pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: गौरव
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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया.............!      

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारा राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों देश की पहचान और गौरव का विदेशों में भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें सभी राष्ट्रीय अवसरों और कार्यक्रमों पर बजाया और गाया जाता है ! इससे हम सब में देशभक्ति और एकता की भावना जागृत होती है ! पिछले दिनों वंदे मातरम गीत को ले कर देश में काफी चर्चा चली ! इससे संबंधित कानून भी संसद में पारित करवाया गया ! इसका पाठ पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में श्री रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था !

वंदे मातरम 
इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया ! इसका उपयोग एक राजनीतिक नारे के रूप में पहली बार 7 अगस्त, 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान किया गया था ! हालांकि दोनों ही संगीत रचनाएं देश के गौरव, एकता और देशभक्ति की भावना को जागृत करने का काम करती हैं, पर दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं ! 

बंकिम चंद्र जी 
मारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" देश की पहचान और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बोल देश के इतिहासिक, मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को व्यक्त करते हैं। यह कानून द्वारा निर्दिष्ट है और देश के आधिकारिक प्रतीकों के रूप में पहचाना जाता है। इसे सभी राष्ट्रीय पर्वों और खेल आयोजनों जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। इसमें कुछ खास बाते हैं, जैसे इसे निर्दिष्ट अवधि जो 52 सेकंड की है, तय लयबद्धता यानी इसकी धुन को बदला नहीं जा सकता, ऐसा करना दंडनीय अपराध की गिनती में आता है और सम्मानजनक स्थिति में विशेष प्रोटोकॉल के तहत ही बजाया या गाया जा सकता है ! 

हमारी पहचान 
पना वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता और गौरव की गाथा है, जिसका अर्थ है कि मैं भारत माता की वंदना और स्तुति करता हूं। यह एक तरह से अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और देशभक्ति की अभिव्यक्ति है। जो हर भारतीय में राष्ट्रवाद की भावना को जगाती है। इसे सांस्कृतिक  आयोजनों और देशभक्ति के कार्यक्रमों में गाया जाता है। वंदे मातरम गीत में समय, धुन या लयबद्धता जैसी कोई बाध्यता नहीं है। इसके तीन विभिन्न संस्करण बहुत लोकप्रिय हैं ! पर इसकी भी राष्ट्र गान की तरह ही किसी भी प्रकार की अवमानना, असम्मानजनक स्थिति या अवहेलना करना अपराध के दायरे में आता है। 

कविगुरु 
हम सभी ने महसूस किया है कि जब भी ये दोनों कहीं भी, कभी भी प्रसारित होते हैं तो तन-बदन में एक ऊर्जा सी भर जाती है ! दिल-ओ-दिमाग गौरवान्वित हो उठते हैं ! तन-बदन में एक लोमहर्षक रोमांच का अनुभव होने लगता है ! ना जाने क्या जादू छिपा है इनके शब्दों में कि पूरे शरीर में  देशभक्ति की लहर सी दौड़ जाती है ! हर देशवासी का फर्ज है, कर्तव्य है कि उसे तो ये दोनों रचनाएं कंठस्त हों ही, यह भी सुनिश्चित हो कि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे पूर्णतया परिचित हों ! 

जय हिन्द ! वंदे मातरम !!

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

कहां पगड़ी और कहां हिजाब

अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! यह सबसे बड़ी पहचान है, सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के विरुद्ध असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है.............. ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देश के टुकड़े हो गए ! अंग्रेज स्थूल रूप से चले गए, पर जिन्होंने राज हथियाया, उन पर उनका प्रतीयमान सदा हावी रहा ! ''फूट डालो और राज करो'' को गुरु मंत्र की तरह अंगीकार कर लिया गया ! राज करने वालों की सिर्फ चमड़ी का रंग बदला, कार्य प्रणाली वही रही ! आजादी पाने की ख़ुशी में सब कुछ भूले अवाम को इस कदर अपने आभा मंडल से सम्मोहित कर दिया गया कि उसे "हर तरफ तू ही तू" नजर आने लगा ! धीरे-धीरे धर्म-जाति-भाषा रूपी अफीम चटाई जाने लगी ! लिहाजा वो अवाम जो कभी देश के लिए एक आवाज पर एकजुट हो कंधे से कंधा मिला खड़ा हो जाता था, अब बड़े से बड़े घटनाक्रम पर भी आँख मीचे अपने खोल में दुबका रहने लगा है ! सत्ता-पिपासु जो चाहते थे, वही हुआ ! 

अब चुनाव लियाकत की बजाय भीड़ की बदौलत जीते जाने लगे हैं ! उस भीड़ को बरगलाने के लिए तरह-तरह की शोशेबाजियों का सहारा लिया जाने लगा है ! कोई भी चुनाव आते ही तरह-तरह जुमले उछलने लगते हैं ! साधारण सी स्थानीय बात को कुछ लोगों की अज्ञानता का लाभ उठा, उनकी भावनाओं को भड़का, पैसे के बल पर राष्ट्रीय मुद्दा बना देश में अराजकता फैलाने का कुत्सित प्रयास शुरू हो जाता है ! हाल के पांच राज्यों के चुनाव में यह खेल फिर नजर आया है ! इस बार हिजाब का सहारा ले लोगों को भड़काने का कुचक्र रचा गया है ! मूर्खता की अति तो तब हो गई, जब इसकी तुलना सिक्खों की पगड़ी से कर दी गई ! जबकि दोनों कि कोई तुलना हो ही नहीं सकती ! क्योंकि एक है जो देश-दुनिया में शान से अपनी पहचान उजागर करवाती है तो दूसरी ओर वह है जो पहचान को छुपाने का काम करता है !

तुलना करने वाली इस जमात में तथाकथित बुद्धिजीवी, सदा से देश के खिलाफ रहे साम्यवादी, मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, पैसे के गुलाम न्याय-भक्षक या देश विरोधी ताकतें तो शामिल थी हीं, साथ ही अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है !  यह सबसे बड़ी पहचान है सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के खिलाफ असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है !

दूसरी तरफ हिजाब महिलाओं द्वारा लोगों से बात करते समय ओट के लिए काम आने वाला एक पर्दा है ! ठीक है, कई तरह के लोगों से महिलाओं का वास्ता पड़ता है, इससे अवांछित लोगों से आड़ बनी रहती है ! इससे आज तक किसी को कोई परेशानी भी नहीं थी ! पर अब इसी की आड़ में असमाजिक तत्वों द्वारा अपनी पहचान छुपा देश-समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है ! इसीलिए यह अब विवाद का विषय बन गया है ! वैसे इसे किसी के निजी जीवन से हटाने की किसी की मंशा नहीं है पर विद्यालय-महाविद्यालय जैसी जगहों में जहां अनुशासन प्राथमिकता है वहां के लिए जिद करना बेमानी है ! यदि इसके पक्ष में खुद के परिधान पहनने की मौलिक अधिकार की दुहाई दी जा रही है, तो "एमयू" के द्वारा जारी ड्रेस-कोड को क्या कहा जाएगा, जिसमें वहां की छात्राओं को सिर्फ सलवार-कमीज और दुपट्टा ही पहनना अनिवार्य है ! इसे क्या कहेंगे ! वहां क्यों नहीं विरोध होता ? दोहरी मानसिकता तो कबूल नहीं की जा सकती !

जिनका है वे तो हिजाब के पक्ष में खड़े होंगे ही, शुरू से ही उन्हें इसकी आदत है ! पर सिर्फ अपने मतलब के लिए इस विवाद को हवा दे, उनका साथ देने वाले विघ्नसंतोषी, मौकापरस्त ! क्या उन्हें अपना इतिहास नहीं मालुम ? क्या उन्हें सिक्ख धर्म की स्थापना क्यों और कैसे हुई, इसका ज्ञान नहीं ? क्या भूल गए ये लोग गुरुओं की परपरा को, उनकी वाणी को, उनके त्याग को, उनकी कुर्बानियों को ? क्या इन कुटिलों को पगड़ी की महत्ता का एहसास नहीं है ? क्या उन्हें नहीं मालुम की एक सिक्ख जान दे सकता है पर अपनी पगड़ी अपने दस्तार पर आंच नहीं आने दे सकता ! एक बार मुंह खोलते समय तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई इन लोगों को तुलना करते हुए कि मैं क्या बोलने जा रहा हूँ ! क्रोध नहीं, घिन्न आती है ऐसे लोगों पर !

सही बात तो यह है कि अब आम देशवासी भी सब देखने समझने लग गया है ! उसे पहले की तरह भरमा या बेवकूफ बना कर नहीं रखा जा सकता ! इस खेल को भी सब समझ रहे हैं कि कौन-कैसे अपनी ओछी मानसिकता और लिप्सा के कारण क्यों और क्या कर रहा है ! किसको देश-समाज-सर्वहारा की चिंता है और किसे सिर्फ और सिर्फ अपनी ! आशा है हाशिए पर सरका दिए जाने के बावजूद अपने गुमान के नशे में खोए लोग जल्द असलियत की धरती पर उतर उसकी कठोरता का आभास पा सकेंगे !

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