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शनिवार, 16 नवंबर 2024

रणछोड़भाई रबारी, One Man Army at the Desert Front

सैम मानेक शॉ अपने अंतिम दिनों में भी अपने इस ''पागी'' को भूल नहीं पाए थे। 2008 में जब वे तमिलनाडु के वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती थे तो अक्सर डाक्टरों के साथ उनके किस्से साझा किया करते थे ! समझा जा सकता है कि जब मानेक शॉ जैसी हस्ती बार-बार किसी को याद करती हो तो उस इंसान में कितनी खूबियां होंगी ! आज ये दोनों विभूतियां हमारे साथ नहीं हैं, पर देश सदा उनका आभारी और कृतज्ञ रहेगा........................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कई बार फिल्मों में या सीरियलों की आभासी दुनिया में सेना या पुलिस को किसी आम से व्यक्ति से गुप्त सूचनाएं प्राप्त करते देखा-दिखलाया जाता है ! कहानी का अंग मान हम उस पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते ! पर असली जिंदगी में हर देश में ऐसे लोगों का अस्तित्व है, यह बात भी अनजानी नहीं हैं ! उनके द्वारा दी गई गुप्त जानकारियों की वजह से अनेकों बार बड़ी सफलताएं भी हासिल होती हैं पर उन्हें ना कभी सार्वजनिक सम्मान मिल पाता है ना हीं कोई उन्हें जान पाता है ! उनके घरवालों को भी शायद ही उनके कारनामों का पता होता हो ! वैसे उनकी सुरक्षा और काम के लिए उनका गुमनामी के कोहरे में बना रहना ही बेहद जरुरी भी होता है ! पर कभी-कभी संयोगवश जब ऐसे ही किसी विलक्षण व्यक्ति की शख्शियत लोगों के सामने आती है तो उनकी उपलब्धियां जान कर सब अपने दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं !
जनरल सैम मानेक शॉ 
ऐसे ही एक विलक्षण शख्स थे, रणछोड़ रबारी, पूरा नाम रणछोड़भाई सवाभाई रबारी ! जिन्होंने 1965 तथा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बिना बंदूक उठाए, अपने हुनर ​​से पाकिस्तान को ऐसे जख्म दिए जो वह कभी नहीं भूल सकेगा ! सेना में इन्हें पागी यानी मार्गदर्शक के नाम से भी जाना जाता था ! इनके सबसे बड़े प्रशंसक खुद जनरल मानेक शॉ थे ! जो उन पर गहरा भरोसा करते थे। उन्हीं की सिफारिश पर रणछोड़ जी को ''रेगिस्तानी मोर्चे पर एक आदमी की सेना,'' One Man Army at the Desert Front का खिताब दे कर सम्मानित किया गया था। 
रणछोड़भाई रबारी
गुजरात के बनासकांठा के पिथापुर गांव के रबारी परिवार में जन्में, भेड़, बकरी और ऊंट पालने वाले एक साधारण व्यक्ति रणछोड़ रबारी को दुनिया ने तब जाना जब 1971 के युद्ध की जीत के उपलक्ष्य में दिल्ली में मनाए जा रहे जश्न में उनको भी आमंत्रित किया गया। हेलिकॉप्टर में वे अपने साथ रोटी, सूखी लाल मिर्च और प्याज लेकर आए और उस भव्य आयोजन में उनके साथ सैम मानेक शॉ ने भी उनके घर की रोटी और प्याज खाया। सम्मान देते भी क्यों ना ! यही वह इंसान था जिसने अपने बल-बूते पर 1965 और 1971 के युद्ध में हजारों भारतीय सैनिकों की जान बचाई थी ! उधर पाकिस्तान ने उन्हें पकड़वाने पर पचास हजार का इनाम रखा था !

मान पत्र 

प्रशस्ति पत्र 
आगे चल कर 1965 और 1971 के युद्धों  में उनकी भूमिका के लिए उन्हें संग्राम पदक,  पुलिस पदक और समर सेवा स्टार सहित कई पुरस्कार प्रदान किए गए। सन 2007 के  स्वतंत्रता दिवस समारोह में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी उनका उल्लेख किया। उन्हें  पुलिस और  सीमा सुरक्षा बल (BSF) दोनों के द्वारा सम्मानित किया गया।  सुरक्षा बल की  अपनी कई पोस्टों  के नाम मंदिर, दरगाह और जवानों के नाम पर हैं, किन्तु रणछोड़भाई देश के पहले  ऐसे आम इंसान हैं,  जिनके नाम  पर सेना ने अपनी किसी पोस्ट का नामकरण किया  है।  गुजरात के बनासकांठा  के अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र  में सुईगाम की एक सीमा चौकी को 'रणछोड़दास पोस्ट' नाम दिया गया है और साथ ही उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

फिल्म, भुज 

2021 में भारत-पाकिस्तान युद्ध पर बनी एक फिल्म, भुज, The Pride of India, आई थी, जिसमें अजय देवगन, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त और नोरा फतेही की मुख्य भूमिकाएं थीं। इसमें अजय देवगन ने इस युद्ध के नायक रहे भारतीय वायु सेना के स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक के किरदार को निभाया था। उसी के साथ संजय दत्त ने भी इस फिल्म में भारतीय सेना के स्काउट रणछोड़दास पागी के असल किरदार को साकार किया था ! यह भी उन्हें एक तरह की श्रद्धांजलि ही थी !


सेवा निवृत्ति के उपरांत 

  • सैम मानेक शॉ अपने अंतिम दिनों में भी अपने इस ''पागी'' को भूल नहीं पाए थे। 2008 में जब सैम मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती थे तो अक्सर डाक्टरों के साथ उनके किस्से साझा किया करते थे ! समझा जा सकता है कि जब मानेक शॉ जैसी हस्ती बार-बार किसी को याद करती हो तो उस इंसान में कितनी खूबियां होंगी ! आज ये दोनों विभूतियां हमारे साथ नहीं हैं ! 27 जून 2008 में सैम मानेक शॉ का निधन हो गया ! जुलाई 2009 में रणछोड़ जी ने भी स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली। जनवरी 2013 में 112 वर्ष की उम्र में वे भी इस दुनिया को छोड़ गए।

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  • @सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

शून्य की खोज के पहले भी गणना तो होती ही थी

संख्या प्रणालियां शून्य के आविष्कार के बहुत पहले से अस्तित्व में थीं ! जैसे कि रोमन प्रणाली में दस को ''X'' और सौ की संख्या को ''C'' से दर्शाया जाता रहा है। ब्राह्मी लिपि में भी दस, सौ, हजार जैसी संख्याओं के लिए विशेष चिन्ह हुआ करते थे, हालांकि इनसे गणना करना कुछ कठिन होता था पर बिना शून्य के भी सारी संख्याएं आसानी से लिखी जाती रही थीं ! परंतु ''शून्य'' के आ जाने से छोटी-बड़ी हर तरह की संख्याओं की गणना करना आसान हो गया..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ लोग देसी घी को हजम नहीं कर पाते ! वे बहकावे या प्रलोभन में आकर तरह-तरह के विदेशी कारखानों से नि:सृत चिकनाई को सेहतवर्द्धक मान, अपने उत्पाद को हीन सिद्ध करने पर तुले रहते हैं ! यहीं के रहने-खाने वाले, यहीं की हवा-पानी-मिट्टी में पलने-बढ़ने वाले, जिनका यहां के बिना और कहीं ठिकाना भी नहीं है, वे अपने ही देश की संस्कृति, संस्कार, आस्था, मान्यताओं का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते ! बार-बार सिद्ध होने के बावजूद उन्हें अपने ग्रंथ, अपना इतिहास, अपने महापुरुष, अपनी मान्यताएं दोयम दर्जे की मालूम होती हैं ! बिना गहन अध्ययन, बिना उचित जानकारी, आधी-अधूरी, सुनी-सुनाई बातों को लपक, ऐसी अधजल गगरियां जहां-तहां छलकती रहती हैं !  

इन्हें इस बात का गर्व महसूस नहीं होता कि भारत ने विश्व को एक नायाब विधा सौंपी है ! इनको इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि अंकों के मामले में संपूर्ण जगत भारत का ऋणी है ! इन्हें ज्ञान ही नहीं है कि 2500-3000 पुराने हमारे ग्रंथों में गणित में की गई खोजों का विस्तृत विवरण है ! उस समय दशमलव प्रणाली तथा रेखागणित के साथ-साथ अंकगणित के नियम भी विकसित हो चुके थे ! 

महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट
किसी भी देश और जाति की आत्मा होती है उसकी संस्कृति, उसका ज्ञान, उसका समृद्ध इतिहास जिस पर उसको गर्व होता है ! कोई भी आक्रांता पहले उसी को खत्म या नष्ट करने की कोशिश करता है ! हमारे साथ भी यही हुआ ! हजार साल की पराधीनता की अवधि में हमारे इतिहास को हमारी संस्कृति को, हमारे संस्कारों को बदलने की कोशिश होती रही ! सफलता भी मिली उन लोगों को, क्योंकि रीढ़विहीन लोग हर युग में हर देश में पाए ही जाते हैं ! इन लोलुपों को वही समझाया गया जो उनके आका चाहते थे ! इनको दिया जाने वाला ज्ञान इनके आकाओं द्वारा निर्मित और वहीं तक सिमित था, जहां तक उनकी इच्छा थी ! देश पर हुकूमत के लिए यह जरुरी था नहीं तो देश और बाकी देशवासियों को काबू करने के लिए फौज कहां से आती ! 

दासता तो खत्म हो गई पर कुछ लोगों की मानसिक गुलामी अभी भी बरकरार है ! ऐसे ही लोगों का एक प्रिय विषय ''शून्य यानी जीरो'' है ! ये यह प्रचार नहीं करते कि शून्य, जो सिर्फ कहने भर को शून्य है पर इसकी क्षमता अपार है, जो एमें इनके कुतर्क आज के सोशल मीड़िया पर छाए रहते हैं ! ये वही लोग हैं जो आजादी के बाद से ही अपने पूरे मनोयोग से हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर विकृत कर वर्तमान और आने वाली पीढ़ी क को दस, हजार, लाख, करोड़, अरब-खरब कुछ भी बना सकता है, इसे हमने दुनिया को दिया ! उलटे  इसके बारे को गुमराह करने में जी-जान से जुटे हुए हैं ! मजाक उड़ाने की तर्ज पर इनका तर्क होता है कि जब आर्यभट्ट ने करीब 1500 साल पहले ही शून्य का आविष्कार कर गणित में इसे पहली बार प्रस्तुत किया और इसे गणितीय समीकरणों और संख्याओं में शामिल किया, तो पौराणिक युग में रावण के दस सिरों और महाभारत में सौ कौरवों की गिनती कैसे कर ली गई ? ऐसे अधकचरे विद्वानों के लिए देवदत्त पटनायक जी ने, जो पौराणिक कथाओं के लेखक और जाने-माने विश्लेषक हैं, इस बात का विस्तार से वर्णन किया है।     

उनके अनुसार संख्या प्रणालियां शून्य के आविष्कार के बहुत पहले से अस्तित्व में थीं ! जैसे कि रोमन प्रणाली में दस को ''X'' और सौ की संख्या को ''C'' से दर्शाया जाता रहा है। ब्राह्मी लिपि में भी दस, सौ, हजार जैसी संख्याओं के लिए विशेष चिन्ह हुआ करते थे, हालांकि इनसे गणना करना कुछ कठिन होता था पर बिना शून्य के भी सारी संख्याएं आसानी से लिखी जाती रही थीं ! परंतु ''शून्य'' के आ जाने से छोटी-बड़ी हर तरह की संख्याओं की गणना करना आसान हो गया।  

हमारे यहां से इसे अरब व्यापारी यूरोप ले गए। शुरू में हर नई चीज की तरह वहां इसका विरोध भी हुआ, क्योंकि उनका तथ्य ज्ञान और आख्यान ईसाई धर्म से प्रभावित था, जिसमें शून्य या अनंत जैसी धारणाओं का कोई स्थान नहीं था। पर धीरे-धीरे यह प्रणाली अपनी विशिष्टताओं की वजह से वहां भी लोकप्रिय हो गई। 

विडंबना यह है कि विपरीत विचार धारा, अलग सोच, अलग निष्ठा के बावजूद, अपनी खासियतों के बल पर जो विधा विदेशों में भी स्वीकार्य हो गई, उसी का अपने यहां के पश्चिमी सभ्यता में रचे-पगे, मूढ़ मति, लोग मजाक उड़ाने से गुरेज नहीं करते ! भले ही इससे उनकी बुद्धिमत्ता का स्तर जग जाहिर हो जाता हो ! पर गुलामी की इस मानसिकता की जकड़ से आजाद होने की किसी भी तरह की चेष्टा या इच्छा फिलहाल ऐसे लोगों में अभी तक तो नहीं ही दिखती.......!    

@आभार - देवदत्त जी, अंतर्जाल                         

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