pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं............??      

#हिंदी_ब्लॉगिंग 

क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! यदि ऐसा परिवर्तन समाज में लाना हो तो वह अवाम और देश के हित में होना चाहिए ! यह तभी संभव है जब जनमानस में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न कोई ठोस वजह हो और साथ ही उनमें दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना कूट-कूट कर भरी हो ! ऐसी पहल का मुख्य घटक सदा से समाज का युवा वर्ग ही रहा है ! पर इधर इतिहास भुला कर, कुछ स्वार्थी, मक्कार, सत्ता लोलूप तत्वों द्वारा अपने हित-साधन के लिए, विदेशों से आयातित शब्द ''जेन-जी'' से युवाओं को भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया गया है !

आदर्श 

जेन-जी ! वह पीढ़ी जो डिजिटल दुनिया में जन्मी और पली-बढ़ी है। इसकी सूचना प्राप्त करने की आदतें पिछली पीढ़ियों से अलग हैं। समाचार पत्र पढ़ने या लंबी बहस सुनने की बजाय यह छोटे वीडियो, मीम, रील और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्राप्त करती है। इस कारण यह नई सूचनाओं को तेजी से ग्रहण करती है, लेकिन कई बार उनकी सत्यता की जांच करने को पर्याप्त समय नहीं देती। इसीलिए कभी-कभी गलत सूचनाएं और अतिवादी विचार भी लोकप्रिय हो जाते हैं और लोगों को क्रोधित, भयभीत, उत्साहित या भावुक कर विशाल सार्वजनिक बहस का रूप ले लेते हैं। परिणामस्वरूप कई बार वास्तविक समस्याओं को किनारे कर छद्म भावनात्मक शोर कुछ देर के लिए सच का स्थान ले लेता है !  


प्रेरणा 
मारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! ऐसे लोग सत्ता, अधिकार और प्रभुत्व के लिए देश को भी दांव पर लगाने पर नहीं झिझकते ! यदि वे संविधानिक तरीके से सफल नहीं हो पाते तो देश में आंतरिक कलह उत्पन्न करने हेतु किसी बेहद निम्नस्तरीय अभियान का सहारा ले लेते हैं ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं !

भविष्य 
पना हित साधने वाले कई लोग अपने साथ उस शहीद भगत सिंह की तस्वीर रख, लोगों को गुमराह करने की कुचेष्टा भी करते हैं, जिन्होंने इस देश के लिए सिर्फ 23 साल की उम्र में अपना बलिदान दे दिया था ! भगत सिंह ही की तरह ऐसे सैकड़ों हजारों नाम हैं जो देश की खातिर हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए थे ! ऐसे अनगिनत किशोर हैं जिनका नाम भी लोगों को मालूम नहीं है, पर धन्य हैं उन शहीदों के माता-पिता और परिवार जिन्होंने उनके नाम पर देश से अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा ! इधर ये लोग हैं जो अपने स्वार्थ के लिए देश, समाज, नागरिकों में भेद-भाव पैदा कर जब घर लौटते हैं तो इनकी आरती उतारी जाती है, जैसे दिग्विजय कर लौटे हों ! इनकी तुलना उन शहीदों से करना भी बहुत बड़ा अपराध है। 

सुरक्षा का एहसास 
ऐसे में बात संस्कारों पर आ जाती है ! भले ही पाश्चात्य सभ्यता ने हमारे यहां घुसपैठ कर ली हो, पर अभी भी एक बहुत बड़े वर्ग में माता-पिता व बड़े-बुजुर्गों द्वारा छुटपन में ही बच्चों में संस्कार के बीज रोपित कर दिए जाते हैं ! इसलिए किशोरावस्था भले ही पूर्ण रूप से परिपक्व ना हो पर उसे बहका-फुसला कर गुमराह नहीं किया जा सकता ! बच्चे तो कच्ची मिटटी की तरह होते हैं ! यह तो कुम्हार पर निर्भर करता है कि वह चिलम बनाता है या सुराही ! उसके हाथ की जरा सी जुंबिश पूरे आकार को बेकार कर सकती है ! हमें उन सभी युवाओं के माता-पिता का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को सुसंस्कृत किया, दिलों में देश प्रेम की लौ जगाई और एक कुत्सित प्रयास को विफल करने में अहम भूमिका निभाई 🙏 

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

रविवार, 12 जुलाई 2026

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात यह भी है कि जहां हर शिवालय में नंदी बाबा बैठे हुए मिलते हैं वहीं वे यहां खड़ी मुद्रा में दिखाई देते हैं ! वैसे उज्जैन के संदीपनी आश्रम में स्थित शिव मंदिर के नंदी देव भी इसी मुद्रा में स्थित हैं.....................!  

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

''अरे भाई निकल के आ घर से, आ  घर से ! दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से !'' किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह गाना उन्हीं की फिल्म नई दिल्ली का है ! उस समय फिल्म के अनुसार गीत का आशय भले ही कुछ और रहा हो, पर ''दुनिया की रौनक के बदले देश की रौनक'' जैसे थोड़े से बदलाव के साथ यदि इसे पर्यटन से जोड़ दें तो यह आज भी मौजूं है ! अपने देश के हर क्षेत्र में ऐसे-ऐसे अनूठे, अनोखे दर्शनीय स्थल, पूजास्थान, विलक्षण वास्तु निर्माण उपलब्ध हैं कि उनको देखने के लिए जीवन कम पड़ जाए !
विचित्र 
ऐसी ही एक जगह है, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से करीब 12 किमी की दूरी पर ओयल कस्बे में स्थित अनूठी वास्तु-कला से निर्मित नर्मदेश्वर महादेव मंदिर ! आम धारणा और मान्यता है कि शिवजी का वाहन नंदी है, पर यहां वे एक विशाल मेंढक की आकृति वाले चबूतरे पर विराजमान हैं, इसीलिए इसे 'मेंढक मंदिर' भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण ओयल रियासत के राजा बख्श सिंह ने 1860 से 1870 की अवधि में करवाया था। 
विलक्षण 
लोकमत है कि एक बार राजा बख्श सिंह के राज में भयंकर सूखा पड़ा था। राजा भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने उस विपदा से उबरने और अपने क्षेत्र की रक्षा हेतु, पंडितों की सलाह पर "मंडूक तंत्र" के आधार पर इस मंदिर का निर्माण मेंढक के आकार में करवाया था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग नर्मदा नदी से लाया गया था, जिसे लेकर यह मान्यता है कि यह शिवलिंग दिन में 3 बार अपना रंग बदलता है।
नर्मदेश्वर 
एक अन्य मान्यता के अनुसार यहां के राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए मेंढक की बलि दी थी, क्योंकि मेंढक को प्रजनन का प्रतीक माना जाता है ! उसी 'मेंढक बलिदान' को श्रद्धांजलि स्वरूप यह मंदिर तंत्रवाद पर आधारित एक तांत्रिक यंत्र की तरह बनवाया गया था । जिसका मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण दिशा की ओर खुलता है ! मंदिर में एक कुआं है, जिसका पानी जमीन से ऊपर रहता है। मंदिर की अनोखी बनावट वर्षों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है ! 
अद्भुत 
अनूठा 
ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात यह भी है कि जहां हर शिवालय में नंदी बाबा बैठे हुए मिलते हैं वहीं कुछेक मंदिरों में वे खड़ी मुद्रा में भी दिखाई देते हैं ! यहां भी वे उज्जैन के संदीपनी आश्रम में स्थित शिव मंदिर के नंदी देव की तरह खड़ी मुद्रा में हैं ! 


संदीपनी आश्रम
मेंढक मंदिर लखनऊ से 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए लखीमपुर जाना होता है, जहां से ओयल की दूरी 11 किलोमीटर है। लखीमपुर से स्थानीय बस या टैक्सी के जरिए मंदिर पहुंचा जा सकता है ! यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन लखनऊ है। 

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, फिल्में बनी हैं ! इन चलचित्रों ने इन बिमारियों के प्रति लोगों को जागरूक भी किया है ! यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जिया भी है...............!   

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

दु निया भर में अबाल-वृद्ध सभी के पसंदीदा शौक में फिल्में सर्वोपरि हैं ! ये समाज का आइना कहलाती हैं ! जो मनोरंजन के साथ-साथ अभिव्यक्ति का भी बहुत सशक्त माध्यम हैं ! इसीलिए दर्शक उनसे और उनमें काम करने वाले पात्रों से अतीव जुड़ाव महसूस करता है। लोग अपने नेताओं को पहचाने ना पहचाने पर फिल्मों के छोटे-बड़े कलाकारों की बखूबी खबर रखते हैं ! इसलिए अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखने के लिए कलाकार भी अपने प्रशंसकों के मनमुताबिक काम करते रहते हैं ! पर कुछ अलग भी होते हैं !



नुष्य की जिंदगी में सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव के साथ-साथ हारी-बिमारी भी एक अभिन्न अंग है, इसीलिए अन्य विभिन्न परिस्थितियों के साथ ही बीमारियों पर आधारित बहुत सारी संवेदनशील फिल्में बनी हैं, जिनके समझदार निर्माता-निर्देशकों ने दर्शकों को जागरूक करने के साथ-साथ Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia और न जाने कितनी ऐसी बीमारियों के बारे में, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, बताया, चेताया और जागरूक कर उनकी रोक-थाम की बात भी की ! ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने भी उनके पात्रों से गहराई से जुड़ फिल्म को सफल भी करवाया है। 



यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जीया भी है ! उन्होंने बिना झिझक ऐसी फिल्मी स्वीकारीं और उन्हें सफल भी बनवाया।


पने अभिनय के शुरूआती दौर में ही उनको एक ऐसी फिल्म ''रेशमा और शेरा" मिली जिसमें उन्होंने एक गूंगे-बहरे का किरदार निभाया था। उसके बाद उनकी अनेक ऐसी फिल्में आईं  जिसका मुख्य किरदार किसी न किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित था ! जैसे वे फिल्म मजबूर में ब्रेन टयृमर से ग्रस्त रोगी के रूप में दिखाई दिए। फिल्म ब्लैक में अल्जीमर्स के रोगी के रूप में, ''पा'' में प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रस्त दिखे, यह उनकी  बेहतरीन यादगार फिल्मो में भी सर्वोपरि है !



कि तनी फिल्में याद की जाएं, ''दिवार'' में ब्रोंकाइटिस से ! ''वक्त'' में कैंसर से ! ''पीकू'' में कॉन्स्टिपेशन से ! फिल्म ''पिंक'' में बाइपोलर डिसऑर्डर से ! ''वजीर'' में विकलांग !  ''शमिताभ'' में ईर्ष्या, द्वेष, मूक ! ''आँखें'' में तेज मिजाज, गुस्सैल का किरदार निभाने के अलावा टी. वी. धारावाहिक युद्ध में भी हंगरीस्टन नामक रोग से पीड़ित दिखे !


लोगों का असीम प्यार, लगाव, शुभकामनाएं पाने के बावजूद ऐसा लगता है कि उनका और हारी-बिमारियों का आपस में कुछ ज्यादा ही लगाव है तभी तो इतने सारे रोगग्रस्त किरदार निभाने के अलावा भी ऐसी कई फिल्मों में काम किया, जिनमें वे खुद तो बीमार नहीं थे, पर उनके सहयोगी पात्र बिमारी से जूझ रहे थे जैसे ''आनंद'', "मिली", ! इसके अलावा वे खुद अपने जीवन में भी किसी न किसी कष्ट का सामना करते ही रहे हैं। पर लगता है कि उनके अंदर का "102 नॉट-आउट" का जिंदादिल, खुशी और जिंदगी से भरपूर किरदार सदा उनकी प्रेरणा, शक्ति और उत्साह बनाए रखता है ! 


मिताभ का कोई कितना बड़ा भी आलोचक हो, वह उनकी जिजीविषा, उनके काम के प्रति समर्पण, उनकी निष्ठा, उनकी मेहनत, बिना थके-हारे अपने काम को करने की लगन के ऊपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकता ! हिंदी फिल्मों के इतिहास में नायकों के पहले दस नामों में उनका जिक्र शामिल रहेगा !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

रविवार, 28 जून 2026

मायका नदियों का 🤔

महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं..........!              

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मा यका यानी माँ का घर ! साधारणतया इसका ताल्लुक इंसानों से खासकर महिलाओं से होता है ! वह घर जहां बच्चियां जन्म लेती हैं, बड़ी होती हैं, कार्य-कुशलता प्राप्त करती हैं और फिर समय आने पर विवाहोपरांत अपने ससुराल या पति के घर चली जाती हैं ! पर उनका मायके से नाता जुड़ा रहता है ! तीज-त्यौहार-उत्सवों के अलावा भी गाहे-बगाहे वे वहां आती-जाती रहती हैं !  

मध्य प्रदेश 

पर क्या नदियों का मायका भी होता है ? जी हाँ ! हमारे देश में मध्य प्रदेश एक ऐसी जगह है, जिसे नदियों का मायका कहलवाने का सौभाग्य प्राप्त है ! क्योंकि यहां से लगभग 6 बड़ी और करीब 14 मध्यम व छोटी नदियां निकलती हैं। यहां से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ हैं, नर्मदा, चंबल, ताप्ती, सोन, क्षिप्रा, बेतवा,केन, तवा, काली सिंध, कूनो इत्यादि ! इन नदियों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही इसके साथ ही इनका मध्य प्रदेश के निवासियों के लिए  बहुत बड़ा आर्थिक योगदान भी है। यही कारण है कि इस राज्य को नदियों का मायका कहा जाता है। 

अमरकंटक 

वि डंबना यह है कि इंसानी महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं !

नदियों का मायका 
इस दुनिया में करीब डेढ़ लाख नदियां बहती हैं, जिनमें छोटी-बड़ी मिला कर तकरीबन दो सौ प्रमुख नदियां हमारे देश में लोगों को जीवन प्रदान करती हैं ! मायके से निकलने के बाद जनहित में ये कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखतीं ! ऐसी जीवन दायिनी, प्रभु की अमूल्य भेंट के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम इनका ख्याल रखें ! इनका सम्मान करें ! यदि कुछ ना भी कर सकें तो कम से कम इन्हें ''व्यथित'' तो ना करें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

शुक्रवार, 19 जून 2026

टायरानोसौरस, शरीर चालीस फुट का, हाथ सिर्फ तीन फुट के 🦖

एक विशालकाय जीव जिसकी लंबाई 40 से 45 फीट, ऊंचाई तकरीबन 20 फीट, एक-एक फुट के दांत, वजन आज की दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, उस इतने विशाल और शक्तिशाली शिकारी की हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी यदि इसकी तुलना किसी 6 फीट लंबे साधारण व्यक्ति से की जाए तो उस इंसान की बांहें केवल 5-6 इंच की होंगी !  टायरानोसौरस का आकार ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है.............!    

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्र कृति अपने-आप में एक अबूझ पहेली है ! इसके खेल बड़े निराले होते हैं, जिसमें आँखों से दिखाई ना देने वाले सूक्षतम जीवाणु से लेकर पर्वताकार प्राणियों तक हजारों-लाखों खिलाड़ी शामिल हैं ! उन्हीं में से एक, छिपकलियों के पूर्वज, लुप्त डायनासोर प्रजाति के अजूबे टायरानोसौरस, जिसे टायरानोसौरस रेक्स या टी-रेक्स भी कहा जाता है, भी शामिल हैं ! फिल्मों से लगाव रखने वाले देसी-विदेशी दर्शकों ने इनका आभासी रूप जुरासिक पार्क जैसी फिल्मों में देखा होगा, जिनमें ये अपने पूरे जलवे के साथ उपस्थित थे !  

 टायरानोसौरस

फिल्म 

टा यरानोसौरस, इसके अवशेषों से पता चलता है कि यह आज से करीब साढ़े छह करोड़ साल पहले मुख्यत: उत्तरी अमेरिका की धरती पर विचरण करने वाले प्रसिद्ध डायनासोरों में से एक, बेहद खतरनाक शिकारी था ! पर जबसे इसका पहला कंकाल, 1900 के शुरुआती वर्षों में खोजा गया, तभी से वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम लोग भी समझ नहीं पा रहे कि 40 से 45 फीट की लंबाई, तकरीबन 20 फीट की ऊंचाई, एक-एक फुट के दांतों वाले इस जीव, जिसका वजन दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, इतना विशाल और शक्तिशाली शिकारी, पर उसके हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी किसी 6 फीट लंबे व्यक्ति से तुलना करें तो उस इंसान की बांहें सिर्फ 5-6 इंच लंबी ही होंगी ! दरअसल, टी. रेक्स अकेला ऐसा डायनासोर नहीं था, जिसकी भुजाएं छोटी थीं और भी कई प्रजातियों में ऐसी विसंगति थी ! पर ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है !

उनका समय 

तुलना 

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि  टायरानोसौरस के आकार का बदलाव उन इलाकों में शुरू हुआ होगा जहां उसके शिकार भी बहुत बड़े होते होंगे। जिन्हें हाथों से पकड़ कर काबू कर पाना मुश्किल होता होगा ! इसमें उसका विशाल व शक्तिशाली जबड़ा ज्यादा कारगर सिद्ध होता होगा ! इसीलिए बड़े सिर और शरीर के संतुलन के लिए हाथ छोटे होते चले गए होंगे ! यह भी हो सकता है कि जो प्राणी अपने जबड़े के एक ही झटके में बड़े से बड़े जीव का काम तमाम कर देता हो, यदि उसके हाथ भी उसी के आकार के अनुरूप होते तो वह दूसरे पशुओं के लिए बहुत ही खतरनाक हो जाता, शायद इसी लिए प्रकृति ने संतुलन बनाए रखने के लिए उसके हाथों को छोटा कर दिया हो !

जबड़े की उपयोगिता 

फि लहाल वैज्ञानिक अभी भी पूरी तरह नहीं जानते कि टी. रेक्स अपने हाथों का उपयोग कैसे करता था या वे इतने छोटे ही क्यों विकसित हुए। शायद भविष्य में कोई नई खोज इस रहस्य को सुलझा सके !

@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏                            

मंगलवार, 16 जून 2026

बरगलाए हुए "जेंजी'' 😞

अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग            

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम दर्ज हैं, जो उम्र में भले ही छोटे थे, लेकिन उनके हौसलों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी !  ऐसे किशोर और युवा, जिन्होंने अपने लहू से वतन की मिटटी को सींचा, बिना जुल्म-ओ-अत्याचार की परवाह किए -

बाजी राउत 
*बाजी राउत, सिर्फ 12 साल का बच्चा, सबसे कम उम्र का शहीद, जिसे अंगेजों का हुक्म ना मानने की वजह से गोली मार दी गई थी ! 

*खुदी राम बोस, युवा क्रान्तिकारी, 18 साल की उम्र में फांसी दे दी गई ! 

*करतार सिंह सराभा - 19 साल की उम्र में फांसी।  

*प्रफुल्ल चंद्र चाकी - उम्र 19 साल। पर अंग्रेजी हुकूमत उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी ! 

*भगत सिंह, * सुख देव, *शिवराम राजगुरु - इन्हें कौन नहीं जानता, जिन्हें सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था ! 

*चंद्र शेखर आजाद ! जिन्हें सपने में भी देख कर अंग्रेजों को पसीना आ जाता था ! धोखे से घेरा गया, पर कोई जिंदा नहीं पकड़ पाया ! जब देश को प्राण अर्पण किए तो उम्र थी महज 24 साल !  

 *मदन लाल ढींगरा - 25 साल, अंग्रेजों पर गोली चलाने के लिए फांसी ! 

*राजेंद्र लाहिरी - 26 साल, काकोरी केस में फांसी।  

*अशफाक उल्ला खां - 27 साल,  काकोरी केस में फांसी। 

*पंडित राम प्रसाद बिस्मिल - 30 वर्ष, मैनपुरी और काकोरी केस में फांसी  

*चेत राम जाटव - 30 साल। अंग्रेजों की खिलाफत के कारण गोली मार दी गई ! 

*मंगल पांडे - 30 साल की उम्र में फांसी। 

*जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, युवावस्था में एक बाघ से भिड़ कर मार डालने के कारण नाम पड़ा. ''बाघा जतिन'', 35 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए ! कनक लता बरुआ 15 साल, बादल गुप्ता 18 वर्ष, हेमू कालाणी 19 साल, अनंत लक्ष्मण 19 साल, प्रफ्फुल चाकी 19 साल, बसंत कुमार विश्वास 20 साल, कन्हाई  लाल दत्त 20 वर्ष.........कितने गिनाएं, कहां तक गिनाएं, स्याही खत्म हो जाएगी, कागज कम पड़ जाएंगे !  

अपने ऐसे शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! जिनको क्रांति का सही अर्थ ही मालूम ना हो ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा !  

क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! जो अवाम और देश के हित में हो ! ऐसी स्थिति के लिए मुख्य कारण जनमानस में अंसतोष का होना होता है, जो समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी  मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न हुआ हो ! परंतु ऐसा बदलाव या परिवर्तन लाने के लिए ठोस कारण का होना बेहद जरुरी है ! इसके साथ ही दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना का होना भी बहुत जरुरी है। 

@वंदे मातरम ! राष्ट्र प्रथम 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

बुधवार, 10 जून 2026

गर्मी को धता बताता टिटलागढ़ का शिव मंदिर

ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है.....................! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारा देश एक धर्म प्रधान देश है ! यहां हजारों-लाखों मंदिर, देवस्थान हैं ! उनमें से अनगिनत ऐसे  हैं, जिनके साथ कोई ना कोई रहस्यात्मक बात जुडी हुई है, जिसका अथक प्रयासों, वैज्ञानिक कोशिशों के बावजूद निवारण नहीं हो पाया है ! ऐसा ही एक शिव-पार्वती मंदिर, उड़ीसा के टिटलागढ़ में स्‍थापित है जो अपनी अनूठी विशेषता के कारण जगत्प्रसिद्ध है ! 

 

प्रवेश द्वार 

डिशा ! देश के पूर्वी तट पर स्थित यह हमारा आठवां सबसे बड़ा राज्य है। यह अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां कई प्राचीन, रहस्यमय, विश्वविख्यात मंदिर हैं।देश की इस सबसे गर्म जगह का भी सबसे गर्म इलाका है टिटलागढ़ ! जहां गर्मियों में दिन का अधिकतम तापमान 55 डिग्री तक चला जाता है ! उसी टिटलागढ़ के कुम्हडा पहाड़ी की चोटी पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का एक अद्भुत मंदिर स्थित है। गर्मियों में कुम्हरा पर्वत की चट्टानें और पत्थर इतने गर्म हो जाते हैं कि वहां किसी का भी कुछ मिनटों के लिए भी ठहरना मुहाल हो जाता है ! पर आश्चर्य की बात यह है कि इस भीषण गर्मी का मंदिर के अंदर लेष मात्र भी असर नहीं पड़ता और वहां ठंडक बनी रहती है ! 

प्रांगण 
इस अनोखे मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि बाहर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे इसके अंदर बिना एसी, कूलर या पंखे के तापमान कम होता चला जाता है ! कभी-कभी तो यह दस डिग्री से भी नीचे पहुंच जाता है ! बाहर के 50 डिग्री के तापमान से आया इंसान तब आश्चर्यचकित सा रह जाता है, जब वह मंदिर के अंदर विद्यमान पुजारी और श्रद्धालुओं को गर्म कपड़े ओढ़े बैठा देखता है ! पर कुछ ही देर में मंदिर में प्रवेश करते ही बाहर की भीषण गर्मी से परेशान वह श्रद्धालु भी ठंड से कांपने लगता है और उसे भी किसी गर्म वस्त्र की जरुरत पड़ ही जाती है ! तापमान के इस बदलाव का रहस्य अभी तक वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए हैं। 

विलक्षणता 
ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है ! 

हर हर महादेव 
यह शिव मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का निर्माण पत्थरों से किया गया है और इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी भी की गई है। मंदिर के अंदर एक शिवलिंग स्थापित है, हालांकि, इसके निर्माण का समय या इसे किसने बनवाया, इस बारे में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है। आस्था के इस केंद्र में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के भीतर एक छोटा सा कुंड है, बाहर चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो पूरे साल इसमें ठंडा पानी मौजूद रहता है ! हो सकता है कि इस पानी के स्रोत की वजह से मंदिर में तापमान कम रहता हो ! जो भी हो मंदिर की यही विशेषता इसको और भी अद्वितीय बनाती है। 

 

विहंगम दृश्य 
डिसा के बालांगीर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 59 पर स्थित टिटलागढ़ इलाके में विद्यमान इस मंदिर तक देश के किसी भी हिस्से से रेल, हवाई या सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है ! ओडिशा के सबसे बड़े शहरों में से एक टिटलागढ़ का सभी जगहों से बेहतरीन कनेक्शन है। विदेशों की यात्राओं से पहले हमें अपने देश को एक बार पूरी तरह देख, समझ, टटोल लेना चाहिए !

@ सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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