सोमवार, 16 मई 2022

मेरे पास एक आइडिया है

आयडिया आते हैं और गायब हो जाते हैं ! एक ही  पल में उन को पहचानने, समझने और प्रयोग में ले आने की जरुरत होती है ! ये एक तरह से इलेक्ट्रॉनिक संचार प्रणाली की तरह हैं, जो हमारे चारों ओर लगातार घूमते-विचरते तो रहते हैं पर क्लिक तभी करते हैं जब टीवी ऑन किया जाता है ! पर फर्क यह है कि टीवी सिग्नल कोई भी मॉनिटर ऑन कर पकड़ सकता है पर आइडिया को लपकने के लिए जुनून होना जरुरी है ! उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, हर समय उसकी आहट पर कान लगे होने चाहिए ! कहते हैं ना कि पता  नहीं ईश्वर किस  रूप में दर्शन दे  दें ! उसी तरह विचार भी अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े किसी भी रूप में कभी भी कौंध सकते हैं............!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मेरे पास एक आइडिया है !"

टीवी सीरियलों में, फिल्मों में या रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर यह जुमला सुनाई पड़ जाता है ! क्या होता है यह आयडिया या विचार ! जो कभी-कभी जिंदगी तक बदल देता है ! जिसकी जरुरत बड़े-बड़े साइंसदा, उद्यमी, नेताओं, कारोबारियों से लेकर आम इंसान या कहिए बच्चों-छात्रों तक को रहती है ! यह कहाँ से आता है ! कब आता है ! कैसे आता है ! सोचा जाए तो इसको ले कर ढेरों प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं ! 

ऐसी मान्यता है कि हर इंसान की जिंदगी में एक ना एक बार सौभाग्य जरूर दस्तक देता है ! उस क्षण को को पकड़ने और पहचानने की लियाकत होनी चाहिए ! वही हालत विचारों की भी है, ये भी आते हैं और उसी समय  गायब भी हो जाते हैं ! बस एक ही पल में उस को पहचानने, समझने और प्रयोग में ले आने की जरुरत होती है ! ये एक तरह से इलेक्ट्रॉनिक संचार प्रणाली की तरह होते हैं, जो हमारे चारों ओर लगातार घूमते-विचरते तो रहते हैं पर क्लिक तभी करते हैं जब टीवी ऑन किया जाता है ! जिस तरह किसी खास प्रोग्राम को उसके समय पर ही देखा जा सकता है वैसे ही विचारों को भी उचित समय पर लपकना पड़ता है ! पर इतना फर्क भी है कि टीवी सिग्नल कोई भी पकड़ सकता है पर आइडिया को लपकने के लिए जुनून होना जरुरी है ! उसको लपकने के लिए सदा तैयार होना चाहिए ! उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, हर समय उसकी आहट पर कान लगे होने चाहिए ! कहते हैं ना कि पता नहीं ईश्वर किस रूप में दर्शन दे दें ! उसी तरह विचार भी अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े किसी भी रूप में कौंध सकता है ! 


दुनिया के इतिहास में दसियों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जब सही समय में सही विचार को सही समय पर लपक, सही दिशा में उसका उपयोग कर दुनिया को चमत्कृत कर रख दिया गया हो ! इसमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय और उल्लेखित न्यूटन और सेव, आर्कमिडीज की नग्नावस्था में दौड़, इलियास होवे का स्वप्न में खुद को नोक पर बने छिद्र वाले भालों से कौंचा जाना, विल्हेल्म कोनराड द्वारा X-ray की पहचान, बेंजामिन फ्रैंकलिन का आकाशीय बिजली का प्रयोग हैं ! इनके पहले भी सेव-आम-अमरूद पेड़ों से गिरते ही रहते थे ! बिजली चमकती ही रहती थी ! पानी भरे बर्तन में किसी चीज के गिरने से पानी उसके लिए जगह बना उसे हल्का महसूस करवाता ही था ! इन विचारों को ही उपयोग में ला, हमारे ऋषि-मुनियों-आचार्यों ने अध्ययन के सरलीकरण की विविध विधियां ईजाद की हुई थीं। अपने विचारों को ही उपदेश बना उन्होंने मानव को सुखी-स्वस्थ-प्रसन्न रहने का मार्ग प्रशस्त किया था !

                                
कहावत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है, पर आविष्कार को जन्म देने के लिए विचारों की कोख की जरुरत पड़ती है ! बड़े-बड़े आविष्कारों को जाने दें, विचारों के कौंधने से सैंकड़ों ऐसी खोजें हुई है जिन्होंने हमारे कई दुष्कर कार्यों को सरल बना दिया है ! आप सोचिए यदि जूते के तस्मों के सिरे पर लगे एग्लेट न होते तो जूतों में फीता डालने में कितना समय व्यर्थ जाता ! वर्षों पहले हार्वे केनेडी मोमबत्ती की रौशनी में अपने जूतों में लेस डालने की कोशिश कर रहा था, अचानक उसके फीते के सिरे पर पिघला मोम गिर कर जम गया, बिखरे फीते के कडा होते ही उसे जूते में पिरोना आसान हो गया ! इसे देख हार्वे के दिमाग में आए आयडिया ने करोड़ों लोगों का बहुमूल्य समय बचाने में मदद की ! 

         
बहुत पीछे ना जाएं ! अभी कुछ ही वर्षों में ऐसी सैंकड़ों ईजादें हुई हैं जिन्होंने समाज का रहन-सहन-चलन बदल डाला है ! फिर चाहे वह यू ट्यूब हो, फेस बुक हो, ट्विटर हो ! अमेजन हो ! घर पहुँच सेवाएं हों, चाय-कॉफी के स्टालों की चेन हो, फलों-सब्जियों, रोजमर्रा में काम आने वाली चीजों की पैंकिग हो, विज्ञापनों को लुभावना बनाना हो, मेडिकल हेल्प हो, कहाँ तक गिनाएं ! सब कुछ किसी ना किसी आयडिया के क्लिक हो किसी के दिमाग की बत्ती जलने का ही परिणाम है ! आज जो नए-नए स्टार्ट-अप रोज चलन में आ रहे हैं यह सब नए-नए विचारों का ही तो खेल है !

                                          

हमारी हर अड़चन नए आयडिया की जननी होती है ! पर ऐसा भी नहीं है कि आपने सोचा और आयडिया आ गया ! कभी तो दिनों-हफ़्तों तक कुछ नहीं सूझता और कभी पल भर में दिमाग की बत्ती जल जाती है ! पर कोशिश सदा सकारात्मक सोच की होनी चाहिए ! अपनी अड़चन को दूर करने का ख्याल सदा बना रहना चाहिए ! हमारा अवचेतन भी समस्या का हल ढूंढने में हमारी सहायता करता है ! ठीक उसी तरह जैसे आप सुबह निश्चित समय पर उठने का याद कर सोते हैं और बिना किसी बाहरी सहायता के आपकी नींद ठीक उसी समय खुल जाती है ! इसी तरह कभी-कभी अवचेतन से हमें अपनी अड़चनों का हल भी मिल जाता है ! वैसे कभी-कभी विफल विचार में से भी नया विचार उभर आता है ! 

                                           

अधिकतर यह कहा-सुना जाता है कि शरीर को स्वस्थ रखने, तनाव-मुक्त रहने, चिंताओं से निजात पाने या ध्यान इत्यादि के लिए दिलो-दिमाग का विचार शून्य होना जरुरी है ! पर इसके साथ ही दुनिया को चलायमान बनाए रखने, सुविधायुक्त बनाने, रोजमर्रा की अड़चनों से छुटकारा पाने के लिए सकारात्मक व सृजनात्मक विचारों का प्रवाह भी उतना ही जरुरी है ! अब यह हम पर है कि हम कैसे सही ताल-मेल बिठा कर अपना, समाज का और देश का भला कर पाते हैं ! 

मंगलवार, 10 मई 2022

नाम भले ही आम हो, बात हर खास है

दुनिया में सबसे मंहगा बिकने वाला, जापान के मियाजाकी स्थान पर उगाया जाने वाला, इसी नाम से प्रसिद्ध मियाजाकी आम है ! यह अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में दो लाख सत्तर हजार रूपए किलो तक बिका है। आमों की किस्मों का रंग हरा-पीला या हल्का गुलाबी लाल होता है पर मियाजाकी का रंग गहरा लाल या बैंगनी होता है। इसका आकार डायनासॉर के अण्डों की तरह होता है।सुना गया है कि मध्य प्रदेश के एक दंपत्ति ने इस किस्म को उगाया है ! इसे चोरी से बचाने के लिए उन्होंने सात शिकारी कुत्तों के साथ चार गार्ड का पहरा अपने बागीचे में लगाया हुआ है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

यूं तो गर्मियां ज्यातातर परेशान ही करती हैं। पर ढेर सारी परेशानियों के बावजूद कई मायनों में अहम, यह ऋतु अपने साथ एक अनोखा तोहफा भी ले कर आती है ! जिसका सिला तो किसी भी तरह नहीं दिया जा सकता ! वह बेमिसाल उपहार है फलों के राजा आम के रूप में ! जो ग्रीष्म ऋतु में ही, आ कर दिल ओ दिमाग को तृप्ति प्रदान करता है। अपने देश के इस राष्ट्रीय फल की अनगिनत विशेषताएं हैं ! आम होते हुए भी यह स्वादिष्ट और पौष्टिकता से भरपूर फल इतना खास है कि प्रकृति की इस नियामत को शायद ही कोई इंसान नापसंद करता हो ! यह अकेला फल है जो आम और खास हर तरह के लोगों को समान रूप से प्रिय है !  बेर से कुछ बड़े, गमले में भी लग जाने वाली, आम्रपाली से लेकर साढ़े तीन किलो वजन की नूरजहां जैसी किस्मों तक फैले इस अनोखे फल की बात  ही कुछ अलग सी और निराली है !

हथेली पर आम्रपाली 
आम आम्रपाली 
नूरजहां 
आम नूरजहां 

आम दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में से एक है। यह न सिर्फ एक फल है बल्कि कई देशों की संस्कृति और इतिहास का हिस्सा है। सैंकड़ों प्रजातियों के साथ दुनिया में बहुतायद में उगाई जाने वाली एक फसल। भारत में आम पहली बार 5 हजार साल पहले उगाए गए थे। माना जाता है कि उसका मूल म्यामांर, बांग्लादेश (आज के) और उत्तर पूर्वी भारत के बीच है। दुनिया भर में तकरीबन 500 प्रकार के आम पाए जाते हैं। उनकी प्रजातियां अलग हैं। जापानी मियाजाकी दुनिया के सबसे महंगे आमों में से एक है। बांग्लादेश ने आम के पेड़ को 2019 में अपना राष्ट्रीय पेड़ घोषित किया है। अपनी सुगंध, मिठास, स्वाद तथा अपने दैवीय रस के कारण खास मुकाम हासिल करने वाला आम भारत में फलों का राजा कहलाता है। क्या बच्चा क्या बूढ़ा, क्या युवक क्या जवान, शायद ही कोई ऐसा हो जो इसे पसंद न करता हो। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक उपजने वाले इस तोहफे के तरह-तरह के नाम हैं, हापुस, अल्फांसो, चौसा, सिंदूरी, हिमसागर, सफेदा, गुलाबखास, दशहरी, लंगड़ा, केसर, बादामी, तोतापरी, बैगनपल्ली, नूरजहां, मुलगोबा, इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि ! प्रत्येक की अपनी सुगंध, अपना स्वाद ! किसी से किसी की कोई तुलना नहीं ! हर एक अपने आप में लाजवाब, बेमिसाल, अतुलनीय !   

लंगड़ा आम 
अलफांसो या हापुस 

गुलाबखास या सिंधूरी 

हिमसागर 
आम के फल के अलावा उसका पेड़ भी अत्यंत उपयोगी होता है ! यह दीर्घजीवी, सघन तथा एक विशाल वृक्ष होता है। जो भारत में दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में हिमालय की तराई तक (3,000 फुट की ऊँचाई तक) तथा पश्चिम में पंजाब से पूर्व में आसाम तक आसानी से पाया जाता है। अनुकूल वातावरण और परिस्थितियों में यह औसतन 50 से 60 फिट की ऊंचाई तक का पादप है ! पर कोई-कोई वृक्ष 90  फिट तक की ऊंचाई तक भी पहुँच जाता है। इसकी सघनता पशु-पक्षियों को बहुत रास आती है। हमारी संस्कृति, परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों, दैनिक दिनचर्याओं में इसका हर अंग सदियों से रचा-बसा है ! हमारे वेद-पुराणों ने भी इसे बेहद पवित्र व उपयोगी माना है ! 



 
इसकी लोकप्रियता का इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि इस आम के लिए साल में खास दिन मुकर्रर किए गए हैं ! जी हाँ ! 22 जुलाई से दो दिवसीय मैंगो उत्सव का आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में हर साल किया जाता है ! इस दिन देश के 50 चुनिंदा आम के उत्पादक किसानों को उत्सव में आमंत्रित किया जाता है, जो अपनी 550 से भी ज्यादा किस्मों को आम के प्रेमियों की खातिर पेश करते हैं। जो लोग सोचते हैं कि आम की दस-पंद्रह किस्में होती होंगी, उनकी आँखें इतने तरह के आमों को देख खुली की खुली रह जाती हैं। हालांकि राष्ट्रीय आम दिवस का इतिहास और उत्पत्ति अज्ञात है ! पर भारत की लोक कथाओं और धार्मिक समारोहों से इसका अटूट संबंध है। आम के बाग को बुद्ध को तोहफे में देने का ब्यौरा मिलता है ! आम के फूलों को मंजरी कहा जाता है, संस्कृत के इस शब्द का अर्थ छोटे गुच्छों में उगने वाले फूल होता है। इससे भी इस फल की भारतीय जड़ों का संकेत मिलता है। वैसे भी गर्मियों में उपजने वाले इस फल का विवरण हमारे ग्रंथों में 5000 साल पहले तक के समय में उपलब्ध है।  





दुनिया में सबसे मंहगा बिकने वाला, जापान के मियाजाकी स्थान पर उगाया जाने वाला, इसी नाम से प्रसिद्ध मियाजाकी आम है ! यह अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में दो लाख सत्तर हजार रूपए किलो तक बिका है। आमों की किस्मों का रंग हरा-पीला या हल्का गुलाबी लाल होता है पर मियाजाकी का रंग गहरा लाल या बैंगनी होता है। इसका आकार डायनासॉर के अण्डों की तरह होता है। सुना गया है कि मध्य प्रदेश के एक दंपत्ति ने इस किस्म को उगाया है ! इसे चोरी से बचाने के लिए उन्होंने सात शिकारी कुत्तों के साथ चार गार्ड का पहरा अपने बागीचे में लगाया हुआ है। भारत का सबसे मंहगे आम का श्रेय कोहितूर नाम की किस्म को जाता है, जो सिर्फ बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में उगाई जाती है ! इसकी कीमत तकरीबन 1500/- प्रति नग यानी पीस है। अलफांसो अकेला आम है जो तौल कर और गिन कर भी बेचा जाता है ! लंगड़ा आम के बाद यह देश का सबसे मीठा आम भी है। इसको हापुस भी कहा जाता है।
सबसे मंहगा आम मियाजाकी 

 मियाजाकी 

भारत का सबसे मंहगा आम, कोहितूर 
दशहरी 
सफेदा 
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर भी आम की एक किस्‍म विकसित की गई है। आम की सबसे ज्‍यादा 300 किस्‍में उगाने वाले लखनऊ स्थित मलिहाबाद निवासी कलीमुल्‍ला साहब ने खुद 13 किस्में विकसित कर प्रत्येक का नाम किसी न किसी खास शख्सियत के नाम पर रखा है। इनमें से एक खास किस्म का नाम मोदी जी के नाम पर नमो रखा है ! इनकी किस्मों की सूची में सचिन, ऐश्वर्या, अनारकली, नयनतारा, अखिलेश जैसे लोग शामिल हैं। कलीमुल्‍ला अपने आमों को इन्हीं नामों से एक्‍सपोर्ट भी करते हैं ! वैसे भी भारत अपने आम की 1.90 करोड़ लाख टन की उपज और उसका निर्यात करने वाला दुनिया का सिरमौर देश है ! भारत दुनिया का 41 फीसदी आम का उत्पादन करता है. वहीं, 50 देशों को 5276.1 करोड़ टन आम एक्सपोर्ट करता है.इतनी भारी-भरकम उपज का सबसे ज्यादा उत्पादन उत्तर प्रदेश  है जो सकल उपज का तक़रीबन एक चौथाई भाग की हिस्सेदारी निभाता है !
आम, नमो 
नए हाईब्रीड आम 

कलीमुल्ला नर्सरी 
आम की नई प्रजाति 
अब ऐसा है कि भले ही इस सैकड़ों प्रजाति वाले आम का नाम आम हो पर इसकी कथा आम ना हो कर खास और अपरंपार है यानि आम अनंत, आम कथा अनंता ! जिसे एक साथ समेटना नामुमकिन ना सही पर मुश्किल जरूर है ! इसलिए अभी मौसम है, आम की बहार है, मौका है, दस्तूर भी है तो इस अनुपम, दिव्य फल के मधुर रस का लुत्फ उठाएं और प्रकृति को इस अनुपम उपहार के लिए धन्यवाद प्रेषित करें !     

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

लम्बी उम्र और हुस्न का हुक्का

भगवान ने आज तक ऐसी कोई महिला नहीं बनाई जो अपनी प्रशंसा सुन अभिभूत ना हो जाए ! आपको बस इसी कमजोरी कहें या खूबी का लाभ उठाना है ! इसके लिए आपको अपने दिल पर पत्थर रख अपनी पत्नी की रोज प्रशंसा करनी है ! यदि, ''चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो,'' यह गीत गा सकें तब तो आपकी खुशी घुटने मोड़ कर आपके घर बैठी रहेगी ! फिर ना रोटी जलेगी, ना दाल में नमक ज्यादा होगा, ना चाय फीकी रहेगी, ना नाश्ता बेस्वाद होगा ! घर का माहौल उत्सव भरा, बच्चे हंसते-खेलते-खिलखिलाते रहेंगे ! गमलों में फूल लहलहाते रहेंगे ! घर के दर ओ दीवार पर खुशी सदा नए पेंट की तरह चिपकी रहेगी......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कुछ दिनों पहले मुझे एक समारोह शिरकत करने का मौका मिला ! मैं जब वहाँ पहुंचा तो मंच पर एक दिव्य पुरुष की वाणी से उम्रदराज होने का नुस्खा अवतरित हो रहा था ! वक्ता, महानुभाव कुछ ज्यादा ही दिव्य होने की कोशिश में थे ! वे बाजार में उपलब्ध सारे उम्र बढ़ाऊ टोटकों का घालमेल कर बनाए गए नुस्खे पर अपने नाम का ठप्पा लगा, सामने लंबी उम्र की आकांक्षा में बैठे मूढ़ श्रोताओं के कानों में उड़ेले जा रहे थे ! लोग ऐसे भाव विभोर हो सुन रहे थे जैसे हॉल से निकलते ही उनकी उम्र तीस साल बढ़ जाएगी ! भाषण तो कुछ देर बाद खत्म हो गया पर उपकृत लोग अपनी तालियां रोके ना रोक पा रहे थे ! उनके बाद ही मुझे उवाचना था !   

इतने हो-हल्ले के बाद मुझे लग रहा था कि अब मुझे कौन सुनेगा या अब कोई सुनना चाहेगा भी या नहीं ! पर वह लेखक, कवि या नेता ही क्या जो मंच पर खड़े हो माइक संभालने का लोभ संवरण कर जाए ! वैसे भी उपस्थितों की कमजोर नस मेरे हाथ लग ही गई थी ! तो अपन भी जा खडे हुए मंच पर ! मेरा सबसे पहला उद्देश्य था पूर्ववर्ती वक्ता के प्रभाव से श्रोताओं को मुक्त कर अपने वाक्जाल में उलझाना !

मैंने बिना किसी लाग-लपेट-भूमिका के अपना प्रवचन शुरू कर श्रोताओं से कहा कि मेरे मंच पर आने के पहले जरा सी भी करतल ध्वनि नहीं हुई, पर मेरा चैलेंज है कि मेरे जाते समय आपकी तालियां रुकेंगी नहीं ! इतना सुनते ही सारा जमघट शांत हो मेरी ओर मुखातिब हो गया ! मेरी आधी जीत हो चुकी थी ! बस स्टेज लूटना बाकी था !

मैंने कहा कि मैं भी आज आपको लम्बी उम्र जीने का ही राज बताने जा रहा हूँ, पर इसमें कोई हींग या फिटकरी नहीं लगती, बस आपकी कार्य कुशलता और क्षमता की जरुरत पड़ेगी ! इतना सुनते ही लोग उत्सुक हो अपनी सीटों पर कुछ आगे खिसक आए ! माहौल  बन चुका था ! मैंने कहा मेरे नुस्खे का राज है खुश रहना ! खुश रहिए और लम्बा जीवन पाइए ! पर यहां एक पेंच है ! शादी-शुदा इंसान के लिए खुश रह पाना इतना आसान नहीं होता ! इसके लिए खुद के बजाए आपको अपनी श्रीमती जी को खुश रखना पडेगा ! जो कि हर पुरुष के लिए टेढ़ी खीर है ! पर यहीं मेरा उपाय काम आता है !  

ऐसी मान्यता है कि दुनिया में एक चेहरे जैसे कम से कम तीन लोग होते हैं ! पर यह निर्विवाद सत्य है कि करोड़ों बीवियों में कोई भी एक सी नहीं होती ! सबका अपना अलग ही स्वभाव होता है ! पर एक बात ऐसी भी है जो तमाम बीवियों में बिना अपवाद, निश्चित रूप से जरूर पाई जाती है और वह है प्रशंसा ! भगवान ने आज तक ऐसी कोई महिला नहीं बनाई जो अपनी प्रशंसा सुन अभिभूत ना हो जाए ! आपको बस इसी कमजोरी कहें या खूबी का लाभ उठाना है ! इसके लिए आपको अपने दिल पर पत्थर रख अपनी पत्नी की रोज प्रशंसा करनी है ! यदि, ''चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो,'' यह गीत गा सकें तब तो आपकी खुशी घुटने मोड़ कर आपके घर बैठी रहेगी ! फिर ना रोटी जलेगी, ना दाल में नमक ज्यादा होगा, ना चाय फीकी रहेगी, ना नाश्ता बेस्वाद होगा ! घर का माहौल उत्सव भरा, बच्चे हंसते-खेलते-खिलखिलाते रहेंगे ! गमलों में फूल लहलहाते रहेंगे ! घर की दीवारें सदा आपके स्वागत को आतुर मिलेंगी ! घर के दर ओ दीवार पर खुशी सदा नए पेंट की तरह चिपकी रहेगी ! 

पर आपको तो पता रहेगा कि चाँद चौदहवीं का नहीं दूज का है ! मन कचोटेगा रोज-रोज झूठ बोलने पर ! ग्लानि से सर झुका रहेगा ! अपनी ही नजरों में आप मुजरिम बन जाओगे ! पर साथ ही खुश भी रहना है, लम्बी उम्र भी पानी है और नकारात्मकता से भी छुटकारा पाना है ! मुख्य बात भी यही है ! तो इसका भी उपाय लेकर ही मैं आपके सामने आया हूँ ! इसके लिए आपको रोज सोने के पहले, अकेले में एक मंत्र पढ़ना है जो आपको आपकी सारी दुश्चिंताओं से मुक्ति भी दिला देगा और आप ''वीर भोग्या वसुंधरा'' बन जाओगे ! अमोघ मंत्र के तीन बार का जाप आपको हर दुविधा से छुटकारा दिला सुबह फिर चापलूसी के लिए तैयार करवा देगा !  

तुम्हारे हुस्न का हुक्का तो बुझ चुका है जानम,                          
वह तो हम ही हैं, जो गुड़गुड़ाए जाते हैं ! 

जाहिर है, मैं उस दिन अपना चैलेंज जीत चुका था ! तालियों की गड़गड़ाती हुई तड़तड़ाहट हॉल के बाहर तक गूँज रही थी ! मैं स्वर्गीय के.पी. सक्सेना जी को मन ही मन नमन कर, बाग-बाग होते दिल को संभालते, सर झुकाए अपने स्थान को ग्रहण करने बढ़ा जा रहा था !

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

राम वन गए, राम बन गए

वनगमन के बाद ही श्री राम की धीर, वीर, स्थिर व गंभीर छवि उभर कर आई ! इसमें जिन गुणों की प्रमुख भूमिका रही, वे थे, धैर्य और सहनशीलता ! माता-पिता के वचनों की रक्षा हेतु पल भर में राजमहल का सुख और तमाम वैभव त्यागने वाले वाले युवराज राम वन से लौटने पर ही मर्यादा पुरषोत्तम राम कहलाए ! आज वे सिर्फ किसी प्रदेश, देश के नहीं बल्कि पूरी दुनिया के आदर्श और गौरव हैं..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

राम भगवान विष्णु का अवतार थे ! विष्णु तो गुणों का भंडार हैं ! पर उनका यह अवतार मर्यादित था ! गुणों को खुद सिद्ध होते हुए उभरना था ! हालांकि वनवास की घटना बहुत दुःखदाई, कष्टदाई और संतापदाई है ! पर यदि राम वनगमन ना होता तो क्या राम मर्यादा पुरषोत्तम बन पाते ! क्या सारे गुण उभर कर जगत के सामने आ पाते ! क्या वे सिर्फ युवराज राम या राजा राम बन कर ही ना रह जाते ! पर वे तो नारायणावतार थे और अवतार सिर्फ राजा बनने के लिए ही नहीं लिया गया था ! सब कुछ पहले से सुनिश्चित था ! सारी पटकथा सारे तथ्यों को, परिणामों को, परिस्थितों को, अंजामों को देख-भाल कर, बहुत निपुणता के साथ, सारे नियम-कानूनों को ध्यान में रख, न्याय-अन्याय को संतुलित करने और लिए-दिए गए वचनों को पूरा करने हेतु रची गई थी ! जिसमें राम वनगमन प्रमुख व अति आवश्यक अध्याय था ! 

राम जैसा धीरोदात्त व्यक्तित्व फिर ना कभी हुआ और शायद ना कभी हो भी पाएगा ! आलेखानुसार उनका वनगमन तो होना ही था ! उसी के परिणाम स्वरूप ही तो देश-दुनिया-समाज को मातृ-पितृ भक्ति, आदर्श भाई, भाई-बंधुओं-आत्मीयों पर स्नेह, त्याग, धैर्य, प्रेम, समर्पण, वियोग, स्थिर स्वभाव, सहनशीलता, दयालुता, श्रेष्ठ चरित्र, प्रबंधन कुशलता, सत्य का साथ, न्याय, उच्च नेतृत्व क्षमता, शरणागत रक्षा जैसे और भी अनेक, अनगिनत गुणों का अप्रतिम व सर्वोत्तम उदाहरण मिल पाया  ! 

वनगमन के दौरान ही उन्होंने हर जाति, हर वर्ग के व्यक्तियों के साथ मित्रता की ! हर रिश्ते को दिल से पूरी आत्मीयता और ईमानदारी से निभाया ! केवट हो या सुग्रीव, निषादराज हो या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेल कर एक आदर्श संसार के सामने रखा ! इन सब के अलावा वर्षों पहले कहे गए कथन, वचन, वरदान, श्राप, सबका परिमार्जन भी किया जाना था ! कइयों को न्याय दिलवाना था ! कइयों को दंडित करना था ! देश-समाज में शान्ति स्थापित करनी थी ! इतना सब कुछ बिना वनगमन किए राजमहल में बैठ कर करना, अत्यधिक समय व रुकावटों का सबब बन सकता था !

वनगमन के बाद ही श्री राम की धीर, वीर, स्थिर व गंभीर छवि उभर कर आई ! इसमें जिन गुणों की प्रमुख भूमिका रही, वे थे, धैर्य और सहनशीलता ! माता-पिता के वचनों की रक्षा हेतु पल भर में राजमहल का सुख और तमाम वैभव त्यागने वाले वाले युवराज राम वन से लौटने पर ही मर्यादा पुरषोत्तम राम कहलाए ! आज वे सिर्फ किसी प्रदेश, देश के नहीं बल्कि पूरी दुनिया के आदर्श और गौरव हैं ! 

जय श्री राम !

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

कर्म पर भारी पड़ती, किस्मत

समर ने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी सो वही ले कर वह विदेश रवाना हो गया। गंतव्य पर पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो उन लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गए ! इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गए। पर उन लोगों के सामने एक धर्मसंकट आ खड़ा हुआ कि इतनी अच्छी चीज का मोल वे लोग किस कीमती वस्तु से चुकाएं....! उनके लिये सोने का कोई मोल तो था ही नहीं  ! तो क्या करें ? तभी वहां के मुखिया ने सब को सुझाया कि सोने से कीमती चीज तो अभी उनके पास कुछ दिनों पहले ही आई है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कहानी कुछ पुरानी जरूर है पर है बड़ी दिलचस्प। जो यह बताती है कि कर्म के साथ किस्मत का सांमजस्य होना कितना जरुरी  होता है ! बात उन दिनों की है जब आधुनिक संचार व्यवस्था का नाम भी लोगों ने नहीं सुना था ! लोग आने-जाने वालों, व्यापारियों, घुम्मकड़ों, सैलानियों से ही देश विदेश की खबरें, जानकारियां प्राप्त करते रहते थे। ऐसे ही अपने आस-पास के व्यापारियों की माली हालत अचानक सुधरते देख छोटी-मोटी खेती-बाड़ी करने वाले जमुना दास ने अपने पड़ोसी की मिन्नत चिरौरी कर उसकी खुशहाली का राज जान ही लिया। पड़ोसी ने बताया कि दूर देश के राज में बहुत खुशहाली है। वहां इतना सोना है कि लोग रोज जरूरत की मामूली से मामूली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी सोने का उपयोग करते हैं। वहां हर चीज सोने की है। सोना मिट्टी के मोल मिलता है !

ऐसी बातें सुन जमुना दास भी उस देश की जानकारी ले, वहां जाने को उद्यत हो गया। पर उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं। फिर भी इस बार उसकी प्याज की फसल ठीक-ठाक हुई थी ! भगवान् का नाम ले, उसी की बोरियां जहाज पर लदवा, वह अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया। उसकी तकदीर का चमत्कार कि वहां के लोगों को मसाले वगैरह की जानकारी बिलकुल नहीं थी ! प्याज को चखना तो दूर उन्होंने उसका नाम तक भी नहीं सुना था। जब जमुना दास ने उसका उपयोग बताया तो उसका स्वाद चख कर वे लोग खूशी से पागल हो गए ! पलक झपकते, मिनटों में ही जमुना दास का सारा का सारा प्याज खत्म हो गया। बदले में वहाँ के लोगों ने उसकी बोरियों को सोने से भर दिया। जमुना दास वापस अपने घर लौट आया। उसके तो वारे-न्यारे हो चुके थे। अब वह जमुना दास नहीं सेठ जमुना दास कहलाने लग गया था।
यहाँ देखें तो जमुना दास और समर ने अपनी तरफ से पुरजोर कर्म किए किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती ! विदेशियों ने भी अपनी और से बिना भेदभाव के भरपूर सहायता की, पर किस्मत
उसकी जिंदगी और हालात बदलते देख उसके पड़ोसी समर से भी नहीं रहा गया। एक दिन वह भी हाथ जोड़े जमुना दास के पास आया और एक ही यात्रा में मालामाल होने का राज पूछने लगा। उन दिनों लोगों के दिलों में आज की तरह द्वेष-भाव ने जगह नहीं बनाई थी। पड़ोसी, रिश्तेदारों की बढोत्तरी से, किसी की भलाई कर लोग खुश ही हुआ करते थे। जमुना दास ने भी समर को सारी बातें तथा हिदायतें विस्तार से बता-समझा दीं और उसे भी विदेश जाने को  प्रोत्साहित किया। पर यहां भी वही बात थी, समर की जमा-पूँजी भी उसकी खेती ही थी। संयोग से उसने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी, सो उसी को ले कर वह भी स्वर्ण देश को रवाना हो गया।

गंतव्य स्थल पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो वहाँ के लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गए ! इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गए ! उसका खूब मान-सम्मान हुआ ! पर उन लोगों के सामने एक धर्मसंकट आ खड़ा हुआ कि इतनी बेहतरीन, लाजवाब वस्तु का मोल वे किस वस्तु से चुकाएं.... ! उनके लिए सोने का कोई मोल नहीं था ! इतनी दिव्य और अच्छी चीज का मोल भी वे लोग किसी बेशकीमती चीज से चुकाना चाहते थे। वे लोग इसी पेशोपेश में थे कि करें तो क्या करें, जिससे इस व्यापारी के एहसान का बदला उचित रूप से चुकाया जा सके ! 

काफी सोच-विचार के बाद वहां के मुखिया को एक उपाय सूझा !  उसने सबको सुझाया कि हमारे पास सोने से भी कीमती चीज तो अभी कुछ दिनों पहले ही आई है। उसी को इस व्यापारी को दे देते हैं। क्योंकि इतनी स्वादिष्ट चीज के बदले किसी अनमोल वस्तु को दे कर ही इस व्यापारी का एहसान चुकाया जा सकता है। सभी को यह सलाह बहुत पसंद आई और उन्होंने समर के थैलों को प्याज से भर अपने आप को ऋण मुक्त कर लिया।  

अब यहाँ देखें तो जमुना दास और समर ने अपनी तरफ से पुरजोर कर्म किए किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती ! विदेशियों ने भी अपनी और से बिना भेदभाव के भरपूर सहायता की, पर किस्मत, किस पर, किस तरह मुस्कुराई............!!  
_
बेचारा समर !!

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

लाखों की फीस लगती है, चोरी की कला सीखने के लिए

यहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी-भरकम फीस लेकर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को खुद वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भारतीय गौरवशाली संस्कृति में किसी समय चोरी करना भी एक कला मानी जाती थी। सेंधबाज ऐसी-ऐसी कलाकारी से अपने काम को अंजाम देते थे कि लोग दांतो तले उंगलियां दबा लेते थे। उनका अंदाज, उनके काम करने का तरीका, उनको एक विशेष पहचान प्रदान करवा देता था ! पहुंचे हुए चोरों को अपने ऊपर इतना विश्वास होता था कि वे  भी चोरी करने के बाद अपनी कोई न कोई निशानी छोड़ जाते थे, एक चुनौत्ती की तरह कि लो खोज लो मुझे यदि हो सके तो ! एक तरह से ये उनके "ट्रेड मार्क" भी हुआ करते थे। जाहिर है इतनी निपुणता पाने के लिए कहीं न कहीं से शुरूआती प्रशिक्षण तो लेना ही पड़ता होगा, शुरू में कोई तो उन्हें प्रशिक्षित करता ही होगा ! जिसकी पूर्णता फिर उन्हें अपने अनुभव से प्राप्त होती होगी ! यह सब बीते दिनों की बातें हैं ! वैसे भी चोरी तो चोरी ही होती है ! इसीलिए इसे दुष्कर्मों में गिना जाने लगा और यह दंडात्मक कार्यों में शुमार हो गया !   

परंतु राज व समाज द्वारा लाख जुर्माना, सजा, हिकारत, बदनामी, घृणा मिलने के बावजूद भी इसका खात्मा नहीं किया जा सका ! यह आदत इंसान में बरकरार ही रही। इसीलिए लगता है कि प्राचीन समय में इसे मिलने वाला प्रशिक्षण व संरक्षण दबे-ढके रूप से विद्यमान रहता चला आया है ! इसका प्रमाण तब मिला जब मध्य प्रदेश के कड़िया, हुलखेड़ी और गुलखेड़ी जैसे गांवों का नाम सामने आया ! ये वे गांव हैं जहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी भरकम फीस ले कर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ! इसमें मुख्य पाठ्यक्रम शादी-ब्याहों  से कीमती सामान पार करने में प्रशिक्षित करता है ! जिसमें आठ-दस साल के बच्चों को प्रमुखता दी जाती है, जिससे यदि पुलिस पकड़ भी ले नाबालीगता का सहारा ले उन्हें छुड़वाने में आसानी रहती है ! काम को अंजाम देने के लिए दो-तीन लोग बड़ा सा उपहार का पैकेट और चार-पांच बच्चों को एक बड़ी सी गाडी में ले कर किसी शादी या भव्य समारोह में पहुँचते हैं ! वहाँ वे उपस्थित लोगों से घुल-मिल जाते हैं और बच्चे आपस में खेलने के बहाने उसी जगह का चक्कर लगाते रहते हैं जहां कीमती सामान रखा होता है और मौका पाते ही सामान को गाड़ी में पहुंचा दिया जाता है ! पकड़े जाने पर उन्हें रोने-धोने, तेजी से भागने, भीड़ की पिटाई से बचने आदि में भी ट्रेंड किया जाता है ! इसके अलावा इन गिरोहों की अपने वकीलों की टीम भी होती है !

इन गांवों में अधिकाँश परिवार जरायम पेशे से जुड़े रह कर देश भर में सक्रिय हैं ! इन गांवों में प्रवेश करना भी आफत को दावत देने के समान है ! बच्चों के अलावा इनके गिरोह में महिलाओं का भी जमावड़ा रहता है जिन्हें आसानी से जमानत मिल जाती है ! वही बच्चे जो पैसा दे कर ''हुनर'' सीखते हैं, जब निपुण हो जाते हैं तो गिरोह के सरगना उनके माँ-बाप को उनके काम के एवज में लाखों का भुगतान करते हैं ! जैसे इंजीनियरिंग या एम बी ए की डिग्री हासिल करने पर प्लेसमेंट होता है !  

इन सब बातों का खुलासा तब हुआ जब हाल ही में राजस्थान में हुई 10 लाख की चोरी के बाद मामले की जांच-पड़ताल की गई ! जहां एक पूर्व सैनिक के दस लाख रुपए चुरा लिए गए ! लेकिन सीसीटीवी फुटेज से मिले सुराग के आधार पर आरोपियों की पहचान हो गई। इसके बाद इनकी गिरफ्तारी भी हो गई। विचित्र है मानव उसकी प्रकृति और हमारा देश................!! 

आभार - श्री एन. रघुरामन जी 

शनिवार, 19 मार्च 2022

उजड़ता बागीचा और घड़ियाली चमड़े के जूते

वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गई ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है, जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ ये घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह एक जोरदार ठहाका लगा दिया............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत सुंदर बागीचा था। उसमें तरह-तरह के देसी-विदेशी पेड़-पौधे, लता-गुल्म, फूल-पत्तियां करीनेवार लगे हुए थे ! इसका कोई दूसरा उदाहरण देश में कहीं और नहीं था ! इसकी साज-संभार के लिए दसियों निपुण लोग तन-मन-धन से लगे रहते थे। दूर-दूर तक इस बागीचे की सुंदरता और रख-रखाव की ख्याति फैली हुई थी ! पता नहीं कहाँ-कहाँ से लोग इसे देखने के लिए आते थे ! उसकी साज-सज्जा, उसमें उत्पन्न विभिन्न किस्में, उनकी उपयोगिता बागीचे को सदा खास बनाए रखती थीं ! एक तरह से उसको देश की धरोहर माना जाने लगा था ! 
उसकी सुरक्षा और देखभाल के लिए वहाँ काम करने वालों में से ही एक माली को बागीचे के मध्य में एक कक्ष बना कर दे दिया गया था। समय बीतता गया, पुराने लोग एक के बाद एक दिवंगत होते चले गए ! जिसे पहरेदारी के लिए कक्ष दिया गया था, वह भी परलोक सिधार गया पर उसके कुनबे के लोगों ने वह जगह हथिया कर घर और बागीचे दोनों का स्वंय को मालिक और पर्याय घोषित कर दिया ! उनकी दबंगई, अहम, अदूरदर्शिता, अज्ञान देख कर्मठ और समर्पित लोग धीरे-धीरे अलग होते चले गए ! उनकी जगह नाकाबिल, चापलूस, चारण व मतलबपरस्त जैसों का जमावड़ा हो गया ! जो बागीचे का भला चाहते थे उनकी कोई पूछ नहीं थी !
काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई  ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया  
बागीचे की अब किसी को चिंता नहीं थी ! माली की वर्तमान पीढ़ी इस काम से पूरी तरह नावाकिफ व लापरवाह थी ! खुद तो क्या, वहाँ काम करने वालों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता था ! सिर्फ नाम और दाम की चाहत रह गई थी ! इसका फायदा उठा कुछ भ्रष्ट कर्मचारी लाभ कमाने और अपना घर भरने की ताक में रहने लगे ! कुछ कारिंदों ने तो बागीचे की जमीन के टुकड़े कर उन पर अपना हक जमा लिया ! ऐसे में जो होना था वही हुआ ! बिना उचित रख-रखाव के बागीचे का सौंदर्य नष्ट होने लगा ! बात फैली तो मालिक परिवार ने खुद को बचाते हुए सारी जिम्मेदारी अपने कारिंदों पर डाल दी ! बताया गया कि खाद-पानी ठीक नहीं मिल रहा पर कुछ ही दिनों में हालत सुधर जाएंगे ! बात आई गई हो गई ! कुछ दिनों बाद भी कुछ सुधार ना होता देख, फिर मीटिंग बुलाई गई, कुटिल कारिंदों ने समझा दिया कि औजार वगैरह पुराने हो गए हैं, नए आते ही सब ठीक हो जाएगा ! पर फिर भी सब जस का तस रहा ! समर्पित लोग इस दुर्दशा से परेशान सिर्फ हाथ मलते रह जाते थे ! पर किसी में हिम्मत नहीं थी कि कहे कि मुझे जिम्मेदारी दे दीजिए मैं सुधार ला दूंगा ! ऐसा इसलिए भी क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा कहते ही चरणसेवक व चापलूस यह भ्रम फैला देंगे कि कुछ लोग जिम्मेदारी पा जमीन हड़पना चाहते हैं और कान के कच्चे उनके आका इस बात का विश्वास भी कर लेंगे !  

समय बीतता गया ! बुहाई-चुहाई का मौसम फिर आ गया ! इस बार माली परिवार के एक सदस्य पूरे अहम, दिखावे और ठसक के साथ साज-संभार की जिम्मेदारी ले ली ! सबको बता दिया कि अब मैं ही मुखिया हूँ ! मेरे आते ही आमूलचूल परिवर्तन आ जाएगा ! पर इस भार को संभालने का कारण जमीन की बदहाली की चिंता से ज्यादा उसकी आड़ में अपनी वंश बेल का आधिपत्य बरकरार रखने का भी गुप्त इरादा ही था शायद ! जो भी हो, तन और धन से काम शुरू कर दिया गया ! प्रचार भी खूब किया गया कि इस बार की पैदावार अप्रतिम होगी ! जमीन उर्वरा होते ही सिर्फ स्थानीय लोगों को उसका उपयोग करने दिया जाएगा ! उसकी पैदावार लोगों को मुफ्त दी जाएगी, इत्यादि-इत्यादि ! पर काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया ! यूं ही नहीं कहा गया कि जिसका काज उसी को साजे और करे तो डंडा बाजे ! सो यहां भी डंडा ही बजता नजर आया......!

कहावत है कि कोई भी काम करते समय नियत भी नेक होनी चाहिए ! आप लोगों को धोखा दे सकते हो पर ईश्वर को नहीं ! और सबसे बड़ी बात, आप जो काम कर रहे हैं उस काम का पूरा इल्म होना चाहिए ! यहां भी यही हुआ ! जुताई-बुताई के दौरान ही एक भयंकर झंझावात आ गया ! अब इन लोगों की अज्ञानता और अदूरदर्शिता के कारण ऐसी परिस्थितियों से निबटने का कोई प्रबंध किया ही नहीं गया था ! लिहाजा बागीचे के दो-तीन पेड़ों को छोड़ बाकी सब कुछ नेस्तनाबूद हो गया ! बिना सोचे-समझे, बिना किसी जानकार के मार्गदर्शन के, बिना परिस्थितियों के आकलन के वही हुआ जो होना था ! सब मटियामेट हो कर रह गया ! 

पर अभी भी किसी ने माली परिवार को गलत नहीं ठहराया ! सारी असफलता का ठीकरा दूसरों के सर फुड़वा दिया गया ! खुद लुटिया डुबोने में अग्रणी रहे गपोड़शखों ने फिर नासमझ आकाओं को आश्वस्त कर दिया कि भविष्य में सब दुरुस्त हो जाएगा ! मालिकों ने भी इस पयाम के साथ बयानवीर सेवकों को गांव-कस्बों की चौपालों पर सैर-सपाटे के लिए भेज दिया ! जहां वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गयी ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ वह घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह जोरदार ठहाका लगा दिया !   

किसी को भी अपनी समझदानी पर ज्यादा जोर डालने की आवश्यकता नहीं है ! शीशे की तरह साफ है कि वे कौन लोग हैं जो अभी भी चाहते हैं कि बागीचे की जिम्मेदारी माली परिवार के पास ही रहे ! घड़ियाली जूते तो सभी को चाहिएं......... और अभी तो बागीचा ही उजड़ा है, जमीन तो बची हुई है ना !    

विशिष्ट पोस्ट

मेरे पास एक आइडिया है

आयडिया आते हैं और गायब हो जाते हैं ! एक ही  पल में उन को पहचानने, समझने और प्रयोग में ले आने की जरुरत होती है ! ये एक तरह से इलेक्ट्रॉनिक सं...