शुक्रवार, 19 जून 2026

टायरानोसौरस, शरीर चालीस फुट का, हाथ सिर्फ तीन फुट के 😯

एक विशालकाय जीव जिसकी लंबाई 40 से 45 फीट, ऊंचाई तकरीबन 20 फीट, एक-एक फुट के दांत, जिसका वजन आज की दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, इतना विशाल और शक्तिशाली शिकारी, पर उसके हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी यदि अगर तुलना की जाए तो 6 फीट लंबे व्यक्ति की बांहें केवल 10-12 इंच की ! ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है.............!    

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्र कृति अपने-आप में एक अबूझ पहेली है ! इसके खेल बड़े निराले होते हैं, जिसमें आँखों से दिखाई ना देने वाले सूक्षतम जीवाणु से लेकर पर्वताकार प्राणियों तक हजारों-लाखों खिलाड़ी शामिल हैं ! उन्हीं में से एक, छिपकलियों के पूर्वज, लुप्त डायनासोर प्रजाति के अजूबे टायरानोसौरस, जिसे टायरानोसौरस रेक्स या टी-रेक्स भी कहा जाता है, भी शामिल हैं ! फिल्मों से लगाव रखने वाले देसी-विदेशी दर्शकों ने इनका आभासी रूप जुरासिक पार्क जैसी फिल्मों में देखा होगा, जिनमें ये अपने पूरे जलवे के साथ उपस्थित थे !  

 टायरानोसौरस

फिल्म 

टा यरानोसौरस, इसके अवशेषों से पता चलता है कि यह आज से करीब साढ़े छह करोड़ साल पहले मुख्यत: उत्तरी अमेरिका की धरती पर विचरण करने वाले प्रसिद्ध डायनासोरों में से एक, बेहद खतरनाक शिकारी था ! पर जबसे इसका पहला कंकाल, 1900 के शुरुआती वर्षों में खोजा गया, तभी से वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम लोग भी समझ नहीं पा रहे कि 40 से 45 फीट की लंबाई, तकरीबन 20 फीट की ऊंचाई, एक-एक फुट के दांतों वाले इस जीव, जिसका वजन दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो, इतना विशाल और शक्तिशाली शिकारी, पर उसके हाथों की लंबाई सिर्फ तीन फुट ! यानी 6 फीट लंबे व्यक्ति की बांहें केवल केवल 10-12 इंच की ! दरअसल, टी. रेक्स अकेला ऐसा डायनासोर नहीं था, जिसकी भुजाएं छोटी थीं और भी कई प्रजातियों में ऐसी विसंगति थी ! पर ऐसा क्यों था, यह रहस्य अभी तक सुलझ नहीं पाया है !

उनका समय 

तुलना 

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि  टायरानोसौरस में बड़े सिर का बदलाव उन इलाकों में शुरू हुआ होगा जहां उसके शिकार भी बहुत बड़े होते होंगे। जिन्हें हाथों से पकड़ कर काबू कर पाना मुश्किल होता होगा, इसमें उनका विशाल व शक्तिशाली जबड़ा ज्यादा कारगर सिद्ध होता होगा ! इसीलिए ऐसा माना जा रहा है  कि इन डायनासोरों का बड़ा सिर शिकार करने में अधिक उपयोगी होने के कारण और शरीर के संतुलन के लिए हाथ छोटे होते चले गए होंगे ! 

जबड़े की उपयोगिता 

फि लहाल वैज्ञानिक अभी भी पूरी तरह नहीं जानते कि टी. रेक्स अपने हाथों का उपयोग कैसे करता था या वे इतने छोटे ही क्यों विकसित हुए। शायद भविष्य में कोई नई खोज इस रहस्य को सुलझा सके !

@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

मंगलवार, 16 जून 2026

बरगलाए हुए "जेंजी'' 😞

अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग            

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे सैकड़ों-हजारों नाम दर्ज हैं, जो उम्र में भले ही छोटे थे, लेकिन उनके हौसलों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी !  ऐसे किशोर और युवा, जिन्होंने अपने लहू से वतन की मिटटी को सींचा, बिना जुल्म-ओ-अत्याचार की परवाह किए -

बाजी राउत 
*बाजी राउत, सिर्फ 12 साल का बच्चा, सबसे कम उम्र का शहीद, जिसे अंगेजों का हुक्म ना मानने की वजह से गोली मार दी गई थी ! 

*खुदी राम बोस, युवा क्रान्तिकारी, 18 साल की उम्र में फांसी दे दी गई ! 

*करतार सिंह सराभा - 19 साल की उम्र में फांसी।  

*प्रफुल्ल चंद्र चाकी - उम्र 19 साल। पर अंग्रेजी हुकूमत उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी ! 

*भगत सिंह, * सुख देव, *शिवराम राजगुरु - इन्हें कौन नहीं जानता, जिन्हें सिर्फ 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था ! 

*चंद्र शेखर आजाद ! जिन्हें सपने में भी देख कर अंग्रेजों को पसीना आ जाता था ! धोखे से घेरा गया, पर कोई जिंदा नहीं पकड़ पाया ! जब देश को प्राण अर्पण किए तो उम्र थी महज 24 साल !  

 *मदन लाल ढींगरा - 25 साल, अंग्रेजों पर गोली चलाने के लिए फांसी ! 

*राजेंद्र लाहिरी - 26 साल, काकोरी केस में फांसी।  

*अशफाक उल्ला खां - 27 साल,  काकोरी केस में फांसी। 

*पंडित राम प्रसाद बिस्मिल - 30 वर्ष, मैनपुरी और काकोरी केस में फांसी  

*चेत राम जाटव - 30 साल। अंग्रेजों की खिलाफत के कारण गोली मार दी गई ! 

*मंगल पांडे - 30 साल की उम्र में फांसी। 

*जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, युवावस्था में एक बाघ से भिड़ कर मार डालने के कारण नाम पड़ा. ''बाघा जतिन'', 35 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए ! कनक लता बरुआ 15 साल, बादल गुप्ता 18 वर्ष, हेमू कालाणी 19 साल, अनंत लक्ष्मण 19 साल, प्रफ्फुल चाकी 19 साल, बसंत कुमार विश्वास 20 साल, कन्हाई  लाल दत्त 20 वर्ष.........कितने गिनाएं, कहां तक गिनाएं, स्याही खत्म हो जाएगी, कागज कम पड़ जाएंगे !  

अपने ऐसे शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों पर हरकत कर रहे हों ! जिनका देश के इतिहास से, उसकी संस्कृति से, उसके संस्कारों से दूर-दूर का नाता ना हो ! जो कुछ देर की धूप की तपन से ही बेहोश हो जाएं ! जिन्हें जरा सी गर्मी ही बेचैन कर दे ! जिनकी सहूलियत के लिए सेवक पंखा और शीतल पेय के साथ नियुक्त हों ! जिनको क्रांति का सही अर्थ ही मालूम ना हो ! रईसों के ऐसे भटके हुए बददिमाग, बदजुबान लड़कों से अपने शहीदों की तुलना तो दूर उनके नाम के साथ इन्हें जोड़ना भी बहुत बड़ा अपराध होगा !  

क्रांति यानी किसी संरचना में आमूलचूल परिवर्तन ! जो अवाम और देश के हित में हो ! ऐसी स्थिति के लिए मुख्य कारण जनमानस में अंसतोष का होना होता है, जो समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या किसी  मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न हुआ हो ! परंतु ऐसा बदलाव या परिवर्तन लाने के लिए ठोस कारण का होना बेहद जरुरी है ! इसके साथ ही दृढ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस, सच का दामन, अटूट धैर्य, देशप्रेम और देशहित की भावना का होना भी बहुत जरुरी है। 

@वंदे मातरम ! राष्ट्र प्रथम 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

बुधवार, 10 जून 2026

गर्मी को धता बताता टिटलागढ़ का शिव मंदिर

ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है.....................! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारा देश एक धर्म प्रधान देश है ! यहां हजारों-लाखों मंदिर, देवस्थान हैं ! उनमें से अनगिनत ऐसे  हैं, जिनके साथ कोई ना कोई रहस्यात्मक बात जुडी हुई है, जिसका अथक प्रयासों, वैज्ञानिक कोशिशों के बावजूद निवारण नहीं हो पाया है ! ऐसा ही एक शिव-पार्वती मंदिर, उड़ीसा के टिटलागढ़ में स्‍थापित है जो अपनी अनूठी विशेषता के कारण जगत्प्रसिद्ध है ! 

 

प्रवेश द्वार 

डिशा ! देश के पूर्वी तट पर स्थित यह हमारा आठवां सबसे बड़ा राज्य है। यह अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां कई प्राचीन, रहस्यमय, विश्वविख्यात मंदिर हैं।देश की इस सबसे गर्म जगह का भी सबसे गर्म इलाका है टिटलागढ़ ! जहां गर्मियों में दिन का अधिकतम तापमान 55 डिग्री तक चला जाता है ! उसी टिटलागढ़ के कुम्हडा पहाड़ी की चोटी पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का एक अद्भुत मंदिर स्थित है। गर्मियों में कुम्हरा पर्वत की चट्टानें और पत्थर इतने गर्म हो जाते हैं कि वहां किसी का भी कुछ मिनटों के लिए भी ठहरना मुहाल हो जाता है ! पर आश्चर्य की बात यह है कि इस भीषण गर्मी का मंदिर के अंदर लेष मात्र भी असर नहीं पड़ता और वहां ठंडक बनी रहती है ! 

प्रांगण 
इस अनोखे मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि बाहर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे इसके अंदर बिना एसी, कूलर या पंखे के तापमान कम होता चला जाता है ! कभी-कभी तो यह दस डिग्री से भी नीचे पहुंच जाता है ! बाहर के 50 डिग्री के तापमान से आया इंसान तब आश्चर्यचकित सा रह जाता है, जब वह मंदिर के अंदर विद्यमान पुजारी और श्रद्धालुओं को गर्म कपड़े ओढ़े बैठा देखता है ! पर कुछ ही देर में मंदिर में प्रवेश करते ही बाहर की भीषण गर्मी से परेशान वह श्रद्धालु भी ठंड से कांपने लगता है और उसे भी किसी गर्म वस्त्र की जरुरत पड़ ही जाती है ! तापमान के इस बदलाव का रहस्य अभी तक वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए हैं। 

विलक्षणता 
ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है ! 

हर हर महादेव 
यह शिव मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का निर्माण पत्थरों से किया गया है और इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी भी की गई है। मंदिर के अंदर एक शिवलिंग स्थापित है, हालांकि, इसके निर्माण का समय या इसे किसने बनवाया, इस बारे में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है। आस्था के इस केंद्र में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के भीतर एक छोटा सा कुंड है, बाहर चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो पूरे साल इसमें ठंडा पानी मौजूद रहता है ! हो सकता है कि इस पानी के स्रोत की वजह से मंदिर में तापमान कम रहता हो ! जो भी हो मंदिर की यही विशेषता इसको और भी अद्वितीय बनाती है। 

 

विहंगम दृश्य 
डिसा के बालांगीर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 59 पर स्थित टिटलागढ़ इलाके में विद्यमान इस मंदिर तक देश के किसी भी हिस्से से रेल, हवाई या सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है ! ओडिशा के सबसे बड़े शहरों में से एक टिटलागढ़ का सभी जगहों से बेहतरीन कनेक्शन है। विदेशों की यात्राओं से पहले हमें अपने देश को एक बार पूरी तरह देख, समझ, टटोल लेना चाहिए !

@ सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए

बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह मुफ्तखोर गीदड़ दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप को सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को रोज तंग करने लगा ! किसी से कुछ भी छीन लेना उसके लिए आम बात हो गई ! अब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या किसी ताजा घटना की याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है.............  😊   

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

र इंसान के जीवन में कम से कम एक बार तो समय अनुकूल होता ही है ! उसी वक्त की मेहरबानी के चलते पिद्दी भी पहलवान बन जाती है ! पर कुछ पिद्दियां इतिहास से कोई सबक ना लेते हुए इस अनुकूलता को अपनी नियति, अपना शौर्य समझ इतनी अराजक, अहंकारी और धृष्ट हो जाती हैं कि खुद को ही भगवान समझने लगती हैं ! वे भूल जाती हैं कि समय कभी भी एक समान नहीं रहता ! ऐसी ही कुछ पिद्दियों का हश्र देख बचपन की एक कहानी याद आ गई, जो यही सीख देती है कि किसी को भी अपनी औकात, अपनी बिसात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए ! कहानी कुछ इस प्रकार है :

भटकन 
क जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।


ऐश 
गीदड़ के समय के अनुकूल होते ही उसके दिन फिर गए। बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को तंग करने लगा ! किसी से उसका कुछ भी छीन लेना आम बात हो गई ! धीरे-धीरे उसे लगने लगा की इन डरपोक जानवरों का तो मैं भी शिकार कर सकता हूँ !  ऐसा ख्याल आते ही अब वह शेर को शिकार करते हुए ध्यान देखने लगा। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। 
समझाइश 
गीदड़ अपने गुमान में अपनी औकात भूल गया ! उसे लगने लगा कि शिकार करना तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आए हैं, आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताए, पर गीदड़ जिद पर अड़ा रहा तो शेर ने उसे इजाजत दे दी। समय ने करवट ले ली थी !
मतिभृष्टता 
अंत 
दूसरे दिन सुबह वह मांद से निकला। जंगल में कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आ गया। आज तक उसने हाथी का मांस नहीं खाया था। पर उसे मालुम नहीं था कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जाएगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद तो गया, पर हाथी के विशाल शरीर से टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने उसकी हरकत पर झुंझला कर उसे सूंड में लपेट दूर उछाल दिया ! गीदड़ की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया। शेर ने एक बार उधर देखा फिर अपना मुंह मोड़ लिया !
ब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या कोई ताजा घटना याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है 😊  

@छवियों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 29 मई 2026

दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है

कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी रक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! उनको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग को लक्ष्य बनाने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है...........😡

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

अभी पिछले दिनों कुछ पूर्वाग्रही, कुंठित, अराजक तत्वों ने देश की युवा पीढ़ी की तुलना उस   2.5x4x1.5cm के आकार के कीड़े से की, जो इस दुनिया में करीब 35 करोड़ सालों से रेंग रहा है ! जो एक कीड़ा नहीं बल्कि चलता-फिरता जीवाश्म है ! तो क्या ऐसे लोगों ने सिर्फ इसलिए एक घृणित जीव को अपना आदर्श बना लिया क्योंकि वह करोड़ों वर्षों से ''सर्वाइव'' कर रहा है ? नहीं ! उनका मुख्य उद्देश्य उस जीव के ''सर्वाइवालपने'' के पैटर्न को अपने से जोड़, एक गलत नेरेटिव गढ़, देश के युवा वर्ग को गुमराह करना था ! पर उनके उस विलेन नुमा हीरो के चरित्र, उसका व्यवहार, उसकी कारस्तानियों ने इनके गुब्बारे के फूलने से पहले ही हवा निकाल दी ! 

एजेंडा 

वैसे तो इस कीड़े का हमारे ग्रंथों में कोई जिक्र नहीं मिलता, पर ऐसा तो नहीं कि इस राक्षसी प्रवृति के सर्वाहारी जीव को अपने दुराचार, पापों, कुकर्मों की वजह से, अश्वस्थामा की तरह ही कोई श्राप मिला हो, जिसकी वजह से इसे घृणा-वितृष्णा सहते हुए धरती पर गंदगी व मलिनता में वर्षों-वर्ष से रहना पड़ रहा हो ! उसी मलिनता के कारण दूषित हुए दिलो-दिमाग ने इसे ''वेक्टर'' बना दिया हो !

अनगिनत बीमारियों का वाहक 
पि छले दिनों देश में जो एक अराजक माहौल बनाया गया, जिसका आधार, वर्षों पहले विश्व-विख्यात उपन्यासकार फ्रांज काफ्फा का लोकप्रिय उपन्यास ''द मेटामॉफोर्सिस'' था ! जिसमें उन्होंने एक अकर्मण्य, आत्मश्लाघि, बरोजगार, परदोषी युवक की कहानी बयां की थी जो अपने को, लियाकत ना होते हुए भी सर्वगुणसम्पन्न समझता है ! एक दिन जब वह अपनी नौकरी जाने के बाद, गंदगी से भरे अपने कमरे में सुबह नींद से जागता है तो खुद को एक कीड़े के रूप में पाता है और वह कीड़ा था कॉकरोच यानी तिलचट्टा ! 

किताब का कवर 

इसी को आधार बनाया गया 

ले खक काफ्फा ने उस युवक को एक पीड़ित के रूप में दर्शाया था ! इन दिनों उसी भाव को ले उड़ा गया कि मैं पीड़ित हूँ ! मेरे ऊपर अत्याचार किया जा रहा है ! मुझे सताया जा रहा है ! सिस्टम दोषी है ! इसे बदलने के लिए क्रांति करनी होगी ! विडंबना यह है कि जो परजीवी खुद को पीड़ित दिखा रहे हैं, वे खुद कोई उपक्रम करना नहीं चाहते ! बस पड़े रहना, गंदगी फैलाना और जहां हैं उसी को बर्बाद करना उनका उद्देश्य है ! फिर भी उस उपन्यास के लड़के की तरह ये लोग चाहते हैं कि बिना कुछ किए, दूसरों की तरह उन्हें सम्मान मिले, उनकी बात सुनी जाए, उन्हें अधिकार भी दिए जाएं ! 

कपट 
ऐसा होने से पहले ही उपाय जरुरी 
कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों की नहीं, इंसानों की है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! क्या ऐसे लोग, अभिभावक या समाज अपने बच्चों को कभी भी कॉकरोच कहलवाना गवारा करेगा ? क्या कोई भी माँ-बाप यह चाहेगा कि उसका बच्चा आलसी, निकम्मा बन घर पर बोझ बने ? क्या कोई भी चाहेगा कि उसकी संतान को देश-परिवार-समाज विरोधी समझ हिकारत से देखा जाए और उन्हें ताने सुनने पड़ें ? काफ्फा भी अपने नायक के प्रति सहानुभूति रखने के बावजूद सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ पाया और उसको उस नालायक युवा का उसी के परिवार के सदस्यों द्वारा बहिष्कार करते हुए दिखाना पड़ा ! 
मनोरमता 
नको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग कॉकरोच कह अपना लक्ष्य साधने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! वह बेहद  क्षुब्ध हुआ है ऐसी हरकत से ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है ! वह यह भी अच्छी तरह से जानता है कि यदि इन सर्वाहारी जीवों को जरा सी भी सहानुभूति दे पनपने दिया, तो एक दिन वे उसी को खा जाएंगे, समाज को नष्ट कर देंगे, देश को खतरे में डाल देंगे  !  इसलिए वह सावधान भी है ! 

जागरूकता 
 मय बदल गया है ! लोग अब अफवाहों, गलत नेरेटिव के बहकावे में नहीं आते ! समाज जागरूक हो चुका है ! उसके पास गंदे, घिनौने, चालाक, कीड़े की खाल ओढ़ धोखा देने वाले कपटी और कुटिलों की खातिर के लिए पुरातन उपाय चप्पल का तो है ही, साथ में आधुनिक हथियार ''हिट'' तो हइए है...........!

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 22 मई 2026

हल्की आंच पर भुनते खोवे के धुएं ने कइयों के भूत उतार दिए

जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा, तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! कर्कशता की जगह जुबान में चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां-संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग   

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया ! 

ताड़ना भी जरुरी है 
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 
दिनचर्या 
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी ! 

आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम 
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बदजुबान वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! 
 

फिजा में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां, संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी, पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं होता.........!

@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 19 मई 2026

आजकल वो इस तरफ देखता है कम

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! पर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य  को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट बदस्तूर वैसे ही चली आ रही है ! मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! वैसे साख भी तो उन्हीं की दांव पर लगी है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए ! ऋतुएं बनाईं ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे ! कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 

सृष्टि रचना 

दे वलोक के झरोखे पे बैठ इन खिलौनों का वीडियो गेम खेला व देखा जाने लगा ! पर खेल कितना भी मनोरंजक हो, कितनी देर तक देखा जा सकता है ? सो अगला भी कुछ समय पश्चात इसे ''ऑटोपायलट मोड'' पर डाल फारिग हो गया ! इसमें उसके तो कुछ पल ही व्यतीत हुए पर पृथ्वी पर करोड़ों साल निकल गए, सदियां बीत गईं, युग बदलते चले गए ! शुरूआती समय तो अच्छा था, कृतियों को प्रभु ने मन लगा कर बनाया था, वे नेक, समझदार, विवेकी थीं ! पर प्रभु ने समय भी तो बनाया था, जो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी एक सा नहीं रहने देता !

मानवातरण 
वैसे नीचे जो भी टूट-फूट या किसी की एक्सपायरी हो, उसका रिप्लेसमेंट और सप्लाई ऊपर से बदस्तूर जारी तो है ! पर वस्तु की क्वालिटी में गिरावट का एहसास दिखने लगा है ! खासकर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट लगातार बढ़ती ही जा रही है ! यदि मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती होंगी, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! ध्यान तो उन्हें ही देना है ! साख तो उन्हीं की दांव पर लगी है !

धरा 
इसी लापरवाही का नतीजा है कि संसार में कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां शांति हो ! जहां लोग चैन से रहते हों ! जहां लोगों का जीवन दुश्वार ना हो गया हो ! जहां के रहवासियों के स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो ! जहां भाईचारा खत्म ना हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों ! जरा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो ! पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन ना समझते हों ! ऐसा ही रहा तो क्या ईश्वर की बेहतरीन कृति और सृष्टि ज्यादा समय तक बच पाएंगे ? 

तांडव, हर जगह 
अब तो प्रभु ही कुछ करें तो करें ! निर्माण के दौरान वहीं सुधार हो जाए ! कमियां वहीं दूर कर दी जाएं ! वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा पर ना किया जाए  ! कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए ! यदि ऐसा हो सके तो इन विकारों से उपजी व्याधियों, अराजकताओं, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए, जो बार-बार कभी प्रभू को, कभी जगत जननी माँ को, तो कभी विघ्नेश्वर को इस धरा पर आना पड़ता है, उस आने-जाने से बचने वाले समय का सदुपयोग वे अपनी ही कृतियों की भलाई में कर सकते है ! क्योंकि उनका मकसद और उद्देश्य भी तो अपने बच्चों को खुश रखने का है, ना कि उन्हें दंडित करने का........!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

विशिष्ट पोस्ट

टायरानोसौरस, शरीर चालीस फुट का, हाथ सिर्फ तीन फुट के 😯

एक विशालकाय जीव जिसकी  लंबाई 40 से 45 फीट, ऊंचाई तकरीबन 20 फीट, एक-एक फुट के दांत, जिसका वजन आज की दुनिया के सबसे विशाल हाथी से भी ज्यादा हो...