pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: सरसों का साग
सरसों का साग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सरसों का साग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 28 अगस्त 2024

जब क्लास ले ली सब्जी वाली अम्मा ने ! किस्सा-ए-रायपुर

अभी कुछ दिनों पहले ही एक खान-पान के एक संस्मरण को ब्लॉग पर उतारा था, अब उसी से संबंधित एक और वाकए ने ऊपरी माला ऐसा हथियाया है कि खाली करने को ही तैयार नहीं है ! हालांकि लगभग एक ही जैसे विषय पर दो रचनाएं किसी को ऊबा भी सकती हैं, पर मेरी मजबूरी है कि उसको मूर्त रूप नहीं दिया तो पता नहीं कब तक ऐसे ही दिमाग में चिपका रहेगा ! तो आज स्वांत: सुखाय के साथ-साथ रायपुर के आत्मीय जनों की खातिर ही सही........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कभी-कभी यादों के झरोखों से अपना अतीत दिखने लग जाता है और फिर वह दिमाग में उतर जम कर बैठ जाता है ! अभी कुछ दिनों पहले ही एक खान-पान के एक संस्मरण को ब्लॉग पर उतारा था, अब उसी से संबंधित एक और वाकए ने ऊपरी माला ऐसा हथियाया है कि खाली करने को ही तैयार नहीं है ! हालांकि लगभग एक ही जैसे विषय पर दो रचनाएं किसी को ऊबा भी सकती हैं, पर मेरी मजबूरी है कि उसको मूर्त रूप नहीं दिया तो पता नहीं कब तक ऐसे ही दिमाग में चिपका रहेगा ! तो आज स्वांत: सुखाय के साथ-साथ रायपुर के आत्मीय जनों की खातिर ही सही !    

बात तब की है जब ग्रहों के षड्यंत्र के चलते अस्सी के दशक में हमारा सारा परिवार, तब के मध्य प्रदेश के रायपुर शहर में जा बसा था ! मेरी बुआ जी का सालों से वहां स्थाई निवास था ! देश के विभिन्न शहरों में बसे हमारे परिवारों में से दो उस समय एक जगह हुए थे ! एक नवंबर 2000 में उसी रायपुर को छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी बना दिया गया ! उन दिनों रायपुर एक सुस्त, कस्बाई शहर हुआ करता था ! दुकानें, बाजार दोपहर को बंद हो जाते थे और फिर शाम को चार बजे के आस-पास खुला करते थे ! बड़े शहरों की तरह भीड़-भड़क्का, आपा-धापी कुछ नहीं ! अपनी मंथर गति से चलता हुआ एक शांत, उनींदा सा, तालाबों का नगर ! पर राजधानी बनने के बाद पूरी तरह से इसका कायापलट हो चुका है ! चंडीगढ़, भुनेश्वर की तरह पूरी तरह व्यवस्थित नया रायपुर देश के कई शहरों के लिए मॉडल सिद्ध हो सकता है ! कई मायनों में तो दिल्ली तक को भी मात दे रहा है यह शहर !

उस समय मालवीय रोड़ मुख्य बाजार हुआ करता था ! छोटी-बड़ी जरुरत की वस्तुएं वहां उपलब्ध रहती थीं। उसी को केंद्र बना बाकी के छोटे-छोटे बाजार, दफ्तर, डाकघर, कुछ सिनेमा घर, बैंक, वगैरह उसके आस-पास ही स्थित थे ! वही इलाका सिटी कहलाता था ! वहां के आराम तलब लोगों की मनोदशा यह थी कि यदि कोई भला आदमी अपना काम निपटा, सिर्फ दो-एक किमी दूर अपने घर वापस आ जाता था और कहीं बाई चांस, कभी-कभार, भूले-भटके, शहर संबंधित किसी चीज की जरुरत पड़ जाती थी तो जाने उस पर आफत आन पड़ती थी ! अरे ! फिर सिटी जाना पड़ेगा...!'' दिल्ली-कलकत्ता से हम जैसे वहां पहुंचे लोगों को, जिनका पहले रोज करीब पचास से ऊपर का सफर हो जाता था, यह सुन बड़ा अजीब सा महसूस किया करते थे ! 

तो बात हो रही थी हमारे विस्थापन की ! हमारा ठिकाना बना था, न्यू शांति नगर ! तो एक बार ठंड के दिनों में ऐसे ही विभिन्न खाद्य पदार्थों की रायपुर में उपलब्धि पर चर्चा में मकई का आटा भी आ फंसा ! उन दिनों किराने की सबसे नामी दूकान घनश्याम प्रोविजन स्टोर हुआ करती थी, जो मोती बाग के पास चौराहे पर, मालवीय रोड़ से फर्लांग भर दूर स्थित थी। बताया गया कि और कहीं मिले ना मिले वहाँ जरूर मिल जाएगा!मैंने अपना स्कूटर उठाया और पहुँच गए घनश्याम किराना भंडार ! दस मिनट भी तो नहीं लगते थे ! 

वह विलक्षण वस्तु वहाँ तो ना मिली, पर एक नई जानकारी का इजाफा जरूर हुआ ! घनश्याम जी ने कहा कि सर आज तो यह मेरे पास नहीं है, पर अगली बार जब आप आओगे तो यह आटा यहां जरूर मिलेगा ! मैंने जिज्ञासावश पूछ कि ऐसा क्यों ? उन्होंने कहा कि अभी तक इसकी डिमांड नहीं आई थी। अब आपने चाहा है तो मैं जरूर रखूँगा क्योंकि मेरा उसूल है कि ग्राहक कभी भी बिना सामान लिए वापस नहीं जाना चाहिए ! तभी मुझे समझ आया कि सिंधी समाज व्यापार में इतना आगे क्यों है ! उन्होंने ही मुझे बताया कि बांसटाल में कृष्णा आटा चक्की पर यह आपको मिल जाएगा, पर अगली बार आप मुझसे ही लें ! प्रसंगवश बता दूँ कि दो-तीन साल में ही उनकी दूकान से मौसम पर चार से पांच बोरी मक्के का आटा बिकना शुरू हो गया था ! हम जब भी मिलते थे तो इस बात का जिक्र वे वहाँ उपस्थित सभी लोगों से किया करते थे कि शर्मा जी के कारण ये चीज मैंने रखनी शुरू की है ! इसीलिए मुझे तनिक गुमान सा है कि रायपुर में इस व्यंजन को लोकप्रिय बनाने में मेरा भी कुछ योगदान तो जरूर है !  

मकई के आटे के साथ वहाँ सरसों के साग की उपलब्धि की बात भी कर ली जाए ! तो लगे हाथ बता दूँ कि छत्तीसगढ़ में इस तरह के पत्तेदार साग को भाजी कहते हैं, जैसे पालक भाजी, मेथी भाजी, चना भाजी इत्यादि ! वहाँ के सबसे बड़े सब्जी बाजार, जिसे शास्त्री मार्किट (अंग्रजी भाषा के शब्द छत्तीसगढ़ी में बिलकुल दूध में पानी की तरह घुल-मिल गए हैं) में भी यह ''महोदया'' कभी-कभार ही मिलती थीं ! पर शंकर नगर के पास टाटीबंध के इलाके में सुबह लगने वाले बाजार में, जहां छोटे खेतिहर अपना उत्पाद खुद ही ले कर आते थे, इनकी उपलब्धि बनी रहती थी ! 

सरसों के पत्ते 
तो एक दिन अपने सहोदर के साथ पहुँच गए टाटीबंध ! तरह-तरह की हरी भाजियों को सजाए एक सब्जी विक्रेता महिला से पूछा कि सरसों भाजी है ? तो उसने छोटी बच्चियों की चोटियों की तरह की पांच गुच्छियां हमें पकड़ा दीं ! हमने कहा, अम्मा ! हमें दो किलो चाहिए ! यह सुनते ही उस महिला ने मुंह बाए, आश्चर्यचकित हो हमें ऐसे देखा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से उतरे हों ! छत्तीसगढ़ी भाषा में हमारी क्लास लग गई -

कितना चाहिए ?''

दो किलो !

........इतना क्या करोगे ?''                 

खाएंगे''

इत्ता सारा ?''

तब तक माजरा हमें समझ में आ गया था, सो बात खत्म करने के लिए कह दिया कि -

अम्मा ! भोज है, बहुत सारे लोग आएँगे''  

सब्जी वाली अम्मा को पता नहीं हमारी बात पर कितना यकीन हुआ पर उन्होंने उस छोटी सी बजरिया में अपने साथियों को फरमान भेज दिया ! जिसके पास जितनी सरसों भाजी थी, सब लेकर हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए ! पर सब मिला कर भी दो किलो नहीं बन पाया था ! कुछ विक्रेता, बहती गंगा देख, अपनी रकम-रकम की भाजियां हम पर थोपने का अवसर तलाशने लगे थे ! पर साग बिकने से ज्यादा उन सबको, उसे लेने वाले अजूबों को देखने की उत्सुकता थी ! हम एक तरह से तमाशाइयों से घिर गए थे, इसीलिए बिना मोल-भाव किए, साग की जितनी कीमत मांगी गई, दे कर, हम तुरंत वहाँ से निकल लिए ! 

आज के समय, जब देश-दुनिया की हर चीज हर जगह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, तो वह घटना कुछ अजीब सी लगती है ! कभी तो आश्चर्य भी होता है कि क्या सचमुच वैसा हुआ था ! पर जब भी वो वाकया याद आता है बरबस हंसी फूट पड़ती है !

सोमवार, 12 अगस्त 2024

सरसों का साग, मक्के की रोटी के लिए तब कई पापड़ बेलने पड़ते थे

सुबह के निकले हम यदि कलकत्ते में पिक्चर देखने का लोभ संवरण कर लेते, तो अपरान्ह तक घर पहुंच जाते थे नहीं तो रात हो जाती थी ! घर पहुंच रिक्शे से उतरते-उतरते सभी पंद्रह-सोलह परिवारों में खबर लग जाती थी कि साग आ गया है ! कई मुस्कुराते चेहरे आमने-सामने की खिड़कियों-बालकनियों में टंग जाते !  सुबह माँ जुट जातीं तैयारी में ! कुछ कमी ना रह जाए इसलिए बिना किसी की सहायता लिए खुद ही काटतीं-छांटतीं !  एक अलग अंगीठी सुलगाई जाती सिर्फ साग के लिए ! फिर घंटो के इंतजार, गलने-पकने-दलने के पश्चात उसमें ढ़ेर सा घी पड़ता और फिर जो व्यंजन सामने आता उसकी दूर-दूर तक फैलती दैवीय सुगंध बार-बार मुंह को पानी से भर जाती ! कुछ ही देर में यह अड़ोस-पड़ोस के हर घर में पहुंच, टेबल पर सज, अपनी महक से उसे सुवासित कर रहा होता ! माँ के हाथों के कमाल और निपुणता की चर्चा कई दिनों तक होती रहती.............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग           

आज बाजार ने हमें जितनी सहूलियतें प्रदान कर दी हैं उनके बारे में 20-25 साल पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था और इधर आज की पीढ़ी उस समय की होने वाली खरीद-फरोख्त का अंदाज भी नहीं लगा सकती है ! आज तो किसी भी चीज की इच्छा जाहिर कीजिए कुछ ही देर में वह दरवाजे पर हाजिर दिखेगी, पर पहले ऐसा नहीं होता था, तब अपनी इच्छित वस्तु को ढूंढ कर उस तक पहुंचना होता था ! पर उसका भी अपना एक अलग मजा और तसल्ली होती थी ! कभी-कभी वे दिन याद आ जाते हैं ! 

सरसों के पत्ते 
ऐसी ही एक स्मृति को आपके साथ साझा कर रहा हूँ ! बात है सत्तर के दशक की ! पिताजी कोलकाता, तब के कलकत्ता, से करीब 35 किमी दूर, नॉर्थ 24 परगना के एक उपनगर, भाटपारा में स्थित रिलांयस जूट मिल  (इस रिलांयस का उस रिलांयस से कोई भी संबंध कभी नहीं रहा) में कार्यरत थे ! वहां देश के हर हिस्से से आए लोग एक परिवार की तरह रहते थे। कोई भेद-भाव नहीं, जैसे सभी एक ही कुटुंब के सदस्य हों ! एक अजब ही माहौल हुआ करता था जो अखंड भारत की छवि प्रस्तुत करता था !
घर 
अपुन का परिवार ठहरा पंजाबी, सो कभी-कभी पंजाबियत जोर मार कर मक्की की रोटी की मांग कर ही देती थी ! पर सहज उपलब्ध ना होने के कारण, उसे पूरा करना तब उतना सरल नहीं था ! सरसों के साग का जुगाड़ कलकत्ते के सुदूर भवानीपुर इलाके के थोक सब्जी बाजार से करना पड़ता था और मक्की के आटे का इंतजाम खासतौर से अपने लिए मक्की के दानों को पिसवा कर किया जाता था ! मक्के का आटा उतना सर्वसुलभ नहीं होता था ! तो जब कभी इन व्यंजनों की इच्छा ज्यादा जोर मारने लगती, जो सिर्फ हमारे ही नहीं वहां के अधिकांश परिवारों की कामना होती थी, तो उसको फलीभूत करने के लिए मेरे मामाजी सामने आते ! जिनके साथ होता बालक रूपी मैं ! 
साग 
इस नेमत को, जिसके रसास्वादन के लिए कई-कई लोग इंतजार में रहते थे, पाने के लिए अच्छा-खासा उद्यम करना पड़ता था ! मिल के रिहाइशी क्षेत्र से रेलवे स्टेशन, जिसका नाम कांकिनाड़ा था (काकीनाडा नहीं), की दूरी करीब एक किमी होगी, जिसे मौके के अनुसार पैदल या रिक्शे से नापा जाता था ! स्टेशन से कलकत्ते का सियालदह स्टेशन करीब 35 किमी था, बीच में उस समय ग्यारह स्टेशन पड़ते थे ! इस दूरी को पार करने में लोकल ट्रेन तकरीबन घंटे भर का समय ले लेती थी। सियालदह के जन सैलाब को पार कर बाहर आ कर शहर के भवानीपुर इलाके के लिए बस ली जाती थी। फिर बस छोड़ सब्जी बाजार तक जाना पड़ता था। जहां से अपनी इच्छित मात्रा मुताबिक सरसों का साग मिल जाना भी एक उपलब्धि ही होती थी ! फिर उसी क्रम में वापसी होती थी फर्क सिर्फ इतना होता था कि बाजार से सियालदह तक का सफर बस की बजाय टैक्सी पूरा करवाती थी और स्टेशन से मिल के अंदर घर तक रिक्शा !
मौजां ई मौजां 
सुबह के निकले हम यदि कलकत्ते में पिक्चर देखने का लोभ संवरण कर लेते, तो अपरान्ह तक घर पहुंच जाते थे नहीं तो रात हो जाती थी ! घर पहुंच रिक्शे से उतरते-उतरते सभी पंद्रह-सोलह परिवारों में खबर लग जाती थी कि साग आ गया है ! कई मुस्कुराते चेहरे आमने-सामने की खिड़कियों-बालकनियों में टंग जाते ! सहायकों द्वारा साग के पत्तों की आवभगत रात तक हो जाती ! सुबह माँ जुट जातीं तैयारी में ! कुछ कमी ना रह जाए इसलिए बिना किसी की सहायता लिए खुद ही काटतीं-छांटतीं ! उन दिनों अभी गैस आई नहीं थी सो एक अलग अंगीठी सुलगाई जाती सिर्फ साग के लिए ! साग के अनुपात के अनुसार पता नहीं क्या-क्या और कुछ उसमें मिलाया जाता ! फिर घंटो के इंतजार, गलने-पकने-दलने के पश्चात उसमें ढ़ेर सा घी पड़ता और फिर जो व्यंजन सामने आता उसकी दूर-दूर तक फैलती दैवीय सुगंध बार-बार मुंह को पानी से भर जाती ! बेसब्री से किया जा रहा इंतजार खत्म होता ! कुछ ही देर में यह हर घर में पहुंच, टेबल पर सज, अपनी महक से उसे सुवासित कर रहा होता ! माँ के हाथों के कमाल और निपुणता की चर्चा कई दिनों तक होती रहती ! 

विशिष्ट पोस्ट

आराध्य की विदाई भी सम्मानजनक होनी चाहिए

मूर्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कारण विसर्जन क्षेत्रों में अपार भीड़ उमड़ने लगी है, जिससे वहां अव्यवस्था, बदइंतजामी और अफरा-तफरी का माहौल ...