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मंगलवार, 14 जनवरी 2025

पत्रकारिता, लोकतंत्र का चौथा बंबू

पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है, तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ..............!!         

#हिन्दी_ब्लागिंग                                     

कुछ साल पहले तक समाचार पत्रों में छपी खबरों पर आम इंसान आँख मूँद कर विश्वास कर लिया करता था ! क्योंकि उसे मालूम था कि इन समाचारों को उन तक पहुंचाने वाले इंसान निर्भीक, निष्पक्ष, निडर व सत्य  के पक्षधर हैं ! रेड़िओ पर पढ़ी जाने वाली सरकारी खबरें भी बहुत हद तक दवाब-विहीन ही होती थीं ! पर धीरे-धीरे इस विधा में भी मतलबपरस्त, चापलूस, धन-लोलूप खलनायकों का दखल शुरू हो गया और आज हालत यह है कि संप्रेषण के किसी भी माध्यम पर, चाहे वह छपने वाला हो या दिखने वाला, किसी को भी पूर्ण विश्वास नहीं है ! इसी बीच व्हाट्सएप, युट्यूबर जैसी एक और खतरनाक मंडली भी उभर कर आई हुई है ! जिसका भ्रामक असर अति व्यापक, घातक और मारक है !

आज के समय में तकरीबन हर अखबार, हर टीवी चैनल, किसी ना किसी राजनैतिक दल का भौंपू बन कर रह गया है ! उनकी भी अपनी मजबूरी है ! आज कौन चाहेगा निष्पक्ष पत्रकारिता या सच को उजागर करने के चक्कर में अपना तंबू-लोटा समेट घर बैठना और तन-धन को जोखिम में डालना ! जबकि जरा सी चापलूसी, जी-हजूरी के बदले गाड़ी, घोड़ा, बंगला, जमीन, विदेशयात्रा, संरक्षता, मान-सम्मान, पुरस्कार, प्रतिष्ठा सभी कुछ हासिल हो रहा हो ! इसीलिए ऐसी गंगा में सभी हाथ धोने की बजाय पूरी डुबकियां लगाने से परहेज नहीं करते !

आम जनता भी अब जानकारी के लिए नहीं बल्कि समय गुजारने या मनोरंजन के लिए खबरिया चैनलों के सामने बैठने लगी है ! पर वहां की स्तरहीन, मक्कारी भरी, तथ्यहीन वार्ता और उसमें विभिन्न दलों के तथाकथित वार्ताकारों का ज्ञान, उनकी मानसिकता, उनकी शब्दावली, उनकी कुंठा, उनकी चारणिकता, उनके पूर्वाग्रहों को देख दर्शकों का रक्त-चाप ही  बढ़ता है ! मेहमान पर नहीं मेजबान पर कोफ्त होती है !
    
अर्से से पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है ! तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ! सो एक मंच तैयार किया गया, पर वही आज सच्चाई, विश्वास, नैतिकता, निष्पक्षता यहां तक कि देशहित को भी भस्मासुर की तरह स्वाहा करने पर उतारू है ! 

एक कहावत है कि हर चीज के बिकने की एक कीमत होती है ! तो कीमत लगी, माल खरीदा गया और उसे तरह-तरह के नाम और अलग-अलग तरह की थालों में रख, दुकानों में सजा दिया गया ! इधर पब्लिक अपनी उसी पुरानी भेड़चाल के तहत, अपने-अपने मिजाजानुसार उन दुकानों पर बिकते असबाबों की परख किए बगैर, उनकी गुणवत्ता को नजरंदाज कर, उनके रंग-रूप-चकाचौंध पर फिदा हो अपने सर पर लाद अपने-अपने घरों तक लाती रही ! भले ही बाद में पछताना ही पड़ रहा हो !

घोर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह आशा बनी हुई है कि अभी भी  ऐसे लोग जरूर होंगे, जिनमें अभी भी जिम्मेवारी का एहसास बचा हुआ होगा ! जिनकी आत्मा रोती होगी आज के हालात देख कर ! जिनकी कर्त्तव्यपरायणता अभी भी सुप्तावस्था में नहीं चली गई होगी ! क्या ऐसे लोगों का जमीर उन्हें कभी कचोटता नहीं होगा ? क्या उनकी बची-खुची गरिमा उन्हें सोने देती होगी ? क्या कभी उन्हें अपनी उदासीनता पर ग्लानि नहीं होती होगी ? क्या उन्हें कभी ऐसा विचार नहीं आता होगा कि जिस विधा का काम समसामयिक विषयों पर लोगों को जागरूक करने और उनकी राय बनवाने में बड़ी भूमिका निभाना है और जिस कारणवश आज विश्व में मीडिया एक अलग शक्ति के रूप में उभरा है, उसी का अभिन्न अंग होते हुए भी वे उसका दुरूपयोग होते देख रहे हैं ! ऐसे लोगों को तो आगे आना ही पड़ेगा ! इस घोर अंधकार को मिटाने के लिए सच का दीपक प्रज्ज्वलित करना होगा ! छद्म संप्रेषण का चक्रव्यूह नष्ट कर निडर, निर्भीक, निर्लेप, विश्वसनीय निष्पक्षता का आलम फिर से स्थापित करना होगा !  

पर क्या ऐसा होगा ? क्या कोई ऐसी हिम्मत जुटा पाएगा ? क्या वर्तमान ताकतों का मायाजाल छिन्न-भिन्न हो सकेगा ? ऐसे बहुत सारे क्या हैं ! क्या इन क्याओं का उत्तर मिल पाएगा ? क्या अपने हित को दरकिनार कर, अपने नुक्सान की परवाह ना कर, देश, समाज, अवाम के हितार्थ सच के पैरोकार आगे आएंगे ? सुन तो रखा है कि बुराई पर अच्छाई की और झूठ पर सच की सदा विजय होती है ! 
देखें.........!!

शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

जो कभी नहीं जाती, उसी को जाति कहते हैं

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे ! उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे ! ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज बहुत दिनों बाद बिनोद आया था ! देखने से स्वस्यचित्त नजर आ रहा था ! पर हाव-भाव से कुछ ऐसा भी महसूस हो रहा था कि कुछ कहना चाह रहा है पर झिझक और संकोच उसे रोक रहे थे ! प्रसंगवश बतला दूँ कि बिनोद मूलतः झारखंड का निवासी है। पूरा नाम बिनोद कुमार झा है। स्नातक है। वर्षों से दिल्ली में आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है ! माँ-बाप गुमला, झारखंड, में रहते हैं ! थोड़ी-बहुत गुजारे लायक जमीन है।  बिनोद सात-आठ साल से मेरे संपर्क में है ! सीधा, सरल, नेक, अविवाहित युवक है ! मुझ से अपने हर मसले को साझा करता रहता है ! हमारे बीच एक अनजाना सा रिश्ता पनप गया है।  पर आज करीब आधे घंटे से मेरे पास बैठे रहने के बावजूद खुल नहीं पा रहा था ! मैंने ऐसे ही उसे कुरेदा,

क्या बात है, सब ठीक है ना ?"                       

हाँ भइया, सब वइसा ही चल रहा है''

पर तुम्हें देख, लग तो नहीं रहा !'' मैं मुस्कुराया, वह कुछ झेंप सा गया ! कुछ देर चुप रहा, फिर जैसे उसने अपने संकोच को परे धकेल दिया, बोला,

भइया जी, हम सोच रहे हैं कि अपना जाति बदल लिया जाए, एस टी या एस सी बन जाऊं ?''

मैं जैसे छत से गिरा ! हक्का-बक्का रह गया ! बोल क्या रहा है यह लड़का ! पगला क्या है क्या ?

क्या कह रहे हो ?''

भईया का है ना, उसमें बहुते तरह का फायदा रहता है ! तरह-तरह का सहूलियत मिलता है ! नौकरी भी लग जाता है ! ई, झा-वा में कुच्छो नहीं रखा !'' 

मुझे तो जैसे सांप सूँघ गया हो ! उसको कैसे समझाऊं, जब खुद ही कुछ नहीं समझ पा रहा था ! बिनोद जवाब के लिए मेरा मुंह जोह रहा था ! कुछ तो मुझे बोलना ही था......! किसी तरह कहा,

अरे ! ऐसा थोड़े ही होता है, यह कोई नाम या धर्म थोड़े ही है, जो जब चाहे बदल लिया ! जाति एक ऐसी व्यवस्था है जो हमारे यहां कर्म से नहीं जन्म से निर्धारित होती है। इसलिए कोई इंसान अपनी जाति कभी भी नहीं बदल सकता ! यदि ऐसा हो जाए तो पूरे समाज का ढांचा बिगड़ जाएगा ! अफरा-तफरी मच जाएगी ! वैसे यह गैर कानूनी भी है !''

पर भइया जी, हमारे जान-पहचान के एक नेता टाइप के मनई हैं, उनका राजनीती में बहुत चलता है ! बड़का-बड़का लोग से जान-पहचान है ! ऊ कह रहे थे, एक रास्ता है ! उससे सब मैनेज हो जाएगा ! थोड़ा खर्चा और समय लगेगा ! हम सोचे पहले भइया जी से पूछ लें, इसीलिए सलाह लेने आए थे !'' 

देखो, बिनोद ! मैं इतना जानता हूँ कि यह काम पूरी तरह से गैर कानूनी है ! पर इसके किसी लूप होल से यदि कोई ऐसा कर भी लेता है तो वह भी हर दृष्टि से गलत ही होगा ! इसलिए मेरी यही सलाह है कि ऐसे किसी पचड़े में मत पड़ना ! समय और पैसा दोनों बर्बाद कर दोगे ! जो भी तुम्हें ऐसा हो जाने का आश्वासन दे रहा है, वह गलत कर रहा है ! हमारे देश में किसी भी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति कितनी ही कोशिश कर ले, अपने रहने की जगह बदल ले, नाम बदल ले या धर्म ही बदल ले, वह अपनी जाति से पीछा नहीं छुड़वा सकता।''

पर भईया जी, यदि कोई अपना धर्म बदल ले, तब तो उसका जाति खत्म ना हो जाता है ?'' 

क्या कहना चाहते हो ?''    

यही कि यदि हम धर्म बदल लें तो हमारा जाति ऑटोमेटेक्लि खत्म हो जाएगा और फिर हम अपना धर्म में वापस आ जाएं तो ?''

मैं समझ गया कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए इसको किसी ने पूरी पट्टी पढ़ा दी है ! अपना हित साधने के लिए इसे मोहरा बना रहा है ! इसलिए इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उसको कहा, 

देखो बिनोद, किसी के बहकावे में मत आ जाना ! यह सब इतना सरल नहीं है ! हर धर्म में उसके कुछ अपने नियम और विभाग होते हैं ! वह एक अलग और गहन विषय है ! पर तुम इतना समझ लो कि यदि कोई इस तरह का उल्टा-सीधा रास्ता अख्तियार करता है, तो भी अपनी मन-मर्जी नहीं कर सकता ! यदि ऐसा कर वह किसी जाति विशेष को अपनाता है, तो पहले यह देखा जाएगा कि उस जाति के लोग उसे स्वीकार करते भी हैं कि नहीं ! दूसरा इस तरह जाति बदलने वाले को पहले खुद को उसी जाति का होने का प्रमाण भी देना पड़ता है ! ऐसे बहुत से केस हो चुके हैं और किसी को भी कानूनी तौर पर सफलता नहीं मिली है ! मैं फिर कहता हूँ कि इस पचड़े में मत पड़ो ! कोई जरुरी नहीं कि यह सब उटपटांग करने के बाद भी भाग्य तुम पर मेहरबान हो ही जाएगा !''

ठिक्के कह रहे हैं आप ! ई सब यदि एतना ही सहज होता तो कोई भी, जब भी चाहता अपनी जाति बदल लिए होता ! तब तो बहुते भसान मच जाता ! पर भईया जी, अपने देश में अइसे बहुते लोग हैं जो सालों से अपना नाम-उपनाम बदल कर मजे से जीवन बिता रहे हैं ! केतना लोग पकड़ा भी गया है ! तिस पर ई भी तो सच्चे है कि रसूखवाला, पइसावाला, ताकतवाला लोग ही ज्यादा गलत काम करता है ! हमको भी हमारे पिताजी मना किए थे ई सब करने से ! बोले थे, बिटवा किसी लालच में आ कर अंधे कूऐं में झलांग मत लगाना ! भगवान जो दिया है, उसमें खुश रहो ! मेहनत करते रहो, उसी से सफलता मिलेगी ! देक्खे रहे हो केतना गरीब-गुरबा का बच्चा लोग अपना मेहनत से कहां का कहां पहुंच गया ! बस, मेहनत से जी मत चुराना !''

फिर भी तुम चल पड़े ?''

नहीं भईया जी ! आप गलत सोच लिए ! माँ कसम ! हमहूँ ऐसा करना नहीं चाहते थे ! सच तो ई है कि चाह कर भी अइसा नहीं कर पाते ! हमारा आत्मा हमें करने ही नहीं देता ! पर थोड़ा समय के लिए मन डगमगा गया था ! का है ना कि हमसे अपने पिताजी और माँ का हालत देखा नहीं जाता ! इस उमर में भी दिन-रात खटते हैं ! फिर भी ना खाना ढंग का मिलता है ना हीं रहना ! हमहूँ तो इधर कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे हैं  !उनको कुछ हो गया तो हम अपने को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे !  ऐ ही वास्ते मन बेचैन रहता है ! ऊही से थोड़ा भटक गए थे.....!

बिनोद की आँखें भर आईं थीं ! मैं समझ रहा था, एक बेटे का अपने माता-पिता से लगाव ! उनके प्रति उसका अपना कर्तव्य ! उसका दर्द ! उसकी छटपटाहट ! उसकी मजबूरी ! उसकी हताशा !    

मैंने उसके सर पर हाथ रखा ! वह फफक पड़ा ! कुछ देर बाद अपने को संभाल बोला,

भईया जी, हमको माफ कर दीजिए''

अरे ! किस बात की माफ़ी ? तुमने क्या किया है ? तुम तो खुद ही समझदार हो ! उठो ! मुंह-हाथ धो लो ! फिर एक-एक कप चाय हो जाए, भाभी को बोल दो पकौड़ों के लिए ! 

बाहर बारिश की झमाझम सुखद लगने लगी थी !   

बुधवार, 16 अगस्त 2023

टमाटर तो बहाना है

वो टमाटर जो कभी बाकि सब्जियों के साथ चुपचाप सलाद के ढेर में दुबका रहता था ! वही आज कुछ मौकापरस्त लोगों के लिए राजनीतिक शस्त्र बन बैठा है ! पर क्या इसमें टमाटर की कोई गलती है ? क्या उसने खुद अपने दाम बढ़वाए हैं ? कभी प्याज, कभी टमाटर, कभी और कोई जिंस, परिस्थितिवश बढ़ी उनकी कीमतों को मुद्दा तो तुरंत बना दिया जाता है पर कारण नहीं बताए जाते ! टमाटर तो बहाना है, मौका मिल जाता है, हाशिए पर खिसका दिए गए दलों के छुटभइए, तथाकथित नेताओं को इनके सहारे, लोगों को गुमराह करने हेतु, विभिन्न मंचों पर पहुंच  बहसियाने का ! टमाटर के कीमतें तो कुछ दिनों में वश में आ जाएंगी, जरुरत है इनके सहारे लोगों को गुमराह करने वाले मौकापरस्तों को काबू कर सीख देने  की  ............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग  

ज्ञानी, गुणी, विवेकशील लोग कह गए हैं कि अरे क्या खाने के लिए जीता है ! सिर्फ थोड़ा-बहुत जीने के लिए खा लिया कर ! अब उनको क्या बताएं कि दोनों अवस्थाओं में खाना तो खाना ही पड़ेगा और खाना सुरुचिपूर्ण होने के लिए रसना को रस मिलना जरुरी है ! अब यह तीन इंची इंद्रिय बस देखने-कहने को ही छोटी है, कारनामे इसके बड़े-बड़े होते हैं। ये चाहे तो महाभारत करवा दे ! यह चाहे तो घास-पात को अनमोल बनवा दे। बोले तो, पूरी की पूरी मानवजाति इसके इशारों पर नाचती है। भले ही उसके लिए कुछ भी, कोई भी, कैसी भी कीमत चुकानी पड़े।

वैसे इस दुनिया में कब  कोई फर्श से अर्श (इसका उल्टा भी) तक पहुँच जाए, कभी भी नहीं कहा जा सकता ! अब टमाटर को ही ले लीजिए जो साल दो साल पहले की प्याजों की राह पर चल पड़ा है ! जो चीज चमगादड़ की तरह कभी सब्जी और कभी फल के बीच झूलती रही हो ! कुछ दिनों पहले जिसे कोई टके का भाव ना दे रहा हो ! जिसे किसान सडकों पर फेंक रहे हों ! वही आज टनटनाते हुए सैकड़ों के भाव को छू रहा है ! जिस तरह प्याज ने बिना खुद को छिलवाए, लोगों के आंसू निकलवाए दिए थे, उसी तरह इसने भी बिना खुद को ग्रेवी बनवाए, लोगों की चटनी बना दी है ! पर इसके इस तरह अनमोल हो जाने में इसकी क्या गलती है ?  क्या इसने खुद अपनी कीमत बढ़वाई है ? क्या यह खुद लोप हो गया ? कभी प्याज, कभी टमाटर, कभी और कोई जिंस, परिस्थितिवश बढ़ी उनकी कीमतों को मुद्दा तो तुरंत बना दिया जाता है पर कारण नहीं बताए जाते ! टमाटर तो बहाना है, इसके कंधे के जोर से कुछेक को अपनी बंद दुकानों का शटर उठवाना है ! 

पहले भी अति वर्षा, मौसम या अन्य कई कारणों से खेती प्रभावित होती रही है ! वैसे ही कुछ कारणों से वो टमाटर जो कभी बाकि सब्जियों के साथ चुपचाप सलाद के ढेर में दुबका रहता था, वही आज टुच्ची राजनीती का शस्त्र बन बैठा है ! हाशिए पर खिसका दिए गए छुटभइए तथाकथित नेता इसको साथ ले, लोगों को गुमराह करने हेतु, मंचों पर बहसियाने पहुँच रहे हैं ! जब लुटे-पिटे दलों के ये प्रवक्ता बेशर्मी से जेब से टमाटर निकाल लोगों को दिखा-दिखा कर जबरन उसे मुद्दा बनाने के प्रयास में नौटंकी करते हैं तो  देखने वाले को तरस आने लगता है, इन जैसों की हालत पर ! टमाटर के कीमतें तो कुछ दिनों में वश में आ जाएंगी, पर जरुरत है इनके सहारे लोगों को गुमराह करने वाले मौकापरस्तों को काबू कर सीख देने  की !                                                                            

वह आधा किलो टमाटर ले रही है ! जरूर उसके पास ब्लैकमनी होगा !
(तीस साल पहले का कार्टून )

हालांकि स्थिति सोचनीय है ! जबरदस्त मंहगाई की मार में यह एक और थपेड़ा है ! हम यह सोच कर निश्चिन्त नहीं हो सकते कि हम अकेले नहीं हैं, यह विपदा संसार भर में है ! पर सिमित आय, बढ़ती मंहगाई कब तक धैर्य धरवा सकेगी ? कब तक मध्यम वर्ग अपने खर्चों में कटौती करता रहेगा ? कब तक अति जरुरी चीजों को भी अपनी औकात से बाहर जाता देखता रहेगा ! कब तक अमीर और गरीब जैसे दो विशाल, कठोर, निर्मम पाटों के मध्य यह अभिशप्त बीच वाला वर्ग पिसता रहेगा ! हर चीज की सीमा होती है !  फिलहाल अभी तो आलम यह है कि ''उठाए जा उनके सितम और जिए जा, यूँ ही मुस्कुराए जा और पैसे खर्च किए जा ! (आंसू पिए जा !) 

सोमवार, 31 जनवरी 2022

येड़ा बन कर पेड़ा खाना

बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा; वह जा.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मुहावरे जिंदगी के तजुर्बों पर ही बनते हैं ! इनमें समाज और लोगों के अनुभवों का सार होता है। ऐसा ही एक मुहावरा है, ''येड़ा बन कर पेड़ा खाना !'' वैसे तो यह एक बंबइया मुहावरा है, जिसका मतलब होता है, खुद को बेवकूफ जतला कर अपना अभिलाषित या वांछित पा लेना ! पर आज कल ऐसे येड़े देश भर में अपने पेड़ों की तलाश में विचरते नजर आ रहे हैं ! बस जरा सा फर्क है कि वे दूसरों को येड़ा बना पेड़ा खुद खा रहे हैं ! इसी मंजर पर एक पुरानी बात याद आ गई ! आशा है गुदगुदाएगी जरूर !

जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया, उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी 

रायपुर में मेरी रिहाइश के दौरान मेरे एक पडोसी थे, माधव जी ! मिलनसार, हंसमुख, खुश मिजाज ! अच्छा-खासा परिवार ! उनके स्वभाव के कारण उनके मित्रों की भी अच्छी-खासी जमात थी ! घर में किसी न किसी का आना-जाना लगा ही रहता था। उनके सात और पांच साल के दो लड़के थे ! बड़े को प्यार से सोनू तथा छोटे को छोटू कह कर बुलाया जाता था। अपने मजाकिया स्वभाव के कारण माधव जी अक्सर अपने घर आने वालों को सोनू की 'बुद्धिमंदता' का खेल दिखलाते रहते थे ! होता क्या था कि बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर  सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा, वह जा।माधवजी भी मजे ले-ले कर बताते कि बचपन से ही सोनू बड़ा सिक्का ही उठाता है, बिना उसकी कीमत जाने ! जबकि छोटू को इसकी समझ है। यह खेल काफी समय से चला आ रहा है, पर सोनू वैसे का वैसा ही है !

पर सोनू की माँ, श्रीमती माधव को यह सब अच्छा नहीं लगता था कि कोई उनके बेटे का मजाक बनाए। पर कई बार कहने, समझाने के बावजूद भी माधवजी अपने इस खेल को बंद नहीं करते थे। एक बार सोनू के मामाजी इनके यहाँ आए। बातों-बातों में बहन ने भाई को इस बारे में भी बताया। मामाजी को भी यह बात खली। उन्होंने अकेले में सोनू को बुलाया और कहा, बेटा तुम बड़े हो गए हो ! स्कूल जाते हो, पढाई में भी ठीक हो, तो तुम्हें क्या यह नहीं पता कि दो रुपये, पांच रुपयों से कम होते हैं ?

पता है, सोनू ने कहा !  

तब तुम सदा लोगों के सामने दो रुपये ही क्यों उठाते हो ? लोग तुम्हारा मजाक बनाते हैं ? मामाजी ने आश्चर्य चकित हो पूछा।

मामाजी ! जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया, उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी ! सोनू ने निर्लिप्त भाव से जवाब दिया !

मामाजी हतप्रभ से अपने चतुर भांजे का मुख देखते ही रह गए ! ठीक वैसे ही जैसे हम आज अपने आस-पास के चतुरों की चतुराई देखते रह जाते हैं ! पता ही नहीं चलता कौन येड़ा है और कौन पेड़ा खा रहा है !

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

खेला आरंभ, मानुष दंग

बंगाल में आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनकी इजाजत बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

शारदीय नवरात्र आते ही बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम मच जाती है ! एक से एक बढ़ कर सुंदर-भव्य पंडाल एक दूसरे से होड़ लेने लगते हैं ! हर पंडाल में वाद्य-यंत्रों द्वारा मधुर शास्त्रीय संगीत की मधुर धवनि की गूँज ही सुनाई पड़ती है !  250 से भी ज्यादा वर्षों से चले आ रहे इस आयोजन का सदा से ही यह मकसद रहा है कि पंडालों के निर्माण में भव्यता, नवीनता, कलात्मकता के साथ ही दिव्यता, पवित्रता और भक्तिभाव का भी भरपूर समावेश हो। भले ही सामयिक घटनाओं का आभास दिया जाता रहा है, पर उनको कभी भी पूजा स्थल के पावन परिवेश पर हावी नहीं होने दिया जाता था ! पर अब वर्षों से से चली आ रही परम्पराओं,आस्थाओं व संस्कृति से छेड़-छाड़ शुरू हो चुकी है !

                                         

आज बंगाल में एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ! 



हमारी आदत में शुमार है कि हम किसी भी गलत काम की शुरुआत पर कभी भी ध्यान नहीं देते ! उसे पनपते, फलते-फूलते तब तक देखते रहते हैं जब तक घाव नासूर नहीं बन जाता ! सैकड़ों बार इस आदत ने हमें सबक सिखाया है, पर हम हैं कि मानते ही नहीं ! इसका मुख्य कारण शायद यह है कि ऐसी हरकतों की शुरुआत छटे हुए चंट लोगों द्वारा बहुत ही मामूली और छोटे पैमाने पर की जाती है ! हम किसी पचड़े में ना पड़ने की अपनी मानसिकता के कारण उसे हर बार नजरंदाज कर देते हैं ! कुछ ऐसा ही इस बार बंगाल के पंडाल निर्माण में हुआ है ! तुच्छ व ओछी राजनीती ने इस माध्यम द्वारा बहुत धीरे से, लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर, घुस-पैठ करते हुए इन पूजास्थलों को भी अपना समरांगण बनाने का षड्यंत्र शुरू कर दिया है ! इस बार के कुछ पंडाल इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो भक्तिभाव की जगह जुगुप्सा उत्पन्न करते दिखते हैं।

आज कुछ लोग जैसे माथे पर तिलक-रोली लगा अपनी नुमाइश करते घूम रहे हैं ! वैसे ही अपने ''खेला'' में एक ट्विस्ट ला, ममता ने अपनी बहुसंख्यक विरोधी छवि को संभालने के साथ-साथ पुराने रवैये को भी साधे रखने के लिए सार्वजनिक पूजा पंडालों को माध्यम बनाया है ! आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है !  

वैसे ''कुछेकों'' को सिर्फ भगवान की लाठी ही ठीक कर सकती है ! इनकी आँखों पर चढ़ी गुमान की पट्टी इन्हें उन दसियों स्वंयभू भगवानों का हश्र नहीं देखने देती जो अर्श से गिर, जेल के फर्श पर पड़े, किसी तरह अपने दिन काट रहे हैं ! इन्हें तो उस महिला का इतिहास भी याद नहीं जिसने अपने गुरु और आराध्य से भी बड़ी अपनी मूर्तियां गढ़वा कर अपने को दुनिया से अलग दिखाने की कोशिश की थी ! इसलिए समय फिलहाल भले ही अपना हो, पर हर इंसान को अपनी औकात कभी नहीं भूलनी चाहिए ! समय का तो ऐसा है कि उसने अवतारों तक को नहीं छोड़ा ! वह तो कभी खुद का भी नहीं हुआ ! सो भाई खेलो जरूर पर बिना फाउल करे ! क्योंकि अम्पायर भले ही चूक जाए पर अवाम रूपी तीसरा अम्पायर सदा अपनी आँखें खुली रखता है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

शुक्रवार, 11 जून 2021

दिल को देखो, चेहरा ना देखो

तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर कुछ लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! कुछ सुप्रीमो, प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। ऐसों का अपने प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है.............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

चेहरे के बारे में किशोर कुमार कहते-कहते चले गए कि इस लुटेरे से बच कर रहो, दिल की बात सुनो ! उनके पहले और बाद में भी बहुत से लोगों ने चेहरों से सावधान रहने को बहुत कुछ कहा है ! पर हम सदा चेहरे की लुनाई, उसकी सुंदरता, उसकी मनमोहकता पर रीझ उस पर फ़िदा होते रहे हैं। समाज के हर क्षेत्र में लियाकत के साथ-साथ सुंदर व आकर्षक चेहरा सफलता के मापदंडों में प्रमुख भूमिका निभाता रहा है !राजनीती को ही देख लें ! तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! यदि कुछ सुप्रीमो खुद इस कसौटी पर कहीं नहीं ठहरते तो वे प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। भले ही मुंह खोलते ही उनकी औकात सामने आ जाती हो ! पर उनके ग्लैमर से चूंधियाई हुई आम जनता की तालियों की आवाज, परिणाम आने तक ही सही, पार्टी में जान सी फूँक देती है !  

इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं

हमारा देश त्योहारों का देश है और हम, उत्सव प्रियः मानवा:। धीरे-धीरे हमारे चुनाव भी एक तरह के उत्सव में बदल गए हैं। अब उत्सव है तो मौज-मस्ती-हंसी-ठिठोली "इज ए मस्ट" ! सो इस त्यौहार के आते ही लुभावने-सलोने चेहरों की मांग बढ़ जाती है। जो ज्यादातर "शो या लोकप्रिय बिजनेस" से ताल्लुक रखते हैं। इनमें इक्के -दुक्के को छोड़ अधिकतर ऐसे होते हैं जिन्हें देश-समाज-गरीब-गुरबों की कोई चिंता नहीं होती ! उन्हें तो उनकी खुदगर्जी और राजनितिक दल की मज़बूरी इस स्टेज पर ले आती है ! वे तो अपने अस्ताचलगामी समय को भांप कर, लोगों में अपनी पहचान और अपने अतीत की यादों को बचाए रखने के लिए, जिस किसी भी पार्टी की तरफ से ज्यादा लुभावना प्रस्ताव मिलता है, उसी के हिमायती बन उसकी खिदमत और तीमारदारी में जुट उसके कहेनुसार "डॉयलाग डिलीवरी" कर अवाम और समाज को बरगलाने में लग जाते हैं ! 

ऐसे बहुत से मतलबपरस्त हैं, जो कभी इधर कभी उधर मंडराते हुए, अपने हितों को साधते रहते हैं ! कुछ ऐसे भी होते हैं जो अचानक मिल गई सत्ता, ताकत, लोकप्रियता को संभाल नहीं पाते ! फिर उनको किसी का लिहाज नहीं रहता। ना उम्र का ! ना पद का ! नाहीं देश की गरिमा या मान-सम्मान का ! ऐसों का प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है ! ऐसे मतलबपरस्त लोग अपने आकाओं की नाकामयाबियों पर पर्दा डालने, उनको छिपाने के लिए दूसरों पर अनवरत विष-वमन करते रहते हैं। जो इनका एकमात्र और एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता है ! जिसके लिए इनकी औकात से ज्यादा भुगतान इन्हें किया जाता है। इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं। 

आजकल हर चीज पराकाष्ठा को प्राप्त हो चुकी है। नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या की कोई हद नहीं रही है। आज जो ज्यादा अंतहीन बकवास कर सकता हो, स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल कर सकता हो, निम्न कोटि के शब्दों का प्रयोग कर सकता हो, वही ज्यादातर पार्टीयों के प्रमुख प्रवक्ता का पद हासिल कर पाता है ! बशर्ते चेहरा लुभावना हो ! विपक्ष में ऐसे लोगों की भरमार है ! उनमें से कुछ पूर्वाग्रही और कुंठित लोगों को सिर्फ बाल की खाल निकालने, बात का बतंगड़ बनाने, सच पर झूठ का मुलम्मा चढ़ाने और दूसरे को किसी भी तरह दोषी ठहराने का काम सौंपा गया है ! इनको अपने इतिहास, अपने आकाओं की गलतियों और अपनी पार्टी की गलत नीतियों से कोई मतलब नहीं होता ! ये सिर्फ इन्तजार करते हैं कि सामने वाला कभी भी, कहीं भी कुछ भी बोले और ये अपनी सर्पजिह्वा से वैमनस्य फैलाना शुरू करें ! सोशल मीडिया पर तो छुद्र कोटि के ऐसे निम्न सोच वाले लोग बैठे हैं जो हर बात को ''शिट और पी'' (इन्हीं शब्दों का उपयोग कर) के समकक्ष बनाने में कोई गुरेज नहीं करते ! पता नहीं कैसी मानसिकता और सोच है ! ये इंसान हैं या कौवे, जिसका ध्यान सिर्फ गंदगी पर रहता है !

यह जरुरी नहीं कि हर किसी की विचारधारा एक हो ! इतना बड़ा देश है ! अथाह आबादी है ! सबकी अपनी-अपनी निष्ठा है ! अपनी-अपनी सोच है ! किसी की पसंद-नापसंद उसका अपना व्यक्तिगत मामला है। अच्छी बात है, विविधता होनी भी चाहिए। पर जब देश की बात हो, देश के प्रधान की बात हो, तब वह इंसान या व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। वह देश के मान-सम्मान, विदेशों में उसकी साख की बात बन जाती है। कोई व्यक्ति विशेष का विरोध करे, बात समझ में आती है। पर अपने स्वार्थ, अपने हित, अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ती के लिए देश के गरिमामय पद की बदनामी की जाए, उस पर लांछन लगाए जाऐं, उसकी हर बात को गलत सिद्ध किया जाए, यह तो किसी भी तरह बर्दास्त करने की बात नहीं है ! कहा भी गया है की भय के बिना प्रीत नहीं होती ! तो आज उसी भय की सख्त जरुरत है ! यह भी सही है कि हमारे देश की रीती रही है कि यदि किसी के गलत काम का सौ लोग विरोध करते हैं तो दस उसके पक्ष में भी आ खड़े होते हैं ! उन्हीं दस की शह पर वह और कुकर्म करता जाता है ! तो आज उस कुकर्म करने वाले के साथ ही उन दस लोगों को भी सबक सिखाने की सख्त जरुरत है ! इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ! वृक्ष को स्वस्थ रख पर्यावरण बचाना है तो पहले दीमकों और कीड़ों का नाश तो करना ही पडेगा !

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