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रविवार, 29 दिसंबर 2024

इतिहास किसी के प्रति भी दयालु नहीं होता

इतिहास नहीं मानता किन्हीं भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी.............!

#हिंदी_ब्लागिंग 

हमारे पुराणों में शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है ! मान्यता है कि वह संसार के सभी प्राणियों को बिना किसी किसी भेदभाव, बिना किसी पक्षपात, बिना किसी दया-माया के उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं ! उनकी इसी न्याय प्रक्रिया के कारण डरते हैं लोग उनसे ! उन्हें क्रूर माना जाता है। इतिहास भी कुछ-कुछ वैसा ही है। यह भले ही कर्मों का फल ना देता हो, पर हर हाल में उनको उजागर जरूर करता है,  बिना कुछ छिपाए ! इस मामले में वह बड़ी निर्ममता से शल्य चिकित्सा करता है ! किसी की नहीं सुनता। इसीलिए कहा जाता है कि उससे सबक लेना चाहिए ! सीखना चाहिए उससे !

इतिहास कभी भी भेदभाव नहीं करता, नाहीं वह किसी का पक्ष लेता है ! सत्ताधीश उसे विकृत करने की कितनी भी कोशिश कर लें ! कुछ समय के लिए भले ही उस पर अपना मुखौटा मढ़ दें ! उसे जमींदोज कर उस पर झूठ का प्लास्टर चढ़ा दें, पर उसके सच का बीज इतना ताकतवर है कि वह हर विपरीत परिस्थिति को दरकिनार कर अंकुरित हो कर ही रहता है, कुछ समय भले ही लग जाए !

हमारी अच्छी या बुरी जो भी कह लें परंपरा रही है कि किसी के निधन के बाद उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए, पर इतिहास तो नहीं ना मानता ऐसी भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी ! 

आज यानी वर्तमान में जो लिखा-बोला जा रहा है वही समयानुसार इतिहास बनेगा ! परंपरानुसार दो-चार दिन की बात छोड़ दें, भले ही मजबूरीवश, तो उसके बाद शालीनता, मृदु भाषा, सहनशीलता की पूरी विवेचना तो होगी ही, साथ ही साथ लिप्सा, कमजोरी, लियाकत, आत्म सम्मान हीनता का भी पूरा लेखा-जोखा लिया जाएगा ! देश, समाज का कितना भला हुआ और कितना नुक्सान उसका आकलन होगा और फिर जो निर्मम सत्य सामने आएगा, वही आगे चल कर इतिहास बनेगा जो ना किसी के साथ दयालुता बरतता है ना हीं बिना बात कठोरता.........!

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

बोया पेड़ बबूल का तो.....!!

क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, इस पेड़ को ही चुन कर लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही हो.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत पुरानी कहावत है, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय ! भले ही इसकी अन्तर्निहित सीख यही है कि बुरे काम का अच्छा नतीजा नहीं मिल सकता। पर दूसरी तरफ इस मुहावरे को सुन कुछ ऐसा नहीं लगता कि जैसे बबूल का पेड़ लगाने वाले ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो और आम जैसे महत्वपूर्ण, फलदार वृक्ष की जगह इस बेकार, कंटीले व अनुपयोगी से पेड़ को लगा दिया हो ! चलो, यदि लगा भी दिया, तो फिर वह इससे आम की उम्मीद क्यों करेगा ! फिर सवाल यह भी उठता है कि ऐसा कह कौन रहा है, और किससे कह रहा है, और वह कौन है जो चुपचाप सुने जा रहा है ! कहता क्यों नहीं कि बबूल अपनी जगह आम के पेड़ से किसी भी तरह कमतर नहीं है ! 

सोचने की बात है, क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, चुन कर ही इस पेड़ को ही  लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग, पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही रहा हो ! जिसने इंसान, समाज और पशुओं तक की भलाई को ध्यान में रख अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए इस बहूपयोगी वृक्ष का रोपण किया हो ! अगर ऐसा है तो वह इस वृक्ष से आम की उम्मीद क्यों करेगा ! 

 
यदि मान लें  कि पौधा लगाने  वाला  कोई भोला बंदा था. जिसे  वनस्पतियों के  बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  इसी  लिए वह अपने बबूल के पेड़ से  आम के फल की आस लगाए बैठा रहा  तो  उसे आम का  बतला कर बबूल का पौधा  किसने थमाया !  फिर वर्षों उसे  जलील  कर नसीहतें देता रहा !  इस पर  भी यदि  वह भोला बंदा अपने बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद लगाए बैठा रहा,  तो उसके आस - पास के  किसी  भलेमानुष  ने  उसे  सच्चाई क्यों  नहीं बताई !  क्यों उसे  प्रताड़ित  करवा, उदाहरण बना  दूसरों को ज्ञान बांटना शुरू कर दिया गया ! 

                                      
वैसे तो दोनों की पेड़ों की तुलना करना ही उचित नहीं है। दोनों वृक्षों की अपनी-अपनी खूबियां हैं, अपनी-अपनी विशेषताएं हैं ! बबूल में जो औषधीय गुण हैं वे आम में नहीं हैं और जो स्वाद, मिठास व दूसरी खूबियां आम में हैं वे बबूल में नहीं हैं। कायनात ने बनाया ही इस तरह है कि जो बात आम में है वह बबूल में नहीं हो सकती और जो खासियतें बबूल में हैं उन्हें किसी दूसरे वृक्ष में खोजना तो नासमझी ही होगी ! मरू-भूमि में उगने वाले काँटेदार बबूल की अहमियत जाननी हो तो वहाँ के स्थानीय निवासियों से इसके बारे में पूछ कर देखें, जिनके लिए यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है।फिर आम और बबूल ही क्यों, संसार की किसी भी वनस्पति की एक दूसरे से तुलना करना या किसी को कम आंकना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सब अपनी-अपनी विशेषताएं, गुण तथा उपयोगिताएं लिए होते हैं। सबकी अपनी अलग-अलग पहचान होती है ! 

                           
ऐसी मान्यता है कि बबूल के पेड़, जिसे कीकर भी कहा जाता है, पर देवताओं का वास होता है। प्राचीन काल में इसकी पूजा की जाती रही है। इसको अत्यंत शुभ, पावन और वैभवदाई माना जाता है। इसका प्रत्येक भाग किसी न किसी उपयोग में जरूर आता है। इसकी लकड़ी औरों की बनिस्पत काफी मजबूत व क्षयरोधी होती है। चाहे मरुभूमि का फैलाव हो या पानी का कटाव इसके होते इन दोनों से बचाव हो जाता है। इसीलिए इसको काटना या नष्ट करना निषेद्ध माना गया है। ऐसे पेड़ की किसी दूसरे वृक्ष से तुलना कर इसे हेय करार देना नादानी ही मानी जानी चाहिए ! अब यह दूसरी बात है कि महान संत, समाज सुधारक को बुराई की तुलना के लिए यही पादप मिला ! 

शुक्रवार, 29 मई 2020

वे भी मेरी निष्पक्षता और मंतव्य को समझते थे।

आजकल लॉकडाउन में बिटिया ऋद्धिमा, पुत्रवधु, जिसे घर में रिद्धि या रिद्दु कह कर ही बुलाते हैं, अक्सर कुछ नया व्यंजन बना उसे ''लॉक'' कर, मेरी राय जानना चाहती है ! उस पदार्थ का उसके हाथों पहली बार धरा पर अवतरण होने के कारण उसकी ऐसी जिज्ञासा का होना स्वाभाविक भी है ! जब उसे सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल जाती है तब उसकी मांग मुझसे  ''आउट ऑफ़ टेन'' कुछ नंबर पाने की हो जाती है जो मेरे द्वारा सात-साढ़े सात से ऊपर नहीं जा पाता !


कुछ सालों पहले रायपुर में बी.एड. के छात्र-छात्राओं के पुष्प सज्जा, मूर्तिकला व रंगोली इत्यादि की स्पर्धा में अक्सर मुझे जज की भूमिका निभाने का अवसर मिलता रहता था। छात्रों को मुझसे हौसलाअफजाई और सलाह तो मिल जाती थी पर स्पर्द्धा के दौरान उन्हें मुझसे औरों की बजाय कुछ कम ही नंबर मिल पाते थे। पर वे भी शायद मेरी निष्पक्षता और मंतव्य को समझते थे।  


अब एक कहानी - किसी नगर में एक बहुत ही निष्णात और निपुण शिल्पकार रहता था।  जिसकी ख्याति देश-विदेश में दूर-दूर तक फैली हुई थी। उसका एक ही लड़का था। अपनी कला की विरासत को ज़िंदा रखने के लिए शिल्पी ने अपने बेटे को शिल्प की बारीकियां समझा उसे हर तरह से निपुण कर दिया था। लड़के की कला भी मशहूर हो चुकी थी। अलग-अलग राज्यों से उसे बुलावा आने लगा था। सराहना के साथ-साथ दिनों-दिन पारितोषिकों में भी इजाफा होता चला जा रहा था। पर वह युवक जब भी अपने पिता से अपनी कलाकृति के बारे में पूछता तो पिता हर बार उसमें कोई ना कोई कमी निकाल देता था। लड़का और मनोयोग से अपनी कला को निखारने में जुट जाता था। एक बार उसने अपना सब कुछ झोंक कर एक बेहतरीन प्रतिमा बनाई ! लोग उसे देख दांतों तले उंगलियां दबाने लगे ! सभी ने यहां तक कि राजा ने भी उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। पर इस बार भी युवक कलाकार का पिता नाखुश ही रहा। उसके इस बर्ताव से युवक को दुःख के साथ-साथ क्रोध भी बहुत आया और उसने अपने पिता से कहा कि लगता है आप मेरी सफलता से ईर्ष्या करते हैं ! मेरी यशो-कीर्ति आपको अच्छी नहीं लगती। आप किसी दुर्भावना के तहत मेरी हर कृति में खामियां निकाल देते हैं ! ऐसा क्यों ? आज आपको बताना ही पडेगा ! अपने पुत्र की बात सुन शिल्पकार गंभीर हो गया ! पर आज समय आ पहुंचा था सच बताने का ! उसने अपने बेटे को शांत हो जाने को कहा और बोला कि मैं तुम्हें अपने से भी बड़ा शिल्पकार बनता हुआ देखना चाहता हूँ ! इसीलिए मैं तुम्हारी हर कलाकृति में मीन-मेख निकाला करता हूँ और इसीलिए अब तक तुम अपनी कला को और बेहतर करने के लिए जुट जाते थे। मुझे पता था कि जिस दिन मैंने तुम्हारी कला की प्रशंसा कर दी; उसी दिन तुम संतुष्ट हो जाओगे ! और जब भी कोई कलाकार अपने काम से संतुष्ट हो जाता है उसी समय उसकी कला का एक तरह से अंत हो जाता है ! उसकी और बेहतर करने की भूख ख़त्म हो जाती है ! उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है ! ऐसा तुम्हारे साथ ना हो, तुम विश्व के महान शिल्पकार बन सको इसीलिए मेरा ऐसा व्यवहार हुआ करता था। पिता की बात सुन पुत्र की आँखों से आंसू बह निकले ! वह क्षमा माँगते हुए अपने पिता के चरणों में झुक गया। 


पता नहीं क्यों जब भी ऐसा कोई ''क्षण''  सम्मुख होता है तो यह पुरानी कहानी भी सामने आ खड़ी हो जाती है ! 

शनिवार, 9 मई 2020

यह वृक्ष का घमंड था या अन्याय का प्रतिरोध

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है.........


#हिन्दी_ब्लागिंग 

बचपन की कई किस्से कहानियों का पुनरावलोकन करने पर लगता है कि जैसे उनके मुख्य पात्र के साथ न्याय ना हुआ हो ! कहीं ना कहीं उसका संदेश अनकहा रह गया हो ! ऐसी ही एक कहानी है उस  वृक्ष की जो तूफ़ान का सामना करते हुए धराशाई हो गया था। 

वर्षों से एक कहानी पढाई/सुनाई जाती है कि किसी उपवन में एक छायादार आम का वर्षों पुराना वृक्ष था। विशाल, घना, सदाबहार, जिसकी छाया में इंसान हो या पशु सभी आश्रय व राहत पाते थे। उसकी ड़ालियों पर हजारों पक्षियों का बसेरा था। तने और जड़ में भी नाना प्रकार के जीव-जंतुओं ने आश्रय ले रखा था। उस पर लगने वाले फल बिना भेदभाव के सब की क्षुधा शांत करते थे। वह वृक्ष, वृक्ष ना होकर जैसे उन सब का अभिभावक सा बन गया था। 

समय का फेर। बरसात का मौसम था। रोज ही आंधी-पानी ने मिल कर जीवों का जीना दूभर कर रखा था। पर पेड़ की सघनता उनके लिए कवच का काम कर रही थी। जैसे कह रही हो कि मेरे रहते तुम सभी सुरक्षित हो। पर एक शाम, शायद उस दिन काल-वैसाखी थी, एक जबरदस्त तूफान उठा ! चारों और अंधेरा छा गया ! मूसलाधार पानी बरसने लगा ! आकाशीय बिजली लपलपा कर धरती छूने लगी ! वाओं ने तो जैसे सब कुछ उड़ा ले जाने की ठान ली थी ! छोटे-मोठे पेड़ तो कब के भू-लुंठित हो चुके थे ! ऐसा लगता था कि आज सारी कायनात ही खत्म हो कर रह जाएगी। ऐसे में भी वह वृक्ष अपने शरणागतों को साहस बंधाता खड़ा था ! जैसे कह रहा हो कि मेरे रहते तुम पर आंच नहीं आ सकती ! पर इधर तूफ़ान का जोर बढ़ता ही जा रहा था ! पानी लगातार बरसे जा रहा था ! हवाऐं और-और तेज होती जा रही थीं ! पूरी कोशिश के बावजूद भी वह पुराना, बुजुर्ग पादप प्रकृति के इस प्रचंड प्रकोप को सह नहीं पाया और जड़ से उखड़ गया।

दूसरे दिन उधर से एक ज्ञानी पुरुष अपने शिष्यों के साथ निकले। उस विशाल वृक्ष का हश्र देख उन्होंने अपने शिष्यों को उसे दिखा कर कहा कि देखो अहंकारी का अंत ऐसा ही होता है। घमंड़ के कारण यह विनाशकारी तूफान के सामने भी अकड़ा खड़ा रहा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। उधर वह कोमल घास विपत्ति के समय झुक गयी और अब लहलहा रही है। इसे कहते हैं बुद्धिमत्ता।

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है।

शनिवार, 2 मई 2020

गधे की गदहागिरी से मुल्ला नसीरुद्दीन को मिला सबक

आज के वेदव्यास अपने से ज्यादा दूसरे को विद्वान समझने की गलतफहमी नहीं पालते ! इसलिए सिर्फ अपना पढवाने की होड़ है ! इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़, पढ़ता भी कौन है ! बस सब लिखे जा रहे हैं ! लिख्खाड़ों की भरमार हो गई है ! विश्वास ना हो तो कोई भी पत्रिका उठा उसमें पैवस्त रचनाओं को देख लें ! दौड़ में बने रहने की मारम-मार है ! अब थोक के प्रोडक्शन में माल कहां से आ रहा है इसकी चिंता नहीं है ! ऑरिजिनल मिलता नहीं ज्यादातर असेम्बलिंग होती है ! ऐसे में गुणवत्ता का क्या काम ! कोई अपेक्षा भी नहीं करता.............! ऐसी ही एक असेम्बल्ड गल्प; अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं  

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कुछ दिनों पहले मुल्ला नसीरुद्दीन की एक कहानी को साझा करने चला तो अचानक आड़े-टेढ़े ख्यालों ने भरमा कर दिमाग को मुख्य पटरी से लूप लाइन पर धकेल दिया ! सो कहानी वहीं की वहीं रह गई। अब ख्याल भले ही आंके-बांके हों पर कुछ ना कुछ सच्चाई तो होती ही है उनमें भी, जो यह बता रही थी कि इस सीधी-सादी गल्प का भी आजकल के विद्वान कुछ का कुछ अर्थ निकाल इसको कहीं के कहीं ले जाएंगे ! फिर सोचा अपने यहां खुद को छोड़ बाकियों को कुछ भी समझने-समझाने की आजादी है..........! अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं।  तो कहानी कुछ इस प्रकार है कि -
एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन को बैठे-बैठे यह ख्याल आया कि जैसे मैं सांझ-सबेरे छत पर चढ़ कर दुनिया-जहान का लुत्फ़ उठाता हूँ, उसका जायजा लेने का हक़ उसके प्यारे गधे को भी है ! सो दूसरे दिन अल-सुबह वह गधे को छत पर चढ़ाने को तैयार हो गया। गधे के लिए यह एक नई मुसीबत थी, वह सीढ़ी पर पैर रखने तक को तैयार नहीं था ! काफी मेहनत-मशक्कत, लाड-प्यार, धक्कम-धुक्की, खींच-तान के बाद किसी तरह मुल्ला ने गधे को छत पर ला खड़ा कर ही दिया। अब गधा तो गधा वह इस मुकाम की अहमियत जाने बिना वहां भी सर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा ! कुछ देर बाद जब मुल्ला ने देखा कि उसके गधे को छत से दिखती नियामतों में कोई रूचि नहीं है तो उसने नीचे उतरने के लिए जब गधे को पुचकारा तो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। मुल्ला ने हर तरकीब आजमा ली पर गधे को हिलना तक गवारा नहीं था। जैसे बदला ले रहा हो अपने को छत पर चढाने का ! थक-हार कर मुल्ला उसको वहीं छोड़ नीचे चला आया। पर कुछ देर बाद ही ऊपर से अजीब सी आवाजें आने लगीं जैसे कोई कुछ तोड़ रहा हो ! मुल्ला जब दौड़ कर ऊपर पहुंचा तो उसने देखा कि उनका प्यारा गधा अपनी दुलत्तियों से छत तोड़ने को आमादा है ! छत कच्ची थी, कहीं टूट ही ना जाए इस डर से मुल्ला ने गधे को हटाना चाहा तो उसने दुलत्ती मार उसी को नीचे गिरा दिया ! जब तक मुल्ला संभले तब तक गधा भी छत तोड़ नीचे आ गिरा !

मुल्ला नसीरुद्दीन ने इस हादसे पर काफी दिमाग लड़ाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि कभी भी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिए ! ऐसा करने पर वह उसी जगह को बर्बाद करता है ! ले जाने वाले को भी लतिया कर गिरा देता है और सबसे बड़ी बात खुद भी सर के बल नीचे आ गिरता है। यानी दान, ज्ञान और सम्मान सुयोग्य पात्र को ही देना चाहिए।
@संदर्भ - भास्कर     

सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

परवा जरूर हो, पर अतिरेक नहीं

पौधों को नई जगह की आबो-हवा, धूप-झांव, मिटटी-पानी के साथ ताल-मेल बैठाने, परिस्थियों के अनुसार खुद को ढालने, आस-पास के माहौल में खुद को रमाने में कुछ तो समय लगना ही था ! हाथी इस बात को बखूबी समझते थे ! वे पौधों इत्यादि का समुचित ध्यान रख, समयानुसार उनका पोषण करते थे। पर इधर वानरों को अपने लता-गुल्म की कुछ अनावश्यक ही चिंता थी ! वे हर दूसरे-तीसरे दिन अपने लगाए पौधों को उखाड़ कर देखते थे कि उनकी जड़ें विकसित हुए कि नहीं ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
आनंदवन को जीवों के लिए सुगम, सुंदर और व्यवस्थित करने के लिए सिंहराज के नेतृत्व में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके तहत वन के सघन, दुर्गमनीय इलाके के पेड़-पौधों को हटा कर दूसरी विरल जगह रोपित कर दिया जाए जिससे दोनों जगहों का समुचित विकास हो सके। समाज हितकारी इस परियोजना की जिम्मेदारी बुद्धिमान हाथी और चपल बंदरों को सौंपी गयी, जिससे कार्य सुचारु और तीव्र गति से हो सके। कुछ ही दिनों में बीहड़ के पेड़-पौधों का पूरी साज-संभार के साथ नई जगहों पर ला प्रेम और सावधानी के साथ रोपण कर दिया गया ! 

अब पौधों को नई जगह की आबो-हवा, धूप-छांव, मिटटी-पानी के साथ ताल-मेल बैठाने, परिस्थियों के अनुसार खुद को ढालने, आस-पास के माहौल में खुद को रमाने में कुछ तो समय लगना ही था ! हाथी इस बात को बखूबी समझते थे ! वे पौधों इत्यादि का समुचित ध्यान रखते थे, समयानुसार उनका पोषण करते थे। पर इधर वानरों को अपने लता-गुल्म की कुछ अनावश्यक ही चिंता थी ! वे हर दूसरे-तीसरे दिन अपने लगाए पौधों को उखाड़ कर देखते थे कि उनकी जड़ें विकसित हुए कि नहीं ! कभी अनावश्यक रूप से उनकी झाड़-पौंछ कर देते ! कभी पानी देने में अतिरेक ! उनकी खैर-खबर लेने की इन गलतियों से ना तो पौधे अपनी जड़ जमा पाए, नाहीं उनका अपने नए वातावरण से ताल-मेल बैठ पाया और ना ही वे पनप पाए ! नतीजतन जहां हाथियों द्वारा रक्षित पेड़-पौधे कुछ ही दिनों में विकसित हो पनप गए और लहलहाने लगे ! वहीं वानरों की अदूरदर्शिता ने, भले ही यह उनका अपने पौधों के प्रति अतरिक्त केयर, लगाव या चिंता थी, उनके पौधों को अविकसित, निर्जीव सा कर उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा ! 

ऐसी ही कुछ प्रवृत्ति हम में से कुछ मानवों में भी पाई जाती है जिनकी भावनाओं का, लगाव का, अनावश्यक चिंता का, नकारात्मक सोच का, अविश्वास का अतिरेक उन्हें तो परेशानी में डालता ही है, संबंधित माहौल को भी आविष्ट व तनावग्रस्त बना डालता है !

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया, इसकी आदत बचपन से ही डालें

यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए। अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए । यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे  सुबह-सबेरे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है और घर में शांति स्थाई हो जाती है। हमारे ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती ही जाती है ...........!       


#हिन्दी_ब्लागिंग           

अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा हमारे यहां सदियों से चली आ रही है। अपने से बड़े के आदर स्वरुप उनके चरण स्पर्श करना बहुत उत्तम माना गया है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि रोज बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेने से घर में सुख-शांति तथा समृद्धि का वास होता है। विशेष
तौर पर जब आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हों या कोई नया काम शुरू कर रहे हों, कोई ख़ास दिन या त्यौहार हो तब तो जरूर ही। आज के तथाकथित विद्वान या अपने को आधुनिक मानने वाले लोग इस पर विश्वास करें न करें पर जब भी हम किसी का झुक कर चरण स्पर्श करते हैं तो हम में विनम्रता का भाव आ जाता है, हम विनीत हो जाते है, नम्र हो जाते हैं जिससे हमारे शरीर की उर्जा की नकारात्मकता श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर नष्ट हो जाती है, तथा उनकी सकारात्मक ऊर्जा आशीर्वाद के रूप में हमें मिल जाती है। पर इसके लिए हमारे मन में अपने बड़ों के प्रति, अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जरूर का होना जरुरी होता है। चरण स्पर्श करते समय हमेशा दोनों हाथों से दोनों पैरों को छूना चाहिए। एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है।


आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए, अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए। यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है। ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है। 

हमारे महान ग्रंथों में भी प्रणाम की महत्ता बताई गयी है। रामायण में तो प्रभू खुद ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए जाने को कहते हैं तो उन्हें पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।

महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता। 

एक प्रणाम से तो ऋषि मार्कण्डेय जी, जिनका अल्पायु योग था ख़त्म हो गया था। जब उनके पिता महामुनि मृकण्डु को यह बात पता चली तो उन्होंने उनका जनेऊ संस्कार कर खा कि जो भी तुम्हारे सामने पड़े उसके सामने तुम झुक कर प्रणाम कर आशीर्वाद लेना। मार्कण्डेय जी ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वैसा ही करना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक दिन उनके सामने सप्तऋषि आ गए मार्कण्डेय जी ने झुककर सप्तऋषियों का चरण स्पर्श किया। अनजाने में सप्तऋषियों ने मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया। जब उन्हें पता चला कि मार्कण्डेय जी अल्पायु हैं तो वे चिंता में पड़ गये। सप्तऋषि बालक मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी के पास ले गये। मार्कण्डेय जी ने ब्रह्मा जी का भी चरण स्पर्श किया। ब्रह्मा जी ने भी मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया जिससे यमराज भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए।           

पर यदि प्रणाम करने वाले के लिए कुछ नियम हैं तो जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, वह चाहे स्त्री हो या पुरुष  उनका भी फर्ज होता है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें।  साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। क्योंकि पैर का किसी को लगना अशुभ कर्म माना गया है। तो जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें भी इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है। 

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