शुक्रवार, 11 जून 2021

दिल को देखो, चेहरा ना देखो

तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर कुछ लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! कुछ सुप्रीमो, प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। ऐसों का अपने प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है.............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

चेहरे के बारे में किशोर कुमार कहते-कहते चले गए कि इस लुटेरे से बच कर रहो, दिल की बात सुनो ! उनके पहले और बाद में भी बहुत से लोगों ने चेहरों से सावधान रहने को बहुत कुछ कहा है ! पर हम सदा चेहरे की लुनाई, उसकी सुंदरता, उसकी मनमोहकता पर रीझ उस पर फ़िदा होते रहे हैं। समाज के हर क्षेत्र में लियाकत के साथ-साथ सुंदर व आकर्षक चेहरा सफलता के मापदंडों में प्रमुख भूमिका निभाता रहा है !राजनीती को ही देख लें ! तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! यदि कुछ सुप्रीमो खुद इस कसौटी पर कहीं नहीं ठहरते तो वे प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। भले ही मुंह खोलते ही उनकी औकात सामने आ जाती हो ! पर उनके ग्लैमर से चूंधियाई हुई आम जनता की तालियों की आवाज, परिणाम आने तक ही सही, पार्टी में जान सी फूँक देती है !  

इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं

हमारा देश त्योहारों का देश है और हम, उत्सव प्रियः मानवा:। धीरे-धीरे हमारे चुनाव भी एक तरह के उत्सव में बदल गए हैं। अब उत्सव है तो मौज-मस्ती-हंसी-ठिठोली "इज ए मस्ट" ! सो इस त्यौहार के आते ही लुभावने-सलोने चेहरों की मांग बढ़ जाती है। जो ज्यादातर "शो या लोकप्रिय बिजनेस" से ताल्लुक रखते हैं। इनमें इक्के -दुक्के को छोड़ अधिकतर ऐसे होते हैं जिन्हें देश-समाज-गरीब-गुरबों की कोई चिंता नहीं होती ! उन्हें तो उनकी खुदगर्जी और राजनितिक दल की मज़बूरी इस स्टेज पर ले आती है ! वे तो अपने अस्ताचलगामी समय को भांप कर, लोगों में अपनी पहचान और अपने अतीत की यादों को बचाए रखने के लिए, जिस किसी भी पार्टी की तरफ से ज्यादा लुभावना प्रस्ताव मिलता है, उसी के हिमायती बन उसकी खिदमत और तीमारदारी में जुट उसके कहेनुसार "डॉयलाग डिलीवरी" कर अवाम और समाज को बरगलाने में लग जाते हैं ! 

ऐसे बहुत से मतलबपरस्त हैं, जो कभी इधर कभी उधर मंडराते हुए, अपने हितों को साधते रहते हैं ! कुछ ऐसे भी होते हैं जो अचानक मिल गई सत्ता, ताकत, लोकप्रियता को संभाल नहीं पाते ! फिर उनको किसी का लिहाज नहीं रहता। ना उम्र का ! ना पद का ! नाहीं देश की गरिमा या मान-सम्मान का ! ऐसों का प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है ! ऐसे मतलबपरस्त लोग अपने आकाओं की नाकामयाबियों पर पर्दा डालने, उनको छिपाने के लिए दूसरों पर अनवरत विष-वमन करते रहते हैं। जो इनका एकमात्र और एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता है ! जिसके लिए इनकी औकात से ज्यादा भुगतान इन्हें किया जाता है। इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं। 

आजकल हर चीज पराकाष्ठा को प्राप्त हो चुकी है। नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या की कोई हद नहीं रही है। आज जो ज्यादा अंतहीन बकवास कर सकता हो, स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल कर सकता हो, निम्न कोटि के शब्दों का प्रयोग कर सकता हो, वही ज्यादातर पार्टीयों के प्रमुख प्रवक्ता का पद हासिल कर पाता है ! बशर्ते चेहरा लुभावना हो ! विपक्ष में ऐसे लोगों की भरमार है ! उनमें से कुछ पूर्वाग्रही और कुंठित लोगों को सिर्फ बाल की खाल निकालने, बात का बतंगड़ बनाने, सच पर झूठ का मुलम्मा चढ़ाने और दूसरे को किसी भी तरह दोषी ठहराने का काम सौंपा गया है ! इनको अपने इतिहास, अपने आकाओं की गलतियों और अपनी पार्टी की गलत नीतियों से कोई मतलब नहीं होता ! ये सिर्फ इन्तजार करते हैं कि सामने वाला कभी भी, कहीं भी कुछ भी बोले और ये अपनी सर्पजिह्वा से वैमनस्य फैलाना शुरू करें ! सोशल मीडिया पर तो छुद्र कोटि के ऐसे निम्न सोच वाले लोग बैठे हैं जो हर बात को ''शिट और पी'' (इन्हीं शब्दों का उपयोग कर) के समकक्ष बनाने में कोई गुरेज नहीं करते ! पता नहीं कैसी मानसिकता और सोच है ! ये इंसान हैं या कौवे, जिसका ध्यान सिर्फ गंदगी पर रहता है !

यह जरुरी नहीं कि हर किसी की विचारधारा एक हो ! इतना बड़ा देश है ! अथाह आबादी है ! सबकी अपनी-अपनी निष्ठा है ! अपनी-अपनी सोच है ! किसी की पसंद-नापसंद उसका अपना व्यक्तिगत मामला है। अच्छी बात है, विविधता होनी भी चाहिए। पर जब देश की बात हो, देश के प्रधान की बात हो, तब वह इंसान या व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। वह देश के मान-सम्मान, विदेशों में उसकी साख की बात बन जाती है। कोई व्यक्ति विशेष का विरोध करे, बात समझ में आती है। पर अपने स्वार्थ, अपने हित, अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ती के लिए देश के गरिमामय पद की बदनामी की जाए, उस पर लांछन लगाए जाऐं, उसकी हर बात को गलत सिद्ध किया जाए, यह तो किसी भी तरह बर्दास्त करने की बात नहीं है ! कहा भी गया है की भय के बिना प्रीत नहीं होती ! तो आज उसी भय की सख्त जरुरत है ! यह भी सही है कि हमारे देश की रीती रही है कि यदि किसी के गलत काम का सौ लोग विरोध करते हैं तो दस उसके पक्ष में भी आ खड़े होते हैं ! उन्हीं दस की शह पर वह और कुकर्म करता जाता है ! तो आज उस कुकर्म करने वाले के साथ ही उन दस लोगों को भी सबक सिखाने की सख्त जरुरत है ! इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ! वृक्ष को स्वस्थ रख पर्यावरण बचाना है तो पहले दीमकों और कीड़ों का नाश तो करना ही पडेगा !

4 टिप्‍पणियां:

Kadam Sharma ने कहा…

Satik vishleshan. Desh ka durbhagy

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
धन्यवाद! सहमत हूं, आपसे

शिवम् कुमार पाण्डेय ने कहा…

बिल्कुल सही लिखा है अपने।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी
बहुत-बहुत धन्यवाद

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