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रविवार, 29 दिसंबर 2024

इतिहास किसी के प्रति भी दयालु नहीं होता

इतिहास नहीं मानता किन्हीं भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी.............!

#हिंदी_ब्लागिंग 

हमारे पुराणों में शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है ! मान्यता है कि वह संसार के सभी प्राणियों को बिना किसी किसी भेदभाव, बिना किसी पक्षपात, बिना किसी दया-माया के उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं ! उनकी इसी न्याय प्रक्रिया के कारण डरते हैं लोग उनसे ! उन्हें क्रूर माना जाता है। इतिहास भी कुछ-कुछ वैसा ही है। यह भले ही कर्मों का फल ना देता हो, पर हर हाल में उनको उजागर जरूर करता है,  बिना कुछ छिपाए ! इस मामले में वह बड़ी निर्ममता से शल्य चिकित्सा करता है ! किसी की नहीं सुनता। इसीलिए कहा जाता है कि उससे सबक लेना चाहिए ! सीखना चाहिए उससे !

इतिहास कभी भी भेदभाव नहीं करता, नाहीं वह किसी का पक्ष लेता है ! सत्ताधीश उसे विकृत करने की कितनी भी कोशिश कर लें ! कुछ समय के लिए भले ही उस पर अपना मुखौटा मढ़ दें ! उसे जमींदोज कर उस पर झूठ का प्लास्टर चढ़ा दें, पर उसके सच का बीज इतना ताकतवर है कि वह हर विपरीत परिस्थिति को दरकिनार कर अंकुरित हो कर ही रहता है, कुछ समय भले ही लग जाए !

हमारी अच्छी या बुरी जो भी कह लें परंपरा रही है कि किसी के निधन के बाद उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए, पर इतिहास तो नहीं ना मानता ऐसी भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी ! 

आज यानी वर्तमान में जो लिखा-बोला जा रहा है वही समयानुसार इतिहास बनेगा ! परंपरानुसार दो-चार दिन की बात छोड़ दें, भले ही मजबूरीवश, तो उसके बाद शालीनता, मृदु भाषा, सहनशीलता की पूरी विवेचना तो होगी ही, साथ ही साथ लिप्सा, कमजोरी, लियाकत, आत्म सम्मान हीनता का भी पूरा लेखा-जोखा लिया जाएगा ! देश, समाज का कितना भला हुआ और कितना नुक्सान उसका आकलन होगा और फिर जो निर्मम सत्य सामने आएगा, वही आगे चल कर इतिहास बनेगा जो ना किसी के साथ दयालुता बरतता है ना हीं बिना बात कठोरता.........!

सोमवार, 4 नवंबर 2024

दीपक, दीपोत्सव का केंद्र

अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है.......................!         

#हिन्दी_ब्लागिंग  

दीपोत्सव  फिर आने का वादा कर समय-चक्र पर सवार हो विदा ले गया ! साल की सबसे घनघोर काली रात के भय से उबारने वाला यह त्यौहार सदा याद दिलाता रहता है, अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश की ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है !   

दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पावन पर्व है। हम भारतवासियों का दृढ विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है, झूठ का नाश होता है ! दीपावली भी यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय ! अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे दीपक रौशनी के सिपाही बन, अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद, एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके। 

अपनी छोटी सी पर सार्थक जिंदगी के पश्चात दीपक बुझ तो जरूर जाता है पर उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाता ! इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और खुशी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है। बाहरी संसार को रौशन करने के उसके इस प्रयास के साथ ही कितना अच्छा हो यदि हमारी यह कोशिश रहे कि जगत में उजास बनाए रखने के साथ ही हम अपने अंतस में छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य जैसे तमस को भी दूर कर दें ! जिससे मानव मात्र के भले के साथ ही देश-समाज-जगत में भी सुख-शांति-चैन का माहौल स्थापित हो सके ! 

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को हृदय की गहराइयों से हार्दिक शुभकामनाएं !परमपिता की असीम कृपा से सब लोग सपरिवार, स्वस्थ, प्रसन्न व सुरक्षित रहें ! सुख-शांति का वास हो ! आने वाला समय सभी के लिए शुभ और मंगलमय हो ! सब का जीवन पथ सदा प्रशस्त व आलोकित रहे ! यही कामना है !    

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

ना वैसे सिंहासन रहे नाहीं वैसे आरूढ़ होने वाले

शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! भले ही इसके लिए उसकी चारों ओर से लानत-मलानत हो रही हो..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 70-80 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था ?
सिंहासन 
हमारे साहित्य ग्रंथों में राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है, वह शायद ही किसी और सम्राट या नायक के लिए हुआ हो। कहते हैं कि उनके पराक्रम, शौर्य, न्यायप्रियता, कला-मर्मज्ञता तथा दानशीलता से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें एक दिव्य रत्नजड़ित स्वर्णिम सिंहासन उपहार में दिया था ! इसमें 32 पुत्तलिकाएं यानी पुतलियां लगी हुई थीं ! उसी पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढ़नी पड़ती थीं। हर सीढ़ी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी, जिससे कोई अयोग्य उस पर आसनारूढ ना हो जाए !  
न्याय का हथौड़ा 
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था कि कहीं इसका दुरूपयोग ना हो ! कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा, तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन, क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं ? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं ! फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना, उस को ग्रहण किया, यह नहीं कि अपने रसूख का दुरूपयोग कर जबरन उसे हासिल कर लिया हो ! 
सर्वोच्च 
यह तो पुरानी बात हो गई। पर हमारे समय के दिग्गज कथाकारों की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो अपनी बुद्धिमत्ता, कुशाग्रता तथा लियाकत से यह सम्मान पाते थे ! इन गरिमामय आसनों पर बैठने के पश्चात, किसी भी प्रकार का भेदभाव, दवाब या पक्षपात ना कर न्याय और सिर्फ न्याय किया करते थे, चाहे उनके सामने कोई भी वादी-प्रतिवादी खड़ा हो ! इसीलिए लोगों को उन पर अटूट विश्वास होता था और वे आदर के पात्र बने रहते थे ! 
न्यायस्थल 
पर अब समय बहुत कुछ बदल चुका है ! दुनिया के हर क्षेत्र की तरह न्याय का यह पावन स्थल भी बुराइयों से अछूता नहीं रह गया है ! कुछ लोगों द्वारा इसे हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद हर तरह की नीति अपनाई जाने लगी है। योग्यता या काबिलियत ठगी सी रह जाती हैं, इस प्रकार के उपक्रमों को देख कर ! इसी कारण लोगों का विश्वास भी ऐसी प्रणाली से तिरोहित होने लगा है ! लोग हर फैसले को शक की निगाह से देखने लगे हैं !
कोर्ट रूम 
शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है !
विश्वास 
पर संतोष की बात है कि ऐसे लोग मुठ्ठी भर के ही हैं ! ऐसा भी नहीं है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से निराशा का पर्याय बन गया हो ! अभी भी अधिकांश कर्मठ लोग बिना किसी भय, लोभ, दवाब के अपने काम को सही ढंग से अंजाम देते आ रहे हैं ! जबकि उनको सदा जान-माल का खतरा बना रहता है ! पर उनका विवेक, उनका अंतर्मन, उनका आत्म विश्वास, उनकी निष्ठा उन्हें पथभ्रष्ट नहीं होने देती, भले ही उनके सामने कितना भी दुर्दांत अपराधी क्यों ना खड़ा हो ! इसीलिए सेवानिवृति के पश्चात भी उनकी गरिमा, उनका सम्मान, उनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है ! पर वही बात है कि ओछे लोगों की हरकत आजकल ज्यादा प्रचार पाती है और कर्तव्यनिष्ट लोग गुमनामी की धुंध में अलक्षित से रह जाते हैं ! 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...