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| विचित्र |
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| विलक्षण |
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| नर्मदेश्वर |
| अद्भुत |
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| अनूठा |
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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| विचित्र |
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| विलक्षण |
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| नर्मदेश्वर |
| अद्भुत |
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| अनूठा |
अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, फिल्में बनी हैं ! इन चलचित्रों ने इन बिमारियों के प्रति लोगों को जागरूक भी किया है ! यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जिया भी है...............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
दु निया भर में अबाल-वृद्ध सभी के पसंदीदा शौक में फिल्में सर्वोपरि हैं ! ये समाज का आइना कहलाती हैं ! जो मनोरंजन के साथ-साथ अभिव्यक्ति का भी बहुत सशक्त माध्यम हैं ! इसीलिए दर्शक उनसे और उनमें काम करने वाले पात्रों से अतीव जुड़ाव महसूस करता है। लोग अपने नेताओं को पहचाने ना पहचाने पर फिल्मों के छोटे-बड़े कलाकारों की बखूबी खबर रखते हैं ! इसलिए अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखने के लिए कलाकार भी अपने प्रशंसकों के मनमुताबिक काम करते रहते हैं ! पर कुछ अलग भी होते हैं !
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म नुष्य की जिंदगी में सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव के साथ-साथ हारी-बिमारी भी एक अभिन्न अंग है, इसीलिए अन्य विभिन्न परिस्थितियों के साथ ही बीमारियों पर आधारित बहुत सारी संवेदनशील फिल्में बनी हैं, जिनके समझदार निर्माता-निर्देशकों ने दर्शकों को जागरूक करने के साथ-साथ Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia और न जाने कितनी ऐसी बीमारियों के बारे में, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, बताया, चेताया और जागरूक कर उनकी रोक-थाम की बात भी की ! ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने भी उनके पात्रों से गहराई से जुड़ फिल्म को सफल भी करवाया है।
अ पने अभिनय के शुरूआती दौर में ही उनको एक ऐसी फिल्म ''रेशमा और शेरा" मिली जिसमें उन्होंने एक गूंगे-बहरे का किरदार निभाया था। उसके बाद उनकी अनेक ऐसी फिल्में आईं जिसका मुख्य किरदार किसी न किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित था ! जैसे वे फिल्म मजबूर में ब्रेन टयृमर से ग्रस्त रोगी के रूप में दिखाई दिए। फिल्म ब्लैक में अल्जीमर्स के रोगी के रूप में, ''पा'' में प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रस्त दिखे, यह उनकी बेहतरीन यादगार फिल्मो में भी सर्वोपरि है !
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏
महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं..........!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
मा यका यानी माँ का घर ! साधारणतया इसका ताल्लुक इंसानों से खासकर महिलाओं से होता है ! वह घर जहां बच्चियां जन्म लेती हैं, बड़ी होती हैं, कार्य-कुशलता प्राप्त करती हैं और फिर समय आने पर विवाहोपरांत अपने ससुराल या पति के घर चली जाती हैं ! पर उनका मायके से नाता जुड़ा रहता है ! तीज-त्यौहार-उत्सवों के अलावा भी गाहे-बगाहे वे वहां आती-जाती रहती हैं !
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| मध्य प्रदेश |
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| अमरकंटक |
वि डंबना यह है कि इंसानी महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं !
| नदियों का मायका |
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏
एक विशालकाय जीव जिसकी लंबाई 40 से 45 फीट, ऊंचाई तकरीबन 20 फीट, एक-एक फुट के दांत, वजन आज की दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, उस इतने विशाल और शक्तिशाली शिकारी की हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी यदि इसकी तुलना किसी 6 फीट लंबे साधारण व्यक्ति से की जाए तो उस इंसान की बांहें केवल 5-6 इंच की होंगी ! टायरानोसौरस का आकार ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है.............!
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प्र कृति अपने-आप में एक अबूझ पहेली है ! इसके खेल बड़े निराले होते हैं, जिसमें आँखों से दिखाई ना देने वाले सूक्षतम जीवाणु से लेकर पर्वताकार प्राणियों तक हजारों-लाखों खिलाड़ी शामिल हैं ! उन्हीं में से एक, छिपकलियों के पूर्वज, लुप्त डायनासोर प्रजाति के अजूबे टायरानोसौरस, जिसे टायरानोसौरस रेक्स या टी-रेक्स भी कहा जाता है, भी शामिल हैं ! फिल्मों से लगाव रखने वाले देसी-विदेशी दर्शकों ने इनका आभासी रूप जुरासिक पार्क जैसी फिल्मों में देखा होगा, जिनमें ये अपने पूरे जलवे के साथ उपस्थित थे !
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| टायरानोसौरस |
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| फिल्म |
टा यरानोसौरस, इसके अवशेषों से पता चलता है कि यह आज से करीब साढ़े छह करोड़ साल पहले मुख्यत: उत्तरी अमेरिका की धरती पर विचरण करने वाले प्रसिद्ध डायनासोरों में से एक, बेहद खतरनाक शिकारी था ! पर जबसे इसका पहला कंकाल, 1900 के शुरुआती वर्षों में खोजा गया, तभी से वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम लोग भी समझ नहीं पा रहे कि 40 से 45 फीट की लंबाई, तकरीबन 20 फीट की ऊंचाई, एक-एक फुट के दांतों वाले इस जीव, जिसका वजन दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, इतना विशाल और शक्तिशाली शिकारी, पर उसके हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी किसी 6 फीट लंबे व्यक्ति से तुलना करें तो उस इंसान की बांहें सिर्फ 5-6 इंच लंबी ही होंगी ! दरअसल, टी. रेक्स अकेला ऐसा डायनासोर नहीं था, जिसकी भुजाएं छोटी थीं और भी कई प्रजातियों में ऐसी विसंगति थी ! पर ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है !
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| उनका समय |
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| तुलना |
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि टायरानोसौरस के आकार का बदलाव उन इलाकों में शुरू हुआ होगा जहां उसके शिकार भी बहुत बड़े होते होंगे। जिन्हें हाथों से पकड़ कर काबू कर पाना मुश्किल होता होगा ! इसमें उसका विशाल व शक्तिशाली जबड़ा ज्यादा कारगर सिद्ध होता होगा ! इसीलिए बड़े सिर और शरीर के संतुलन के लिए हाथ छोटे होते चले गए होंगे ! यह भी हो सकता है कि जो प्राणी अपने जबड़े के एक ही झटके में बड़े से बड़े जीव का काम तमाम कर देता हो, यदि उसके हाथ भी उसी के आकार के अनुरूप होते तो वह दूसरे पशुओं के लिए बहुत ही खतरनाक हो जाता, शायद इसी लिए प्रकृति ने संतुलन बनाए रखने के लिए उसके हाथों को छोटा कर दिया हो !
| जबड़े की उपयोगिता |
फि लहाल वैज्ञानिक अभी भी पूरी तरह नहीं जानते कि टी. रेक्स अपने हाथों का उपयोग कैसे करता था या वे इतने छोटे ही क्यों विकसित हुए। शायद भविष्य में कोई नई खोज इस रहस्य को सुलझा सके !
@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏
अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा............!
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम दर्ज हैं, जो उम्र में भले ही छोटे थे, लेकिन उनके हौसलों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी ! ऐसे किशोर और युवा, जिन्होंने अपने लहू से वतन की मिटटी को सींचा, बिना जुल्म-ओ-अत्याचार की परवाह किए -
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| बाजी राउत |
*खुदी राम बोस, युवा क्रान्तिकारी, 18 साल की उम्र में फांसी दे दी गई !
*करतार सिंह सराभा - 19 साल की उम्र में फांसी।
*प्रफुल्ल चंद्र चाकी - उम्र 19 साल। पर अंग्रेजी हुकूमत उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी !
*भगत सिंह, * सुख देव, *शिवराम राजगुरु - इन्हें कौन नहीं जानता, जिन्हें सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था !
*चंद्र शेखर आजाद ! जिन्हें सपने में भी देख कर अंग्रेजों को पसीना आ जाता था ! धोखे से घेरा गया, पर कोई जिंदा नहीं पकड़ पाया ! जब देश को प्राण अर्पण किए तो उम्र थी महज 24 साल !
*मदन लाल ढींगरा - 25 साल, अंग्रेजों पर गोली चलाने के लिए फांसी !
*राजेंद्र लाहिरी - 26 साल, काकोरी केस में फांसी।
*अशफाक उल्ला खां - 27 साल, काकोरी केस में फांसी।
*पंडित राम प्रसाद बिस्मिल - 30 वर्ष, मैनपुरी और काकोरी केस में फांसी
*चेत राम जाटव - 30 साल। अंग्रेजों की खिलाफत के कारण गोली मार दी गई !
*मंगल पांडे - 30 साल की उम्र में फांसी।
*जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, युवावस्था में एक बाघ से भिड़ कर मार डालने के कारण नाम पड़ा. ''बाघा जतिन'', 35 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए ! कनक लता बरुआ 15 साल, बादल गुप्ता 18 वर्ष, हेमू कालाणी 19 साल, अनंत लक्ष्मण 19 साल, प्रफ्फुल चाकी 19 साल, बसंत कुमार विश्वास 20 साल, कन्हाई लाल दत्त 20 वर्ष.........कितने गिनाएं, कहां तक गिनाएं, स्याही खत्म हो जाएगी, कागज कम पड़ जाएंगे !
अपने ऐसे शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! जिनको क्रांति का सही अर्थ ही मालूम ना हो ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा !
क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! जो अवाम और देश के हित में हो ! ऐसी स्थिति के लिए मुख्य कारण जनमानस में अंसतोष का होना होता है, जो समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न हुआ हो ! परंतु ऐसा बदलाव या परिवर्तन लाने के लिए ठोस कारण का होना बेहद जरुरी है ! इसके साथ ही दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना का होना भी बहुत जरुरी है।
@वंदे मातरम ! राष्ट्र प्रथम
@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏
ऐसी मान्यता है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है.....................!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
ह मारा देश एक धर्म प्रधान देश है ! यहां हजारों-लाखों मंदिर, देवस्थान हैं ! उनमें से अनगिनत ऐसे हैं, जिनके साथ कोई ना कोई रहस्यात्मक बात जुडी हुई है, जिसका अथक प्रयासों, वैज्ञानिक कोशिशों के बावजूद निवारण नहीं हो पाया है ! ऐसा ही एक शिव-पार्वती मंदिर, उड़ीसा के टिटलागढ़ में स्थापित है जो अपनी अनूठी विशेषता के कारण जगत्प्रसिद्ध है !
| प्रवेश द्वार |
ओ डिशा ! देश के पूर्वी तट पर स्थित यह हमारा आठवां सबसे बड़ा राज्य है। यह अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां कई प्राचीन, रहस्यमय, विश्वविख्यात मंदिर हैं।देश की इस सबसे गर्म जगह का भी सबसे गर्म इलाका है टिटलागढ़ ! जहां गर्मियों में दिन का अधिकतम तापमान 55 डिग्री तक चला जाता है ! उसी टिटलागढ़ के कुम्हडा पहाड़ी की चोटी पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का एक अद्भुत मंदिर स्थित है। गर्मियों में कुम्हरा पर्वत की चट्टानें और पत्थर इतने गर्म हो जाते हैं कि वहां किसी का भी कुछ मिनटों के लिए भी ठहरना मुहाल हो जाता है ! पर आश्चर्य की बात यह है कि इस भीषण गर्मी का मंदिर के अंदर लेष मात्र भी असर नहीं पड़ता और वहां ठंडक बनी रहती है !
| प्रांगण |
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| विलक्षणता |
| हर हर महादेव |
ओ डिसा के बालांगीर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 59 पर स्थित टिटलागढ़ इलाके में विद्यमान इस मंदिर तक देश के किसी भी हिस्से से रेल, हवाई या सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है ! ओडिशा के सबसे बड़े शहरों में से एक टिटलागढ़ का सभी जगहों से बेहतरीन कनेक्शन है। विदेशों की यात्राओं से पहले हमें अपने देश को एक बार पूरी तरह देख, समझ, टटोल लेना चाहिए !
विहंगम दृश्य
@ सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह मुफ्तखोर गीदड़ दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप को सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को रोज तंग करने लगा ! किसी से कुछ भी छीन लेना उसके लिए आम बात हो गई ! अब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या किसी ताजा घटना की याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है............. 😊
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
हर इंसान के जीवन में कम से कम एक बार तो समय अनुकूल होता ही है ! उसी वक्त की मेहरबानी के चलते पिद्दी भी पहलवान बन जाती है ! पर कुछ पिद्दियां इतिहास से कोई सबक ना लेते हुए इस अनुकूलता को अपनी नियति, अपना शौर्य समझ इतनी अराजक, अहंकारी और धृष्ट हो जाती हैं कि खुद को ही भगवान समझने लगती हैं ! वे भूल जाती हैं कि समय कभी भी एक समान नहीं रहता ! ऐसी ही कुछ पिद्दियों का हश्र देख बचपन की एक कहानी याद आ गई, जो यही सीख देती है कि किसी को भी अपनी औकात, अपनी बिसात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए ! कहानी कुछ इस प्रकार है :
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| भटकन |
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| ऐश |
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| समझाइश |
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| अंत |
@छवियों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार
ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...