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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

व्यस्त रहें, मस्त रहें

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब कर्मविहीन इंसान, खासकर सेवानिवृत्त, वेल्ला होता है तो ऐसे में वह बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है ! उस समय उसे बीते समय की खुशनुमा बातें तो कम याद आती हैं, उल्टे बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग, कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुजरे लम्हों की जैसे फिल्मी रील सी चलने लगती है। ऐसा ना हो तो फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। 
बेल्लापन 
सीलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। व्यस्तता ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात, शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी, कैसा भी, कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 
कब्जा 
एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे सही-गलत, कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे उसका आवास चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे, पर नाम ऐसा बदनाम है कि उसका किया-धरा सब कुछ लोगों को शैतानियत ही लगता है ! 
खुशहाली 
एक सच्चाई यह भी है कि इंसान के व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर उसके परिवार की शांति और सकून पर भी पड़ता है। क्योंकि घर के अन्य लोग, उसकी बेवजह दखलंदाजी, फिजूल के हस्तक्षेप, बिन मांगी सलाहें, बेकार की टोका-टाकी, बार-बार की चाय-पानी की पानी की फरमाइश से बचे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्य व आत्मीय-जन सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

विभिन्न रुचियां 
तो लब्बो-लुआब यह है कि यदि हम अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई जरिया ढूंढ लेते हैं, जिसमें व्यस्त रहते हुए खुशी और संतुष्टि भी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसा हो तो यह तय है कि दिमाग दुरुस्त व शरीर चुस्त तो रहेगा ही, साथ-साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईए है ! 
  
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

सपूत

हेमंत जब चुप हुआ तो रामगोपाल जी उससे आँखें नहीं मिला पा रहे थे ! अपने आप को बेटे के सामने बौना महसूस कर रहे थे ! लाज आ रही थी उन्हें अपनी सोच और निराधार विचारों पर ! आक्रोश था अपने पर कि कैसे उन्होंने अपने बेटे के बारे में गलत सोच लिया ! क्या उन्हें खुद अपने  दिए संस्कारों पर भी भरोसा नहीं रह गया था ! वे उठे और बेटे को कस कर गले से लगा लिया, आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे ! हेमंत उन्हें ऐसे संभाल रहा था जैसे वह उनका पिता हो........!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

शाम की चहलकदमी के बाद रामगोपाल जी घर आ, नम आँखों के साथ पत्नी रमा की फोटो के सामने बहुत देर तक खड़े रहे ! आज उन्हें बिछुड़े हुए पूरा एक साल हो गया था ! पत्नी के देहावसान के पश्चात वे इस शहर में बिलकुल अकेले रह गए थे ! इकलौता बेटा हेमंत अपनी पत्नी स्नेहा और तीन साल की बिटिया के साथ दिल्ली में रहता है ! उसने कई बार कहा, कितनी बार समझाया, इन बारह महीनों में बीसियों बार मनाने की कोशिश की कि पापा हमारे पास आ जाओ ! पर रामगोपाल जी ने, इस उम्र में अकेले रहना ठीक नहीं है, जानते हुए भी दिल्ली जाना गवारा नहीं किया ! वैसे तो वर्षों से उनके साथ रह रहा सहायक दीनू तो था, पर उसकी भी काफी उम्र हो चुकी थी ! 

अलौकिक अनुभूति 
ऐसा  नहीं है कि रामगोपाल जी परिवार के साथ रहना नहीं चाहते थे या उनका आपस में प्रेम नहीं था ! बेटे और उसके परिवार पर वे दिलो-जान से न्योछावर थे ! वो तो पोती को सदा अपने कंधे पर बैठाए, उसका घोड़ा बना रहना चाहते थे ! उसकी एक-एक हरकत को संजो लेना चाहते थे ! उसकी मासूमियत को यादगार बना लेना चाहते थे ! पर आए दिन अखबारों में छपने वाली खबरें उन्हें आशंकित और विचलित कर देती थीं ! उनके दिल में एक अनजाना डर, एक काल्पनिक खौफ घर कर गया था ! रोज ही कोई ना कोई ऐसी घटना सामने आ जाती थी, जिसमें सारी सम्पत्ति हथिया या पूरी जमीन-जायदाद अपने नाम कर बेटा-बहू, माँ-बाप को किसी स्टेशन या एयर पोर्ट पर लावारिस छोड़ गायब हो जाते हैं ! यदि कोई घर ले भी जाता है तो मतलब निकलते ही पालकों को शेष जीवन बिताने के लिए वृद्धाश्रम में छोड़ आता है ! उन्हें अपने बेटे पर विश्वास तो था पर दिल का क्या करें, जो उलटे-सीधे विचारों से इधर-उधर भटकाता रहता था ! 

तभी  फोन की घंटी बजती है ! हेमंत था दूसरी तरफ ! उसने बिना इनको कुछ कहने का मौका दिए, फरमान सुना दिया कि वह दो दिन बाद आ रहा है उनको लेने ! इस बार कोई बहाना नहीं चलने वाला और वे उसके साथ जा रहे हैं ! रामगोपाल जी जानते थे कि बेटा पूर्णतया उन पर गया है जो ठान लिया उसे पूरा करना ही होता है ! इन्होंने सोचा कि चलो कुछ दिन रह आता हूँ, हफ्ते दस दिन में लौट आऊंगा ! पर बेटे ने तो कुछ और ही सोच रखा था।  

पिता-पुत्र 
अगले  कुछ दिन तो बवंडर भरे थे ! उस तूफान में कब सामान पैक हुआ, कब मकान का निपटारा हुआ, कब सारी औपचारिकताएं पूरी हो गईं, कब दिल्ली घर पहुंच गए, पता ही नहीं चला ! जैसे किसी ने सम्मोहित कर दिया हो ! लाख चाह कर भी विरोध नहीं कर पाए रामगोपाल जी ! होश तब आया जब पोती किलकारी मारती हुई उछल कर दद्दू की गोद में चढ़ गई ! उस स्वर्गिक पल में रामगोपाल जी ने सब प्रभु पर छोड़ दिया, जो होगा देखा जाएगा !  

पर मन में एक खटका बना ही हुआ था, क्योंकि उन्हें अपना सामान नजर नहीं आ रहा था ! हेमंत से पूछने पर उसने कहा आप जहां रहेंगे वहां रखवा दिया है ! रामगोपाल जी समझ गए कि मुझे यहां नहीं रहना है ! सामान पहले ही वृद्धाश्रम भिजवा दिया गया है ! आज नहीं तो कल तो जाना ही था, पहले से ही पहुंचा दिया गया है ! तभी हेमंत बोला, पापा आपके लिए एक सरप्राइज है ! रामगोपाल जी ने मन में सोचा काहे का सरप्राइज बेटा, मैं सब जानता हूँ ! तुम भी दुनिया से अलग थोड़े ही हो ! पैसा क्या कुछ नहीं करवा लेता है ! खुद पर क्रोध भी आ रहा था कि सब जानते-समझते भी सब बेच-बाच कर यहां क्यों चले आए ! पर अब तो जो होना था हो चुका था !

तभी हेमंत की आवाज सुनाई पड़ी, पापा चलिए ! रामगोपाल जी के पैर मन-मन भारी हो गए थे, किसी तरह खुद को घसीटते हुए बाहर आ खुद को लिफ्ट में समो दिया ! पर यह क्या ! लिफ्ट नीचे ना जा ऊपर की ओर चल अगले माले पर रुक गई ! उन्हें कुछ समझ नहीं आया ! तभी हेमंत ने बाहर निकल सामने के फ्लैट की घंटी बजाई ! दरवाजा खुला, जिसने खोला उसे देख रामगोपाल जी झटका खा गए, सामने दीनू खड़ा था ! दीनू यहां ? उन्हें बोध ही नहीं हो रहा था कि क्या हो रहा है ! वे कहां हैं ! क्या देख रहे हैं और जो देख रहे हैं वह सच भी है या नहीं ! पर अभी तो कुछ और भी हैरतंगेज होने वाला था !

हेमंत ने अंदर जा आवाज लगाई, काका बाहर आ जाओ, पापा आ गए हैं ! और अंदर से जो आया उसे देख कर तो रामगोपाल जी चकरा कर गिरते-गिरते बचे ! उनके सामने उनके बचपन का, भाई समान, जिगरी यार निशिकांत चला आ रहा था ! निशिकांत ने लपक कर उन्हें गले लगा लिया ! वर्षों के बिछुड़े दोस्तों के मिलन पर सभी की आँखें भीग गईं ! फोन से तो बात होती थी पर मिले अरसा बीत चुका था ! आज ईश्वर की कृपा हुई थी ! पर रामगोपाल जी पूरी तरह असमंजस में थे ! उन्हें सब कुछ किसी नाटक की तरह लग रहा था, जिसमें वे भी थे, पर नहीं थे ! तभी नीचे से बहू का संदेश आ गया, खाना तैयार है !

जब सब खाने की मेज पर इकठ्ठा हुए तो हेमंत ने सारी कहानी का खुलासा किया ! उसने बताया कि उसके अनेक प्रयासों के बावजूद पापा यहां आने के लिए मान नहीं रहे थे ! वह उनके लिए सदा परेशान रहता था। पर कोई हल नहीं निकल पा रहा था ! पर पिछले पखवाड़े जब निशिकांत काका का फोन आया और पता चला कि उनकी तबियत ठीक नहीं रहती, तो मैं उनसे मिलने गया ! वे भी बिलकुल अकेले रहते थे ! उन्होंने शादी वगैरह नहीं की थी ! मैंने उनके पास जा कर सारी परिस्थितियों का जायजा लिया और उसी समय  स्नेहा से मश्विरा कर एक योजना बना डाली।  उसी के तहत निशिकांत काका को भी अपने साथ ले आया ! यह ऊपर वाला फ्लैट भी उन दिनों बिकाऊ था, इसे ले लिया गया ! उसके बाद पापा को यहां कैसे लाया यह आप सब को पता ही है ! रही दीनू काका की बात तो उन्हें इस उम्र में अकेला छोड़ने का तो सोचा भी नहीं जा सकता था ! उनके लिए भी यहां एक अलग कमरे की व्यवस्था है, कोई दिक्कत नहीं होगी ! अब हम सब एक साथ रहेंगे ! मेरा सपना पूरा हुआ ! इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है ! 

हेमंत जब चुप हुआ तो रामगोपाल जी उससे आँखें नहीं मिला पा रहे थे ! अपने आप को बेटे के सामने बौना महसूस कर रहे थे ! लाज आ रही थी उन्हें अपनी सोच और निराधार विचारों पर ! आक्रोश था अपने पर कि कैसे उन्होंने अपने बेटे के बारे में गलत सोच लिया ! उस बेटे के बारे में जो उनका ही नहीं उनसे जुड़े लोगों का भी भला सोचता हो ! क्या उन्हें खुद अपने दिए संस्कारों पर भी भरोसा नहीं रह गया था ! वे उठे और बेटे को कस कर गले लगा लिया, आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे ! हेमंत उन्हें ऐसे संभाल रहा था जैसे वह उनका पिता हो ! बहू उनकी पीठ सहला रही थी ! इधर मासूम छुटकी जो यह जान कर ठुमक रही थी कि दादू अब यहीं रहेंगे उसको अब यह सब देख समझ ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है !

कुछ दिनों बाद आज फिर रामगोपाल जी पत्नी की तस्वीर के सामने खड़े थे ! सामने कप बोर्ड पर उनके तथा निशिकांत जी के नाम के फिक्स्ड डिपॉज़िट के पेपर रखे हुए थे, जो हेमंत ने दोनों घरों को बेच कर मिली राशि से बनवाए थे ! निशिकांत जी जैसे पत्नी को बता रहे थे कि तुम चिंता मत करना तुम्हारे लायक बेटे ने बिना बोले, अघोषित रूप से  मेरे सा-साथ दीनू तथा निशिकांत हम तीनों की जिम्मेदारी ले ली है ! भगवान उसे सदा सुखी रखें !

@दो चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

जो कभी नहीं जाती, उसी को जाति कहते हैं

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे ! उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे ! ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज बहुत दिनों बाद बिनोद आया था ! देखने से स्वस्यचित्त नजर आ रहा था ! पर हाव-भाव से कुछ ऐसा भी महसूस हो रहा था कि कुछ कहना चाह रहा है पर झिझक और संकोच उसे रोक रहे थे ! प्रसंगवश बतला दूँ कि बिनोद मूलतः झारखंड का निवासी है। पूरा नाम बिनोद कुमार झा है। स्नातक है। वर्षों से दिल्ली में आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है ! माँ-बाप गुमला, झारखंड, में रहते हैं ! थोड़ी-बहुत गुजारे लायक जमीन है।  बिनोद सात-आठ साल से मेरे संपर्क में है ! सीधा, सरल, नेक, अविवाहित युवक है ! मुझ से अपने हर मसले को साझा करता रहता है ! हमारे बीच एक अनजाना सा रिश्ता पनप गया है।  पर आज करीब आधे घंटे से मेरे पास बैठे रहने के बावजूद खुल नहीं पा रहा था ! मैंने ऐसे ही उसे कुरेदा,

क्या बात है, सब ठीक है ना ?"                       

हाँ भइया, सब वइसा ही चल रहा है''

पर तुम्हें देख, लग तो नहीं रहा !'' मैं मुस्कुराया, वह कुछ झेंप सा गया ! कुछ देर चुप रहा, फिर जैसे उसने अपने संकोच को परे धकेल दिया, बोला,

भइया जी, हम सोच रहे हैं कि अपना जाति बदल लिया जाए, एस टी या एस सी बन जाऊं ?''

मैं जैसे छत से गिरा ! हक्का-बक्का रह गया ! बोल क्या रहा है यह लड़का ! पगला क्या है क्या ?

क्या कह रहे हो ?''

भईया का है ना, उसमें बहुते तरह का फायदा रहता है ! तरह-तरह का सहूलियत मिलता है ! नौकरी भी लग जाता है ! ई, झा-वा में कुच्छो नहीं रखा !'' 

मुझे तो जैसे सांप सूँघ गया हो ! उसको कैसे समझाऊं, जब खुद ही कुछ नहीं समझ पा रहा था ! बिनोद जवाब के लिए मेरा मुंह जोह रहा था ! कुछ तो मुझे बोलना ही था......! किसी तरह कहा,

अरे ! ऐसा थोड़े ही होता है, यह कोई नाम या धर्म थोड़े ही है, जो जब चाहे बदल लिया ! जाति एक ऐसी व्यवस्था है जो हमारे यहां कर्म से नहीं जन्म से निर्धारित होती है। इसलिए कोई इंसान अपनी जाति कभी भी नहीं बदल सकता ! यदि ऐसा हो जाए तो पूरे समाज का ढांचा बिगड़ जाएगा ! अफरा-तफरी मच जाएगी ! वैसे यह गैर कानूनी भी है !''

पर भइया जी, हमारे जान-पहचान के एक नेता टाइप के मनई हैं, उनका राजनीती में बहुत चलता है ! बड़का-बड़का लोग से जान-पहचान है ! ऊ कह रहे थे, एक रास्ता है ! उससे सब मैनेज हो जाएगा ! थोड़ा खर्चा और समय लगेगा ! हम सोचे पहले भइया जी से पूछ लें, इसीलिए सलाह लेने आए थे !'' 

देखो, बिनोद ! मैं इतना जानता हूँ कि यह काम पूरी तरह से गैर कानूनी है ! पर इसके किसी लूप होल से यदि कोई ऐसा कर भी लेता है तो वह भी हर दृष्टि से गलत ही होगा ! इसलिए मेरी यही सलाह है कि ऐसे किसी पचड़े में मत पड़ना ! समय और पैसा दोनों बर्बाद कर दोगे ! जो भी तुम्हें ऐसा हो जाने का आश्वासन दे रहा है, वह गलत कर रहा है ! हमारे देश में किसी भी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति कितनी ही कोशिश कर ले, अपने रहने की जगह बदल ले, नाम बदल ले या धर्म ही बदल ले, वह अपनी जाति से पीछा नहीं छुड़वा सकता।''

पर भईया जी, यदि कोई अपना धर्म बदल ले, तब तो उसका जाति खत्म ना हो जाता है ?'' 

क्या कहना चाहते हो ?''    

यही कि यदि हम धर्म बदल लें तो हमारा जाति ऑटोमेटेक्लि खत्म हो जाएगा और फिर हम अपना धर्म में वापस आ जाएं तो ?''

मैं समझ गया कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए इसको किसी ने पूरी पट्टी पढ़ा दी है ! अपना हित साधने के लिए इसे मोहरा बना रहा है ! इसलिए इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उसको कहा, 

देखो बिनोद, किसी के बहकावे में मत आ जाना ! यह सब इतना सरल नहीं है ! हर धर्म में उसके कुछ अपने नियम और विभाग होते हैं ! वह एक अलग और गहन विषय है ! पर तुम इतना समझ लो कि यदि कोई इस तरह का उल्टा-सीधा रास्ता अख्तियार करता है, तो भी अपनी मन-मर्जी नहीं कर सकता ! यदि ऐसा कर वह किसी जाति विशेष को अपनाता है, तो पहले यह देखा जाएगा कि उस जाति के लोग उसे स्वीकार करते भी हैं कि नहीं ! दूसरा इस तरह जाति बदलने वाले को पहले खुद को उसी जाति का होने का प्रमाण भी देना पड़ता है ! ऐसे बहुत से केस हो चुके हैं और किसी को भी कानूनी तौर पर सफलता नहीं मिली है ! मैं फिर कहता हूँ कि इस पचड़े में मत पड़ो ! कोई जरुरी नहीं कि यह सब उटपटांग करने के बाद भी भाग्य तुम पर मेहरबान हो ही जाएगा !''

ठिक्के कह रहे हैं आप ! ई सब यदि एतना ही सहज होता तो कोई भी, जब भी चाहता अपनी जाति बदल लिए होता ! तब तो बहुते भसान मच जाता ! पर भईया जी, अपने देश में अइसे बहुते लोग हैं जो सालों से अपना नाम-उपनाम बदल कर मजे से जीवन बिता रहे हैं ! केतना लोग पकड़ा भी गया है ! तिस पर ई भी तो सच्चे है कि रसूखवाला, पइसावाला, ताकतवाला लोग ही ज्यादा गलत काम करता है ! हमको भी हमारे पिताजी मना किए थे ई सब करने से ! बोले थे, बिटवा किसी लालच में आ कर अंधे कूऐं में झलांग मत लगाना ! भगवान जो दिया है, उसमें खुश रहो ! मेहनत करते रहो, उसी से सफलता मिलेगी ! देक्खे रहे हो केतना गरीब-गुरबा का बच्चा लोग अपना मेहनत से कहां का कहां पहुंच गया ! बस, मेहनत से जी मत चुराना !''

फिर भी तुम चल पड़े ?''

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ तो इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे हैं  !उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे !  ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे.....!

बिनोद की आँखें भर आईं थीं ! मैं समझ रहा था, एक बेटे का अपने माता-पिता से लगाव ! उनके प्रति उसका अपना कर्तव्य ! उसका दर्द ! उसकी छटपटाहट ! उसकी मजबूरी ! उसकी हताशा !    

मैंने उसके सर पर हाथ रखा ! वह फफक पड़ा ! कुछ देर बाद अपने को संभाल बोला,

भईया जी, हमको माफ कर दीजिए''

अरे ! किस बात की माफ़ी ? तुमने क्या किया है ? तुम तो खुद ही समझदार हो ! उठो ! मुंह-हाथ धो लो ! फिर एक-एक कप चाय हो जाए, भाभी को बोल दो पकौड़ों के लिए ! 

बाहर बारिश की झमाझम सुखद लगने लगी थी !   

रविवार, 21 जनवरी 2024

गांव की हवा फुसफुसाती है

हालांकि दीवारों के भी कान होते हैं ! पर वे बोल नहीं सकतीं ! पर उन कानों से हो कर गुजरने वाली  हवाओं की फुसफुसाहट सब कुछ बयान कर देती हैं ! गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक ने बिना कहे हरिया की जिम्मेवारी संभाल ली थी और इधर महानगर में, देश की राजधानी में, मेरे एक ही मकान के चार फ्लोरों की सीमित सी जगह में तीन परिवारों को पता नहीं है कि चौथी मंजिल पर मैं हफ्ते भर से बाहर नहीं निकला हूँ, बीमार हूँ ..........! 

#हिंदी_ब्लागिंग 

अंधेरा गहराने लगा था ! शाम का पल्लू थामे रात धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाते आ रही थी ! हरिया की तबियत पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रही थी ! पर उठना तो था ही ! गांव-देहात में अभी भी संध्या समय बिस्तर पर पड़े रहना अच्छा नहीं समझा जाता ! वैसे भी घर में दीया-बाती भी तो करनी थी ! परबतिया को आज ही ना चाहते हुए भी हरिया को इस हालत में छोड़ जरुरी काम से मायके जाना पड़ गया था ! दो ही जनों का तो परिवार था !  

हरिया पूजास्थल पर दीपक जला कर मुड़ा ही था कि खिड़की से उसे दूर से तपन माली आता दिखाई पड़ा ! गांव में इस समय ऐसे दिनों में बाहर निकलना अजूबा ही होता है ! हरिया खिड़की पर खड़ा हो उसे तकने लगा ! तपन के कुछ और नजदीक आने पर दिखा कि वह कंधे पर कंबल और हाथों में एक थैला और लालटेन भी लिए है ! गांव में बिजली थी पर कब चली जाए ठिकाना नहीं था ! कहीं जा रहा होगा जरुरी काम से, यह सोच हरिया वापस अपनी खाट पर आ बैठा ! वैसे भी इन दोनों परिवारों का कोई खास मेल-जोल नहीं था !

हरिया का घर  गांव के पूर्वी छोर पर है और तपन का ठीक दूसरे पश्चिमी छोर पर ! गांव को मुख्य सड़क से तीन पगडंडिया जोड़ती हैं ! इसे सड़क तक जाना था तो बाजार के बीच से नजदीक पड़ता ! ठंड के दिनों में इस वक्त बिना काम कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलता ! कंबल और लालटेन भी लिए है, कहीं दूर ही जा रहा होगा ! हरिया कमरे में आ तो गया था पर दिमाग उसका तपन में ही उलझा हुआ था !  इसी पेशोपेश में उसके घर के दरवाजे पर दस्तक हुई !

हरिया ने दरवाजा खोला ! सामने तपन खड़ा था ! उसने अभिवादन किया ! हरिया ने उसे अंदर आने को कहा ! हरिया के चेहरे की प्रश्नवाचक मुद्रा को देख तपन ने ही कहना शुरू किया ! काका, आपके लिए खाना लाया हूँ ! आपकी बहू कह रही थी कि पारबती काकी बाहर गईं हैं काका अकेले हैं उनकी तबियत भी ठीक नहीं है, सो रात को उनके पास ही रुक जाना ! सुबह ही उसने पता कर लिया था कि दोपहर का खाना और शाम की चाय रतनी बुआ पहुंचा गईं हैं ! इसीलिए मेरा अब आना हुआ ! हरिया अभिभूत था, उसने तपन और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया और उसके आराम की व्यवस्था कर सोचने लगा प्रभु किसी को भी बेसहारा नहीं छोड़ते !

हालांकि दीवारों के भी कान होते हैं ! पर वे बोल नहीं सकतीं ! पर उन कानों से हो कर गुजरने वाली  हवाओं की फुसफुसाहट सब कुछ बयान कर देती हैं ! नहीं तो सुबह जाते समय पारबती ने किसी को कुछ बताया थोड़े ही था, पर उसे विश्वास था कि हरिया अकेला नहीं रहेगा ! वह भी तो ऐसे मौकों पर दूसरों के लिए सदा खड़ी रहती है ! सारा गांव एक परिवार ही तो है ! गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक ने बिना कहे हरिया की जिम्मेवारी संभाल ली थी, बिना कोई एहसान जताए ! और इधर महानगर में, देश की राजधानी में, मेरे एक ही मकान के चार फ्लोरों की सीमित सी जगह में तीन परिवारों को पता नहीं है कि चौथी मंजिल पर मैं हफ्ते भर से बाहर नहीं निकला हूँ, बीमार हूँ ..........! 

रविवार, 23 अप्रैल 2023

फोन से लगाव, रिश्तों में अलगाव (मोबिकेट)

आज मोबाइल शिष्टाचार पर बात करना  करना ठीक ऐसा ही है जैसे किसी कॉलेज के छात्र को पांचवीं क्लास का कोर्स समझाया जा रहा हो ! अधिकाँश लोग इन सब बातों को जानते भी हैं, पर फिर भी जाने-अनजाने चूक हो ही जाती है ! आज की दुनिया में यह भले ही एक वरदान है, लेकिन इसका अनुचित प्रयोग कभी-कभी दूसरों की परेशानी का सबब बन जाता है ! खास कर तब, जब यह बिना एहसास दिलाए आपकी लत में बदल चुका हो ! आज खुद को भोजन मिले ना मिले पर इसका 'पेट'भरे रहना, इसकी चार्जिंग की ज्यादा चिंता रहती है ! इसलिए यह जरुरी  हो गया है कि अभिभावक बचपन से ही अपने बच्चों को "मोबिकेट" से अवगत कराते रहें............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कल मेरे एक मित्र घर आए ! मैं लैप-टॉप पर अपना कुछ काम कर रहा था ! उनके आते ही मैंने उसे बंद कर उनका अभिवादन किया ! अभी आधे मिनट की दुआ-सलाम भी ठीक तरह से नहीं हुई थी कि उनका फोन घनघना उठा और वे उस पर व्यस्त हो गए ! बात खत्म होने के बाद भी वे उसमें निरपेक्ष भाव से अपना सर झुकाए कुछ खोजने की मुद्रा बनाए रहे ! इधर मैं उजबक की तरह उनको ताकता बैठा था ! बीच में एक बार मैंने एक मैग्जीन उठा उसके एक-दो पन्ने पलटे कि शायद भाई साहब को मेरी असहजता का कुछ एहसास हो ओर पर वे वैसे ही निर्विकार रूप से अपने प्रिय के साथ मौन भाव से गुफ्तगू में व्यस्त बने रहे ! हार कर मैं भी अपने कम्प्यूटर को दोबारा होश में ले आया ! हालांकि मुखातिब उनकी ओर ही रहा ! पर पता नहीं उन्हें क्या लगा या क्या याद आ गया कि वे अचानक उठ कर बोले, अच्छा चला जाए ! मैंने कहा, बस ! बैठो ! बोले, नहीं फिर कभी आऊंगा !   

मोबाइल फोन, आज हर आम और खास के लिए यह कितना महत्वपूर्ण बन गया है, इसके बारे में बात करना समय बर्बाद करना है ! आज खुद को भोजन मिले ना मिले पर इसका ''पेट'' भरे रहना, इसकी चार्जिंग, जरुरी है ! आज की दुनिया में यह भले ही एक वरदान है, लेकिन इसका अनुचित प्रयोग कभी-कभी दूसरों की परेशानी का सबब बन जाता है ! और खास कर तब, जब यह बिना एहसास दिलाए आपकी लत में बदल चुका हो ! सोचिए आप किसी के घर गए हैं, तो वह अपने दस काम छोड़ आपकी अगवानी करता है और आप हैं कि आपका फोन आपको छोड़ ही नहीं रहा ! मान लीजिए इसका उल्टा हो जाए, आप किसी के यहां जाएं और वह अपने फोन पर व्यस्त रहे, तो.......! 

घर के अलावा आज तो यह हालत हैं कि कुछ लोग ऑफिस पहुँच कर भी अपने फोन से बाहर नहीं निकल पाते ! मिटिंग हो, सामने क्लाइंट हो, जरुरी कागजात देखे-परखे जाने हों, जरुरी काम समय सीमा में निपटना हो, इनका फोन बीच में गुर्राने लगता है और ये सब कुछ छोड़ उसमें घुस जाते हैं बिना चिंता किए कि सामने वाले का समय बर्बाद हो रहा है ! बहुत जरुरी सूचना हो तो भी अलग बात है, बेकार के मीम या क्लिप को भी बिना पूरा हुआ नहीं छोड़ते ! मैंने तो ऐसे-ऐसे शख्स भी देखे हैं जो अपनई इन समय खाऊ बकवासों को अपने काम के लिए बैठे व्यक्ति को भी दिखाने से बाज नहीं आते ! कई तो अपना काम छोड़ फोन उठा बहार की तरफ चल देते हैं, चहलकदमी करते हुए, मोबाईल जो ठहरा ! इस लत के तहत, अनजाने ही सही, यदि किसी के साथ बात करते या सामने बैठे हुए आप अपने फोन पर ''अन्वेषण'' करते हैं तो सामने वाला अपने को उपेक्षित समझ, भले ही मुंह से कुछ न बोले, बुरा जरूर मान बैठता है भले ही अपनी जरुरत के लिए दांत निपोरता रहे !  

जानकारों ने, मनोवैज्ञानिकों ने, इस लत के लिए कुछ सुझाव दिए हैं ! उन पर अमल करना तो हमारा काम है, जिससे फिजूल की परिस्थितियां या माहौल पनपने ना पाएं ! इन सुझावों पर बात करना फिलहाल ऐसा ही है जैसे किसी कॉलेज के छात्र को पांचवीं क्लास का कोर्स समझाया जाए ! पर यह जरुरी भी है कि अभिभावक शुरू से ही अपने बच्चों को "मोबिकेट" की जानकारी से अवगत कराते रहें ! 

सबसे पहले तो फोन आने या करने पर अपना स्पष्ट परिचय दें ! ''पहचान कौन'' या ''अच्छा ! अब हम कौन हो गए'' जैसे वाक्यों से सामने वाले के धैर्य की परीक्षा ना लें ! हो सकता है कि आपने जिसे फोन किया हो उसके बजाए सामने कोई और हो, जो आपकी आवाज ना पहचानता हो !फोन करते समय सामने वाले का गर्मजोशी और खुशदिली से अभिवादन करें ! आपका लहजा ही आपकी छवि घडता है ! स्पष्ट, संक्षिप्त और सामने वाले की व्यस्तता को देख बात करें ! बात करते समय किसी का भी तेज बोलना या चिल्लाना अच्छा नहीं माना जाता, फिर भले ही वह आपका लहजा हो या फिर फोन की रिंग-टोन ! हमेशा विनम्र रहें और अभद्र भाषा के प्रयोग तथा किसी को कभी भी फोन करने से बचें। गलती से गलत नंबर लग जाए तो क्षमा जरूर मांगें !

जब भी आपसे कोई आमने-सामने बात कर रहा हो तो मोबाईल पर बेहद जरुरी कॉल को छोड़ ना ज्यादा बात करें नाहीं स्क्रॉल करें ! वहीं ड्राइविंग के वक्त, खाने की टेबल पर, बिस्तर या टॉयलेट में तो खासतौर पर मोबाइल न ले जाएं । इसके अलावा अपने कार्यस्थल या किसी मीटिंग के दौरान फोन साइलेंट या वाइब्रेशन पर रखें और मेसेज भी न करें ! कुछ खास जगहों या अवसरों, जैसे धार्मिक स्थलों, बैठकों, अस्पतालों, सिनेमाघरों, पुस्तकालयों, अन्त्येष्टि इत्यादि पर बेहतर है कि फोन बंद ही रखा जाए  !

इन सब के अलावा कुछ बातें और भी ध्यान देने लायक हैं ! कईयों की आदत होती है दूसरों के फोन में ताक-झांक करने की जो कतई उचित नहीं है नाहीं बिना किसी की इजाजत उसका फोन देखने लगें ! बिना वजह कोई भी एसएमएस दूसरों को फारवर्ड ना करें, जरूरी नहीं कि जो चीज आपको अच्छी लगे वह दूसरों को भी भाए ! आजकल मोबाइल में कैमरा, रिकॉर्डर और ऐसी अनेक सुविधाएं होती हैं। इन सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल न कर जरूरत के वक्त ही इस्तेमाल करें !  

आज ध्यान में रखने की बात यह है कि यदि आधुनिक यंत्रों का आविष्कार यदि हमें तरह-तरह की सुख-सुविधा प्रदान कर रहा है, तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हमारी सहूलियतें दूसरों की मुसीबत या असुविधा ना बन जाएं !  

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

सोमवार, 9 नवंबर 2020

इसलिए होता है मूल से अधिक ब्याज प्यारा

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो ...................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी इंसान के दादा-दादी बनने पर उनके अपने पोते-पोतियों से स्नेह-अनुराग को लेकर, ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत है कि ''मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।'' इसका कतई यह मतलब नहीं है कि उसे अपने बच्चों से लगाव नहीं होता ! पर काम का बोझ, पारिवारिक दायित्व व जिम्मेदारियां, जीवन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिशें, चाहते हुए भी, उसे इतना समय ही नहीं देतीं कि वह प्रभु-प्रदत्त इस नियामत के बढ़ने-फलने-फूलने का पूरा आनंद उठा सके। पर अपनी इस तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक दायित्वमुक्त हो चुका होता है। काफी कुछ हासिल कर चुका होता है ! पहले की तरह जीवन में आपाधापी नहीं रह जाती ! सो अफरात समय भी उपलब्ध रहता है। इसी से जब वह प्रभु की इस अद्भुत, अप्रतिम, सर्वोत्तम कृति को शिशु रूप में अठखेलियां करते देखता है, जो वह अपने समय में नहीं देख पाया थाा, तो वह अचंभित, मुग्ध व चित्रलिखित सा हो मोह में बंध कर रह जाता है। 

सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो 

कहा जाता है कि बच्चे प्रभु का रूप होते हैं ! पर प्रभु को भी इस धरा को, प्रकृति को, सृष्टि को बचाने के लिए कई युक्तियों तथा नाना प्रकार के हथकंडों का सहारा लेना पड़ा था ! पर निश्छल व मासूम शैशव, चाहे वह किसी भी प्रजाति का हो, छल-बल, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा सबसे परे होता है, इसीलिए वह सबसे अलग होता है, सर्वोपरि होता है। भगवान को तो फिर भी इंसान को चिंतामुक्त करने में कुछ समय लग जाता होगा, पर घर में कैसा भी वातावरण हो, तनाव हो, शिशु की एक किलकारी सबको उसी क्षण तनावमुक्त कर देती है। गोद में आते ही उसकी एक मुस्कान बड़े से बड़े अवसाद को तिरोहित करने की क्षमता रखती है। उसकी बाल सुलभ हरकतें, अठखेलियां, जिज्ञासु तथा बड़ों की नक़ल करने की प्रवृति, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी होती हैं। उसकी अपने आस-पास की चीजों से तालमेल बैठाने की सफल-असफल कोशिशें कठोर से कठोर चहरे पर भी मुस्कान की रेख खिंच देने में कामयाब रहती हैं। 

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो !   

मैं भी उसी श्रेणी से संबद्धित हूँ, इसीलिए यह कह पा रहा हूँ ! अपनी डेढ़ वर्ष की पौत्री की बाल चेष्टाओं, उसकी गतिविधियों, उसकी मासूमियत भरी हरकतें देख यह अहसास होता है कि जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कुछ खो दिया था ! किस नियामत से वंचित रह गया था ! उपलब्धियों की चाहत में कितना कुछ अनुपलब्ध रह गया था ! पर आज दिल की गहराइयों से प्रभु का शुक्रगुजार हूँ कि समय रहते उन्होंने मुझे इस दैवीय सुख से परिचित करवा दिया ! सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो ! पर इसके साथ ही कभी-कभी एक अजीब सी ,बेचैनी, एक अलग सा भाव, कुछ खो जाने का डर भी महसूसने लगता हूँ ! क्योंकि यह तुतलाती जुबां, डगमगाती चाल, अठखेलियां, मासूम हरकतें समय के चंगुल से कहाँ बच पाएंगी ! फिर वही पाठ्यक्रमों का बोझ, स्कूलों की थकान भरी बंदिशें, दुनियावी प्रतिस्पर्द्धा और ना जाने क्या-क्या हावी होती चले जाएंगे ! पर कुछ किया भी तो नहीं जा सकता जग की इस रीत के विपरीत...............!! 

जी तो करता है कि इसकी मासूमियत, निश्छलता, भोलापन यूँ ही बने रहें ! इसी तरह अपनी तोतली भाषा में हमसे बतियाती रहे ! इसी तरह सुबह डगमगाती हुई आ गोद में चढने की जिद करती रहे ! यूँ ही इसकी किलकारियों से घर गुंजायमान रहे ! पर समय.....! किसका वश चल पाया है उस पर ! इसीलिए कोशिश करता हूँ कि इन पलों को बाँध के रख लूँ ! या फिर जितना ज्यादा हो सके, समेटता ही चला जाऊं, समेटता ही चला जाऊं, और सहेज के रख लूँ दिलो-दिमाग के किसी बहुत ही सुरक्षित कोने में, धरोहर बना कर !    

रविवार, 10 मई 2020

माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है

वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए  ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है, जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त यह सबसे बड़ी नेमत है, जिसका कोई सिला नहीं ! माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी ख़ुशी के एवज में भी बच्चों की ख़ुशी ही मांगती है !
माँ, पिकासो की अमर कृति 
जिस माँ के बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया....! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है; तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह खुद को धन्य मानता है !
वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहेगी। ख़ुशी में सबके साथ खुश और दुःख में आगे बढ़, ढाढस दे आंसू पोछंती रहेगी। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है।

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बिना राजधानी वाला दुनिया का इकलौता देश

ना उरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र ...