 

इसको मनाने का कोई बहुत ही अनिवार्य या कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
इस दिन कई खेलों के शुरू होने का चलन रहा है। उसी में क्रिकेट भी शामिल है। इस बार भी हम आस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं और बॉक्सिंग डे पर ही, एक मैच से पीछे चल रही हमारी टीम को दूसरा टेस्ट मैच खेलना है। हमारा इस दिन खेले गए मैचों का रेकॉर्ड बहुत ही "गरीब" रहा है !  हमने अब तक इस दिन आस्ट्रेलिया के साथ आठ, द. अफ्रीका के खिलाफ पांच और न्यूजीलैंड के साथ एक मैच खेला है। जिसमें दो में ही जीत मिल पाई हैं ! नौ में हार तथा तीन बेनतीजा रहे हैं। इस बार अपने देश के क्रिकेट प्रेमी यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। 
आमीन !!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अपनी भाषा को पहले हमें ही सम्मान देना है

विश्व में केवल संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें सिर्फ  "एक अक्षर, दो अक्षर या केवल तीन ही अक्षरों" से पूरा वाक्य बनाया जा सकता है। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है.............!!

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भाषा अभिव्यक्ति का वह सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम या जरिया है, जिसके द्वारा हम आपस में अपने मनोभावों को, विचारों को व्यक्त करते हैं, एक-दूसरे से जुड़ पाते हैं। यह हमारे समाज के निर्माण, विकास, अस्मिता, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण साधन है। इसके लिये हमारी वाचिक ध्वनियां सहायक होती हैं, जो शब्दों और वाक्यों का समूह बन एक-दूसरे को अपने मन की बात बताती-समझाती हैं। इसके बिना मनुष्य व समाज सर्वथा अपूर्ण हैं !  

हमारे शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई 

जाहिर है समय, परिवेश, स्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न तरह की भाषाओं का उद्भव हुआ। मानव के उत्थान के साथ-साथ उसका आरंभिक ''नाद'' विकास करते हुए संपन्न भाषाओं में बदलता चला गया। इस समय सारे संसार में हजारों (अनुमानत: 6809) प्रकार की भाषाएँ, वर्षों से अपनी-अपनी जरुरत के अनुसार बोली जाती रही हैं। इनमें से कई तो हजारों-हजार साल से अपना अस्तित्व बनाए रखे हुए हैं। बहुतेरे देशों ने सिर्फ अपनी भाषा का उपयोग करते हुए भी ज्ञान-विज्ञान, पठन-पाठन में असाधारण प्रगति की है। उन्हें अपनी वाक्संपदा पर नाज है। थोड़ी-बहुत कमी-त्रुटि तो हर चीज में होती ही है, पर इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी बोलियां हेय हैं, दोयम हैं ! 

हमारे देश पर सैंकड़ों सालों तक गैरों ने राज किया ! सालों-साल गुलाम रहने का असर हमारे दिलो-दिमाग पर भी पड़ना ही था ! हम अपना सुनहरा अतीत बिसारते चले गए ! हमें शासक और उनके कारिंदों की बातों में ही सच्चाई नजर आने लगी ! इस कुचक्र में कुछ हमारे अपने मतलबपरस्त लोगों का भी योगदान रहा है ! हमार शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी उस प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, जिसमें हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन के सार को लिपिबद्ध कर दिया था, उसे भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई !

हम शुरू से ही सहिष्णु रहे हैं। हमने दुनिया को ही अपना परिवार माना है ! हर अच्छी चीज का स्वागत किया है। दूसरे धर्मों, संस्कृतियों, मान्यताओं को भी अपने में सहर्ष समो लिया है। हमारे इसी विवेक, सहनशीलता, सामंजस्य को कमजोरी मान लिया गया ! अच्छाइयों के साथ बुराइयां भी थोपी जाने लगीं। सबसे ज्यादा नुक्सान अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुआ, जब उन्होंने अंग्रेजी को कुछ ऐसा आभामंडित कर दिया जैसे वह विश्व की सर्वोपरि भाषा हो ! उसके बिना कोई भी उपलब्धि हासिल ना की जा सकती हो ! देश में उसे रोजगार हासिल करने का मुख्य जरिया बना दिया गया। वर्षों-वर्ष यह गलतफहमी पलती रही ! पर फिर समय आ ही गया जब उन्हें बताना जरुरी हो गया कि समृद्ध भाषा कैसी होती है !

उदाहरण स्वरूप अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर होते हैं। जिन्हें दर्शाने के लिए एक बहुत प्रसिद्ध वाक्य गढ़ उसमें वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित किए गए हैं "THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG" पर वाक्य को पूरा करने के लिए O को चार बार और  A, E, U तथा R को दो-दो बार सम्मिलित करना पड़ा है। इस तरह इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है। भले ही ''टाइप'' करने की सुविधा के लिए ऐसा किया गया हो !

अब संस्कृत का उदहारण लें, 

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:। तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।। 

जिसका अर्थ है कि, पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करने वाला कौन ? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

इस श्लोक में संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन तो हैं ही वे भी पूरे क्रमानुसार। यह खूबसूरती संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को छोड़ अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती ! 

संस्कृत में श्लोक सुनिए, मंत्र सुनिए, भजन सुनिए ! इसके उच्चारणों में वह शक्ति है जो किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है ! एकाकार कर सकती है ! सम्मोहित कर किसी और लोक में पहुंचा सकती है। यही अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें केवल "एक अक्षर" से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। महाकवि भारवि ने अपने काव्य संग्रह किरातार्जुनीयम् में केवल “न” व्यंजन का प्रयोग कर अद्भुत श्लोक की रचना की है जो थोड़े में ही बहुत कह जाती है -

 न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु। नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

यानी, जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। 

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः। दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः॥ 

अर्थात, दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

इसक अलावा सिर्फ दो और तीन अक्षरों से पूरा वाक्य बनाना सिर्फ संस्कृत भाषा में ही संभव है -

कवि माघ ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक की रचना कर डाली -

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे। भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।

अर्थात, निर्भय हाथी जो कि भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां। दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।

अर्थात - वह परमात्मा जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव को मारा था। 

ऐसे सैंकड़ों उदहारण मिल जाएंगें जो निर्विवाद रूप से संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ, व्याकरणिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक, त्रुटिहीन भाषा सिद्ध कर सकते हों। इसीलिए जब संस्कृत को सर्वोपरि कहा जाता है तो उसके पीछे इस तरह के अद्भुत साक्ष्य होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है !

@संदर्भ - अंतरजाल 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

एक मंदिर, जिसके सामने से गुजरते वक्त ट्रेनों की गति धीमी हो जाती है :-

यह शायद देश का एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी की प्रतिमा के बाएं बाजू पर श्री सिद्धि विनायक गणेशजी भी विराजित हैं। एक ही प्रतिमा में दोनों देवताओं के होने से ये अनूठी प्रतिमा अत्यंत शुभ, पवित्र, कल्याणकारी और फलदायी मानी जाती है............!

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मानव के होश संभालने के साथ-साथ ही ईश्वर की कल्पना भी अस्तित्व में आ गई थी। हालांकि उसके निराकार होने की मान्यता भी है। फिर भी उसकी शक्ति का एहसास किया जाता रहा है ! ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जो उसके अस्तित्व को महसूस कराते रहते हैं। हमारा देश तो भरा पड़ा है ऐसे अलौकिक, आश्चर्यजनक, हैरतंगेज चमत्कारों से ! 
ऐसी ही एक जगह है मध्य प्रदेश के भोपाल-रतलाम रेल मार्ग पर शाजापुर जिले का बोलाई गांव। कभी इस जगह बारह टोले हुआ करते थे। फिर समय के साथ सबने साथ रहना शुरू किया तो यह गांव बना बोलाई। यहीं स्थित है, तक़रीबन 600 साल पुराना एक हनुमान जी का मंदिर। जिसे सिद्धवीर खेड़ापति हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह शायद देश का एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी की प्रतिमा के बाएं बाजू पर श्री सिद्धि विनायक गणेशजी भी विराजित हैं। एक ही प्रतिमा में दोनों देवताओं के होने से ये अनूठी प्रतिमा अत्यंत शुभ, पवित्र, कल्याणकारी और फलदायी मानी जाती है। 
वैसे तो इस मंदिर से कई चमत्कारों का संबंध है। पर इसका सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि इस मंदिर के सामने से जब भी कोई भी ट्रेन गुजरने को होती है, तो उसके पहले ही उसकी गति अपने आप कम हो जाती है। गाडी के चालक को कुछ ऐसा एहसास होता है जैसे कि कोई उसे ट्रेन की स्पीड कम करने के लिए कह रहा हो। यदि कोई ड्राइवर इसे नजरअंदाज करता है तो अपने आप ही ट्रेन की स्पीड कम हो जाती है। कुछ समय पहले इसी जगह के पास रेल लाइन पर दो मालगाडियां आपस में टकरा गईं थीं। बाद में दोनों गाड़ियों के चालकों ने बताया था कि उन्हें घटना के कुछ देर पहले विचित्र सा अहसास हुआ था, मानो कोई ट्रेन की रफ्तार कम करने के लिए कह रहा हो। पर उन्होंने इसे मन का वहम मान कर गति धीमी नहीं की औऱ इसी कारण आमने-सामने की टक्कर हो गई थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि भीषण हादसे के बाद भी कोई हताहत नहीं हुआ था।
मंदिर से जुडी मान्यता है कि मंदिर में विराजित हनुमान जी अपने भक्तों को उनके भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का पूर्वाभास करवा देते हैं, जिससे वह सचेत रह सके ! अनगिनत लोगों को इसका आभास हुआ है इसीलिए इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। इसी के साथ यह धारणा भी है कि यहां आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं इसीलिए हर मंगल, शनि और बुधवार को दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है जो यहां आ कर अपनी मनोकामना पूर्ती के लिए अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करते हैं।   

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

ट्रेन के डिब्बों का रंग फिर लाल होने लगा है

इस चतुर इंसान ने मौका ताड़ा और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की और फिर हो गया, डिब्बों का रंग नीला। उनका तर्क था की लाल रंग क्रोध, उत्तेजना व आवेश का रंग है, इसी कारण रेल एक्सीडेंट होते हैं ! नीला रंग शांति का प्रतीक है इसलिए दुर्घटनाओं का ख़तरा बिल्कुल कम हो जाएगा ! दुर्घटनाएं कितनी कम हुईं ये तो सबने देखा पर करोड़ों अरबों के खेल का खेल पर्दे के पीछे हो गया.................!!

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भारत में रेल का परिचय अंग्रेजों द्वारा सन 1853 में बहुत ही मामूली शुरूआत से हुआ जब बंबई से थाणे तक की 34 किमी की दूरी तय कर इतिहास बनाया था ! हालांकि उसके पहले 1837 में मद्रास में लाल पहाड़ियों से चिंताद्रीपेत पुल तक तथा 1851 में रुड़की में सोलानी नदी पर एक एक्वाडक्ट के लिए निर्माण सामग्री पहुंचाई गई थी पर वह सिर्फ माल ढोने के लिए किया गया था। शायद अंग्रेजों को लाल रंग बहुत पसंद था सो रेल गाड़ियों के डिब्बे भी लाल रंग के ही होते थे। वर्षों-वर्ष यही रंग चलता भी रहा !

शुरू के डेढ़-दो दशकों को छोड़ दें जिसने भी रेल की कमान संभाली उसने इससे कुछ ना कुछ फायदा जरूर उठाया ! पर यह एक दुधारू गाय है, यह पहचान दो चतुर लोग ही कर पाए ! ऐसे ही एक दूरंदेशी, महत्वाकांक्षी, पारखी को जब इसकी बागडोर संभालने का सुअवसर मिला, उस समय केंद्र में सरकार भी लुंज-पुंज सी ही थी ! इस चतुर इंसान ने मौका ताड़ा और वरिष्ठ अधिकारियों से बात की और फिर हो गया, डिब्बों का रंग नीला। उनका तर्क था की लाल रंग रोष, आक्रमकता तथा उत्तेजना का रंग है, इसी कारण रेल एक्सीडेंट होते हैं ! नीला रंग शांति का प्रतीक है इसलिए दुर्घटनाओं का ख़तरा बिल्कुल कम हो जाएगा ! दुर्घटनाएं कितनी कम हुईं ये तो सबने देखा पर करोड़ों अरबों के खेल का खेल पर्दे के पीछे हो गया। 

                                  
आज फिर से रेल के लाल डिब्बे नजर आने लगे हैं, पर ये नीले से लाल नहीं किए जाते बल्कि इनका मूल रंग ही मुख्यता लाल रखा गया है। नई तकनीकी के उच्च गुणवत्ता के इन लाल और सिल्वर रंग के कोच को एलएचबी (Link Hoffman Bush) कहा जाता है। जो एल्युमिनियम तथा स्टेलनेस स्टील से एंटी टेलीस्कोपिक सिस्टम के द्वारा बने होने के कारण भार में हल्के होते हैं और इनको 160 किलोमीटर से 200 किलोमीटर/घंटा पर दौड़ाया जा सकता है। ये आसानी से पटरी से नहीं उतरते ! बड़े झटके भी आसानी से झेल लेते है। जिसकी वजह से एक्सीडेंट बहुत ही कम हो जाते हैं। इनको रिपेयर की जरुरत भी काफी देर के बाद पड़ती है।  इनमें डिस्क ब्रेक लगाये जाते हैं, जिससे इन्हें जल्दी रोका जा सकता है। इसके अलावा इसमें ज्यादा यात्रियों के लिए सीटें होती हैं। 

                                       
नीले इंग के डिब्बों का निर्माण इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में किया जाता है। ये लोहे के बनते हैं इसलिए कुछ भारी होते हैं। इनकी गति भी 70 से 140 तक ही होती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि घटना के दौरान इनके डिब्बे एक दूसरे पर चढ़ जाते हैं। यात्रियों के लिए सीटें भी लाल वाले से कम होती हैं। इसके रख-रखाव को भी जल्दी-जसल्दय करना पड़ता है। 



वैसे कुछ गाड़ियों में हरे, मिले-जुले पीले रंग या कुछ और रंगों में भी होते हैं पर मुख्यता नीले और लाल रंग के डिब्बे ही ज्यादातर उपयोग में आते हैं।  

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

किसान कानून के सकारात्मक परिणाम से कुछेक का अस्तित्व ही न मिट जाए

किसान की जिंदगी का हाल उजागर करती 1953 में फिल्म आई ''दो बीघा जमीन !'' उसके बाद भी हमारे देश के ''सुखी-खुशहाल, चिंता-फ़िक्र से मुक्त, उल्लास से नाचते-गाते किसानों'' पर, मदर इंडिया, हीरा-मोती, उपकार, कड़वी हवा, लगान, पीपली लाइव, किसान जैसी अनेक फ़िल्में आईं। पर समय एक सा कहां रहता है ! फिर आ गया 2014 का साल..............!

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कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होती हैं ! जो कुछ भी समाज में घट रहा होता है उसे ही पर्दे पर साकार कर दिया जाता है। जागरूक फिल्मकार सदा ही बिना किसी फायदे-नुक्सान-आलोचना-दवाब की परवाह किए बगैर अवाम की ज्वलंत समस्याओं को सामने लाते रहे हैं। स्वतंत्रता मिलने के कुछ ही साल बाद, आजादी का खुमार उतरने पर फिल्मकारों का ध्यान देश-समाज की धुरी रहे किसान पर भी गया ! उसकी जिंदगी का हाल उजागर करती 1953 में फिल्म आई ''दो बीघा जमीन !'' उसके बाद भी हमारे देश के ''सुखी-खुशहाल, चिंता-फ़िक्र से मुक्त, उल्लास से नाचते-गाते किसानों'' पर, मदर इंडिया, हीरा-मोती, उपकार, कड़वी हवा, लगान, पीपली लाइव, किसान जैसी अनेक फ़िल्में बनाई गईं। पर समय एक सा कहां रहता है ! फिर आ गया 2014 का साल ! बस फिर क्या था ! तभी से किसान की जिंदगी दूभर हो गई ! फसल की कीमत ना मिलने पर उसे नष्ट किया जाने लगा ! भूखों मरने की नौबत आ गई ! कइयों ने  तंग आ कर आत्महत्या कर ली। बिचौलिए हावी हो गए ! आढ़तिए उनका हक़ मारने लगे ! 

सच तो यह है कि देश के सबसे कमजोर, गरीब, कोमल तबके के सदस्य किसान की बदहाली शुरू से ही जस की तस रही है ! सदा उसका शोषण हुआ है ! आजादी के दशकों बाद भी हालत बहुत ज्यादा सुधार हुआ नहीं लगता। ऐसे में यदि बेहतरी की सोच के साथ एक कदम उठा है तो उसका स्वागत होना चाहिए ना कि उसके डगमगाने के डर से, बिना पूरा परिणाम जाने उसे उठने ही नहीं दिया जाए ! जब वर्षों वर्ष बदहाली में गुजरे हैं तो क्यों नहीं एक नई पहल का स्वागत किया जाए। विरोध का कारण साफ़ है वे बिचौलिए-आढ़तिए जो भोले-भाले किसानों की सरलता और अनभिज्ञता का सदियों से फायदा उठाते आए हैं उन्हें अपना विनाश नजर आने लगा है। 

यदि आप सचमुच लोगों का भला चाहते हो तो प्रयोग होने दो। सफल रहा तो किसान खुश, देश खुशहाल ! नहीं तो फिर आप तो हैं ही छीछालेदर करने को ! पर कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको इस कानून का सही परिणाम दिखने लगा हो और अपना अस्तित्व मिटते....

वैसे देर से ही सही आम इंसान भी एक बात समझने लगा है कि देश की सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी जिसके नेताओं ने आजादी की लड़ाई में आगे आ कर हिस्सा लिया ! अपने समय की सबसे लोकप्रय पार्टी रही ! एक से बढ़ कर एक नेताओं ने उसके झंडे तले रह कर देश की सेवा की ! आज वह सिर्फ मतलब और मौका परस्त लोगों का जमावड़ा बन कर रह गई है ! जो सिर्फ उसके नाम और इतिहास का सहारा लिए किसी तरह अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जुगाड़ में हैं। अवाम भी उसकी नकारात्मक सोच, कड़वी भाषा, सिर्फ विरोध के लिए विरोध वाली शैली से तंग आ चुका है ! किसी को समझ नहीं आता कि उन्हें हर चीज से ''एलर्जी'' क्यों है ! चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी हो, सर्जिकल स्ट्राइक हो, राफ़ेल का सौदा हो,  राम मंदिर का मुद्दा हो, 370 हो, कोरोना हो, उसकी दवाई हो, अर्थ व्यवस्था हो चाहे यह किसान कानून ! हर जगह उन्हें सिर्फ बुराई ही नजर आती है ! मजे की बात यह भी है कि हर बार उन्हें अपनी बात का गलत होने पर शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी है, पर सुधार कभी और कहीं से आता नहीं दिखता ! 

उनके प्रवक्ता तो एक से एक महान लोग हैं जो बिना किसी शर्म-लिहाज के भद्द पिटने के बावजूद झूठ को सच बनाने में लगे रहते हैं ! अभी टीवी पर एक महोदय दावा कर रहे थे कि जब भाजपा दो से तीन सौ के पार जा सकती है तो उनके तो अभी सौ लोग हैं, अगले चुनाव में देखिएगा ! पता नहीं इनका अगला अपना पिछड़ा क्यों नहीं देखता ! पर वे यह आकलन करना भूल गए कि दो से तीन शतक तक पहुँचाने की उपलब्धि पनपते हुए हुई है और वे पतझड़ की ओर उन्मुख हैं वह भी ऐसे पेड़ के जिसकी जड़ों में घुन लग चुका है ! 

जब हर जगह बदलाव की बयार बह रही है तो यहां भी उसे आजमाने में क्या बुराई है ! जबकि पुरानी व्यवस्था का परिणाम सामने है ! यदि आप सचमुच लोगों का भला चाहते हो तो प्रयोग होने दो। सफल रहा तो किसान खुश, देश खुशहाल ! नहीं तो फिर आप तो हैं ही छीछालेदर करने को ! और तब तो आपकी भी पौ बारह होगी ! पर कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको इस कानून का सही परिणाम दिखने लगा हो और अपना अस्तित्व मिटते........लगता तो यही है !!

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

सरकार और किसान, जरुरी है विश्वास और भरोसा कायम होना

किसान आंदोलन कुछ भी हो, है तो दुखदाई ! कठिन परिस्थितियां  ! गहराती ठंड ! खुला आसमान ! हैं तो वे भी इंसान ही !कुछ लोगों का कहना है कि यह सिर्फ पंजाब के किसानों की बात है ! यदि ऐसा है भी तो वे भी तो हमारे अपने हैं ! उनकी दुःख-तकलीफ को दूर करने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है ! यदि वहां विपक्ष का शासन है भी तो क्या उन्हें हक़ नहीं कि वे अपनी शंका-डर-गलतफहमी दूर करवा सकें ! यह काम समय रहते ही कर लिया जाता तो न इतना बखेड़ा होता, ना विघ्नसंतोषियों के कोई अवसर हाथ आता, ना ही हताश-निराश कुतर्कियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों को वैमनस्य फ़ैलाने का मौका मिल पाता ..........!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आम देशवासी की यही चाहत होती है कि सर्वत्र सुख-शांति, अमन-चैन बना रहे ! भले ही उनका एक अच्छा-खासा प्रतिशत राजनीती से दूर ही रहता हो पर वह देश-काल में घटते घटनाक्रमों से बिल्कुल निस्पृह नहीं रह सकता ! ऐसा ही हो रहा है सरकार और किसानों के बीच चल रहे विवादों से ! उठते बवाल, उलझते मसले, खिंचती समस्याएं, मचती अफरा-तफरी, उत्पन्न होते व्यवधान, अवाम के मन में भी सवाल उठाने  लगे हैं कि क्यों नहीं समय रहते इस सब का हल निकाल लिया गया ? क्यों किसानों को लम्बी-लम्बी यात्राएं कर सरकार के कान पर जूँ रेंगवानी पड़ी ? 

सबसे बड़ी बात, यह तो थाली में सजा कर मौका दे दिया गया हाशिए पर सिमटे, लुटे-पिटे-हारे-थके उन विरोधियों को जो ना संसद में लड़ पाते हैं नाहीं चुनावों में ! पर सड़क पर आ झूठ को सच में बदलना खूब आता है। जो माहिर हैं, जनता को बरगलाने में ! जो सिर्फ मौका तलाशते रहते हैं अराजकता फैलाने का ! उन्हें ही फिर अपनी दूकान खोलने का अवसर दे दिया गया ! विघटनकारियों को फिर एक मंच मिल गया !षड्यंत्रकारियों के लिए छींका ही तोड़ डाला गया ! जब जाहिर ही था कि बात कर के ही समस्या सुलझनी है, और यह काम समय रहते ही कर लिया जाता तो न इतना बखेड़ा होता, ना विघ्नसंतोषियों के कोई अवसर हाथ आता, ना ही हताश-निराश कुतर्कियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों को वैमनस्य फ़ैलाने का मौका मिलता !  
सरकार भी यही चाहती है कि उगाने वाले को सही मूल्य मिल सके ! उपभोक्ताओं को सही कीमत पर जींस उपलब्ध हो सकें ! बीच के कमाने वालों पर नकेल कसी जा सके !  पर कहीं ना कहीं झोल तो जरूर है, नहीं तो अभी भी तय कीमत से आधी पर से भी कम पर क्यों और कैसे धान बिक रहा है 
सरकार के अनुसार उसके द्वारा लाए गए कानून से किसान का भाग्य बदल जाएगा ! यदि ऐसा है तो किसान ही, क्यों नहीं इस बात को मान रहा ? क्यों नहीं वह उस पर विश्वास कर रहा ? सरकार के अनुसार, क्यों वह विरोधियों के बहकावे में आ रहा है ? जब वे लोग उसे बरगला सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं समझा पा रही ? जबकि सरकार में एक से एक उम्दा वक्ता और प्रचार विशेषज्ञ इस काम के लिए सिद्धहस्त हैं ?  यदि वर्षों से बार-बार ठगा गया किसान चाहता है कि ''मंडी व्यवस्था'' और ''एमएसपी'' बनी रहे, जिसका सरकार खुद भी दावा कर रही है, तो उसे अनिवार्य कर देने में संकोच क्यों ? इसके आड़े कुछ ''इफ-बट्स'', बिचौलियों के हथकंडे, माफियाओं के कुचक्र जरूर आ सकते हैं, जिनसे निपटना सरकारी महकमों का काम है। उन्हें काबू में किया जाए ! उनसे डर कर देश के अन्नदाता को क्यों तंग किया जाए ! क्यों उसे किसी भी बात के लिए मजबूर किया जाए ! एक-एक कर अलग होते सहयोगियों के बावजूद लगता है कुछ लोग इसको गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, अभी किसी महानुभाव ने कहा है कि ''जो चाहे संबंध तोड़ ले हमें किसी की गरज नहीं है'' ! सत्ता के मद में कोई अपने अहम के चलते बात का बतंगड़ ना बना दे इस बात का ध्यान रखअपने सदस्यों को सरकार द्वारा ऐसी गर्वोक्तियों से तो निश्चित रूप से दूर रहने की चेतावनी जरूर मिलनी चाहिए ! 

कुछेक को छोड़ दें तो आम किसान सदा से ही हमारे सामाजिक ढाँचे का कोमल, कमजोर तथा उपेक्षित सा हिस्सा रहा है। सदियों से उसका मतलब के लिए ही उपयोग होता आ रहा है ! अभी स्थिति जरूर पहले से बहुत सुधरी है पर अभी भी बहुत सा काम बाकी है। जो इस किसानआंदोलन से साफ़ नजर आ रहा है। कुछ भी हो यह है तो दुखदाई ! कठिन परिस्थितियां ! गहराती ठंड ! खुला आसमान ! हैं तो. वे भी इंसान ही ! कुछ लोगों का कहना है कि यह सिर्फ पंजाब के किसानों की बात है ! यदि ऐसा है भी तो, वे भी तो हमारे अपने हैं ! उनकी दुःख-तकलीफ को दूर करने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है ! यद्यपि वहां विपक्ष का शासन है, तो क्या सिर्फ इसीलिए उन्हें हक़ नहीं कि वे अपनी शंका-डर-गलतफहमी दूर करवा सकें ? ये तो केंद्र के लिए एक ऐसा सुनहरा मौका था जबकि उन के साथ प्रेम पूर्वक बात कर, उनकी शंका दूर कर, समस्या का हल निकाल उनका मन और विश्वास जीता जा सके।  

कई अति उत्साही लोग जोर-जबरदस्ती और दंड का उपयोग करने की सलाह देने लगे हैं जो कि निहायत ही गैर जिम्मेदाराना मश्विरा है ! ध्यान देने की बात है कि हजारों-हजार की संख्या में पंजाब से दिल्ली पहुँचाने वाले जत्थों द्वारा किसी भी तरह का उत्पात नहीं हुआ ! ना आगजनी की घटनाएं हुईं ना हीं पथराव  इत्यादि की ! तो पूरी तरह शांति और अहिंसक मार्च कर रहे सीधे-सादे लोगों पर क्यों बर्बरता बरती जानी चाहिए ! जबकि सरकार को बदनाम करने की मंशा वाले विरोधियों का ध्येय भी यही होगा ! यह भी तो सच है कि जब भी कोई सरकार विरोधी आंदोलन छिड़ता है तो वह विपक्ष के लिए राजनीती मांजने का मौका बन जाता है। यहां भी यही हो रहा है। तरह-तरह के हथकंडों का उपयोग शुरू हो गया है। पर आज के तकनीकी सक्षम समय में ऐसे लोगों की पहचान कोई बड़ी समस्या नहीं है ! जरुरत है भेड़ की खाल ओढ़े, बवाल मचाने की ताक में लगे भेड़ियों को सामने ला सबक सीखाने की ! 

क्या ही अच्छा होता कि माँ बिन रोए ही बच्चे को दूध उपलब्ध करवा देती ! बगावत के बीज अंकुरित होने के पहले ही उनका उपाय कर लिया जाता ! चिंगारी लपट ना बन जाए इसका ध्यान रखा जाता ! खासकर पंजाब को मद्देनजर रख, जहां बड़ी मुश्किल से अमन-चैन कायम हो पाया है ! अभी भी समय है कि तुरंत बिना किसी पूर्वाग्रह और कुंठा के इस विवाद का हल ढूंढ लिया जाए ! सरकार की नीतियां तुरंत और ढंग से लागू हो सकें ! उगाने वाले को सही मूल्य मिल सके ! उपभोक्ताओं को सही कीमत पर जींस उपलब्ध हो सकें ! बीच के कमाने वालों पर नकेल कसी जा सके ! भले ही सरकार भी यही चाहती है पर कहीं ना कहीं झोल तो जरूर है, नहीं तो अभी भी तय कीमत से आधी पर से भी कम पर क्यों और कैसे धान बिक रहा है ! किसान और सरकार जब दोनों एक दूसरे का विश्वास और भरोसा पा लेंगे तभी देश की खुशहाली संभव हो पाएगी।  

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

जब फिल्म ''मदर इंडिया'', ''दिस लैंड इज माईन'' बनते-बनते रह गई

पर दिलीप कुमार तो दिलीप कुमार ! उन्हें पता था कि फिल्म नायिका पर केंद्रित है, सारा श्रेय उसे ही मिलने वाला है ! तो भाई ने जगह-जगह कहानी में ज़रा-ज़रा सा बदलाव लाने का सुझाव देना शुरू कर दिया ! फिर इतने से भी काम नहीं बनता दिखा, तो उन्होंने अपने लिए डबल रोल की फरमाइश कर डाली। पहले नायिका का पति और फिर उसका लड़का ! जो सुक्खी लाला से अपनी जमीन हासिल करने के लिए लड़ता और जीतता है। यहां तक कि फिल्म का नाम तक भी सुझा दिया  ''दिस लैंड इज माईन''...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कई बार ऐसा होता है कि कोई इंसान जो समाज में बहुत लोकप्रिय होता है, अवाम का चहेता या आदर्श होता है ! जिसे लोग चाहते हों, प्यार करते हों ! जिसके बारे में उनकी धारणा सिर्फ भले मानुष की हो, ऐसे आदमी को अपनी छवि बनाए रखने के लिए काफी जतन करने पड़ते हैं। अपनी नकारात्मकता को छुपाने के लिए कई-कई सच्ची-झूठी कहानियां घडनी पड़ती हैं ! ''मिथ'' रचना पड़ता है !

औरत 

एक ऐसा ही मिथ, जो पिछले तिरसठ सालों से सच का रूप धरे था, उसका अब जा कर खुलासा हुआ है ! अब तक यही कहा जाता रहा है कि फिल्म मदर इंडिया में दिलीप कुमार ने बिरजू का रोल करने से इस लिए इंकार कर  दिया था क्योंकि वह अपनी अब तक की नायिका रही नर्गिस के बेटे का किरदार नहीं करना चाहते थे। पर सच्चाई इसके विपरीत थी ! उन्हें एक तरह से इस फिल्म से निकाला गया था। पर उनके चाहने वालों पर इस बात का विपरीत असर ना पड़े इसलिए उपरोक्त कहानी गढ़ी गई थी। 

जब नर्गिस को पता चला कि दिलीप कुमार उनके बेटे का रोल कर रहे हैं तो उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धि को भी यह कहते हुए साफ़ इंकार कर दिया कि ''मैं पर्दे पर जिनके साथ रोमांस कर चुकी, उनके साथ माँ-बेटे जैसा रिश्ता निभाना मुझे कतई मंजूर नहीं। अगर दिलीप कुमार बिरजू का रोल करते हैं तो मैं इस फिल्म में काम नहीं कर पाऊंगी।'' 

हुआ यह था कि जब महबूब खान ने अपनी यादगार फिल्म ''औरत'' को दोबारा ''मदर इंडिया'' के नाम से बनाने की सोची, तो कास्टिंग के समय उनके जेहन में बिरजू के रोल के लिए अपने गहरे मित्र दिलीप कुमार का नाम छाया हुआ था। उनको कहानी सुनाई गई ! वे मान भी गए ! पर दिलीप कुमार तो दिलीप कुमार ! उन्हें पता था कि फिल्म नायिका पर केंद्रित है, सारा श्रेय उसे ही मिलने वाला है ! तो भाई ने जगह-जगह कहानी में ज़रा-ज़रा सा बदलाव लाने का सुझाव देना शुरू कर दिया ! फिर इतने से भी काम नहीं बनता दिखा तो उन्होंने अपने लिए डबल रोल की फरमाइश कर डाली। पहले नायिका का पति और फिर उसका लड़का ! जो सुक्खी लाला से अपनी जमीन हासिल करने के लिए लड़ता और जीतता है। यानी पूरी फिल्म  की ! यहां तक कि उन्होंने इस फिल्म का नाम तक भी सुझा दिया ''दिस लैंड इज माईन'' ! महबूब एक सरल ह्रदय इंसान थे, तिस पर दिलीप कुमार के दोस्त, वे इन सब बदलावों के लिए तैयार भी हो गए। उन्हें इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ कि उनके दोस्त ने उनकी कहानी की आत्मा को मार, फिल्म को पूर्णतया अपनी बना लिया है और इसकी पूरी तैयारी भी शुरू कर दी है जिसके लिए अपने बाप और बेटे के रोल के लिए स्पेशल विग बनवाने लंदन भी चले गए हैं। 

औरत 

पर विधि को कुछ और ही मंजूर था। ''औरत'' के लेखक वजाहत मिर्जा को यह सब बदलाव बेहद नागवार गुजर रहे थे। उनके अनुसार इस तरह तो कहानी की मूल भावना और उद्देश्य ही ख़त्म हो रहे थे। उन्होंने जब इस बात का पुरजोर विरोध किया तो यूनिट के बाकी लोग भी उनके साथ आ खड़े हुए। इधर जब नर्गिस को, जिन्हें ऐसे ही रोल की सदा से तलाश थी जो उनकी फ़िल्मी जिंदगी का मील का पत्थर साबित हो सके, पता चला कि दिलीप कुमार उनके बेटे का रोल कर रहे हैं तो उन्होंने इतनी उपलब्धि को भी यह कहते हुए साफ़ इंकार कर दिया कि ''मैं पर्दे पर जिनके साथ रोमांस कर चुकी, उनके साथ माँ-बेटे जैसा रिश्ता निभाना मुझे कतई मंजूर नहीं। अगर दिलीप कुमार बिरजू का रोल करते हैं तो मैं इस फिल्म में काम नहीं कर पाऊंगी।'' 

मदर इंडिया 

इन सब के बीच महबूब बुरी तरह उलझ कर रह गए ! एक तरफ जिगरी दोस्त दिलीप कुमार और दूसरी तरफ नर्गिस और उनकी अपनी पूरी टीम ! आखिर फिल्म के हित के लिए उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा। नरगिस को नायिका का रोल सौंपा गया।  दिलीप को समझा-बुझा कर और उनकी इज्जत के लिए नर्गिस की बात को उनकी बता, एक मिथ रच कर उन्हें फिल्म से अलग किया गया। सारे बदलाव रद्द कर पुरानी कहानी को बरकरार रखते हुए ''दिस लैंड इज माईन'' को ''मदर इंडिया'' का नाम दे इतिहास रचा गया। 

@संदर्भ, आभार - राजकुमार केसवानी, पुस्तक-नर्गिस, बन्नी रूबेन  

बुधवार, 25 नवंबर 2020

छँटना कोहरे का, भले देर से ही सही

बच्चों-किशोरों और युवाओं के लिए फ़िल्मी दुनिया के कर्मकार भगवान बन गए। उनकी नक़ल होने लगी ! उनकी बातें-मूल्य-हरकतें आदर्श बन गईं ! उनका प्रभामंडल कोमल-अर्धविकसित मस्तिष्क पर इतना हावी हो गया कि वे अपने आदर्श के विरुद्ध कुछ भी देखना-सुनना नापसंद करने लगे। यहां तक कि उनकी गलत, आपराधिक या समाज विरोधी हरकतों पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं होता था। ख़ासकर बच्चों और किशोरों द्वारा उनका नशा करना अदाकारी, फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाडी चढ़ा देना शौर्य या एक से अधिक रिश्ते बनाना उनकी जिंदादिली का प्रतीक माना जाने लगा. ......... !

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कुछ दिनों पहले एक फ़िल्मी कलाकार की आत्महत्या की तहकीकात की खोज में तफ्तीश की रौशनी एक ऎसी सुरंग में जा पड़ी जहां फिल्म-टीवी से संबंधित नशेड़ियों-गंजेड़ियों की जमात डेरा डाले पड़ी थी ! ये वे लोग थे, जिनकी तरह बनने की चाहत कई युवक-युवतियों के दिलों में पनप रही है। कइयों के आदर्श हैं ये ! पर नशे के उपभोग और उसके व्यापार ने लोगों के सामने इन बड़े नाम वालों के खोटे कर्मों की पोल खोल कर रख दी। पर जैसा हमारे देश का चलन है कि यदि सौ आदमी किसी गलत काम की बुराई करते हैं तो दस उस गलत इंसान के पीछे भी आ खड़े होते हैं ! इन्हीं दस लोगों की शह पर गलत करने वाला अपना काम जारी  रखता है; बेहिचक, बेखौफ !  

यहां भी ऐसा ही होना था और हुआ ! जब अपनी लियाकत से ज्यादा फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों की बदौलत पहचान बनाने वाली एक तथाकथित कॉमेडियन और उसके पति को गांजा रखने के आरोप में जेल भेजा गया तो तरह-तरह की टिप्पणियों से सोशल मीडिया भर उठा ! कोई इसे किल्मों के बाद टीवी पर हस्तक्षेप की बात करने लगा, तो कोई साधू-संतों के गांजा पीने का उदाहरण देने लगा ! पर इस हमाम के किसी भी बिरादर ने खुल कर उनकी हरकत को गलत नहीं ठहराया ! गनीमत तो यह रही किसी ने शिव जी का उदाहरण दे इन्हें पाक-साफ़ कहने की जुर्रत नहीं की।   

अभिनेता-अभिनेत्रियों की छोटी-बड़ी खूबियों, अंतरंग रिश्तों, जायज-नाजायज संबंधों, वैभव व विलासितापूर्ण रहन-सहन को बढ़ा-चढ़ा कर अवाम के सामने रखा जाने लगा। कुछ लोगों ने पैसे के बल पर कुछ पत्रकारों को अपना पैरोकार बना उनको अपनी छवि को निखारने-सुधारने का काम सौंप दिया। जिन्होंने उन्हें तरह-तरह के उपनामों और विशेषणों से नवाज उन्हें नायक से महानायक बना प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया

यह तो सच्चाई है कि आजादी के एक चौथाई शतक के गुजरते-गुजरते देश के किशोर और युवाओं के आदर्श, नेताओं की बनिस्पत फ़िल्मी पर्दे-के नायक-नायिकाएं होने लग गए थे ! जिसमें फिर क्रिकेटर भी अपनी फ़िल्मी दुनिया से नजदीकियों के कारण जुड़ते चले गए ! इस मर्ज को मास-मीडिया और फिर सोशल मीडिया ने खूब पहचाना और इसका फायदा उठाने के लिए उनके लिए जगह बना ज्यादा तवज्जो देनी शुरू कर दी। अपना व्यापार बढ़ने के लिए इनसे जुडी खबरों को सनसनीखेज, चटपटा रूप दे परोसना शुरू कर दिया ! समाज उनकी दिखावटी बातों में आ उन्हीं के अनुरूप चलने की कोशिश करने लगा। 

इसी प्रचार के तहत अभिनेता-अभिनेत्रियों की छोटी-बड़ी खूबियों, अंतरंग रिश्तों, जायज-नाजायज संबंधों, वैभव व विलासितापूर्ण रहन-सहन को बढ़ा-चढ़ा कर अवाम के सामने रखा जाने लगा। लोगों की इस सब में गहरी रूचि देख कुछ लोगों ने पैसे के बल पर कुछ पत्रकारों को अपना पैरोकार बना उनको अपनी छवि को निखारने-सुधारने का काम सौंप दिया। जिन्होंने उन्हें तरह-तरह के उपनामों और विशेषणों से नवाज उन्हें नायक से महानायक बना प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। उनकी छोटी-बड़ी उपलब्धियों पर पन्ने पर पन्ने रंग डाले ! उनको किसी दूसरी दुनिया का वाशिंदा बना दिया ! भोले-भाले लोग उनकी बातों के जाल में फंसते चले गए ! उनकी गलत आदतों को ही सफलता की सीढ़ी माना जाने लगा ! 

इन सब बातों का बच्चों-किशोरों और युवाओं पर सबसे ज्यादा और जबरदस्त असर पड़ा ! फ़िल्मी दुनिया के कर्मकार उनके लिए भगवान बन गए। उनकी नक़ल होने लगी ! उनकी बातें-मूल्य-हरकतें आदर्श बनती चली गईं ! उनका प्रभामंडल कोमल-अर्धविकसित मस्तिष्क पर इतना हावी होता चला गया कि वे अपने आदर्श के विरुद्ध कुछ भी देखना-सुनना नापसंद करने लगे। यहां तक कि उनकी गलत, आपराधिक या समाज विरोधी हरकतों पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं रहा। ख़ासकर बच्चों और किशोरों द्वारा उनका नशा करना अदाकारी, फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाडी चढ़ा देना शौर्य या एक से अधिक रिश्ते बनाना उनकी जिंदादिली का प्रतीक माना जाने लगा ! पर संसार में जो भी  चीज शुरू होती है उसका अंत भी तय होता है ! 

राहत की बात है कि जागरूकता बढ़ रही है ! समाज के अलग-अलग हिस्सों की बहुत सी तरह-तरह की सच्चाइयां अब सामने आने लगी हैं ! कई स्थानों पर पसरा कोहरा छंटने लगा है ! युवाओं का ध्यानअपने भविष्य पर है ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि मीडिया विश्लेषण कर खुद को ''संजय'' साबित करे ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि आवाज उठे उनके खिलाफ जो मुख्य दोषी हैं ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि उन काले कारनामियों के चेहरे से नकाब हटाई जाए जो समाज में जहर घोल रहे हैं ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि जड़ पर प्रहार किया जाए ना कि सिर्फ पत्तों को तराश कर निश्चिन्त हो लिया जाए ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि नशे के जहर के छोटे-मोटे उपभोक्ताओं को पकड़ने के साथ-साथ उत्पादक को भी लम्बे हाथ लिया जाए ! वह खुला रहा तो उसको शिकार की क्या कमी पड़ेगी ! बिमारी गंभीर है ! लाइलाज हो जाए उससे पहले ही शल्य चिकित्सा की सख्त जरुरत है !   

सोमवार, 9 नवंबर 2020

इसलिए होता है मूल से अधिक ब्याज प्यारा

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो ...................! 

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किसी इंसान के दादा-दादी बनने पर उनके अपने पोते-पोतियों से स्नेह-अनुराग को लेकर, ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत है कि ''मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।'' इसका कतई यह मतलब नहीं है कि उसे अपने बच्चों से लगाव नहीं होता ! पर काम का बोझ, पारिवारिक दायित्व व जिम्मेदारियां, जीवन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिशें, चाहते हुए भी, उसे इतना समय ही नहीं देतीं कि वह प्रभु-प्रदत्त इस नियामत के बढ़ने-फलने-फूलने का पूरा आनंद उठा सके। पर अपनी इस तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक दायित्वमुक्त हो चुका होता है। काफी कुछ हासिल कर चुका होता है ! पहले की तरह जीवन में आपाधापी नहीं रह जाती ! सो अफरात समय भी उपलब्ध रहता है। इसी से जब वह प्रभु की इस अद्भुत, अप्रतिम, सर्वोत्तम कृति को शिशु रूप में अठखेलियां करते देखता है, जो वह अपने समय में नहीं देख पाया थाा, तो वह अचंभित, मुग्ध व चित्रलिखित सा हो मोह में बंध कर रह जाता है। 

सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो 

कहा जाता है कि बच्चे प्रभु का रूप होते हैं ! पर प्रभु को भी इस धरा को, प्रकृति को, सृष्टि को बचाने के लिए कई युक्तियों तथा नाना प्रकार के हथकंडों का सहारा लेना पड़ा था ! पर निश्छल व मासूम शैशव, चाहे वह किसी भी प्रजाति का हो, छल-बल, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा सबसे परे होता है, इसीलिए वह सबसे अलग होता है, सर्वोपरि होता है। भगवान को तो फिर भी इंसान को चिंतामुक्त करने में कुछ समय लग जाता होगा, पर घर में कैसा भी वातावरण हो, तनाव हो, शिशु की एक किलकारी सबको उसी क्षण तनावमुक्त कर देती है। गोद में आते ही उसकी एक मुस्कान बड़े से बड़े अवसाद को तिरोहित करने की क्षमता रखती है। उसकी बाल सुलभ हरकतें, अठखेलियां, जिज्ञासु तथा बड़ों की नक़ल करने की प्रवृति, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी होती हैं। उसकी अपने आस-पास की चीजों से तालमेल बैठाने की सफल-असफल कोशिशें कठोर से कठोर चहरे पर भी मुस्कान की रेख खिंच देने में कामयाब रहती हैं। 

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो !   

मैं भी उसी श्रेणी से संबद्धित हूँ, इसीलिए यह कह पा रहा हूँ ! अपनी डेढ़ वर्ष की पौत्री की बाल चेष्टाओं, उसकी गतिविधियों, उसकी मासूमियत भरी हरकतें देख यह अहसास होता है कि जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कुछ खो दिया था ! किस नियामत से वंचित रह गया था ! उपलब्धियों की चाहत में कितना कुछ अनुपलब्ध रह गया था ! पर आज दिल की गहराइयों से प्रभु का शुक्रगुजार हूँ कि समय रहते उन्होंने मुझे इस दैवीय सुख से परिचित करवा दिया ! सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो ! पर इसके साथ ही कभी-कभी एक अजीब सी ,बेचैनी, एक अलग सा भाव, कुछ खो जाने का डर भी महसूसने लगता हूँ ! क्योंकि यह तुतलाती जुबां, डगमगाती चाल, अठखेलियां, मासूम हरकतें समय के चंगुल से कहाँ बच पाएंगी ! फिर वही पाठ्यक्रमों का बोझ, स्कूलों की थकान भरी बंदिशें, दुनियावी प्रतिस्पर्द्धा और ना जाने क्या-क्या हावी होती चले जाएंगे ! पर कुछ किया भी तो नहीं जा सकता जग की इस रीत के विपरीत...............!! 

जी तो करता है कि इसकी मासूमियत, निश्छलता, भोलापन यूँ ही बने रहें ! इसी तरह अपनी तोतली भाषा में हमसे बतियाती रहे ! इसी तरह सुबह डगमगाती हुई आ गोद में चढने की जिद करती रहे ! यूँ ही इसकी किलकारियों से घर गुंजायमान रहे ! पर समय.....! किसका वश चल पाया है उस पर ! इसीलिए कोशिश करता हूँ कि इन पलों को बाँध के रख लूँ ! या फिर जितना ज्यादा हो सके, समेटता ही चला जाऊं, समेटता ही चला जाऊं, और सहेज के रख लूँ दिलो-दिमाग के किसी बहुत ही सुरक्षित कोने में, धरोहर बना कर !    

बुधवार, 4 नवंबर 2020

करवा चौथ, सोच बदलने की जरुरत है

आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से  महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं 


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करवाचौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का  एक महत्वपूर्ण त्यौहार।  जिसमें पत्नियां अपने  पति की  लंबी उम्र के लिए दिन भर  कठोर उपवास  रखती हैं। यह  खासकर उत्तर  भारत में  खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम का प्रतीक ! सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर आपस मनाया जाने वाला एक छोटा, प्यारा, मासूम सा उत्सव। 
व्रत से जुडे हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु,  सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है
इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। जिसकी कुछ कथाएं बहुत प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है। जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।
 
करवाचौथ के व्रत से जुडी कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी तरह-तरह के अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ ! इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा अपने आप को प्रगतिशील दिखाने के कुप्रयास में इसे पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दी जा रही है। 
आजकल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। 
वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।
आज एक तरफ हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। दूसरी तरफ "बाजार" उतारू है, इस जैसे मासूम से त्यौहारों को फैशन के रूप में ढालने को ! आस्था को खिलवाड का रूप दे दिया गया है। मिट्टी के बने कसोरों का स्थान मंहगी धातुओं ने ले लिया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह चाकलेट आ गया है। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गये। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गयी। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाती है, कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाज़ार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला है। पावन रूप को विकृत करने की शुरुआत हुई फिल्मों से जिसने रफ्तार पकडी टी.वी. सीरियलों के माध्यम से !
अब तो सोची समझी साजिश के तहत हमारी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों, उत्सव-त्योहारों, रस्मों-रिवाजों, परंपराओं सब पर इस गिद्ध रूपी बाज़ार को हावी करवाया जा रहा है ! समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें। उसमें छिपे गुणों, नसीहतों, उपदेशों को अपनाएं !

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

एक रेलवे स्टेशन, जो ग्रामीणों के चंदे से चलता है

स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

हमारे देश में जहां रेल में बिना टिकट यात्रा करने वालों और उनसे जुर्माना वसूला जाना एक आम बात है ! रेलवे की सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाने वालों की भी कोई कमी नहीं है ! वहीं बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि हमारे ही देश में एक ऐसा रेलवे स्टेशन भी है, जिसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वहां के ग्रामीण हर महीने चंदा जुटा कर 1500 रूपए का टिकट खरीदते हैं, जिससे कि रेलवे उस स्टेशन को बंद ना कर दे !

राजस्थान के बीकानेर और जोधपुर के बीच बसा है नागौर शहर। इसी शहर के डेगाना जिले का एक गांव जालसू ! शुरू से ही यह गांव फौजियों का रहा है ! इसके हर घर से एक व्यक्ति फौज में हैं। उनकी सुविधा के लिए सरकार ने 1976 में गांव को स्टेशन की सौगात दी। नाम दिया जालसू नानक हाल्ट। तब जोधपुर रेलवे विभाग ने वहां एक कुटिया बना कर ट्रेनों का ठहराव शुरू कर दिया। हालांकि इसे स्टेशन का दर्जा तो मिल गया था, परन्तु वर्षों तक फिर उसको और कोई ख़ास सुविधा नहीं मिली ! तब ग्रामीणों ने खुद ही, खुद की सहायता करने की ठानी और पंचायत मद से एक हॉल और बरामदे का निर्माण करवाया, साथ ही चंदा जुटाकर एक प्याऊ और फूलों का बगीचा भी तैयार करवा डाला ! वर्तमान में गांव के 160 से ज्यादा  जवान सेना, बीएसएफ, नेवी, एयरफोर्स और सीआरपीएफ में हैं। जबकि 200 से ज्यादा रिटायर्ड फौजी हैं।

पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती  

2005 में अचानक जोधपुर रीजन में कम आमदनी वाले स्टेशनों को बंद करने का फैसला किया गया ! जालसू का नाम भी उस सूचि में था, सो उसे भी बंद कर दिया गया ! स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा।  

सरहद पर लोहा लेने वाले यहां के जांबाज लोगों ने यह शर्त भी मंजूर कर ली। अब सवाल था पूंजी का ! पंचायत जुटी और उसके अनुसार सभी से चंदा ले इस समस्या को हल करने का निर्णय लिया गया ! सबने अपने मान-सम्मान और सुविधा बनाए रखने के लिए हर तरह का सहयोग किया ! देखते-देखते डेढ़ लाख रूपए एकत्रित हो गए। इस राशि को गांव में ब्याज पर दिया जाने लगा, जिससे हर महीने तीन हजार रूपए ब्याज रूप में मिलने लगे। उसी रकम से 1500 टिकटों की खरीदी होने लगी और उसी से बुकिंग संभालने वाले ग्रामीण को भी 15% मानदेय भुगतान किया जाने लगा। इस तरह यह देश का इकलौता रेलवे स्टेशन बन गया है जहां कोई रेलवे अधिकारी या कर्मचारी नहीं है, इसके बावजूद भी यहां 10 से ज्यादा ट्रेनें रुकती हैं। गांव के लोग ही टिकट काटते हैं और हर माह करीब 1500 टिकट खरीदते भी हैं। 

जालसू गांव के लोगों की अपने हक के लिए लड़ाई, कर्मठता, उनकी दृढ़ता के लिए तो जो भी कहा जाए कम है ! पर रेलवे वालों को क्या कहा जाए ! क्या जवानों से ज्यादा अहमियत कमाई की होनी चाहिए ! क्या लकीर के फकीर उन अफसरों को उन 160 जवानों का जरा भी ध्यान नहीं आया, जिनके अपने घर आने-जाने के जरिए पर वे मुश्किलात खड़ी करने जा रहे थे ! रेलवे में कार्यरत रहते हुए उन्हें जापानी रेल सेवा के उस निर्णय की भी खबर जरूर होगी जिसके तहत उसने जापान के एक छोटे से आइलैंड ''होकाइडो'' के दुर्गम और दूरस्थ गांव ''क्यूशिराताकी'' की स्कूल जाने वाली सिर्फ एक बालिका के लिए तब तक ट्रेन सेवा जारी रखी जब तक उसने स्कूल पास नहीं कर लिया। यहां तो देश के लिए मर-मिटने वाले सैंकड़ों जवानों की बात थी !

ऐसा भी नहीं है कि ग्रामीणों के योगदान और सहयोग से चलने वाले इस स्टेशन की बात ऊपर तक ना पहुंची हो ! इस बात का पता रेलवे को तो है ही, पीएमओ तक इसकी खबर है ! पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती। 

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