जागरूकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जागरूकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 31 मई 2025

बिनोद का मुंगेरी वाला सपना

भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह, देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

डोर बेल बजी ! शाम के सात बजा चाह रहे थे, पर अभी भी बहुत गर्मी थी ! कौन आ गया, सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने बिनोद था ! उसे देख अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद आया था ! उसके प्रणाम का जवाब देते-देते उसे अंदर लिवा लाया ! चाय बन ही रही थी, उस में थोड़ा सा मटेरियल और बढ़ा दिया गया ! सामयिक विषयों पर बातों के दौरान मुझे लग रहा था कि बिनोद के दिमाग में जरूर कुछ ना कुछ चल रहा है जो वह मुझसे साझा करना चाहता है ! 

मेरा अंदाजा बिलकुल सही था। चाय ब्रेक के तुरंत बाद ही वह शुरू हो गया ! 

भइया जी, अभी जो सिंदूर ऑप्रेशन के बाद अल्हदा-अल्हदा पाटी का नेता लोग को ले कर जो डेलिगेशनवा देश का पच्छ रखने के लिए बाहर भेजा गया है, ऊही से एक सवाल मन में उठता है कि देश का भलाई में जब ऐसा किया जा सकता है, तो फिर अपना देश का राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकता ? वैसे भी हम सब लोग देखा ही है कि अपना हित के लिए कई राज्य में घोर विरोधी भी आपस में हाथ मिलाता रहता है ! दुनिया की भलाई को देखते हुए अलग-अलग सोच वाला लोग भी मिल कर काम करने लगता है ! तो पाटी अपनी जगह है, अपना विचार अपनी जगह है पर जब देश का बात आता है तो देश का पाटी काहे एक नहीं हो जाता है ? अगर ऐसा हो जाए तो देश का विकास अऊर तेज हो सकता है ! देश का एकता मजबूत हो सकता है ! सबसे पहले तो देशे ही है ना ?"

मैं एकदम चौंक पड़ा ! आज के युवा की ऐसी सकारात्मक सोच देश के उज्जवल भविष्य की द्योतक है। सामान्य होने में कुछ क्षण लगे, फिर कहा, बिलकुल सही सोच रहे हो, बिनोद ! आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी, पर शायद लालसा, अहम या भिन्न विचारधाराओं के चलते नए-नए दल बनते गए और देश पिछड़ता गया !"

हाँ भइया जी, बहुते दिन से हम एही सोच रहे थे कि यदि ऐसा हो जाए तो टुच्ची राजनीति के दिन खत्मे हो जाएंगे ! मउका-परस्तों का दुकाने बंद हो जाएगा ! भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा, अउर सबसे बड़का बात, पूरण बहुमत हो जाने से देश हित में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा जो ओछी राजनीती के कारण टलता चला जाता रहता है !''

बिनोद ! भगवान करे तुम्हारी यह सोच निकट भविष्य में साकार हो जाए परंतु आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह ही है, क्योंकि आज हमारे देश के हर दल में कुछ ऐसे पूर्वाग्रही लोग विराजमान हैं जो अपने मतलब के ऊपर और कुछ नहीं देखते ! अपनी वर्षों पुरानी लीक छोड़ना नहीं चाहते ! अपनी सोच ही उन्हें सर्वोपरि लगती है ! उनके लिए देश गौण है !"

पर भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

बिनोद ! यह सब कहने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है ! पर यदि ऐसा होने लगेगा तो सत्तारूढ़ दल के अच्छे कामों के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ती ही चली जाएगी और यह बात विरोधी दलों को बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इसीके चलते उनका सत्ता में आने का अवसर कम होता चला जाएगा और आज के समय में सत्ता-विहीन रहना कौन पसंद करता है ! इसके अलावा मौकापरस्तों के द्वारा दल-बदल की संभावना भी बढ़ सकती है !"

(गहरी सांस).....आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, भइया जी ! अच्छाई के साथ दस ठो बुर्रइये भी साथे चला आता है। पर बुड़बक लोग ई नहीं समझता है कि देश है तभी इनका पाटी है !'' 

वही कह रहा हूँ ! रेगिस्तान में तो फिर भी पानी मिलने की उम्मीद हो सकती है पर फिलहाल इस विचार के फलीभूत होने की कोई भी संभावना अभी तो नहीं दिखती ! उस पर खेद इस बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव, हमारी फितरत में कोई ज्यादा फर्क नहीं आ पाया है। 

आ जकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई का, चाहे इसके चलते खुद की ही  स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए, चाहे देश की प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों ना लग जाए ! ऐसे परिवेश में वैसी एकता की बात तो दूर की क्या कहीं की कौड़ी भी नहीं लगती ! 

आज समय की मांग है कि हमें और सजग हो, समाज को जागरूक करना है ! अपने समर्पित, कर्मठ, योग्य, देश-हितकारी नायकों को पहचानने और उनका साथ देने और खड़े होने की जरुरत है ! आजके अधिकांश एक्सीडेंटल या छप्पर फाडू उपलब्धि वाले लोग नेता होने या कहलाने के लायक ही नहीं हैं ! जरुरत है ऐसे धूर्त और मक्कार लोगों की सच्चाई सामने लाने और उन्हें उनकी वाजिब औकात दिखा उन्हें दरकिनार करने की ! जरुरी नहीं है कि अपराधी को मार ही दिया जाए, उसकी जलालत, उसकी बेकद्री, उसकी अवहेलना, उसके लिए मौत से ज्यादा बदतर साबित हो सकती है !"

मु झको अपने अंदर एक तीखी सी कसमसाहट, एक छटपटाहट, जल्द कुछ ना कर पाने की बेचैनी, दिमाग पर एक अजीब सा बोझ महसूस हो रहा था, जो मेरी साँसों के साथ बाहर निकल कमरे में पसर कर वहां के माहौल में भी एक भारीपन तारी करने लगा था..........!  

इससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय था ! सो फिर अंदर गुहार लगाई एक कड़क चाय के लिए   

गुरुवार, 23 मई 2024

क्यों.....?

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बेतहाशा गर्मी की अपरान्ह बेला में घंटी की ध्वनि पर दरवाजा खोला, तो सामने बिनोद खड़ा था ! बहुत दिनों पर आया था ! अंदर बुला, बैठाया और पूछा, अरे बिनोद ! कहां थे इतने दिनों तक ? नजर नहीं आए !''

गांव गया था, भईया !'' 

गांव ! कहां पर ! इतनी गर्मी में ? 

गिरिडीह, झारखंड ! ऊ का है कि.........वोट देने खातिर गया था !''

सिर्फ वोट देने ! इतनी दूर ! पर पहले तो तुम ...........!''

नहीं ! इस बार सोचे कि वोट देना जरुरी है ! आपहिं तो बताए थे कि कइसे एक ठो वोट से भी केतना फर्क पड़ जाता है ! 

मैं आश्चर्य से उसका चेहरा देख रहा था ! जो अपने परिवार की हारी-बिमारी में भी तीन बार सोचता था घर जाने को, वह इस बार चुनाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का, मौसम की विपरीत परिस्थितियों में भी, मन बना गया ! ठीक है इसी बहाने घर-परिवार से मिलना-जुलना भी हो गया पर वह प्राथमिकता नहीं थी ! सच कहूं तो यह बदलाव यह जागरूकता सुखद भी लगी ! 

चलो बहुत अच्छा किया, सबसे मिल भी आए ! पर यह तो बताओ किसको वोट दिए ? अब तो दे ही आए हो छिपाने की कोई बात ही नहीं है, बता सकते हो !''

नहीं छिपाने का कोनो बात ही नहीं है इसमें भईया जी, भाजपा को दिए हैं !''     

भाजपा को ? पर तुम और तुम्हारा परिवार तो कट्टर कांग्रेस समर्थक रहे हो सदा से !''

बिनोद मुंह नीचे किए बैठा रहा ! जैसे भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा हो ! फिर गहरी सांस ली, बोला- 

हम जैसे लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है भईया जी, इस तरह का बदलाव ! किसी परंपरा को, किसी चलन को, किसी आस्था को झटके से बदलना आसान नहीं होता ! हम लोग आजकल के नेताओं की तरह तो हैं नहीं ! जिनकी आत्मा सुबह किसी के, तो शाम किसी और के प्रति समर्पित हो जाए ! जो सिर्फ अपने व्यक्तिगत मतलब या स्वार्थ के कारण अपनी वफादारी बदल लें ! हम जुड़े होते हैं अपने अतीत से, अपने अनुभवों से, अपनी सच्चाई से ! मेरा परिवार देश के अनगिनत लोगों की तरह देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा रहा है ! मेरे दादा-दादी दुन्नो अंग्रेजों की जेल में रहे थे ! हमारे बुजुर्गों ने देखा है, लोगों को आजादी के यज्ञ में होम होते ! विभाजन का दर्द भोगा है ! जीया है उन पलों को ! पैबस्त हैं वे दर्दनाक लम्हें हमारे जिगर में ! उस समय कांग्रेस ही सामने थी, उसीका संघर्ष दिखलाई पड़ता था ! देश का हर बड़ा नेता उसी से जुड़ा हुआ था ! इसीलिए हमारी पिछली पीढ़ियां उसके प्रति समर्पित हो गईं ! समर्पण भी ऐसा कि यदि सत्य भी शरीर धारण कर सामने आ, उसके विरुद्ध कुछ बोले तो किसी को स्वीकार्य नहीं था !  किसी नेता के निधन हो जाने पर घर में खाना नहीं बनता था ! हमारे बुजुर्गों के लिए पार्टी की बात धर्म वाक्य की तरह होती थी ! अपने जीवन के अंत तक उन्होंने उसका दामन थामे रखा था !''

कुछ उदास हो उसको चुप होते देख मैंने पूछ ही लिया, 

फिर यह बदलाव कैसे ?''

बिनोद ने सर उठाया ! सीधे मेरी आँखों में देखा ! उसकी दृष्टि से एक बार तो मैं भी असहज हो गया ! उसकी धीर-गंभीर आवाज ऐसे लगी जैसे किसी गहरे कुएं से आ रही हो !

भईया जी ! वह देश प्रेम था जिसके लिए लोगों ने बेपरवाह हो अपनी जानें कुर्बान कर दीं ! अपने परिजनों को खो दिया ! फिर उसी देश के टुकड़े हो गए ! जैसे किसी ने माँ को बांट दिया हो ! पिछली पीढ़ियों में वह घाव कभी भरा नहीं ! फिर भी वे पुराने नेताओं को याद कर इस दल के साथ ही बने रहे ! समय बदला, नेता मतलबपरस्त होने लगे ! देश पीछे छूटता गया व्यक्ति व परिवार व उसका अहम हावी होते चले गए ! आजादी की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी अपनी अंदरूनी लड़ाई में लिप्त हो गई ! पुराने लोगों का मोहभंग होने लगा, कार्यकर्त्ता दल छोड़-छोड़ कर जाने लगे !  फिर भी बहुत से लोगों ने धैर्य बनाए रखा कि शायद कुछ सुधार हो ही जाए ! 

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! और तो और श्री राम तक को सम्मान देने से कतराने लगें! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

बिनोद चुप हो गया ! उसका यह रूप मैंने पहली बार देखा था ! आजतक उसको अपनी रोजी-रोटी के लिए जूझते एक युवा के तौर पर ही तवज्जो दी थी ! पर ऐसी सोच ! ऐसा विश्लेषण ! इतना आक्रोश पहली बार देखा था ! वह पहचान बन रहा था, आजकी युवा पीढ़ी का ! वह मिसाल का रूप ले रहा था, आज की पीढ़ी की जागरूकता का ! और सबसे बड़ी बात यह उद्घोष था, हर उस नेता के विरुद्ध, चाहे वह किसी भी पार्टी या दल का हो, जो खुद को देश, देश के संविधान और उसकी व्यवस्था के ऊपर खुद को रख, अवाम को नासमझ मान, अपना उल्लू सीधा करने की फिराक और गलतफहमी में रह किसी भी तरह सत्ता को हथियाने का उपक्रम करता रहता है !

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

बसंत आया तो है, पर....

मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ 

#हिन्दी_ब्लागिंग        

बसंत फिर आया तो है ! पर यह कैसा हो गया है, सुस्त, मलिन सा ! जर्जर सी काया ! कांतिहीन चेहरा ! मुखमण्डल पर विषाद की छाया ! पहले कैसे इसके आगमन की सूचना भर से प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता था ! सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक मादक अंगड़ाई ले आलस्य त्याग जागने लगती थी ! जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता था ! वृक्ष, पेड़-पौधे सब नए पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते थे ! सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब प्रफुल्लित हो जाती थी। पर इस बार तो जैसे मायूसी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! जीव-जंतु-पादप सभी जैसे किसी अज्ञात संकट से डरे, सहमे सदमाग्रस्त हुए से लग रहे हैं ! उन्हें डर है कि जैसे बसंत धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है वैसे ही बाकी मौसम भी मुंह फेर गए तो क्या होगा, इस शस्य-श्यामला का ? ऐसा क्यों !
उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता
तभी पिछले वर्ष की वह भोर फिर मेरे मष्तिष्क में कौंध जाती है ! साल गुजर गया इस बात को ! पर अभी भी जब उस पल की याद आती है तो सिहरन तो होती ही है साथ ही विश्वास भी नहीं होता कि उस दिन सचमुच कुछ वैसा भी हुआ था ! आज भी मुझे उस साल भर पहले की सुबह का एक-एक लम्हा अच्छी तरह याद है। जब पौ फटी नहीं थी और मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई दी थी। उस दिन रात देर से सोने के कारण अर्द्ध-सुप्तावस्था सी हालत हो रही थी। इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर मोह लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास !
बसंत 
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !

बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया  सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में डर की एक सर्द लहर सी  सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करूंगा। आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा, उस समय प्रकृति के सुंदर, अद्भुत बदलाव को ! सृजन ही मेरा कर्म है ! धरा को जीवंत रखना मेरा फर्ज ! जीव-जंतुओं, लता-गुल्म की सुरक्षा मेरा उद्देश्य ! 
प्रकृति 
इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। वह मेरी ओर देख रहा था। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि अब वक्त आ गया है, गहन चिंतन का ! लोगों को अपने पर्यावरण, अपने परिवेश, अपनी प्रकृति, अपने माहौल के प्रति जागरूक होने का ! अपनी धरोहरों को बचाने का ! जिससे आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। अवाम को अपनी गफलतों से किनारा करना ही होगा ! नहीं तो कुछ ऐसी अनहोनी ना घट जाए जिस पर बाद में पछताने का कोई लाभ ना हो ! हाथ मलते रहने के सिवा कोई चारा ना हो ! 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मैं पता नहीं कहाँ खो गया ! पता नहीं ऐसे में कितना वक्त निकल गया ! तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो। कंप्यूटर अभी भी चल रहा है, कागज बिखरे पड़े हैं, फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे। सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में हम दोनों के सिवाय और कोई नहीं था। पर जो भी घटित हुआ था, वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं, वह सब भ्रम था ! कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!
महामारी 
पर जो भी हुआ था, जैसे भी हुआ था ! जिस तरह उस दिन जिस गंभीर समस्या की ओर ध्यान गया या दिलाया गया था ! सचेत किया गया था ! उसको हल्के में ले, उसके निवारण हेतु कुछ भी तो सकारात्मक नहीं किया था हमने ! एक सपने की तरह भूला दिया था ! गैस चैंबर में घुट-घुट कर जीते रहने के बावजूद हम सदा की  की तरह निश्चिन्त थे कि प्रकृति खुद ब खुद अपने में सुधार ले आएगी ! हम उसी प्रकृति का दम घोंटने में लगे रहे, उसी कायनात की ऐसी की तैसी कर रख दी, जिसने सिर्फ हमें छह-छह ऋतुओं की नेमत सौंपी है ! वह हमें बार-बार चेताती रही ! उसके संदेशे आते रहे ! पर हम अपने गुमान में ही जीते रहे ! फिर धीरे-धीरे ऋतुएं बदलने लगीं ! मौसम क्रूर होने लगे ! ऋतु चक्र डांवाडोल होने लगा ! पर हम कानों में तेल और आँखों पर पट्टी बांध अपनी कुटिल कारगुजारियों में मशगूल रहे ! 

नतीजतन एक अनजान, लाइलाज, विश्वव्यापी महामारी ने हमें अपने पंजों में धर दबोचा। सारी दुनिया में हाहाकार मचा दिया ! लोग बेतहाशा काल के गाल में समाने लगे ! ना कोई इलाज, ना कोई दवा ! इंसान अपने ही घरों में कैद हो कर रहने को मजबूर हो गया ! पूरी जिंदगी थम कर रह गई ! मानव के अमूल्य जीवन का एक साल पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया ! अभी भी संकट टला नहीं है ! पर पता नहीं इंसान ने सीख ली या नहीं !  

यदि नहीं तो अब कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे ? यदि हमारे पूर्वज भी हमारी तरह सिर्फ मैं और मेरा करते रहे होते तो क्या कभी हम स्वर्ग जैसी इस धरा पर रहने का सौभाग्य पा सकते थे ? फिर मैं सोचता हूँ कि मैंने ही क्या किया इस विषय को ले कर ! सरकार का मुंह तकने, दूसरों से पहल की अपेक्षा रखने और सिवा नुक्ताचीनी के ! किसी की ओर उंगली उठाने से पहले मैंने कोई पहल की इस ओर ? कोई जागरूकता फैलाई ? अपनी तरफ से कोई कदम उठाया इस समस्या के निवारण हेतु ? पर अब इस विपदा से सबक लेते हुए सुधरना तो होगा ही, नहीं तो अब बसंत नहीं आने वाला फिर चेताने के लिए !! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

ये जीना भी कोई जीना है लल्लू

अवचेतन मन-मष्तिष्क को लगातार सकारात्मक संदेश, अच्छे विचार प्रेषित किए जाएं तो वह निराशा से उबर जाता है ! हमें बचपन से बताया जाता रहा है कि ई...