अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम दर्ज हैं, जो उम्र में भले ही छोटे थे, लेकिन उनके हौसलों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी ! ऐसे किशोर और युवा, जिन्होंने अपने लहू से वतन की मिटटी को सींचा, बिना जुल्म-ओ-अत्याचार की परवाह किए -
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| बाजी राउत |
*खुदी राम बोस, युवा क्रान्तिकारी, 18 साल की उम्र में फांसी दे दी गई !
*करतार सिंह सराभा - 19 साल की उम्र में फांसी।
*प्रफुल्ल चंद्र चाकी - उम्र 19 साल। पर अंग्रेजी हुकूमत उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी !
*भगत सिंह, * सुख देव, *शिवराम राजगुरु - इन्हें कौन नहीं जानता, जिन्हें सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था !
*चंद्र शेखर आजाद ! जिन्हें सपने में भी देख कर अंग्रेजों को पसीना आ जाता था ! धोखे से घेरा गया, पर कोई जिंदा नहीं पकड़ पाया ! जब देश को प्राण अर्पण किए तो उम्र थी महज 24 साल !
*मदन लाल ढींगरा - 25 साल, अंग्रेजों पर गोली चलाने के लिए फांसी !
*राजेंद्र लाहिरी - 26 साल, काकोरी केस में फांसी।
*अशफाक उल्ला खां - 27 साल, काकोरी केस में फांसी।
*पंडित राम प्रसाद बिस्मिल - 30 वर्ष, मैनपुरी और काकोरी केस में फांसी
*चेत राम जाटव - 30 साल। अंग्रेजों की खिलाफत के कारण गोली मार दी गई !
*मंगल पांडे - 30 साल की उम्र में फांसी।
*जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, युवावस्था में एक बाघ से भिड़ कर मार डालने के कारण नाम पड़ा. ''बाघा जतिन'', 35 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए ! कनक लता बरुआ 15 साल, बादल गुप्ता 18 वर्ष, हेमू कालाणी 19 साल, अनंत लक्ष्मण 19 साल, प्रफ्फुल चाकी 19 साल, बसंत कुमार विश्वास 20 साल, कन्हाई लाल दत्त 20 वर्ष.........कितने गिनाएं, कहां तक गिनाएं, स्याही खत्म हो जाएगी, कागज कम पड़ जाएंगे !
अपने ऐसे शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! जिनको क्रांति का सही अर्थ ही मालूम ना हो ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा !
क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! जो अवाम और देश के हित में हो ! ऐसी स्थिति के लिए मुख्य कारण जनमानस में अंसतोष का होना होता है, जो समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न हुआ हो ! परंतु ऐसा बदलाव या परिवर्तन लाने के लिए ठोस कारण का होना बेहद जरुरी है ! इसके साथ ही दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना का होना भी बहुत जरुरी है।
@वंदे मातरम ! राष्ट्र प्रथम
@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

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