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गुरुवार, 23 मई 2024

क्यों.....?

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बेतहाशा गर्मी की अपरान्ह बेला में घंटी की ध्वनि पर दरवाजा खोला, तो सामने बिनोद खड़ा था ! बहुत दिनों पर आया था ! अंदर बुला, बैठाया और पूछा, अरे बिनोद ! कहां थे इतने दिनों तक ? नजर नहीं आए !''

गांव गया था, भईया !'' 

गांव ! कहां पर ! इतनी गर्मी में ? 

गिरिडीह, झारखंड ! ऊ का है कि.........वोट देने खातिर गया था !''

सिर्फ वोट देने ! इतनी दूर ! पर पहले तो तुम ...........!''

नहीं ! इस बार सोचे कि वोट देना जरुरी है ! आपहिं तो बताए थे कि कइसे एक ठो वोट से भी केतना फर्क पड़ जाता है ! 

मैं आश्चर्य से उसका चेहरा देख रहा था ! जो अपने परिवार की हारी-बिमारी में भी तीन बार सोचता था घर जाने को, वह इस बार चुनाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का, मौसम की विपरीत परिस्थितियों में भी, मन बना गया ! ठीक है इसी बहाने घर-परिवार से मिलना-जुलना भी हो गया पर वह प्राथमिकता नहीं थी ! सच कहूं तो यह बदलाव यह जागरूकता सुखद भी लगी ! 

चलो बहुत अच्छा किया, सबसे मिल भी आए ! पर यह तो बताओ किसको वोट दिए ? अब तो दे ही आए हो छिपाने की कोई बात ही नहीं है, बता सकते हो !''

नहीं छिपाने का कोनो बात ही नहीं है इसमें भईया जी, भाजपा को दिए हैं !''     

भाजपा को ? पर तुम और तुम्हारा परिवार तो कट्टर कांग्रेस समर्थक रहे हो सदा से !''

बिनोद मुंह नीचे किए बैठा रहा ! जैसे भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा हो ! फिर गहरी सांस ली, बोला- 

हम जैसे लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है भईया जी, इस तरह का बदलाव ! किसी परंपरा को, किसी चलन को, किसी आस्था को झटके से बदलना आसान नहीं होता ! हम लोग आजकल के नेताओं की तरह तो हैं नहीं ! जिनकी आत्मा सुबह किसी के, तो शाम किसी और के प्रति समर्पित हो जाए ! जो सिर्फ अपने व्यक्तिगत मतलब या स्वार्थ के कारण अपनी वफादारी बदल लें ! हम जुड़े होते हैं अपने अतीत से, अपने अनुभवों से, अपनी सच्चाई से ! मेरा परिवार देश के अनगिनत लोगों की तरह देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा रहा है ! मेरे दादा-दादी दुन्नो अंग्रेजों की जेल में रहे थे ! हमारे बुजुर्गों ने देखा है, लोगों को आजादी के यज्ञ में होम होते ! विभाजन का दर्द भोगा है ! जीया है उन पलों को ! पैबस्त हैं वे दर्दनाक लम्हें हमारे जिगर में ! उस समय कांग्रेस ही सामने थी, उसीका संघर्ष दिखलाई पड़ता था ! देश का हर बड़ा नेता उसी से जुड़ा हुआ था ! इसीलिए हमारी पिछली पीढ़ियां उसके प्रति समर्पित हो गईं ! समर्पण भी ऐसा कि यदि सत्य भी शरीर धारण कर सामने आ, उसके विरुद्ध कुछ बोले तो किसी को स्वीकार्य नहीं था !  किसी नेता के निधन हो जाने पर घर में खाना नहीं बनता था ! हमारे बुजुर्गों के लिए पार्टी की बात धर्म वाक्य की तरह होती थी ! अपने जीवन के अंत तक उन्होंने उसका दामन थामे रखा था !''

कुछ उदास हो उसको चुप होते देख मैंने पूछ ही लिया, 

फिर यह बदलाव कैसे ?''

बिनोद ने सर उठाया ! सीधे मेरी आँखों में देखा ! उसकी दृष्टि से एक बार तो मैं भी असहज हो गया ! उसकी धीर-गंभीर आवाज ऐसे लगी जैसे किसी गहरे कुएं से आ रही हो !

भईया जी ! वह देश प्रेम था जिसके लिए लोगों ने बेपरवाह हो अपनी जानें कुर्बान कर दीं ! अपने परिजनों को खो दिया ! फिर उसी देश के टुकड़े हो गए ! जैसे किसी ने माँ को बांट दिया हो ! पिछली पीढ़ियों में वह घाव कभी भरा नहीं ! फिर भी वे पुराने नेताओं को याद कर इस दल के साथ ही बने रहे ! समय बदला, नेता मतलबपरस्त होने लगे ! देश पीछे छूटता गया व्यक्ति व परिवार व उसका अहम हावी होते चले गए ! आजादी की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी अपनी अंदरूनी लड़ाई में लिप्त हो गई ! पुराने लोगों का मोहभंग होने लगा, कार्यकर्त्ता दल छोड़-छोड़ कर जाने लगे !  फिर भी बहुत से लोगों ने धैर्य बनाए रखा कि शायद कुछ सुधार हो ही जाए ! 

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! और तो और श्री राम तक को सम्मान देने से कतराने लगें! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

बिनोद चुप हो गया ! उसका यह रूप मैंने पहली बार देखा था ! आजतक उसको अपनी रोजी-रोटी के लिए जूझते एक युवा के तौर पर ही तवज्जो दी थी ! पर ऐसी सोच ! ऐसा विश्लेषण ! इतना आक्रोश पहली बार देखा था ! वह पहचान बन रहा था, आजकी युवा पीढ़ी का ! वह मिसाल का रूप ले रहा था, आज की पीढ़ी की जागरूकता का ! और सबसे बड़ी बात यह उद्घोष था, हर उस नेता के विरुद्ध, चाहे वह किसी भी पार्टी या दल का हो, जो खुद को देश, देश के संविधान और उसकी व्यवस्था के ऊपर खुद को रख, अवाम को नासमझ मान, अपना उल्लू सीधा करने की फिराक और गलतफहमी में रह किसी भी तरह सत्ता को हथियाने का उपक्रम करता रहता है !

सोमवार, 6 मई 2024

सियालकोट भारत में शामिल होते-होते रह गया था

कुछ लोगों की लापरवाही या कहिए आरामपरस्ती ने देशों के नक्शे बदल कर रख दिए ! ऐसे लोगों के कारण सियालकोट का हिन्दू बहुल इलाका भारत में शामिल होते-होते रह गया ! 1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिन्दुओं की तादाद दो लाख इक्कीस हजार थी। उस में से तकरीबन एक लाख लोगों ने वोट नहीं दिया था और पचपन हजार मतों से सियालकोट का भारत में शामिल करने का प्रस्ताव गिर गया था !  वैसे यह आदत या चरित्र अभी भी पूरी तरह बदली नहीं है..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सियालकोट, पकिस्तान का एक शहर ! आज जो लोग अपने एक वोट को लेकर लापरवाह हैं उनको पता होना चाहिए कि 1946 में कुछ लोगों की आरामपरस्ती, लापरवाही या फर्ज के प्रति उदासीनता के कारण यह शहर हिन्दुस्तान का हिस्सा बनते-बनते रह गया था ! 

कतारें 
देश में आजकल चुनाव चल रहे हैं ! वोट की महत्ता, ताकत, उपयोगिता के बारे में लोगों को जागरूक किया जा रहा है। ऐसा करना जरुरी भी है क्योंकि अधिकांश लोग मतदान के दिन मिले अवकाश को एक अतिरिक्त मिली छुट्टी की तरह ले तफरीह में लग जाते हैं ! उन्हें लगता है कि मेरे एक वोट से कौन सी दुनिया बदल जाएगी ! इसी सोच के कारण हर बार हजारों वोट बेकार चले जाते हैं और नतीजा कुछ का कुछ हो जाता है ! देश की सरकारों को तो छोड़िए देशों का नक्शा तक बदल कर रह जाता है ! इसका एक उदाहरण है सियालकोट ! 
प्रतीक्षा 
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप सिंह जी ने अपने यू-ट्यूब चैनल ''आपका अखबार'' में एक घटना का जिक्र किया है, जिसके अनुसार मतदाताओं की आरामपरस्ती और लापरवाही से सियालकोट जो लाहौर से 135 तथा जम्मू से सिर्फ 42 किमी दूर है और उस समय  भारत का हिस्सा बनते-बनते रह गया था ! बात बंटवारे के पहले की है जब देश के बंटवारे की प्रक्रिया चल रही थी। देश के बड़े नेता गोपीनाथ बोरदोलोई चाहते थे कि सियालकोट भारत का हिस्सा बने क्योंकि उस समय वह हिन्दू बहुल इलाका था ! पर फिर भी यह तय पाया गया की उसका भविष्य जनमत संग्रह से होगा। दिन, तारीख, समय और वोट का तरीका तय हो गया। निश्चित समय पर मतदान शुरू होते ही पोलिंग बूथ के सामने मुसलमानों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं। उन्होंने अपने वोट का हक अदा किया। इधर अधिकांश हिन्दू आराम से उठे, नास्ता-पानी किया और दोपहर तक वहां पहुंच कर लंबी-लंबी कतारों को देखा तो आधे तो ऐसे ही वापस आ गए कि कौन इतनी देर खड़ा रहेगा ! कुछ लोग रुके कि यदि लाइन जल्दी छोटी हो जाए तो वोट डाल ही देते हैं पर वे भी कतारों की सुस्त रफ्तार से तंग या कहिए थक कर वापस हो लिए !
उत्साह 
जनमत संग्रह का जब नतीजा आया तो पता चला कि 55000 वोटों से यह प्रस्ताव पास हो गया कि सियालकोट को पाकिस्तान में शामिल किया जाएगा ! इस तरह एक हिन्दु बहुल इलाका भारत में शामिल होते-होते रह गया ! 1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिन्दुओं की तादाद दो लाख इक्कीस हजार थी। उस में से तकरीबन एक लाख लोगों ने वोट नहीं दिया था और पचपन हजार मतों से सियालकोट का भारत में शामिल करने का प्रस्ताव गिर गया था ! कुछ लोगों की लापरवाही या कहिए आरामपरस्ती ने देशों के नक्शे बदल कर रख दिए ! वैसे यह आदत या चरित्र अभी भी पूरी तरह बदला नहीं है ! 
जोश 
इसके बाद का इतिहास लोगों को मालुम ही होगा जब 1946 के  सोलह अगस्त के जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का कहर सियालकोट पर भी बरपा, खून-खराबा हुआ ! लूट-खसोट हुई ! वो आराम-तलब लोग भी सदा के लिए आराम के हवाले कर दिए गए जो लंबी कतारें देख घर वापस आ गए थे ! उन्हीं जैसे लोगों की लापरवाही के कारण 1951 की जनगणना के अनुसार वहां हिंदुओं की संख्या सिर्फ दस हजार रह गई थी, इतना ही नहीं 2017 की गणना के अनुसार वहां केवल 500 हिन्दू बचे थे ! आज का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, पता नहीं एक भी हिन्दू बचा भी है कि नहीं ! 
EVM
तो अपने विवेक का प्रयोग कर, देश हित में वोट तो जरूर दें, बिना किसी के बहकावे में आए ! जो आपको सुपात्र लगे ! साफ- सुथरी छवि का हो ! देश, जनहित की बात करता हो ! निष्पक्ष हो ! बेदाग हो और जन-जन का हो ! 
वंदे मातरम ! 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...