बुधवार, 23 मई 2018

झूठ बेचते सितारे !

देखने वाला तंग हो जाता है, हर पांच मिनट के बाद "बेल्ले" हीरो को झेल, जो दिन भर कुत्ते-बिल्ली की तस्वीर खींचता बैठा है और उसे बिना कैमरे के पता ही नहीं चलता कि उसका कुत्ता बिन नहाए है। एक और महाशय ने पूरे देश की जुबान को रंगने का ठेका ले सबके दिमाग की ऐसी की तैसी कर धर दी है ! हमारे सिरमौर नायक ठंडे पेय के गुण-गान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि हाथ में पकड़ी हुई बोतल के बावजूद उनकी जैकेट कैसे उतर जाती है ! एक तो गजबे ही है जो अपनी पहचान अपने काम या नाम से नहीं बल्कि शरीर पर थोपे जाने वाले डेडोरेंट से करवाता है ! वही हाल RO वाले पानी के फ़िल्टर का है जिसके बारे में बार-बार कहा जाता है कि वैसे फ़िल्टर की जरुरत सब जगह नहीं होती पर वह महोदया बिना झिझक उसे सर्वश्रेष्ठ बताती चली आ रही हैं ! इनसे तो वोडाफोन की वे "चिट्टियाँ" गुड़ियाँ लाख दर्जे बेहतर हैं जो संदेश के साथ-साथ हर बार चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं.............! 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
यह युग विज्ञापन का है। अखबार, टी.वी., पत्रिकाएं, सड़कों पर के खंभे, दीवालें, वाहन, ऐसा क्या है, जिसका उपयोग इनके लिए नहीं होता ! विज्ञापन वह फंदा या जाल है जिसका उपयोग बाजार द्वारा उपभोक्ता को फंसाने के लिए किया जाता है। जिसका एकमात्र लक्ष्य उपभोक्ताओं की जेब में सेंध लगाना है अधिकांश विज्ञापनों का संबंधित वस्तु की गुणवत्ता से कोई सरोकार नहीं होता, यह कई-कई बार सिद्ध हो चुका है। आज हर चीज की गुणवत्ता परखने की सुविधा, उसके गुण-दोषों की जानकारी सब कुछ आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद भी लोग झांसे में आते चले जाते हैं। क्योंकि बाजार ने इंसान के मनोविज्ञान को समझ उसकी इच्छाओं-कामनाओं-कमजोरियों की नस पकड़ रखी है। इस श्रेणी में अति विशाल जनसंख्या वाला मध्यम-वर्ग ही ज्यादा आता है। साथ ही उत्पादक दाताओं को यह भी मालूम है कि अगर बेचने वाले की साख समाज में हो तो उसका गहरा असर पडता है क्योंकि लोगों की अपने नायकों-नायिकाओं के प्रति ऐसी आस्था है कि वे समझते हैं कि हमारा नायक या नायिका कभी झूठ नहीं बोलेंगे ! सो वह उत्पाद पर भरोसा कर लेते हैं और उनके इसी भोलेपन के प्रभाव से जो चीज कम या भ्रामक गुणवत्ता की भी हो तो भी वह विज्ञापनों के सहारे निकल पड़ती है। इसीलिए किसी भी क्षेत्र के सितारे हर दूसरे-तीसरे विज्ञापन में नजर आ जाते हैं। यहां तक कि कई तो अपने क्षेत्र में हाशिए पर होने के बावजूद यहां माल कूटते नजर आते हैं। कुछ तो अपने रसूख के बल पर अपने रिश्तेदारों का भी भला करवा देते हैं। 

इश्तिहारों के अन्य माध्यम तो उपभोक्ता नजरंदाज कर भी सकता है पर टी.वी. का क्या ! जो हर दूसरे-तीसरे मिनट अपने दर्शकों पर तोप के गोलों की तरह विज्ञापन दागता रहता है ! जिसमें तो अब कई शालीनता की हद भी लांघने लगे हैं। कुछ जाने-अनजाने समाज के वर्गों में भेदभाव करने तो कुछ अपने उत्पाद का उपयोग ना करने पर उपभोक्ता को पिछड़ा हुआ बताने पर भी नहीं चूकते ! मनघड़ंत त्यौहार, दुर्लभ नक्षत्र, ख़ास दिन, आयातित उत्सव, कीमतों में भ्रामक कमी, दो के साथ एक मुफ्त और ना जाने क्या-क्या दिखा बता कर ग्राहक को ललचा, बहला, उकसा कर बाजार अपने सुरसा जैसी कभी ना ख़त्म होने वाली क्षुधा के लिए ईंधन का जुगाड़ करता रहता है। जिसके लिए ज्यादातर बच्चों को साध उनके अभिभावकों को निशाना बनाया जाता है। 

टी.वी पर समाचार या कोई अपना कार्यक्रम देखने वाला तंग हो जाता है, हर पांच मिनट के बाद "बेल्ले" हीरो को झेल, जो दिन भर कुत्ते-बिल्ली की तस्वीर खींचता बैठा है और उसे बिना कैमरे के पता ही नहीं चलता कि उसका कुत्ता बिन नहाए है या उसका जूता मुंह में दबाए भग रहा है। एक और महाशय ने पूरे देश की जुबान को रंगने का ठेका ले सबके दिमाग की ऐसी की तैसी कर धर दी है क्या जिम्मेदार लोग ऐसे बौड़म हैं कि शब्दों की हेरा-फेरी से उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि कौन क्या बेचना चाह रहा है ? ठंडे बोतल बंद पेय पूरी दुनिया में नकारे जा रहे हैं पर हमारे सिरमौर नायक उसके गुण-गान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि हाथ में पकड़ी हुई बोतल के बावजूद उनकी जैकेट कैसे उतर जाती है ! एक तो गजबे ही है जो अपनी पहचान अपने काम या नाम से नहीं बल्कि शरीर पर थोपे जाने वाले डेडोरेंट से करवाता है ! वही हाल RO वाले पानी के फ़िल्टर का है जिसके बारे में बार-बार कहा जाता है कि वैसे फ़िल्टर की जरुरत सब जगह नहीं होती पर वह महोदया बिना झिझक उसे सर्वश्रेष्ठ बताती चली आ रही हैं जबकि संवैधानिक पद के कारण उनकी तो समाज के प्रति और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पर क्या कहा जाए ! लगे हुए हैं सब अपनी जून सुधरने में ! ये तो आमजन को सुध लेने की बात है जो जरा सा ध्यान दे और सोचे कि गंजी पहन लेने से ही दिलेरी नहीं आ जाती नाहीं कुछ खा-पी लेने से ताकत या बुद्धि बढ़ सकती है या कुछ लगाने से रंग बदल जाता है और सुंदरता बढ़ जाती है ! इनसे तो वोडाफोन की वे "चिट्टियाँ" गुड़ियाँ लाख दर्जे बेहतर हैं जो संदेश के साथ-साथ हर बार चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं। 

ऐसा नहीं है कि विज्ञापन बंद ही कर दिए जाएं। कुछ चीजों के बारे में बताना जरुरी भी होता है। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनका पता ही ना चले यदि बताया ना जाए। पर बनाने और बताने वाले की नैतिक जिम्मेदारी निश्चित की जानी चाहिए कि वह अतिरेक, गलत या भ्रामक जानकारी ना दे। विज्ञापन को लोकप्रिय बनाने के लिए शालीनता ना लांघे। बच्चों को बच्चा ही समझे अनावश्यक रूप से उनके काँधे पर रख कर बंदूक ना चलाए। हालांकि इन पर भी अंकुश रखने का प्रावधान है पर पतली गलियां भी तो ढेरों हैं !  

मंगलवार, 22 मई 2018

इस IPL (इंडियन पॉलिटिकल लीग) को कौन सुधारेगा ?

दोनों IPL में एक समानता जरूर है, दोनों के "खिलाड़ी" बिकने के लिए सदा तैयार रहते हैं। जो ज्यादा बोली लगाता है इनकी स्वामिभक्ति उसी की हो जाती है, अगला मौका आने तक ! पर जहां 'प्रीमियम लीग' अपनी कुछ खामियों के बावजूद प्रशंसनीय खेल व मैत्री भावना के साथ क्रिकेट में भारत के बर्चस्व को दर्शा गर्व करने का कुछ मौका प्रदान करती है वहीँ 'दूसरी' लगातार पतनोन्मुख राजनीती पर से पर्दा हटा उसकी गलीजता, मौकापरस्ती, लालच, सत्ता-लोलुपता को बेनकाब कर हताशा से दो-चार करवाती है .........!
#हिन्दी_ब्लागिंग 
अभी-अभी सारे देश को दो-दो IPL, Indian Premier League और Indian Political League के तमाशों को एक साथ देखने का मौका मिला। मैदान और जंग में कोई एकरूपता या समानता ना होने के बावजूद दोनों में हर वह खासियत थी जो हम भारतियों को आकर्षित कर इनकी पल-पल की खबर जानने की उत्सुकता बनाए रखने का माद्दा रखती है। हाँ एक समानता जरूर है, दोनों जगह के "खिलाड़ी" बिकने के लिए सदा तैयार रहते हैं। जो ज्यादा बोली लगाता है इनकी स्वामिभक्ति उसी की हो जाती है, अगला मौका आने तक ! पर जहां प्रीमियम लीग अपनी कुछ खामियों के बावजूद प्रशंसनीय खेल व मैत्री भावना के साथ क्रिकेट में भारत के बर्चस्व को दर्शा गर्व करने का कुछ मौका प्रदान करती है वहीँ दूसरी लगातार पतनोन्मुख राजनीती पर से पर्दा हटा उसकी गलीजता, मौकापरस्ती, लालच, सत्ता-लोलुपता को बेनकाब कर हताशा से दो-चार करवाती है !

दोनों के अपने नियम-कायदे हैं जिनके तहत इनका निर्वाह होता है पर अब देश की राजनीती की जैसी हालत है
उसमें अधिकतर खंडित जनादेश की परिस्थियाँ बनने लगी हैं और ऐसा होते ही इस लीग का सारा खेल बिना नियमों का हो जाता है। उस समय आरोप-प्रत्यारोप, चीर-हरण, उखड़ते दबे मुर्दे, अमर्यादित जुमलेबाजी, एक-दूसरे को नीचा दिखाने का ऐसा माहौल बन जाता है कि नैतिकता, भाषा, सज्जनता, गरिमा ये सब खुद ही चुप-चाप जा ताक पर बैठ जाते हैं। उस समय एक ही लक्ष्य होता है कैसे भी, किसी भी तरह विरोधी को धकिया कर सत्ता हासिल कर ली जाए। तब ना अपने आदर्श याद रहते हैं नाहीं अपनी विचार धाराएं। धुर विरोधी भी अपने मतदाताओं को छल, एक हो, कुर्सी पाने की होड़ में शामिल हो जाते हैं। खेल में शामिल दल किस तरह और किस हद तक मनमानी पर उतर आते हैं यह दर्शकों ने देखा ही है। इसका हल इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसी अवस्था आने पर क्या किया जाना चाहिए इसकी हमारे संविधान में कोई मार्गदर्शिता नहीं है। 

आजकल अधिकतर कौन, कैसे और किस तरह चुनाव लड़ कर विजयी होते हैं यह देश का बच्चा-बच्चा जानता है। इस तरह के लोगों का मूल उद्देश्य सत्ता के मार्फ़त सिर्फ धन और बल हासिल करना होता है। यदि खुदा-न-खास्ता जनादेश खंडित होता है तो इनकी और भी बन आती है। ये तथाकथित जन-सेवक अपनी नीलामी
करवाने बाजार में खड़े हो जाते हैं। लाखों-करोड़ों की बोलियां लगनी शुरू हो जाती हैं। स्व-हित में ये इंसान से माल बन जाते हैं। ऐसे लोग सत्ता में आ कर क्या गुल खिलाएंगे ये कोई रहस्य नहीं रह गया है। आज हर राजनितिक दल इस बिमारी से परेशान है; तो क्या उनका फर्ज नहीं बनता कि ऐसी हालत से निबटने के लिए एक हो, सरकार गठन के नियम-कानूनों को प्राथमिकता देते हुए बदलने की पहल की जाए। 

अब तो जब अपने पेट में वायु-प्रकोप होने पर विरोधी को दोषी ठहराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का द्वार कभी भी, किसी भी समय खटखटा दिया जाता है तो क्यों नहीं वहीँ से सुधार का कडा कानून पारित कर दिया जाए। जैसे स्कूल-कालेज की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के अंक निर्धारित होते हैं वैसे ही यहां भी 51% को पत्थर की लकीर बना दिया जाए। इससे कम पर सरकार बनाने की किसी की कोई सुनवाई, किसी भी कीमत पर न हो यदि कोई दल चुनाव नतीजों के आने के बाद दूसरे दलों से गठबंधन का दावा करे तो उसे चुनाव पूर्व ऐसी सहमति का प्रमाण पेश करना अनिवार्य हो। सांसद संसद में अपने क्षेत्र के मतदाताओं का प्रतिनिधि होता है। उसने किसी दल के तहत या निर्दलीय के रूप में जनता से कुछ वादे कर किसी और के विरुद्ध चुनाव लड़ा होता है। चुनाव पश्चात् यदि वह दल-बदल करना चाहे तो उसे अपने दल से त्याग-पत्र दे फिर से जनादेश लेने के लिए जनता के बीच जाने की मजबूरी हो। ऐसे ही कुछ ठोस उपाय यदि न्यायालय सुझा कर लागू कर दे तो कुछ हद तक तो मौका-परस्ती, भ्रष्टाचार, धन-बल का उपयोग कम हो ही सकता है। कुछेक लोगों का मानना है कि दोबारा चुनाव होने से समय और धन बर्बाद होते हैं; पर यह फिर भी इस लेन-देन, उठा-पटक, तोड़-फोड़, तूतू-मैंमैं, जूतम-पैजार से कहीं बेहतर होगा। प्रत्याशी के मन में निश्चिंतता नहीं बल्कि डर रहेगा "हंग" के "ढंग" का।      

सोमवार, 14 मई 2018

कभी-कभी कोई फिल्म आपके साथ घर तक चली आती है

एक दिन पहले ही आलिया की फिल्म "राजी" भी वहीँ लगी हुई थी, पुरानी लत के कीड़े ने जोर मारा ! पारिवारिक सदस्यों के सामने प्रस्ताव पेश किया तो मना किसने करना था, सारे एक से बढ़ कर एक शौकीन; पर शर्त एक ही थी कि पहले पेट-पूजा का प्रसाद ग्रहण कर ही दोबारा हॉल में प्रवेश किया जाएगा। बात तर्क-सम्मत थी, सो सर्व-सम्मति से पारित हो गयी। इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है आलिया भट्ट। इस लड़की ने इतनी कम उम्र और अपनी संक्षिप्त सी फ़िल्मी यात्रा में वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसे पाने के लिए कई अभिनेत्रियों ने अपनी जिंदगी खपा कर भी सफलता नहीं  पाई  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
फिल्मों का का खानदानी शौक तो सदा से ही रहा है। पहले तो अच्छी-बुरी, हिंदी-अंग्रेजी-बांग्ला सभी फ़िल्में देख ली जाती थीं। एकाधिक बार "मज़बूरी" में एक दिन में दो-दो फ़िल्में भी निपटानी पड़ जाती थीं। हर भाषा के हमारे अपने पसंदीदा कलाकार होते थे। धीरे-धीरे पसंदगी सिमटती गयी, फ़िल्में देखने के पहले चयनित होने लगीं, फिर हॉल-संस्कृति के खात्मे और मल्टी-प्लेक्स के युग में यह चयन और भी सख्त हो गया। याद रखने लायक, देखने की ललक पैदा करने वाली, चुनिंदा फ़िल्में बननी कम हो गयीं। पर कभी-कभी साल में दो-तीन तो ऐसी आ ही जाती हैं जिनका टी. वी. पर आने का इंतजार ना कर जा कर देखने की बनती है। 

पिछले हफ्ते शनिवार सपरिवार अमिताभ-ऋषि की "102 नॉट-आउट" देखने जाना हुआ, फिल्म ठीक-ठाक थी, पहले हाफ में कुछ सुस्त व उबाऊ होने के बावजूद अच्छी लगी। पर साथ ही यह भी सच है कि यदि ये दोनों
कलाकार ना होते तो शायद ही चल पाती। खैर फिल्म ख़त्म हुई, बाहर ना निकल परिसर में ही लौट आए। एक दिन पहले ही आलिया की "राजी" भी वहीँ लगी हुई थी, पुरानी लत के कीड़े ने जोर मारा ! प्रस्ताव पेश किया तो मना किसने करना था, सारे एक से बढ़ कर एक शौकीन; पर शर्त एक ही थी कि पहले पेट-पूजा का प्रसाद ग्रहण कर ही दोबारा हॉल में प्रवेश किया जाएगा। बात तर्क-सम्मत थी, सो सर्व-सम्मति से पारित हो गयी और सिनेमा देखने के इतिहास में पहली बार स्क्रीन के सामने पैर फैला कर बैठने की सुविधा वाली सीटों पर बैठ, गर्दन उठा, फिल्म के कलाकारों के बिल्कुल पास जा फिल्म देखी। 

फिल्म शुरू होते ही सारी कठनाइयां भूल सी गयीं। हालांकि "राजी" कोई बहुत ही असाधारण या अनोखी फिल्म नहीं है पर साधारण भी नहीं हैं ! इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है आलिया भट्ट। इस लड़की ने इतनी कम उम्र और अपनी संक्षिप्त सी फ़िल्मी यात्रा में वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसे पाने के लिए कई अभिनेत्रियों ने अपनी जिंदगी खपा कर भी सफलता नहीं पाई। आज आलिया ने हेमा, जीनत, श्रीदेवी जैसी ग्लैमर्स फिल्मों की अभिनेत्रियों के साथ-साथ शबाना, स्मिता जैसी गंभीर फिल्मों की अदाकाराओं को भी पीछे छोड़ वहीदा, नूतन व मधुबाला जैसी कलाकारों की श्रेणी हासिल कर ली है। "राजी" देख कर ही इस लड़की की "डेप्थ" का अंदाज
लगाया जा सकता है। इस कठिन रोल को उसने जिस सहजता के साथ निभाया है वो कबीले-तारीफ़ है। साथ ही इस फिल्म की निर्देशक मेघना भी बधाई की पात्र है जिसने फिल्म को इतनी तन्मयता से बनाया है जैसे कोई मूर्तिकार बुत तराशता है। हरेक कलाकार को संयमित और सहज रखते हुए उनकी कला का शत-प्रतिशत योगदान करवाया है। इसमें उसने कमाल कर दिया है। पर इसी कमाल ने फिल्म के तराजू को ज़रा सा पकिस्तान की तरफ भी झुका दिया है। कहीं-कहीं दर्शक की सहानुभूति पाक के साथ जा खड़ी होती है ! यह शायद पहली फिल्म है जिसमें कोई भी पाकिस्तानी किरदार खलनायक नहीं लगता। जो भी हो यह उस श्रेणी की फिल्म है जो ख़त्म होने पर आपके साथ घर तक चली आती है।            

गुरुवार, 3 मई 2018

काश ! हिंदी फिल्मों को सत्यजीत रे का सहारा मिला होता

अपराजितो फिल्म का एक सीन, जिसमें अपु अपनी माँ से कहता है कि उसे सुबह की ट्रेन पकड़नी है सो जल्दी उठा देना। सीधी व साधारण सी बात है कि अगले दृश्य में माँ, सुबह हो गयी है, अपु उठो कह कर जगा देती। पर उस गरीबी के मारे परिवार में घडी कहाँ थी ! सुबह कब और कितने बजे ट्रेन है कैसे पता चले ? इसलिए रात को अपु "जंत्री" देख कर माँ को बतलाता है कि सुबह सूर्य 5.45 पर उगेगा, उसके साथ ही मुझे उठा देना,,,,,,,,
#हिन्दी_ब्लागिंग  
समय के साथ-साथ इंसान के सोच-विचार, पसंद-नापसंद इत्यादि में फर्क आता चला जाता है। चीजों को गहराई और गंभीरता से देखने समझने की कोशिश होने लगती है। कलकत्ता (तब का) निवास के दौरान बांग्ला
साहित्य और फ़िल्में देखने का काफी सुयोग मिला करता था। वहाँ निर्माता-निर्देशक सत्यजीत रे और नायक उत्तम कुमार के आस-पास भी किसी को नहीं समझा जाता था। पर मुझे सदा ही फिल्म निर्देशक तपन सिन्हा ज्यादा प्रिय थे। कारण यही था कि सत्यजीत जी की फ़िल्में यथार्थवादी होने के कारण कुछ दर्द और धीमापन लिए चलती थीं। शायद उनहोंने भी इसे समझते हुए "गुपि गाईंन बाघा बाईंन" जैसी हल्की-फुल्की फ़िल्में बनाईं।पर तपन सिन्हा की हर फिल्म में संदेश के साथ-साथ मनोरंजन भी खूब होता था। उनकी फिल्मों का हिंदी रूपांतर भी खूब हुआ जैसे काबुलीवाला, अतिथि, आपनजन, सगीना महतो, हाटे बाजारे इत्यादि। उस समय गंभीर फिल्मों के लिए समझदानी भी छोटी ही थी।   
पाथेर पांचाली 
बनारस के घाट पर अपराजितो 


अपुर सोंसार
यह संयोग ही था कि दो मई, सत्यजीत रे की जयंती के तीन-चार दिन पहले ही उनकी पहली फिल्में अपु-त्रयी (Apu-Trilogy) पाथेर पांचाली, अपराजितो और अपुर सोंसार फिर देखीं, दो दिन में एक साथ-लगातार। वर्षों पहले साल-साल भर के अंतराल में देखने और एक साथ देखने में बहुत फर्क था। क्योंकि यह अपु नाम के बालक के बचपन, युवावस्था व बड़े हो दुनियादारी की कहानी है जो एक साथ देखने पर अपनी अलग छाप छोड़ती हैं।  इसीलिए अबकी हफ्ते भर तक दिलो-दिमाग में छाई रहीं। छोटी-छोटी चीज पर उनकी पैनी नजर, हर छोटे-बड़े अदाकार के अभिनय को महत्व, हर टेक पर मजबूत पकड़, समय-काल का पूरा ध्यान और उसके अनुरूप दृश्य व घटना चक्र, सब का समग्र प्रभाव दर्शक को मंत्रमुग्ध कर बांधे रखता है। हिंदी में उन्होंने सिर्फ एक ही फिल्म बनाई थी "शतरंज के खिलाड़ी" जिसका फिल्मों में अपना ही एक स्थान है। 
शतरंज के खिलाडी 

अमजद को दृश्य समझाते हुए 
उनकी की सूक्ष्म दृष्टि का उदहारण है, अपराजितो फिल्म का एक सीन, जिसमें अपु अपनी माँ से कहता है कि उसे सुबह की ट्रेन पकड़नी है सो जल्दी उठा देना। सीधी व साधारण सी बात है कि अगले दृश्य में माँ, सुबह हो गयी है, अपु उठो कह कर जगा देती। पर उस गरीबी के मारे परिवार में घडी कहाँ थी ! सुबह कब और कितने बजे ट्रेन है कैसे पता चले ? इसलिए रात को अपु "जंत्री" देख कर माँ को बतलाता है कि सुबह सूर्य 5.45 पर उगेगा, उसके साथ ही मुझे उठा देना ! इसी तरह एक जगह कपडे सुखाने के लिए जो अलगनी लगाई गयी थी वह एकदम नई थी। शॉट लेने के पहले मुआइना करते समय रे महोदय की नजर उस पर पड़नी ही थी, तुरंत उसे बदलवा कर जीर्ण-शीर्ण रस्सी का इंतजाम कर शॉट लिया गया। इस बाबत पूछने पर उनका कहना था कि दर्शकों का ध्यान जाए ना जाए पर जिस परिवार को दो जून का भोजन जुटाना भी समस्या हो वह नई अलगनी कहाँ से लाएगा। यह है निर्देशक की खूबी ! उनकी छाप, उनकी पकड़, उनकी खासियत, उनका अपने विषय में ज्ञान, उनका नजरिया उनकी हर फिल्म के एक-एक फ्रेम पर साफ़ दृष्टिगोचर होता है। ऐसे ही उनकी गिनती विश्व के अग्रणी फिल्म निर्देशकों में नहीं होती। जब उन्हें फिल्म संसार को योगदान देने के उपलक्ष्य में ऑस्कर देने की घोषणा हुई तो वे अपनी बिमारी के चलते अस्पताल में होने के कारण वहाँ जाने से मजबूर थे तो ऑस्कर कमिटी ने उन्हें वहीँ आ कर सम्मानित किया और पुरस्कार से नवाजा। ऐसा ऑस्कर के इतिहास में पहली बार हुआ था और यही सत्यजीत रे की विश्व में साख को जाहिर करता है। उनकी 97वीं जयंती पर श्रद्धांजलि !

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

मेरी समझ में तो नहीं आता यह सब ? आपको आता है क्या ?

तलाशी लेने, छापा मारने, किसी को पकड़ने या अपराधी का पीछा करते हुए पुलिस सायरन बजाते क्यों घूमती है ? रात को चौकीदार डंडा पटक, सीटी बजा कर पहरेदारी क्यों करता है ? क्या चोर को बताने के लिए कि भाई मैं इधर हूँ ; तू अपना देख ले ! क्यों लोअर कोर्ट का फैसला हाई कोर्ट में उलट जाता है ? क्या पिछला जज अनुभव हीन होता है ? क्यों माननीय लोगों को अनाप-शनाप सुविधाएं दी जाती हैं ? क्यों नहीं करोड़ों-अरबों के मालिक सांसद वगैरह एक-दूसरे पर लांछन लगाने की बजाए एक-दो गांव गोद ले लेते ? क्यों आदमी जब कुत्ते को काटे तभी मीडिया के लिए खबर बनती हैं ........!
#हिन्दि_ब्लागिंग 
कुछ बातें ऐसी होती हैं जो समझ में नहीं आतीं चूँकि होती चली आ रही हैं इसलिए सब उसे सामान्य रूप से लेते चलते हैं, उनका औचित्य  किसी की समझ में आता हो या ना आता हो,  मुझे तो खैर आज तक नहीं आया ! जैसे

धूम्रपान दुनिया-जहांन में बुरा, सेहत के लिए हानिकारक, शरीर के लिए नुकसानदेह है। सरकार ने सेवन तथा विक्रय करने वालों पर कड़ी नजर तथा दसियों पाबंदियां थोप रखी हैं ! लोगों को इसकी बुराई के बारे में हिदायतें देने पर लाखों रुपये फूँक दिए जाते हैं। पर ना हीं तंबाखू की पैदावार पर कभी रोक लगी और नाहीं सिगरेट इत्यादि बनाने वाले कारखानों पर। अब सोचने की बात यह है कि कोई इंसान करोड़ों खर्च कर इतना बड़ा कारखाना शौकिया तो लगाएगा नहीं; वह तो अपनी लागत निकालने के लिए अपना उत्पाद तो बेचेगा ही। जब सामान बाजार में उपलब्ध होगा, बिकेगा तो खरीदने वाला उसका उपयोग करेगा ही...फिर ? कहते हैं नशीली चीजों से ही सरकार को सबसे ज्यादा आमदनी होती है; तो हुआ करे फिर उनकी बंदी का नाटक क्यों ?

यही बात पान-मसाला, गुटका, मैनपुरी सुपारी, खैनी सब पर उसी तरह लागू होती है। जब बाजार में सामान मिल रहा हो तो शौकीन, लती, आदत से मजबूर लोग उसे खरीदेंगे ही ! आप लाख बंदिशें लगा दें, अनाप-शनाप कीमतें बढ़ा दें, सार्वजनिक उपयोग करने वालों के लिए दंड निर्धारित कर दें, पर उन्हें रोक नहीं पाएंगे, यह ध्रुव सत्य है। जब तक उसका उत्पादन बिल्कुल ख़त्म नहीं हो जाता। शराब को ही लीजिए गुजरात में पचास साल से ऊपर हो गए इसे प्रतिबंधित हुए, पर हर साल वहाँ पकडे जाने वाले इस द्रव्य की कीमत करोड़ों में है ! सैंकड़ों लोग जहरीली शराब के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। गुजरात की शराबबंदी की हक़ीकत सब जानते हैं. वहाँ शौकीनों को अधिक दाम देकर हर तरह की शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। जहरीली शराब के हरियाणा, आंध्र प्रदेश, बिहार जहां-जहां इसका सेवन निषेद्ध किया गया वहीँ अपराध और मौतों में इजाफा हुआ। एक तरफ तो कुछ सरकारें इसको बंद करने के लिए कटिबद्ध हैं तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में सरकार खुद ही इसका वितरण अपने हाथों में ले जगह-जगह दुकाने खुलवा रही है ! एक तरफ तो आप ऐसी चीजों से होने वाले नुक्सान से बचाने की बात करते हो और दूसरी तरफ उसी को बेचने का जुगाड़ भी फिट करते हो; ये दोगलापन समझ के बाहर है कि नहीं ? 
दोषी लोगों के लिए प्राणदंड का प्रावधान है पर धंदा चालू है। कभी सुना है किसी को दंड भुगतते ? 


दो-तीन साल पहले खूब हल्ला मचा प्लास्टिक की थैलियों को लेकर। यह बताने में करोड़ों रूपये बहा दिए कि इससे जमीं-हवा-पानी सब बर्बाद हो जाता है; कुछ दिन असर रहा पर फिर सब यथावत ! ना फैक्ट्रियां बंद हुईँ, ना हीं बिक्री रुकी ! आज सब धड़ल्ले से चल रहा है। बाकी का तो छोड़िए दिल्ली जो प्रदूषित वातावरण से परेशां है वहीँ इसे रोकने वाला कोई नहीं है। अटि पड़ी हैं, सड़कें , नाले-नालियां प्लास्टिक के कचड़े से। जब तक उत्पादन पर रोक नहीं लगेगी तब तक कैसे रुकेगा यह गोरख - धंदा ? सोचने की बात है 

कि ऐसी जगहों को बिजली-पानी हर चीज की सुविधा कौन उपलब्ध करवाता है ? क्या आम आदमी ? चाणक्य ने कटीले पौधे की जड़ों में मठ्ठा डाल उसे समूल नष्ट करने की शिक्षा दी थी। पर यहां विडंबना यही है कि आप जड़ को तो ख़त्म कर नहीं रहे पत्तों टहनियों पर जोर दिखा रहे हो तो विष-वृक्ष पनपने से कैसे रुकेगा ? कारण वही है, इन सब चीजों के कारखाने ज्यादातर रसूखदार, भाई-भतीजों, पार्टी नेताओं या आमदनी स्रोतों के पास होते है जो अपने दल-बल-छल से येन-केन-प्रकारेण अपना हित साध लेते हैं। अंदर ही अंदर पैसों का खेल चलता रहता है और हमारे जैसों को कुछ भी समझ नहीं आता। 

इसी संदर्भ में एक बात और...कभी सोचा है आपने कि तलाशी लेने, छापा मारने, किसी को पकड़ने या अपराधी का पीछा करते हुए पुलिस सायरन बजाते क्यों घूमती है ? क्या उसे सचेत करने के लिए ? रात को चौकीदार डंडा पटक, सीटी बजा कर पहरेदारी क्यों करता है ? क्या चोर को बताने के लिए कि भाई मैं इधर हूँ और उधर जा रहा हूँ; तू अपना देख ले ! क्यों लोअर कोर्ट का फैसला हाई कोर्ट में उलट जाता है क्या पिछला जज अनुभव हीन होता है ? क्यों माननीय लोगों को अनाप-शनाप सुविधाएं दी जाती हैं जब कि पिछली पंक्ति के सर्वहारा को पानी तक नसीब नहीं होता ? क्यों नहीं करोड़ों-अरबों के मालिक सांसद वगैरह एक-दूसरे को देश की गरीबी का जिम्मेदार साबित करने की बजाए एक-दो गांव गोद लेकर मिसाल कायम करते ? क्यों आदमी जब कुत्ते को काटे तभी मीडिया के लिए खबर बनती हैं  ?  क्यों मेरी समझ में तो नहीं आता यह सब ? आपको आता है क्या ?           

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

सबकी प्यारी , पर जेब पर भारी......मेट्रो

दिनों-दिन बढ़ाई जाती कीमतों से तो यही लगता है कि मंशा-ए-हाकिम यही है कि मुश्किल हालातों में किसी तरह गुजर कर रहे नागरिकों के पास की दमड़ी को भी तरह-तरह के हथकंडे अपना किसी तरह हथिया लिया जाए। किराया बढ़ाना सबसे सरल और तुरंत उगाही का तरीका है। क्योंकि कमाई के और पचासों उपाय श्रम और समय दोनों की मांग करते हैं। जिसके लिए किसी में सब्र नहीं है ! गरीब-गुरबा तो कहने की बातें है, इस बार तो सायकिल वालों को भी नहीं बक्शा गया ..............!        
#हिन्दी_ब्लागिंग
इस बार सर्दियों में दिल्ली के पर्यावरण का माहौल किसी गैस चेंबर जैसा था। जाहिर है हो-हल्ला मचा, तरह-
तरह के नेताओं ने तरह-तरह की चिंताओं से घिर तरह-तरह के आश्वासन दे तरह-तरह के सब्ज बाग़ दिखलवाए ! जिसमें एक था मेट्रो के उपयोग के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना। समझाइश यह थी कि निजी वाहन कम निकलेंगे तो "स्मॉग" घटेगा। इसके लिए बच्चों की सेहत को सामने रख भावनात्मक रूप से ब्लैकमेलिंग भी की गयी। बहुतेरे लोग झांसे में आ गए ! थोड़ी-बहुत अड़चनों को नजरंदाज कर, अपनी गाड़ियां छोड़, मेट्रो का सहारा लिया। समयानुसार मौसम बदला, वायुमण्डल में जैसे ही कुछ सुधार हुआ, चंट लोगों ने मेट्रो का किराया अनाप-शनाप बढ़ा दिया ! जनता भौंचक्की ! कुछ लोग फिर अपने निजी वाहनों की ओर लौटे; धड़ से पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ गयीं, उनका तो वैसे ही एक अलग इंद्रजाल है जो किसी की समझ में नहीं आता। अवाम के वश में कहाँ कुछ रहता है, लोग बड़बड़ाते रहे
, जेब ढीली करते रहे। कुछ ने बसों की तरफ रुख किया तो उनके किरायों में बढ़ोत्तरी कर दी गयी। ऐसे ही कुछ दिन बीते,  अभ्यस्तता आती देख फिर देश-हित में सदा तत्पर रहने वालों की कमिटी ने मेट्रो पार्किंग लगभग दुगनी कर दी, यहां तक कि सायकिल वालों को भी नहीं छोड़ा ! क्या इनसे कोई पूछने वाला भी नहीं कि भाई इस तरह कीमत बढ़ते रहने से लोग तुम्हारी मेट्रो को क्यों प्राथमिकता देंगे ? जबकि सच्चाई भी यही है कि मेट्रो से लोगों का मोह-भंग हो रहा है ! सोचने वाली बात यह है कि यदि आप सच्चे दिल से देश-समाज-अवाम का हित समझते हुए यह चाहते हैं कि जनता अपने वाहन का उपयोग ना कर सरकारी यातायात से सफर करे तो उसे लगना तो चाहिए कि निजी से सरकारी वाहन में यात्रा फायदेमंद ना सही पर नुक्सान दायक भी नहीं है।
यहां तो उल्टा हो रहा है ! लग रहा है कि मुश्किल हालातों में भी किसी तरह गुजर कर रहे नागरिकों के पास की दमड़ी को भी तरह-तरह के हथकंडे अपना किसी तरह हथिया लिया जाए। क्योंकि यह सबसे सरल और तुरंत उगाही का तरीका है। क्योंकि कमाई के और पचासों तरीके श्रम और समय दोनों की मांग करते हैं। जिसके लिए किसी में सब्र नहीं है। क्या कारण है कि सरकारी ठप्पा लगते ही हर काम घाटे में चलने लगता है और गैर सरकारी उद्यम दिन दुनि रात चौगुनी कमाई करते चले जाते हैं ! वैसे इस बारे में जानते तो सभी हैं !

अब रही उन कमेटियों की बात जो घाटे की पूर्ती के मार्गदर्शन के लिए बनाई जाती हैं। उनमें कौन लोग होते हैं जो ऐसे फैसले लेते हैं ? ये तो साफ़ है उन्हें अवाम से कोई लेना-देना नहीं है, नाहीं उनकी जेब से कुछ जा रहा है !
उल्टे ऐसे बेतुके निर्णयों पर भी उन्हें भारी-भरकम फीस तो चुकाई जाती ही होगी साथ ही तरह-तरह की सरकारी सुविधाएं भी मुहैय्या करवाई जाती होंगी। ऐसे लोगों के नाम भी उजागर होने चाहिए। बहुत इच्छा है ऐसे महानुभावों के नाम और चेहरे देखने जानने की जिनका खुद और उनके परिवार का आवागमन तो कभी-कभार ही धरती से होता हो और होता भी हो तो उन्हें उसके खर्च की जानकारी शायद ही हो ! ऐसे लोगों की न तो रियाया के साथ कोई सहानुभूति होती है ना हीं उसके हालातों पर ! ऐसे लोगों की जानकारी भी पब्लिक को उपलब्ध करवाई जानी चाहिए !

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

मलेरिया दिवस, आज मच्छरों को बचाना है कि निपटाना है ? :-)

सुबह से ही भम्भल-भूसे में हूँ कि आज के दिन का उद्देश्य क्या है ? क्योंकि हमारे यहां रिवायत है कि दिवस उसी का मनाया जाता है जिसके अस्तित्व पर हम खुद खतरा मंडरवाते हैं और फिर उसे बचाने का नाटक करने का एक दिन निर्धारित कर देते हैं। जैसे पर्यावरण दिवस, हिंदी दिवस, धरा दिवस ! और तो और हम तो मातृ-पितृ दिवस भी मनाने लगे हैं, गोया कि ये हमारे माता-पिता ना हो कर कोई जींस हों ........! 
#हिन्दी_ब्लागिंग   
जिस तरह दिनों का तरह-तरह के मुद्दों के लिए दिनों का आवंटन हो रहा है, उससे तो यही लग रहा है कि आने वाले दिनों में दिन कम पड़ जाएंगे, मुद्दों की बनिस्पद।  25 अप्रैल ! आज विश्व मलेरिया दिवस है, अखबार से पता चला; पर उसने यह नहीं बतलाया कि इस बिमारी और इसके कीट का संरक्षण करना है या इसे हटाना है! 
सुबह से ही भम्भल-भूसे में हूँ कि आज के दिन का उद्देश्य क्या है ? क्योंकि हमारे यहां रिवायत है कि दिवस उसी का मनाया जाता है जिसके अस्तित्व पर हम खुद खतरा मंडरवाते हैं और फिर उसे बचाने का नाटक करने का एक दिन निर्धारित कर देते हैं। जैसे पर्यावरण दिवस, हिंदी दिवस, धरा दिवस ! और तो और हम तो मातृ-पितृ दिवस भी मनाने लगे हैं, गोया कि ये हमारे माता-पिता ना हो कर कोई जींस हों ! 

खैर, बात हो रही थी मच्छर की तो मुझे यही लगा कि मानव को छोड़ कुत्ते-बिल्लियों-भालू-बंदरों को बचाने वाली संस्थाओं को शायद इस छुद्र कीट का भी ध्यान आ गया हो, क्योंकि जिस तरह वर्षों से इसकी जान के पीछे दसियों देश हाथ धो कर पड़े हुए हैं। करोड़ों-अरबों रूपए इसको नष्ट करने के उपायों पर खर्च किए जा रहे हैं, तो कहीं इसकी प्रजाति नष्ट ही ना हो जाए। वैसे भी इन तथाकथित पशु-प्रेमियों को समाचारों में बने रहने का बहुत शौक होता है। जानकार लोगों का कहना है कि तरह-तरह की सावधानियां, अलग-अलग तरह के उपाय आजमाने के बावजूद साल में करीब चार लाख के ऊपर मौतें इसके कारण हो जाती हैं। इतने लोग तो मानव ने आपस में लडे गए युद्धों में भी नहीं खोए ! तो क्या ! सिर्फ इसीलिए हम प्रभू की एक अनोखी रचना को
मटियामेट कर देंगे ? नहीं ! एक-डेढ़ मिलीग्राम के इस दंतविहीन कीड़े को भी जीने का उतना ही हक़ है जितना इंसान को ! रही बात इंसान की मौतों की तो; लाखों लोग सिगरेट के कारण रोग- ग्रस्त हो दुनिया से कूच कर जाते हैं, अनगिनत लोग शराब के कारण मौत का निवाला बन जाते हैं, ड्रग्स, नकली दवाइयां, दूषित हवा, अशुद्ध जल, मिलावटी खाद्य पदार्थों से लाखों लोग असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं तो क्या सिगरेट बंद हुई ? शराब के कारखानों पर ताले लगे ? साफ़ सुथरा खान-पान उपलब्ध हुआ ? वायुमंडल सांस लेने लायक बन पाया ? नहीं ! तो फिर इस गरीब के पीछे क्यों पड़े हो भई ? हम तो उस देश से हैं जहां जहरीले सांप को भी दूध पिलाया जाता है, भले ही वह उसे नुक्सान ही पहुंचा दे, चूहों को हम देवता की सके वारी मानते हैं, भले ही वह करोड़ों के अनाज का सत्यानाश कर दे ! कुत्तों के लिए लाखों घरों से रोज रोटियां निकलती हैं, भले ही भूख के कारण किसान मर जाते हों तो फिर इस मासूम जीव ने क्या पाप किए हैं ? यही सब सोच के मुझे लगा कि मलेरिया दिवस पर मच्छरों को संरक्षित करने के लिए ही इस दिन को चुना गया होगा। तो मैंने भी इसके लिए कुछ इंतजामात करने की सोची पर नासमझ विरोधी पक्ष के कारण............... खैर छोड़िए !

वैसे शायद प्रभू की भी यही इच्छा है कि ये नन्हा सा जीव फले-फूले नहीं तो क्या 1953 से इसके उन्मूलन में लगी दुनिया सफल ना हो जाती ? फिर इसकी पूरी फैमिली भी तो हमारी शत्रु नहीं है; बेचारा नर तो फूलों का रस वगैरह पी कर ही गुजारा कर लेता है। रही मादा की बात तो हर नारी जो वंश वृद्धि करती है उसे तो पौष्टिक खुराक चाहिए ही सो वह जरा सा जीवों का खून ले उसकी पूर्ती करती है, तो इसमें बुराई क्या है ? वैसे इंसानों की एक कहावत, "नारी ना सोहे नारी के रूपा" की पूरी हिमायतन है, इसलिए वह महिलाओं का खून विशेष रूप से पसंद करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं के पसीने में एक विशेष गंध होती है, वही मादा मच्छरों को अपनी ओर आकर्षित करती है और इसके साथ ही लाल रंग या रोशनी भी इन्हें बहुत लुभाती है। 

सांप भले ही नाग देवता हो, उसकी बांबी में हाथ तो नहीं डालते। वैसे ही इनसे बच कर रहने की जरुरत है और इसका उपाय यही है कि खुद जागरूक रह कर अपनी सुरक्षा आप ही की जाए। क्योंकि ये महाशय "देखन में छोटे हैं पर घाव गंभीर करते हैं"।             

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