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गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए

बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह मुफ्तखोर गीदड़ दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप को सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को रोज तंग करने लगा ! किसी से कुछ भी छीन लेना उसके लिए आम बात हो गई ! अब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या किसी ताजा घटना की याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है.............  😊   

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

र इंसान के जीवन में कम से कम एक बार तो समय अनुकूल होता ही है ! उसी वक्त की मेहरबानी के चलते पिद्दी भी पहलवान बन जाती है ! पर कुछ पिद्दियां इतिहास से कोई सबक ना लेते हुए इस अनुकूलता को अपनी नियति, अपना शौर्य समझ इतनी अराजक, अहंकारी और धृष्ट हो जाती हैं कि खुद को ही भगवान समझने लगती हैं ! वे भूल जाती हैं कि समय कभी भी एक समान नहीं रहता ! ऐसी ही कुछ पिद्दियों का हश्र देख बचपन की एक कहानी याद आ गई, जो यही सीख देती है कि किसी को भी अपनी औकात, अपनी बिसात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए ! कहानी कुछ इस प्रकार है :

भटकन 
क जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।


ऐश 
गीदड़ के समय के अनुकूल होते ही उसके दिन फिर गए। बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को तंग करने लगा ! किसी से उसका कुछ भी छीन लेना आम बात हो गई ! धीरे-धीरे उसे लगने लगा की इन डरपोक जानवरों का तो मैं भी शिकार कर सकता हूँ !  ऐसा ख्याल आते ही अब वह शेर को शिकार करते हुए ध्यान देखने लगा। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। 
समझाइश 
गीदड़ अपने गुमान में अपनी औकात भूल गया ! उसे लगने लगा कि शिकार करना तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आए हैं, आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताए, पर गीदड़ जिद पर अड़ा रहा तो शेर ने उसे इजाजत दे दी। समय ने करवट ले ली थी !
मतिभृष्टता 
अंत 
दूसरे दिन सुबह वह मांद से निकला। जंगल में कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आ गया। आज तक उसने हाथी का मांस नहीं खाया था। पर उसे मालुम नहीं था कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जाएगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद तो गया, पर हाथी के विशाल शरीर से टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने उसकी हरकत पर झुंझला कर उसे सूंड में लपेट दूर उछाल दिया ! गीदड़ की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया। शेर ने एक बार उधर देखा फिर अपना मुंह मोड़ लिया !
ब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या कोई ताजा घटना याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है 😊  

@छवियों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है

कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आती है, तब-तब जनता उसे सबक सिखाती है ! इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है.......................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब किसी ने अपने सबसे बड़े सहयोगी की जरुरत को ही नकार दिया था ! तब जनता ने उन्हें ही कुछ हद तक नकारा बना दिया था ! एक था, जिसने जन्मों-जन्मों तक की भविष्यवाणी कर दी थी, जनता ने उसी के सिम्बल से उसे बुहार कर किनारे कर दिया ! एक के लगातार विष-वमन से तंग आ लोगों ने उसका दायरा ही तंग कर डाला ! एक ने जातियों का व्यूह रचा, अवाम ने उसे पांति के ही लायक ना छोड़ा ! एक ने डर, हिंसा, खौफ का माहौल बना खुद को अजेय करना चाहा, उसे आज दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है ! 

जनता जनार्दन 
फिर भी है कि लोग समझते ही नहीं, ताजा उदाहरण है, एक भाई साहब, जिनका नाम भी देश के अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा, अचानक अपने सहयोगी दल को एक मजबूरी बता मिडिया की सुर्खियां बन गए ! अब वह लाख सफाई देते रहें, अपने कहे का अर्थ बदलते रहें, नुक्सान तो हो गया ! लातूर जिले में ऐसी ही बयानबाजी के चलते मिले विपरीत परिणामों से भी उन्होंने कुछ नहीं सीखा !  बोलना है कुछ भी भक्क से उगल दिया ! ऐसी ही हरकत सामने से भी कुछ दिनों पहले हुई थी, जिसने दोस्त, मित्र, साथी, अनुयायी सभी को सकते में ला दिया था !

याद आता है जब 1977 में इंदिरा जी चुनाव हारी थीं, तब जीतने के बाद जनता दल, देश और देशवासियों के हित में कुछ करने के बजाय सिर्फ इस बात पर जुट गया कि इस महिला को जेल भिजवाना है ! पब्लिक को यह सब रास नहीं आया और जनता दल को ही दलदल बना डाला ! 

खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !

निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    

जय हिंद 🙏

शनिवार, 31 मई 2025

बिनोद का मुंगेरी वाला सपना

भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह, देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

डोर बेल बजी ! शाम के सात बजा चाह रहे थे, पर अभी भी बहुत गर्मी थी ! कौन आ गया, सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने बिनोद था ! उसे देख अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद आया था ! उसके प्रणाम का जवाब देते-देते उसे अंदर लिवा लाया ! चाय बन ही रही थी, उस में थोड़ा सा मटेरियल और बढ़ा दिया गया ! सामयिक विषयों पर बातों के दौरान मुझे लग रहा था कि बिनोद के दिमाग में जरूर कुछ ना कुछ चल रहा है जो वह मुझसे साझा करना चाहता है ! 

मेरा अंदाजा बिलकुल सही था। चाय ब्रेक के तुरंत बाद ही वह शुरू हो गया ! 

भइया जी, अभी जो सिंदूर ऑप्रेशन के बाद अल्हदा-अल्हदा पाटी का नेता लोग को ले कर जो डेलिगेशनवा देश का पच्छ रखने के लिए बाहर भेजा गया है, ऊही से एक सवाल मन में उठता है कि देश का भलाई में जब ऐसा किया जा सकता है, तो फिर अपना देश का राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकता ? वैसे भी हम सब लोग देखा ही है कि अपना हित के लिए कई राज्य में घोर विरोधी भी आपस में हाथ मिलाता रहता है ! दुनिया की भलाई को देखते हुए अलग-अलग सोच वाला लोग भी मिल कर काम करने लगता है ! तो पाटी अपनी जगह है, अपना विचार अपनी जगह है पर जब देश का बात आता है तो देश का पाटी काहे एक नहीं हो जाता है ? अगर ऐसा हो जाए तो देश का विकास अऊर तेज हो सकता है ! देश का एकता मजबूत हो सकता है ! सबसे पहले तो देशे ही है ना ?"

मैं एकदम चौंक पड़ा ! आज के युवा की ऐसी सकारात्मक सोच देश के उज्जवल भविष्य की द्योतक है। सामान्य होने में कुछ क्षण लगे, फिर कहा, बिलकुल सही सोच रहे हो, बिनोद ! आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी, पर शायद लालसा, अहम या भिन्न विचारधाराओं के चलते नए-नए दल बनते गए और देश पिछड़ता गया !"

हाँ भइया जी, बहुते दिन से हम एही सोच रहे थे कि यदि ऐसा हो जाए तो टुच्ची राजनीति के दिन खत्मे हो जाएंगे ! मउका-परस्तों का दुकाने बंद हो जाएगा ! भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा, अउर सबसे बड़का बात, पूरण बहुमत हो जाने से देश हित में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा जो ओछी राजनीती के कारण टलता चला जाता रहता है !''

बिनोद ! भगवान करे तुम्हारी यह सोच निकट भविष्य में साकार हो जाए परंतु आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह ही है, क्योंकि आज हमारे देश के हर दल में कुछ ऐसे पूर्वाग्रही लोग विराजमान हैं जो अपने मतलब के ऊपर और कुछ नहीं देखते ! अपनी वर्षों पुरानी लीक छोड़ना नहीं चाहते ! अपनी सोच ही उन्हें सर्वोपरि लगती है ! उनके लिए देश गौण है !"

पर भइया जी, चाहे ऐसा ना भी हो, पर कम से कम ई तो होइहे सकता है कि विपच्छी दल का अनुभवी और निष्णात लोगन का सलाह देश हित में जो भी सत्तारूढ़ दल हो, ले लिया करे ! अब देखिए ना, कोई भी सरकार बदल जाता है तो भी पुरनका अफसर लोग तो वहिऐं ना रहता है ! ऊ लोग तो पाटी नहीं देशे का सेवा ना करता रहता है ! वैसा ही नेता लोग काहे नहीं कर सकता है ?" 

बिनोद ! यह सब कहने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है ! पर यदि ऐसा होने लगेगा तो सत्तारूढ़ दल के अच्छे कामों के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ती ही चली जाएगी और यह बात विरोधी दलों को बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इसीके चलते उनका सत्ता में आने का अवसर कम होता चला जाएगा और आज के समय में सत्ता-विहीन रहना कौन पसंद करता है ! इसके अलावा मौकापरस्तों के द्वारा दल-बदल की संभावना भी बढ़ सकती है !"

(गहरी सांस).....आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, भइया जी ! अच्छाई के साथ दस ठो बुर्रइये भी साथे चला आता है। पर बुड़बक लोग ई नहीं समझता है कि देश है तभी इनका पाटी है !'' 

वही कह रहा हूँ ! रेगिस्तान में तो फिर भी पानी मिलने की उम्मीद हो सकती है पर फिलहाल इस विचार के फलीभूत होने की कोई भी संभावना अभी तो नहीं दिखती ! उस पर खेद इस बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव, हमारी फितरत में कोई ज्यादा फर्क नहीं आ पाया है। 

जकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई का, चाहे इसके चलते खुद की ही  स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए, चाहे देश की प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों ना लग जाए ! ऐसे परिवेश में वैसी एकता की बात तो दूर की क्या कहीं की कौड़ी भी नहीं लगती ! 

आज समय की मांग है कि हमें और सजग हो, समाज को जागरूक करना है ! अपने समर्पित, कर्मठ, योग्य, देश-हितकारी नायकों को पहचानने और उनका साथ देने और खड़े होने की जरुरत है ! आजके अधिकांश एक्सीडेंटल या छप्पर फाडू उपलब्धि वाले लोग नेता होने या कहलाने के लायक ही नहीं हैं ! जरुरत है ऐसे धूर्त और मक्कार लोगों की सच्चाई सामने लाने और उन्हें उनकी वाजिब औकात दिखा उन्हें दरकिनार करने की ! जरुरी नहीं है कि अपराधी को मार ही दिया जाए, उसकी जलालत, उसकी बेकद्री, उसकी अवहेलना, उसके लिए मौत से ज्यादा बदतर साबित हो सकती है !"

मु झको अपने अंदर एक तीखी सी कसमसाहट, एक छटपटाहट, जल्द कुछ ना कर पाने की बेचैनी, दिमाग पर एक अजीब सा बोझ महसूस हो रहा था, जो मेरी साँसों के साथ बाहर निकल कमरे में पसर कर वहां के माहौल में भी एक भारीपन तारी करने लगा था..........!  

इससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय था ! सो फिर अंदर गुहार लगाई एक कड़क चाय के लिए   

बुधवार, 7 अगस्त 2024

एक हैं रामचेत, सुल्तानपुर वाले

अब बात साइड इफेक्ट की ! इस मुलाकात के बाद रामचेत जी सुर्खियों में आ गए ! आना ही था ! दूकान पर लोग पहुंचने लगे ! दूर-दूर से फोन आने लगे ! अपने गांव-खेड़े में उनकी इज्जत बढ़ गई ! मीडिया उनके इंटरव्यू के लिए समय लेने लगा ! वे खुश हैं, गदगद हैं ! उनके साथ-साथ उस पुरानी चप्पल के भी भाग खुल गए ! देश-परदेस में उसकी फोटो ''वायरल'' हो गई ! खबरें हैं कि उसकी कीमत भी लगने लगी है ! कौन लगा रहा है इसकी जानकारी गोपनीय है ! ज्ञातव्य है कि कुछ सालों पहले ऐसे ही किसी पेंटिंग की भी दो करोड़ की  बोली लगी थी ! किसी को फुरसत नहीं है कि पूछे कि साहब उत्तर प्रदेश की उस गरीब महिला कलावती का आजकल क्या हाल है, जिसका पहली बार आपने मनरेगा मजदूर बन, मिटटी का टोकरा उठा कर आपने फोटुएं खिंचवाईं थी...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पिछले कई दिनों से राहुल गांधी के तरह-तरह के अवतार देश के सामने लाए जा रहे हैं ! कभी खेत में किसानों के साथ, कभी रेलवे कुलियों के साथ, कभी किसी मेकेनिक के साथ, कभी बढ़ई के साथ, कभी रेलवे के स्टाफ के साथ और कभी किसी जूते गांठने वाले की गुमटी पर ! विरोधियों द्वारा इसका काफी मजाक बनाया गया ! काफी ट्रोलिंग हुई ! उनके व्यक्तित्व पर भी सवाल उछाले गए ! पर शायद इन ड्रामों के सीधे-सरल आमजन पर पड़ने वाले प्रभाव पर किसी ने ध्यान नहीं दिया ! जो सुलतानपुर एपिसोड के बाद अचानक सामने आया है ! जिसमें रामचेत ने अपने पूरे गांव के साथ उनको वोट देने की बात की है ! इससे तो यही लगता है कि बहुत सावधानी से डूब कर पानी पिया जा रहा है ! यानी ऐड़ा बन कर नहीं, ऐड़ा बना कर पेड़ा खाया जा रहा है !     
हुनर 
पिछले दिनों 26 जुलाई को अपने एक केस के सिलसिले में यू.पी. के सुल्तानपुर के कोर्ट में पेशी के बाद लौटते समय राहुल गांधी का काफिला अचानक कूरेभार क्षेत्र के विधायक नगर के मुख्य मार्ग पर स्थित राम चेत मोची की छोटी सी गुमटीनुमा जूतों की दुकान पर रुकता है ! राहुल जी अपने दल-बल के साथ गाड़ी से उतर कर दुकान में विराजमान हो जाते हैं ! वहीं रामचेत जी से बातचीत होती है ! एक पुरानी चप्पल उठा, उसकी गठाई तथा एक जूते में सोल चिपकाया जाता है ! काफिला करीब आधा घंटा वहां गुजार, मदद का वादा कर आगे रवाना हो जाता है ! वादे के अनुसार रामचेत जी को एक मशीन भी भेजी जाती है, हालांकि बिजली ना होने की वजह से फिलहाल वह काम नहीं कर रही ! रामचेत जी भी रिटर्न गिफ्ट के रूप में अपने हाथ से बनाए दो जूते उन्हें भिजवाते हैं ! अच्छा रहा सब कुछ ! बहुत अच्छा ! 
रामचेत जी 
अब बात साइड इफेक्ट की ! इस मुलाकात के बाद रामचेत जी सुर्खियों में आ गए ! आना ही था ! दूकान पर लोग पहुंचने लगे ! फोन आने लगे ! अपने गांव-खेड़े में उनकी इज्जत बढ़ गई ! मीडिया उनके इंटरव्यू के लिए समय लेने लगा ! वे गदगद हैं ! इनके साथ-साथ उस चप्पल के भी भाग खुल गए ! देश-परदेस में उसकी फोटो ''वायरल'' हो गई ! खबरें हैं कि उसकी कीमत भी लगने लगी है ! कौन लगा रहा है, इसकी जानकारी गोपनीय है ! ज्ञातव्य है कि कुछ सालों पहले ऐसे ही किसी पेंटिंग की भी दो करोड़ की बोली लगाई गई थी ! पर अभी तो 40-45 साल से तंगहाली और गुरबत की अवस्था में रहने वाले, इस घटना से उस स्थिति में कोई खास बदलाव ना आने के बावजूद, रामचेत जी अभी इस लाइम-लाइट का मजा ले रहे हैं !
सिलाई मशीन 
इसमें सियासत क्या हुई ! एक लोकल चैनल के साक्षात्कार में जब रामचेत जी से राहुल जी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्हें पहली बार देखा है। पोस्टरों में चेहरा देखा होने की वजह से पहचान गए ! उनके अनुसार वे बहुत ही नेकदिल, दयालु और सज्जन इंसान हैं ! वे अपने वादे के भी पक्के हैं ! मैं छोटी जाति का हूँ (उन्होंने अपनी जाति भी बताई ) आजतक किसी छोट-मोटे नेता तक ने कभी मेरी दूकान की तरफ रुख नहीं किया पर आज देश का इतना बड़ा नेता आ कर मेरे पास बैठा ! मेरे से बात की ! मेरा हाल-चाल जाना ! यह उनकी महानता है ! उनका बड़प्पन है ! मैं धन्य हो गया ! 
लखटकिया चप्पल 
जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा गया कि आप वोट किसको देंगे तो बिना एक क्षण लगाए, सीधे-सरल रामचेत जी ने राहुल गांधी का ही नाम तो लिया ही, विश्वास के साथ यह भी कहा कि मैं तो क्या सारा गांव उन्हीं को वोट देगा। देश का नेता ऐसा ही मिलनसार, भलामानुष, गरीबों का ध्यान रखने वाला होना चाहिए ! यही बात गौर करने वाली है कि राहुल का कहीं भी रुकना, किसी से भी मिलना, उसके काम में दिलचस्पी दिखाना, उससे बात करना, क्या यह सब स्वतःस्फूर्त है या सब कुछ किसी स्क्रिप्ट के तहत, एक दीर्घ कालीन योजना को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? खोजबीन तो यही बताती है कि यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत, सर्वे कर, पूरी स्क्रिप्ट बना, उचित कलाकार को चुन, पहले से पूरी बिसात बिछा कर घटना को अंजाम दिया जाता है ! 
असर क्या है ? समाज के उन गरीब मजदूर, मेकेनिक, कारपेंटर, कुली, मोची, जिनसे कोई ढंग से बात भी नहीं करता उनके मन पर इन सब बातों से बड़ा गहरा असर पड़ता है ! ऐसे अत्यंत पिछड़े, समाज के अंतिम छोर पर खड़े इंसान को जब ऐसी हमदर्दी, ऐसा सम्मान, ऐसी इज्जत मिलती है, जिसकी उसने सपने में भी कल्पना ना की हो, जब अचानक वह अपने आप का कद अपने लोगों में बढ़ा पाता है तो निहाल हो, गर्व सा महसूस करने लगता है और इस बात को चारों ओर ज्यादा से ज्यादा प्रचारित-प्रसारित  करने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता ! वह सबको बताता है कि देखो इतना बड़ा आदमी, देश का नेता, कितना रहम दिल है, जो हमारी खोज-खबर ले रहा है ! हमारा इतना ख्याल रख रहा है ! जहां देश के बड़े-बड़े लोग नहीं जा सकते वहां हमें ले जा कर बैठाता है ! हमारा सुख-दुःख पूछता है ! यदि यह सत्ता में आ गया तो सारे गरीबों का कल्याण  हो जाएगा ! उसकी यह बात वह काम कर जाती है जो किसी नेता की दस-बीस हजार की सभा में दिया गया भाषण भी नहीं कर पाता ! 
फोटो सेशन 
उसको इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने वाला किस लिए ऐसा कर रहा है ! उसका आचरण क्या है ! वो जो कर रहा है वह नाटक है या सच्चाई ! उसे सिर्फ इतना पता होता है कि उस इंसान के कारण उसकी जिंदगी में एक सुखद बदलाव आया है और मैं उसी का साथ दूँगा ! अपने परिवार की चिंता से ग्रस्त जिंदगी के थपेड़ों से जूझते ऐसे लोगों को फुर्सत ही कहां मिलती है कि वे आस-पास घटित हो रहे वाकयों पर ध्यान दे सकें ? नहीं तो इनमें से कोई तो पूछता कि साहब उत्तर प्रदेश की उस गरीब महिला कलावती का क्या हाल है, जिसका पहली बार मनरेगा मजदूर बन, मिटटी का टोकरा उठा कर आपने फोटुएं खिंचवाईं थीं ? 

गरीबों के मनोविज्ञान को, लोगों की इसी कमजोर रग को, राहुल जी की सलाहकार समिति ने समझ, अपना चक्रव्यूह उसी के अनुसार रच डाला है ! बाकी का काम तो उनके साथ चलते निर्देशकों, स्क्रिप्ट लेखकों और कैमरों ने पूरा कर ही दिया है ! एक बात और कि इस तरह के सारे नाटकों का श्रेय उनके निदेशक को जाता है, कलाकार रूपी राहुल जी तो पूरी तरह, सपूर्णतया निर्देशक के नायक हैं, जो उसने कहा अक्षरशः वैसा ही निभा दिया !   

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 23 मई 2024

क्यों.....?

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बेतहाशा गर्मी की अपरान्ह बेला में घंटी की ध्वनि पर दरवाजा खोला, तो सामने बिनोद खड़ा था ! बहुत दिनों पर आया था ! अंदर बुला, बैठाया और पूछा, अरे बिनोद ! कहां थे इतने दिनों तक ? नजर नहीं आए !''

गांव गया था, भईया !'' 

गांव ! कहां पर ! इतनी गर्मी में ? 

गिरिडीह, झारखंड ! ऊ का है कि.........वोट देने खातिर गया था !''

सिर्फ वोट देने ! इतनी दूर ! पर पहले तो तुम ...........!''

नहीं ! इस बार सोचे कि वोट देना जरुरी है ! आपहिं तो बताए थे कि कइसे एक ठो वोट से भी केतना फर्क पड़ जाता है ! 

मैं आश्चर्य से उसका चेहरा देख रहा था ! जो अपने परिवार की हारी-बिमारी में भी तीन बार सोचता था घर जाने को, वह इस बार चुनाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का, मौसम की विपरीत परिस्थितियों में भी, मन बना गया ! ठीक है इसी बहाने घर-परिवार से मिलना-जुलना भी हो गया पर वह प्राथमिकता नहीं थी ! सच कहूं तो यह बदलाव यह जागरूकता सुखद भी लगी ! 

चलो बहुत अच्छा किया, सबसे मिल भी आए ! पर यह तो बताओ किसको वोट दिए ? अब तो दे ही आए हो छिपाने की कोई बात ही नहीं है, बता सकते हो !''

नहीं छिपाने का कोनो बात ही नहीं है इसमें भईया जी, भाजपा को दिए हैं !''     

भाजपा को ? पर तुम और तुम्हारा परिवार तो कट्टर कांग्रेस समर्थक रहे हो सदा से !''

बिनोद मुंह नीचे किए बैठा रहा ! जैसे भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा हो ! फिर गहरी सांस ली, बोला- 

हम जैसे लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है भईया जी, इस तरह का बदलाव ! किसी परंपरा को, किसी चलन को, किसी आस्था को झटके से बदलना आसान नहीं होता ! हम लोग आजकल के नेताओं की तरह तो हैं नहीं ! जिनकी आत्मा सुबह किसी के, तो शाम किसी और के प्रति समर्पित हो जाए ! जो सिर्फ अपने व्यक्तिगत मतलब या स्वार्थ के कारण अपनी वफादारी बदल लें ! हम जुड़े होते हैं अपने अतीत से, अपने अनुभवों से, अपनी सच्चाई से ! मेरा परिवार देश के अनगिनत लोगों की तरह देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा रहा है ! मेरे दादा-दादी दुन्नो अंग्रेजों की जेल में रहे थे ! हमारे बुजुर्गों ने देखा है, लोगों को आजादी के यज्ञ में होम होते ! विभाजन का दर्द भोगा है ! जीया है उन पलों को ! पैबस्त हैं वे दर्दनाक लम्हें हमारे जिगर में ! उस समय कांग्रेस ही सामने थी, उसीका संघर्ष दिखलाई पड़ता था ! देश का हर बड़ा नेता उसी से जुड़ा हुआ था ! इसीलिए हमारी पिछली पीढ़ियां उसके प्रति समर्पित हो गईं ! समर्पण भी ऐसा कि यदि सत्य भी शरीर धारण कर सामने आ, उसके विरुद्ध कुछ बोले तो किसी को स्वीकार्य नहीं था !  किसी नेता के निधन हो जाने पर घर में खाना नहीं बनता था ! हमारे बुजुर्गों के लिए पार्टी की बात धर्म वाक्य की तरह होती थी ! अपने जीवन के अंत तक उन्होंने उसका दामन थामे रखा था !''

कुछ उदास हो उसको चुप होते देख मैंने पूछ ही लिया, 

फिर यह बदलाव कैसे ?''

बिनोद ने सर उठाया ! सीधे मेरी आँखों में देखा ! उसकी दृष्टि से एक बार तो मैं भी असहज हो गया ! उसकी धीर-गंभीर आवाज ऐसे लगी जैसे किसी गहरे कुएं से आ रही हो !

भईया जी ! वह देश प्रेम था जिसके लिए लोगों ने बेपरवाह हो अपनी जानें कुर्बान कर दीं ! अपने परिजनों को खो दिया ! फिर उसी देश के टुकड़े हो गए ! जैसे किसी ने माँ को बांट दिया हो ! पिछली पीढ़ियों में वह घाव कभी भरा नहीं ! फिर भी वे पुराने नेताओं को याद कर इस दल के साथ ही बने रहे ! समय बदला, नेता मतलबपरस्त होने लगे ! देश पीछे छूटता गया व्यक्ति व परिवार व उसका अहम हावी होते चले गए ! आजादी की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी अपनी अंदरूनी लड़ाई में लिप्त हो गई ! पुराने लोगों का मोहभंग होने लगा, कार्यकर्त्ता दल छोड़-छोड़ कर जाने लगे !  फिर भी बहुत से लोगों ने धैर्य बनाए रखा कि शायद कुछ सुधार हो ही जाए ! 

पर जब देशभगतों की जगह देशद्रोहियों को तरजीह दी जाने लगे ! जिस देश की आजादी के लिए लोगों ने अपने परिवार के परिवार होम कर दिए, उसी देश के टुकड़ों की कामना करने वालों को जब नेता बनाया जाने लगे ! सनातन धर्म को ही जब गालियां दी जाने लगें ! अपने ही देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जाने लगें ! और तो और श्री राम तक को सम्मान देने से कतराने लगें! देश की मान-मर्यादा को विदेशों में उछाला जाने लगे ! अपने मतलब के लिए अपने धुर विरोधियों के सामने समर्पित होने की नौबत आने लगे ! तो भईया जी बताइए कौन उस पार्टी का साथ देगा और क्यों...........??

बिनोद चुप हो गया ! उसका यह रूप मैंने पहली बार देखा था ! आजतक उसको अपनी रोजी-रोटी के लिए जूझते एक युवा के तौर पर ही तवज्जो दी थी ! पर ऐसी सोच ! ऐसा विश्लेषण ! इतना आक्रोश पहली बार देखा था ! वह पहचान बन रहा था, आजकी युवा पीढ़ी का ! वह मिसाल का रूप ले रहा था, आज की पीढ़ी की जागरूकता का ! और सबसे बड़ी बात यह उद्घोष था, हर उस नेता के विरुद्ध, चाहे वह किसी भी पार्टी या दल का हो, जो खुद को देश, देश के संविधान और उसकी व्यवस्था के ऊपर खुद को रख, अवाम को नासमझ मान, अपना उल्लू सीधा करने की फिराक और गलतफहमी में रह किसी भी तरह सत्ता को हथियाने का उपक्रम करता रहता है !

बुधवार, 15 मई 2024

एक पत्र, खुला-खुला सा

नवनिर्मित राम मंदिर में देश के हर कोने से रोजाना लाखों लोग दर्शन करने आ रहे हैं ! जाहिर है वहां से वे अपने घरों को भी लौटते होंगे ! चुनाव का समय है, घर लौट कर वे वोट देने भी जाते होंगे ! आपको क्या लगता है कि वे इस वैभवशाली अयोध्या को भूल पाएंगे ? सैंकड़ों सालों के बाद बने इस मंदिर में पहुंच, ऐसी भव्यता को देख, पुराने इतिहास को याद कर, क्या वे उन लोगों को वोट देंगे जो राम के अस्तित्व को ही नकार रहे थे ? उन लोगों को क्षमा करेंगे जो अयोध्या में मंदिर की जगह अस्पताल और शौचालयों को तरजीह दे रहे थे ?  सनातन धर्म को गाली दे रहे थे.........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

श्रीमान खड़गे जी !  

नमस्कार !

पहले तो क्षमा चाहता हूँ यदि आपके नाम के अक्षरों को गलत लिख गया होऊँ तो ! वो क्या है ना कि देश के आधे से ज्यादा लोगों को तो आपका सही नाम ही नहीं मालूम है, कोई खरगे लिखता है तो कोई खड़गे ! आशा है मैंने ठीक लिखा होगा ! 

खैर ! कल आपने शर्त लगाई थी कि भाजपा इस बार दो सौ सीटें भी प्राप्त नहीं कर सकेगी ! ठीक है अच्छी बात है दिल बहलाने को कुछ दिनों के लिए ! पर आपने यह नहीं बताया कि यदि आप शर्त हार जाओगे तो क्या करोगे ? संन्यास ले लोगे या अध्यक्ष बने रहोगे ? अब यह अलग और सोचने की बात है कि अध्यक्ष किसके रहोगे ! 

चलिए छोड़िए यह शर्त-वर्त की कल्पना, यथार्थ को देखते हैं ! आप इतने बड़े नेता हैं, आपको तो देश-दुनिया की पूरी खबर रहती होगी ! इसलिए शायद आपको पता ही होगा कि नवनिर्मित राम मंदिर में देश के हर कोने से रोजाना लाखों लोग दर्शन करने आ रहे हैं ! जाहिर है वहां से वे अपने घरों को भी लौटते होंगे ! चुनाव का समय है, घर लौट कर वे वोट देने भी जाते होंगे ! आपको क्या लगता है कि वे इस वैभवशाली अयोध्या को भूल पाएंगे ? सैंकड़ों सालों के बाद बने इस मंदिर में पहुंच, ऐसी भव्यता को देख, पुराने इतिहास को याद कर, क्या वे उन लोगों को वोट देंगे जो राम के अस्तित्व को ही नकार रहे थे ? उन लोगों को क्षमा करेंगे जो अयोध्या में मंदिर की जगह अस्पताल और शौचालयों को तरजीह दे रहे थे ?  सनातन धर्म को गाली दे रहे थे ? इस सच्चाई से मुंह मत फेरिएगा नाहीं बुरा मत मानिएगा, सिर्फ सोच के देखिएगा !

एक आदमी ने, नाम तो आप जानते ही हैं, थाली बजाने को कहा, लोग कटोरी-चम्मच तक बजाने लगे ! कोरोना के समय उसने डॉक्टरों का सम्मान करने को कहा, लोग उन पर फूल बरसाने लगे ! उसने एक दिया जलाने को कहा, लोगों ने दीयों की कतार लगा दी ! विश्व-रिकॉर्ड बना दिया ! हालांकि वह भी जानता था और जनता भी कि दिए के जलने से कोरोना नहीं जाएगा, पर यह एक तरह से लोगों को तनाव से बाहर लाने का उपक्रम था ! गहरी मुसीबत में एक आसरे का सहारा सा देने की इच्छा थी ! दूसरी तरफ आपने सिर्फ उसका उपहास किया, मजाक बनाया, गालियां दीं ! कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! इतिहास से भी सबक नहीं लिया जो चीख-चीख कर बताता रहा है कि देश के आमजन को, आवाम को, किसी की लगातार बेकद्री कभी भी रास नहीं आती ! 

लगे हाथ एक और परिक्षण कर लेते हैं ! इसी बात पर आप का आकलन भी हो जाएगा ! उसके कहने पर तो थाली, कटोरी, फूल, दिया सब हो गया ! राम लहर चल ही रही है, अब आप एक बार आह्वान कीजिए कि अमुक तारीख पर, अमुक समय देश के सभी लोग सिर्फ ग्यारह बार श्री राम का नाम जपेंगे ! देखिए कितने लोग आते हैं ! दूध का दूध, चार सौ का चार सौ हो जाएगा !    

मेरी किसी बात को अन्यथा मत लीजिएगा ! यह सब किसी पूर्वाग्रह या दुर्भावना से नहीं कहा गया है ! खेद होता है जब व्यक्तिगत स्पर्धा देश के विरुद्ध जाने लगती है ! पढ़े-लिखे लोगों को एक दूसरे के प्रति हलके शब्दों का सहारा लेते देखना पड़ता है ! अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण देश-समाज को बांटने की बात होने लगती है ! सच कहता हूँ, बहुत दुःख होता है.............!    

:

आपका ही एक देशवासी 

गगन 

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

भगवान सम्हाले ना रहा है, इत्ते दिनों से

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बार एक जज साहब ने देश की व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि देश को भगवान ही बचा सकता है ! इस पर कईयों की भृकुटि पर बल पड़ गए थे ! पर कोई माने या ना माने, निष्पक्षता से देखा जाए तो हमारे यहां की बहुत सी चीजों का मालिक भगवान ही है ! अब यह जो भगवान होता है वह बहुत दयालु, क्षमाशील व भक्तवत्सल होता है ! इसीलिए अपने बंदों की लायकी-नालायकी को कभी-कभी नजरंदाज कर उन पर कभी कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जाता है !   

अभी क्रिकेट का मौसम है उसी को देखें, उसे ''कौन'' चला रहा है ! देश की क्रिकेट टीम की बागडोर एक ऐसे कप्तान के हाथों में है, जो 2011 से 140 बार अपनी घरेलू टीम, बेंगलुरू का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद, एक बार भी उसे ट्राफी नहीं दिला पाया ! पर ऊपर वाले की कृपा से पहलवान है !

भारत की टीम की ''मेंटरिंग'' एक ऐसे इंसान की झोली में जा गिरी जो इस बार केआईपीएल के खात्मे होते तक खुद बड़ी मुश्किल से सौ रनों का आंकड़ा छू पाया है ! भले ही इतिहास कुछ भी हो !

रही कोच की बात, तो शायद उसे खुद भी पता न हो कि उसकी किस उपलब्धि पर इतना मंहगा और जिम्मेदारी भरा पद उसे हासिल हुआ पड़ा है ! 

फिर लगता है कि यह सब बेकार की बातें हैं ! भगवान हैं ना ऊपर ! उस पर अटूट भरोसा होना चाहिए ! इस सबसे भी कहीं बड़े-बड़े हादसे उसी की मर्जी से हमारे सामने से गुजरे हैं !

याद है, एक नेता ने अपने पर चालीसा लिखने वाले चापलूस चारण को राज्य सभा में जगह दिला दी थी ! 

अपना नाम तक ना लिख पाने के बावजूद सूबे के भविष्य को निर्धारित करने वाले दस्तावेजों पर प्रभु द्वारा अनुग्रहित किसी के ''हस्ताक्षर'' हुआ करते थे !    

अपने नेता की चप्पल उठा उसके पीछे भागने वाले नेता, के सर पर सालों भगवान की मर्जी से ही तो जूते बरसाते रहे थे !  किसकी शह पर !

पद-नाम-दाम हथियाने के लिए आका के इशारे पर झाड़ू-पौंछा लगाने से भी गुरेज ना करने वाले जनता पर वर्षों रोब गालिब किस की शह पर करते थे ! 

कहावत है कि दिल तक पहुंचने वाला रास्ता पेट से हो कर जाता है पर हमारे यहां तो पेट को तृप्ति दिलाने वाले को देश का सिरमौर ही बना दिया गया था ! अब यह सब प्रभुएच्छा से ही तो संभव हुआ होगा !

किसी एक का भविष्य संवारने के लिए जब लाखों का भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है, तो वह एक, प्रभु को प्यारा होगा की नहीं ! 

डाका-लूट-मार के व्यवसाई को जनता की सुरक्षा सौंप दी जाती रही है ! यह सब बिना ऊपर वाले की मर्जी से हो सकता है क्या !

उसका वरद-हस्त सर पर आते ही आम से खास बने जीव की बुद्धि यदि बाकी की आबादी को कैटल यानी भेड-बकरी समझने लग जाए तो इसमें उसका क्या दोष !

कुछ पर तो प्रभु कृपा का ऐसा सैलाब आता है कि वे लोग खुद को उसका सिबलिंग ही समझ, उसी की तरह अपनी मूर्तियां भी गढवाने लग जाते हैं ! खुद ऊँचे आसनों पर बैठ अपने ही जैसों को हिकारत की नजर से देखने लगते हैं ! पर वह भी बड़ा राहबर है सबको काट-छांट कर ही रखता है !   

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता ! 

इतने बड़े ब्रह्मांड की व्यवस्था, संचालन, रख-रखाव कोई हंसी-खेल तो है नहीं ! थोड़ी-बहुत चूक, विलंब, अनदेखी हो ही जाती है ! परिमार्जन भी तो होता है ! जेलें यूं ही तो नहीं भरी हुईं ! इसलिए मस्त हो, झरोखे पर बैठें और तमाशा देखें ! किसी भी चीज/बात को बहुत गंभीरता से ना लें ! दिल बहुत नाजुक होता है, हो सकता है, भगवान को आने में समय ही लग जाए.......!   

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

खेला आरंभ, मानुष दंग

बंगाल में आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनकी इजाजत बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

शारदीय नवरात्र आते ही बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम मच जाती है ! एक से एक बढ़ कर सुंदर-भव्य पंडाल एक दूसरे से होड़ लेने लगते हैं ! हर पंडाल में वाद्य-यंत्रों द्वारा मधुर शास्त्रीय संगीत की मधुर धवनि की गूँज ही सुनाई पड़ती है !  250 से भी ज्यादा वर्षों से चले आ रहे इस आयोजन का सदा से ही यह मकसद रहा है कि पंडालों के निर्माण में भव्यता, नवीनता, कलात्मकता के साथ ही दिव्यता, पवित्रता और भक्तिभाव का भी भरपूर समावेश हो। भले ही सामयिक घटनाओं का आभास दिया जाता रहा है, पर उनको कभी भी पूजा स्थल के पावन परिवेश पर हावी नहीं होने दिया जाता था ! पर अब वर्षों से से चली आ रही परम्पराओं,आस्थाओं व संस्कृति से छेड़-छाड़ शुरू हो चुकी है !

                                         

आज बंगाल में एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ! 



हमारी आदत में शुमार है कि हम किसी भी गलत काम की शुरुआत पर कभी भी ध्यान नहीं देते ! उसे पनपते, फलते-फूलते तब तक देखते रहते हैं जब तक घाव नासूर नहीं बन जाता ! सैकड़ों बार इस आदत ने हमें सबक सिखाया है, पर हम हैं कि मानते ही नहीं ! इसका मुख्य कारण शायद यह है कि ऐसी हरकतों की शुरुआत छटे हुए चंट लोगों द्वारा बहुत ही मामूली और छोटे पैमाने पर की जाती है ! हम किसी पचड़े में ना पड़ने की अपनी मानसिकता के कारण उसे हर बार नजरंदाज कर देते हैं ! कुछ ऐसा ही इस बार बंगाल के पंडाल निर्माण में हुआ है ! तुच्छ व ओछी राजनीती ने इस माध्यम द्वारा बहुत धीरे से, लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर, घुस-पैठ करते हुए इन पूजास्थलों को भी अपना समरांगण बनाने का षड्यंत्र शुरू कर दिया है ! इस बार के कुछ पंडाल इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो भक्तिभाव की जगह जुगुप्सा उत्पन्न करते दिखते हैं।

आज कुछ लोग जैसे माथे पर तिलक-रोली लगा अपनी नुमाइश करते घूम रहे हैं ! वैसे ही अपने ''खेला'' में एक ट्विस्ट ला, ममता ने अपनी बहुसंख्यक विरोधी छवि को संभालने के साथ-साथ पुराने रवैये को भी साधे रखने के लिए सार्वजनिक पूजा पंडालों को माध्यम बनाया है ! आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है !  

वैसे ''कुछेकों'' को सिर्फ भगवान की लाठी ही ठीक कर सकती है ! इनकी आँखों पर चढ़ी गुमान की पट्टी इन्हें उन दसियों स्वंयभू भगवानों का हश्र नहीं देखने देती जो अर्श से गिर, जेल के फर्श पर पड़े, किसी तरह अपने दिन काट रहे हैं ! इन्हें तो उस महिला का इतिहास भी याद नहीं जिसने अपने गुरु और आराध्य से भी बड़ी अपनी मूर्तियां गढ़वा कर अपने को दुनिया से अलग दिखाने की कोशिश की थी ! इसलिए समय फिलहाल भले ही अपना हो, पर हर इंसान को अपनी औकात कभी नहीं भूलनी चाहिए ! समय का तो ऐसा है कि उसने अवतारों तक को नहीं छोड़ा ! वह तो कभी खुद का भी नहीं हुआ ! सो भाई खेलो जरूर पर बिना फाउल करे ! क्योंकि अम्पायर भले ही चूक जाए पर अवाम रूपी तीसरा अम्पायर सदा अपनी आँखें खुली रखता है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...