pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: देश
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मंगलवार, 14 जुलाई 2026

नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं............??      

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! यदि ऐसा परिवर्तन समाज में लाना हो तो वह अवाम और देश के हित में होना चाहिए ! यह तभी संभव है जब जनमानस में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न कोई ठोस वजह हो और साथ ही उनमें दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना कूट-कूट कर भरी हो ! ऐसी पहल का मुख्य घटक सदा से समाज का युवा वर्ग ही रहा है ! पर इधर इतिहास भुला कर, कुछ स्वार्थी, मक्कार, सत्ता लोलूप तत्वों द्वारा अपने हित-साधन के लिए, विदेशों से आयातित शब्द ''जेन-जी'' से युवाओं को भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया गया है !

आदर्श 

जेन-जी ! वह पीढ़ी जो डिजिटल दुनिया में जन्मी और पली-बढ़ी है। इसकी सूचना प्राप्त करने की आदतें पिछली पीढ़ियों से अलग हैं। समाचार पत्र पढ़ने या लंबी बहस सुनने की बजाय यह छोटे वीडियो, मीम, रील और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्राप्त करती है। इस कारण यह नई सूचनाओं को तेजी से ग्रहण करती है, लेकिन कई बार उनकी सत्यता की जांच करने को पर्याप्त समय नहीं देती। इसीलिए कभी-कभी गलत सूचनाएं और अतिवादी विचार भी लोकप्रिय हो जाते हैं और लोगों को क्रोधित, भयभीत, उत्साहित या भावुक कर विशाल सार्वजनिक बहस का रूप ले लेते हैं। परिणामस्वरूप कई बार वास्तविक समस्याओं को किनारे कर छद्म भावनात्मक शोर कुछ देर के लिए सच का स्थान ले लेता है !  


प्रेरणा 
मारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! ऐसे लोग सत्ता, अधिकार और प्रभुत्व के लिए देश को भी दांव पर लगाने पर नहीं झिझकते ! यदि वे संविधानिक तरीके से सफल नहीं हो पाते तो देश में आंतरिक कलह उत्पन्न करने हेतु किसी बेहद निम्नस्तरीय अभियान का सहारा ले लेते हैं ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं !

भविष्य 
पना हित साधने वाले कई लोग अपने साथ उस शहीद भगत सिंह की तस्वीर रख, लोगों को गुमराह करने की कुचेष्टा भी करते हैं, जिन्होंने इस देश के लिए सिर्फ 23 साल की उम्र में अपना बलिदान दे दिया था ! भगत सिंह ही की तरह ऐसे सैकड़ों हजारों नाम हैं जो देश की खातिर हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए थे ! ऐसे अनगिनत किशोर हैं जिनका नाम भी लोगों को मालूम नहीं है, पर धन्य हैं उन शहीदों के माता-पिता और परिवार जिन्होंने उनके नाम पर देश से अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा ! इधर ये लोग हैं जो अपने स्वार्थ के लिए देश, समाज, नागरिकों में भेद-भाव पैदा कर जब घर लौटते हैं तो इनकी आरती उतारी जाती है, जैसे दिग्विजय कर लौटे हों ! इनकी तुलना उन शहीदों से करना भी बहुत बड़ा अपराध है। 

सुरक्षा का एहसास 
ऐसे में बात संस्कारों पर आ जाती है ! भले ही पाश्चात्य सभ्यता ने हमारे यहां घुसपैठ कर ली हो, पर अभी भी एक बहुत बड़े वर्ग में माता-पिता व बड़े-बुजुर्गों द्वारा छुटपन में ही बच्चों में संस्कार के बीज रोपित कर दिए जाते हैं ! इसलिए किशोरावस्था भले ही पूर्ण रूप से परिपक्व ना हो पर उसे बहका-फुसला कर गुमराह नहीं किया जा सकता ! बच्चे तो कच्ची मिटटी की तरह होते हैं ! यह तो कुम्हार पर निर्भर करता है कि वह चिलम बनाता है या सुराही ! उसके हाथ की जरा सी जुंबिश पूरे आकार को बेकार कर सकती है ! हमें उन सभी युवाओं के माता-पिता का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को सुसंस्कृत किया, दिलों में देश प्रेम की लौ जगाई और एक कुत्सित प्रयास को विफल करने में अहम भूमिका निभाई 🙏 

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

शुक्रवार, 29 मई 2026

दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है

कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी रक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! उनको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग को लक्ष्य बनाने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है...........😡

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

अभी पिछले दिनों कुछ पूर्वाग्रही, कुंठित, अराजक तत्वों ने देश की युवा पीढ़ी की तुलना उस   2.5x4x1.5cm के आकार के कीड़े से की, जो इस दुनिया में करीब 35 करोड़ सालों से रेंग रहा है ! जो एक कीड़ा नहीं बल्कि चलता-फिरता जीवाश्म है ! तो क्या ऐसे लोगों ने सिर्फ इसलिए एक घृणित जीव को अपना आदर्श बना लिया क्योंकि वह करोड़ों वर्षों से ''सर्वाइव'' कर रहा है ? नहीं ! उनका मुख्य उद्देश्य उस जीव के ''सर्वाइवालपने'' के पैटर्न को अपने से जोड़, एक गलत नेरेटिव गढ़, देश के युवा वर्ग को गुमराह करना था ! पर उनके उस विलेन नुमा हीरो के चरित्र, उसका व्यवहार, उसकी कारस्तानियों ने इनके गुब्बारे के फूलने से पहले ही हवा निकाल दी ! 

एजेंडा 

वैसे तो इस कीड़े का हमारे ग्रंथों में कोई जिक्र नहीं मिलता, पर ऐसा तो नहीं कि इस राक्षसी प्रवृति के सर्वाहारी जीव को अपने दुराचार, पापों, कुकर्मों की वजह से, अश्वस्थामा की तरह ही कोई श्राप मिला हो, जिसकी वजह से इसे घृणा-वितृष्णा सहते हुए धरती पर गंदगी व मलिनता में वर्षों-वर्ष से रहना पड़ रहा हो ! उसी मलिनता के कारण दूषित हुए दिलो-दिमाग ने इसे ''वेक्टर'' बना दिया हो !

अनगिनत बीमारियों का वाहक 
पि छले दिनों देश में जो एक अराजक माहौल बनाया गया, जिसका आधार, वर्षों पहले विश्व-विख्यात उपन्यासकार फ्रांज काफ्फा का लोकप्रिय उपन्यास ''द मेटामॉफोर्सिस'' था ! जिसमें उन्होंने एक अकर्मण्य, आत्मश्लाघि, बरोजगार, परदोषी युवक की कहानी बयां की थी जो अपने को, लियाकत ना होते हुए भी सर्वगुणसम्पन्न समझता है ! एक दिन जब वह अपनी नौकरी जाने के बाद, गंदगी से भरे अपने कमरे में सुबह नींद से जागता है तो खुद को एक कीड़े के रूप में पाता है और वह कीड़ा था कॉकरोच यानी तिलचट्टा ! 

किताब का कवर 

इसी को आधार बनाया गया 

ले खक काफ्फा ने उस युवक को एक पीड़ित के रूप में दर्शाया था ! इन दिनों उसी भाव को ले उड़ा गया कि मैं पीड़ित हूँ ! मेरे ऊपर अत्याचार किया जा रहा है ! मुझे सताया जा रहा है ! सिस्टम दोषी है ! इसे बदलने के लिए क्रांति करनी होगी ! विडंबना यह है कि जो परजीवी खुद को पीड़ित दिखा रहे हैं, वे खुद कोई उपक्रम करना नहीं चाहते ! बस पड़े रहना, गंदगी फैलाना और जहां हैं उसी को बर्बाद करना उनका उद्देश्य है ! फिर भी उस उपन्यास के लड़के की तरह ये लोग चाहते हैं कि बिना कुछ किए, दूसरों की तरह उन्हें सम्मान मिले, उनकी बात सुनी जाए, उन्हें अधिकार भी दिए जाएं ! 

कपट 
ऐसा होने से पहले ही उपाय जरुरी 
कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों की नहीं, इंसानों की है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! क्या ऐसे लोग, अभिभावक या समाज अपने बच्चों को कभी भी कॉकरोच कहलवाना गवारा करेगा ? क्या कोई भी माँ-बाप यह चाहेगा कि उसका बच्चा आलसी, निकम्मा बन घर पर बोझ बने ? क्या कोई भी चाहेगा कि उसकी संतान को देश-परिवार-समाज विरोधी समझ हिकारत से देखा जाए और उन्हें ताने सुनने पड़ें ? काफ्फा भी अपने नायक के प्रति सहानुभूति रखने के बावजूद सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ पाया और उसको उस नालायक युवा का उसी के परिवार के सदस्यों द्वारा बहिष्कार करते हुए दिखाना पड़ा ! 
मनोरमता 
नको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग कॉकरोच कह अपना लक्ष्य साधने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! वह बेहद  क्षुब्ध हुआ है ऐसी हरकत से ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है ! वह यह भी अच्छी तरह से जानता है कि यदि इन सर्वाहारी जीवों को जरा सी भी सहानुभूति दे पनपने दिया, तो एक दिन वे उसी को खा जाएंगे, समाज को नष्ट कर देंगे, देश को खतरे में डाल देंगे  !  इसलिए वह सावधान भी है ! 

जागरूकता 
 मय बदल गया है ! लोग अब अफवाहों, गलत नेरेटिव के बहकावे में नहीं आते ! समाज जागरूक हो चुका है ! उसके पास गंदे, घिनौने, चालाक, कीड़े की खाल ओढ़ धोखा देने वाले कपटी और कुटिलों की खातिर के लिए पुरातन उपाय चप्पल का तो है ही, साथ में आधुनिक हथियार ''हिट'' तो हइए है...........!

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है

कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आती है, तब-तब जनता उसे सबक सिखाती है ! इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है.......................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब किसी ने अपने सबसे बड़े सहयोगी की जरुरत को ही नकार दिया था ! तब जनता ने उन्हें ही कुछ हद तक नकारा बना दिया था ! एक था, जिसने जन्मों-जन्मों तक की भविष्यवाणी कर दी थी, जनता ने उसी के सिम्बल से उसे बुहार कर किनारे कर दिया ! एक के लगातार विष-वमन से तंग आ लोगों ने उसका दायरा ही तंग कर डाला ! एक ने जातियों का व्यूह रचा, अवाम ने उसे पांति के ही लायक ना छोड़ा ! एक ने डर, हिंसा, खौफ का माहौल बना खुद को अजेय करना चाहा, उसे आज दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है ! 

जनता जनार्दन 
फिर भी है कि लोग समझते ही नहीं, ताजा उदाहरण है, एक भाई साहब, जिनका नाम भी देश के अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा, अचानक अपने सहयोगी दल को एक मजबूरी बता मिडिया की सुर्खियां बन गए ! अब वह लाख सफाई देते रहें, अपने कहे का अर्थ बदलते रहें, नुक्सान तो हो गया ! लातूर जिले में ऐसी ही बयानबाजी के चलते मिले विपरीत परिणामों से भी उन्होंने कुछ नहीं सीखा !  बोलना है कुछ भी भक्क से उगल दिया ! ऐसी ही हरकत सामने से भी कुछ दिनों पहले हुई थी, जिसने दोस्त, मित्र, साथी, अनुयायी सभी को सकते में ला दिया था !

याद आता है जब 1977 में इंदिरा जी चुनाव हारी थीं, तब जीतने के बाद जनता दल, देश और देशवासियों के हित में कुछ करने के बजाय सिर्फ इस बात पर जुट गया कि इस महिला को जेल भिजवाना है ! पब्लिक को यह सब रास नहीं आया और जनता दल को ही दलदल बना डाला ! 

खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !

निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    

जय हिंद 🙏

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं

अभी-अभी पश्चिमी कैलेंडर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही.........🙏

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मारा देश एक उत्सव-धर्मी देश है ! हमारी आत्मा बसती है, इन उत्सवों में ! इतने विविध त्यौहार दुनिया के शायद ही किसी और देश में मनाए जाते हों ! रंग-बिरंगे, उल्लासमय, खुशियां बिखेरते, प्रकृति, परंपराओं से, गाथाओं से जुड़े हुए, एक से एक बढ़ कर महोत्सव ! होना तो यह चाहिए था कि दुनिया हमारे समारोहों को मनाए, पर हुआ इसके ठीक विपरीत, हम जुट गए पाश्चात्य जश्नों को अपनाने में ! यही नहीं हम तो एक कदम और आगे बढ़ अपने मासूम से पर्वों को पश्चिमी रंगों से रंगने की धृष्टता करने से  भी बाज नहीं आए !

पावन, पवित्र 
ऐसा नहीं है कि किसी और के त्यौहार को मनाना गलत है ! त्यौहार तो खुशी का प्रतीक हैं ! खुशियां अपनानी ही चाहिए ! पर हमारे हमारे पर्व गौण क्यों होते चले गए ? ऐसा क्योंकर हुआ ? तो इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने अधिकांश देशवासियों में जो एक हीन भावना का संचार कर दिया था, उसी से हम आक्रांताओं को अपने से बेहतर मानने लग गए, जिसका परिणाम यह रहा कि हमें अपने ऊपर ही विश्वास नहीं रह गया ! हमारी समृद्ध परिपाटी, परंपरा, इतिहास, सभी हाशिए पर सिमटते चले गए !   

जैसे अभी-अभी पश्चिमी कैलेण्डर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही ! 

इसी बात का उल्लेख वर्षों पहले अपनी कविता  ''यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं'' में हमारे राष्ट्र कवि श्री रामधारी दिनकर जी ने पूरे विस्तार के साथ किया था ! हम सभी को उसे पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं कि -


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं                                
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                          


है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है                                               
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर                                                                  
सर्द हवा का पहरा है                                                                             

सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही                                                                                                  

उल्लास मंद है जन-मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो

प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध                                                                                    
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                    

है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                                                                           

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏🙏

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

असली चेहरा सामने आया, फितरत को भी सामने लाया

दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों, किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेशानुसार हरकतें करते हैं....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वि देशी ताकतों द्वारा भारत में अपनी कठपुतलियों की असलियत को अब तक ढक-छुपा कर उनकी आड़ में खुद को सत्ता में सुपर पॉवर बनाए रखने का जो षड्यंत्र सालों से किया जाता रहा था, वह खुल कर सामने आ गया है ! आज के माहौल में उन्हें भी यह बात समझ में आ गई है कि अब भारत में इन प्यादों के बल पर अपने मनोनुकूल सरकार बनाना कतई मुमकिन नहीं है ! तो अब खुला खेल फर्रुखाबादी ! 
प्यादे 
पि छले दसेक वर्षों से कुछ तथाकथित राजनितिक लोग सनातन विरोधी, हिंदू विरोधी, धर्म विरोधी ब्यान पर ब्यान दिए जा रहे हैं, कोई कहता है हिन्दू धर्म ग्रंथ जला दो ! कोई देवी-देवताओं को काल्पनिक बताता है ! कोई लोकप्रिय त्योहारों को खतरनाक बता लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्टा करता है ! कोई किसी उत्सव पर सवाल खड़े करने की हिमाकत कर देता है ! कोई देवी-देवताओं के बारे में अभद्र टिप्पणियां कर देता है! कोई अपने पर्वों पर होने वाले खर्च को धन की बर्बादी बता, विदेशी धर्मों से सीख लेने की बात करता है ! वह भी तब जब देश की बहुसंख्यक आबादी सनातन की आस्था से जुड़ी हुई है ! यह सब अकारण नहीं हो रहा, सब सोची-समझी साजिशों के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है !
बकैती 

आम इंसान को यह सब वर्षों से सत्ता से दूर विपक्षी दलों की छटपटाहट या आक्रोश लग सकता है ! पर सच्चाई किसी और ही दिशा-दशा की ओर इशारा करती है ! आज के देश के माहौल को देखते हुए कोई भी व्यक्ति जो राजनीती से जुड़ा हो और उसे जरा सी भी राजनितिक समझ होगी तो वह कभी भी ऐसे ब्यान दे कर अपने कैरियर को खत्म नहीं करना चाहेगा ! दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेश के अनुसार ही हरकतें करते हैं ! 
बिसाती मोहरे 
ऐसा नहीं है कि शतरंज की बिसात बिछा उस पर सिर्फ प्यादों की परेड करवा दी जाती हो ! अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए पूरा ताम-झाम किया जाता है ! अकूत धनराशि खर्च की जाती है ! तरह-तरह के आख्यान-व्याख्यानों का जाल बिछाया जाता है ! प्रचार-प्रसार हेतु सोशल मीडिया का उपयोग-दुरूपयोग किया जाता है ! हर ऐसी शह जो इंसान के ईमान को डगमगा दे उसका उपयोग किया जाता है ! जिस किसी व्यक्ति का जरा सा भी रसूख या पहुँच होती है उसे खरीद कर अपनी दुरभिसंधि का सदस्य बना लिया जाता है ! पैसे का लालच दे कुछ भी बुलवा-लिखवा लिया जाता है ! पैसे को ही सर्वशक्तिमान बना दिया गया है !
सोशल मिडिया 
खरीदफरोख्त 
धन की शक्ति अपरंपार है ! दुनिया का कोई भी कोना उससे सुरक्षित नहीं है ! उसी के बल पर झूठ को सच की शेरवानी पहनवा, सजा-संवार कर उसकी बारात निकाल दी जाती है ! यह तो जग जाहिर है कि जब तक सच अपनी चप्पलें पहनता है, झूठ दुनिया के दस चक्कर लगा आता है और ऐसे लोग तो अपने धन-बल पर झूठ के लिए रॉकेट तक उपलब्ध करवा देते हैं ! लोग बहकावे में आ जाते हैं ! उधर विडंबना यह है कि सच को अपना सच बताने के लिए भी धन की शरण लेनी पड़ती है ! पर समय ने बदलना शुरू कर दिया है !

सच्चाई 
इसी सब के बीच अचानक देश की आजादी से भी पहले से रचा जा रहा, पर अब तक दबा-ढका, एक ऐसा कुचक्र सामने आया है जिससे सभी अचंभित से हो गए हैं ! कोई खुद पाक-साफ रह कर, वर्षों से किसी को किसी और के विरुद्ध बरगला कर, किसी और से मतभेद करवा कर, किसी और  मुद्दे को भड़का कर लोगों को भ्रमित कर, उनका ध्यान कहीं और भटकवा कर, अपना उल्लू सीधा करता रहा ! उसका तरीका इतना प्रेममय,  दोस्ताना,  सौहार्दपूर्ण और स्नेहयुक्त था कि लोग  उसके इरादों  को कभी  भांप ही नहीं पाए ! परंतु वक्त सब का हिसाब करता और रखता है, उसका भी हुआ और उसके क्रियाकलापों की नग्नता सामने आ ही गई और जब आ ही गई तो वह भी खुल कर अब तक छुपे अपने गुर्गों, गणों के साथ सामने आ गया ! उसका नतीजा सबके सामने है और अब हमारी बारी है कि हमें किससे कैसे निपटना है !  
वन्देमातरम।। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

''जेन-जी'', इस में भी सनातन सबसे आगे है

हमारे यहां तो लम्बी कतार है उदाहरणों की, श्री कृष्ण, नचिकेता से शरू करें तो आधुनिक युग में भी  लक्ष्मी बाई, चंद्रशेखर, खुदीराम बोस, विवेकानंद, जतिंद्र नाथ, भगत सिंह, उमाकांत कड़िया, करतार सिंह सराभा, गिनते-गिनते थक जाएंगे पर इन शूरवीरों के नाम खत्म नहीं होंगे.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

युवा वर्ग को ले कर अचानक एक गढ़ा गया शब्द ''जेन-जी'' उमड़ता है और दुनिया भर पर वितान सा छा जाता है ! ऐसे शब्द पहले भी बनते-बिगड़ते रहे हैं, तरह-तरह के बदलावों से उन्हें जोड़ा जाता  रहा है ! आज इसे यदि युवाओं की क्रांति से जोड़ा जा रहा है तो, युवा तो हर युग में हुआ है ! क्रांतियां तो युवाओं द्वारा ही होती हैं ! उन्हीं के द्वारा सदा गलत के विरोध में विद्रोह और प्रतिरोध हुए हैं !

सत्ता के विरुद्ध पहली क्रांति 

हमारे यहां तो यह चिर काल से होता आया है ! यदि अपने पूर्वाग्रह और कुंठा छोड़, सभी लाल-नीले-पीले, गोल-चपटे-तीरछी विचारधारा वाले, श्री कृष्ण चरित्र को पढ़ें तो ज्ञात हो जाएगा कि इस बारे में भी सनातन सबसे आगे है और उसका कोई सानी, कोई उदाहरण, कोई दृष्टांत, कोई मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती ! 

जन-क्रांति 
श्री कृष्ण, जिनके विराट व्यक्तित्व को दुनियावी परिभाषाओं में नहीं बांधा जा सकता, हजारों-हजार साल पहले उन्होंने तो बाल्यकाल से ही अन्यायी, जन-विरोधी व्यवस्था का प्रतिरोध किया था ! युवा होते-होते इंद्र जैसी सत्ता को चुनौती दे डाली थी ! कंस जैसे महा शक्तिशाली राजा और उसके आतंक को खत्म कर डाला था ! 

अपने देश में तो लम्बी कतार है उदाहरणों की, श्री कृष्ण, नचिकेता से शरू करें तो आधुनिक युग में भी लक्ष्मी बाई, चंद्रशेखर, खुदीराम बोस, विवेकानंद, जतिंद्र नाथ, भगत सिंह, उमाकांत कड़िया, करतार सिंह सराभा गिनते-गिनते थक जाएंगे पर इन शूरवीरों के नाम खत्म नहीं होंगे ! 

पर इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि यदि भौतिक बदलावों को छोड़ दें तो जो क्रांतियां, तानाशाही, भ्रष्टाचार, वंश, भाई-भतीजावाद के विरोध में की गईं वे तात्कालिक रूप से तो सफल रहीं, परंतु समय के साथ फिर उनके परिणामों में बदलाव आता चला जाता है ! फिर वही पुरानी बुजुर्वा ताकतें हावी होती चली जाती हैं ! पर अब अच्छी बात यह है कि आज का युवा तकनिकी तौर पर पहले से ज्यादा सक्षम ज्ञानवान तथा जागरूक है, उसे ना तो ''नेरेटिवों'' से बहकाया जा सकता है ना हीं उससे सच्चाई छिपाई जा सकती है ! देश का भविष्य सुरक्षित है और रहेगा ! 

जय हिन्द 🙏

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

बाबा हरभजन सिंह, मृत्योपरांत भी देश सेवा में लीन (वीडियो सहित)

समय-समय पर वे सपने में आ कर, अपने सैनिकों को सतर्क करते रहते हैं। कई बार उन्होंने विषम परिस्थितियों के आने के पहले ही सेना को सचेत किया है ! उनकी सूचना हर बार पूरी तरह सही साबित हुई है ! पर वे खुद कभी दिखाई नहीं पड़ते ! पर दूसरी ओर चीनी सैनिकों का मानना है कि उन्होंने एकाधिक बार रात में बाबा हरभजन सिंह को घोड़े पर सवार होकर सीमा पर गश्त लगाते हुए देखा है ...........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

क्या यह संभव है कि कोई सैनिक अपने देश से इतना प्रेम करता हो कि अपनी मृत्यु के पश्चात भी वह अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए सदा सचेत व तत्पर रहता हो ! शायद हाँ ! यहाँ शायद कहना भी शायद गलत होगा क्योंकि इस बात का प्रमाण हम नहीं विदेशी देश के सैनिक देते हैं ! भारत माँ के उस वीर सपूत का नाम है, हरभजन सिंह, जिन्हें मृत्योपरांत अब बाबा हरभजन सिंह के नाम से सादर याद किया जाता है !

बाबा हरभजन सिंह 

मंदिर
मंदिर में स्थित प्रतिमा 
अगस्त, 30, 1946 को पंजाब के गुजरांवाला में जन्मे हरभजन सिंह, बचपन से ही फौजी बनना चाहते थे ! उनकी इस अदम्य इच्छा का ही परिणाम था जिससे 9, फरवरी 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में एक सिपाही के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई ! 1968 में उन्हें 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम के बार्डर पर तैनात किया गया।



उसी वर्ष की घटना है ! ऐसा कहा और माना जाता है कि 4, अक्टूबर 1968 को जब वे नाथुला दर्रे से डोंगचुई तक अपनी पोस्ट के लिए खच्चरों पर रसद लेकर जा रहे थे, तभी बदकिस्मती से उनका पैर फिसल गया और वे कई फुट नीचे नदी में जा गिरे, पानी का तेज बहाव उनके शरीर को बहा कर दूर ले गया। पांच दिनों की तलाश पर भी जब उनका पता नहीं चल पाया तो उन्हें लापता घोषित कर दिया गया !

दफ्तर और रेस्ट रूम 
कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथी सैनिक प्रीतम सिंह के सपने में आकर अपनी मौत की खबर दी और यह भी बताया कि उनका शरीर कहाँ मिलेगा। प्रीतम सिंह की बात पर पहले तो किसी ने भी विश्वास नहीं किया पर शव भी नहीं मिल पा रहा था सो बताए गए स्थान पर गहन खोज की गई और ठीक उसी जगह हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर मिल गया। सेना ने सम्मान पूर्वक उनका अंतिम संस्कार किया ! इसके कुछ दिनों के बाद प्रीतम सिंह को एक बार फिर सपने में आ कर हरभजन जी ने अपनी समाधि बनाने की इच्छा व्यक्त की ! उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए सेना के उच्च अधिकारियों ने “छोक्या छो” नामक स्थान पर उनकी समाधि बनवा दी ! 


समाधि बनने के बाद अजीबोगरीब वाकए होने लगे ! ऐसा लगने लगा जैसे मृत्यु के बाद भी हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी करते हुए चीनी सेना की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और समय-समय पर सपने में आ कर अपने सैनिकों को सतर्क करते रहते हैं। कई बार उन्होंने विषम परिस्थितियों के आने के पहले ही सेना को सचेत किया है ! उनकी सूचना हर बार सही साबित हुई है ! पर वे खुद कभी दिखाई नहीं पड़ते ! पर दूसरी ओर चीनी सेना ने बॉर्डर पर घोड़े पर सवार किसी जवान को अपनी निगरानी करते हुए पाया है ! इन बातों की पुष्टि सैन्य अधिकारीयों ने भी की है ! भारतीय सेना के जवान उन्हें ''नाथुला के नायक'' के रूप में याद करते हैं ! 

 


समाधि स्थल 
इन सब बातों के चलते, सेना द्वारा एक अद्भुत निर्णय लिया गया ! उसके द्वारा उन्हें मरणोपरांत कैप्टन की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाकी सैनिकों की तरह हरभजन सिंह जी को भी वेतन, दो महीने की छुट्टी, इत्यादि सुविधाएं दी जाने लगीं ! दो महीने की छुट्टी के दौरान उनके घर जाने के लिए ट्रेन में दो सहायकों के साथ उनकी सीट बुक करवाई जाने लगी ! सेना के जवान बताते हैं कि बाबा को ड्यूटी पर कोई भी गफलत बर्दास्त नहीं है, जब कभी किसी सिपाही की सीमा पर पहरा देते वक्त आंख लग जाती है तो उनको अदृश्य चाटें भी पड़ते हैं, जैसे कोई उन्हें जगा रहा हो !

पूजा स्थल 
लोगों में इस जगह को लेकर बढ़ती आस्था तथा उनकी सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने 1982 में  9 किलोमीटर नीचे एक मंदिर बनवा दिया, जिसे अब बाबा हरभजन मंदिर के नाम से जाना जाता है।  हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते हैं। मंदिर में बाबा हरभजन सिंह के जूते और बाकी का सामन रखा गया है। भारतीय सेना के जवान इस मंदिर की चौकीदारी करते हैं ! वहां पर तैनात सिपाहियों का कहना है कि रोज उनके जूतों पर किचड़ लगा हुआ होता है और उनके बिस्तर पर सलवटें भी दिखाई पड़ती हैं, जैसे उस पर कोई सोया हो ! ‌

बाबा हरभजन सिंह जी का छोटी सी उम्र में परलोक-गमन के कारण उनकी देश सेवा की अदम्य इच्छा पूरी नहीं हो सकी ! इसीलिए शायद उन्होंने अपनी अल्पकालीन देश सेवा को दीर्घकालिक में तब्दील करने के लिए ही उस लोक में जाने के बजाए अशरीरी रूप में यहीं रह अपने को मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया ! आज उस घटना को घटे करीब 57 साल होने जा रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा आज भी भारतीय सेना के लिए अपना कर्तव्य निभा रही है। सेना भी उनको सदा आदर के साथ याद रखती है। उसी ने उन्हें 'बाबा' की उपाधि दी है। वे हमेशा अमर रहेंगे।

मंदिर और चीनी सीमा 
 
कुहासे से घिरा मंदिर 

यह मंदिर सिक्किम राज्य की राजधानी गंगटोक से 59 किलोमीटर की दूरी पर नाथुला दर्रे से 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यानी एक तरह से चीनी सीमा से लगा हुआ है ! उनकी निगाह हम पर सदा बनी रहती है ! इसके अलावा यहां का मौसम बिल्कुल अप्रत्याशित है ! एक पल में सुहाना, दूसरे पल में शीत लहर ! कभी कुहासा इतना गहरा कि कुछ गज देखना भी दूभर हो जाता है ! इसलिए यात्रा के पहले समुचित तैयारी होनी चाहिए ! सेना द्वारा संचालित यहां एक गिफ्ट शॉप भी है, जहां से यादगार के तौर पर खरीदारी की जा सकती है ! 

जय हिन्द ! जय हिन्द की सेना !!

शनिवार, 31 मई 2025

बिनोद का मुंगेरी वाला सपना

भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह, देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

डोर बेल बजी ! शाम के सात बजा चाह रहे थे, पर अभी भी बहुत गर्मी थी ! कौन आ गया, सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने बिनोद था ! उसे देख अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद आया था ! उसके प्रणाम का जवाब देते-देते उसे अंदर लिवा लाया ! चाय बन ही रही थी, उस में थोड़ा सा मटेरियल और बढ़ा दिया गया ! सामयिक विषयों पर बातों के दौरान मुझे लग रहा था कि बिनोद के दिमाग में जरूर कुछ ना कुछ चल रहा है जो वह मुझसे साझा करना चाहता है ! 

मेरा अंदाजा बिलकुल सही था। चाय ब्रेक के तुरंत बाद ही वह शुरू हो गया ! 

भइया जी, अभी जो सिंदूर ऑप्रेशन के बाद अल्हदा-अल्हदा पाटी का नेता लोग को ले कर जो डेलिगेशनवा देश का पच्छ रखने के लिए बाहर भेजा गया है, ऊही से एक सवाल मन में उठता है कि देश का भलाई में जब ऐसा किया जा सकता है, तो फिर अपना देश का राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकता ? वैसे भी हम सब लोग देखा ही है कि अपना हित के लिए कई राज्य में घोर विरोधी भी आपस में हाथ मिलाता रहता है ! दुनिया की भलाई को देखते हुए अलग-अलग सोच वाला लोग भी मिल कर काम करने लगता है ! तो पाटी अपनी जगह है, अपना विचार अपनी जगह है पर जब देश का बात आता है तो देश का पाटी काहे एक नहीं हो जाता है ? अगर ऐसा हो जाए तो देश का विकास अऊर तेज हो सकता है ! देश का एकता मजबूत हो सकता है ! सबसे पहले तो देशे ही है ना ?"

मैं एकदम चौंक पड़ा ! आज के युवा की ऐसी सकारात्मक सोच देश के उज्जवल भविष्य की द्योतक है। सामान्य होने में कुछ क्षण लगे, फिर कहा, बिलकुल सही सोच रहे हो, बिनोद ! आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी, पर शायद लालसा, अहम या भिन्न विचारधाराओं के चलते नए-नए दल बनते गए और देश पिछड़ता गया !"

हाँ भइया जी, बहुते दिन से हम एही सोच रहे थे कि यदि ऐसा हो जाए तो टुच्ची राजनीति के दिन खत्मे हो जाएंगे ! मउका-परस्तों का दुकाने बंद हो जाएगा ! भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा, अउर सबसे बड़का बात, पूरण बहुमत हो जाने से देश हित में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा जो ओछी राजनीती के कारण टलता चला जाता रहता है !''

बिनोद ! भगवान करे तुम्हारी यह सोच निकट भविष्य में साकार हो जाए परंतु आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह ही है, क्योंकि आज हमारे देश के हर दल में कुछ ऐसे पूर्वाग्रही लोग विराजमान हैं जो अपने मतलब के ऊपर और कुछ नहीं देखते ! अपनी वर्षों पुरानी लीक छोड़ना नहीं चाहते ! अपनी सोच ही उन्हें सर्वोपरि लगती है ! उनके लिए देश गौण है !"

पर भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

बिनोद ! यह सब कहने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है ! पर यदि ऐसा होने लगेगा तो सत्तारूढ़ दल के अच्छे कामों के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ती ही चली जाएगी और यह बात विरोधी दलों को बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इसीके चलते उनका सत्ता में आने का अवसर कम होता चला जाएगा और आज के समय में सत्ता-विहीन रहना कौन पसंद करता है ! इसके अलावा मौकापरस्तों के द्वारा दल-बदल की संभावना भी बढ़ सकती है !"

(गहरी सांस).....आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, भइया जी ! अच्छाई के साथ दस ठो बुर्रइये भी साथे चला आता है। पर बुड़बक लोग ई नहीं समझता है कि देश है तभी इनका पाटी है !'' 

वही कह रहा हूँ ! रेगिस्तान में तो फिर भी पानी मिलने की उम्मीद हो सकती है पर फिलहाल इस विचार के फलीभूत होने की कोई भी संभावना अभी तो नहीं दिखती ! उस पर खेद इस बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव, हमारी फितरत में कोई ज्यादा फर्क नहीं आ पाया है। 

जकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई का, चाहे इसके चलते खुद की ही  स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए, चाहे देश की प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों ना लग जाए ! ऐसे परिवेश में वैसी एकता की बात तो दूर की क्या कहीं की कौड़ी भी नहीं लगती ! 

आज समय की मांग है कि हमें और सजग हो, समाज को जागरूक करना है ! अपने समर्पित, कर्मठ, योग्य, देश-हितकारी नायकों को पहचानने और उनका साथ देने और खड़े होने की जरुरत है ! आजके अधिकांश एक्सीडेंटल या छप्पर फाडू उपलब्धि वाले लोग नेता होने या कहलाने के लायक ही नहीं हैं ! जरुरत है ऐसे धूर्त और मक्कार लोगों की सच्चाई सामने लाने और उन्हें उनकी वाजिब औकात दिखा उन्हें दरकिनार करने की ! जरुरी नहीं है कि अपराधी को मार ही दिया जाए, उसकी जलालत, उसकी बेकद्री, उसकी अवहेलना, उसके लिए मौत से ज्यादा बदतर साबित हो सकती है !"

मु झको अपने अंदर एक तीखी सी कसमसाहट, एक छटपटाहट, जल्द कुछ ना कर पाने की बेचैनी, दिमाग पर एक अजीब सा बोझ महसूस हो रहा था, जो मेरी साँसों के साथ बाहर निकल कमरे में पसर कर वहां के माहौल में भी एक भारीपन तारी करने लगा था..........!  

इससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय था ! सो फिर अंदर गुहार लगाई एक कड़क चाय के लिए   

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