मंगलवार, 29 अगस्त 2017

क्या सच्चे संतों और धर्मगुरुओं से लोगों का मोहभंग हो गया है ?

इन सब घटनाओं को देखते हुए यह प्रश्न मन में उठता है कि क्यों लोग सच्चे साधू-संतों से मार्ग-दर्शन लेने के बदले, उनके प्रवचन सुनने की बजाय इन ढोंगियों की चालों में फंस अपना सब कुछ लुटा बैठते हैं ? क्यों हमारे बड़े-बड़े संत, महात्मा, शंकराचार्य, धर्माधिकारी इस बाबत चुप्पी साध लेते हैं ? क्यों नहीं वे लोग आगे आ लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते ?
#हिन्दी_ब्लागिंग  

एक पारिवारिक शादी के कारण 25 अगस्त को पंचकुला में ही उपस्थिति थी। अब शादी-ब्याह का मुहूर्त तो महीनों पहले से ही तय हो जाता है उसी के अनुसार 22 शाम को पहुँच कर 25 सुबह की रवानगी थी। यह संयोग ही था कि गुरमीत राम रहीम जैसे ढोंगी को भी अपनी करनी का फल पच्चीस को ही मिलना तय हुआ । वहाँ रहने के दौरान वैसे तो सब सामान्य लग रहा था पर जिस तरह से आस-पास के गांव-देहात-कस्बों के लोग, धारा 144 लगे होने के बावजूद, ट्रेन, बस, ट्रैक्टर, गाडी या फिर पैदल ही, जैसे भी संभव था, हर रास्ते से छोटे-छोटे गुटों में आ रहे थे। हालाँकि न्यायालय के काफी पहले ही उन्हें रोक दिया गया था पर हजारों की तादाद में
पुरुष-महिलाओं के हुजूम ने, अपनी हर तरह की जरूरतों को नजरंदाज कर जिस तरह वहीँ सड़कों पर डेरा डाल दिया था,  उससे शहर निवासियों को आसन्न अनिष्ट की आशंका का आभास मिल रहा था, पुलिस की भारी तादाद के बावजूद ! कार्यक्रम के दौरान माहौल को भांपते हुए कुछ लोग  चौबीस की रात को  और  कुछ पच्चीस की सुबह मुंह-अँधेरे अपने-अपने साधनों से अपने घरों को लौट लिए थे। मेरे छोटे बेटे की ट्रेन सुबह करीब पौने सात की थी, उसी के हिसाब से निकले पर पाया कि स्टेशन पहुँचने के तमाम मार्ग सील कर दिए गए थे। हमारी रवानगी दोपहर की थी पर हालात देखते हुए उसे कैंसिल करवाना पड़ा। 

गुरमीत का फैसला अढ़ाई बजे आना था। पर वातावरण में पहले ही भारीपन आ चुका था। शाम होते-होते तो सारा शहर खौफ के धुंए में घिर गया, अराजकता पूरी तरह फ़ैल चुकी थी। इंटरनेट सेवा रोक दी गई थी। कालोनियों के बड़े गेट बंद कर दिए गए थे। लोग पुलिस की चेतावनी के बावजूद बिगड़ते माहौल को देखने के लिए अपने घरों की छतों पर चढ़े हुए थे। काफी मशक्क्त के बाद किसी तरह उपद्रव पर काबू पाया गया। 

कुछ देर बाद घर के पास का जायजा लिया तो साफ़ लगा कि यह सब जो हुआ या किया गया वह गांव-देहात के सीधे-साधे लोगों का नहीं, पेशेवरों का काम था।   हमारे  घर के पीछे के पार्क के पेड़ों की मजबूत डालियाँ काट कर
उनसे लाठियां बनाई गयी थीं। पैदल पथ पर लगी टायल्स को उखाड़ कर उनसे पत्थरबाजी की गयी थी। रेलिंगे उखाड दी गयी थीं। पुलिस द्वारा लगाई गयी कटीली तारों को भी हथियार बना लिया गया था। यह तो सिर्फ एक जगह का हाल था।  इस सब के क्यूँ-कैसे के बारे में तो अखबारें, टी.वी. चैनल बता ही रहे हैं ! पर यह सब सामने घटता देख, बरबस कुछ दिनों पहले आई  "नायक" फिल्म की याद आ जाती है। इन सब घटनाओं को देखते हुए यह प्रश्न मन में उठता है कि, भोले-भाले लोगों को अपने झांसे में फंसा करोड़ों इकठ्ठा करने वाले, धर्म के नाम पर गुमराह कर अपना घर भरने वाले, आम आदमी की भावनाओं से खेल उनका शोषण करने वाले, अपने आप को भगवान मनवाने वाले ढोंगियों की कैसे बन आती है ? क्यों लोग सच्चे साधू-संतों से मार्ग-दर्शन लेने के बदले, उनके प्रवचन सुनने की बजाय इन ढोंगियों की चालों में फंस अपना सब कुछ लुटा बैठते हैं ? क्यों हमारे बड़े-बड़े संत, महात्मा शंकराचार्य, धर्माधिकारी इस बाबत चुप्पी साध लेते हैं ? क्यों नहीं वे लोग आगे आ लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते ?

प्रशासन क्या नहीं कर सकता, इसका उदाहरण 28 अगस्त है, जिस दिन तथाकथित बाबे की सजा की अवधि निश्चित होनी थी, मजाल है किसी परिंदे ने कहीं भी बिना इजाजत पर मारा हो। पर घूम-फिर कर बात वहीँ आ जाती है कि कब हम जागरूक होंगे ? कब ढोंगी बाबाओं, चंट नेताओं, भ्रष्ट अफसरों को आईना दिखा पाएंगे ? कब हमें अपने अच्छे-बुरे की पहचान होगी ? कब हम दूसरों के बहकावे में आ अपना ही अहित करने से बचेंगे ? ऐसा करना या होना मुश्किल जरूर लगता है पर आज हर तरह से सशक्त, समर्थ, बाहुबली को उसकी सही जगह पहुंचाने में जिस तरह मुकदमे से जुडी दोनों महिलाओं ने हर मुसीबत, हर डर, हर धमकी को असहनीय तनाव झेलते हुए जैसा साहस दिखलाया है, उसका तो कोई सानी ही नहीं है  उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। डेढ़ दशक कोई छोटा-मोटा समय नहीं होता। अच्छे-अच्छे मजबूत इरादे वाले धराशाई हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं।  

सोमवार, 21 अगस्त 2017

गैजेट्स पर निर्भरता हमें अपंग ना बना दे

सुबह की फ्लाइट के लिए रात दो बजे प्रवेश की हिदायत दी गयी थी। डेढ़ बजे रात 'कैब' का इंतजाम कर रवानगी करवा दी ।  उनके जाने के बाद शयन-शय्या पर पहुंचा ही था कि कुछ देर के लिए बिजली गायब हो गयी साथ ही कॉर्ड-लेस भी सेंस-लेस हो गया। बिजली आने पर कैब चालाक का फोन मिला कि आपका फोन नहीं लग रहा था इधर मेरे नेट बंद होने की वजह से मेरा जी.पी.एस. काम नहीं कर रहा है ! अब आप इंतजार करेंगे या गाडी छोड़ना चाहेंगे ?

आजकल "गैजेट्स" पर हमारी निर्भरता भविष्य में खतरनाक रूप ले सकती है। हम समझ नहीं पा रहे हैं पर धीरे-धीरे परवश होते चले जा रहे हैं। बहुत पहले "मैन्ड्रेक जादूगर कॉमिक्स" में एक कहानी थी जिसमें रोबॉट इंसान को अपने वश में कर गुलाम बना लेते हैं। मशीन इंसान पर पूरी तौर से हावी हो जाती है। इस पर शायद फिल्म भी बन चुकी है। प्राथमिक स्तर पर ऐसी कुछ घटनाओं की शुरुआत हो भी चुकी है। हालांकि नए गैजेट्स के अपार फायदे हैं पर इन्होंने ही कई बातों का भट्ठा भी बैठा दिया है। अबाल-वृद्ध सब उसके शिकंजे में कसते चले जा रहे हैं। याद कीजिए कुछ ही सालों पहले जब घर में स्थिर फोन हुआ करता था तो घर के प्रत्येक सदस्य को दस-पांच जरुरी नंबर तो याद रहते ही थे, आज कइयों को अपना नंबर ही याद नहीं रहता क्योंकि इसकी जिम्मेवारी चलित फोन ने ले ली है और जब किसी कारणवश उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है तो कैसी परिस्थिति सामने आती है वही बताने जा रहा हूँ।                  

अभी दो दिन पहले पंजाब निवासी मेरे मामाजी ने अपनी बेटी के पास नार्वे जाने की खबर मुझे दी। उड़ान सुबह पांच बजे की थी। कुछ समय मेरे साथ बिताने के लिए वे अपने पुत्र के साथ एक दिन पहले दिल्ली आ गए। मैं उन्हें लेने नई दिल्ली स्टेशन गया था, पर कुछ हुआ और उनका फोन लगना बंद हो गया, स्थिति अपंगता सी हो गयी। घर फोन कर उनसे बात करने को कहा, वह फोन भी ना लगे ! फिर बेटे राम को कॉन्टेक्ट करने को कहा, फिर किसी तरह संचार विभाग की मेहरबानी से संपर्क हुआ और उन्हें ले मैं घर पहुंचा। 

सुबह की फ्लाइट के लिए रात दो बजे प्रवेश की हिदायत दी गयी थी। डेढ़ बजे रात 'कैब' का इंतजाम कर रवानगी करवा दी गयी।  उनके जाने के बाद शयन-शय्या पर पहुंचा ही था कि कुछ देर के लिए बिजली गायब हो गयी साथ ही कॉर्ड-लेस भी सेंस-लेस हो गया। बिजली आने पर कैब चालाक का फोन मिला कि आपका फोन नहीं लग रहा था इधर मेरे नेट बंद होने की वजह से मेरा जी.पी.एस. काम नहीं कर रहा है ! अब आप इंतजार करेंगे या
गाडी छोड़ना चाहेंगे ? मेरे पूछने पर कि क्या उसे रास्ता नहीं पता ? तो उसने बताया कि वह गाजियाबाद में काम करता है इधर के मार्गों की उसे जानकारी नहीं है। मैंने उसे धौला कुआं का रास्ता बताया तो उसने अपनी पोजीशन पंखा रोड की बताई क्योंकि "उसकी गाइड" ने बंद होने के पहले द्वारका का रास्ता सुझाया था। कार सवार दोनों रास्ते से अंजान, रात के दो बजे कोई कुत्ता तक सड़क पर नजर नहीं आ रहा था, नाहीं कोई पुलिस बूथ, समय निकलता जा रहा था। ऐसे में मुझे यही सूझा कि गाडी निकाल खुद ही चला जाए "रेस्क्यू आप्रेशन" पर। जल्दी-जल्दी चालाक को जहां है वहीँ रुकने को कहा और रात्रि-विहार पर निकला ही था कि उसका फोन आ गया कि नेट शुरू हो गया है। सुन कर सर से तनाव दूर हुआ राहत की सांस ली और वापस घर आ बिस्तर पर जा गिरा। तीन बजते-बजते उन लोगों के पोर्ट पहुँच जाने की खबर भी मिल गयी। तब सोना हो पाया।

बात छोटी सी ही थी यह भी कहा जा सकता है कि आधुनिक टेक्निक के कारण ही बात बन सकी पर यह घटना हमारी, दिन पर दिन  मशीनों पर निर्भर होती जाती, जिंदगी को भविष्य का आइना भी दिखा रही है !!
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शनिवार, 5 अगस्त 2017

महिलाओं की "पोस्ट" पर न्यौछावर "कुछ" लोगों की अजीब मानसिकता

फेस-बुक की एक पोस्ट में राखी के दिन महिलाओं को मुफ्त में बसों में सफर करने की सहूलियत पर राय जानने को ले कर एक प्रश्न उठाया गया था !..... आ गए, सारे समाज सुधारक, नीतिवान, ज्ञानवान, जनता के हितैषी, और लगे जपने अपनी विरोध की माला ! ऐसे ही लोग महिलाओं की पोस्ट पर "लाइक्स और कमेंट्स" की झड़ी लगा देते हैं। लगता है महिलाओं का इनसे बड़ा पक्षधर और कोई नहीं पर वही लोग एक दिन के लिए महिलाओं को दी गयी कुछ रुपयों की छूट पर खूँटा उखाड़ रहे थे 
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आज कल फैशन हो गया है, खासकर मीडिया पर, किसी भी काम के विरोध करने का। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्हें "अलिफ़ के बे" का भी पता नहीं होता, नाहीं मुद्दे की पूरी जानकारी पर पूर्वाग्रहों से ग्रसित ये लोग भी विरोध करने की हिमाकत कर पिले रहते हैं। अभी एक-दो दिन पहले फेस-बुक पर एक पोस्ट में राखी के दिन महिलाओं को मुफ्त में बसों में सफर करने की सहूलियत पर राय जानने को ले कर प्रश्न था।..... आ गए, सारे समाज सुधारक, दाएं-बाएं चलने वाले, हाशिए पर बैठे, नीतिवान, ज्ञानवान, जनता के हितैषी, और लगे जपने अपनी विरोध की माला ! कोई कह रहा है कि सरकार इस तरह मुफ्तखोरी की लत डाल रही है ! किसी को इसमें राजनितिक चाल दिखाई दे रही थी ! कोई वोट बैंक बढ़ाने की तिकड़म बता रहा था !! 
ऐसे ही लोग महिलाओं की पोस्ट पर "लाइक्स और कमेंट्स" की झड़ी लगा देते हैं। लगता है महिलाओं का इनसे बड़ा पक्षकार और कोई नहीं पर आज वही लोग एक दिन के लिए महिलाओं को दी गयी कुछ रुपयों की छूट पर खूँटा उखाड़ रहे हैं।  यही लोग जब सरकार सब्सिडी ख़त्म करने की बात करती है तो धरने पर बैठ जाते हैं। दसियों सालों से एक तरह से मुफ्त का गेहूँ-चावल लेने से इन्हें गुरेज नहीं होता ! नालायक लोगों को तरह-तरह की सहूलियतें मिलने पर उसमें इन्हें मुफ्त-खोरी की लत लगती नहीं दिखती ! देश-विरोधी मुहिमों में जुटे लोग जब करोड़ों की  संपत्ति डकार जाते हैं तब इनकी जबान पर ताला लग जाता है। पर एक दिन, सिर्फ एक दिन के लिए यदि महिलाओं को यह सहूलियत दे दी जाती है तो ऐसे लोग उसकी प्रशंसा करने की बजाय उसमें भी खामियां ढूंढ अपनी भड़ास निकलने से बाज नहीं आते। वैसे इनको यह भी पता नहीं होगा कि दो-तीन राज्यों में यह छूट वर्षों से मिल रही है और कुछ राज्यों में महिलाओं से आधा किराया लिया जाता है। पर इन लोगों को उससे मतलब नहीं है, इन्हें तो सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है। उसके पहले ये लोग देखते या सोचते भी नहीं कि इस ज़रा सी छूट से महिलाओं को कितनी ख़ुशी मिलती होगी ! वह बहन भी घर से निकलने की हिम्मत कर लेती होगी जो ज़रा से पैसे खर्च होने की चिंता में अपने भाई या मायके जाने की सोच-सोच कर रह जाती होगी। 

मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्थान पर कटुता नहीं होनी चाहिए। ब्लागिंग में तो कतई भी नहीं ! कोशिश भी यही रही है,  इतने सालों से, पर आज क्षमा चाहता हूँ यदि अति हो गयी हो तो।  वैसे बोलने की इतनी आजादी तो शायद ही अपने देश में कभी मिली हो ! फिर वह चाहे आम इंसान हो, बुद्धिजीवी हो, कलाकार हो, फिल्म निर्देशक हो या फिर नेता ही क्यों ना हो ! हर जगह हद पार की जा रही है। ना शर्म है, ना लिहाज है, ना किसी पद की मर्यादा है नाहीं किसी की उम्र की गरिमा की फ़िक्र ! पक्ष-विपक्ष में पहले भी नोक-झोंक होती थी। वाद-विवाद होता था। झड़पें होती थीं। पर आपस में  आदर-सम्मान भी था। नैतिकता थी। नेहरू जी के क्या कम विरोधी थे पर तब किसी ने हल्की भाषा का प्रयोग नहीं किया। कठिन समय में सारा देश उनके साथ था। इंदिरा जी के तो शायद सर्वाधिक विरोधी होंगे पर उनके साहस, निडरता तथा देश हित में उठाए गए कदमों की सबने एक स्वर में सराहना की। विरोधी पक्ष के श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने तो उन्हें दुर्गा तक कह डाला था । जहां देश की बात आती थी तो पक्ष-विपक्ष नहीं देखा जाता था लायक आदमी को ही जिम्मेदारी सौंपी जाती थी जैसा इंदिरा जी ने बाजपेयी जी को नेता बना बाहर भेजा था। अच्छे काम की सभी तरफदारी करते थे आज की तरह नहीं कि देश हित में कुछ हो रहा हो तो भी धरना दे कर बैठ जाएं या फिर उसका श्रेय लेने के लिए जनता को बर्गलाएँ।   

उस समय, एक-दो दलों को छोड़ दें, तो हर राजनैतिक दल का काम-विचार देश हित के लिए होता था। पर आज पहले मैं, फिर परिवार, फिर जाति, फिर धर्म और फिर यदि कुछ बचे तो देश की तरफ ध्यान जाता है। आज तो कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी से भी हाथ मिलाने से नहीं हिचकते, कीचड़ में लौटने से भी गुरेज नहीं करते ! कई बार तो सोच कर भी डर लगता है कि यदि सेना और न्यायालय ना होता तो....................
वैसे कोशिशें जारी हैं इन पर भी तोहमत लगाने और नीचा दिखाने की !  अब तो जनता जनार्दन पर ही आशा है कि वह अपनी नींद त्यागे, अपने तथाकथित आकाओं की असलियत पहचाने, आँख मूँद कर उसकी बातों में ना आएं, नापे-तौलें फिर विश्वास करें ! जाति-धर्म के साथ-साथ देश की भी सुध ले ! क्योंकि देश है तभी हमारा भी अस्तित्व है !  

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

मंदिर, जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है.!

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-ी तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है। ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल के कुल्लू क्षेत्र में स्थित बिजलेश्वर महादेव, जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भाव-विभोर और जिह्वा एक ही वाक्य उच्चारण कराती है, "त्वं-शरणम्"  ..........................सावन के पावन माह पर शिव जी से संबंधित एक लेख का पुन: प्रकाशन    
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हिमाचल, देवभूमि, जहां के कण-कण में देवताओं का निवास है। प्रकृति ने दोनों हाथों से बिखेरी है यहाँ सुंदरता। भले ही कश्मीर को देश-विदेश में ज्यादा जाना जाता हो,पर हिमाचल उससे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं है। जितना यह प्रदेश खुद सुंदर है उतने ही यहां के लोग सरल, सीधे, निष्कपट, मिलनसार और सहयोगी स्वभाव वाले हैं। शायद इसी लिए पृथ्वी का यह हिस्सा देवताओं को भी प्रिय रहा है। उनसे संबंधित गाथाएं और एक से बढ़ कर एक स्थान यहां देखने को मिलते हैं। कुछ तो इतने हैरतंगेज हैं कि बिना वहाँ जाए-देखे विश्वास ही नहीं होता ! 
श्री मक्खन महादेव 
ऐसा ही एक मंदिर, जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है, यहां कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह अति प्राचीन मंदिर है। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप-स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।

शिवलिंग व पुजारी जी 
इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मणिकर्ण 
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। जो व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक पहुंचा देती हैं। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है। यहां पहुँचाने का एक और मार्ग भी है, जो नग्गर नामक स्थान से लगभग मंदिर के पास तक जाता है पर वह दुर्गम और जटिल तो है ही और उस पर सिर्फ  दुपहिया वाहन से  ही जाया जा सकता है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी  है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।
मंदिर 

कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर, पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, जहां परिक्रमा करने के लिए करीब तीन फुट का गलियारा भी है, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है, जिसके बाद गर्भ गृह है, जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब 4 फ़िट तथा उंचाई 2.5 फ़िट के लगभग है।

वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।
घाटी 

पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

"महामृत्युंजय मंत्र" में खरबूजे का उल्लेख !

दो दिन पहले यहीं भगवान् शिव के अति शक्तिशाली  "महामृत्युंजय मंत्र" का उल्लेख करने का साहस किया था। इस मंत्र में खरबूजे के फल को विशेष स्थान प्रदान किया गया है। जहां से इस पवित्र मंत्र के भावार्थ का ज्ञान हुआ, वहाँ इतने सारे फलों के होते खरबूजा ही क्यों, इस प्रश्न का समाधान नहीं हो पाया ! एक बार हिमाचल प्रवास के दौरान एक विद्वान पंडित जी से बात हुई तो उन्होंने इसका समाधान किया था .....

हमारे ग्रंथों में उल्लेखित मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।    

"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।     
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात् ।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

सोचने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद  में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।
प्राप्त हुआ है।

ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।

संकलन में या लिखने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा चाहूंगा।
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विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...