बुधवार, 25 नवंबर 2020

छँटना कोहरे का, भले देर से ही सही

बच्चों-किशोरों और युवाओं के लिए फ़िल्मी दुनिया के कर्मकार भगवान बन गए। उनकी नक़ल होने लगी ! उनकी बातें-मूल्य-हरकतें आदर्श बन गईं ! उनका प्रभामंडल कोमल-अर्धविकसित मस्तिष्क पर इतना हावी हो गया कि वे अपने आदर्श के विरुद्ध कुछ भी देखना-सुनना नापसंद करने लगे। यहां तक कि उनकी गलत, आपराधिक या समाज विरोधी हरकतों पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं होता था। ख़ासकर बच्चों और किशोरों द्वारा उनका नशा करना अदाकारी, फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाडी चढ़ा देना शौर्य या एक से अधिक रिश्ते बनाना उनकी जिंदादिली का प्रतीक माना जाने लगा. ......... !

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ दिनों पहले एक फ़िल्मी कलाकार की आत्महत्या की तहकीकात की खोज में तफ्तीश की रौशनी एक ऎसी सुरंग में जा पड़ी जहां फिल्म-टीवी से संबंधित नशेड़ियों-गंजेड़ियों की जमात डेरा डाले पड़ी थी ! ये वे लोग थे, जिनकी तरह बनने की चाहत कई युवक-युवतियों के दिलों में पनप रही है। कइयों के आदर्श हैं ये ! पर नशे के उपभोग और उसके व्यापार ने लोगों के सामने इन बड़े नाम वालों के खोटे कर्मों की पोल खोल कर रख दी। पर जैसा हमारे देश का चलन है कि यदि सौ आदमी किसी गलत काम की बुराई करते हैं तो दस उस गलत इंसान के पीछे भी आ खड़े होते हैं ! इन्हीं दस लोगों की शह पर गलत करने वाला अपना काम जारी  रखता है; बेहिचक, बेखौफ !  

यहां भी ऐसा ही होना था और हुआ ! जब अपनी लियाकत से ज्यादा फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों की बदौलत पहचान बनाने वाली एक तथाकथित कॉमेडियन और उसके पति को गांजा रखने के आरोप में जेल भेजा गया तो तरह-तरह की टिप्पणियों से सोशल मीडिया भर उठा ! कोई इसे किल्मों के बाद टीवी पर हस्तक्षेप की बात करने लगा, तो कोई साधू-संतों के गांजा पीने का उदाहरण देने लगा ! पर इस हमाम के किसी भी बिरादर ने खुल कर उनकी हरकत को गलत नहीं ठहराया ! गनीमत तो यह रही किसी ने शिव जी का उदाहरण दे इन्हें पाक-साफ़ कहने की जुर्रत नहीं की।   

अभिनेता-अभिनेत्रियों की छोटी-बड़ी खूबियों, अंतरंग रिश्तों, जायज-नाजायज संबंधों, वैभव व विलासितापूर्ण रहन-सहन को बढ़ा-चढ़ा कर अवाम के सामने रखा जाने लगा। कुछ लोगों ने पैसे के बल पर कुछ पत्रकारों को अपना पैरोकार बना उनको अपनी छवि को निखारने-सुधारने का काम सौंप दिया। जिन्होंने उन्हें तरह-तरह के उपनामों और विशेषणों से नवाज उन्हें नायक से महानायक बना प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया

यह तो सच्चाई है कि आजादी के एक चौथाई शतक के गुजरते-गुजरते देश के किशोर और युवाओं के आदर्श, नेताओं की बनिस्पत फ़िल्मी पर्दे-के नायक-नायिकाएं होने लग गए थे ! जिसमें फिर क्रिकेटर भी अपनी फ़िल्मी दुनिया से नजदीकियों के कारण जुड़ते चले गए ! इस मर्ज को मास-मीडिया और फिर सोशल मीडिया ने खूब पहचाना और इसका फायदा उठाने के लिए उनके लिए जगह बना ज्यादा तवज्जो देनी शुरू कर दी। अपना व्यापार बढ़ने के लिए इनसे जुडी खबरों को सनसनीखेज, चटपटा रूप दे परोसना शुरू कर दिया ! समाज उनकी दिखावटी बातों में आ उन्हीं के अनुरूप चलने की कोशिश करने लगा। 

इसी प्रचार के तहत अभिनेता-अभिनेत्रियों की छोटी-बड़ी खूबियों, अंतरंग रिश्तों, जायज-नाजायज संबंधों, वैभव व विलासितापूर्ण रहन-सहन को बढ़ा-चढ़ा कर अवाम के सामने रखा जाने लगा। लोगों की इस सब में गहरी रूचि देख कुछ लोगों ने पैसे के बल पर कुछ पत्रकारों को अपना पैरोकार बना उनको अपनी छवि को निखारने-सुधारने का काम सौंप दिया। जिन्होंने उन्हें तरह-तरह के उपनामों और विशेषणों से नवाज उन्हें नायक से महानायक बना प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। उनकी छोटी-बड़ी उपलब्धियों पर पन्ने पर पन्ने रंग डाले ! उनको किसी दूसरी दुनिया का वाशिंदा बना दिया ! भोले-भाले लोग उनकी बातों के जाल में फंसते चले गए ! उनकी गलत आदतों को ही सफलता की सीढ़ी माना जाने लगा ! 

इन सब बातों का बच्चों-किशोरों और युवाओं पर सबसे ज्यादा और जबरदस्त असर पड़ा ! फ़िल्मी दुनिया के कर्मकार उनके लिए भगवान बन गए। उनकी नक़ल होने लगी ! उनकी बातें-मूल्य-हरकतें आदर्श बनती चली गईं ! उनका प्रभामंडल कोमल-अर्धविकसित मस्तिष्क पर इतना हावी होता चला गया कि वे अपने आदर्श के विरुद्ध कुछ भी देखना-सुनना नापसंद करने लगे। यहां तक कि उनकी गलत, आपराधिक या समाज विरोधी हरकतों पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं रहा। ख़ासकर बच्चों और किशोरों द्वारा उनका नशा करना अदाकारी, फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाडी चढ़ा देना शौर्य या एक से अधिक रिश्ते बनाना उनकी जिंदादिली का प्रतीक माना जाने लगा ! पर संसार में जो भी  चीज शुरू होती है उसका अंत भी तय होता है ! 

राहत की बात है कि जागरूकता बढ़ रही है ! समाज के अलग-अलग हिस्सों की बहुत सी तरह-तरह की सच्चाइयां अब सामने आने लगी हैं ! कई स्थानों पर पसरा कोहरा छंटने लगा है ! युवाओं का ध्यानअपने भविष्य पर है ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि मीडिया विश्लेषण कर खुद को ''संजय'' साबित करे ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि आवाज उठे उनके खिलाफ जो मुख्य दोषी हैं ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि उन काले कारनामियों के चेहरे से नकाब हटाई जाए जो समाज में जहर घोल रहे हैं ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि जड़ पर प्रहार किया जाए ना कि सिर्फ पत्तों को तराश कर निश्चिन्त हो लिया जाए ! क्या वक्त नहीं आ गया है कि नशे के जहर के छोटे-मोटे उपभोक्ताओं को पकड़ने के साथ-साथ उत्पादक को भी लम्बे हाथ लिया जाए ! वह खुला रहा तो उसको शिकार की क्या कमी पड़ेगी ! बिमारी गंभीर है ! लाइलाज हो जाए उससे पहले ही शल्य चिकित्सा की सख्त जरुरत है !   

सोमवार, 9 नवंबर 2020

इसलिए होता है मूल से अधिक ब्याज प्यारा

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो ...................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी इंसान के दादा-दादी बनने पर उनके अपने पोते-पोतियों से स्नेह-अनुराग को लेकर, ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत है कि ''मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।'' इसका कतई यह मतलब नहीं है कि उसे अपने बच्चों से लगाव नहीं होता ! पर काम का बोझ, पारिवारिक दायित्व व जिम्मेदारियां, जीवन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिशें, चाहते हुए भी, उसे इतना समय ही नहीं देतीं कि वह प्रभु-प्रदत्त इस नियामत के बढ़ने-फलने-फूलने का पूरा आनंद उठा सके। पर अपनी इस तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक दायित्वमुक्त हो चुका होता है। काफी कुछ हासिल कर चुका होता है ! पहले की तरह जीवन में आपाधापी नहीं रह जाती ! सो अफरात समय भी उपलब्ध रहता है। इसी से जब वह प्रभु की इस अद्भुत, अप्रतिम, सर्वोत्तम कृति को शिशु रूप में अठखेलियां करते देखता है, जो वह अपने समय में नहीं देख पाया थाा, तो वह अचंभित, मुग्ध व चित्रलिखित सा हो मोह में बंध कर रह जाता है। 

सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो 

कहा जाता है कि बच्चे प्रभु का रूप होते हैं ! पर प्रभु को भी इस धरा को, प्रकृति को, सृष्टि को बचाने के लिए कई युक्तियों तथा नाना प्रकार के हथकंडों का सहारा लेना पड़ा था ! पर निश्छल व मासूम शैशव, चाहे वह किसी भी प्रजाति का हो, छल-बल, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा सबसे परे होता है, इसीलिए वह सबसे अलग होता है, सर्वोपरि होता है। भगवान को तो फिर भी इंसान को चिंतामुक्त करने में कुछ समय लग जाता होगा, पर घर में कैसा भी वातावरण हो, तनाव हो, शिशु की एक किलकारी सबको उसी क्षण तनावमुक्त कर देती है। गोद में आते ही उसकी एक मुस्कान बड़े से बड़े अवसाद को तिरोहित करने की क्षमता रखती है। उसकी बाल सुलभ हरकतें, अठखेलियां, जिज्ञासु तथा बड़ों की नक़ल करने की प्रवृति, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी होती हैं। उसकी अपने आस-पास की चीजों से तालमेल बैठाने की सफल-असफल कोशिशें कठोर से कठोर चहरे पर भी मुस्कान की रेख खिंच देने में कामयाब रहती हैं। 

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो !   

मैं भी उसी श्रेणी से संबद्धित हूँ, इसीलिए यह कह पा रहा हूँ ! अपनी डेढ़ वर्ष की पौत्री की बाल चेष्टाओं, उसकी गतिविधियों, उसकी मासूमियत भरी हरकतें देख यह अहसास होता है कि जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कुछ खो दिया था ! किस नियामत से वंचित रह गया था ! उपलब्धियों की चाहत में कितना कुछ अनुपलब्ध रह गया था ! पर आज दिल की गहराइयों से प्रभु का शुक्रगुजार हूँ कि समय रहते उन्होंने मुझे इस दैवीय सुख से परिचित करवा दिया ! सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो ! पर इसके साथ ही कभी-कभी एक अजीब सी ,बेचैनी, एक अलग सा भाव, कुछ खो जाने का डर भी महसूसने लगता हूँ ! क्योंकि यह तुतलाती जुबां, डगमगाती चाल, अठखेलियां, मासूम हरकतें समय के चंगुल से कहाँ बच पाएंगी ! फिर वही पाठ्यक्रमों का बोझ, स्कूलों की थकान भरी बंदिशें, दुनियावी प्रतिस्पर्द्धा और ना जाने क्या-क्या हावी होती चले जाएंगे ! पर कुछ किया भी तो नहीं जा सकता जग की इस रीत के विपरीत...............!! 

जी तो करता है कि इसकी मासूमियत, निश्छलता, भोलापन यूँ ही बने रहें ! इसी तरह अपनी तोतली भाषा में हमसे बतियाती रहे ! इसी तरह सुबह डगमगाती हुई आ गोद में चढने की जिद करती रहे ! यूँ ही इसकी किलकारियों से घर गुंजायमान रहे ! पर समय.....! किसका वश चल पाया है उस पर ! इसीलिए कोशिश करता हूँ कि इन पलों को बाँध के रख लूँ ! या फिर जितना ज्यादा हो सके, समेटता ही चला जाऊं, समेटता ही चला जाऊं, और सहेज के रख लूँ दिलो-दिमाग के किसी बहुत ही सुरक्षित कोने में, धरोहर बना कर !    

बुधवार, 4 नवंबर 2020

करवा चौथ, सोच बदलने की जरुरत है

आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से  महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

करवाचौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का  एक महत्वपूर्ण त्यौहार।  जिसमें पत्नियां अपने  पति की  लंबी उम्र के लिए दिन भर  कठोर उपवास  रखती हैं। यह  खासकर उत्तर  भारत में  खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम का प्रतीक ! सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर आपस मनाया जाने वाला एक छोटा, प्यारा, मासूम सा उत्सव। 
व्रत से जुडे हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु,  सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है
इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। जिसकी कुछ कथाएं बहुत प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है। जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।
 
करवाचौथ के व्रत से जुडी कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी तरह-तरह के अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ ! इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा अपने आप को प्रगतिशील दिखाने के कुप्रयास में इसे पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दी जा रही है। 
आजकल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। 
वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।
आज एक तरफ हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। दूसरी तरफ "बाजार" उतारू है, इस जैसे मासूम से त्यौहारों को फैशन के रूप में ढालने को ! आस्था को खिलवाड का रूप दे दिया गया है। मिट्टी के बने कसोरों का स्थान मंहगी धातुओं ने ले लिया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह चाकलेट आ गया है। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गये। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गयी। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाती है, कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाज़ार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला है। पावन रूप को विकृत करने की शुरुआत हुई फिल्मों से जिसने रफ्तार पकडी टी.वी. सीरियलों के माध्यम से !
अब तो सोची समझी साजिश के तहत हमारी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों, उत्सव-त्योहारों, रस्मों-रिवाजों, परंपराओं सब पर इस गिद्ध रूपी बाज़ार को हावी करवाया जा रहा है ! समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें। उसमें छिपे गुणों, नसीहतों, उपदेशों को अपनाएं !

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

एक रेलवे स्टेशन, जो ग्रामीणों के चंदे से चलता है

स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

हमारे देश में जहां रेल में बिना टिकट यात्रा करने वालों और उनसे जुर्माना वसूला जाना एक आम बात है ! रेलवे की सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाने वालों की भी कोई कमी नहीं है ! वहीं बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि हमारे ही देश में एक ऐसा रेलवे स्टेशन भी है, जिसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वहां के ग्रामीण हर महीने चंदा जुटा कर 1500 रूपए का टिकट खरीदते हैं, जिससे कि रेलवे उस स्टेशन को बंद ना कर दे !

राजस्थान के बीकानेर और जोधपुर के बीच बसा है नागौर शहर। इसी शहर के डेगाना जिले का एक गांव जालसू ! शुरू से ही यह गांव फौजियों का रहा है ! इसके हर घर से एक व्यक्ति फौज में हैं। उनकी सुविधा के लिए सरकार ने 1976 में गांव को स्टेशन की सौगात दी। नाम दिया जालसू नानक हाल्ट। तब जोधपुर रेलवे विभाग ने वहां एक कुटिया बना कर ट्रेनों का ठहराव शुरू कर दिया। हालांकि इसे स्टेशन का दर्जा तो मिल गया था, परन्तु वर्षों तक फिर उसको और कोई ख़ास सुविधा नहीं मिली ! तब ग्रामीणों ने खुद ही, खुद की सहायता करने की ठानी और पंचायत मद से एक हॉल और बरामदे का निर्माण करवाया, साथ ही चंदा जुटाकर एक प्याऊ और फूलों का बगीचा भी तैयार करवा डाला ! वर्तमान में गांव के 160 से ज्यादा  जवान सेना, बीएसएफ, नेवी, एयरफोर्स और सीआरपीएफ में हैं। जबकि 200 से ज्यादा रिटायर्ड फौजी हैं।

पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती  

2005 में अचानक जोधपुर रीजन में कम आमदनी वाले स्टेशनों को बंद करने का फैसला किया गया ! जालसू का नाम भी उस सूचि में था, सो उसे भी बंद कर दिया गया ! स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा।  

सरहद पर लोहा लेने वाले यहां के जांबाज लोगों ने यह शर्त भी मंजूर कर ली। अब सवाल था पूंजी का ! पंचायत जुटी और उसके अनुसार सभी से चंदा ले इस समस्या को हल करने का निर्णय लिया गया ! सबने अपने मान-सम्मान और सुविधा बनाए रखने के लिए हर तरह का सहयोग किया ! देखते-देखते डेढ़ लाख रूपए एकत्रित हो गए। इस राशि को गांव में ब्याज पर दिया जाने लगा, जिससे हर महीने तीन हजार रूपए ब्याज रूप में मिलने लगे। उसी रकम से 1500 टिकटों की खरीदी होने लगी और उसी से बुकिंग संभालने वाले ग्रामीण को भी 15% मानदेय भुगतान किया जाने लगा। इस तरह यह देश का इकलौता रेलवे स्टेशन बन गया है जहां कोई रेलवे अधिकारी या कर्मचारी नहीं है, इसके बावजूद भी यहां 10 से ज्यादा ट्रेनें रुकती हैं। गांव के लोग ही टिकट काटते हैं और हर माह करीब 1500 टिकट खरीदते भी हैं। 

जालसू गांव के लोगों की अपने हक के लिए लड़ाई, कर्मठता, उनकी दृढ़ता के लिए तो जो भी कहा जाए कम है ! पर रेलवे वालों को क्या कहा जाए ! क्या जवानों से ज्यादा अहमियत कमाई की होनी चाहिए ! क्या लकीर के फकीर उन अफसरों को उन 160 जवानों का जरा भी ध्यान नहीं आया, जिनके अपने घर आने-जाने के जरिए पर वे मुश्किलात खड़ी करने जा रहे थे ! रेलवे में कार्यरत रहते हुए उन्हें जापानी रेल सेवा के उस निर्णय की भी खबर जरूर होगी जिसके तहत उसने जापान के एक छोटे से आइलैंड ''होकाइडो'' के दुर्गम और दूरस्थ गांव ''क्यूशिराताकी'' की स्कूल जाने वाली सिर्फ एक बालिका के लिए तब तक ट्रेन सेवा जारी रखी जब तक उसने स्कूल पास नहीं कर लिया। यहां तो देश के लिए मर-मिटने वाले सैंकड़ों जवानों की बात थी !

ऐसा भी नहीं है कि ग्रामीणों के योगदान और सहयोग से चलने वाले इस स्टेशन की बात ऊपर तक ना पहुंची हो ! इस बात का पता रेलवे को तो है ही, पीएमओ तक इसकी खबर है ! पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती। 

शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

एक गाँव, अफसरों वाला

यह तो सिर्फ एक गाँव की बात है ! पर कटु सत्य तो यह है कि हमारे देश के हर क्षेत्र में तरह-तरह के अनगिनत गौरव स्थल मौजूद हैं, जिन पर देशवासियों को नाज हो सकता है। पर उनमें से अधिकतर की जानकारी हमें नहीं है या देने की जरुरत ही नहीं समझी जाती ! शुरू से ही ऐसा रहा है ! लिखने-बताने वालों ने अपने पूर्वाग्रहों के चलते या फिर किसी दवाबवश, वही लिखा या बताया जितना उनसे कहा गया ! आज जब जागरूकता और सहूलियतें बढ़ी, तो ऐसी-ऐसी धरोहरें सामने आने लगीं कि हम किंकर्त्वयविमूढ़ रह गए...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आम धारणा है कि शहरों में पले युवा, सुविधासम्पन्न होने के कारण, गाँव-देहात के अपने समवयस्कों से ज्यादा होनहार, होशियारऔर समझदार होते हैं। हालांकि यह बात बहुतेरी बार झुठलाई जा चुकी है पर सोच का क्या किया जा सकता है ! हमारे संचार माध्यमों, मुद्रित, श्रव्य या दृश्य-श्रव्य कोई भी हो, उनको सनसनीखेज ख़बरों से ही फुरसत नहीं मिलती जो ऐसी गलत धारणाओं को झुठलाती सच्चाइयों को सारे देशवासियों के सामने लाएं  ! 

इसी सोच को दरकिनार करती हमारे देश में एक ऐसी जगह है जिसका सानी शायद ही कोई और स्थान हो ! एक ऐसा गाँव जिसके हर दूसरे घर का होनहार युवा आईएएस, आईपीएस या अन्य किसी उच्च सरकारी पद पर आसीन है। इस गाँव की हवा-पानी-माटी में ही ऐसी कोई बात है जिसने एक के बाद एक सैकड़ों युवाओं को देश के उच्च पदों तक पहुंचाया। तभी तो इस का नाम अफसरों वाला गाँव के रूप में ख्यात हो गया। 

इंटरमीडिएट कॉलेज, जिसका परीक्षा परिणाम हर वर्ष 90 प्रतिशत रहता है, से उत्तीर्ण अनगिनत प्रतिभावान छात्र आज पुलिस, प्रशासनिक तथा चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत हैं। कुछ दिनों पहले ही गाँव से एक साथ 11 लड़कों का चयन सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ था

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद डिवीज़न के प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 24 किमी दूर दो नदियों, सई और लोनी, के बीच बसे इस गाँव का नाम बहुचरा है। दिखने में मोटे तौर पर यह भी प्रदेश के दूसरे गाँवों जैसा ही एक आम सा गाँव है, पर जो बात इसे दूसरों से अलग करती है वह है यहां की उपज ! यहां खेती तो नाम मात्र की होती है, पर होनहार बच्चों के लिए इस गाँव की जमीन खूब उपजाऊ है। 

यहां के लोग बताते हैं कि ''1919 में हमारे गाँव से 25 जवान ब्रिटिश सरकार की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने गए थे। उनके लौटने पर जब सरकार की तरफ से उन्हें इनाम देने की बात आई तो उन्होंने इनाम के बदले गाँव में एक स्कूल खोलने की दरख्वास्त कर दी ! उनकी बात मान ली गई और इस तरह गाँव को एक स्कूल मिल गया। पर लोगों को पढ़ाई में ज्यादा रूचि नहीं थी ! लोग बच्चों को पढ़ने भेजने से कतराते थे। पर हमारे पूर्वजों को शिक्षा की महत्ता मालुम थी सो गाँव में ये नियम बनाया गया कि पांच साल का होते ही बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाना पडेगा ! नहीं तो  भारी जुर्माना देना होगा ! उसी कारण आज यहां की साक्षारता दर, प्रदेश की 67.68% के मुकाबले तकरीबन 82% है। पर उसी जबरदस्ती के कारण विद्यालय का नाम जबरिया अनिवार्य प्राथमिक विद्यालय भी पड़ गया। 

जबरिया अनिवार्य प्राथमिक विद्यालय  
वर्ष 1969 से स्थापित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज, जिसका परीक्षा परिणाम हर वर्ष 90 प्रतिशत रहता है, से उत्तीर्ण अनगिनत प्रतिभावान छात्र आज पुलिस, प्रशासनिक तथा चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत हैं।कुछ दिनों पहले ही गाँव से एक साथ 11 लड़कों का चयन सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ था। इसके पहले भी कई इंस्पेक्टर इस गाँव से चयनित हो चुके हैं तथा कई पुरुस्कारों से नवाजे जा चुके हैं।

यह तो सिर्फ एक गांव की बात है ! पर कटु सत्य तो यह है कि हमारे देश के हर क्षेत्र में तरह-तरह के अनगिनत गौरव स्थल मौजूद हैं, जिन पर देशवासियों को नाज हो सकता है। पर उनमें से अधिकतर की जानकारी हमें नहीं है या देने की जरुरत ही नहीं समझी जाती ! शुरू से ही ऐसा रहा है ! लिखने-बताने वालों ने अपने पूर्वाग्रहों चलते या फिर किसी दवाब वश वही लिखा या बताया जितना उनसे कहा गया ! आज जब जागरूकता और सहूलियतें बढ़ी तो ऐसी-ऐसी धरोहरें सामने आने लगीं कि हम खुद ही किंकर्त्वयविमूढ़ रह गए। 

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

भारत रत्न !...ताकि अहमियत बनी रहे

जिस तरह किसी भी रत्न को दाग, जाल, रेखा या किसी भी अशुद्धि से परे जा कर ही अनमोल माना जाता है, नहीं तो उसका मोल कम हो जाता है, ठीक उसी तरह चयनित होने जा रहे भारत रत्न का भी हर तरह की कसौटी पर खरा उतरना लाजिमी होना चाहिए ! पर आज के माहौल में, राजनीतिक तुष्टिकरण में, जाति -बिरादरी में साख की खातिर, हैसियत जताने के लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए या अपनी महत्वकाक्षों के चलते, कोई भी अपनी पसंद के किसी के नाम को भी इस सम्मान हेतु प्रस्तावित करता नजर आने लगा है............!

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भारत रत्नभारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में की गई थी। इसके लिए चयनित व्यक्ति विशेष का चयन ज्यादातर सर्वमान्य रहा, पर कुछेक बार अनुत्तरित प्रश्न भी खड़े हुए, इसकी चयनित शख्सियत को ले कर ! इधर भी एक चलन कुछ ज्यादा ही देखने में आने लगा है, कोई भी अपनी जाति-बिरादरी, धर्म-पंथ के नेता के लिए इसकी मांग उठाने लग पड़ा है ! यदि इसकी रेवड़ी बंटने लगी तो फिर भविष्य में इसकी महत्ता का सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है !  

रत्न, प्रकृति प्रदत्त एक मूल्यवान निधि है। यह आकर्षक, चिरस्थायीव, दुर्लभ तथा अपने गुणों की खातिर अनमोल बन जाता है। जब कुछ तत्व जटिल परिस्थियों में, विपरीत वातावरण में, विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा आपस में मिलते हैं तब जा कर इसका निर्माण होता है। इसीलिए इसमें कई अद्भुत गुणों का समावेश भी हो जाता है। इन पर ऋतुओं के परिवर्तन, मौसम का प्रभाव या प्रकृति की भीषण उथल-पुथल का कभी असर नहीं पड़ता। 

इन्हीं  सब गुणों को देखते हुए सर्वोच्च नागरिक सम्मान के नामकरण के लिए इसके स्वप्नकारों के दिमाग में ''रत्न'' नाम आया होगा। यानी एक ऐसा इंसान जो देश से जुड़ा हुआ हो ! जो मन-कर्म-वचन से देश और देशवासियों के उत्थान के लिए समर्पित हो ! समय के थपेड़े, विपरीत परिस्थियां, जटिल समस्याएं भी उसे विचलित या पथ-भ्रष्ट ना कर पाती हों ! संयम, विनम्रता, समर्पण, लगन, जिजीविषा, परोपकारिता, निरपेक्षिता जैसे गुण उसमें चिरस्थाई हों। जैसे  रत्न आभूषणों के रूप में शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, साथ ही अपनी दैवीय शक्ति के प्रभाव के कारण रोगों का निवारण भी करते हैं; उसी तरह इस सम्मान को पाने वाले के गुण भी देश की शोभा में इजाफा करने वाले और उसकी कर्मठता, अवाम के हालात को सुधारने और उसकी मुश्किलों का हल निकालने में सक्षम होनी चाहिए । एक ऐसा इंसान जिसकी मिसाल दी सके ! जो सर्वोपरि हो, अपने समय में ! 

इसके समकक्ष एक और अलंकरण बना दिया जाए और उसका नाम भारत भूषण रख दिया जाए ! अब भूषण यानी गहने वगैरह को टिकाऊ बनाने के लिए उसमें कुछ खोट मिलाने की छूट और मान्यता तो है ही 

जिस तरह किसी भी रत्न को दाग, जाल, रेखा या किसी भी अशुद्धि से परे जा कर ही अनमोल माना जाता है, नहीं तो उसका मोल कम हो जाता है, ठीक उसी तरह चयनित होने जा रहे भारत रत्न का भी हर तरह की कसौटी पर खरा उतरना लाजिमी होना चाहिए ! पर आज के माहौल में, राजनीतिक तुष्टिकरण में, जाति-बिरादरी में साख की खातिर, हैसियत जताने के लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए या अपनी महत्वकाक्षों के चलते, कोई भी अपनी पसंद के किसी के नाम को भी इस सम्मान हेतु प्रस्तावित करता नजर आने लगा है। 

अब ना तो पहले जैसे लोग रहे ना हीं ऊसूल ! ऐसे में याद आती है, भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री श्री अबुल कलाम आज़ाद की ! जब उनको भारत रत्न देने की बात आई तो उन्होंने खुद जोर देकर मना कर दिया, क्योंकि वे खुद इसकी चयन समिति के सदस्य थे ! हालांकि बाद में मरणोंपरांत 1992 में उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया ! आज तो खुद ही अपना नाम प्रस्तावित करवाया जाने लगा है ! आज जरुरत है पद्म पुरुस्कारों जैसी अवनति से इसे बचाए रखने की। 

वैसे इसकी मर्यादा को बचाए रखने के लिए एक विकल्प निकाला जा सकता है ! इसके समकक्ष एक और अलंकरण बना दिया जाए और उसका नाम भारत भूषण रख दिया जाए ! अब भूषण यानी गहने वगैरह को टिकाऊ बनाने के लिए उसमें कुछ खोट मिलाने की छूट और मान्यता तो है ही ! इससे देने-लेने में आने वाली हर तरह की मुश्किल और किसी धर्म संकट से बचने से छुटकारा पाया जा सकेगा ! तू भी खुश, मैं भी खुश ! 

शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

''ट्राम रेस्त्रां'', कोलकाता का

इस परिवहन सेवा के साथ कोलकाता वासियों  का एक ऐसा अटूट भावनात्मक संबंध कायम हो गया, एक ऐसा रिश्ता बन गया कि इस पर लोग चढ़ें ना चढ़ें पर इसके बिना वे अपने शहर की कल्पना भी नहीं कर सकते ! इसीलिए उसे बचाने, उसे लोकप्रिय बनाने व दीर्घजीवी बनाने हेतु एक प्रयोग के तहत एक ट्राम को रंग-रोगन और चित्रकारी से सजा कर उसका एक नया  अवतार गढा गया ! ट्यूरिस्टों की जरूरतों को मद्दे नजर रख उसे पूरी तरह वातानुकूलित कर बायो टॉयलेट तथा म्यूजिक सिस्टम से युक्त कर उसे एक आधुनिक रेस्त्रां का रूप दे दिया गया................!

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हमारा बंगाल ! पहले ऐसा कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है, वो पूरा भारत कल सोचता है ! वह राज्य जो देश में सर्वाधिक उपलब्धियों में पहला स्थान रखता है ! पहला महानगर, पहला अखबार, पहला विश्वविद्यालय, पहला नोबेल, पहला ऑस्कर, पहली मेट्रो, पहला प्लैनेटेरियम, पहला फ्लोटिंग मार्किट, पहली अंडरवाटर ट्रेन ! पहला ! पहला !! पहला !!! इसी गौरवमयी परंपरा में यहां के निवासियों ने एक और अनोखी पहल की है ! वह है कोलकाता का ''ट्राम रेस्त्रां'' !   


ट्राम ! अश्व चालित से विद्युत सरीसृप का रूप धर, अभी भी अस्तित्व में बने रहते हुए यह करीब डेढ़ सौ वर्षों से देश में घटित हुए विभिन्न घटनाक्रमों की चश्मदीद गवाह है ! इसीलिए 1902 में शुरू हुई इस परिवहन सेवा के साथ यहां के निवासियों का एक ऐसा अटूट भावनात्मक संबंध कायम हो गया, एक ऐसा रिश्ता बन गया कि इस पर लोग चढ़ें ना चढ़ें पर इसके बिना वे अपने शहर की कल्पना भी नहीं कर सकते ! भले ही इसे अपनी पटरियों पर धीमी गति और यातायात में बाधा आने के कारण बहुतेरी बार आलोचना का शिकार भी होना पड़ता रहा हो, पर स्थानीय निवासियों के प्रेम और उनकी  भावनाओं के कारण कलकत्ता में इसके वजूद को बरकरार रखा गया ! हालांकि इसके परिवहन पथ को बहुत सिमित कर दिया गया ! जहां साठ-सत्तर के दशक में ट्राम 52 रूटों पर चल करीब 70-75 की. मी. का दायरा पूरा करती थी वह अब पांच रूटों के 17-18 की मी के दायरे में सिमट कर रह गई है।  परंतु ''हेरिटेज'' में शामिल इस वाहन को बचाने, इसकी लोकप्रियता को बढ़ाने और कुछ कमाई का साधन जुटाने के लिए CTC (Calcutta Tramways Company) और इसके चाहने वालों ने एक प्रयोग के तहत, इसे चलित रेस्त्रां में बदलने की सोची ! 
 

इसी प्रयोग के तहत एक ट्राम को रंग-रोगन और चित्रकारी से सजा कर एक नया रूप दिया गया ! ट्यूरिस्टों की जरूरतों को मद्दे नजर रख उसे पूरी तरह वातानुकूलित कर बायो टॉयलेट तथा म्यूजिक सिस्टम से युक्त किया गया। इस पर करीब दस लाख रुपयों का खर्च आया।  खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में कोई बाधा ना खड़ी हो, इसलिए खाद्य पदार्थ बनाने वाली कई ब्रांडेड कंपनियों को साथ लिया गया। CTC ने विक्टोरिया ग्रुप को इसका जिम्मा देते हुए उनसे दस साल का अनुबंध किया, जिसके तहत ग्रुप, CTC को हर महीने डेढ़ लाख से कुछ ज्यादा राशि का भुगतान करता है। इस ट्राम रेस्त्रां में एस्पलेनेड से खिदिरपुर जाने-आने की डेढ़ घंटे की यात्रा में 799/- और 999/- की दर पर निरामिष और आमिष दोनों तरह का भोजन उपलब्ध कराया जाता है। जिसमें कई तरह के भिन्न-भिन्न पेय, स्टार्टर, मुख्य भोजन और डेजर्ट वगैरह शामिल होते हैं।

ऐसी पहली सेवा 14 अक्टूबर 2018 में एस्प्लेनेड के ऐतिहासिक शहीद मीनार से खिदिरपुर तक के लिए शुरू की गई ! यही वह रूट है जिस पर 27 मार्च 1902 में पहली विद्युत चलित ट्राम चलाई गई थी। उसी मार्ग पर जहां पुराने महानगर का एकमात्र हरित स्थल ''मैदान'', जो वर्षों-वर्ष से यहां के वाशिंदों को प्राणवायु प्रदान करता आ रहा है, के बीचो-बीच चलती, अद्भुत इमारत विक्टोरिया मेमोरियल के दर्शन कराती, रेस कोर्स के बगल से गुजरती हुई अपने गंतव्य, खिदिरपुर की ओर बढ़ती इस नई, अनोखी सवारी को ''विक्टोरिया ऑन व्हील 18'' नाम दिया गया है। फिलहाल इसके चार ट्रिप निश्चित किए गए हैं, दो सुबह लंच के समय और दो शाम डिनर के वक्त ! इस चलित रेस्त्रां में 27 मेहमानों के स्वागत की व्यवस्था है। इसके लिए 24 घंटे पहले आरक्षण करवाना जरुरी है।यात्रा के दौरान इस पर कोई भी आधिकारिक यात्री कहीं से भी चढ़-उतर सकता है।

महलों के शहर कोलकाता को, विभिन्न खाद्यों के विविध स्वादों के रसास्वादन के साथ, धीरे-धीरे चलते हुए देखने, समझने, यादों  समेटने का, कुछ अलग सा, अवर्चनीय सुख तो यात्रा कर के ही प्राप्त किया जा सकता है। सो इस कोरोना संकट से उबर कर जब भी अगली बार कोलकाता जाना हो तो एक दिन के कुछ घंटे अपनी चहेती ट्राम के काया-कल्पित रूप को समर्पित जरूर हों।     

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