गुरुवार, 24 जून 2021

बूँदों की सरगम और मानसून के साज पर राग पावस

नन्ही - नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच सतरंगी  पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत - रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण - कण का मन - मयूर नाचने - गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है ! उसी महारानी का अद्भुत श्रृंगार  'मानसून' कहलाता है ! इसके क्रियान्वयन के लिए उन ख़ास हवाओं जरुरत पड़ती है, जो हिंद व अरब महासागर से उठ, हमारे देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं ! उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है।  ऐसा न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

इस बार देश में भले ही पिछले सालों जैसी झुलसा देने वाली उतनी लंबी गर्मी न पडी हो, देश के अधिकांश भागों में मानसून ने भी कुछ पहले ही दस्तक दे दी थी। पर दिल्ली समेत कुछ इलाकों में गर्मी ने विदा होने के पहले जून के अंतिम सप्ताह में अपना असली रूप कुछ न कुछ दिखाया जरूर है। हालांकि उसका रौद्र रूप अपने चरम पर नहीं रहा, नाही उतनी पानी की किल्लत हुई पर एक बार तो उसने अपनी उपस्थिति जाहिर कर ही दी। समयानुसार प्रकृति ने फिर करवट बदली है ! कुछ देर से ही सही सकून देने वाली पावस ऋतु के कदमों में बंधी पायल की सुमधुर रिम-झिम ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। धीरे-धीरे सारा देश इस मधुर ध्वनि के आगोश में खो जाने वाला है। इस बार कुछ देर से ही सही पर आकाश से बरसने वाली इस अमृत रूपी बरसात से जल्द ही सिर्फ हमारा देश ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तृप्त और खुशहाल होने वाले हैं। जून से सितंबर तक होने वाली इस बरसात को जो हवाएं, हिंद और अरब महासागर से उठ, अपने देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। मानसून नाम अरबी भाषा के ''मावसिम'' शब्द से आया है।

                                  

इन दिनों की राह तो जैसे सारी कायनात देख रही होती है ! मौसम का यह खुशनुमा बदलाव समस्त चराचर को अभिभूत कर रख देता है। आकाश में जहां सिर्फ आग उगलते सूर्य का राज होता था वहीं अब जल से भरे कारे-कजरारे मेघों का आधिपत्य हो जाता है। उनसे झरती नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच जब सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ होगा जो इसके प्रेम-पाश से बच सका हो। 


भारत में इसका आगाज तक़रीबन एक जून से हो जाता है, पर इसकी आहट मई के अंतिम हफ्ते से ही सुनाई देने लग जाती है। हमारा मौसम विभाग देश भर के विभिन्न भागों से तापमान, हवा के रुख, बर्फ़बारी, वायुमंडल के दवाब इत्यादि आंकड़ों को ध्यान में रख कई तथ्यों का अध्ययन कर आने वाले मौसम की भविष्यवाणी करता है। पर आंकड़ों में जरा सी चूक आकलन में काफी हेर-फेर ला देती है ! फिर भी इस विभाग की उपयोगिता और उसकी कर्मठता पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। सवाल तो खड़े होने चाहिए हम पर ! जिनकी  गलतियों का खामियाजा भुगत कर पर्यावरण दूषित हो रहा है ! ''ग्लोबल वार्मिंग'' बढ़ रही है ! यह डर की बात तो है ही और ऐसा लग भी रहा है कि मानसून, जो सदियों से भारत पर सहृदय, दयाल और मेहरबान रहता आया है, वह आने वाले वक्त में अपना समय और दिशा बदल सकता है। उससे हमारे विशाल कृषि प्रधान देश को कितनी समस्याओं का सामना करना पडेगा उसका अंदाज लगाना भी मुश्किल है ! ऐसा न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए !    
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

25 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (25-06-2021) को "पुरानी क़िताब के पन्नों-सी पीली पड़ी यादें" (चर्चा अंक- 4106 ) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
धन्यवाद सहित।

"मीना भारद्वाज"

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

Kamini Sinha ने कहा…

"बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है।"
बिलकुल सही कहा आपने,यदि ऐसी सुचना है तो शायद प्रकृति हम पर थोड़ी मेहरबान हो रही है, सादर नमन आपको

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी
सदा स्वागत है आपका

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ जून २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी
सम्मिलित करने हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद

Onkar ने कहा…

सही कहा

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ओंकार जी
हार्दिक आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जानकारी परक लेख । सवाल सच में हम पर ही खड़े होने चाहिएँ , पर्यावरण का जो नुकसान हम लोगों ने किया है खामियाज़ा तो भुगतना ही पड़ेगा । सार्थक लेख ।

Subodh Sinha ने कहा…

"Global Warming" के लिए सारे आधुनिक भौतिकवादी और विध्वंसकारक उपकरणों को विश्व के हम सभी विभत्स प्राणियों को त्यागना होगा, जो दूर-दूर तक हम दो पैर वाले प्राणियों के लिए असम्भव दिख रहा है .. शायद ...

Harash Mahajan ने कहा…

बहुत सुंदर सृजन ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संगीता जी
बहुत-बहुत धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुबोध जी
"कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है आपका

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी
हौसलाअफजाई हेतु अनेकानेक धन्यवाद

Jigyasa Singh ने कहा…

बहुत सी सुंदर सारगर्भित आलेख, बहुत बहुत आभार आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत ही सारगर्भित एवं चिन्तनपरक लेख।
मौसम की विसंगतियों एवं ग्ली वार्मिंग जैसी समस्या के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

Sudha Devrani ने कहा…

कृपया ग्लोबल वार्मिंग पढें।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जिज्ञासा जी
अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुधा जी
सब जानने-बूझने के बावजूद भी हम लापरवाह बने हुए हैं

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

जानकारी परक लेख। आपने सही कहा अगर हम न सम्भले तो शायद हमें इसका तगड़ा खामियाजा भुगतना पड़े।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विकास जी
कायनात पूरे गुस्से में है पर हम अभी भी सबक लेने को तैयार नहीं हैं

Anita ने कहा…

मानसून पर रोचकता पूर्ण जानकारी

Kadam Sharma ने कहा…

Bahut hi rochak w sundar wiwran

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
बहुत-बहुत धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
अनेकानेक धन्यवाद

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