गुरुवार, 4 मार्च 2021

द्रोणाचार्य, एक पहलू ऐसा भी

प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने गुरु द्रोण को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आज के हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

हमारे ग्रंथों में वर्णित कई ऐसे पात्र हैं जिनके जीवन चरित्र के बारे में अनायास कई जिज्ञासाएं उठ खड़ी होती हैं ! जैसे महाभारत के महान योद्धा, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, युद्धविद्या में निष्णात, अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ, परशुराम शिष्य, कुरुवंश गुरु आचार्य द्रोण ! जिनको भगवान् कृष्ण भी प्रणाम करते थे ! पर इतने गुणी, सक्षम, ज्ञानी, और पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें शुरू में अभावों का सामना करते रहना पड़ा था ! कथाओं के अनुसार उनके जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघर्षमय, कठिन व अभावपूर्ण रहा था ! देखा जाए तो जितना कठिन उनका जीवन रहा उतना ही जटिल उनका चरित्र भी था। 

हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते

ऐसा माना जाता है कि द्रोण का जन्म, आज के उत्तरांचल की राजधानी देहरादून, जिसका उल्लेख महाभारत में द्रोणनगरी जिसे देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहा जाता रहा है, में हुआ था। इस इलाके में फैले मंदिरों और उपलब्ध मूर्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है। इनके पिता महर्षि भारद्वाज तथा माता अप्सरा घृतार्ची थीं। परिस्थियोंवश इनकी उत्पत्ति द्रोणी (यज्ञकलश) में हुई थी, इसलिए इनका नाम द्रोण पड़ा। इनका बचपन, लालन-पालन अपने पिता ऋषि भारद्वाज के आश्रम में ही हुआ। वहीं इन्होंने हर विद्या में निपुणता प्राप्त की। समयानुसार इनका विवाह आचार्य कृपाचार्य की बहन कृपि से सम्पन्न हुआ। 

इन सारे विवरणों को जान कर जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि एक ऐसा इंसान जो महान ऋषि भारद्वाज का पुत्र हो, आचार्य कृपाचार्य जिसके रिश्तेदार हों ! जो खुद इतना ज्ञानी, गुणी, विद्वान और पराक्रमी हो ! क्यों उसे शुरू में इतने अभाव में जीवनयापन करना पडा कि वह एक गाय तक पालने में असमर्थ था ! क्यों गरीबी के कारण उसे अपने मित्र द्वारा अपमानित होना पड़ा ! क्यों काम की तलाश में दर-दर भटकना पड़ा ! क्यों उसको अपनी योग्यता के अनुरूप यश नहीं मिल पाया ! क्यों बदनामियों ने उसका दामन थामे रखा !  

यदि गहराई से ग्रंथों की कथाओं-उपकथाओं का अध्ययन किया जाए तो एकाध जगह आचार्य द्रोण और गुरु शुक्राचार्य की आपसी मित्रता का जिक्र मिलता है। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य से अंतरंगता के कारण इन्हें देवताओं का कोपभाजन बन सुख-समृद्धि से वंचित रहने पर मजबूर होना पड़ा हो और इसी कारण तिरस्कृत होने तक की नौबत आन पड़ी हो ! एक क्षीण सा कारण और भी संभव हो सकता है ! जैसा कि महाभारत में उनका जो चरित्र उभर कर आता है वह एक ऐसे इंसान का है जो सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार की फ़िक्र करता है ! खासकर अपने बेटे की, जिसके सामने उसके लिए बाकी सारी बातें गौण हो जाती हैं। हो सकता है उनकी इसी मानसिकता के चलते हर कोई उनसे दूरी बना कर रखता हो। भीष्म पितामह को भी यह बात पता थी ! इसीलिए उन्होंने कुरु कुमारों की शिक्षा की जिम्मेदारी देते हुए उनसे वादा लिया था कि वे सिर्फ कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे। जाने अनजाने यह बात भी आगे चल कर उनकी बदनामी का एक कारण बन गई।  

गुरु द्रोणाराचार्य ने यह कभी नहीं कहा कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का प्रण लिया है। ऐसा होता तो वे सूत पुत्र कर्ण को भी अपना शिष्य ना बनाते। कुरुवंश से जुड़ने के पहले ऐसी किसी बात का कोई कारण भी नहीं बनता ! भीष्म पितामह को वचन देने के पहले यदि एकलव्य उनसे मिला होता तो उसे अपना शिष्य बनाने में उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं होती। क्योंकि एकलव्य कोई साधनहीन या निर्धन परिवार का सदस्य नहीं था। वह प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा  निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चंदेरी आदि बड़े राज्यों के समकक्ष थी। लेकिन एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने, अपने गुरु को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आजके हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी। लोकमान्यता के अनुसार इन्द्रप्रस्त का राजा बनने पर युधिष्ठिर ने यह गांव अपने गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया था। उनके नाम पर ही इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा, जो कालांतर में बदलकर गुड़गांव हो गया।

रही अर्जुन से अति लगाव की बात, तो हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते ! इन सब बातों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि महान होने के बावजूद उनमें इंसानी कमजोरियों की बहुतायद थी। परिवार के प्रति मोह था ! पुत्र प्रेम सर्वोपरि था ! अहम की भावना गहरी थी। क्षमा भाव की कमी थी ! इन्हीं सब वजहों से उन्हें वह आदर-सम्मान-ख्याति नहीं मिल पाई जो पितामह भीष्म को मिली ! उलटे, झूठे-सच्चे लांझनों से सदा उन्हें दो-चार होते रहना पड़ा।   

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

नोबेल की मृगमरीचिका और नेहरू

आज बहुत से लोग एक दल और उसके अनुयायियों को नेहरू विरोधी बता कटुता फैलाने की कोशिश में हैं ! उनसे भी एक सवाल है कि क्या नेहरू विरोध इन्हीं कुछ वर्षों से आरंभ हुआ है ? पहले क्या उनका विरोध कभी नहीं हुआ ? यदि वे सर्वमान्य नेता थे ! उनका हर कदम देश की भलाई के लिए था ! यदि वे सिर्फ देश और उसके नागरिकों का भला चाहते थे, तो उस समय सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अम्बेडकर, जय प्रकाश नारायण जैसे कई-कई नेता उनसे अलग विचार क्यों रखते थे ! क्या ये लोग देश का भला नहीं चाहते थे ..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज पक्ष-विपक्ष दोनों अपने-अपने हिसाब से देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू का नाम ले रहे हैं। एक उन्हें सर्वगुण संपन्न नेता के रूप में पेश कर रहा है तो दूसरा देश की कई-कई विफलताओं का जिम्मेदार उन्हें मान रहा है। इस विवाद में ना पड़ते हुए, करीब दस साल पुरानी यह पोस्ट एक अलग सी सच्चाई सामने ला कर रख रही है !  

नेहरू जी को शांति दूत के रूप में खूब प्रचारित किया गया है, पर नोबेल पुरस्कार फाउंडेशन ने भारत के इस पहले प्रधान मंत्री के नाम पर ज्यादा विचार नहीं किया ! हालांकि चयन की सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन जब इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया तब सामने आया कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को कभी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।  

नेहरू जी की अगुवाई में कई बड़े संयंत्र लगे, जिन्हें वे मंदिर की संज्ञा देते थे ! पंचवर्षीय योजनाएं लागू हुईं ! लोकतत्र मजबूत हुआ ! सामाजिक सुधार के लिए भी कमोबेश काम हुआ ! पर वे भी तो इंसान थे ! भूल-चूक उनसे भी हुई होगी ! जिसे मान लेने में कोई बुराई तो नहीं ही है।   

सबसे पहले 1950 में नेहरू जी के नाम से दो प्रस्ताव नोबेल शांति पुरूस्कार के लिए भेजे गए थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अंहिंसा के सिद्धांतों के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय यह सम्मान फिलिस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में रॉल्फ बुंचे को दिया गया था। 

1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए ! पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया। 

1953 में उनके लिए बेल्जियम के सांसदों सहित तीन प्रस्ताव भेजे गए थे ! पर पुरूस्कार गया द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जॉर्ज सी. मार्शल की झोली में।

1954 में नेहरू जी को फिर दो नामांकन प्राप्त हुए, पर इस बार गजबे हो गया, जब पुरूस्कार का हकदार किसी इंसान को नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय को बना दिया गया।

अंतिम बार 1955 में फिर एक बार उनके नाम को प्रस्तावित कर भेजा गया ! पर तब यह पुरूस्कार किसी को ना देकर, इसकी सारी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।

आश्चर्य की बात है कि हम जिन्हें दुनिया भर में शांति की अलख जगाने वाला, पंचशील का सिद्धांत लाने वाला, भविष्यदृष्टा, देश का निर्माता और ना जाने क्या-क्या मानते आए हैं, उसे इस विश्व प्रसिद्ध फांउडेशन ने मान्यता ना दे सिरे से ही नकार दिया ! दो-तीन बार नहीं पूरे ग्यारह बार अनदेखी कर दी गई ! सवाल तो कई उठते हैं ! क्या यह आभामंडल जबरन रचा गया था ! देशवासियों की नज़र में विश्व के अग्रणी नेता के रूप में स्थापित करने के लिए मिथक गढ़े गए थे ! सर्वमान्य नेता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था ! 

आज बहुत से लोग एक दल और उसके अनुयायियों को नेहरू विरोधी बता कटुता फैलाने की कोशिश में हैं ! उनसे भी एक सवाल है कि क्या नेहरू विरोध इन्हीं कुछ वर्षों से आरंभ हुआ है ? पहले क्या उनका विरोध कभी नहीं हुआ ? यदि वे सर्वमान्य नेता थे ! उनका हर कदम देश की भलाई के लिए था ! यदि वे सिर्फ देश और उसके नागरिकों का भला चाहते थे तो उस समय सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अम्बेडकर, जय प्रकाश नारायण जैसे कई-कई नेता उनसे अलग विचार क्यों रखते थे ! क्या ये लोग देश का भला नहीं चाहते थे ? 

यह सच है कि नेहरू जी की अगुवाई में कई बड़े संयंत्र लगे, जिन्हें वे मंदिर की संज्ञा देते थे ! पंचवर्षीय योजनाएं लागू हुईं ! लोकतत्र मजबूत हुआ ! सामाजिक सुधार के लिए भी कमोबेश काम हुआ ! पर वे भी तो इंसान थे ! भूल-चूक उनसे भी हुई होगी ! जिसे मान लेने में कोई बुराई तो नहीं ही है।  

वैसे बताते चलें कि बापू गांधी का नाम भी  पांच बार नोबेल के लिए प्रस्तावित किया गया था पर....... 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

बसंत आया तो है, पर....

मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ 

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बसंत फिर आया तो है ! पर यह कैसा हो गया है, सुस्त, मलिन सा ! जर्जर सी काया ! कांतिहीन चेहरा ! मुखमण्डल पर विषाद की छाया ! पहले कैसे इसके आगमन की सूचना भर से प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता था ! सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक मादक अंगड़ाई ले आलस्य त्याग जागने लगती थी ! जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता था ! वृक्ष, पेड़-पौधे सब नए पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते थे ! सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब प्रफुल्लित हो जाती थी। पर इस बार तो जैसे मायूसी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! जीव-जंतु-पादप सभी जैसे किसी अज्ञात संकट से डरे, सहमे सदमाग्रस्त हुए से लग रहे हैं ! उन्हें डर है कि जैसे बसंत धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है वैसे ही बाकी मौसम भी मुंह फेर गए तो क्या होगा, इस शस्य-श्यामला का ? ऐसा क्यों !
उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता
तभी पिछले वर्ष की वह भोर फिर मेरे मष्तिष्क में कौंध जाती है ! साल गुजर गया इस बात को ! पर अभी भी जब उस पल की याद आती है तो सिहरन तो होती ही है साथ ही विश्वास भी नहीं होता कि उस दिन सचमुच कुछ वैसा भी हुआ था ! आज भी मुझे उस साल भर पहले की सुबह का एक-एक लम्हा अच्छी तरह याद है। जब पौ फटी नहीं थी और मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई दी थी। उस दिन रात देर से सोने के कारण अर्द्ध-सुप्तावस्था सी हालत हो रही थी। इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर मोह लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास !
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !

बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया  सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में डर की एक सर्द लहर सी  सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करूंगा। आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा, उस समय प्रकृति के सुंदर, अद्भुत बदलाव को ! सृजन ही मेरा कर्म है ! धरा को जीवंत रखना मेरा फर्ज ! जीव-जंतुओं, लता-गुल्म की सुरक्षा मेरा उद्देश्य ! 
इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। वह मेरी ओर देख रहा था। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि अब वक्त आ गया है, गहन चिंतन का ! लोगों को अपने पर्यावरण, अपने परिवेश, अपनी प्रकृति, अपने माहौल के प्रति जागरूक होने का ! अपनी धरोहरों को बचाने का ! जिससे आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। अवाम को अपनी गफलतों से किनारा करना ही होगा ! नहीं तो कुछ ऐसी अनहोनी ना घट जाए जिस पर बाद में पछताने का कोई लाभ ना हो ! हाथ मलते रहने के सिवा कोई चारा ना हो ! 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मैं पता नहीं कहाँ खो गया ! पता नहीं ऐसे में कितना वक्त निकल गया ! तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो। कंप्यूटर अभी भी चल रहा है, कागज बिखरे पड़े हैं, फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे। सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में हम दोनों के सिवाय और कोई नहीं था। पर जो भी घटित हुआ था, वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं, वह सब भ्रम था ! कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!
पर जो भी हुआ था, जैसे भी हुआ था ! जिस तरह उस दिन जिस गंभीर समस्या की ओर ध्यान गया या दिलाया गया था ! सचेत किया गया था ! उसको हल्के में ले, उसके निवारण हेतु कुछ भी तो सकारात्मक नहीं किया था हमने ! एक सपने की तरह भूला दिया था ! गैस चैंबर में घुट-घुट कर जीते रहने के बावजूद हम सदा की  की तरह निश्चिन्त थे कि प्रकृति खुद ब खुद अपने में सुधार ले आएगी ! हम उसी प्रकृति का दम घोंटने में लगे रहे, उसी कायनात की ऐसी की तैसी कर रख दी, जिसने सिर्फ हमें छह-छह ऋतुओं की नेमत सौंपी है ! वह हमें बार-बार चेताती रही ! उसके संदेशे आते रहे ! पर हम अपने गुमान में ही जीते रहे ! फिर धीरे-धीरे ऋतुएं बदलने लगीं ! मौसम क्रूर होने लगे ! ऋतु चक्र डांवाडोल होने लगा ! पर हम कानों में तेल और आँखों पर पट्टी बांध अपनी कुटिल कारगुजारियों में मशगूल रहे ! 

नतीजतन एक अनजान, लाइलाज, विश्वव्यापी महामारी ने हमें अपने पंजों में धर दबोचा। सारी दुनिया में हाहाकार मचा दिया ! लोग बेतहाशा काल के गाल में समाने लगे ! ना कोई इलाज, ना कोई दवा ! इंसान अपने ही घरों में कैद हो कर रहने को मजबूर हो गया ! पूरी जिंदगी थम कर रह गई ! मानव के अमूल्य जीवन का एक साल पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया ! अभी भी संकट टला नहीं है ! पर पता नहीं इंसान ने सीख ली या नहीं !  

यदि नहीं तो अब कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे ? यदि हमारे पूर्वज भी हमारी तरह सिर्फ मैं और मेरा करते रहे होते तो क्या कभी हम स्वर्ग जैसी इस धरा पर रहने का सौभाग्य पा सकते थे ? फिर मैं सोचता हूँ कि मैंने ही क्या किया इस विषय को ले कर ! सरकार का मुंह तकने, दूसरों से पहल की अपेक्षा रखने और सिवा नुक्ताचीनी के ! किसी की ओर उंगली उठाने से पहले मैंने कोई पहल की इस ओर ? कोई जागरूकता फैलाई ? अपनी तरफ से कोई कदम उठाया इस समस्या के निवारण हेतु ? पर अब इस विपदा से सबक लेते हुए सुधरना तो होगा ही, नहीं तो अब बसंत नहीं आने वाला फिर चेताने के लिए !! 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

कब और कैसे भारत, इंडिया हो गया

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे, ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है ! पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए, कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी यह कहां पता चल पाया..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

अपने देश में हजारों ऐसे स्थानों या जगहों के नाम सुनने-जानने को मिल जाएंगे जिनका उस स्थान से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता। ना हीं उस नाम के अर्थ से उसका कोई संबंध होता है। फिर ऐसा क्यों ! एक संभावना यह लगती है कि ऐसा जाने-अंजाने, जुबान पर ना चढ़ने वाले कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण और बोलने की सहूलियतानुसार हो गया होगा। ऐसी जगहों पर शोध किया जाए तो एक ग्रंथ ही बन जाए। पिछली पोस्ट में दो-तीन अजीबोगरीब शब्दों वाले मुहावरों की बात उठी थी ! उसी बहाव में कुछ ऐसी जगहों के नाम याद आ गए जिनसे मेरा संबंध रह चुका है ! ऐसे ही मेरे दो प्रत्यक्ष-प्रमाणित उदाहरण पेश हैं - 

सबसे पहले तो एक आपबीती ! जिसके याद आते ही आज भी हंसी आ जाती है ! बंगाल के साउथ चौबीस परगना जिले के बज बज इलाके में कैलेडोनियन (Caledonian) नाम की जूट मील थी (आज भी है) । तब मैं नार्थ चौबीस परगना में स्थित कमरहट्टी जूट मील में कार्यरत था। एक बार मैंने अपने क्लर्क को वहां के लिए एक ऑफिशियल पत्र का मजमून बता उसका ड्राफ्ट बनाने को कहा। जब वह लेटर टाइप कर लाया तो उसमें कैलेडोनियन की जगह कालीदुनिया लिखा हुआ था ! मैंने विस्मित हो पूछा, तो वह बोला कि यह नाम कभी सुना नहीं था और आपका उच्चारण समझ नहीं पाया, तो मैंने सोचा यह कालीदुनिया होगा सो......! उस दिन तो ना गुस्सा होते बना ना हीं हँसते, पर आज उस लम्हे को याद कर मुस्कराहट जरूर आ जाती है।

बज बज वही जगह है, जिसके फेरी घाट पर, 19 फरवरी 1897 में शिकागो की अपनी इतिहासिक यात्रा के बाद स्वामी विवेकानंद ने भारत भूमि पर पग धरे थे ! यहीं पर कोमागाटामारु जहाज आ किनारे लगा था 
ऐसा ही एक और उदाहरण ! कोलकाता से लगभग पन्द्रह की.मी. की दूरी पर टीटागढ नामक एक जगह है। यहां एक पेपर मिल भी है। सडक से यह स्थान कोलकाता से जुडा हुआ है। इसी के बाद अगला कस्बा बैरकपुर का है। वही बैरकपुर जो ब्रिटिश काल में अंग्रेजी फौजों का केंद्र हुआ करता था। आज यहां भारतीय सेना की छावनी है। बैरकपुर से कोलकाता के लिए अच्छी-खासी सरकारी व निजी बस-सेवा उपलब्ध है। इनमें निजी बसों के साथ चलने वाले सहायक लडके यात्रियों की सुविधा के लिए बस-स्टापों के नाम जोर-जोर से बोलते रहते हैं। बैरकपुर और टीटागढ के बीच एक बस स्टाप है जिसे ये लडके 'बडा मस्तान' के नाम से पुकारते हैं। जिसका अर्थ होता है, कोई बलशाली या दबंग इंसान या फिर कोई मशहूर पीर या सिद्ध बाबा ! समय के साथ मरणोंपरांत उसकी समाधी या मजार बना दी जाती है। छुटपन में इन सब बातों पर ध्यान कहां जाता है ! पर होश संभालने पर जब कुछ खोज-खबर लेनी चाही तो उस बस-स्टॉप के आस-पास कोई समाधी या मजार का पता नहीं लग पाया। लोगों से जानकारी ली तो भी यही पता चला कि ''ऐसा कोई फकीर यहां हुआ ही नहीं। हां, बस-स्टाप से थोडी दूरी पर एक छोटे से अहाते में एक मंदिर है। उस जगह को ब्रह्म-स्थान के नाम से जाना जाता है।'' तब जाकर ज्ञान-चक्षुओं ने यह रहस्य खोला कि यह ब्रह्म-स्थान ही धीरे-धीरे अनपढ़, नासमझ लडकों की 'नीम-हकीमी' के कारण बडा मस्तान का रूप लेता चला गया।

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी कहां पता चल पाया !!!

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

गदा, उल्लू व कुतका

ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्षों से चली आ रही बहुतेरी कहावतों या मुहावरों के शाब्दिक अर्थ कुछ होते हैं गूढ़ार्थ कुछ और ! हो सकता है कि ऐसा जाने-अंजाने, कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण या फिर नासमझी के कारण होता चला गया हो। या फिर आत्मश्लाघि, नीम-पंडितों और विद्वान व्याकरण के ज्ञाताओं के दिमाग की उपज हों। प्रस्तुत है ऐसी ही कुछ बातों का लेखा-जोखा ! 

खुदा मेहरबान तो गधा (गदा) पहलवान -  कहते हैं कि इसमें प्रयुक्त गधा असल में "'गदा'' है जो एक फ़ारसी शब्द है और जिसका अर्थ होता है फकीर या भिक्षा मांगने वाला। अब भिक्षा तो वही मांगेगा जो लाचार, मजबूर या कमजोर होगा ! इसलिए कहावत में गधा की जगह पर गदा अधिक अर्थवान लगता है जो कलिष्ट या मतलब ना समझ पाने की वजह से गधा हो गया होगा। 

अपना उल्लू सीधा करना - आजकल यह अपना मतलब सिद्ध करने के संदर्भ में प्रयुक्त होता है ! पर एक बार कादम्बिनी पत्रिका के ''शब्द स्तंभ में इब्बार रब्बी जी'' ने बताया था कि खेतों की मेढ़ों में पानी के बहाव को बदलने के लिए एक लकड़ी का टुकड़ा काम में लाया जाता है जिसे ''उल्लू'' बोलते हैं। किसान उसीको सीधा कर जब पानी के बहाव को अपने खेत की ओर मोड़ता है तो उसे उल्लू सीधा करना कहते हैं। समय के साथ इस का अर्थ मतलबपरस्ती से जुड़ गया। 

घर का कुत्ता ना घर का ना घाट का - इसका मोटा सा अर्थ यह लगाया जाता है कि चूँकि वह धोबी के साथ घाट के चक्कर लगाता रहता है इसलिए घर वाले समझते हैं कि वह घाट पर रोटी खा लेगा और घाट पर धोबी समझता है कि वह घर से खा आया होगा इस तरह बेचारा कुकुर भूखा ही रह जाता है ! पर यह बात उतनी जमती नहीं जितनी कि मित्र शिवम मिश्रा जी द्वारा बताई, ''आशुतोष राणा जी'' द्वारा दी गई जानकारी, मुहावरे के ज्यादा करीब लगती है। पहले घरों की दिवार पर एक खूँटिनुमा लकड़ी का टुकड़ा, जिसे ''कुतका'' कहते थे, लगाया जाता था।  इस पर घर के मैले  कपड़ों को टांग दिया जाता था जहां से धोबी उन्हें धोने के लिए ले जाता और धुले कपडे वहीं लटका जाता था। अब वह धोबी के लिए हो कर भी उसका नहीं होता था। फिर ठेठ गांवों को छोड़ शायद ही अब उसका अस्तित्व कहीं बचा हो ! इसलिए वैसी लुप्तप्राय और अनजान चीज भूलती चली गई और उसके बदले  कुत्ता अस्तित्व में आ गया, ऐसा लगता है ! जबकि धोबी का साथी ज्यादातर गधा हुआ करता था ! 

यह तो कुछ उदाहरण हैं पर ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना !

आभार - शिवम मिश्रा  

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

सच तो यही है कि हम खुदगरज हैं

सरकार बिल्कुल बेकार है ! इस बार इनको वोट ही नहीं दूंगा ! ऐसा क्यों पूछने पर बोले, डीए ही नहीं बढ़ाया ! इतनी मंहगाई है कुछ सोचते ही नहीं ! पिछले वाले बढ़ाते रहते थे ! वे ठीक थे ! जब उन्हें कोई नए कर ना लगाने, करोड़ों लोगों को साल भर मुफ्त खाने तथा अन्य सुविधाओं का हवाला दिया तो बोले किसने देखा है कौन कहां क्या दे रहा है ! मुझे नहीं मिला यह मुझे पता है ! जब उनको कहा कि प्रायवेट सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं, आपकी तो बची हुई है ! तो चिढ कर बोले, किसने मना किया, कर लें सब सरकारी जॉब ! अब ऐसी सोच से क्या बहस !! 

#हिन्दी_ब्लागिंग   

दिल्ली के बाहर या विदेश से अदि कभी कोई ताना मारता है कि दिल्ली वालों ने सिर्फ मुफ्त के बिजली-पानी की वजह से ही किसी को सत्ता सौंपी है, तो हम लोग तिलमिला कर रह जाते हैं ! बेइज्जती महसूस करते हैं ! लगता है जैसे किसी ने भरे बाजार में मानहानि कर दी हो ! वैसे सच कहा-देखा जाए तो यह बात बिलकुल निराधार भी तो नहीं है ! हम में से अधिकतर  मुखौटाधारी लोग हैं ! पार्टियों में, सार्वजनिक जगहों में, टीवी देखते हुए, भाषण सुनते हुए हम पूरी तरह देश भक्त होते हैं ! पर जहां अपने निजी फायदे की बात आती है तो हमारा मुखौटा पता नहीं कब कहां जा हमारी असलियत उजागर कर देता है ! हम ऊपर से अपने को कितना भी परोपकारी, देश-समाज हितैषी या लालच विहीन दिखाने की कोशिश करें, भीतर ही भीतर रियायत पाने की लालसा, मुफ्त की चीज की हवस बनी ही रहती है। फ्री का नमक भी चीनी सी मिठास देता लगता है !  

पिछले दिनों बजट के बाद एक परिचित का घर आना हुआ ! सरकारी मुलाजिम हैं ! बातों ही बातों में बात सरकार पर आ गई ! बोले बिल्कुल बेकार है ! मैं इस बार इनको वोट ही नहीं दूंगा ! ऐसा क्यों पूछने पर बोले, डीए ही नहीं बढ़ाया ! इतनी मंहगाई है कुछ सोचते ही नहीं ! पिछले वाले बढ़ाते रहते थे ! वे ठीक थे ! जब उन्हें तर्क दिया गया कि इतनी आपदा के बावजूद कोई नया टैक्स नहीं लगाया ! करोड़ों लोगों को साल भर से मुफ्त खाना दिया जा रहा है ! गरीबों को आर्थिक सहायता तथा अन्य सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही हैं ! उन सब के लिए भी तो पैसा चाहिए वह कहां से आएगा ! तो बोले किसने देखा है कौन कहां क्या दे रहा है ! मुझे नहीं मिला यह मुझे पता है ! जब उनको कहा कि प्रायवेट सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं आपकी तो बची हुई है ! तो चिढ कर बोले किसने मना किया, कर लें सब सरकारी जॉब ! अब ऐसी सोच से क्या बहस !!

यह तो एक बानगी भर थी ! हजारों-लाखों लोग ऐसे हैं जो प्याज-टमाटर-पेट्रोल पर अपनी आस्था बदल लेते हैं ! तो बिजली-पानी तो बहुत बड़ी बात है ! हमें दो-तीन-पांच साल बाद की खुशहाली से कोई मतलब नहीं है ! आज और अभी फौरी तौर पर क्या फायदा हो रहा है, हमारे लिए यही मायने रखता है ! वर्तमान में जिओ, भविष्य किसने देखा है ! चतुर लोगों ने इसी कमजोर नस को परखा और फ़ायदा उठा लिया ! अब तिलमिलाते रहो तानों पर ! 

एक बात और भी है, कहना नहीं चाहिए ! कइयों को नागवार भी गुजर सकती है ! पर सरकारी नौकरी वालों को कुछ ऐसा लगता है जैसे देश के संसाधनों पर बाकियों से उनका हक़ ज्यादा है ! वह भी औने-पौने या मुफ्त की सुविधाओं के साथ ! यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज देश के अधिकतर संसाधन अपने कर्मचारियों को मुफ्त की सेवाऐं प्रदान करने की वजह से ही बिकने के खतरे की कगार पर आन पड़े हैं ! यह कोई कुंठा या पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार नहीं है, मेरे भी दसियों बहुत ही अपने-करीबी सरकारी पदों पर आसीन हैं, पर सच्चाई तो सच्चाई ही है ! सरकार को कड़वा घूँट पी, बहुत ही जरुरी को छोड़ मुफ्त की रेवड़ियों की बंदर बांट बंद कर ही देनी चाहिए !!  

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कुछ हो तो जरूर रहा है

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता, हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे; दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे, वे मैदान के बाहर हो गए ! सारा परिदृश्य ही बदल गया। परिस्थियाँ बदल गईं।बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था ! अब जो सहमति होगी उसका सारा श्रेय भी उत्तर प्रदेश को ही मिलेगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ हो तो जरूर रहा है ! कोई जरुरी नहीं कि मैं सही ही होऊँ ! मैं गलत भी हो सकता हूँ ! पर पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि जो दिख रहा है वैसा हो नहीं रहा और जो हो रहा है वह दिख नहीं रहा ! यवनिका के पीछे बहुत ही सोच-समझ कर, समझदारी और चतुराई से समस्या का आकलन कर उससे पार पाने की तरकीब निकाली जा रही है। जिन्होंने वर्षों-वर्ष से चली आ रही अड़चनों को एक झटके में दूर कर दिया हो वे क्या देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वालों की हरकतों पर हाथ पर हाथ धरे बैठे होंगे ! 

फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा 

करीब दो अढ़ाई महीने पहले जो किसान आंदोलन पंजाब से शुरू हुआ जिसे कुछ स्पोर्ट हरियाणा से मिला उसमें सबसे ज्यादा प्रतिशत पंजाब के वाम पंथी और उग्रवादी नेताओं का था ! जिनका मुख्य उद्देश्य शायद किसानों की सहायता से ज्यादा केंद्र सरकार को नीचा दिखाना था। इसीलिए दसियों बैठकें हुईं सरकार के साथ पर कोई नतीजा नहीं निकला या निकलने नहीं दिया गया ! फिर गणतंत्र दिवस पर जो हुआ उसे विश्व ने देखा !

26 जनवरी के कांड के दो दिन बाद एकबारगी तो लगा कि नौटंकी का पटाक्षेप हो गया है और सरकार ने पूरी तरह स्थिति पर काबू पा लिया है। पर अचानक नाटक में जुटे बीसियों किसान नेताओं में से एक, पश्चिमी उतर प्रदेश के राकेश टिकैत, जो अपने दल का मुख्य प्रवक्ता था, मुखिया नहीं, ने अपने अभिनय का कौशल दिखलाया और इस बार पंजाब के बदले उत्तर प्रदेश के किसानों के हुजूम को दिल्ली बार्डर पर ला, चरित्र अभिनेता से नायक बन गया ! यहीं से लगने लगा कि शतरंज पर एक नए व्यूह की रचना कर दी गई है !

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के  मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता,  हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे;  दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए  समर्थन जुटा रहे थे वे मैदान के बाहर हो गए !  सारा परिदृश्य ही बदल गया।  परिस्थियाँ बदल गईं। बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था। जहां  वोट प्रतिशत क्रमश: 43.6 और 53.1 हो, वहीं के किसानों से बात होगी। हो सकता है कि इस बार सरकार दो कदम पीछे भी हटे !  किसानों को संतुष्ट किया जाएगा !  सरकार और  किसान दोनों का सम्मान बचा रहेगा ! उधर वामियों-कांगियों को, जो अभी तक मोदी जी को समझ ही नहीं पा रहे, फिर कहीं मुंह छुपाने की जगह खोजनी होगी। 

यदि 28 की रात को दिल्ली बॉर्डर खाली करवा लिया जाता तो उसका एक संदेश यह भी जा सकता था कि सरकार ने जबरदस्ती दमनकारी रुख अख्तियार कर आंदोलन ख़त्म करवाया। तानाशाही काआरोप जड़ दिया जाता। लुटे-पिटे विपक्ष को तो मौका चाहिए ही होता है। फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा ! अभी भले ही सरकार की मुश्किलें बढ़ी हुई लग रही हों पर मुझे लगता है कि बहुत जल्द इस समस्या का हल निकाल लिया जाएगा ! क्योंकि आगामी साल यू.पी. में फिर चुनाव हैं उन पर भी इस बात का सकारात्मक प्रभाव पडेगा। 

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