शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

देहरादून का प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर, जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है

मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो लगता है कि शायद आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो चारों ओर फैलती गंदगी पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ...............?

#हिन्दी_ब्लागिंग 
देहरादून दूसरा दिन ! जैसा की तय किया गया था, सुबह साढ़े नौ बजते-बजते शहर भ्रमण का दौर शुरू हो गया। सबसे पहले मसूरी रोड पर, घंटाघर से करीब बारह कि.मी. दूर. कुठाल गेट के पास सड़क के किनारे स्थित #प्रकाशेश्वर_महादेव_मंदिर पर रुकना हुआ। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। हर रोज मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। स्फटिक का शिवलिंग यहां का मुख्य आकर्षण है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है। लाल और नारंगी  रंगों से सजे इस मंदिर की छत पर शिव जी के त्रिशूल सजे हुए हैं। मंदिर की दीवारों को लाल और नारंगी रंग में चित्रित किया गया है। आने वाले श्रद्धालुओं को दिन भर खीर का प्रसाद मिलता है। किसी शिव भक्त के द्वारा निर्मित इस मंदिर का इतिहास फिलहाल अज्ञात है। हालांकि मुख्य द्वार पर बंगला भाषा में सूचना पट पर एक "फरमान" जरूर लिखा हुआ है जिसमें किसी भी तरह के चढावे की मनाही का निर्देश दिया गया है। 

मंदिर के अंदर किसी पूजा सामग्री या मिठाई वगैरह की दूकान नहीं है। अलबत्ता मोती-रत्नों-रुद्राक्ष-माला वगैरह की बिक्री के लिए खासी बड़ी जगह घेर कर बिक्री की जाती है। उसी तरह मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ ही खाने-पीने की दूकान खोल दी गयी है। वहीं एक बात और महसूस हुई कि मंदिर से जुड़े अधिकांश लोग तनावग्रस्त से लगे बाहर की दूकान पर उपस्थित सज्जन तो जैसे ग्राहकों पर एहसान सा कर रहे थे। सच कहूं तो किसी धर्मस्थल के अंदर जाते समय जो एक श्रद्धा की भावना उपजती उसका यहां तनिक अभाव सा लगा ! 

इस प्रसिद्ध मंदिर को देखने की लालसा लिए जैसे ही मंदिर के मुख्य द्वार के सामने उतरे वैसे ही मन खिन्नता से भर उठा। मुख्य द्वार के सामने ही दो बड़े-बड़े ऊपर तक कूड़े से भरे कूड़ा पात्र रखे हुए थे ! जिनके पूरे भरे होने की वजह से कूड़ा निकल-निकल कर मंदिर के अंदर-बाहर गंदगी फैला रहा था। मंदिर के अंदर भी एक कूड़ादान रखा हुआ था ! ऊपर से रही-सही कसर वहां घूमते बंदर पूरी कर रहे थे। दरवाजे पर ही एक नल भी लगा हुआ था जिसकी वजह से जूते उतारने की जगह भी गीली थी। कूड़ा और पानी दोनों मिल कर गंदगी का कहर ढा रहे थे। जबकि मंदिर के सामने जहां गाड़ियां खड़ी होती हैं वहां अफरात जगह है। वैसे भी मंदिर की काफी बड़ी जगह है, कूड़ेदान कहीं और भी बिना परेशानी रखे जा सकते हैं। 


उस समय तो संकोचवश किसी से कुछ नहीं कहा पर लौटते समय रहा ना गया ! श्रीमती जी की भी इच्छा थी एक बार और दर्शन करने की ! सो इस बार पुजारी जी से अति नम्रता से अपने मन की बात कही ! पहले तो वे मेरा मुंह ही देखते रह गए ! फिर उन्होंने सारा इल्जाम बंदरों पर थोप दिया ! जिस पर मैंने कहा कि चूँकि कूड़ादान ठीक दरवाजे पर मंदिर के सामने है तो बंदर तो आऐंगे ही और वे यहीं गंदगी फैलाएंगे, इसमें जानवरो का क्या कसूर है ? कूड़ादान को ही कहीं और रखा जाए तो ही बात बनेगी। मेरी बात कुछ समझ में आने पर उन्होंने मुझे प्रबंधक से बात करने को कहा। ये महोदय भी कुछ असमंजस में घिर गए ! बोले इस ओर ध्यान ही नहीं गया ! फिर आपकी बात पर जरूर कार्यवाही करेंगे, ये आश्वासन जरूर दिया। 


ये सब देख यही लगता है कि मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो इतनी बड़ी बात पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ? 

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

दिल्ली-देहरादून-लाखामंडल

दिनों-दिन बढ़ती आबादी का बोझ महानगरों से निकल अब छोटे शहरों को भी अपने चंगुल में लेने लगा है। पहाड़ की गोद में  बसा सुंदर प्यारा सा शहर देहरादून भी इसकी चपेट में आ चुका है। आबादी के साथ ही बढ़ते निर्माण, धुंआ उगलते बेलगाम वाहन, बेतरतीब यातायात,  घटती हरियाली, उड़ती धूल यहां भी लोगों को मास्क लगाने को मजबूर कर रहे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
लाखामंडल :- यहां जाने की इच्छा एक लंबे अरसे के बाद इस बार नवम्बर में जा कर पूरी हुई। जब किसी तरह आठ से बारह नवम्बर का समय दायित्वों-परिस्थितियों से समझौता कर निकाला गया। पूरा खाका और ताना-बाना फिट कर आठ की सुबह देहरादून शताब्दी की सीट पर जा जमे। साथ में श्रीमती जी और बड़े बेटे चेतन का साथ भी था। देहरादून के होटल में चार दिनों की बुकिंग की जा चुकी थी। पर पहले दिन ही जब मित्र दीक्षित जी को हमारे वहां होने का पता चला तो उन दोनों द्वारा आग्रह युक्त इतना स्नेहिल दवाब पड़ा कि लाख झिझक और संकोच के बावजूद अगले दिन शहर से दूर साफ़-सुथरे वातावरण में उनके बड़े से, 5BHK एपार्टमेंट की चाबी लेने को बाध्य हो गए। पर शर्त यह रही कि हमारा सिर्फ और सिर्फ रहना ही होगा। उनका अपना दूसरा फ़्लैट भी उसी परिसर में बगल में ही था। 

घर की छत से नजर आता विहंगम दृश्य 
पहला दिन :- होटल स्टेशन के पास ही था। आठ की दोपहर बाद का समय भीड़-भाड़ वाले पलटन बाजार की गश्त, घडी मीनार की छाया में हलकी-फुलकी उदर पूजा करते और अगले दिनों का कार्यक्रम तय करने तथा टैक्सी वगैरह के इंतजाम में ही निकल गया। आज की रेल यात्रा की थकान को देखते हुए यह तय रहा कि दूसरे दिन यानि नौ को देहरादून का कम थकाने वाला भ्रमण कर दस को लाखामंडल की ओर निकला जाए, क्योंकि वहां की करीब सवा सौ कि.मी. की दूरी तक आने-जाने में आठ घंटे तथा वहां तक़रीबन दो घंटे यानी कुल दस-ग्यारह घंटों के लिए तारो-ताजा होना बेहद जरुरी था। इसी यात्राक्रम को ध्यान में रख वाहन उपलब्ध करवाने वालों से जानकारी हासिल की और दो दिनों के लिए अपनी आवश्यकताएं बता घूमने की जिम्मेदारी एक को सौंप दी। 
पलटन बाजार 
वही भीड़-भाड़ वही अफरा-तफरी 

पलटन बाजार, 1820 में अंग्रेजों को देहरादून में जब अपनी छावनी स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई तो उन्होंने  ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी को यहां ला तैनात किया। अब जब लोग आ बसे तो उनकी रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति के लिए दुकानों की भी आवश्यकता पड़ी। इस तरह एक बाजार अस्तित्व में आया, जहां सेना, जिसे पलटन कहते थे, के जवान ही अधिकतर खरीदारी किया करते थे, इसलिए उस बाजार का नाम पलटन बाजार पड़ा जो आज भी उसी नाम से प्रसिद्ध है। यह यहां का सर्वाधिक पुराना और व्यस्त बाजार है। स्थाई निवासियों तथा पर्यटकों सबकी खरीदारी करने के लिए पहली पसंद तो है ही इसके साथ ही युवाओं के लिए यह मौज और समय बिताने की जगह की रूप में भी जाना जाता है। आज इस बाजार में फल, सब्जियां, सभी प्रकार के कपड़े, तैयार वस्त्र, जूते और घर में प्रतिदिन काम आने वाली प्रत्येक वस्तु सहज उपलब्ध हैं।
घंटाघर :- यह देहरादून की सबसे व्यस्त राजपुर रोड के मुहाने पर स्थित है और यहाँ की प्रमुख व्यवसायिक गतिविधियों का केन्द्र है। ईंटों और पत्थरों से निर्मित इस षट्कोणीय ईमारत का निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था। जिसके शीर्ष के हर मुख पर छः घड़ियां लगी हुई हैं। इसके हर पहलू में एक दरवाजा बना हुआ है जिसके अंदर की सीढ़ियां ऊपर तक जाती हैं जहां अर्द्ध वृताकार खिड़कियां बनी हुई हैं। देहरादून का यह घंटाघर नगर की सबसे सौन्दर्यपूर्ण संरचना तो है ही इसका षट्कोणनुमा ढाँचा एशिया में भी अपने प्रकार का विरला ही है।
इधर से निश्चिन्त हो होटल लौटे ही थे कि क्षमा जी का फोन आ गया और जैसा पहले बता चुका हूँ उनका आग्रह टाला नहीं जा सका। दूसरे दिन सुबह कुछ तामझाम के बाद होटल की बुकिंग निरस्त कर, गाडी वहीं बुला, सामान को उनके घर छोड़ते हुए देहरादून से परिचित होने निकल पड़े।

@दूसरा दिन - देहरादून के दर्शनीय स्थल 

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

लेडिकेनी ! यह कैसा नाम है मिठाई का !

लेडिकेनि ! कुछ अजीब सा नाम नहीं लगता, वह भी जब यह किसी मिठाई का हो ! लेकिन यह सच है कि पश्चिम बंगाल में इस नाम की एक मशहूर मिठाई पाई जाती है जो काफी लोकप्रिय भी है। छेने और मैदे के मिश्रण को तल कर फिर चाशनी में सराबोर कर तैयार किए गए इस मिष्टान का नाम, 1856 से 1862 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे, चार्ल्स कैनिंग की पत्नी चार्लोट कैंनिंग के नाम पर रखा गया था.....!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
उन दिनों देश में फिरंगियों के विरुद्ध गंभीर माहौल था। उन्हें दुश्मनी की नज़रों से देखा जाता था ! विद्रोह की संभावना बढ़ती जा रही थी ! ऐसे में भी एक अंग्रेज महिला ने ऐसी ख्याति अर्जित की, इतना स्नेह जुटाया कि उनके नाम पर एक मिठाई का नामकरण कर दिया गया ! ऐसा होने का भी एक बड़ा कारण था ! उन दिनों देश का माहौल अत्यंत खराब और भयप्रद होने के बावजूद लेडी चार्लोट देश भ्रमण कर लोगों से मिलती-जुलती रहीं। जनता के करीब रह उनका हाल-चाल जानने के लिए प्रस्तुत रहीं। इसी कारण अवाम में वे काफी लोकप्रिय हो गयीं, आम आदमी उन्हें अंग्रेज होने के बावजूद पसंद करने और चाहने लगा। वे भी शायद इस देश से प्रेम व लगाव रखने लगी थीं इसीलिए शायद उन्होने इसी धरा में दफ़न होना उचित समझा हो ! उनकी कब्र कोलकाता के नजदीक बैरकपुर में आज भी मौजूद है। उनकी इसी लोकप्रियता के कारण उनकी अभ्यर्थना स्वरुप एक नयी मिठाई की ईजाद कर उसका नाम उनके नाम पर रखा गया।  


मिष्टी प्रेम 



वैसे लेडिकेनि के उद्भव के बारे में तरह-तरह के लोकमत हैं। कोई कहता है कि कलकत्ता के मशहूर हलवाई भीम चंद्र नाग, जिनकी छठी पीढ़ी अभी भी कलकत्ते में अत्यंत सफलता पूर्वक अपना कारोबार चला रही है, द्वारा इसे खासकर लेडी कैंनिग के भारत प्रवास पर इसे बनाया था ! कोई इसे उनके जन्मदिन के उपहार स्वरुप निर्मित किया मानता है ! कोई उनके आगमन पर उनके स्वागत हेतु प्रस्तुत किए गए व्यंजन के रूप में देखता है तो कोई इसका जन्म बरहमपुर में लॉर्ड कैंनिग के आगमन के समय बनाया गया बताता है। कहानी कोई भी हो पर यह सच है कि इसका नाम लेडी कैनिंग को ही समर्पित है। इसी समर्पण की वजह से ही इसे इतनी अधिक ख्याति मिली बजाए इसके स्वाद के ! उस दौरान यह इतनी लोकप्रिय हो चुकी थी कि 1861 में उनकी मृत्यु के पश्चात भी इसको सम्मलित किए बगैर, मिष्टी प्रिय सभ्रांत बंगाली परिवारों का कोई भी महाभोज पूरा नहीं हो पाता था। पर समय के साथ धीरे-धीरे इसका नाम लेडी कैनिंग से बदल कर लेडिकेनि होता चला गया !  


बैरकपुर में स्थित ग्रेव 
देखने में और कुछ-कुछ स्वाद में भी यह अपने चचेरे भाई गुलाब जामुन के बहुत करीब है। पर दोनों में एक बुनियादी फर्क है, गुलाबजामुन जहां खोये से बनाया जाता है, वहीं लेडिकेनि के लिए छेने का प्रयोग किया जाता है। बाकि बनाने की विधि और रूप-रंग तक़रीबन समान ही होते हैं। जो भी हो, है तो यह भी एक जिह्वाप्रिय मिष्टान ! तो जब कभी भी मौका मिले, चूकना नहीं चाहिए इसका स्वाद लेने को ! 

शनिवार, 26 अक्तूबर 2019

आतिशी मायाजाल का करिश्मा

आप सभी मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से इस पावन पर्व की ढेरो व अशेष शुभकामनाएं। परमपिता की असीम कृपा से हम सब का जीवन पथ सदा प्रशस्त व आलोकित रहे ! राग-द्वेष दूर हों, सुख-शांति का वास हो, आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो !


#हिन्दी_ब्लागिंग 
दीपावली का शुभ दिन पड़ता है अमावस्या की घोर काली रात को। शुरू होती है अंधेरे और उजाले की जंग। अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दो-जहद। निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाने रखने की पुरजोर कोशिश। इसमें अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा अपने महाबली शत्रु से जूझती हैं सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ।  


हम भारतवासियों दृढ का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है।अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे रोशनी के सिपाही अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके। 

ऐसा होता भी है, इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और हंसी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है।  
एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  
हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो।    

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2019

त्योहारों का सरताज, उत्सव दीपावली का ¡ पर........ ¡¡

यह त्योहार हमें रूखी-सूखी खाकर ठंडा पानी पीने या जितनी चादर है उतने पैर पसारने की सलाह नहीं देता। इन उपदेशों का अपना महत्व जरूर है पर यह त्योहार यह सच्चाई भी बताता है कि भौतिक स्मृद्धि का भी जीवन में एक अहम स्थान है, इसका भी अपना महत्व है ! हमारे वेद-पुराणों में सर्व-शक्तिमान से यह प्रार्थना की गई है कि वे हमारे अंदर के अंधकार को दूर करें, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएं जिससे हमें ज्ञान और शांति प्राप्त हो जिसका उपयोग दूसरों की भलाई में किया जा सके। इसी बात को, इसी संकल्प को हमें अपने जेहन में संजोए रखना है पर यह उद्देश्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक इस पर्व को मनाने की क्षमता, समृद्धि का वास देश के हर वासी, हर गरीब-गुरबे के घर-आंगन में नहीं हो जाता...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

फिर एक बार दीपावली आ पधारी ! अपने साथ खुशियां, उल्लास और उजाला ले कर ! इस पारंपरिक त्यौहार से हम आदिकाल से जुड़े हुए हैं। यह अपने देश के सारे त्योहारों से एक अलग और अनोखे तरह का उत्सव है। रोशनी के त्योहार के रूप में तो यह अलग है ही, इसे सबसे ज्यादा उल्लास से मनाए जाने वाले त्योहारों में भी गिना जा सकता है। इसे चाहे किसी भी कथा, कहानी या आख्यान से जोड लें पर मुख्य बात असत्य पर सत्य की विजय की ही है। प्रकाश के महत्व की है। तम के नाश की है। उजाले के स्वागत की है।  इसीलिए इसके आते ही सब अपने अपने घरों इत्यादि की साफ-सफाई करने, रौशनी करने मे मशगूल हो जाते हैं। साफ-सफाई के अलावा इस त्योहार मे एक बात और है कि यह अकेला ऐसा त्योहार है, जिसमें हर आदमी, हर परिवार समृद्धि की कामना करता है। यह त्योहार हमें रूखी-सूखी खाकर ठंडा पानी पीने या जितनी चादर है उतने पैर पसारने की सलाह नहीं देता। इन उपदेशों का अपना महत्व जरूर है पर यह त्योहार यह सच्चाई भी बताता है कि भौतिक स्मृद्धि का भी जीवन में एक अहम स्थान है, इसका भी अपना महत्व है। 
 
 धन की, सुख की आकांक्षा हरेक को होती है इसीलिए इस पर्व पर अमीर-गरीब अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार दीए जला, पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। हां यह जरूर है कि अमीरों के ताम-झाम और दिखावे से यह लगने लगता है जैसे यह सिर्फ अमीरों का त्योहार हो।  

हमारे वेद-पुराणों में सर्व-शक्तिमान से यह प्रार्थना की गई है कि वे हमारे अंदर के अंधकार को दूर करें, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएं जिससे हमें ज्ञान और शांति प्राप्त हो जिसका उपयोग दूसरों की भलाई में किया जा सके। इसी बात को, इसी संकल्प को हमें अपने जेहन में संजोए रखना है पर यह उद्देश्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक इस पर्व को मनाने की क्षमता, समृद्धि का वास देश के हर वासी, हर गरीब-गुरबे के घर-आंगन में नहीं हो जाता। 

सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

परवा जरूर हो, पर अतिरेक नहीं

पौधों को नई जगह की आबो-हवा, धूप-झांव, मिटटी-पानी के साथ ताल-मेल बैठाने, परिस्थियों के अनुसार खुद को ढालने, आस-पास के माहौल में खुद को रमाने में कुछ तो समय लगना ही था ! हाथी इस बात को बखूबी समझते थे ! वे पौधों इत्यादि का समुचित ध्यान रख, समयानुसार उनका पोषण करते थे। पर इधर वानरों को अपने लता-गुल्म की कुछ अनावश्यक ही चिंता थी ! वे हर दूसरे-तीसरे दिन अपने लगाए पौधों को उखाड़ कर देखते थे कि उनकी जड़ें विकसित हुए कि नहीं ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
आनंदवन को जीवों के लिए सुगम, सुंदर और व्यवस्थित करने के लिए सिंहराज के नेतृत्व में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके तहत वन के सघन, दुर्गमनीय इलाके के पेड़-पौधों को हटा कर दूसरी विरल जगह रोपित कर दिया जाए जिससे दोनों जगहों का समुचित विकास हो सके। समाज हितकारी इस परियोजना की जिम्मेदारी बुद्धिमान हाथी और चपल बंदरों को सौंपी गयी, जिससे कार्य सुचारु और तीव्र गति से हो सके। कुछ ही दिनों में बीहड़ के पेड़-पौधों का पूरी साज-संभार के साथ नई जगहों पर ला प्रेम और सावधानी के साथ रोपण कर दिया गया ! 

अब पौधों को नई जगह की आबो-हवा, धूप-छांव, मिटटी-पानी के साथ ताल-मेल बैठाने, परिस्थियों के अनुसार खुद को ढालने, आस-पास के माहौल में खुद को रमाने में कुछ तो समय लगना ही था ! हाथी इस बात को बखूबी समझते थे ! वे पौधों इत्यादि का समुचित ध्यान रखते थे, समयानुसार उनका पोषण करते थे। पर इधर वानरों को अपने लता-गुल्म की कुछ अनावश्यक ही चिंता थी ! वे हर दूसरे-तीसरे दिन अपने लगाए पौधों को उखाड़ कर देखते थे कि उनकी जड़ें विकसित हुए कि नहीं ! कभी अनावश्यक रूप से उनकी झाड़-पौंछ कर देते ! कभी पानी देने में अतिरेक ! उनकी खैर-खबर लेने की इन गलतियों से ना तो पौधे अपनी जड़ जमा पाए, नाहीं उनका अपने नए वातावरण से ताल-मेल बैठ पाया और ना ही वे पनप पाए ! नतीजतन जहां हाथियों द्वारा रक्षित पेड़-पौधे कुछ ही दिनों में विकसित हो पनप गए और लहलहाने लगे ! वहीं वानरों की अदूरदर्शिता ने, भले ही यह उनका अपने पौधों के प्रति अतरिक्त केयर, लगाव या चिंता थी, उनके पौधों को अविकसित, निर्जीव सा कर उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा ! 

ऐसी ही कुछ प्रवृत्ति हम में से कुछ मानवों में भी पाई जाती है जिनकी भावनाओं का, लगाव का, अनावश्यक चिंता का, नकारात्मक सोच का, अविश्वास का अतिरेक उन्हें तो परेशानी में डालता ही है, संबंधित माहौल को भी आविष्ट व तनावग्रस्त बना डालता है !

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2019

दो बार हुई थी अर्जुन की मृत्यु

यह तो सर्व ज्ञात है कि अपने अंतिम समय में स्वर्ग यात्रा के दौरान पर्वतारोहण के समय, युधिष्ठिर को छोड़ एक-एक कर सभी पांडव भाइयों की मृत्यु होती चली गयी थी। लेकिन महाभारत की उपकथाओं में इस महाकाव्य के प्रमुख पात्र अर्जुन की इसके पहले भी एक बार हुई मृत्यु का एक बहुत अल्पज्ञात जिक्र मिलता है ! आज करवा चौथ के अवसर पर एक पत्नी का अपने पति को बचाने के उपक्रम का विवरण........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारी पौराणिक कथाओं में ''अष्टवसु'' का जिक्र आता है। इन आठों देवभाइयों को इन्द्र और विष्णु का रक्षक देव माना जाता है। एक बार इनमें सबसे छोटे वसु द्वारा वशिष्ठ ऋषि की गाय नंदिनी को लालचवश चुरा लेने के फलस्वरूप आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप मिला पर इनके द्वारा क्षमा मांगने पर वशिष्ट ने सात वसुओं के शाप की अवधि एक वर्ष कर दी पर सबसे छोटे वसु को जिसने यह कृत्य किया था, उसे महान विद्वान, वीर, ख्यात और दृढ़प्रतिज्ञ होने के साथ-साथ दीर्घकाल तक मनुष्य योनि में रहने, संतान उत्पन्न न करने तथा स्त्री परित्यागी होने का दंड भी मिला। इसी शाप के अनुसार महाभारत काल में उसका जन्म भीष्म के रूप में हुआ था।   
भीष्म पितामह 
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। युधिष्ठिर राज-पाठ संभाल रहे थे। तभी एक दिन महर्षि वेदव्यास और श्रीकृष्ण ने पांडव भाइयों को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी, जिससे शासन व्यवस्था और मजबूत हो सके। इसी के तहत, शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ कर घोड़ा छोड़ दिया गया, जिसकी रक्षा का भार अर्जुन को सौंपा गया था। जहां कहीं घोड़े को रोका गया वहां के राजाओं को अर्जुन ने परास्त कर अपने राज्य का विस्तार किया। इसी दौरान यह कारवां मणिपुर जा पहुंचा। एक बार पहले नियम भंग करने के प्रायश्चित स्वरुप, घूमते हुए अर्जुन के यहां  आने पर यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से उनका विवाह संपन्न हुआ था, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी जो की अब वहां का राजा था, बभ्रुवाहन ! 
अर्जुन 
 बभ्रुवाहन
जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र को देखकर अर्जुन बहुत खुश हुए पर नियमों से बंधे होने के कारण मजबूरीवश उन्हें कहना पड़ा कि यज्ञ के घोड़े को यहां रोका गया है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी है इसलिए तुम्हें मुझसे युद्ध करना पडेगा ! बभ्रुवाहन ने ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी ! पर अर्जुन भी अपनी बातों पर अड़े हुए थे !  इसी वाद-विवाद के बीच अर्जुन की एक और पत्नी नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई और बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाना शुरू कर दिया ! अपने पिता के हठ व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। पिता पुत्र में भयंकर युद्ध हुआ। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। दोनों बुरी तरह घायल और थक चुके थे। इसी बीच बभ्रुवाहन का एक तीक्ष्ण बाण सीधा आ अर्जुन को लगा जिसकी चोट से अर्जुन गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गयी ! उधर बभ्रुवाहन भी बेहोश हो धरती पर गिर पड़ा। पति और पुत्र की यह हालत  देख चित्रांगदा पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा ! कुछ देर बाद जब बभ्रुवाहन को होश आया तब वह भी अपने पिता की हालत देख शोकाकुल हो उठा और ऐसे जघन्य कृत के लिए अपने को दोषी मान विलाप करने लगा। 
उलूपी व संजीवनी मणि 
अर्जुन की मृत्यु से दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही आमरण उपवास पर बैठ गए। जब नागकन्या उलूपी ने यह देखा तो उसने संजीवनी मणि का आह्वान कर उसको बभ्रुवाहन को देते हुए उसे अर्जुन की छाती  पर रखने को कहा, ऐसा करते ही अर्जुन जीवित हो उठे। तब उलूपी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि महाभारत में भीष्म पितामह की धोखे से किए गए वध के कारण ''वसु'' बहुत नाराज व क्रोधित हो गए थे। जिसके कारण उन्होंने अर्जुन को श्राप देने का संकल्प ले लिया था। जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर सब विधि का विधान बता प्रार्थना की। तब वसुओं ने कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। इसीलिए वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मुझे अपनी यह मोहिनी माया रचनी पड़ी। तत्पश्चात अर्जुन बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दे पुन: अपनी यात्रा पर आगे चल दिए। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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