गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

कहां पगड़ी और कहां हिजाब

अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! यह सबसे बड़ी पहचान है, सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के विरुद्ध असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है.............. ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देश के टुकड़े हो गए ! अंग्रेज स्थूल रूप से चले गए, पर जिन्होंने राज हथियाया, उन पर उनका प्रतीयमान सदा हावी रहा ! ''फूट डालो और राज करो'' को गुरु मंत्र की तरह अंगीकार कर लिया गया ! राज करने वालों की सिर्फ चमड़ी का रंग बदला, कार्य प्रणाली वही रही ! आजादी पाने की ख़ुशी में सब कुछ भूले अवाम को इस कदर अपने आभा मंडल से सम्मोहित कर दिया गया कि उसे "हर तरफ तू ही तू" नजर आने लगा ! धीरे-धीरे धर्म-जाति-भाषा रूपी अफीम चटाई जाने लगी ! लिहाजा वो अवाम जो कभी देश के लिए एक आवाज पर एकजुट हो कंधे से कंधा मिला खड़ा हो जाता था, अब बड़े से बड़े घटनाक्रम पर भी आँख मीचे अपने खोल में दुबका रहने लगा है ! सत्ता-पिपासु जो चाहते थे, वही हुआ ! 

अब चुनाव लियाकत की बजाय भीड़ की बदौलत जीते जाने लगे हैं ! उस भीड़ को बरगलाने के लिए तरह-तरह की शोशेबाजियों का सहारा लिया जाने लगा है ! कोई भी चुनाव आते ही तरह-तरह जुमले उछलने लगते हैं ! साधारण सी स्थानीय बात को कुछ लोगों की अज्ञानता का लाभ उठा, उनकी भावनाओं को भड़का, पैसे के बल पर राष्ट्रीय मुद्दा बना देश में अराजकता फैलाने का कुत्सित प्रयास शुरू हो जाता है ! हाल के पांच राज्यों के चुनाव में यह खेल फिर नजर आया है ! इस बार हिजाब का सहारा ले लोगों को भड़काने का कुचक्र रचा गया है ! मूर्खता की अति तो तब हो गई, जब इसकी तुलना सिक्खों की पगड़ी से कर दी गई ! जबकि दोनों कि कोई तुलना हो ही नहीं सकती ! क्योंकि एक है जो देश-दुनिया में शान से अपनी पहचान उजागर करवाती है तो दूसरी ओर वह है जो पहचान को छुपाने का काम करता है !

तुलना करने वाली इस जमात में तथाकथित बुद्धिजीवी, सदा से देश के खिलाफ रहे साम्यवादी, मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, पैसे के गुलाम न्याय-भक्षक या देश विरोधी ताकतें तो शामिल थी हीं, साथ ही अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है !  यह सबसे बड़ी पहचान है सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के खिलाफ असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है !

दूसरी तरफ हिजाब महिलाओं द्वारा लोगों से बात करते समय ओट के लिए काम आने वाला एक पर्दा है ! ठीक है, कई तरह के लोगों से महिलाओं का वास्ता पड़ता है, इससे अवांछित लोगों से आड़ बनी रहती है ! इससे आज तक किसी को कोई परेशानी भी नहीं थी ! पर अब इसी की आड़ में असमाजिक तत्वों द्वारा अपनी पहचान छुपा देश-समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है ! इसीलिए यह अब विवाद का विषय बन गया है ! वैसे इसे किसी के निजी जीवन से हटाने की किसी की मंशा नहीं है पर विद्यालय-महाविद्यालय जैसी जगहों में जहां अनुशासन प्राथमिकता है वहां के लिए जिद करना बेमानी है ! यदि इसके पक्ष में खुद के परिधान पहनने की मौलिक अधिकार की दुहाई दी जा रही है, तो "एमयू" के द्वारा जारी ड्रेस-कोड को क्या कहा जाएगा, जिसमें वहां की छात्राओं को सिर्फ सलवार-कमीज और दुपट्टा ही पहनना अनिवार्य है ! इसे क्या कहेंगे ! वहां क्यों नहीं विरोध होता ? दोहरी मानसिकता तो कबूल नहीं की जा सकती !

जिनका है वे तो हिजाब के पक्ष में खड़े होंगे ही, शुरू से ही उन्हें इसकी आदत है ! पर सिर्फ अपने मतलब के लिए इस विवाद को हवा दे, उनका साथ देने वाले विघ्नसंतोषी, मौकापरस्त ! क्या उन्हें अपना इतिहास नहीं मालुम ? क्या उन्हें सिक्ख धर्म की स्थापना क्यों और कैसे हुई, इसका ज्ञान नहीं ? क्या भूल गए ये लोग गुरुओं की परपरा को, उनकी वाणी को, उनके त्याग को, उनकी कुर्बानियों को ? क्या इन कुटिलों को पगड़ी की महत्ता का एहसास नहीं है ? क्या उन्हें नहीं मालुम की एक सिक्ख जान दे सकता है पर अपनी पगड़ी अपने दस्तार पर आंच नहीं आने दे सकता ! एक बार मुंह खोलते समय तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई इन लोगों को तुलना करते हुए कि मैं क्या बोलने जा रहा हूँ ! क्रोध नहीं, घिन्न आती है ऐसे लोगों पर !

सही बात तो यह है कि अब आम देशवासी भी सब देखने समझने लग गया है ! उसे पहले की तरह भरमा या बेवकूफ बना कर नहीं रखा जा सकता ! इस खेल को भी सब समझ रहे हैं कि कौन-कैसे अपनी ओछी मानसिकता और लिप्सा के कारण क्यों और क्या कर रहा है ! किसको देश-समाज-सर्वहारा की चिंता है और किसे सिर्फ और सिर्फ अपनी ! आशा है हाशिए पर सरका दिए जाने के बावजूद अपने गुमान के नशे में खोए लोग जल्द असलियत की धरती पर उतर उसकी कठोरता का आभास पा सकेंगे !

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

एक दल अर्श से फर्श के भी नीचे

पंजाबी कौम बहुत ही मेहनती है ! किसी भी काम को करने में गुरेज नहीं करती ! अपने इसी गुण के कारण देश-विदेश सभी जगह सफल, सम्माननीय व प्रतिष्ठित है ! इनकी मेहनत ने ही पंजाब को दशकों तक अन्न प्रदान करने वाले राज्यों में प्रमुख बनाए रखा था ! पर इसके साथ ही यह भी सत्य है कि यूपी-बिहार के सहायकों के अनवरत बहे पसीने और मिटटी के संयोग से ही यह संभव हो पाया था ! अब यदि उन्हीं को इस राज्य से दूर रखने की बात हो और वे यदि यहां ना आएं तो खेती करना दुर्भर हो जाएगा ! यह बात पंजाब का हर छोटा-बड़ा जमींदार जानता और मानता है ! क्या वोट देने के पहले वे कुछ सोचेंगे या नहीं........!!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज कल देश की सबसे पुरानी पार्टी की कार्य शैली को देख पक्ष-विपक्ष-अवाम सभी अचंभित हैं ! क्या कोई इतना बुद्धिहीन, लापरवाह या अहमी हो सकता है कि उसको देश-काल-परिस्थिति किसी का कुछ भी भान  ना हो ! आत्मविश्वास जितना अच्छा गुण है, अति आत्मविश्वास उतना ही खतरनाक ! लगता ही नहीं कि इस दल के सर्वेसर्वा कहीं से भी गंभीर हैं, लगता है जैसे किसी नौटंकी का मंचन देख या कर रहे हैं ! इनकी कथनी-करनी देख कतार में सबसे पीछे खड़े इंसान को भी लगने लगा है कि जो अपनी पार्टी ही नहीं संभाल पा रहे, उनके हाथ में देश की बागडोर सौंपने की बात सोची भी कैसे जा सकती है !   

एक-एक कर जो थोड़े बहुत समझदार थे वे किनारा करते जा रहे हैं ! सच्चे हिमायती भी कुछ ना कर पाने की हालत में निराश हो दामन छोड़ रहे हैं ! चारण, चरणचुंबी, मौकापरस्त, मतलबी लोग, जिनका कहीं कोई आधार नहीं है, जिन्हें घर छोड़ बाहर शायद ही कोई पहचानता हो, जैसे ही बचे रह गए हैं ! पर दल की कमान संभालने वाली त्रयी अभी भी हवा में उड़ रही है ! अवाम को अपनी रियाया समझ वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है !

अब रही पंजाब की बात ! पंजाबी कौम बहुत ही मेहनती है ! किसी भी काम को करने में गुरेज नहीं करती ! अपने इसी गुण के कारण देश-विदेश सभी जगह सफल, सम्माननीय व प्रतिष्ठित है ! इनकी मेहनत ने ही पंजाब को दशकों तक अन्न प्रदान करने वाले राज्यों में प्रमुख बनाए रखा था ! पर इसके साथ ही यह भी सत्य है कि यूपी-बिहार के सहायकों के अनवरत बहे पसीने और मिटटी के संयोग से ही यह संभव हो पाया था !  अब यदि उन्हीं को इस राज्य से दूर रखने की बात हो और वे यदि यहां ना आएं तो खेती करना दुर्भर हो जाएगा ! यह बात पंजाब का हर छोटा-बड़ा जमींदार जानता और मानता है ! पर एक-दो दिन पहले एक चुनाव रैली के दौरान पानी के बुलबुले रूपी कारिंदे ने यूपी-बिहार के लोगों के विरोध में भाषण दे डाला और मलकिन खड़ी मुस्कुराती रही ! क्या पंजाब के किसान वोट देने के पहले कुछ सोचेंगे नहीं !

जब देश ने धीरे से भाई के हाथ से कमान ले बहन को आगे आते देखा तो लगा कि शायद अब कुछ समझदारी भरी बातें होंगी ! पर ये तो उस पर भी सवा सेर पड़ीं ! अब तो पंजाब के लोगों को सोचना ही होगा कि जो अपने हारने पर आग लगने की बात करते हैं ! जन्मजात बैरी पडोसी के यहां जा खुद को सत्ता में लाने की सहायता की गुजारिश करते हैं ! वहां के हुक्मरानों की चापलूसी कर गलबहियां डालते हैं ! बच्चियों के बिकनी पहनने पर आजादी की अभिव्यक्ति समझते हैं या देश के दूसरे हिस्सों से काम-काज की खोज में आने वालों पर रोक लगाने की बात करते हैं, वे क्या इस राज्य और यहां के वाशिंदो के हितैषी हो सकते है ?

उनकी अदूरदर्शिता, अज्ञानता, आत्ममोह, सत्ता लोलुपता, बेलगाम जुबान, अहम और चारणों की फौज राज्य क्या देश की अस्मिता के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं ! उनको तो यह भी समझ-नज़र नहीं आ रहा कि उनकी नादानियों, बेवकूफियों की वजह से दूसरे "दीमकी छुटपट'' दल इनकी जगह लेने को आतुर हो लार टपका रहे हैं ! पर शायद अब समय नहीं बचा है कि कुछ भी किया जा सके, संभला जा सके.........!   

बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

हमारी लता जी, कुछ छुए-अनछुए पहलू

इतनी बड़ी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही लगेगा ! कितना भी शोध कर लीजिए, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा ! कितनी भी बातें कर लीजिए, कम ही रह जाएंगी ! इतने विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में सहेजना मुमकिन नहीं है ! पर जो भी हो यह सच है कि वे सदा हमारे हृदयों पर राज करती रहेंगी, ससम्मान ! जब भी गीत-संगीत की बात होगी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा !  जब तक प्रकृति में संगीत रहेगा तब तक लता जी भी हम सब के बीच रहेंगी...........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

यह शाश्वत सत्य है कि जो भी इस धरा पर जन्म लेगा, चाहे वह कोई भी हो, चल-अचल, जड़-चेतन, उसकी मृत्यु निश्चित है ! इसीलिए इसे मृत्युलोक भी कहा जाता है। यहां रोज हजारों-लाखों लोग मरते हैं जिनकी कोई खोज-खबर नहीं होती ! कुछ विशेष लोगों की खबर कुछ लोगों तक पहुंचती है, कुछ दिनों बाद लोग उन्हें भूल-भाल जाते हैं ! पर कुछ महान, दिव्य हस्तियां ऐसी भी होती हैं, जिनका अस्तित्व भौतिक रूप से विलीन हो जाने के बावजूद यहां लोगों के जेहन में सदा मौजूद रहता है ! ऐसी ही दिव्यात्मा थीं हमारी लता जी ! जिनको भुला पाना शायद ही कभी संभव हो पाए ! एक ऐसी हस्ती जिसके लिए देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग शोकग्रस्त हो गए !   

महान लोगों का जीवन एक खुली किताब सा हो जाता है। लोगों की उनमें दिलचस्पी के कारण उनकी हर बात सार्वजनिक हो जाती है ! कुछ बातें बेहद आम हो जाती हैं पर कुछ फिर भी ऐसी होती हैं जो बहुत से लोगों तक नहीं पहुँच पातीं ! लता जी से संबंधित ऐसी ही कुछ बातों का, जो सोशल माध्यम पर उपलब्ध होने के बावजूद बेहद आम नहीं हुईं है। आज श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ ऐसी ही बातों का यहां जिक्र, जिससे उनकी याद यहां सदा दर्ज रहे ! 



उनके पिता दीनानाथ और मां शेवांति जी ने अपनी इस पहली संतान का नाम हेमा रखा था। पर बाद में उनके पिताजी ने अपने एक नाटक भाव-बंधन के एक अति लोकप्रिय किरदार लतिका से प्रभावित हो उनका नाम लता कर दिया।  

लता जी अपने स्कूल के पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा को भी साथ ले गईं थीं ! पर जब स्कूल द्वारा दोनों की फीस मांगी गई तब उन्होंने खुद भी स्कूल न जाने का फैसला कर लिया ! उनकी शिक्षा घर पर ही संपन्न हुई ! हालांकि उन्हें जीवन में छह-छह यूनिवर्सिटियों से मानद उपाधि द्वारा नवाजा गया। 

लता जी तब 5-6 वर्ष की थीं तो पिता की अनुपस्थिति में उनके शिष्य को एक राग गलत गाते सुन, उसको सही तरह गा कर बताया ! उनके पिता जी को तब तक लता जी के हुनर का पता नहीं था ! उनको एक जटिल राग को सहजता से गाता देख वे आश्चर्यचकित रह गए ! तभी से उन्होंने लता जी को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया।   


लता जी को रेडिओ सुनने का बहुत शौक था ! पर जिस दिन वह अपना पहला रेडियो घर ला उसे सुनने बैठीं तो पहली खबर ही सहगल जी के देहावसान की मिली, उन्होंने रेडिओ ही वापस कर दिया !

लता जी के लिए गायन एक पूजा थी, आराधना थी ! वे जब भी कोई गाना रिकॉर्ड करती थीं तो अपने जूते या चप्पल जो भी पहने होती थीं, उतार देती थीं।


वे आनंदअघन, जो कि 17 शताब्दी के एक जैन साधू, रहस्यमय कवि और भजन गायक थे, के नाम से गाने भी कंपोज किया करती थीं। बंगाली भाषा में 'तारे आमी चोखने देखिनी' और 'आमी नी' गाने उन्होंने ही कंपोज किए थे। जिन्हें किशोर कुमार ने गाया था। इसके अलावा मराठी में भी कुछ गाने कंपोज़ किए थे। 



1974 में, लता जी लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। ज्ञातव्य है कि वहां सिर्फ ब्रिटिशर ही अपनी प्रस्तुति दे सकते थे ! पर लता जी के कारण वहां की सरकार ने अपना नियम बदला।    

फिल्म जगत से जुड़ी दो ही हस्तियों को भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा  गया है ! लता जी के अलावा यह गौरव सत्यजीत रे जी को ही मिला है ! 


राज्य सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने कभी वेतन या दिल्ली में घर नहीं लिया। आज के तथाकथित नेता तो पता नहीं इन सहूलियतों के लिए क्या-क्या कर जाते हैं !

वे हर काम को पूर्णरूपेण सही ढंग से करने में विश्वास रखती थीं यानी जूनून की हद तक पूरी परफेक्शनिस्ट थीं ! पूरी गहराई तक जा-समझ कर ही उसे पूरा करती थीं। फिर चाहे वह गायन हो या फोटोग्राफी। गायन की तरह ही वे बेहद कुशल फोटोग्राफर थीं ! जो उनका बेहद पसंदीदा शौक था ! 

लताजी को स्वर कोकिला की उपाधि देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ दी थी।

 


वैसे तो हर बड़ी और नामचीन अभिनेत्री की यही इच्छा होती थी कि उस पर फिल्माया गया गाना लता जी ही गाएं ! पर कहते हैं मधुबाला जी तो अपने कंट्रैक्ट में बाकायदा यह शर्त रखती थीं कि उनके गाने सिर्फ लता जी ही गाएंगी !

वैसे तो बड़े से बड़े संगीत विशेषज्ञ उनके गायन में कोई त्रुटि नहीं ढूंढ पाते, पर लता जी कभी भी अपनी रचनाओं से पूर्णतया संतुष्ट नहीं होती थीं, उन्हें सदैव लगता था कि इस से भी बेहतर किया जा सकता है ! एक बार उन्होंने बताया था कि मैं अपने गाने नहीं सुनती क्योंकि मुझे लगता है कि उनमें मुझे कोई न कोई कमी नजर आ जाएगी ! उनका नाम 1974 की गिनीज बुक में as the most recorded artist के रूप में दर्ज किया गया था।



लता जी को क्रिकेट से भी बहुत लगाव था। यह तो सभी जानते हैं कि 1983 में वर्ल्ड कप जीतने पर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पास इतना पैसा नहीं था की वह खिलाडियों को कुछ दे सके ! तब लता जी ने आगे आ कर अपनी तरफ से कॉन्सर्ट आयोजित कर बीस लाख रुपए अर्जित किए और उन्हें खिलाड़ियों को दे कर उन्हें सम्मानित किया ! 
 

क्रिकेट के शौक ने ही उन्हें राज सिंह डूंगरपुर से मिलवाया था। राज सिंह जी लता जी के क्रिकेट प्रेमी और खिलाड़ी भाई हृदयनाथ जी के दोस्त थे। उन्हीं ने दोनों को मिलवाया था ! इन दोनों के संबंधों की अनेक बातें हैं। जिनकी चर्चा सोशल मिड़िया, संगीत की दुनिया या कहीं होती भी है तो बड़े अदब के साथ की जाती है। यह भी कि दोनों ने आजीवन विवाह नहीं किया और राज सिंह जी लताजी को अक्सर ''मिठू'' कह कर बुलाया करते थे !


लता जी ने भारतीय सेना को समर्पित अपना अंतिम गाना ''सौगंध मुझे इस मिटटी की'' रेकॉर्ड करवाया था जो 30 मार्च 2019 रिलीज किया गया था।

लताजी ने अपने जीवनकाल  में अनगिनत लोगों को मोटीवेट किया है। उनके गाए गानों से लाखों लोग अपना जीवनयापन कर रहे हैं। लता जी के गानों को गा-गा कर कई लोग नाम-दाम पा गए ! टीवी के उलटे-सीधे कार्यक्रमों में उनकी नकल कर बहुतों ने पैसा बनाया ! उदहारण स्वरूप लोगों को याद होगा कैसे बंगाल की रानू मंडल, जो सड़कों पर लता जी के गाने गा कर गुजर-बसर करती थी, कैसे रातों रात स्टार बन गई थी ! पर ऐसे धूमकेतु, जो बिना मेहनत-समर्पण-लगन के कुछ समय के लिए चमक, फिर गुमनामी के अँधेरे में गुम हो जाते हैं, उनके लिए लता जी ने एक सारगर्भित संदेश  दिया था ! उन्होंने कहा था कि "मै खुशनसीब हूं कि मेरे काम और नाम की वजह से कोई आगे बढ़ पा रहा है। मगर, मैं आजकल के नए गायकों को यह सलाह देना चाहती हूं कि आपको मेरे, आशा, किशोर दा, रफी साहब, मुकेशा दा या किसी और पुराने सिंगर्स के गानों को कॉपी नहीं करना चाहिए। बल्कि आपको अपना काम अपने अंदाज में दिखाना चाहिए। किसी को कॉपी करना गलत नहीं है मगर, इससे आपका नाम ज्‍यादा दिन तक नहीं हो पाएगा। आपको अपने गीतों से अपनी पहचान बनानी चाहिए।''



इतनी बड़ी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही लगेगा ! कितना भी शोध कर लीजिए, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा ! कितनी भी बातें कर लीजिए, कम ही रह
 जाएंगी ! इतने विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में सहेजना मुमकिन नहीं है ! पर जो भी हो यह सच है कि वे सदा हमारे हृदयों पर राज करती रहेंगी, ससम्मान ! जब भी गीत-संगीत की बात होगी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा !  जब तक प्रकृति में संगीत रहेगा तब तक लता जी भी हम सब के बीच रहेंगी ! 

@सहयोग हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

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