शुक्रवार, 22 मई 2026

हल्की आंच पर भुनते खोवे के धुएं ने कइयों के भूत उतार दिए

जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा, तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! कर्कशता की जगह जुबान में चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां-संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग   

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया ! 

ताड़ना भी जरुरी है 
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 
दिनचर्या 
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी ! 

आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम 
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बदजुबान वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! 
 

फिजा में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां, संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी, पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं होता.........!

@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 19 मई 2026

आजकल वो इस तरफ देखता है कम

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! पर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य  को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट बदस्तूर वैसे ही चली आ रही है ! मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! वैसे साख भी तो उन्हीं की दांव पर लगी है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए ! ऋतुएं बनाईं ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे ! कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 

सृष्टि रचना 

दे वलोक के झरोखे पे बैठ इन खिलौनों का वीडियो गेम खेला व देखा जाने लगा ! पर खेल कितना भी मनोरंजक हो, कितनी देर तक देखा जा सकता है ? सो अगला भी कुछ समय पश्चात इसे ''ऑटोपायलट मोड'' पर डाल फारिग हो गया ! इसमें उसके तो कुछ पल ही व्यतीत हुए पर पृथ्वी पर करोड़ों साल निकल गए, सदियां बीत गईं, युग बदलते चले गए ! शुरूआती समय तो अच्छा था, कृतियों को प्रभु ने मन लगा कर बनाया था, वे नेक, समझदार, विवेकी थीं ! पर प्रभु ने समय भी तो बनाया था, जो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी एक सा नहीं रहने देता !

मानवातरण 
वैसे नीचे जो भी टूट-फूट या किसी की एक्सपायरी हो, उसका रिप्लेसमेंट और सप्लाई ऊपर से बदस्तूर जारी तो है ! पर वस्तु की क्वालिटी में गिरावट का एहसास दिखने लगा है ! खासकर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट लगातार बढ़ती ही जा रही है ! यदि मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती होंगी, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! ध्यान तो उन्हें ही देना है ! साख तो उन्हीं की दांव पर लगी है !

धरा 
इसी लापरवाही का नतीजा है कि संसार में कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां शांति हो ! जहां लोग चैन से रहते हों ! जहां लोगों का जीवन दुश्वार ना हो गया हो ! जहां के रहवासियों के स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो ! जहां भाईचारा खत्म ना हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों ! जरा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो ! पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन ना समझते हों ! ऐसा ही रहा तो क्या ईश्वर की बेहतरीन कृति और सृष्टि ज्यादा समय तक बच पाएंगे ? 

तांडव, हर जगह 
अब तो प्रभु ही कुछ करें तो करें ! निर्माण के दौरान वहीं सुधार हो जाए ! कमियां वहीं दूर कर दी जाएं ! वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा पर ना किया जाए  ! कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए ! यदि ऐसा हो सके तो इन विकारों से उपजी व्याधियों, अराजकताओं, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए, जो बार-बार कभी प्रभू को, कभी जगत जननी माँ को, तो कभी विघ्नेश्वर को इस धरा पर आना पड़ता है, उस आने-जाने से बचने वाले समय का सदुपयोग वे अपनी ही कृतियों की भलाई में कर सकते है ! क्योंकि उनका मकसद और उद्देश्य भी तो अपने बच्चों को खुश रखने का है, ना कि उन्हें दंडित करने का........!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

रविवार, 17 मई 2026

एक मंदिर, मकड़ी, सांप और हाथी के नाम

मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी, जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! इस बात पर उन तीनों में रोज झगड़ा-विवाद भी होता था ! प्रभु तो आशुतोष हैं, उन्होंने इनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न हो तीनों को अपने लोक बुलवा लिया..........! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारे देश में हजारों-लाखों मंदिर, पूजा स्थान व धर्म-स्थल हैं ! उनकी भव्यता, उनकी संरचना, उनकी विलक्षणता विश्व प्रसिद्ध है ! इसके साथ ही उनके निर्माण और उनसे जुड़ी आस्था को लेकर कोई ना कोई कथा-कहानी भी जुड़ी हुई है। उनमें से कुछ कथा-कहानियां तो बहुत ही हैरतंगेज होती हैं ! ऐसी ही एक कथा जुड़ी हुई है आंध्रप्रदेश के एक कस्बे में स्थित अति प्राचीन श्रीकालहस्ती शिव मंदिर के साथ ! यहां श्री का मतलब है, मकड़ी ! काल शब्द सर्प के लिए प्रयुक्त हुआ है और हस्ती का अर्थ तो हाथी होता ही है !

श्रीकालहस्ति महादेव 

मंदिर का विहंगम दृश्य 
आं ध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में पेन्नार दरिया की एक सहायक शाखा स्वर्णामुखी नदी के किनारे एक छोटा सा कस्बा है, कालाहस्ती ! जिसका नामकरण वहां स्थित करीब 2000 साल पुराने, तीन विशाल गोपुरम और सौ स्तंभों वाले श्रीकालहस्ती महादेव मंदिर के नाम पर ही हुआ है ! ये तीर्थ नदी के तट से लेकर मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय पहाड़ी की तलहटी तक फैला हुआ है। इसे दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान कालहस्तीश्वर के संग देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी स्थापित हैं। देवी की मूर्ति परिसर में , मुख्य मंदिर के बाहर ही स्थापित है। 

गर्भगृह 
इस मंदिर के साथ जुडी हुई कथा हमारे उस विश्वास को स्थापित करती है जिसके अनुसार सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है यानी ईश्वरः सर्वभूतेषु ! इस स्थान का नाम तीन जीवों, श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प एवं हस्ती यानी हाथी के नाम पर किया गया है। इन तीनों ने यहां शिवजी की आराधना कर अपनी योनि से मुक्ति पाई थी ! मान्यताओं के अनुसार मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! उनमें रोज विवाद होता था ! फिर आपस में तय पाया गया कि पहले हाथी अभिषेक कर ले, उसके बाद सर्प अपनी मणियां अर्पित करे तदुपरांत शिव-लिंग पर मकड़ी अपना जाल बन दे तो सभी की आराधना हो सकेगी ! उनके भक्तिभाव को देख प्रभु ने तीनों को अपने लोक बुलवा लिया ! इसके अलावा भी कई कथाएं यहां के लिए प्रचलित हैं ! 
 
मकड़ी, सांप और हाथी की मूर्तियां 

पूजारत तीनों जीव 
यहां पर इन तीनों जीवों की मूर्तियां भी स्थापित है। श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार इस स्थान पर अर्जुन ने प्रभु कालहस्तीवर के दर्शन किए थे। इसके अलावा कणप्पा नामक एक आदिवासी ने यहां पर भगवान शिव को अपनी आंख अर्पित कर आराधना की थी। ये मंदिर राहुकाल पूजा के लिए भी विशेष रुप से जाना जाता है।
गोपुरम 
मं दिर के परिक्रमा पथ में कई शिवलिंग, भगवान पशुपति, गणेश, कार्तिकेय, चित्रगुप्त, यमराज, धर्मराज, चण्डिकेश्वर, नटराज, सूर्य, बाल सुब्रह्मण्य, लक्ष्मी-गणपति, बाल गणपति, कालभैरव तथा धनुर्धर अर्जुन की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर के आस-पास और भी बहुतेरे दर्शनीय स्थल मौजूद हैं ! 
स्तंभ 
यहां का नजदीकी हवाई अड्डा तिरुपति में है, जो यहाँ से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेल द्वारा चेन्नई-विजयवाड़ा लाइन पर स्थित गुंटूर या चेन्नई से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। आंध्र प्रदेश परिवहन की बस सेवा भी तिरुपति से इस स्थान के लिए उपलब्ध है। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है पर सितम्बर से मार्च तक का समय उपयुक्त है। 

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

रविवार, 10 मई 2026

मातृदिवस, दस मई को ही क्यों

माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई सहारा नहीं, माता के समान कोई रक्षक नहीं, माता के समान कोई शिक्षक नहीं और माता के ममत्व के समान कोई चीज नहीं है। उसके बारे में जितना भी कहा जाए कम है, उसका ऋण कभी भी नहीं चुकाया जा सकता ! ऐसा कहा गया है कि भगवान हर स्थान पर मदद करने नहीं पहुंच सकते, इसलिए उन्होंने माँ को बनाया। इसीलिए माँ  को भगवान का स्वरुप माना गया है 🙏🙏     

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

माँ ! जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम का कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी खुशी के एवज में भी बच्चों की खुशी ही मांगती है !

माँ ! जिसके बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया ! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है, तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह कर खुद को धन्य मानता है

ममत्व तो ईश्वर को भी चाहिए 
माँ ! उसको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई खास दिन निर्धारित किया गया है कि नहीं ! उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहती है ! खुशी में सबके साथ खुश और दुःख में  ढाढस दे आंसू पोछंती ! वह भगवान से भले ही नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए ! हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है !

ममता 
माँ ! जैसे विशाल, अद्वितीय, अप्रतिम, दैवीय व्यक्तित्व के लिए एक दिन का निर्धारण ! इस बात को लेकर कई बार हम भावुक और आक्रोशित भी हो जाते हैं ! पर मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाने के पीछे भी एक बेटी की अपनी माँ के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और सामाजिक सुधार की भावना काम कर रही थी ! उस बेटी का नाम है, एना मारिया जार्विस ! एना की मां का निधन 9 मई 1905 को हुआ था, जो उस वर्ष मई का दूसरा रविवार था, इसीलिए मई के दूसरे रविवार को ही ''मदर्स डे'' मनाने की परंपरा शुरू हुई !

एना जार्विस 
माँ ! ऐन रीव्स जार्विस अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया में रहते हुए समाज सेवा से जुड़ी हुई थीं। वह महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए लगातार काम करती रहती थीं। एक तरह से उन्होंने अपना जीवन खपा दिया था, जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों के लिए ! एना अपनी माँ से बहुत प्रभावित थीं और उनसे बेहद प्यार करते हुए अपना प्रेरणास्रोत मानती थी ! ऐसा कहा जाता है कि ऐन रीव्स की यह इच्छा थी कि माँओं के सम्मान में एक दिन मनाया जाना चाहिए। इसीलिए अपनी मां की इच्छा को पूरा करने के लिए एना ने एक अभियान चलाया, लोग जुड़ते गए और पहली बार 10 मई 1908 को मदर्स डे मनाया गया ! इसे आधिकारिक रूप देने के प्रयास चलते रहे और साल 1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से मदर्स डे घोषित कर दिया। इसके बाद मदर्स डे पूरी दुनिया में मशहूर होता चला गया। 

मातृदिवस का ऐतिहासिक चिन्ह 
माँ ! ऐन रीव्स जैसी माँओं के सम्मान के लिए निर्धारित दिन का बाजार के कारोबार का जरिया बनता देख खुद एना इस दिन के खिलाफ हो गईं थीं ! उन्होंने कई जगह विरोध प्रदर्शन भी किए और लोगों से अपील की कि मदर्स डे को केवल औपचारिक रूप या दिखावे के लिए ना मनाएं ! उनका मानना था कि माँओं को उपहार नहीं सिर्फ सच्चा प्यार और सम्मान चाहिए। बाद में मदर्स डे को खत्म करने तक की मुहिम शुरू कर दी थी ! 

ममत्व 
पर बाजार तो बाजार है, उसने हर पावन त्यौहार, समारोह, परंपरागत उत्सव सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और लेता जा रहा है............!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 8 मई 2026

मनुष्य एक आशंकित जीव है

हम सब धर्मपरायण लोग हैं ! आस्थावान हैं ! धर्म-भीरु भी हैं ! हम अपने-अपने तरीके से अपने इष्ट की आराधना करते हैं ! पर साथ ही साथ, कहीं ना कहीं मतलबी और स्वार्थी भी हैं ! इसके अलावा एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो अनिष्ट के डर से, किसी अनहोनी की आशंका से ही धर्म का पालन करते हैं ! यह बात दुनिया के सभी धर्मों-पंथों में समान रूप से पाई जाती है और बचपन से ही मन में बिठा दी जाती है कि यदि सर्वोच्च सत्ता की आराधना नहीं की तो अनिष्ट हो जाएगा.........................😞   

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म नुष्य एक मतलबपरस्त, स्वार्थी तथा आशंकित जीव है ! उसे हर समय कुछ पाने की लालसा के साथ-साथ किसी न किसी अनहोनी का डर भी लगा रहता है ! इसीलिए उसे एक संबल की तलाश रहती है। उसके पूजा, इबादत या उपासना करने का सबसे बड़ा कारण यही भावनाएं हैं ! पर जहां डर होता है वहां श्रद्धा नहीं होती ! इसीलिए वह विभिन्न धर्मस्थानों की शरण में जाता रहता है ! कुछ महान हस्तियों, दिव्य पुरुषों-महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो ऐसी भावनाएं कमोबेश संसार के सभी इंसानों में व्याप्त है !

आशंका 
नहोनी के डर के बाद धार्मिक होने का दूसरा बड़ा कारण है, अपनी विभिन्न कामनाओं की पूर्ति की चाह! हमें लगता है कि अगर हम ईश्वर की आराधना करेंगे तो वे खुश हो कर हमारी मनोकामनाएं पूरी कर देंगे ! यह सोच भी हर धर्म में मौजूद है। कोई मन्नत मांगता है, कोई चढ़ावा चढ़ाता है, कोई दान देता है, कोई विशेष कर्मकांड करता है। हम भूल जाते हैं कि प्रभु सर्वज्ञानी है, निष्पक्ष है, न्यायप्रिय है ! वे हमें हमारे कर्मों के अनुसार फल देंगे नाकि कर्मकांडों की वजह से ! हमारे लिए पूजा या इबादत एक सौदा या व्यापार बन जाते हैं कि हम ये करेंगे तो वो ये कर देगा ! इसी सौदेबाजी में जब हमारी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं तो हमारा विश्वास भी डगमगाने लगता है तो हमारी अस्थिरता और खुदगर्ज दिलोदिमाग कोई और ठीहा ढूँढ़ने लगते हैं !   

भय 
दमी के धार्मिक होने का एक और बड़ा कारण परिवार की परंपरा भी होती है ! परिवार जैसा करता चला आया है अगली पीढ़ियां भी उस पर सवाल ना उठा, उसी का अनुसरण करने लगती हैं ! इसी के साथ एक बात और भी है कि इंसान कुछ लोगों को किसी पंथ से लाभ होता देख या किसी स्थल विशेष की महत्ता को सुन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए उधर आकर्षित होता है, ऐसी अस्थिरता वह अपने जीवन में कई-कई बार दोहराता रहता है !

डर 
एक आम धारणा है कि यदि मैंने उपासना नहीं कि तो ईश्वर नाराज हो मुझे और मेरे परिवार को दंडित कर देंगे ! यह डर तो बचपन से इंसान के मन में बैठ जाता है, पर वह यह भूल जाता है कि प्रभु हम सबके पालनहार हैं, न्यायप्रिय हैं, दयालु हैं, बेवजह वे किसी को दंड नहीं देते ! हमारे कर्म ही हमारा भाग्य निर्धारित करते हैं ! पर अनहोनी का डर उसके दिलोदिमाग पर ताउम्र हावी रह उससे कुछ ना कुछ उल्टा-सीधा करवाता ही रहता है ! देखा जाए तो यह भी तो प्रभु की इच्छानुसार ही होता है...!


@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बिना राजधानी वाला दुनिया का इकलौता देश

नाउरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। कुछ जिलों में विभक्त इस कस्बे में संसद भवन, हवाई अड्डा, सरकारी कार्यालय और विदेशी दूतावास मौजूद हैं। इसीलिए इस कस्बे को इस देश का “डि फैक्टो कैपिटल” कहा जाता है। यह अनोखी व्यवस्था नाउरू के छोटे आकार, प्रशासनिक सुविधा और उसकी अपनी अलग पहचान को दर्शाती है...............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

रा जधानी किसी भी देश, प्रदेश या राज्य का प्रमुख शहर तथा राजनीतिक केंद्र होता है। यह विशेष दर्जा उसे उस देश के संविधान द्वारा प्रदत्त किया जाता है। यह एक ऐसा शहर होता है, जहां केंद्र सरकार के सारे दफ्तर होते हैं और जहां से सरकार चलती है, कानून बनते हैं, कानून और संविधान का निर्धारण किया जाता है और देश की दिशा तय होती है। आज दुनिया में करीब 195 देश हैं। हर देश की अपनी राजधानी है। लेकिन इसी दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जिसकी कोई राजधानी नहीं है, फिर भी वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है। उसका अपना संविधान है, अपना झंडा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी मौजूदगी भी है। इस देश का नाम है नाउरू (Nauru). 

नाउरू 
द्वीपीय देश 
कभी प्लीजेंट-आइलैंड के नाम से जाना जाने वाला नाउरू, दुनिया का अकेला ऐसा देश है जिसकी कोई आधिकारिक राजधानी नहीं है। यह द्वीपीय देश दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित है। जहां इसके 21 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में सिर्फ दस हजार की आबादी रहती है ! जो इसे दुनिया का क्षेत्रफल के हिसाब से तीसरा और आबादी के हिसाब से दूसरा सबसे छोटा स्वतंत्र गणराज्य बनाती है ! अपने छोटे से क्षेत्र के बावजूद यह किसी भी महाद्वीप से जुड़ा हुआ नहीं है।  इसका निकटतम पड़ोसी बनाबा द्वीप है जो इससे तकरीबन तीन सौ किमी दूर है ! 

प्राकृतिक सौंदर्य 

ना उरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। कुछ जिलों में विभक्त इस कस्बे में संसद भवन, हवाई अड्डा, सरकारी कार्यालय और विदेशी दूतावास मौजूद हैं। इसीलिए इस कस्बे को इस देश का “डि फैक्टो कैपिटल” कहा जाता है। यह अनोखी व्यवस्था नाउरू के छोटे आकार, प्रशासनिक सुविधा और उसकी अपनी अलग पहचान को दर्शाती है। 


हवाई पट्टी 

ना उरू की अर्थ व्यवस्था को संभालने वाले खनिज पदार्थ लगभग समाप्त हो चुके हैं। इस छोटे से देश में जहां सिर्फ दो घंटे में सारा क्षेत्र नाप लिया जा सकता है ! जहां खूबसूरत समुद्री तट और शांत वातावरण भी है ! पर घूमने के लिए ज्यादा जगहें ना होने के कारण यहां पर्यटन विकसित नहीं हो पाया है ! इसीलिए यहां के वाशिंदों की जीविका नारियल की उपज और समुद्री मछलियों के सहारे ही चलती है ! आर्थिक रूप से यह ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर है और उसका संरक्षण इसे प्राप्त है ! इसकी आधिकारिक मुद्रा भी आस्ट्रेलियाई डॉलर ही है। वैसे अपने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से यह बाकी दुनिया से भी जुड़ा हुआ है। 


संतुष्ट, खुशहाल जिंदगी  

छोटे-बड़े द्वीपों से मिलकर बने नाउरू की खासियत यह है कि अपनी बेहद छोटी आबादी के बावजूद इसने अपने प्रमुख खेल वेटलिफ्टिंग के जरिए ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ अपनी उपस्थिति ही दर्ज नहीं करवाई, बल्कि वहां पदक भी जीते हैं। जो यहां के नागरिकों के लिए गर्व का विषय है !


देश का गौरव 
नाउरू का अपनी राजधानी ना बनाने का सिर्फ एक ही कारण है, उसका छोटा आकार ! सिर्फ 21 वर्ग किलोमीटर की जमीन पर बसी हुई उसकी आबादी, बस्तियां और उनकी दूरियां एक-दूसरे में जैसे घुलमिल सी गई हैं। इसीलिए एक अलग राजधानी जैसा शहर बनाने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं की गई। वैसे यह देश इस बात का प्रमाण है कि किसी भी देश के नागरिकों की जिजीविषा ही देश को स्थाईत्व प्रदान करती है ! यदि वहां के लोगों का हौसला बुलंद हो, तो देश की आबादी या उसका क्षेत्रफल कोई मायने नहीं रखता ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

रविवार, 12 अप्रैल 2026

आशा ताई भी अलविदा कह गयीं 😢

भारतीय सिनेमा के संगीत के स्वर्ण काल का आखिरी रौशन चिराग, देश की सबसे पसंदीदा, लोकप्रिय, चहेती, पार्श्वगायिका आशा ताई ! कल ही उनके हृदयाघात की खबर आई थी ! आज वे देश के सभी संगीत प्रेमियों को गम में डूबा छोड़, अलविदा कह गयीं ! एक युग का अंत ! किसी भी दिवंगत के लिए सदा कहा जाता है कि प्रभु उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें, पर ऐसी विभूतियां जब परमपिता के पास वापस पहुंचती होंगी तो मेरा यह विश्वास है कि उनकी उपस्थिति से देवलोक को ही एक दैवीय शांति और उनकी उपस्थिति का सुखद एहसास होता होगा ! ........अश्रुपूरित श्रद्धांजलि  🙏🙏

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

भारतीय फिल्मों का यदि उनके संगीत के नजरिए से आकलन किया जाए तो 1950 से लेकर तकरीबन 1980 तक का समय स्वर्णिम काल रहा। एक से एक बढ़ कर दिग्गज संगीत निदेशक, लेखक, गायक कलाकार इस समय में हुए ! किसी की किसी से कोई तुलना नहीं ! सबकी अपनी-अपनी खासियत, सबका अपना-अपना अलग अंदाज, सबकी अपनी-अपनी विशेषता ! परंतु एक-दूसरे से अलग अंदाज रखते हुए भी एक-दूसरे के पूरक ! हर दिल अजीज ! खुली किताब ! उनके बारे में इतना सब जाना जाता है कि अलग से और कुछ भी कहने, लिखने, बताने के लिए कुछ भी नया नहीं है !

सदा याद रहेंगी 

पर क्या समय ने कभी किसी को बक्शा है ?  एक-एक कर सभी इस लोक में अपना कर्म पूरा कर विधाता के चरणों में जा विराजे ! आज आशा जी भी वहां अपनी बहनों, भाइयों, साथी कलाकारों के पास अपने निर्धारित स्थान पर जा विराजीं ! वे सब भले ही भौतिक शरीर के साथ हमारे बीच ना हों, पर उनकी कला की उपस्थिति, समय को भी मात देते हुए सदा-सदा के लिए हमारे बीच बनी रहेगी !

किसी भी दिवंगत के लिए सदा कहा जाता है कि प्रभु उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें, पर ऐसी विभूतियां जब परमपिता के पास वापस पहुंचती होंगी तो मेरा यह विश्वास है कि उनकी उपस्थिति से देवलोक को ही एक दैवीय शांति और उनकी उपस्थिति का सुखद एहसास होता होगा ! 

प्रभु भूलोक पर हृदयनाथ जी, उषा जी सहित उनके परिवार, उनके परिजनों को इस दुखद घड़ी को सहन करने हेतु संबल प्रदान करें !

ॐ शांति 🙏

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