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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

व्यस्त रहें, मस्त रहें

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब कर्मविहीन इंसान, खासकर सेवानिवृत्त, वेल्ला होता है तो ऐसे में वह बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है ! उस समय उसे बीते समय की खुशनुमा बातें तो कम याद आती हैं, उल्टे बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग, कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुजरे लम्हों की जैसे फिल्मी रील सी चलने लगती है। ऐसा ना हो तो फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। 
बेल्लापन 
सीलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। व्यस्तता ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात, शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी, कैसा भी, कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 
कब्जा 
एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे सही-गलत, कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे उसका आवास चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे, पर नाम ऐसा बदनाम है कि उसका किया-धरा सब कुछ लोगों को शैतानियत ही लगता है ! 
खुशहाली 
एक सच्चाई यह भी है कि इंसान के व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर उसके परिवार की शांति और सकून पर भी पड़ता है। क्योंकि घर के अन्य लोग, उसकी बेवजह दखलंदाजी, फिजूल के हस्तक्षेप, बिन मांगी सलाहें, बेकार की टोका-टाकी, बार-बार की चाय-पानी की पानी की फरमाइश से बचे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्य व आत्मीय-जन सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

विभिन्न रुचियां 
तो लब्बो-लुआब यह है कि यदि हम अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई जरिया ढूंढ लेते हैं, जिसमें व्यस्त रहते हुए खुशी और संतुष्टि भी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसा हो तो यह तय है कि दिमाग दुरुस्त व शरीर चुस्त तो रहेगा ही, साथ-साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईए है ! 
  
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

सोमवार, 4 नवंबर 2024

दीपक, दीपोत्सव का केंद्र

अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है.......................!         

#हिन्दी_ब्लागिंग  

दीपोत्सव  फिर आने का वादा कर समय-चक्र पर सवार हो विदा ले गया ! साल की सबसे घनघोर काली रात के भय से उबारने वाला यह त्यौहार सदा याद दिलाता रहता है, अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश की ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है !   

दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पावन पर्व है। हम भारतवासियों का दृढ विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है, झूठ का नाश होता है ! दीपावली भी यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय ! अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे दीपक रौशनी के सिपाही बन, अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद, एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके। 

अपनी छोटी सी पर सार्थक जिंदगी के पश्चात दीपक बुझ तो जरूर जाता है पर उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाता ! इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और खुशी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है। बाहरी संसार को रौशन करने के उसके इस प्रयास के साथ ही कितना अच्छा हो यदि हमारी यह कोशिश रहे कि जगत में उजास बनाए रखने के साथ ही हम अपने अंतस में छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य जैसे तमस को भी दूर कर दें ! जिससे मानव मात्र के भले के साथ ही देश-समाज-जगत में भी सुख-शांति-चैन का माहौल स्थापित हो सके ! 

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को हृदय की गहराइयों से हार्दिक शुभकामनाएं !परमपिता की असीम कृपा से सब लोग सपरिवार, स्वस्थ, प्रसन्न व सुरक्षित रहें ! सुख-शांति का वास हो ! आने वाला समय सभी के लिए शुभ और मंगलमय हो ! सब का जीवन पथ सदा प्रशस्त व आलोकित रहे ! यही कामना है !    

गुरुवार, 15 जून 2023

दिल की जुबान हैं, आंसू

ऐसा समझा या माना जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं ! पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं ! उनका मन रोगी हो सकता है ! ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है ! तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं ! पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रहे कि आप के कारण किसी  के  आंसू ना  बहें .........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

दुनिया में शायद ही कोइ ऐसा इंसान होगा जिसकी आंखों से कभी आंसू न बहे हों ! जीवन के विभिन्न  हालातों, परिस्थितियों, घटनाओं  से इनका अटूट संबंध रहता है। समय कैसा भी हो, दुख का, पीड़ा का, ग्लानी का, परेशानी का, खुशी का, यह नयन जल, नयनों का बांध तोड़ खुद को उजागर कर ही देता है ! मन की विभिन्न अवस्थाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप आंखों से बहने वाला, जब भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं तो मन को संभालने वाला, दुःख के समय मन को हल्का करने वाला, सुख के अतिरेक में भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम, हमारे शरीर का साथी है, यह "अश्रु" ! इतना ही नहीं सामान्य अवस्था में यह हमारी आंखों को साफ तथा कीटाणु-जीवाणु मुक्त भी रखता है। 
आंसू
इसके सामान्यतया तीन रूप होते हैं ! पहले हैं बेसल आंसू ! जो आंखों में नमी तथा स्नेहन की स्थिति बनाए रखते हैं, जिससे आँख साफ रहती है और आंखों का सूखेपन से होने वाले नुक्सान से बचाव होता है ! दूसरे होते हैं रीफ्लेक्स आंसू ! वह जल जो कभी धूल-कण या किसी कीड़े वगैरह के आँख में पड़ जाने से आंखों भर आता है, जिससे अवांछित वस्तु आँख से बाहर आ जाती है और तीसरा जो सबसे अहम् है, वह है साइकिक आंसू ! रुदन-समय पर बहने वाला रूप ! आंसू  हमारी मनोदशा को भी उजागर कर देते हैं ! दुख या सुख में निकलने वाले आंसू जाहिर कर देते हैं कि व्यक्ति खुश है या दुखी ! इसीलिए शायरों ने इन्हें दिल की जुबान कहा है ! वैसे बीमारी तथा भोज्य पदार्थ की तीक्ष्णता इत्यादि के कारण भी यह आंखों से बहने लगते हैं !  

आंसू का निर्माण "लैक्रिमल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं ! इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं ! वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है यानी एक चम्मच आंसू तकरीबन सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है !

इन आंसुओं के बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से रिसर्च कर रहे हैं ! प्रकृति की इस विलक्षण देन के अनुसंधान से कई अनोखे तथ्य सामने आए हैं ! जर्मन शोध की मानें तो महिलाएं, पुरुषों से अधिक रोती हैं ! महिलाओं के आंसुओं से संबंधित ग्लैंड पुरुषों से अधिक सक्रीय होते हैं और उनकी बनावट भी अलग होती है ! वैसे भी महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं ! अब लोगों के "घंटों रोने" की बात मुहावरा बन चुकी है, क्योंकि आमतौर पर महिलाएं औसतन एक बार में कम से कम छह मिनट तक रोती हैं, जबकि पुरुषों के लिए आंसू बहने की अवधि आमतौर पर दो से चार मिनट तक ही होती है !    

बहुत छोटे बच्चे जब रोते हैं तो उनके आंसू नहीं बहते ! लगभग छः माह की उम्र होने तक रोने पर भी बच्चों की आँख से आँसू नहीं निकलते सिर्फ रोने की आवाज ही आती है ! आंसू बनाने वाला लैक्रिमल ग्लैंड आंखों के ऊपरी हिस्से में स्थित होता है ! बहुत अधिक आंसू बनने की दशा में ये आँखों से बाहर आने के साथ-साथ श्वास नली में भी चले जाते हैं, जिससे नाक बहने लगती है ! प्याज काटते वक्त इससे निकलने वाला ऑक्साइड, लैक्रिमल ग्लैंड को प्रभावित करता है ! यही वजह है प्याज काटते वक्त आंखों में जलन के साथ आंसू निकलते हैं। 
दुःख के आंसू 
प्राणी शास्त्रियों का कहना है कि सिर्फ बंदर ही ऐसा जीव है, जो दुख या तकलीफ में हमारी तरह आंसू बहाता है ! जानवर हमारी तरह आंसू बहाकर अपना दुख व्यक्त नहीं करते हैं। फिर भी जानवरों की आंखों से जो आंसू निकलते देखे जाते हैं, उनका जानवरों के दुख और तकलीफ से कोई लेना-देना नहीं है ! वह उनकी आँखों को साफ़ रखने की प्राकृतिक क्रिया है ! हम जब रोते हैं तो हमारी आंखों के चारों ओर की मांसपेशियों में खिंचाव होता है और हमारी अश्रुग्रंथियों पर दबाव पड़ता है, जिसकी वजह से आंसू बह निकलते हैं पर जानवरों में इस तरह की मांसपेशियां होती ही नहीं हैं ! उनका अपने दुःख-तकलीफ को जाहिर करने का दूसरा तरीका होता है !
खुशी के आँसू 
ऐसा समझा या माना जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं ! पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं ! उनका मन रोगी हो सकता है ! ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है ! तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं ! पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रहे कि हमारे कारण किसी और के आँसूं ना  बहें !
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आंसू की इस परिभाषा का भी ध्यान रखें -
It is a Hydraulic force through which Masculine WILL POWER defeated by Feminine WATER POWER. 😅

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...