रविवार, 14 अगस्त 2022

स्वतंत्रता दिवस और लाल किला

ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी, पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में और डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था। देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया। इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोतोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

स्वतंत्र भारत की पहली सुबह की अगवानी ! सारा देश रात भर सो ना पाया था ! अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार देशवासी मौत का आलिंगन कर चुके थे ! आखिर उनकी शहादत रंग लाई थी ! सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से ! खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का... !

आजादी का जश्न 
दिल्ली तो जैसे पगला सी गई थी। होती भी क्यों ना, आजाद देश की राजधानी जो थी ! रात के अँधेरे में भी नाचते-गाते लोगों के हुजूम के हुजूम, ठट्ठ के ठट्ठ बढ़े चले जा रहे थे, लाल किले की ओर ! हवा में भी जैसे स्वतंत्रता की भीनी-भीनी सुगंध घुल गई थी !आज यह एतिहासिक किला भी फूला नहीं समा रहा था अपने भाग्य पर ! बहुत उतार- चढ़ाव देख रखे थे, इसने अपने जीवन काल में ! जबसे शाहजहां, ने उस जमाने में करीब एक करोड़ की लागत से इसे नौ सालों में बनवा कर पूरा किया था, तब से आज तक यह अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा है ! देश के प्रमुख किले के खिताब का गौरव  इसे ऐसे ही नहीं मिल गया ! 
जहां यह किला मुगलों की शानो-शौकत का गवाह रहा था, वहीं करीब दो सौ साल बाद, अंतिम मुग़ल बादशाह की दर्दनाक मौत का अभिसाक्षी भी इसे बनना पड़ा ! सन 1857 की क्रांति में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अंग्रेजों को मात दे कर यहीं बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट चुना था ! किला गवाह है, उस इतिहास का कि कैसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने मौत का तांडव शुरु कर दिया था ! हजारों निहत्थे, बेकसूर, मासूम लोग मौत के घात उतार दिए गए ! कितनों को फांसी पर लटका दिया गया ! सैंकडों को काला पानी नसीब हुआ ! बुढे, बीमार, मजलूम बादशाह को कैद कर रंगून भेज दिया गया ! कितनी मांगें सूनी हो गईं ! कितनी गोदें उजड़ गईं ! कितनी आँखों का पानी सूख गया था ! जिनका कोई हिसाब नहीं ! इंसान का वहशीपन जैसे सजीव हो उठा था ! 
ऐसा नहीं है कि इसके पहले या बाद में इस दुर्ग ने जुल्मों-सितम नहीं देखे ! सालों बाद एक बार फिर 1945 में ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी ! पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था ! प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में ! डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था ! देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया ! इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोत्तोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान, यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया था ! उसके बाद से आज तक देश का हर प्रधान मंत्री यहां से झंडा फहरा कर अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता है ! यह किला हमारी आन-बान-शान का प्रतीक बन, गर्व से सर उठाए खड़ा है !
आप सभी को, असंख्य विडंबनाओं के बावजूद, देश की आजादी की 75 वीं सालगिरह पर अनेकानेक शुभकामनाएं ! हमारा देश दुनिया का सिरमौर बने ! सभी देशवासी सदा सुरक्षित, सुखी, स्वस्थ व प्रसन्न रहें ! यही कामना है !

वंदे मातरम, जय हिंद  

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

श्रीराम वंशज बृहदबल ने कौरवों का साथ क्यों दिया

आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने, अधर्म पक्ष होते हुए भी, कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! ऐसी क्या मजबूरी या परिस्थिति थी कि युद्ध के सबसे निंदनीय, अनैतिक, अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा,,,,,,,,,,,!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे हिन्दू धर्म के मुख्यतम दो महान ग्रंथों में से एक महाभारत ! एक महान, अनुपम, धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक व दार्शनिक काव्य ग्रंथ ! जो विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ है ! जिसे आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय प्रेणना स्रोत माना जाता है ! इसी ग्रंथ में श्रीराम जी के बाद श्रीविष्णु जी के, विश्वप्रसिद्ध, जन-जन में लोकप्रिय, जन-नायक, सर्वगुणसम्पन्न, आठवें परमावतार श्रीकृष्ण जी की कथा भी आती है ! जिन्होंने धर्म की रक्षा हेतु उस समय पांडवों का साथ दिया था ! 
सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है
भारतवर्ष के प्राचीन काल की इस ऐतिहासिक कथा के द्रोणपर्व में कथा के एक महत्वपूर्ण पात्र वीर अभिमन्यु का जिक्र आता है जिन्हें चक्रव्यूह में घेर कर कौरवों द्वारा छल पूर्वक मार डाला गया था ! उस समय युद्ध में कौरव सेना प्रमुख जयद्रथ, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन, कर्ण, दु:शासनअश्वस्थामा जैसे सात महारथियों के अलावा, दुर्योधन, दू:शासन व शल्य के पुत्र, कर्ण के भाईयों सहित और भी बहुत से योद्धा मौजूद थे ! जिनमें से अधिकतर अभिमन्यु के हाथों मारे गए !

चक्रव्यूह 
उन्हीं कौरव-पक्षीय योद्धाओं में से एक था वृहद्वल या बृहदबल ! जिसको अभिमन्यु के तीक्ष्ण तीरों से वीर गति प्राप्त हुई थी ! आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने अधर्म पक्ष होते हुए भी कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! कोई तो कारण होगा जो विष्णुवतार श्रीराम जैसे मर्यादा पुरषोत्तम, धर्म-रक्षक, न्यायप्रिय, प्रजापालक, आदर्श शासक का वंशज होते हुए भी उसे कौरवों का साथ देना पड़ा ! इतना ही नहीं युद्ध के सबसे निंदनीय अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा ! उस समय ऐसा होने के लिए क्या परिस्थितियां थीं या क्या मजबूरियां थीं, यह पूर्णतया तो नहीं पता किया जा सकता, पर इतिहास खंगालने पर जो कुछ सामने आता है, उसी को कारण माना जा सकता है !  
महाभारत काल में तक आते-आते कोसल प्रदेश पांच भागों में विभक्त हो चुका था ! उस समय मध्य कोसल पर राम वंशज बृहदबल का शासन था, जिसकी राजधानी अयोध्या थी ! राजसूय यज्ञ की विजय यात्रा में भीम ने उसको पराजित किया था ! इस हार का क्षोभ भी पांडवों के विरुद्ध जाने का कारण हो सकता है ! तिस पर कुछ समय पश्चात कर्ण ने अपनी दिग्विजय प्रयाण के दौरान मध्य कोसल को अपने आधीन कर लिया था ! हो सकता है यह आधीनता भी एक कारण रहा हो, बृहद्बल को मजबूरीवश कौरवों का साथ देने का ! तीसरा कारण, जैसा कि ग्रंथों से पता चलता है कि पौराणिक काल में सेनानायक द्वारा योद्धाओं को उनकी योग्यता के अनुसार ही पद प्रदान किए जाते थे ! सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है ! जो भी हो युद्ध के तेहरवें दिन पद्मव्यूह द्वार पर अभिमन्यु से भीषण युद्ध के दौरान उसको वीर गति प्राप्त हुई थी ! 

मंगलवार, 19 जुलाई 2022

इंसानियत कभी खत्म नहीं होती

देश में अनगिनत लोग ऐसे हैं जो अपने दायरे में रह कर दूसरों की मदद करना चाहते हैं पर उन्हें समझ नहीं आता कि शुरुआत कैसे करें ! इसलिए शेकर जैसे परोपकारी नजरिया रखने वाले लोगों के उपक्रम का देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचना अति आवश्यक है ! जिससे और लोग भी अपने तरीके से समाज की सेवा कर सकें ! साथ ही उन पराजीवियों व मुफ्तखोरों को भी सबक मिल सके जो अपने जीवनयापन के लिए भी सदा दूसरों के मोहताज रहते हैं ! अपनी जिंदगी का बोझ समाज के कंधों पर लाद देते हैं ! खुद की अक्षमता का दोषारोपण भी सरकार  पर करते रहते हैं...........! 

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किसी की भलमनसाहत देख अक्सर सुनने में आता है कि इंसानियत अभी जिन्दा है ! पर सच्चाई तो यह है कि भलमनसी कभी खत्म नहीं होती ! इंसान पर चाहे कैसी भी मुसीबत आ जाए ! परिस्थितियां कितनी भी बिगड़ जाएं ! हताशा-निराशा चाहे कितना भी अँधेरा फैला लें, पर सुजनता या भलमनसत सदा उजास फैलाती रही है ! वह सदा इस दुनिया में बनी रही है और आगे भी बनी रहेगी ! इसके दसियों उदाहरण यदा-कदा सामने आते ही रहते हैं ! जो यह भी बताते हैं कि यदि इंसान में नेकी है, तो पता नहीं कौन सी घटना कब और कैसे उसकी जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल दे ! 

अभी पिछले दिनों दुनिया पर एक भीषण कहर टूटा था कोविड के रूप में ! ना कोई इलाज था, न कोई दवा ! सारी दुनिया में हाहाकार मच गया था ! छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, सक्षम-सर्वहारा सभी इस की चपेट में आ गए थे ! इंसान को संभलने में ही महीनों लग गए थे ! सब कुछ अस्त-व्यस्त हो कर रह गया था ! ऐसे में भी मानवता पीछे नहीं रही ! इस भारी विपदा में भी, बिना अपने हित की चिंता किए, सैंकड़ों लोग सामने आए बिना किसी अपेक्षा-लालच या चाहत के और जुट गए दूसरों को बचाने, उनकी सहायता करने, बावजूद इसके कि उन्हें खुद मदद या सहायता की सख्त जरुरत थी ! उदाहरण तो अनेक हैं पर आज उसकी बात जिसने खुद मुसीबत में रहते हुए, कुछ कर गुजरते हुए, एक लक्ष्य निर्धारित किया, लोगों को राह दिखाई !

शेकर पुवरासन, इलेक्ट्रानिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग का डिप्लोमा धारक ! अच्छी-खासी नौकरी ! पर कोविड के ज्वालामुखी में, हजारों लोगों की तरह इनकी आमदनी का जरिया भी भस्मीभूत हो कर रह गया ! बेरोजगारी का तनाव, घर पर बीमार पिता की चिंता, मुफलिसी का आलम, इन्हीं सब बातों से परेशान एक दिन सागर तट पर चहलकदमी करते हुए उन्हें चाय की दूकान पर बेहद दयनीय अवस्था में एक बुजुर्ग दिखाई पड़ा ! जिसे देख कर ही लगता था कि उसने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है ! शेकर की जेब में भी सिर्फ दस रूपए ही थे ! फिर भी उसने बुजुर्ग को चाय पिलवा दी ! चाय पीने के बाद बुजुर्ग की आँखों के संतोष और धन्यवाद के भाव शेकर के दिल में बस गए ! उसे लगा कि अगर किसी भी इंसान को खाने के लिए गिड़गिड़ाना या भीख मांगना पड़े तो ये बेहद शर्मनाक बात है ! उसने तय किया कि जहां तक संभव होगा वह भूखे लोगों की मदद करेगा ! हालांकि उसके खुद की आर्थिक स्थिति बेहद डांवाडोल थी ! पर जहां चाह होती है वहां कोई न कोई राह निकल ही आती है ! 

बड़ी मुश्किल और खींचतान कर कुछ पैसों का जुगाड़ कर तिंडीवनम पुड्डूचेरी हाईवे इलाके में सड़क के किनारे एक छोटे से ठेले, manithaneyam यानी इंसानियत, पर भोजन सामग्री का वितरण शुरू कर दिया ! आहार की कोई कीमत नहीं दर्शाई गई, उनके अनुसार जीवन प्रदान करने वाले अन्न की कोई कीमत नहीं हो सकती ! पर रोज तकरीबन 60-70 लोगों के भोजन की व्यवस्था में पैसा तो लगता ही है इसके लिए शेकर ने  पास ही एक बक्सा रखा है, जिस पर लिखा है, पे व्हॉट यू कैन (इच्छानुसार पैसे दीजिए) ! उनके अनुसार रोज का खर्च 1500 रूपए के लगभग होता है पर वापस तीन-चार सौ ही आते हैं ! इसकी भरपाई दोस्तों की और सोशल मीडिया से मिलने वाली मदद से हो जाती है ! उनका सपना अपने इस मॉडल को लोकप्रिय बना जरूरतमंदों की यथासंभव सहायता करने का है, जिससे किसी को भी किसी के सामने भोजन के लिए गिड़गिड़ाना ना पड़े !

हमारे देश में अनगिनत लोग ऐसे हैं जो अपने दायरे में रह कर दूसरों की मदद करना चाहते हैं पर उन्हें समझ नहीं आता कि शुरुआत कैसे करें ! इसलिए शेकर जैसे परोपकारी नजरिया रखने वाले लोगों के उपक्रम का देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचना अति आवश्यक है ! जिससे और लोग भी अपने तरीके से समाज की सेवा कर सकें ! साथ ही उन पराजीवियों व मुफ्तखोरों को भी सबक मिल सके जो अपने जीवनयापन के लिए भी सदा दूसरों के मोहताज रहते हैं ! अपनी जिंदगी का बोझ समाज के कंधों पर लाद देते हैं ! खुद की अक्षमता का दोषारोपण भी सरकार को देते रहते हैं !

सोमवार, 11 जुलाई 2022

सोशल मीडिया की रेशमी अंधियारे पक्ष वाली सुरंग

जाहिर है कि खतरा बहुत बड़ा है ! पर इससे बचाव का एक सीधा-सरल तरीका यह भी है कि हम किसी भी चीज पर अपना मत प्रगट करने में जल्दबाजी से बचें ! सामने आई खबर या जानकारी का धैर्य से मनन करें ! तत्काल प्रतिक्रिया ना दें ! उतावलेपन या हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया दे, बेवकूफ बनने या किसी के मंतव्य का शिकार होने से बेहतर है, कुछ देर से ही सही, सच जानना..........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

तमाम हिदायतों, निर्देशों, चेतावनियों, समझाईशों के बावजूद हम सोशल मीडिया की रेशमी अंधियारे पक्ष वाली सुरंग की अंतहीन गहराइयों में बिना अपने विवेक का सहारा लिए धंसते चले जा रहे हैं ! सम्मोहित अवस्था में हमें अच्छे-बुरे, सही-गलत का भान ही नहीं रह गया है ! उस पर मिली किसी भी उल-जलूल, चकित करने वाली खबर या बात को हम बिना जांचे-परखे आगे धकेलने को आतुर हो जाते हैं ! इसके पीछे एक भावना यह भी रहती है कि दोस्त-मित्र-लोगों में अपने जानकार होने की धाक जमे, जबकि ज्यादातर यह हमें अहमक और गैर जिम्मेदार ही साबित करती रही है !  

इन सब की शुरुआत छोटे से पैमाने से हुई थी ! बहुतों को याद होगा कि व्हाट्सएप पर फरवरी में एक मैसेज जंगल की आग की तरह फैला रहता था कि ऐसी फ़रवरी 800 या 1200 या ऐसे ही किसी लम्बे समय के बाद आ रही है, जिसमें सोम से लेकर रवि तक सारे दिन बराबर-बराबर एक ही अंक 4 वाले हैं ! इस अद्भुत योग के बारे में सभी को बताएं इत्यादि... इत्यादि ! अब हम इस बात से चमत्कृत हो बिना सोचे कि भई लीप ईयर को छोड़ हर फरवरी ऐसी ही होती है, दनादन अपने अंगूठों से अपनी विद्व्ता का ढिंढोरा पीटने लग जाते थे ! वैसे ही एक अहमकाना मैसेज में दावा किया जाता था कि स्क्रीन पर दिख रहे अंकों में से आपके द्वारा चयनित अंक, कुछ देर स्क्रीन पर दिख रही आँखों को देखने से गायब हो जाएगा ! अंक गायब होता भी था पर सिर्फ चयन किया हुआ नहीं, स्क्रीन पर पहले दिख रहे सारे के सारे अंकों के साथ ! मैसिजिआए सज्जन अभिभूत हो उसे आगे धकेलने में संलग्न हो जाते थे ! ऐसा ही कुछ कर एक ढोंगी लाल-हरी चटनी खिला कर महीनों लोगों को सामूहिक रूप से बेवकूफ बनाता रहा था ! यह तो एक बानगी भर है ! 

अब यह खेल बड़े पैमाने पर होने लगा है ! किसी का नाम क्या लेना पर कोई भी अपना हित साधने के लिए यहां कुछ भी चेप रहा है ! असामाजिक तत्वों का तो यह एक हथियार ही बन चुका है ! आम अवाम की लापरवाही, धैर्यहीनता, अज्ञानता, अधकचरी जानकारी का लाभ उठा अपना उल्लू सीधा करना आज का चलन बन गया है ! सुनने में आ रहा है कि जापान के पूर्व प्रधान मंत्री की हत्या करने वाला उनके बारे में फैली एक बेबुनियाद अफवाह के कारण उनसे नाराज हो गया था ! हमारे यहां होने वाले दंगे-फसादों-उपद्रवों-उत्पातों में भी ऐसे ही फैलाई गई आधी-अधूरी, सच्ची-झूठी, असली-नकली जानकारियों का बहुत बड़ा हाथ होता है !

अभी कुछ दिन पहले ही हर जगह बिहार के सहायक प्राध्यापक ललन कुमार के नाम के चर्चे हो रहे थे कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर अपनी तनख्वाह के 23 लाख 82 हजार 228 रूपए बिहार यूनिवर्सिटी को वापस कर दिए ! हर तरफ उनकी नैतिकता, दरियादिली, विवेकशीलता की तारीफ हो रही थी ! तभी असली सच्चाई सामने आई कि वह शख्स अपनी मनपसंद जगह पर तबादले के लिए नौटंकी कर रहा था ! 


 बहुत पहले जबकि कम्प्यूटर का नाम भी लोगों के लिए अनजान सा था, लेखक व चित्रकार ली फ़ाक ने अपने कॉमिक्स के किरदार जादूगर मैंड्रेक की मार्फ़त एक आशंका जताई थी, जिसमें कम्प्यूटर मनुष्यों को गुलाम बनाना आरंभ कर देता है ! वह कल्पना आज साकार होती नजर आती है ! बच्चे और युवा तो इसके चंगुल में तक़रीबन फंस ही चुके हैं ! यदि जल्द कोई कदम नहीं उठाया गया तो यह दुनिया की  प्रमुख मौलिक समस्याओं में अग्रणी होगा ! अब तो डाटा चुराने का नया अपराध भी विकराल रूप लेता जा रहा है ! जिससे लोगों के जान-माल-निजिता हर चीज खतरे में पड़ गई है !

जाहिर है कि खतरा बहुत बड़ा है ! पर सावधानी, सतर्कता, धैर्य बचाव भी है ! इससे बचाव का एक सीधा-सरल तरीका यह भी है कि हम किसी भी चीज पर अपना मत प्रगट करने में जल्दबाजी से बचें ! सामने आई खबर या जानकारी का धैर्य से मनन करें ! तत्काल प्रतिक्रिया ना दें ! उतावलेपन या हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया दे बेवकूफ बनने या किसी के मंतव्य का शिकार होने से बेहतर है कुछ देर से ही सही, सच जानना !  

बुधवार, 6 जुलाई 2022

विडंबना, हमारी........देश की

उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह जुमलों, आश्वासनों और दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों से ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे देश में कुछ लोग सदा से अनपढ़, अर्धशिक्षित, मूढ़ व भोले-भाले लोगों के अज्ञान और उनकी सरलता का लाभ उठा, उन्हें जाति-धर्म-वर्ण के मायाजाल में उलझा, वर्षों से अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। अपनी परिस्थितियों को अपनी नियति मान लेने वाले उनके पिछ्ल्गुओं को कभी यह ख्याल तक नहीं आता कि हमारा भला चाह-चाह कर "दुबले" होने वाले हमारे किसी एक नेता ने भी आज तक क़भी अपने बेटे या बेटी की शादी किसी सर्वहारा से कर उसके परिवार से नाता क्यों नहीं जोड़ा ?  क्यों किसी नेता की औलाद आज तक सेना में नहीं गई ? क्यों नहीं उनके परिवार किसी सदस्य को आम इंसान की तरह किसी नौकरी की तलाश में जूतियां घिसनी पड़तीं ? क्यों जरा सी छींक आने पर भी ये विदेश भागने लगते हैं ? क्यों इनकी संतानें, लायक ना भी हों तो भी, विदेशों में शिक्षा पाने पहुँच जाती हैं ? क्यों इनकी नस्लें देश को अपनी बपौती मान लेती हैं ? क्यों इनके शहजादे ही राजा बनने का हक पा जाते हैं ? क्यों तो बहुत सारे हैं पर धर्म, जाती, भाषा की अफीम में उनको ऐसा गाफिल कर दिया जाता है कि वह सामने वाले की तरक्की को ही अपनी सफलता समझने लगता है !     

उस एक वोट की शक्ति वाले को आश्वासनों के सुनहरे संसार में ऐसा दिग्भर्मित कर दिया जाता है कि वह कुछ देख-समझ ही नहीं पाता ! उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह अपने नेता के जुमलों, उसके आश्वासनों, उसके द्वारा दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों में ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है !   

ऐसा नहीं है कि किसी ने इनको समझाने की कोशिश नहीं की या ऐसा पहली बार लिखा जा रहा है ! कोशिशें तो बेशुमार हुईं, पर उनको नाकाम करने की पुरजोर कोशिश भी साथ-साथ हुई ! अपना दबदबा, अपनी सियासत, अपना रुआब, अपना राजपाट कौन छोड़ना चाहता है ! गाहे-बगाहे इस टकराव का भीषण परिणाम देश-समाज को झेलना पड़ता रहा है ! उधर जिनके हित के लिए प्रयास किए जाते हैं उन पर धर्म-भाषा-जाति की कॉकटेल का नशा इतना हावी है कि उनकी समझने-विचारने की क्षमता लुप्तप्राय हो गई है ! मदमत्त यही देख-सुन कर आह्लादित होता रहता है कि उसकी जाती-धर्म वाले की हैसियत राज करने वाली है !   

हर बार विभिन्न मंचों से घोषणाएं होती रहती हैं कि अशिक्षा का अंधकार दूर होना चाहिए, किया जाएगा ! पर ऐसा बोलने वाला भी कब चाहता है कि अँधेरा दूर हो ! क्योंकि तम हटते ही उसके खम जगजाहिर हो जाएंगे ! पर कोई भी चीज-समय-परिस्थिति स्थाई नहीं होती ! इसीलिए उस सुबह का आना भी तय है, जब अज्ञानता का अँधेरा छंटेगा, ज्ञान का सूरज सभी दिशाओं को आलोकित करेगा ! शायद थोड़ा सा और इंतजार करना पड़े पर बदलाव आना निश्चित है.......!

गुरुवार, 16 जून 2022

मैं ही क्यों..!

इंसान की फितरत है कि उसे कभी संतोष नहीं होता ! किसी ना किसी चीज की चाह हमेशा बनी ही रहती है ! पर एक सच्चाई यह भी है कि हम अपनी जिंदगी से भले ही खुश ना हों पर हजारों ऐसे लोग भी हैं, जो हमारी जैसी जिंदगी जीना चाहते हैं, वैसे जीवन की कामना करते हैं ! इसलिए जो है, उसी में संतुष्ट हो ऊपर वाले को धन्यवाद देना चाहिए.....!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

समय के साथ-साथ मनुष्य के जीवन में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव आते रहते हैं ! कभी ख़ुशी कभी गम, कभी ज्यादा कभी कम, कुछ ना कुछ घटता ही रहता है ! इंसान को सदा यही लगता है कि जो कुछ वह कर रहा है वह सही है ! अपने अनुचित कार्यों को भी सही ठहराने का तर्क वह खोज लेता है ! कभी-कभार अंतरात्मा के चेताने पर अपनी तसल्ली या अपराधबोध से उबरने के लिए, दान-पुण्य के नाम पर कुछ खर्च वगैरह भी करता है ! धर्मस्थलों का पर्यटन या दर्शन तो आम बात है ही ! पर यह सब सतही तौर पर ही होता है ! असल में वह कभी भी खुद को प्रभु के चरणों में पूरी तरह समर्पित नहीं करता ! उसके मन में एक अविश्वास, एक संदेह बना ही रहता है !  

ऐसे में यदि उस पर कोई विपत्ति आन पड़ती है या किसी बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ता है तो वह शिकायत स्वरूप अपने इष्ट की ओर मुखातिब हो यही पूछता है कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों ? क्योंकि उसे तो लगता है कि वह सदा नेक काम करता रहा है ! भगवान की पूजा-अर्चना, उनके दर्शन, दान-पुण्य-दक्षिणा भी भरपूर देता रहा है, फिर उसे दुःख-तकलीफ कैसे साल सकते हैं ? वो तो सदा सुख पाने का अधिकारी है !  

इसी संबंध में वर्षों पहले की एक बात फिर प्रासंगिक हो उठती है ! टेनिस के खेल के एक बहुत बड़े ख्यातनाम खिलाड़ी रहे है आर्थर ऐश ! 10, जुलाई, 1943 को अमेरिका मे जन्मे ऐश, अंतर्राष्ट्रीय टेनिस में सर्वोच्च स्तर पर खेलने वाले प्रथम अफ्रीकी अमेरिकन खिलाड़ी थे। उनके नाम 33 उपाधियाँ थीं, जिनमें एक-एक बार विम्बलडन, आस्ट्रेलियाई ओपन, अमेरिकी ओपन के साथ साथ दो बार की फ्रेंच ओपन भी शामिल हैं ! परंतु हृदय की दो बार तथा मस्तिष्क की एक बार शल्य चिकित्सा होने के बाद उन्होंने समय से पहले ही कोर्ट तो छोड़ दिया पर समाज को मानवाधिकार, जन स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े कार्यों में अपना योगदान देते रहे ! अपने इलाज के दौरान संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने के फलस्वरूप वे एचआईवी से संक्रमित हो गए थे ! इसका खुलासा अपने प्रशंसकों को उन्होंने खुद किया था !
बिमारी के दौरान उनके पास उनके चाहने वालों के अनगिनित पत्र आते थे ! ऐसे ही एक पत्र में उनके एक दुखी प्रशंसक ने लिखा था कि इस भयानक बिमारी के लिए भगवान ने आप को ही क्यों चुना ! उसके जवाब में ऐश ने जो लिखा वह उनके प्रति लोगों के आदर-सम्मान को और भी बढ़ा देने वाला था ! ऐश ने जवाब दिया, मेरे साथ ही करीब पांच करोड़ बच्चों ने टेनिस खेलना शुरू किया ! उनमें से करीब पचास लाख इस खेल को सीख पाए ! जिनमें से पांच लाख पेशेवर खिलाड़ी बन सके ! इनमें से पचास हजार इस खेल की प्रतियोगिताओं में नामजद हुए ! पांच हजार ग्रैंड स्लैम में पहुंचे ! 50 खिलाड़ी विम्बलडन में पहुंचे ! उसमें भी चार सेमी-फाइनल में आए ! फिर दो ने खेल के फाइनल में  जगह बनाई और फिर जब मैंने कप को हाथों में उठाया तब मैंने भगवान् से नहीं पूछा कि मैं ही क्यूँ ? तो अब जब मैं इस तकलीफ में हूँ तो मैं उनसे यह कैसे पूछ सकता हूँ कि मैं ही क्यूँ ?  
इस सारी बात का लब्बोलुआब यह है कि जब हम उस ऊपर वाले को अपनी खुशी का जिम्मेदार नहीं मान सारा श्रेय खुद ले लेते हैं तो दुःख में उसे उलाहना क्यों देना ! उसके द्वारा उत्पन्न की गईं तरह-तरह की परिस्थितियां, हालात हमें खुद को परखने, निखरने का मौका देते हैं ! इंसान की फितरत है कि उसे कभी संतोष नहीं होता ! किसी ना किसी चीज की चाह हमेशा बनी ही रहती है ! पर एक सच्चाई यह भी है कि आप अपनी जिंदगी से भले ही खुश ना हों पर हजारों ऐसे लोग भी हैं जो आप जैसी जिंदगी जीना चाहते हैं ! इसलिए जो है उसी में संतुष्ट हो ऊपर वाले को धन्यवाद दीजिए !
यह तो सभी जानते हैं कि यदि धन से ही खुशी मिलती तो हर अमीर सड़कों पर रोज नाच रहा होता ! पर यह खुशी गरीब के बच्चों के हिस्से आई है ! सबसे बड़ा धन संतोष है ! यह है तो सब कुछ है ! सो जो नहीं है उसका गम ना कर, जो है उसका नम्रता पूर्वक शुक्रिया अदा कर हमें खुद खुश रहनेऔर जहां तक हो सके औरों को भी खुश रखने का उपक्रम करना चाहिए ! शैलेन्द्र जी ने क्या खूब जीने की परिभाषा बताई है :-  

"किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, 

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.."

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 11 जून 2022

लगता है 'फिनिक्स' बन गया हूं

 शिकायत उससे भी नहीं करता ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ ! इंतजार करता हूं, अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास मेरे लिए ! लगता है "फीनिक्स' बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ, खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रोज सुबह उठता हूं, पिछला सब कुछ भुला, हताशा त्याग, कमर कस, जीवन संग्राम में कुछ कर गुजरने को ! एक नए जोश, दृढ विश्वास, नई चेतना के साथ !

पर जिंदगी भी कहाँ मानती है ! वह भी रोज की तरह मेरे इंतजार में तैनात रहती है, अपनी दसियों दुश्वारियाँ लिए, मुझे हताश-निराश-परास्त करने के लिए !
थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की
फिर शुरू हो जाती है, वही जंग ! वही जद्दोजहद, वही अगम्य कठिनाइयाँ ! वही विपरीत परिस्थितियां ! तुल जाती है, जिंदगी अपने हर दांव-पेंच, तरकश के हर तीर, हर पेंच-ओ-खम को आजमाने ! एक ही उद्देश्य मुझे किसी भी तरह झुकाने का !

थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की !

शिकायत उससे भी नहीं करता ! क्योंकि वह तो अन्तर्यामी है ! सर्वव्यापी है ! सर्वज्ञ है ! उसकी मर्जी के बगैर कहां कुछ भी होना संभव है ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ !

इसीलिए इंतजार करता हूं फिर अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास, एक नई आशा मेरे लिए ! स्थावर तो कुछ भी नहीं है...... समय भी नहीं ! लगता है फीनिक्स बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !!!

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