रविवार, 22 मार्च 2026

जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)

माडूं के मंदिर का यह शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं...........!!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मांडू या मांडवगढ़ अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध, एक प्राचीन नगर है। यह मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्र में, धार शहर से 35 किमी और इंदौर से लगभग 100 किमी की दूरी पर एक चट्टानी इलाके में बसा हुआ है। इसकी ज्यादातर ख्याति बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंगों और उससे जुड़े प्राचीन भवनों के कारण जानी जाती है ! इसी मांडू नगरी की सुंदर वादियों में, मांडू बस अड्डे से करीब पांच किमी और मांडू रोड से तीन किमी की दूरी पर भगवान शिव का एक प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है ! सड़क से कुछ ही दूर, पत्थरों से निर्मित करीब सत्तर सीढ़ियां उतरने के बाद गहरी खाई के साथ एक आंगन के चबूतरे पर मुगल शैली की इमारत में यह मंदिर बना हुआ है ! 

नीलकंठेश्वर 


इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !

चबूतरे पर निर्माण 
सीढ़ियां 
श्रमसाध्य 

मुद्र-मंथन के बाद शिवजी ने हलाहल को अपने गले में धारण किया और वे नीलकंठ कहलाए ! भोलेनाथ ने हलाहल विष की ज्वाला को शांत करने के लिए जिस-जिस जगह पर धूनी रमाई, वही जगह नीलकंठेश्वर के नाम से विख्यात हो गई ! उस कथा से मांडू की पावन जगह का नाम जुड़ा है, तो जाहिर है कि वर्तमान शिवलिंग की स्थापना बहुत पहले हो चुकी होगी ! कुछ लोगों का मानना भी है और वे दबे स्वर में बताते भी हैं कि वर्तमान निर्माण भगवान शिव के पुराने मंदिर पर ही बना है ! जिम्मेदार लोगों, पुरातत्ववेताओं और संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि यहां के इतिहास को खंगाल कर यहां की सच्चाई सामने लाई जाए ! 

दुर्गमता 

दीवाल पर खुदी आयतें 

दरवाजे के ऊपर लिखा संदेश 

नश्रुति कहती है कि नीलकंठ महल को मांडू के मुगल गवर्नर शाह बदगाह ने 1574 AD में अकबर की प्रिय मुगल महारानी मरियम-उज-ज़मानी के लिए बनवाया था, जिसे आम बोलचाल में जोधाबाई के नाम से जाना जाता है। शाही मुगल कागजों में इस महल का नाम इमारत-ए-दिलखुशा लिखा मिलता है। पर यह स्थान आज भी सुनसान और कुछ-कुछ निर्जन ही है। उस समय तो और भी दुर्गम रहा होगा ! उस पर यहां की उबड़-खाबड़ पत्थर की सीढ़ियों से उतर कर पहुंचना भी आसान नहीं है, खासकर महिलाओं के लिए, भले ही वह पालकी में आएं ! इसलिए यह जगह महल कम शिकारगाह ज्यादा लगती है !

नमस्कार 

यहां आ कर ऐसा अनुमान और आभास होता है कि पहले यह महल भगवान शिव के पुराने मंदिर के पास बनाया गया होगा, जिसके खंडहर अभी भी मौजूद हैं, फिर किसी सूबेदार ने आदतानुसार अपने आका को खुश करने के लिए शिवलिंग को घेर कर उस पर भी इमारत खड़ी कर दी होगी ! ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं ! 

गर्भगृह 
                                       

जैसा कि भ्रम फैलाया गया है कि यह मंदिर किसी मुगल रानी के लिए बनवाया गया है। तो यदि श्रद्धा से मंदिर बनवाया जाएगा तो उस पर कलश की स्थापना होनी चाहिए, जो यहां नहीं है ! सोचने की बात है यदि कोई मंदिर, चर्च या मस्जिद बनवाएगा तो उसी के वास्तुनुसार निर्माण होगा ! चर्च और मस्जिद पर कलश नहीं बनवा दिया जाएगा ना हीं घंटे-घड़ियाल लटका दिए जाएंगे ! तो यदि मंदिर बनवाना था तो इस मंदिर का दरवाजा मस्जिदनुमा क्यों है ? दरवाजे के ऊपर के हिस्से में और बगल की दीवारों पर आयतें क्यों कुरेदी गई हैं ? पुरातत्व विभाग ने भी एक आधा-अधूरा सा शिलालेख लगा अपने कर्तव्य की खानापूर्ति कर दी है, कौन झंझट मोल ले ! 

पुरातत्व विभाग का शिलालेख 
मंदिर के गर्भगृह में शिव लिंग के पीछे से कुदरती झरने का पानी बहता रहता है और मंदिर के सामने एक टैंक में इकट्ठा होता है। पास के एक कमरे में भी शिव परिवार स्थापित है ! आंगन के बीच में एक कुंड है, जिसका पानी उसके किनारे बनी एक पानी की भूलभुलैया से गुजरता है ! मान्यता है कि कोई यदि उसमें एक पत्ता रख दे और वह पत्ता भूलभुलैया से बाहर निकल जाए,  तो उस व्यक्ति की इच्छा पूर्ण हो जाती है ! 

भूलभुलैया सी संरचना 
श्रद्धा-भक्ति-आस्था से ओतप्रोत जब कोई श्रद्धालु, अपने मन में एक शिव मंदिर की तस्वीर की कल्पना लिए यहां पहुंचता है तो अपनी सोच के ठीक विपरीत यहां मुगलिया निर्माण के अंदर स्थित शिवलिंग को देखता है तो स्तब्ध, परेशान और हैरान हो कर रह जाता है और बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हो जाता है !

मंगलवार, 10 मार्च 2026

क्रिकेट कंमेट्री भोजपुरी में, जिया हो बिहार के लाला 😍

भोजपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें..........!

#हिन्दी-ब्लॉगिंग 

क्रि केट ! 1877 में शुरू हुए इस अजीबोगरीब नाम वाले खेल को आँखों देखा हाल मिलने करीब पचास साल लग गए ! वह ऐतिहासिक दिन था 14 मई 1927 का ! इंग्लैंड के एक क्रिकेट खिलाड़ी कम चर्च के पादरी  फ़्रैंकगिलिंगहैम से इंग्लैण्ड के लेटन शहर में चल रहे न्यूजीलैंड और मेजबान एसेक्स काउंटी के बीच चल रहे क्रिकेट मैच की कमेंट्री करने को कहा गया ! कारण यह महाशय एक लोकप्रिय वक्ता थे और उनका सेन्स ऑफ ह्यूमर शानदार था ! जब वे अपना भावहीन चेहरा लेकर प्रवचन करते थे तो सुननेवाले लोटपोट हो जाते थे। बीबीसी पर यह पहली क्रिकेट कमेंट्री थी जो चार किस्तों में आधे घंटे के लिए प्रसारित हुई ! कुछ लोगों ने इसका काफी मजाक बनाते हुए इसका काफी मजाक बनाते हुए शतरंज और बिलियर्ड्स की कमेंट्री शुरू करने की बात भी कह दी। 

शुरुआत हुई 

जो भी हो यहां से शुरू हुई क्रिकेट कंमेंट्री ने एक बहुत लंबा सफर तय किया है ! साठ के दशक के हमारे श्रोताओं को टेस्ट मैचों के दौरान उसका ब्यौरा देने वाले विवरण प्रसारकों, सुरेश सरैया, आनंद सीतलवाड़, ए.एफ.एस. तल्यारखान, पियर्सन सुरिटा, विजी, सुभाष मशरूवाला, नरोत्तम पुरी  जैसे नाम भूले नहीं होंगे ! फिर धीरे से यहां प्रवेश हुआ हिंदी का ! इसको लोकप्रिय बनाने में सुशील दोषी और जसदेव सिंह जी को पूरा श्रेय जाता है ! 

आवाज के जादूगर 
स समय रेडिओ पर सुनाया जाने वाला आँखों देखा हाल अलग तरीके का था ! प्रस्तोता को खेल के साथ-साथ ही मैदान पर चल रही एक-एक बात बतानी पड़ती थी, धन्य थे वे लोग, जो सुनने वालों को एक तरह से अपने साथ मैदान में ले आते थे ! समय बदला टी.वी. की सहायता से श्रोता दर्शक बन गए ! अब कथा वाचकों को अपना ढंग बदलना पड़ा, क्योंकि जो वहां हो रहा है, वह सभी देख पा रहे हैं, इसलिए कमेंटेटर को, अपने प्रस्तुतिकरण में इतिहास, कीर्तिमान, हल्की-फुल्की बातें, व्यंग्य जैसी और बहुत कुछ अन्य विषयों का समावेश करना पड़ता है !

मैदान का विकल्प 

इनकी बिक्री बढ़ जाती थी 
स खेल की शुरुआत से अब तक, करोड़ों रन, लाखों चौके, हजारों छक्के लग चुके हैं ! तीन-तीन स्वरूप आ चुके हैं ! नियम-कायदों-पोशाकों, खेलने के समय, तरीकों, उसके उपकरणों, सब में अभूतपूर्व बदलाव आ गए हैं ! तो जाहिर है कमेंट्री में भी कुछ नयापन आना ही था ! हिंदी और बंगला भाषा में तो तकरीबन पचास के दशक में ही शुरुआत हो चुकी थी। पर खेल की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता ने इसका आँखों देखा हाल क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध करवा दिया !

आँखों देखा हाल 
भी हाल में ही क्रिकेट के T-20 विश्व कप की कीर्तिमान जीत के साथ ही दर्शकों-श्रोताओं को एक नया अनुभव देते हुए, देश की सात भाषाओं में इस खेल का विवरण सुनने को मिला ! पर जहां अन्य पांच भाषाओं के वक्ता एक चले आ रहे दायरे में ही बात करते थे, जहां गंभीरता कुछ ज्यादा होती है, वहीं हरियाणवी और भोजपुरी ने एक सुखद बयार की तरह इस माध्यम को अपने चुटीले अंदाज में एक नया आयाम दे और भी मनोरंजक बना दिया ! 
रवि किशन 
भो जपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया, जिसे प्रस्तुत किया भोजपुरी सिनेमा और भाजपा के सांसद रवि किशन के साथ सौरभ यानी रोबिन सिंह, रवि किशन, शिवम सिंह, सत्य प्रकाश, गुलाम अली, मोहम्मद सैफ ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। भोजपुरी में कहें तो इसमें सौरभ सिंह ने गर्दा उड़ा कर रख दिया है ! इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें !
सौरभ सिंह 
भो जपुरी व हरियाणवी की कंमेट्री का उद्भव न केवल क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक सुखद, आनंदप्रद व रोमांचक अनुभव है, बल्कि दोनों भाषाओं और संस्कृति के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है। इनको लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ा योगदान इसके प्रस्तुतकर्ताओं का है ! जिस तरह वे जिंदादिली, सकारात्मकता, अपने खिलाडियों के प्रति सम्मान और विश्वास को ले कर चल रहे खेल का वर्णन करते हैं वह अद्भुत है ! किसी विधा के विभिन्न आयामों की आपस में तुलना करना सही नहीं होता ना हीं न्यायोचित ! पर अभी देखा जाए तो #भोजपुरी की प्रस्तुति सबका मन मोह, सबसे लोकप्रिय हो रही है ! जिसका सारा श्रेय इसके प्रस्तुतकर्ताओं को जाता है।  जिया हो बिहार के लाला 😍

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

शनिवार, 7 मार्च 2026

एक था, अहोम साम्राज्य

हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों और उनके महानायकों का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भी-कभी विचार आता है कि जो भी हमें पढ़ाया गया, उस इतिहास में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों, उनके महानायकों और वीरांगनाओं का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया ! 

अहोम राज 
भारत के ऐसे ही अनजाने उन महान अनेकानेक साम्राज्यों में से एक था अहोम साम्राज्य ! जो आज के असम की पूर्वी ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थित था। यह पूर्वोत्तर भारत में एक दुर्जेय शक्ति थी ! इसने 1228 ईस्वी से शुरू होकर लगभग 600 वर्षों तक अपनी संप्रभुता लगातार बनाए रखी थी ! 13वीं शताब्दी के आरंभ में भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दो महान साम्राज्य हुआ करते थे। एक अहोम तथा दूसरा कामरूप, जिसकी राजधानी प्राग्यज्योतिषपुर थी, जो आजकी गुवाहाटी है। अहोम लोग अब आसाम के अन्य निवासियों में घुल मिल गये हैं और उनकी संख्या बहुत कम रह गई है। 

अहोम साम्राज्य 
राजा चाओलुंग सुकफा ने 13वीं शताब्दी में बर्मा के कुछ हिस्सों, ऊपरी असम तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्रों और वहां की जनजातियों को अपने अधीन कर, पुरानी  व्यवस्था को समाप्त करते हुए अहोम राजवंश की स्थापना की थी ! हालांकि अहोम साम्राज्य के लोग अपने आदिवासी देवताओं की पूजा-उपासना करते थे पर उन्होंने हिंदू धर्म को भी अपनाए रखा ! अहोम राजाओं की सफलता का राज यह था कि राजा ही सर्वोच्च सेनापति भी होता था, जो सदा सेना का आगे बढ़ कर नेतृत्व किया करता था ! अपनी दूरदर्शिता के चलते उन्होंने नागरिकों, सैनिकों तथा धनाढ्य श्रेष्ठि वर्ग के बीच आपसी समझ और एकता को सदा बनाए रखा !  जिससे कभी आपसी वैमनस्य नहीं उभरा ! 

वीर सेनानी 
पनी बहादुरी के लिये विख्यात अहोम, शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के आगे भी कभी नहीं झुके। उल्टे इन्होंने मुगलों को सत्रह बार बुरी तरह परास्त किया था ! मुगलों का यह हश्र देख किसी अन्य आक्रांता की हिम्मत नहीं हुई, इन पर आक्रमण करने की ! इसीलिए यह साम्राज्य 600 वर्षों तक लगातार वजूद में रहा !इस अवधि में 39 अहोम राजा गद्दी पर बैठे। यहाँ के राजाओं की उपाधि 'स्वर्ग देव' थी। अहोम राजाओं ने आसाम में बहुत अच्छा शासन प्रबंध किया। हालांकि उस सामन्तवादी प्रबंधन में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ शामिल थीं ! शासन अपना पूरा लेखा-जोखा रखता था, जिसे बुरंजी कहा जाता था। यह राज्य यंदाबू की संधि पर वर्ष 1826 में ब्रिटिश भारत में शामिल कर लिया गया ! 

लाचित बोड़फुकन
पने इतने अहम और महत्वपूर्ण साम्राज्य के बारे में अपने ही देश के लोगों की जानकारी नगण्य सी है ! उसी को प्रकाश में लाने का उपक्रम मार्च, 2021 में किया गया, जब अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बोड़फुकन को, जिनका जन्म 24 नवंबर, 1622 को हुआ था और जिन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध में अपनी सेना का प्रभावी नेतृत्व करते हुए मुगल सेना का असम पर कब्जा करने का प्रयास विफल कर दिया था, भारत की "आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक'’ की उपाधी प्रदान की गई ! इसके अलावा उनके नाम का एक स्वर्ण पदक भी जारी किया गया जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को प्रदान किया जाता है !

वीरांगना मुला गभारू 
स्मारक 
ह तो सिर्फ एक बानगी है ! ऐसी सैंकड़ों कथाएं-गाथाएं हैं, जिनको सामने लाने की आवश्यकता है ! अब समय है नई पीढ़ी को अपने गौरवमय इतिहास उसके उन नायकों, महानायकों, योद्धाओं के व्यक्तित्व की सच्चाई बताने का, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था ! पर षड्यंत्रवश उनके कर्मों, उनके प्रयासों, उनके त्याग को कभी उजागर नहीं किया गया ! उन्हें सदा गुमनामी के अंधकार में छुपाए रखा गया ! 

@चित्र और संदर्भ अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली, रिलायंस की ! यादें बचपन की

 शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे। आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे.........................😌😍🙏 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
     
होली फिर आ गई और साथ ही ले आई बचपन के दिनों की रंग में सराबोर यादें। बचपन के वे दिन जो रिलांयस में बीते ! वैसे तो समय के साथ-साथ जैसे-जैसे वहां निज़ाम बदलते गए, वैसे-वैसे मिल के वाशिंदों के आचार-व्यवहार-त्यौहार आदि में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आता चला गया, जोकि लाज़िमी भी था। पर आज जो बात बतला रहा हूँ, वह बिल्कुल शुरू के कुछ वर्षों में मनाई-खेली जाने वाली होली की है। 


दिनों सर, मैडम, मिसेज या अंकल-आंटी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं के बराबर ही होता था। जो पंद्रह-बीस परिवार परिसर में रहते थे, उनकी महिला सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए भैन (बहन) या भैन जी तथा एक-दो अपवादों को छोड़, पुरुष सदस्यों के लिए उनका उपनाम या भाई जी का प्रयोग ही हुआ करता था। आज तो मुझे लगता था कि शायद मिल के स्टाफ का पूरा नाम तो सिर्फ कैशियर अंकल ही जानते होंगे, जिन्हें सैलरी देने के लिए पूरे नामों की जरुरत पड़ती होगी ! हाँ बच्चा पार्टी बिना भेद-भाव,जात-पात के सिर्फ नाम से पुकारी जाती थी। 
गुजरा ज़माना बचपन का 
तो बात हो रही थी होली की ! वैसे तो सारा परिसर एक ही परिवार था ! पर पुरुष वर्ग की ''क्रिमी लेयर'' के पांच-सात लोग बहुत ही मित्त-भाषी, सादगी प्रिय, गंभीर और एक अनुशासित ''औरा'' में ही रहने वाले थे ! ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से कठोर या अहम वाले थे ! वे सब बहुत प्रेमिल थे, पर अपने पर और अपनी भावनाओं पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था। समय-समय पर उनकी जिंदादिली भी सामने आती रहती थी पर कभी-कभी, किसी पूर्णिमा पर या एकादशी पर ! ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि जिससे एक खाका खिंच सके, उस समय का। 
पहचान कौन 😜
मि में होली की दस्तक हफ्ते भर पहले ही शुरू हो जाती थी, उसके स्वागत में मिल का युवा स्टाफ रात दस बजे के बाद परिवेश के एक किनारे बने ''बेबी क्रेश'' में चंग या ढपली के साथ राजस्थानी फाग गीतों की स्वर लहरी छेड़ उसके पदचाप की ध्वनि सब तक पहुंचा देता था। ये पारंपरिक राजस्थानी होली गीत होते थे, जिनमें कुछ ''वयस्क शब्दों'' का समावेश भी होता था। इसीलिए यहां बच्चों के प्रवेश की अघोषित मनाही होती थी, पर तरुणाई में कदम रखते मैं और सुमन, बिना शब्दों के अर्थ जाने सिर्फ ढपली की मधुर आवाज से खिंचे वहां चले जाते थे ! भाई लोग कुछ देर तो हमारा लिहाज करते पर फिर गीतों की मस्ती में पूरी तरह डूब जाते थे ! न कोई माइक ना हीं कोई तामझाम, सिर्फ दिल से निकलती आवाज ! कुछ बड़े हो जाने पर उस झिझक का कारण भी समझ में आया 😀

होली के दिन भांग जरूर घुटा करती थी, जिसका पूरा सामान ''कलकत्ते'' से दो दिन पहले पहुँच जाता था। भांग-ठंडाई, बिना किसी मशीन या बाहरी इंसान की सहायता के खुद ही बनाई जाती थी। यह भी एक बड़ा कार्यक्रम होता था ! 60-70 लोगों के लिए इसको बनाना कोई हंसी-खेल नहीं था। सारी सामग्री, घटकों तथा मसालों का सही अनुपात-मात्रा का पूरा ज्ञान और ध्यान रख पूरी तन्मयता और एकांत में उसका निर्माण किया जाता था। भांग बच्चों के लिए पूरी और कठोरता से निषिद्ध थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म पूरे रीती-रिवाजों के साथ पूरी की जाती थी और फिर आ जाता था वह दिन जिसका इंतजार हम बच्चे साल भर से करते रहते थे। 
होलिका दहन 
होली की चहल-पहल सुबह साढ़े आठ-नौ बजे शुरू हो जाती थी। महिलाओं-लड़कियों का अलग गुट होता था जो मैनेजर गेट के पास बांए हाथ के छोटे से मैदान में जुटता था। बाकी छोटे-बड़े पुरुष सामने लॉन में रंगों की धूम मचाते थे। गंगा सामने थीं, पानी इफरात था, रंगों की पूर्ती मिल से होती थी। हम अपनी हाफ पैंटों-निकरों की जेबों में तरह-तरह के रंगों को संजोए मोर्चे पर निकलने को तैयार होने लगते थे। ये दूसरी बात है कि ज्यादातर बच्चों की जेबों में कागज की पुड़ियों में रखे रंग पानी से मिलीभगत कर उन्हीं के बदन को ज्यादा रंगीन कर जाते थे। 

लॉन 
शुरु होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, बिना अपने-पराए का भेद-भाव कर, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। उसी बीच मिठाई का आदान-प्रदान भी बदस्तूर चलता रहता था। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे।  आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे। तीन-चार घंटों के हुड़दंग के बाद, माँओं के, बाथरूम को गंदा ना कर ध्यान से नहाने के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए हम सब अपने-अपने जिद्दी रंगों को छुड़ाने की मशक्कत में जुट जाते थे। यह दूसरी बात है कि रंगों और हमारा स्नेह दो-तीन दिनों तक तो बना ही रहता था। 
हुदंग 

शा को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि अगली होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था 😴😍  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

बदहाली से जूझता एक किला

परन्तु आज किले के प्रवेश द्वार से ही लगने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, बाजारवाद और आधुनिकता का दखल, जलवायु और मानवजनित क्षरण, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं.........................😔   


#हिन्दी_ब्लॉगिंग 


किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।  

रावल जैसल 

सोने का किला 

जैसलमेर का किला 
अनमोल विरासत 
रा जस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 575 किलोमीटर की दूरी पर, 99 विशाल बुर्जों और 30 फुट ऊंची दीवार से घिरे, थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित इस किले का निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है, जो सूर्य की रौशनी में चमक कर सोने का अहसास कराते हैं ! इसीलिए इसे सोने का किला भी कहा जाता है ! देश के सुविख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने इसको केंद्र में रख 1974 में सोनार केल्ला (सोने का किला) नामक एक बंगला फिल्म भी बनाई थी ! 
प्रवेश द्वार


हवा कक्ष 
यह किला भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल तो है ही, साथ ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी इसका नाम शामिल है। जैसलमेर का यह स्वर्ण किला दुनिया के उन गिने-चुने किलों में से एक है, जिसमें हजारों लोग रहते हैं यानी यह एक जीवंत किला है ! यह बहुद सुखद अनुभूति है कि इसके रहवासी आज भी अपने त्योहारों, परम्पराओं और लोकगीतों को भूले नहीं हैं ! अच्छी बात है ! पर परंपराओं के साथ-साथ  इस अनमोल धरोहर के संरक्षण, इसके रख-रखाव, इसकी सुरक्षा का भी ध्यान पूरी शिद्दत से रखा जाना चाहिए !

शयन कक्ष 

झरोखा 

पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी 

पि छले दिनों अपनी संस्था के सौजन्य से जोधपुर-जैसलमेर यात्रा का अवसर मिला। जोधपुर जितना साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिखा उतना जैसलमेर नजर नहीं आया ! खासकर दोनों के दुर्गों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा ! जैसलमेर के किले के प्रवेश द्वार से ही एहसास होने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं ! दुःख सा महसूस होता है हालत देख कर !

आवाजाही 

व्यवसाय 

दुकानदारी 

ढ़ती आमदनी के कारण स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन शैली पर बाजारवाद और आधुनिकता का दखल साफ तौर से दिखने लगा है ! जिसका असर मानवजनित क्षरण के रूप में किले पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा है और यही बात चिंता का विषय भी है कि यदि तुरंत इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं इसका अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाए ! 

गली-गली में दुकान 

यात्री वाहन 
पनी इस अनमोल विरासत को सहेजे रखना हम सबके लिए जितना महत्वपूर्ण है, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है ! आज इसकी पहचान, इसकी खासियत, इसकी विश्व-प्रसिद्ध लोकप्रियता ही इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है ! वाहनों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण ! अनगिनत लोगों को सुविधा प्रदान करने का दवाब ! रख-रखाव की कमी ! बढ़ती दुकानदारी ! समय की मार, इन सबको झेलने में इसका दम फूलता नजर आता है ! 

निजी वाहन, बदहाल राहें 
एक बात का बेहद अचरज होता है कि जब इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है तो इसके अंदर बुर्जों में होटल खोलने की इजाजत क्यों और कैसे दी गई ! होटल हैं तो पर्यटक भी आएंगे, भीड़ बढ़ेगी, जाहिर है दवाब बढ़ेगा तो मानवजनित क्षरण भी बढ़ेगा ! क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया या आमदनी के सामने इसको इसकी हालत पर छोड़ दिया गया ? इसके पड़ोस में ही जोधपुर के मेहरानगढ़ की हालत बहुत ही अच्छी है। जैसलमेर को उसका अनुकरण करना चाहिए, जबकि यहां संसाधनों की किसी भी तरह की कोई कमी भी नहीं है !

@अंतिम तीन चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

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