pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

हमारे बारे में (About us)

Welcome to kuchhalagsa 🙏  

इस ब्लॉग में कोशिश की गई है, देश, समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसमें कुछ रोचक व्यक्तिगत वाकयों को साझा किया गया है, जो किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं। इसके साथ ही यात्रा संस्मरणों को भी जगह मिली है, जो पर्यटन प्रेमियों के लिए काफी जानकारी उपलब्ध करवाते हैं ! ब्लॉग की सदा यह कोशिश रहती है कि वह कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !

मैं गगन शर्मा, जुलाई 2008 में कादम्बिनी पत्रिका के एक ब्लॉग संबंधी लेख ने जैसे मुझे पूरी दुनिया से परिचित करवा दिया। एक ऐसा मंच, जहां से अपनी बात को हजारों लोगों से साझा करने की सहूलियत मिलती थी ! उसी से प्रेरित हो ''कुछ अलग सा'' का अस्तित्व में आया। शुरुआत धीमी रही, पर स्थापित ब्लॉग लेखकों का बहुत सहयोग मिला ! धीरे-धीरे पहचान बनने लगी ! इसी बीच कई अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की आंधी आई, लोगों की पसंद बदल गई ! कई ब्लॉग बंद हो गए ! पर मेरी सोच यही रही कि कुछ भी हो जाए ''कुछ अलग सा'' चलता रहेगा ! उसका प्रतिसाद पाठकों के प्रेम के रूप में मिला, आज यह सोलह लाख से भी ऊपर देश-विदेश में पढ़ा जा चुका है। 

इसकी मुख्य कैटगरी में यात्रा वृत्तांत, जैसे अंडमान, सिक्किम, भूटान इत्यादि जगहों की यात्रा के संस्मरण ! कुछ कम ज्ञात स्थानों का विस्तृत विवरण, जैसे दिल्ली की भूली भटियारी, कोटा का विभीषण मंदिर, जिनके बारे में वहां के रहने वाले भी बहुत कम जानते हैं ! पुरानी कथाओं में उपेक्षित चरित्रों का एक अलग सकारात्मक आंकलन जैसे संपाति का सूर्य अभियान या होलिका के मंगेतर इलोजी की कथा ! समकालीन विषयों और व्यक्तियों पर चर्चा, जो चर्चित हो रहे हों !

मैं अकेला ही ब्लॉग चलाता हूँ ! यात्राओं के लेखों के साथ जहां तक संभव हो अपने द्वारा खींची गई फोटुओं को ही प्राथमिकता देता हूँ ! अभी तक कोई टीम नहीं बनी है, पर यदि कोई जुड़ना चाहे तो स्वागत है !
Yours,
Gagan Sharma
kuchhalagsa.blogspot.com
gagansharma09@gmail.com

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

Privacy Policy

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​Last updated: 28.10.2026

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ताकि बढ़ती उम्र में भी वह दोस्त बना रहे

शरीर की तुलना उस दरवाजे या खिड़की से की जा सकती है, जिस पर रंग-रोगन और सफाई तो खूब की जाती है पर उसे ज्यादतर बंद या जरा सा खोल कर काम चला लिया जाता है ! अब वह दिखने में तो बेहद साफ-सुथरा और चमकदार लगेगा, पर जब उसे पूरा खोलने की आवश्यकता आन पड़ेगी तो उसके कब्जे (Hinge) उसे हिलने-डुलने नहीं देंगें। वह नखरे करेगा, जाम हो जाएगा। चिंचिंयाने लगेगा ! ठीक यही हालत शरीर की भी होती है, दिखने में नहाया-धोया, साफ-सुथरा, चमकदार, पर दस कदम पर ही हांफने और कराहने लगता है। इसीलिए हलके-फुल्के व्यायाम की आवश्यकता बनी रहती है...........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम सभी कहते-सुनते-जानते आए हैं कि शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उसकी देख-भाल के साथ-साथ उसे चलायमान रखना भी जरुरी है ! पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे-वैसे बुजुर्गों के मन में एक भय भी जगह बना लेता है कि किसी वर्कआउट से कहीं कोई हड्डी ना चटक जाए, कहीं गिर ही ना जाऊं, कोई मांसपेशी ही जवाब ना दे दे ! ऐसी ही सोच इंसान को व्यायाम से विमुख कर देती है और वह निष्क्रिय और अस्वस्थ होता चला जाता है, जबकि इस उम्र और अवस्था में सक्रियता और व्यस्तता बहुत जरुरी होती है ! 

द्वंद्व 
शरीर की अस्वस्थता की तुलना उस दरवाजे या खिड़की से की जा सकती है, जिस पर रंग-रोगन और सफाई तो खूब की जाती है पर उसे ज्यादतर बंद या जरा सा खोल कर काम चला लिया जाता है ! अब वह दिखने में तो बेहद साफ-सुथरा और चमकदार लगेगा, पर जब उसे पूरा खोलने की आवश्यकता आन पड़ेगी तो उसके कब्जे (Hinge) उसे हिलने-डुलने नहीं देंगें। वह नखरे करेगा, जाम हो जाएगा। चिंचिंयाने लगेगा ! ठीक यही हालत शरीर की भी होती है, दिखने में नहाया-धोया, साफ-सुथरा, चमकदार, पर दस कदम पर ही हांफने और कराहने लगता है। इसीलिए हल्की-फुल्की सक्रियता की आवश्यकता बनी रहती है।  

जंग 
यहां यह भी सही है कि बुजुर्गों को युवाओं की तरह कसरत की जरुरत नहीं होती ! कसरत शब्द अपने आप में ही भारी है ! उन्हें सिर्फ पूरे शरीर को सक्रीय बनाए रखना होता है ! युवाओं की तरह शरीर को थकाना नहीं होता ! नाहीं मांस-पेशियां या पैक्स बनाने होते हैं ! इसीलिए बढ़ती उम्र में सभी को अपने शरीर की क्षमता के अनुसार ही कसरत चुननी चाहिए और उसी के अनुसार रोजाना थोड़ा-थोड़ा व्यायाम करते रहना चाहिए। इस उम्र में जल्दबाजी नहीं, सहजता ज्यादा जरूरी है। बस, शुरुआत छोटी रखनी है और धीरे-धीरे आगे बढ़ना है ! युवावस्था में भले ही वर्जिश ना की हो पर यह बुजुर्गों के लिए बेहद जरुरी है !

सहजता 

स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बहुत से बुजुर्गों ने अपनी समर्थता के अनुसार रोज टहलने का नियम बना रखा होता है, बहुत अच्छी बात है, पर सिर्फ टहलना शरीर के मध्य से निचले हिस्से को तो कार्यरत कर सकता है पर उससे ऊपर के अंगों जैसे सिर, आँखें, गर्दन, कंधे, कलाइयों, हथेलियों के जोड़ इत्यादि बचे रह जाते हैं ! इनकी देखभाल की भी उतनी ही आवश्यकता है, इनके लिए भी बहुत सारी हल्की-फुल्की गतिविधियां उपलब्ध हैं ! 

निष्फिक्रता 

एक बात और ध्यान में रखनी जरुरी है कि आपको शरीर से जबरदस्ती नहीं करनी है बल्कि उसके साथ मिल कर, उसे दोस्त बना कर काम करना है। इसलिए, छोटी-छोटी गतिविधियां चुनें, जल्दबाजी से बचें। इस उम्र में भारी कसरत करने के बजाय, शरीर की जकड़न दूर करने पर ध्यान दें और अपने डॉक्टर या किसी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

प्रणाम करें और सिखाएं भी

छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लें, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! क्योंकि बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का जरा सा भी अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। सिर्फ प्रयास करना है, अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण का .............!!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्रणाम का अर्थ होता है विनीत होना ! किसी के सामने सर झुकाना ! अपने से बड़ों को, अपने गुरुजनों को सम्मान देना ! प्राचीन काल से ही यह हमारी परंपरा रही है ! जब हम किसी के सामने झुक कर उसका चरण स्पर्श करते हैं तो हमारे में विनम्रता का भाव आ जाता है और सामने वाले की सकारात्मक ऊर्जा, आशर्वाद के रूप में हमारी नकारात्मक ऊर्जा का स्थान ले लेती है ! पर इसके लिए हमारे मन में सामने वाले के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव होना भी जरुरी है !

प्रणाम 

प्रणाम कोई दैनिक मशीनी क्रिया नहीं है ! प्रणाम अनुशासन है, जो हमें विनम्र बनाता है, आदर करना सिखाता है, हमारे अंदर का अहम मिटाता है, सुविचारों को स्थान देता है। घर में सुख-शांति स्थापित करता है, आपसी प्रेम बढ़ाता है ! आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही नहीं आएगी !

आशीर्वाद 
यदि कोई व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, तो उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती चली जाती है। पर चरण स्पर्श भी नियमानुसार करना चाहिए ! इसके लिए हमेशा शांत भाव से बिना किसी जल्दीबाजी के दोनों हाथों से अपने श्रद्देय के दोनों पैरों का स्पर्श करना चाहिए ! घुटने तक या एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है। इसके साथ ही जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, उनका भी फर्ज है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे तो लाभ प्राप्त होता ही है, आशीर्वाद देने वाले का भी पुण्य बढ़ जाता है। 

परंपरा 
प्रणाम की महत्ता का तो रामायण हो या महाभारत सभी ग्रंथों में विवरण उपलब्ध है ! रामायण में तो खुद प्रभू ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए, पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।  महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा, उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा, पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं, तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता ! इसी प्रणाम की क्रिया के प्रभाव से ऋषि मार्कण्डेय जी का अल्पायु योग खत्म हो गया था। ऐसे असंख्य उदाहरण सर्व-सुलभ हैं !

नियम 
इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

खौफ बिस्कुटों का 😧

सच मानिए उन बिस्कुटों का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी.............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

क हते हैं कि दुनिया की हर चीज में आत्मा होती है ! सजीव का तो ठीक है पर क्या निर्जीव में भी ? पर यह भी तो हो सकता है कि जो हमारे लिए निर्जीव हो, वह खुद में सजीव हो ! दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो पैरा-नेचुरल या पैरानॉर्मल बातों पर विश्वास करते हैं ! फिल्मों में भी पुतले, पेड़, कार आदि की आत्माओं के कारनामे सभी ने देख ही रखे हैं ! यदि ऐसा है तो क्या निर्जीव बिस्कुटों में भी ऐसा कुछ होता है ? मेरा तो अनुभव है कि ऐसा कुछ जरूर होता है ! आप माने या ना माने, पर भई मैं तो मानता हूँ, भुग्तभोगी जो हूँ !

यही थे वे 

च लिए पूरी बात बताता हूँ ! आजकल बाजार के डराने-धमकाने की वजह से हम सब कुछ ज्यादा ही स्वास्थ्य-जागरूक हो गए हैं ! उसी के निर्देशानुसार खाने-पीने की चीजें घरों में जगह बनाने लगी हैं ! भले ही वह आपको अच्छी लगें या नहीं ! अब बाजार ने बताया कि बाकि बिस्कुटों की बजाय फलानि कंपनी का फलाना डाइजेस्टिव बिस्कुट सेहत के लिए उत्तम है ! उसके बताने की देर थी कि अगली खेप में घर में उसी ब्रांड के ढेर सारे ''पैकेट्स'' आ गए ! अब आप ही बताइए एक ही चीज रोज-रोज कब तक खाई जा सकती है ? मैंने उसके खिलाफ विद्रोह किया और बाजार से अपनी पसंद का उसका दूसरा भाई ले आया ! 

शा यद यह बात पहले वाले को पसंद नहीं आई, हो सकता है कि इससे उसकी भावनाओं और सम्मान को ठेस पहुंची हो ! फिर क्या था उसकी आत्मा ने अपना रंग दिखाया, एक-दो दिन बाद ऑफिस में जो रिफ्रेशमेंट का सामान आया, उसमें वही बिस्कुट भाई साहब मुझे मुंह चिढ़ाते हुए शामिल थे ! मुझे लगा ऐसा संयोगवश हुआ होगा ! पर बंदे को क्या पता था कि यह सब सुपर-नैचुरल पॉवर का खेल है ! और फिर मेरे सिवाय वहां सभी को वे पसंद भी थे ! अपने वश का तो इतना ही था कि उसका सेवन ही ना किया जाए ! ऐसा ही करता भी रहा, या ज्यादा से ज्यादा किसी के अनुरोध पर एक-आध कुतर लिया ! 

इसी बीच अपने छोटे भ्राता निहार के यहां नागपुर जाने का मौका मिला ! अब विडंबना देखिए, झटका यहां जैसे मेरा इंतजार  ही कर रहा था ! अगले दिन सुबह की चाय के साथ बिस्कुटों के डिब्बे का जैसे ही मैंने ढक्कन खोला तो देखा उसी ब्रांड के वही महाशय मुझे देख, आँख मारते हुए वहां भी विराजमान थे ! जैसे कह रहे हों बेटा, कहां-कहां भागोगे, जहां भी जाओगे मुझे ही पाओगे ! एक अदना सा बिस्कुट भी अच्छे-खासे इंसान को जोकर सा बना सकता है ! 

सच मानिए उस बिस्कुट का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''तेरे मन कुछ और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी !

वा पसी मद्रास-निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस से थी ! ट्रेन में सुबह जब वेंडर चाय लाया तो उसके साथ भी वही दो नामुराद फिर किसी साये की तरह मेरे सामने उपस्थित थे ! लगने लगा था कि एक तरह से ''मिडास'' हो गया हूँ, जिस बिस्कुट को छूता हूँ वही ''वह'' बन जाता है ! समझ नहीं आ रहा था कि रोऊं या उस बिस्कुटिया आत्मा से माफी मांगू ............!

अब आप बताएं, आपको क्या लगता है ! क्या यह सब संयोग था, या फिर......................😨

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद, मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर गया तो वहां उस रचना को भी विचरते पाया ! असमंजस और गहरा गया ! पर तभी मेरी नजर उस रचना के प्रकाशित होने की तारीख पर पड़ी, जो मेरे ब्लॉग के दूसरे यानी अगले दिन की थी ! मन से बोझ सा उतर गया ! लौट कर अमित जी के उस प्रशंसक की टिपण्णी पर टिप्पणी की कि "महोदय वह रचना मेरी नहीं थी, मैंने इस बात को इंगित भी किया है ! पर वह अमित जी की भी नहीं थी, उन्होंने भी उसे मेरे ब्लॉग पर छपने के बाद दूसरे दिन संकलित ही  किया है ! तो किसने किस की............😕" 

व्यक्ति पूजा का जैसा हाल वर्तमान में है, वैसा शायद ही कभी रहा हो ! आज अधिकांश लोग किसी के भी नाम, दाम या व्यक्तित्व के मायाजाल में फंस कर उसके मुरीद बन जाते हैं ! उन्हें सामने वाले की मानसिकता, उसकी नैतिकता, उसके चरित्र से कोई मतलब नहीं होता, उनके लिए अपने आदर्श के मुख से निकली बात ही ब्रह्म-वाक्य होती है !  ये लोग उसके विरुद्ध कोई सच्ची बात भी सुनना भी गवारा नहीं करते ! इतना ही नहीं अपने अगड़े का प्रतिद्वंद्वी उन्हें दुश्मन सरीखा नजर आने लगता है। यह बात आज चहूं ओर नजर आ रही है !   

पराकाष्ठा 
"निज प्रशस्ति, केहि लाग न नीका !" इसीलिए ऐसे चाटुकारों की वजह से सामने वाला भी अपने को कुछ का कुछ समझ, एक अलग ही जगत में विचरने लगता है ! अपने चेले-चपाटियों के मनगढ़ंत, मिथ्या आख्यानों को ही सच मान बैठता है ! झूठ के कोहरे में सच उससे कोसों दूर हो जाता है ! उसे अपने  सिवा सब हेय  नजर आने लगते हैं ! हालांकी अंततोगत्वा यही उसके पतन का कारण भी बनता है ! 

परजीवी 

आज के प्रसंग से कुछ-कुछ मेल खाता हुआ अपने ब्लॉगिंग से संबंधित एक प्रसंग याद आ गया ! बहुत समय पहले मैंने एक मित्र द्वारा भेजी गई एक सुंदर रचना को अपने ब्लॉग पर भी डाल दिया था ! दूसरे ही दिन उस पर अमिताभ जी के एक प्रशंसक ने टिप्पणी कर आपत्ति जाहिर कर दी थी कि वह रचना अमित जी की है, उसे आपने कैसे ले लिया ?  मैं भी असमंजस में पड़ गया कि ऐसी गलती कैसे हो गई ! हालांकि लेखक का नाम ज्ञात ना होने की वजह से मैंने अंतर्जाल का आभार प्रगट किया भी था !

ब्लॉगिंग 

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन मैंने जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर गया तो वहां उस रचना को भी विचरते पाया, असमंजस और गहरा गया ! पर तभी मेरी नजर उस रचना के प्रकाशित होने की तारीख पर पड़ी, जो मेरे ब्लॉग के दूसरे यानी अगले दिन की थी ! मन से बोझ सा उतर गया ! लौट कर अमित जी के उस प्रशंसक की टिपण्णी पर टिप्पणी की कि "महोदय वह रचना मेरी नहीं थी, मैंने इस बात को इंगित भी किया है ! पर वह अमित जी की भी नहीं थी, उन्होंने भी उसे मेरे ब्लॉग पर छपने के बाद दूसरे दिन संकलित ही  किया है ! तो किसने किस की............?

यहां जरा प्रसंगवश मुख्य विषय से भटकना हो गया है ! इसलिए बताता चलूं कि अमित जी का मैं भी प्रशंसक रहा हूँ ! उनकी विद्वता, उनकी हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अद्भुत पकड़, उनकी विनम्रता जैसी खासियतें उनमें तथा अन्य अभिनेताओं में फर्क दर्शाती हैं ! इस प्रसंग से उपरोक्त विषय का भी कोई खास संबंध नहीं है, उनको तो ऐसी बातों का आभास भी नहीं होगा ! पर उनके दीवाने फैन, मुरीद कुछ-कुछ ऊपर वालों जैसे ही हैं, जिन्हें लगता है कि बॉस ने जो लिख दिया, वहीं से लिखाई शुरू होती है 😇😀

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

महाबलीपुरम का शोर मंदिर, यह कैसा नाम

आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए आने-जाने वाले समुद्री व्यापारियों और नाविकों की सहूलियत व सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था..............1

#हिन्दी_ब्लॉगिंग     

कभी-कभी किसी जगह, वस्तु या इंसान के वास्तविक नाम के बदले उसका किन्हीं कारणों से परिवर्तित नाम इतना मशहूर हो जाता है कि असली नाम किसी को याद ही नहीं रहता ! ऐसा ही एक नाम है, शोर मंदिर, जो दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन निर्माणों में से एक, तमिलनाडु के चेन्नई शहर से करीब पचपन कि.मी. दूर महाबलीपुरम के सागर तट पर स्थित है। इसका निर्माण पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने आठवीं शताब्दी में करवाया था ! ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर भारत के गौरवशाली इतिहास, वास्तुकला और इंजीनियरिंग की जीवंत मिसाल है। 

तट मंदिर 
रथ मंदिर 
इसे महाबलीपुरम के रथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है ! समुद्र की लहरों की पृष्ठभूमि में बना यह मंदिर अध्यात्म और पर्यटन का अनोखा संगम है। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा व अद्भुत दृश्य पेश करती हैं। इस परिसर में तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु जी का मंदिर है, जिसके दोनों तरफ शिव मंदिर हैं। समुद्र की तरफ का मुख्य द्वार पूर्व की ओर खुलता है। सुबह की पहली सूर्यकिरण जब मंदिर के शिवलिंग पर पड़ती है, तो वह नजारा अलौकिक होता है। 

सागर का शोर 
अब इस मंदिर के नाम की बात ! मंदिर का ''शोर'' नाम पर्यटकों को कुछ असमंजस में डाल देता है, क्योंकि सुनने वाले को शोर का मतलब कोलाहल या शोरगुल समझ में आता है, पर यह शोर (SHORE) अंग्रेजी का शब्द है, जो इसके समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण पड़ा है, जिससे इसे तट मंदिर भी कहा जाता है ! पर सवाल यह उठता है कि आठवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम शोर कैसे हो गया ? जबकि अंग्रेज तो 17 वीं शताब्दी में भारत आए थे ! तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि समय, परिस्थितियों और समुद्र के अविराम शोर के चलते ऐसा हुआ होगा !

राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय
इ तिहास खंगालने पर पता चलता है कि आठवीं शताब्दी में भारत से व्यापार के लिए समुद्री व्यापारियों और नाविकों का आना-जाना लगा रहता था, तब उनकी सहूलियत और सुरक्षा के साथ-साथ देश तथा पल्लव वंश की वास्तुकला व कलात्मक वैभव को दर्शाने के लिए नरसिंहवर्मन द्वितीय ने, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, इस मंदिर का निर्माण सागर तट पर एक मार्गदर्शक के रूप में करवाया था ! इसके विष्णु मंदिर में भगवान विष्णु शयन मुद्रा में हैं, इसलिए इस मंदिर का नाम भी जलशयन मंदिर रखा गया था ! इसके अलावा शिवजी के मंदिरों को क्षत्रियसंहपल्लवेश्वर व राजसिंहपल्लवेश्वर के नाम से जाना जाता है, जिनमें उनके प्रतीक रूप में शिव लिंग स्थापित हैं। 

दर्शनीय 
ऐसी मान्यता भी है कि पहले यहां सात विशाल मंदिर हुआ करते थे, जिनमें से 6 मंदिर समय के साथ समुद्र में समा गए और आज केवल यह शोर मंदिर ही शेष बचा है। प्राचीन समय में विदेशी समुद्री यात्रियों और नाविकों को यह मंदिर समुद्र से बहुत दूर से ही दिखाई दे जाता था। इसी वजह से इसे प्राचीन काल में "Seven Pagodas" (सात पैगोडा) के नाम से भी जाना जाता था। 

अद्भुत 
यह 27 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा मंदिर विभिन्न मूर्तियों, पौराणिक कथाओं के दृश्यों से सजी एक विशाल दीवार से घिरा हुआ है। दीवारों, स्तंभों और चौखटों पर बेहतरीन सूक्ष्म नक्काशी पल्लव राजवंश के कलात्मक कौशल को प्रदर्शित करती है। यहीं पर एक मछली के आकार की विशाल शिला खंड पर ईश्वर, मानव, पशुओं, पक्षियों की विभिन्न आकृतियों को भी उकेरा गया है ! यह मंदिर सिर्फ महाबलिपुरम या तमिलनाडु का नहीं बल्कि देश के गौरव का प्रतीक माना जाता है।

अवशेष 
मूल रूप से शोर मंदिर एक बड़े मंदिर परिसर का हिस्सा है, जो समुद्र से डूबा हुआ है ! बाहर केवल यह मंदिर ही खड़ा है ! पुरातत्व विभाग इसकी खोज-खबर ले रहा है ! यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में सम्मानित इस प्रमुख पर्यटक स्थल तक देश के किसी भी भाग से रेल या वायु-मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार  

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