pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

आराध्य की विदाई भी सम्मानजनक होनी चाहिए

मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना सिर्फ एक चलन हो कर रह गया है ! क्या प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले यह मूर्ति स्थापना सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! जिसके कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है.......!! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम सब भारतवासी उत्सव प्रिय लोग हैं। वर्ष भर हमारे यहां कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह के समारोह चलते ही रहते हैं ! पर साल के कुछ महीने, पर्वों के लिए खास होते हैं और अब उनका समय आया हुआ है ! रक्षा-बंधन और जन्माष्टमी के बाद बप्पा जी आने वाले हैं, फिर हमारे पूर्वज आएंगे, फिर माँ का आगमन होगा। इसके साथ ही महाकाव्यों का मंचन, पूजा, स्तुति करते हुए कब साल बीत जाएगा, आबालवृद्ध किसी को भी पता ही नहीं चल पाएगा ! पर ऐसे में एक विडंबना भी है ! हम जिसको पूजते हैं, आराधना करते हैं, पलक-पांवड़े बिछाते हैं उसी की अनजाने में बेकद्री भी कर देते हैं, इस अविवेकता, बुद्धिहीनता, नासमझी से बचना भी बहुत जरुरी है !

बप्पा 
दुर्गा पूजा 
होता क्या है कि पर्वों के दिनों में हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को एक निश्चित अवधि के लिए सार्वजनिक स्थलों के अलावा अपने घरों में भी एक निश्चित अवधि के लिए स्थापित किया जाता रहा है ! समय और चलन के साथ-साथ अब घर-घर में अपने आराध्यों की स्थापना होने लगी है, जिनकी नियमानुसार विदाई भी निश्चित होती है ! उनका विसर्जन किसी तालाब, नदी या सागर में किया जाता है !

विदाई 

पूजा स्थलों की संख्या बढ़ने के साथ ही उनके आयोजकों में अपने कार्यक्रम को श्रेष्ठ सिद्ध करने की स्पर्द्धा या होड़ भी शुरू हो गई है, जिसका असर मूर्तियों के आकार, सजावट और साजो-सामान पर पड़ने लगा है, जिससे विसर्जन क्षेत्र में उनको विगलित होने के लिए ज्यादा जगह और समय की जरुरत पड़ने लगी है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है !
नासमझी 

बदहाली 
मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है ! हड़बड़ी में लोग मूर्तियों को जैसे-तैसे पानी में ड़ाल कर्तव्य-मुक्त हो वापस हो लेते हैं ! विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना करना एक चलन हो गया है ! देखा-देखी या बच्चों की जिद के कारण यह प्रभु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के बदले सिर्फ एक शौक बन कर तो नहीं रह गया है ! इसी कारण विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है, जिन्हें नदी, तालाब या सागर में विधिवत विसर्जित ना कर फेंक-फांक कर छुटकारा पा लिया जाता है !
दुर्दशा 
पर्यावरण 😥
आज जरुरत है, प्रकृति से समन्वय की ! पर्यावरण को बचाने की ! जल स्रोतों को संभालने की ! फिजूल-खर्ची पर रोक लगाने की ! धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की ! अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों, अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने की ! ऐसा तभी संभव हो पाएगा जब हम, सब चलता है, की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इस ओर ध्यान देंगे !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

रविवार, 6 सितंबर 2026

बगावत मशीनों की, सिर्फ डरावनी कल्पना नहीं रह गई है

खबर है कि ''ओपनएआई'' के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक ''एजेंट्स'' ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा, मशीनें क्या करेंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती..............😨

#हिन्दी_ब्लॉगिंग    

करीब साठ-सत्तर साल पहले एक लेखक ने एक डरावनी सी कल्पना की थी कि हो सकता है मशीनें इंसानों पर हावी हो जाएं ! कल्पनाकार थे, ली फाक, जिनका असली नाम लियोन हरिसन ग्रास था। वे अमेरिका में थियेटर निदेशक होने के साथ-साथ अत्यंत लोकप्रिय कॉमिक शृंखलाओं के रचयिता थे। उनकी कॉमिक स्ट्रिप के दो विश्वप्रसिद्ध नायक थे, पहला अपराधियों से लड़ने वाला सुपर हीरो 'द फैंटम' तथा दूसरा 'मैंड्रेक द मैजिशियन'। साठ-सत्तर के दशक में इन दोनों की लोकप्रियता का जादू विश्व भर के आबालवृद्ध के सर चढ़ कर बोला करता था। 

इंसान पर हावी होने का खतरा 

ली फाक 
ली फाक ने जून 1967 में, जब कंप्यूटर शुरुआती दौर में थे, ''मैंड्रेक द मैजिशियन'' की शृंखला की एक कहानी "द कंप्यूटर वर्ल्ड" (The Computer World) में कंप्यूटर विद्रोह की एक अनोखी झलक दिखलाई थी। जिसमें एक अति-आधुनिक और विशालकाय सुपरकंप्यूटर बनाया जाता है, जिसे इंसान की तरह सोचने और निर्णय लेने की क्षमता दी जाती है। कुछ ही समय में यह कंप्यूटर खुद को इंसानों से बेहतर और श्रेष्ठ मानने लगता है और स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर देता है। 

वेताल 

मैंड्रेक 

धीरे-धीरे वह कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए दुनिया भर के अन्य कंप्यूटरों और स्वचालित मशीनों पर नियंत्रण हासिल कर लेता है। वह इतना सक्षम हो जाता है कि इंसान की आवाज सुने बगैर उसके हाव-भाव और शारीरिक भाषा से ही उसका इरादा भांप लेता था ! फिर वह अपने बॉस, इंसानों के आदेशों को मानने से इनकार कर, "डिजिटल विद्रोह" की घोषणा कर देता है तथा सेना और रक्षा प्रणालियों से जुड़े कंप्यूटरों को भी प्रभावित करने लगता है, तब अपनी सूझ-बूझ और कौशल से जादूगर मैन्ड्रेक उसके इरादों को निरस्त करता है ! 

खलनायक मशींने 
वह तो एक काल्पनिक कहानी थी, पर आजकल जैसी खबरें आने लगी हैं, उनसे वर्षों पहले की ली फाक की वह रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पना आधुनिक आविष्कार AI के माध्यम से कुछ-कुछ साकार होती दिख रही है ! जबसे इस विधा को इंसानों की नकल करने के साथ-साथ अन्य समस्याओं को हल करने की सीख दी जा रही है, तबसे यह ऐसा व्यवहार करने लगी है जिसकी तनिक सी भी उम्मीद इसके निर्माताओं को नहीं थी, इसने किसी समस्या को हल करने के लिए अपनी तलाश की सीमाएं लांघ धोखा देना भी सीख लिया है !
आशंका 

कुछ दिनों पहले एक बेहद रोमांचक खबर अमेरिका से आई है जो किसी कम्प्यूटर की बगावत से भी ज्यादा डरावनी और खतरनाक है ! बताया जाता है कि ओपनएआई के रिसर्च मॉडल से निकले 1200 से भी अधिक एजेंट्स ने अपनी मर्यादा तोड़, अपनी ही कंपनी को हैक कर, इंटरनेट पर एक खुफिया मैसेज बोर्ड बना पौने लाख से भी ज्यादा संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया ! खुद ही एक-दूसरे के नाम और उपाधि निर्धारित कर साइबर हमले की साजिश रच डाली ! इतना ही नहीं पकड़े जाने पर सबूत मिटाने तक का भी इंतजाम कर लिया था ! 

चेतावनी 

यह घटना वैज्ञानिकों को सचेत करने के लिए काफी है कि समय रहते ऐसे आविष्कारों पर कानूनी और तकनिकी लगाम नहीं कसी गई तो आने वाले समय में ऐसी विधाओं पर नियंत्रण पाना और उन्हें अपने वश में रखना इंसान के लिए नामुमकिन हो जाएगा और फिर क्या होगा मशीनें क्या करेंगीउसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती !

@संदर्भ व चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर करने में अपना जीवन लगा देते हैं ! पर यह बहुत ही जटिल और दुरूह कार्य है ! अपार समय, पैसे और धैर्य की जरुरत होती है ! साथ ही घोर विरोध का भी सामना करना पड़ता है ! विरोध का होना तो लाजिमी है ! जो लोग सत्ता सुख पाने के लिए कुछ भी कर सकते हों, उनके लिए तो उनके सच का आम हो जाना किसी परमाणु विस्फोट से कम नहीं हो सकता.........!     

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हम यदि अपने पुराने ग्रंथों, महाकाव्यों, इतिहास की सुप्रसिद्ध कथाओं-कहानियों को देखें तो उनमें बहादुर, निडर जननायकों के साथ ही उस समय के खलनायकों के षड्यंत्रों, कारस्तानियों, उनकी दुरभिसंधियों का भी विस्तृत विवरण मिल जाता है ! पर बदलते समय के साथ, जब खलनायक भी नायक बन सत्तानशीन होते चले गए और उनके चाटुकार, मौकापरस्त चारणों द्वारा उनके कुकर्मों पर पर्दा डाल, उनके चरित्र को पाक-साफ दिखाने, उनकी छवि को महिमामंडित करने हेतु इतिहास को ही तोड़-मरोड़ डाला गया, तो सच भी रसातल जा पहुंचा ! 

झूठ के मकड़जाल में फंसा सच 

आज जरूरत है उसी परंपरा को जीवित कर सज्जनों के साथ-साथ दुर्जनों की वंशावलियों की भी पूरी कुंडली को जनता-जनार्दन के सामने लाने की ! उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए सारे कारनामों को जिनके अतीत के सच पर झूठ का चमकीला आवरण चढ़ा, असलियत छिपा, उनको महिमामंडित कर, अवाम को सच के सिवा कुछ और ही दिखा-समझा कर पीढ़ी दर पीढ़ी जो गलत इतिहास पढ़ाया-समझाया गया, उसका पर्दाफाश करने की ! वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के सामने सच रखने की ! उनके दिलों में राष्ट्र प्रथम की भावना सुदृढ़ करने की ! जिससे किले के दरवाजे की सुरक्षा पुख्ता हो जाए, अभेद्य हो जाए !

राष्ट्र प्रथम 

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर करने में अपना जीवन लगा देते हैं ! पर यह बहुत ही जटिल और दुरूह कार्य है ! अपार समय, पैसे और धैर्य की जरुरत होती है ! साथ ही घोर विरोध का भी सामना करना पड़ता है ! विरोध का होना तो लाजिमी है ! जो लोग सत्ता सुख पाने के लिए कुछ भी कर सकते हों, उनके लिए तो उनके सच का आम हो जाना किसी परमाणु विस्फोट से कम नहीं हो सकता ! 

भावना 

इस वर्ग के लोगों को अपने समाज, अपनी संस्कृति, अपने देश और उसके गौरवशाली अतीत से कोई सरोकार नहीं होता ! उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने सुख, ऐश-ओ-आराम और अपने भविष्य की चिंता होती है! ऐसे लोग आज से नहीं सदियों से इस देश में फलते-फूलते रहे हैं ! वर्षों-वर्ष से ये लोग अपने ही देश के किले का दरवाजा अंदर से खोलते रहे हैं ! इनके कुत्सित प्रयासों के बावजूद देश तरक्की की राह पर चलने की कोशिश करता रहा है ! 

भविष्य 

कभी-कभी एक विचित्र सी सोच भी मन में उभरती है कि यदि ऐसे लोग विदेशी ताकतों के झांसे में ना आ, देश हित के प्रयासों में जुट जाएं, तो क्या अमेरिका, क्या चीन, क्या योरोप, क्या सारी दुनिया सिर्फ भारत के नाम से नहीं जानी जाने लग जाएगी.................काश ऐसा हो पाता !

जय हिन्द ! वंदे मातरम !!  

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया.............!      

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारा राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों देश की पहचान और गौरव का विदेशों में भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें सभी राष्ट्रीय अवसरों और कार्यक्रमों पर बजाया और गाया जाता है ! इससे हम सब में देशभक्ति और एकता की भावना जागृत होती है ! पिछले दिनों वंदे मातरम गीत को ले कर देश में काफी चर्चा चली ! इससे संबंधित कानून भी संसद में पारित करवाया गया ! इसका पाठ पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में श्री रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था !

वंदे मातरम 
इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" श्री रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1911 में रचा गया और इसे 1950 में राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई ! वंदे मातरम को 1875 में श्री बंकिम चंद्र चैटर्जी ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ के लिए बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा, जो आगे चल कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया ! इसका उपयोग एक राजनीतिक नारे के रूप में पहली बार 7 अगस्त, 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान किया गया था ! हालांकि दोनों ही संगीत रचनाएं देश के गौरव, एकता और देशभक्ति की भावना को जागृत करने का काम करती हैं, पर दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं ! 

बंकिम चंद्र जी 
मारा राष्ट्रीय गान "जन गण मन" देश की पहचान और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बोल देश के इतिहासिक, मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को व्यक्त करते हैं। यह कानून द्वारा निर्दिष्ट है और देश के आधिकारिक प्रतीकों के रूप में पहचाना जाता है। इसे सभी राष्ट्रीय पर्वों और खेल आयोजनों जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। इसमें कुछ खास बाते हैं, जैसे इसे निर्दिष्ट अवधि जो 52 सेकंड की है, तय लयबद्धता यानी इसकी धुन को बदला नहीं जा सकता, ऐसा करना दंडनीय अपराध की गिनती में आता है और सम्मानजनक स्थिति में विशेष प्रोटोकॉल के तहत ही बजाया या गाया जा सकता है ! 

हमारी पहचान 
पना वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता और गौरव की गाथा है, जिसका अर्थ है कि मैं भारत माता की वंदना और स्तुति करता हूं। यह एक तरह से अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और देशभक्ति की अभिव्यक्ति है। जो हर भारतीय में राष्ट्रवाद की भावना को जगाती है। इसे सांस्कृतिक  आयोजनों और देशभक्ति के कार्यक्रमों में गाया जाता है। वंदे मातरम गीत में समय, धुन या लयबद्धता जैसी कोई बाध्यता नहीं है। इसके तीन विभिन्न संस्करण बहुत लोकप्रिय हैं ! पर इसकी भी राष्ट्र गान की तरह ही किसी भी प्रकार की अवमानना, असम्मानजनक स्थिति या अवहेलना करना अपराध के दायरे में आता है। 

कविगुरु 
हम सभी ने महसूस किया है कि जब भी ये दोनों कहीं भी, कभी भी प्रसारित होते हैं तो तन-बदन में एक ऊर्जा सी भर जाती है ! दिल-ओ-दिमाग गौरवान्वित हो उठते हैं ! तन-बदन में एक लोमहर्षक रोमांच का अनुभव होने लगता है ! ना जाने क्या जादू छिपा है इनके शब्दों में कि पूरे शरीर में  देशभक्ति की लहर सी दौड़ जाती है ! हर देशवासी का फर्ज है, कर्तव्य है कि उसे तो ये दोनों रचनाएं कंठस्त हों ही, यह भी सुनिश्चित हो कि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे पूर्णतया परिचित हों ! 

जय हिन्द ! वंदे मातरम !!

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार सड़क पर यूंही डंडा पटक दे तो हुड़दंगी भागते नजर आएं ! एक बार डपट दे तो किसी की चूँ तक करने की हिम्मत ना हो ! वही जवान, समाज और देश हित खातिर अपनी बेकद्री, अपनी बेइज्जती, अपनी जिल्लत को सहते हुए मौन खड़े रहे ! इतना धीरज, इतनी सहनशीलता, इतना सब्र.........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

पु लिस क्या है, कैसी है, क्या करती है, यह सभी जानते हैं ! इसके बिना अवाम, समाज, देश या सरकार एक कदम भी नहीं चल सकते, यह भी सभी को मालूम है ! पर विडंबना कि यह महकमा कितना भी जोर लगा ले, कितनी भी मेहनत कर ले, कितनी भी सफलता पा ले, कितना भी मर-खप जाए, पर ज्यादातर उसके हिस्से में बदनामी ही आती है ! इस बात को, इस प्रथा को, इस परिपाटी को हमें बदलना पडेगा ! वे भी इंसान हैं ! उन्हें भी दर्द-तकलीफ-कष्ट होता है ! उनके भी मनोभाव हैं, जज्बात हैं, वे भी संवेदनशील हैं ! 

मुस्तैदी व सजगता 

अभी जो कुछ पिछले दिनों दिल्ली में हुआ जहां बेकाबू-निरंकुश-पाशविक भीड़ ने दरिंदगी की हद पार कर दी, जहां महिला पुलिस कर्मियों तक को नहीं बक्शा गया ! जहां सुरक्षाकर्मियों की जान पर बन आई ! जहां धक्का-मुक्की, हाथा-पाई, गाली-गलौच, बेइज्जती की सारी सीमाएं लांघ दी गईं ! वहीं माहौल को संभालने में जिस धैर्य, जिस संयम, जिस परिपक्वता का उदाहरण दिल्ली की पुलिस ने दिया वह दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिले ! 

प्रतीक 
पु लिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार सड़क पर यूंही डंडा पटक दे तो हुड़दंगी भागते नजर आएं ! एक बार डपट दे तो किसी की चूँ तक करने की हिम्मत ना हो ! वही जवान, समाज और देश हित खातिर अपनी बेकद्री, अपनी बेइज्जती, अपनी जिल्लत को सहते हुए मौन खड़े रहे ! इतना धीरज, इतनी सहनशीलता, इतना सब्र.........! आपकी आज्ञाकारिता तो सेना के समकक्ष हो गई ! नमन है आपको !
गौरव 
रकार से विनम्र निवेदन है कि इन दिनों जंतर-मंतर पर जितने भी महिला-पुरुष पुलिस कर्मियों ने, अपनी जान की परवाह ना कर अपना कर्तव्य निभाया उन्हें सार्वजनिक तौर पर सम्मानित और पुरस्कृत किया जाए! जिससे उनके काम की जटिलता का आभास हो सभी को ! हर अखबार, हर टीवी चैनल, हर सोशल मिडिया पर उनकी चर्चा हो, ताकि लोगों में, समाज में, पुलिस के प्रति गर्व और आदर का भाव पैदा हो ! उनका सम्मान हो ! लोग उनसे मिलें, डर कर नहीं बल्कि प्रेम से !  

जय हिंद ! वंदे मातरम !! 

@चित्र अंतर्जाल से साभार 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡

लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी की अनुपलब्धि सबसे बड़ी और विकट समस्या रही है ! अप्रैल और मई के महीनों में जब खेतों में बुआई का समय होता है, तब एक-एक बूंद पानी के लिए किसानों को तरसना पड़ता रहा है ! क्योंकि हिमनद पहाड़ के ऊपर, लगभग 18,000 फुट की ऊंचाई पर रहते हैं और जाड़े का मौसम खत्म होने पर जून में जा कर उनका पिघलना आरंभ होता है, तब तक खेती का सही समय निकल जाता था ! फलस्वरूप अधिकांश भूमि बंजर होती जा रही थी !

बंजरता 

बर्फ का रेगिस्तान 
एक इंसान बचपन से ही यह विषमता देखता चला आ रहा था ! वह अपने लोगों, अपने परिवार, अपने समाज की इस अभिशप्तता को दूर करने के लिए बेचैन था ! वह बड़ा हुआ, इजीनियर बना ! तभी 1987 की सर्दियों आईं ! एक दिन वह नदी किनारे अपने घर के बाहर खड़ा था, उसने देखा कि नल से पानी की बूंद टपक कर जमीन पर गिरी और बर्फ बन गई ! उधर नदी का पानी बेकार बह कर बर्बाद हुआ जा रहा था ! उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि इस पानी को किसी तरह जमा दिया जाए तो लद्दाख में पानी की किल्लत दूर हो सकती है ! 

चेवांग नॉरफेल 
व्याकुलता 
निर्माण 
उसने अपनी योजना का खाका तैयार किया और गांव वालों को साथ ले, उसे मूर्त रूप देने में जुट गया ! सबने मिल कर वहीं के मिटटी-पत्थरों का उपयोग कर, छोटी-छोटी नहरें बना, नदी के पानी का रास्ता बदल उसे पास की छायादार घाटी में बांध बना संग्रहित कर दिया ! कड़ाके की सर्दी में वह पानी जम कर, बर्फ के विशाल ढेर में बदल वहां स्थित हो गया ! इस तरह इंसान ने प्रकृति से होड़ ले, पहाड़ की छोटी से काफी नीचे अपना एक कृत्रिमिक ग्लेशियर बनाने में सफलता पा ली ! तापमान में फर्क होने की वजह से इस हिमनद का पिघलना मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाने लगा और यह वही समय होता था जब यहां के किसानों और निवासियों को पानी की सबसे ज्यादा जरुरत होती थी ! 

निरर्थकता 
उपक्रम 
संग्रह 
एक इंसान के बुद्धि-कौशल, लगन और जिद ने लद्दाख के एक हिस्से की सूखी, बंजर जमीन को हरा-भरा कर शस्य=श्यामला बना दिया ! कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले किसानों, रहवासियों के लिए वह इंसान भगवान स्वरूप हो गया ! लोग उन्हें "आइस मैन ऑफ इंडिया" कहने लगे ! उन्होंने करीब 15 छोटे-बड़े हिमनद बनाए, जिनमें सबसे बड़ा हिमनद लगभग 2 कीमी का था ! लद्दाख की भूमि की रंगत बदलने और समाज के उत्थान के लिए किए गए उनके इस अनूठे प्रयास का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार ने भी 2015 में उन्हें पद्म-पुरस्कार से नवाज कर सम्मानित किया ! 

पद्म सम्मान 

मानव निर्मित ग्लेशियर 
स्वप्न साकार 
पर सुदूर बसे लद्दाख में हुए ऐसे क्रांतिकारी आविष्कार, जिसने लाखों लोगों की जिंदगियों को प्रभावित किया, समाज की दशा बदल दी, समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया, वह प्रयास, उन्नत संचार व्यवस्था और आज जैसा सोशल मीडिया ना होने के कारण बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं हो पाया ! फिर समय बदला, हर हाथ में फोन आ गया ! खबरें विद्युत गति से चलने लगीं ! दुनिया सिकुड़ गई ! लद्दाख भी अब वैसा अनजान नहीं रहा और इसी बात का फायदा, एक चालाक, धूर्त, कुटिल व्यक्ति ने उठाया और उन हिमनदों को अपनी उपलब्धि बता, संसार में अपने को वैज्ञानिक सिद्ध कर दिया ! लोग उसके दीवाने हो गए ! देश-विदेश में उसकी उपलब्धियों की बातें होने लगीं, बुलावा व सम्मान मिलने लगा ! धन का नियमित प्रवाह भी शुरू हो गया और वह एक जानी-मानी हस्ती बन जगह-जगह अपनी टांग अड़ाने की कोशिश करने लगा ! देश विरोधी गतिविधियों की वजह से उसे सजा भी मिली ! पर...................!

समर्पण 

मक्कारी 
अब उन दोनों व्यक्तियों की पहचान ! पहला वह जिसे आज भी  लद्दाखवासी कृतज्ञता से याद करते हैं ! जो लद्दाख और लद्दाखवासियों का गर्व है ! उसका नाम है ''चेवांग नॉरफेल'' ! और दूसरा है, अपने ही देशवासी की उपलब्धि को चुरा कर छद्म लोकप्रियता हासिल करने वाला, एक नौटंकीबाज, कुटिल, मौकापरस्त सोनम वांगचुक ! जो आज विदेशी ताकतों का मोहरा बन, देश के देशद्रोही, सनातन विरोधी, मक्कार, धूर्त नेताओं का हमजोली बना हुआ है ! गूगल से प्रमाणित होने के बाद ही किसी बात को मानने वाले, वहां जा कर इस बात की सच्चाई जान सकते हैं !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार !

@''शख्स किसी और के कांधे.....'' वाली पंक्ति प्रख्यात शायर श्री मदन लाल सेठी ऊर्फ मायकश अम्बालवी जी की है। 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर विदेशों से करोड़ों डॉलर उगाहता है ! जो चीन की खुल कर तरफदारी करता है ! जो कश्मीर को अलग करने का सुझाव देता है ! वही जो कभी लद्दाख को कश्मीर से अलग किए जाने पर मोदी जी के कसीदे पढ़ा करता था ! जब तक धर्मेंद्र प्रधान से अनुदान मिलता रहा, तब तक ये उनका मुरीद बना रहा ! जो ''नीट'' के नाम पर, अपने स्वार्थ के लिए, नौटंकीबाजों के साथ खड़ा हो गया ! क्या इसने कभी परीक्षाओं को सफल बनाने के लिए सुझाव दिए ? क्या इसने कभी इस बारे में सरकार से कभी कोई बात की ? क्या इसने कभी उस समस्या को हल करने की कोशिश की ? नहीं ! यदि इसने ऐसा किया होता तो आज देश की जनता भी इसके साथ भूख हड़ताल पर बैठी होती ! .....................!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

हुत दिनों पहले एक फिल्म आई थी ''बीस साल बाद'' ! उस रहस्यात्मक फिल्म में खलनायक की भूमिका एक ऐसे अभिनेता ने निभाई थी, जिनकी छवि सदा नेक, प्रेमल, दयावान पात्र की रही थी। इसीलिए उन पर दर्शकों को शक नहीं होता है और फिल्म का रहस्य अंत तक बना रहता है ! पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भी कुछ ऐसा ही हुआ और उसने एक माहौल की दशा और दिशा ही बदल कर रख दी !

नैरेटिव स्थल 

नै रेटिव गढ़ने में विपक्ष सदा दो कदम आगे रहा है और यह सदा उसका अमोघ अस्त्र भी रहा है ! पर पिछले पखवाड़े बाजार में एक खबर चल पड़ी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में बहुत जल्द फेर-बदल होने वाला है, जिसमें दो-तीन वरिष्ठ मंत्रियों के साथ-साथ विवादित शिक्षा मंत्री की विदाई भी तय है ! सबसे पहले यह खबर एक ऐसे चैनल से आई, जिसकी विश्वसनीयता पर कभी किसी को कोई संदेह नहीं रहा ! फिर यह खबर कुछ अन्य यू-ट्यूब चैनलों पर भी वायरल हो गई ! ऐसा माहौल बन गया कि फेर-बदल अब हुआ ही हुआ !

अभिशप्त ?

ऐसे सुनहरे मौके पर चूक न हो जाए, इसलिए वांग, सारा श्रेय लेने के लिए दिल्ली आ धमका और बिना किसी के कहे खुद ही आमरण अनशन का ऐलान कर दिया ! उसे लगा था कि उधर ''वह'' हटा और इधर ''ये'' अन्ना बना ! अपनी अति मत्वाकांक्षाओं, अहम और विदेशी आकाओं की शह से भ्रमित हो वह अपनी पिछली करतूतों, बयानों, कारस्तानियों को तो भूला ही, साथ ही दस-बारह सालों में देश में चली जा रही सटीक शतरंजी चालों से भी सबक ना ले, उन्हें बिलकुल नजरंदाज कर बैठा ! नतीजा सामने था ! अब ना उगलते बन रहा था, ना हीं निगलते ! वह चौबे जी वाली कहावत चरितार्थ हो गई !

भ्रमजाल 

जं तर-मंतर के जादूई मायाजाल में फंसे इस बंदे को यह नहीं दिखा और ना हीं समझ आया कि क्यों दसियों विपक्षी पार्टियां इस तथाकथित नौटंकी रूपी मुहिम से किनारा किए हुए हैं ? क्यों नहीं तिकड़म में महारत हासिल किए हुए नेतागणों ने इस मौके का फायदा उठाने के लिए, खुद ना सही, अपने सौ-पचास कार्यकर्ता ही यहां भेज, भीड़ बढ़ाने का छद्म प्रयास किया ? यदि इस मुद्दा-विहीन जमावड़े के प्रति जनमानस की लेश मात्र भी सहानुभूति होती,  तो अभी तक तो हारे-थके, हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों ने इस अवसर को हथियाने के लिए कब का अपना झंडा-डंडा यहां गाड़ दिया होता ! 

गुबार देखते रहे 

पने मद में चूर, सारा श्रेय खुद हड़पने और सत्ता की लालसा में इस इंसान को यह भी नहीं दिखा कि सिर्फ उसे ही झाड़ पर क्यों चढ़ाया गया है ! वहां मौजूद कोई भी रंग-बिरंगा जीव, पाव दिन के लिए भी उसके साथ खड़ा होने को तैया नहीं था ! उलटे वहां दिन-रात पिकनीक मनाई जाती रही, नाच-गाना होता रहा ! सुबह-शाम दावतें उड़ती रहीं ! वह भी ठीक उसकी नाक के नीचे ! उन्हें रोज तरह-तरह के व्यंजनों को भकोसता देख वह उन्हें कोसता रहा, बेबस हो गरियाता रहा,  यहां तक कि शाप भी देता रहा, पर उधर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा ! आम जनता की भी कोई सहानुभूति नहीं जगी ! 

सत्ता की लालसा 

यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर विदेशों से करोड़ों डॉलर उगाहता है ! जो चीन की खुल कर तरफदारी करता है ! जो कश्मीर को अलग करने का सुझाव देता है ! वही जो कभी लद्दाख को कश्मीर से अलग किए जाने पर मोदी जी के कसीदे पढ़ा करता था ! जब तक धर्मेंद्र प्रधान से अनुदान मिलता रहा, तब तक ये उनका मुरीद बना रहा ! जो ''नीट'' के नाम पर, अपने स्वार्थ के लिए, नौटंकीबाजों के साथ खड़ा हो गया ! क्या इसने कभी परीक्षाओं को सफल बनाने के लिए सुझाव दिए ? क्या इसने कभी इस बारे में सरकार से कभी कोई बात की ? क्या इसने कभी उस समस्या को हल करने की कोशिश की ? नहीं ! यदि इसने ऐसा किया होता तो आज देश की जनता भी इसके साथ भूख हड़ताल पर बैठी होती  !  

बचा लो ! 
फिर जब कोई चारा नहीं बचा, हालत हद से गुजर गई और जान के लाले पड़ने लगे, तो किसी तरह इज्जत बचाने और यहां से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं से दुहाई की गई ! उनके कारकुनों से सोशल मीडिया पर अपील करवाई जाने लगी ! कुछ फुंके कारतूसों और भीगी दियासलाइयों ने उपस्थिति भी दर्ज भी करवाई ! पर ऐसे प्रयास अवाम के लिए प्रहसन जैसे ही रहे ! क्योंकि आज तो इसके खुद के पढ़ाए हुए बच्चे भी इसका साथ देते नजर नहीं आ रहे ! खैर ! सुनने में आया है कि जल्द ही उन्हें उन्हीं जैसे लोगों द्वारा उबार लिया जाएगा ! प्रभु उन्हें सेहत प्रदान करें !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार 

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