बुधवार, 14 अप्रैल 2021

99.9% का खेल, कीटनाशकों का

कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना के प्रादुर्भाव से पूरी दुनिया  में दहशत  फ़ैल गई थी ! देश-दुनिया-समाज-इंसान  तक़रीबन हर कोई बेहाल हो इसके शिकंजे में किसी ना किसी तरह फंस मुसीबतजदा हुआ ! पहले तो न इसका कोई इलाज था ना हीं बचने का कोई सटीक उपाय ! लोगों का डर चरम पर था ! इसी भय और दवा की अनुपलब्धता ने कुछ लोगों और उद्यमों के भाग्य खोल दिए। यह महामारी उनके लिए व्यावसायिक उपलब्धि का स्वर्णिम मौका साबित हुई ! अस्पतालों, स्वास्थय केंद्रों की बात ना भी करें, तो भी सैकड़ों तरह के सेनेटाइजर, बैक्टेरिया रोधक, वायरस किलर, कीटाणुनाशक, हैंडवाश, हैण्ड रब, साबुन, डिटर्जेंट, ऐन्टीसेप्टिक तथा विभिन्न तरह के स्प्रे, लोशनों ने बाजार को पाट दिया !  बाढ़ सी आ गई ऐसे उत्पादों की। भयभीत और आशंकित लोग, बिना इनके दावों, उपयोगिता और प्रामाणिकता को जांचे, टूट पड़े इनको लेने के लिए ! 

आजकल कोरोना को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। वैसे भी इनका दावा 99.9 का होता है। सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं, उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं 

इधर लाख हिदायतों और वैक्सीन के बावजूद, कोरोना के पलटवार ने तो जैसे उनके लिए कुबेर का खजाना ही खोल कर रख दिया। कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे ! पर विज्ञापनों का मायाजाल ऐसा है कि इस सच्चाई पर कोई ध्यान ही नहीं देता !


यह सिद्ध हो चुका है कि बैक्टेरिया या कीटाणुओं की संख्या में बहुत जल्द वृद्धि होती है और हम यह भी देख चुके हैं कि धीरे-धीरे कीटनाशक इन पर निष्प्रभावी होते चले जाते हैं। मच्छर इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। तो अब जो वो दशमलव एक प्रतिशत बैक्टीरिया बच जाते हैं, वे कुछ समय बाद फिर सक्रिय हो जाएंगे ! धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी भी होती जाएगी जो फिर पूरे इलाके पर काबिज हो जाएगी ! तिस पर अब यह जो नई प्रजाति सामने आएगी उस पर उन कीटनाशकों का भी कोई असर नहीं होगा ! ऐसे में उनका हमला इंसानों के लिए जानलेवा बन जाएगा ! 

आजकल कोरोना या कोविड 19 को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। कीटाणुओं को हटाने का इनका दावा 99.9% का होता है। इसमें सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं। उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं ! आज बाजारवाद सभी जगह पूरी तरह से हावी है और अघोषित रूप से उसमें सब कुछ जायज मान लिया गया है ! ऐसे में तो आम इंसान को बिना घबड़ाए, आतंकित या भयभीत हुए, अपने विवेक का उपयोग करते हुए, सोच-समझ कर ही किसी उत्पाद को खरीदना और उपयोग में लाना चाहिए ! पर होता उलटा ही है बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों के झांसे में आ कर, उन्हें सच मान, उनके उत्पाद खरीद कर हम एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षात्मक कवच सा पा जाते हैं। इससे हमारा दिमाग सकारात्मकता के संदेश देने लगता है। 

हमारे देश में तो वर्षों से घरेलू चीजों का ही उपयोग साफ़-सफाई के लिए होता रहा है ! जिसे अब बाजार और आधुनिकता की छद्म चकाचौंध में नकार सा  दिया गया है ! नहीं तो नमक और नीम जैसे सर्वसुलभ वस्तुओं में भी कीटाणुनाश की उतनी ही शक्ति है जितनी इन अति मंहगे उत्पादों में ! हो सकता है उनसे ज्यादा ही हो और साथ ही इनकी खासियत यह भी है कि ये पूरी तरह निरापद होते हैं । पर्यावरण को भी इनसे कोई नुक्सान नहीं पहुंचता। पर सबसे बड़ी बात विश्वास की है कहा जा सकता है कि जो सोचे-समझे षडयंत्रों द्वारा हटवा दिया गया है। पर अब जो है सो है ! इसलिए इन अनजानी, तीव्र असर वाली रासायनिक वस्तुओं की ख़रीदारी व उपयोग बहुत कम मात्रा में और सोच-समझ कर ही करना चाहिए। 

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

लॉयड के एसी के गैरजिम्मेदाराना विज्ञापन में दीपिका-रणवीर

पत्नी रूपी दीपिका अपने ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता..............!

https://youtu.be/pi4liCB1O5s

#हिन्दी_ब्लागिंग       

आज जब कोरोना फिर बेकाबू हो कर महामारी का रूप ले रहा है तो ऐसे में सिर्फ सरकार का ही नहीं हर एक देशवासी का फर्ज बनता है कि उस के निरोध के लिए यथासंभव प्रयास किए जाएं। पर ऐसा होता दिखता नहीं ! कुछ लोग, संस्थाएं या उद्योग इसे अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे ! उनके व्यवहार में लापरवाही साफ़ झलकती है ! आज जब हर संभव तरीके और मीडिया के द्वारा लोगों को जागरूक किया जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे विज्ञापन भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि या तो वे इस जागरूकता अभियान को हलके में ले रहे हैं या फिर इसका मजाक सा उड़ा सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे हैं ! 

अभी FMEG बनाने वाली एक कंपनी #लॉयड के #एयर_कंडीशनर का विज्ञापन आया है। जिसमें पति रूपी रणवीर घर में घुसते हुए कहता है, ''देखो-देखो मैं आ गया '' ! पत्नी रूपी दीपिका अपने इस ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों, कपड़ों-जूतों में नहीं ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता !

यह तो सिर्फ एक बानगी है समाज के एक ऐसे तबके की जिससे जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। यहां कंपनी ज़रा सी एहतियात बरतअच्छा संदेश दे सकती थी। वहीं ''फिल्मवाले पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं'' वाली छवि को बदल सकते थे दीपिका और रणवीर जरा सी समझदारी दिखा ! संदेश भी अच्छा जाता, लोगों में जागरूकता बढ़ती ! क्योंकि बहुत से घरों में, बाहर या स्कूल से आए, ऐसा करते बच्चों पर ध्यान कम ही दिया जाता है ! बच्चे ही क्यों बहुत से वयस्कों का भी यही हाल है, जूते लेकर पूरे घर में मंडराते रहते हैं ! हो सकता है ऐसों को अपनी गलती का एहसास हो जाता, खासकर इन कठिन दिनों के दौरान ! इसके साथ ही इन दोनों की छवि और लोकप्रियता में भी इजाफा ही होता ! अब क्या कहा जाए ! जो है वह तो हइए है ! सभी को खुद ही अपनी हिफाजत करनी है और करनी पड़ेगी ही !

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

तीन पैरों वाला फ़ुटबाल खिलाडी

वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीन ‘किक’ लगाने में पारांगत हो गया था। ऐसे ही उसके एक शो को देख एक नामी फुटबाल क्लब से उसे खेलने की पेशकश की गयी। फ्रैंक ने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। देखते-देखते वह सबसे लोकप्रिय खिलाडी बन गया। खेल के दौरान जब वह अपने दोनों पैरों को स्थिर कर तीसरे पैर से किक लगा, बाल को खिलाडियों के सर के उपर से दूर पहुंचा देता तो दर्शक विस्मित हो खुशी से तालियां और सीटियां बजाने लगते।  उसे अपने तीसरे पैर से किसी भी तरह की अड़चन नहीं थी। सिर्फ कपडे सिलवाते समय विशेष नाप की जरूरत पडती थी और रही जूतों की बात तो उसने उसका भी बेहतरीन उपाय खोज लिया था , वह दो जोडी जुते खरीदता और चौथे फालतू जूते को किसी ऐसे इंसान को भेंट कर देता जिसका एक ही पैर हो................!!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज जब किसी इंसान की हाथ या पैर में एक छठी उंगली भी हो भले ही वह अंग क्रियाशील हो या ना हो उसे प्रकृति का अजूबा ही माना जाता है। कहीं-कहीं तो ऐसे अंग वाला भला आदमी हास्य का पात्र भी बन जाता है ! समाज में इसे एक तरह की चीज को विकलांगता के रूप में ही देखा जाता है। सालों पहले हमारे एक पहचान के  युवक को तो इसी ''कमी'' की वजह से रेलवे ने नौकरी भी दे दी थी !  हमारे फिल्म उद्योग में कई सितारे अपनी इन्हीं वजहों को सालों छिपाते रहे हैं। ऐसे में एकआदमी ! तीन पैरों वाला ! उस पर फ़ुटबाल का खिलाड़ी ! कपोल-कल्पना लगती है ! किसी किस्से-कहानी की काल्पनिक उड़ान ! सुन कर सहज ही विश्वास होना कठिन है !  



18 मई 1889, इटली में सिसली के पास, रोसोलिनि कस्बे के एक अस्पताल मे एक बच्चे का जन्म होता है। जिसको देखते ही नर्स जोरों से  लेते ही नर्स जोरों से चीख पडी ! मां घबडा कर रोने लगी ! नर्स की चीख सुन पूरे अस्पताल मे हडकंप मच गया। बात ही कुछ ऐसी थी ! उस नवजात  सवस्थ शिशु के पूर्ण विकसित तीन पैर थे ! उस समय के अंधविश्वासों के चलते उसे अपशगुनी मान लिया गया ! पर परिवार की ममता उसे किसी तरह की हानि पहुंचाने को तैयार नहीं थी। बच्चे के मां-बाप ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे किसी भी तरह ऑपरेशन कर इस तीसरी टांग से बच्चे को मुक्ति दिलवा दें। पर डाक्टर विवश थे ! उन्हें लग रहा था कि ऑपरेशन से या तो बच्चे की मौत हो जाएगी या फिर वह जीवन भर के लिए लकवाग्रस्त हो जाएगा। बच्चे की इस अस्वाभाविक बात को छिपाने की हर मुमकिन कोशिश के बावजूद यह खबर सारे शहर मे फैल गई ! लोग उसे देखने के लिए उमड़ पड़े। 

समय कहां रुकता है, वह बीतता गया। उसके साथ ही फ्रैंक लेंटिनी पूरी तरह स्वस्थ रह कर बडा होता गया। बड़े आश्चर्य की बात थी कि उसे अपने इस तीसरे पैर से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई । बस उसे इसका कुछ उपयोग समझ में नहीं आता था। वह उस पैर से शरीर को सहारा देने का काम लिया करता था। समय आने पर उसके पिता ने उसे एक स्कूल में दाखिल करवा दिया। पर वहां उसके सहपाठियों द्वारा उसका उपहास उडाने और उससे दूरी बनाए रखने के कारण फ्रैंक उदास रहने लगा। पिता ने कारण जान-समझ उसे वहां से हटवा कर एक विकलांगों के स्कूल में भर्ती करवा दिया। वहां के अन्य विकलांग बच्चों को देख उसे महसूस हुआ कि वह तो दूसरे बच्चों की तुलना में बहुत भाग्यशाली है। उसे लगने लगा कि भगवान का दिया यह जीवन बहुत खूबसूरत है। रही बात शारीरिक विकृति की तो उसको भी अपनी विशेषता बनाया जा सकता है। उसे तो अपने तीसरे पैर से किसी तरह की अड़चन ही नहीं है। सिर्फ कपडे सिलवाते समय विशेष नाप की जरूरत पडती है और रही जूतों की बात तो उसने उसका भी बेहतरीन उपाय खोज लिया। वह दो जोडी जुते खरीदता और चौथे फालतू जूते को किसी ऐसे इंसान को भेंट कर देता जिसका एक ही पैर हो।

सकारात्मक सोच से फ्रैंक का अपनी जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। उसने अपने जीवन को बेहतर बनाने, उसमें कुछ करने की ठान ली। इसी सोच के कारण वह हर परीक्षा को विशेष योग्यता से पास करता गया। इतना ही नहीं उसने चार-चार भाषाओं का ज्ञान भी अर्जित किया जो उसके भविष्य में बडा काम आया। समय के साथ उसकी पढाई पूरी होते-होते उसके पास काम के प्रस्ताव भी आने शुरु हो गये थे। पर वह ज्यादातर सर्कस के क्षेत्र से थे । काफी सोच-विचार कर उसने एक नामी सर्कस में काम करना शुरु कर दिया। दैवयोग से वहां उसे काफी नाम और दाम तो मिला ही साथ ही साथ उसके मन से रही-सही हीन भावना भी खत्म हो गयी। वहां रहते हुए उसने अपने तीसरे पैर का भरपूर उपयोग करना भी सीख लिया। अब वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीन ‘किक’ लगाने में पारांगत हो गया था। ऐसे ही उसके एक शो को देख एक नामी फुटबाल क्लब से उसे खेलने की पेशकश की गयी। फ्रैंक ने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। देखते-देखते वह सबसे लोकप्रिय खिलाडी बन गया। लोग बडे से बडे खिलाडी को नजरंदाज कर उसी पर निगाहें गडाए रहते। खेल के दौरान जब वह अपने दोनों पैरों को स्थिर कर तीसरे पैर से किक लगा बाल को खिलाडियों के सर के उपर से दूर पहुंचा देता तो दर्शक विस्मित हो खुशी से तालियां और सीटियां बजाने लगते।

फिर एक समय आया जब पैसा और शोहरत पाने के बाद फ्रैंक की इच्छा घर बसाने की हुई। उनकी जिजीविषा, जिंदगी के प्रति सकारात्मक दृष्टि, हाजिर जवाबी और सेंस ऑफ ह्यूमर से एक युवती थेरेसा मुरे काफी प्रभावित हुई। दोनों ने शादी कर ली और दोनों से चार स्वस्थ बच्चे पैदा हुए। फ्रैंक लेंटिनी का 40 साल से ज्यादा का करियर रहा।उन्होंने करीब-करीब हर बड़े सर्कस और साइड-शो के साथ काम किया। साथियों के बीच उनको काफी सम्मान मिलता था और साथी उनको 'द किंग' कहकर बुलाते थे। अपनी विकलांगता को अपनी शक्ति बनाने वाला, उत्कट जिजिविषा और प्रबल इच्छा शक्ति वाले उस इंसान का 22 सितंबर 1966 में 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से   

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

आ बैल (कोरोना) हमें मार

कुछ लोगों को सही मायनों में जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं.......!!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना ! एक अभूतपूर्व तक़रीबन लाइलाज महामारी, जिससे पूरा विश्व सकते में आ गया, लाखों जाने गयीं, करोड़ों लोग चपेट में आ गए ! अनगिनत लोगों की जीविका नष्ट हो गई ! दसियों देशों की अर्थव्यवस्था भू-लुंठित हो कर रह गई ! उसीका प्रकोप फिर एक बार डराने लगा है ! ऐसा नहीं है कि इस पर काबू नहीं पाया जा सकता, पर हम कुछ लोगों की लापरवाहियां उसको उकसाने से बाज नहीं आ रहीं ! हम उसको हलके में ले अपने पर भारी पड़ने का हर मौका दे रहे हैं ! 

यह सर्वज्ञात है कि कुछ बीमारियों या दवाइयों का सेहत ठीक महसूस होने के बावजूद कोर्स पूरा करना पड़ता है ! बीच में उपचार छोड़ देने से दवा का तब तक का असर भी ख़त्म हो जाता है। वैसा ही कुछ इस कोरोना के साथ भी लागू होता है ! जानकारों के अनुसार दवा के अलावा पूरी सावधानियां तब तक बरतनी हैं जब तक कि इसका पूरा सफाया नहीं हो जाता और यहीं हम सब मात खा रहे हैं ! कुछ विवेकहीन, लापरवाह लोगों की गैरजिम्मेदाराना हरकतों के कारण पूरा देश फिर डर के साये में आ गया है। ऐसे लोग धड़ल्ले से अपनी मनमानी कर रहे हैं, जिसके कारण उन लोगों के घर में भी कोरोना का प्रकोप हो सकता है, जो सुरक्षित रहने की कोशिश में हर संभव उपाय करने में जुटे हुए हैं !

सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए 

कायनात ने कोरोना के माध्यम से हमें जो नसीहत देने की कोशिश की उसकी भयावहता से भी कुछ मनचले कोई सबक नहीं ले पा रहे ! कारण यह भी है कि सही मायनों में उन्हें जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं !   

यह भी सही है कि इंसान के ऐसे पचासों जरुरी काम होते हैं जिनके लिए घर से निकलना बहुत आवश्यक होता है, पर सिर्फ तफरीह के लिए खुद की और दूसरों की जान को आफत में डालना कहां की अक्लमंदी है ! पहले लॉक डाउन के समय भी बहुत से लोगों को घर से बाहर सड़कों और माहौल का ''जायजा'' लेते देखा गया था ! अब तो लापरवाही और भी बढ़ गई है ! ऐसा लगता है कि जैसे घूमने-फिरने, खरीदारी या पुण्यार्जन का मौका फिर कभी हाथ आएगा ही नहीं ! प्रकोप के दौरान आईं छुट्टियों को विवेकहीन लोग सैर-सपाटे के काम में लाने लग जाते हैं ! मेरे ख्याल से तो सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए ! क्योंकि हम ताड़ना की भाषा ही जल्दी समझते हैं। 

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

हैप्पी गुड फ्रायडे ??

आज भी वह वाकया याद है ! गुड़ फ्रायडे की छुट्टी थी । सुबह-सुबह  एक सज्जन का फोन आ गया। छूटते ही बोले,  सर हैप्पी गुड फ्रायडे।  मुझसे कुछ बोलते नहीं  बन पडा ! पर फिर धीरे से कहा, भाई; कहा तो गुड फ्रायडे ही जाता है, लेकिन है यह  एक  दुखद दिवस।  इसी दिन ईसा मसीह को मृत्यु दंड दिया गया था। किसी  क्रिश्चियन दोस्त को बधाई  मत दे बैठना.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

ऐसे बहुत से  लोग हैं,  जिन्हें  सिर्फ छुट्टी  या  मौज - मस्ती  से  मतलब   होता है।  उन्हें  उस दिन  विशेष  के  इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई लेना - देना  नहीं होता !   ऐसा  ही  कुछ  "हादसा"  मेरे संस्थान में होते-होते बचा था जब एक भले आदमी ने छुट्टी का नोटिस जारी करते समय "गुड फ्राइडे के उपलक्ष्य में" लिख दिया था ! समझाने पर वही  तर्क कि जब गुड़ कहा जाता है तो इसका  मतलब अच्छा ही हुआ ना ? और उन महाशय जी ने इतिहास में M.A. की डिग्री ले रखी थी !   

वैसे यह सवाल बच्चों को तो क्या बड़ों को भी  उलझन  में डाल  देता  है  कि जब  इस  दिन इतनी दुखद घटना घटी थी तो इसे "गुड़" क्यों कहा जाता है?  ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज - मस्ती से मतलब होता है, उन्हें उस दिन विशेष के इतिहास  या उसकी प्रासंगिकता से कोई  मतलब नहीं होता। अब इसी दिन को लें, सुबह की बधाई को याद रख, दूसरे दिन काम पर जा बहुतेरे लोगों से इस दिन के बारे में पूछने पर, इक्के - दुक्के को छोड कोई ठीक जवाब  नहीं  दे पाया। उल्टा  उनका  भी यही प्रश्न  था  कि फिर इसे  गुड  क्यों  कहा जाता है। इसका यही  उत्तर है कि  यहाँ "गुड"   का  अर्थ  "HOLY"  यानी पावन के अर्थ में लिया जाता है. क्योंकि इस दिन यीशु ने सच्चाई का साथ देने और लोगों की भलाई के लिए, पापों में डूबी मानव जाति की मुक्ति के लिए उसमें सत्य, अहिंसा,त्याग और प्रेम की भावना जगाने के लिए अपने प्राण त्यागे थे। उनके अनुयायी उपवास रख पूरे दिन प्रार्थना करते हैं और यीशु को दी गई यातनाओं को याद कर उनके वचनों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं।

वैसे भी शुक्रवार का दिन बाइबिल में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुडा हुआ है, जैसे उसके अनुसार सृष्टि में पहले मानव का जन्म शुक्रवार को हुआ माना जाता है ! प्रभु की आज्ञाओं का उल्लंघन करने पर आदम व हव्वा को शुक्रवार के दिन ही अदन से बाहर निकाला गया था । ईसा शुक्रवार को ही गिरफ्तार हुए, जैतून पर्वत पर अंतिम प्रार्थना उन्होंने ने शुक्रवार को ही की और उन पर मुकदमा भी शुक्रवार के दिन ही चलाया गया। शुक्रवार के दिन निर्दोष होते हुए भी ईसा को क्रूस पर चढ़ाया गया !
यह कोई जरुरी नहीं कि हरेक को हर चीज का ज्ञान हो ही ! पर उसको व्यवहार में लाते या उपयोग करते वक्त उसकी जानकारी जरूर ज्ञात कर लेनी चाहिए नहीं तो कई बार विचित्र और विकट स्थितियों का सामना करना पड़ जाता है ! 

मंगलवार, 30 मार्च 2021

लक्ष्मण झूला, ऋषिकेश का

इसको देखने का अनुभव जरूर अलग है पर इसकी दशा देख दुःख होता है। लोगों की भीड़ इस पर सदा जमी रहती है। दसियों फोटोग्राफर अपनी रोजी-रोटी के लिए दर्शकों को यहीं बांधे रखते हैं ! दो-तीन मवेशी भी लोगों के द्वारा खाए-अधखाए-छूटे हुए खाद्य-पदार्थों की खोज में वहीं मंडराते रहते हैं ! सुबह से शाम तक हर वक्त 100-150, इससे ज्यादा ही, लोगों का भार दिन भर झेलते, यह कितने दिन निकाल पाएगा, कहा नहीं जा सकता.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
लक्ष्मण झूला ! ऋषिकेश में गंगा नदी पर बना हुआ यह एक पुल है, जिसे खंभों पर नहीं बल्कि लोहे के मोटे तारों के सहारे बनाया गया है। पहले यह लोगों के और हवा के चलने से झूले की तरह डोलता था इसीलिए इसे झूला नाम दिया गया था। पर अब इसकी उम्र और लोगों के बढ़ते आवागमन को देखते हुए इसे फिक्स कर दिया गया है, अब यह सिर्फ पैदल पथ के रूप में ही प्रयोग किया जाता है। यह गंगा नदी के पश्चिमी किनारे के तपोवन और पूर्वी किनारे पर बसे गांव जोंक को आपस में जोड़ता है। 



पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण वध की सफलता के लिए श्री राम ने लक्षमण जी के साथ यहीं आ कर तपस्या की थी। ऐसी मान्यता है कि आज जहां यह पुल है, उसी जगह से लक्ष्मण जी रस्सियों के सहारे गंगा नदी पार किया करते थे। इसीलिए उस जगह बने पुल का नाम उनके नाम पर पड गया। बहुत पहले यहां लोग छींके या टोकरी में बैठ, रस्सियों के सहारे नदी पार किया करते थे। फिर सन् 1889 में उसकी जगह कलकत्ते के एक धार्मिक, दानी सज्जन सूरजमल जी के द्वारा लोहे के मजबूत तारों से दूसरा पुल बनवाया गया। लेकिन लोहे के तारों से बना वह मजबूत पुल 1924 की एक भीषण बाढ़ में बह कर नष्ट हो गया। इस हादसे के बाद नदी से करीब 70 फीट ऊपर, आज का यह मजबूत एवं आकर्षक, 450 फीट लम्बा और 5 फीट चौड़ा पुल 1929 में बन कर तैयार हुआ, जिसे 11 अप्रैल 1930 में लोगों के लिए खोल दिया गया।


आज रख-रखाव की कुछ कमी और पर्यटकों के बढ़ते दवाब के कारण नब्बे साल से भी ऊपर के इस पुल के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि इसके विकल्प के रूप में नदी पार करने के लिए और पुल भी बन गए हैं पर अपनी प्रसिद्धि के कारण यह अभी भी लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसको देखने का अनुभव जरूर अलग है पर इसकी दशा देख दुःख होता है। लोगों की भीड़ इस पर सदा जमी रहती है। दसियों फोटोग्राफर अपनी रोजी-रोटी के लिए दर्शकों को यहीं बांधे रखते हैं ! दो-तीन मवेशी भी लोगों के द्वारा खाए-अधखाए-छूटे हुए खाद्य-पदार्थों की खोज में वहीं मंडराते रहते हैं ! सुबह से शाम तक हर वक्त 100-150, इससे ज्यादा ही, लोगों का भार दिन भर झेलते, यह कितने दिन निकाल पाएगा, कहा नहीं जा सकता ! 


पुल तक पहुंचने के लिए तक़रीबन 40-45 सीधी सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। जो बुजुर्गों के लिए बहुत सुरक्षात्मक नहीं कही जा सकतीं ! इसके अलावा इस तक का पहुंच मार्ग भी सुविधाजनक नहीं है। असमतल सड़कें, बढ़ती दुकानें, जगह घेरते फेरी वाले, आस-पास मंडराते पशु, पर्यटकों के लिए खासी असुविधा उत्पन्न करते हैं। स्थानीय लोगों का व्यापार तो खूब बढ़ रहा है पर बाहर से आने वाले लोग सहजता महसूस नहीं कर पाते। ऐसे विश्व प्रसिद्ध स्थानों का तो विशेष रूप से रख-रखाव और ध्यान रखा जाना जरुरी है। जिससे आने वालों और स्थानीय लोगों, दोनों का मकसद और ध्येय पूरा हो सके।    

शनिवार, 27 मार्च 2021

बदहाल ऋषिकेश

प्रकृति की गोद में, पहाड़ों से घिरे, गंगा किनारे वनाच्छादित, शांत-स्वच्छ परिवेश की छवि की कल्पना को जैसे ही सड़क पर टंगे दिशानिर्देशक बोर्ड ने, ''ऋषिकेश में स्वागत है'' की सुचना दी तो वहां की हालत देख ऐसा लगा जैसे किसी ने मधुर स्वप्न दिखाती नींद से उठा वास्तविकता की पथरीली सड़क पर पटक दिया हो ! वही किसी आम कस्बे की तरह धूल भरी उबड़-खाबड़ संकरी सड़कें, पहाड़ी से नीचे आते सूखे जलपथ ! उनमें बढ़ता कूड़ा-कर्कट ! लुप्तप्राय हरियाली, भीड़-भड़क्का, शोरगुल, गंदगी का आलम ! मन उचाट सा हो गया...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कभी-कभी सुनी-सुनाई बातों से या मीडिया के माध्यम से किसी अनदेखे स्थान के बारे मेंं एक धारणा सी बन जाती है जो अपने हिसाब से दिमाग में उसके बारे में एक काल्पनिक चित्र का चित्रण कर देती है ! पर जब वहां जा कर उस जगह की असलियत सामने आती है तो सब कुछ झिन्न- भिन्न सा हो कर रह जाता है ! कुछ ऐसा ही हुआ जब पहली बार ऋषिकेश जाने का सुयोग बना।  


दूर के ढोल 

पिछले दिनों परिस्थियोंवश उत्तराखंड के शहर कोटद्वार जाने का मौका मिला। वहां जाते समय तो मुज़फ्फरनगर के खतौली से नजीबाबाद होते हुए गए थे। पर लौटते हुए हरिद्वार होते हुए आने का विचार बना। इसका एक कारण हरिद्वार के पास तक़रीबन 15 किमी दूर बहादराबाद में रह रहे अति स्नेही आर्या परिवार से मिलना था, जिन्हें मिले तकरीबन चालीस साल हो चुके थे। दूसरा योग की वैश्विक राजधानी ऋषिकेश,जहां अभी तक कभी भी जाना नहीं हो पाया था। 


वैसे तो हरिद्वार कई बार जाना हुआ था पर इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि उससे सिर्फ 20-22 की. मी. की दूरी पर स्थित ऋषिकेश जाने का कभी भी सुयोग नहीं बन पड़ा। सो हफ्ता भर कोटद्वार में रहने और आस-पास की महत्वपूर्ण जगहों का भ्रमण करने के पश्चात बहादराबाद का रुख किया गया। दूसरे दिन तय कार्यक्रमानुसार भोजनादि के बाद एक बजे, जब पावन नगरी ऋषिकेश के लिए रवाना हुए तो उसकी, प्रकृति की गोद  में, पहाड़ों से घिरे, गंगा किनारे वनाच्छादित, शांत-स्वच्छ परिवेश की छवि की कल्पना थी। पर जैसे ही सड़क पर टंगे दिशानिर्देशक बोर्ड ने ऋषिकेश में स्वागत है की सुचना दी तो वहां की हालत देख ऐसा लगा जैसे किसी ने मधुर स्वप्न दिखाती नींद से उठा वास्तविकता की पथरीली सड़क पर पटक दिया हो !



आश्रमों या मठों का वातावरण भले ही स्वच्छ-शांतिमय हो पर बाकी, वही किसी आम कस्बे की तरह धूल भरी उबड़-खाबड़ संकरी सड़कें, पहाड़ी से नीचे आते सूखे जलपथ ! उनमें बढ़ता कूड़ा ! टूटे घाट ! लुप्तप्राय हरियाली, भीड़-भड़क्का, शोरगुल, गंदगी का आलम ! यह सब देख मन उचाट सा हो गया ! पेशोपेश यह कि अब क्या करें, कहां रुकें ! उस समय दिमाग में एक ही नाम आया, लक्ष्मण झूला ! पूछ-ताछ कर गाडी को उधर मोड़ा गया। किसी तरह उस जगह पहुंचे ! आड़ी-टेढ़ी, उबड़-खाबड़ सी पार्किंग में सौ रूपए का जुर्माना दे कर गाडी खड़ी की। वहां से दो सौ मीटर चल कर गंतव्य  तक पहुंचे। यहां से झूले तक जाने के लिए सीधी 42 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। गंगा नदी पर बने इस पैदल पहले के झूलते पुल को अब फिक्स कर कर  दिया गया है ! यही यहां का मुख्य आकर्षण है। पर ऋषिकेश शहर की तरह यह भी हम नागरिकों की लापरवाही का अंजाम भुगत  रहा है !


अनिंयत्रित  आबादी, सुगम यात्रा पथ,  उपलब्ध सुविधाएं,  बढ़ते  पर्यटन प्रेम  से हर  पर्यटन स्थल का रख-रखाव दूभर होता जा रहा है ! कहीं भी  चले जाइए, बदहाली - बदइंतजामी का माहौल है। स्थानीय  लोगों की आमदनी तो बढ़ रही है, पर  ऐसा लगता है  कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जल्द  ही लालच का शिकार हो अपना अस्तित्व गंवाने वाली है।  कमाई की हवस में जब हम अपने स्रोत को ही सूखा डालेंगे तो फिर उपार्जन कहां से होगा ! ऐसे पौराणिक,  धार्मिक,  इतिहासिक स्थलों के  संरक्षण के  लिए विशेष योजनाओं की जरुरत है। आज हरिद्वार को कुंभ के अवसर  पर अलौकिक रूप से  संवारा जा रहा है. तो उससे जुड़े इस महत्वपूर्ण स्थल ऋषिकेश की उपेक्षा ना कर उसकी भी सुध जरूर ली जानी चाहिए।                                              

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