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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ईश्वर से डायरेक्ट कनेक्शन 😮

मौत से सभी को डर लगता है ! हजारों आस्थावान लोग अपना टीन-टप्पर बेच कर, जान बचाने खातिर पैगंबर साहब के पास पहुंच गए ! क्रिसमस भी आया और चला गया ! पर ना कोई बरसात हुई ना हीं बाढ़ दिखी, न दुनिया डूबी, न धरती कांपी, न आसमान फटा ! लोग पूछने लगे, नोआ भाई, पानी कहां है ? पैगंबर साहब बोले, मेरी ईश्वर से बात हुई, मैंने उनसे आप लोगों के भले के लिए दुआ की और कहा कि नावें कम पड़ रही हैं, तो उन्होंने मुझे और नावें बनाने का समय देते हुए, फिलहाल बाढ़ को स्थगित कर दिया है ! लोग मान भी गए.............!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इं सान ने जब से होश संभाला है, शायद तभी से उसका सबसे बड़ा डर अपनी मौत का ही रहा है ! अपनी या अपने प्रियजनों की मृत्यु उसे सदा भयभीत किए रखती है ! आस्था और डर के बीच बहुत ही महीन रेखा होती है, उसी घालमेल का फायदा उठा संसार भर में कुटिल लोग इस भय को अपने हित में भुनाते रहे हैं ! आज के सोशल मीडिया का बवंडर यदि ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करता है तो दूसरी और उन्हें मशहूर करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता !   

स्वयंभू पैगंबर, एबो नूह
गस्त 2025 ! अचानक एक  “What will happen and how it will happen” शीर्षक का वीडियो, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स पर तेजी से वायरल होने लगा ! जिसमें अफ्रीकी देश घाना के कसोआ इलाके का एक टाट (बोरा) धारी, एबो नूह (Ebo Noah) नामक स्वयंभू पैगंबर दावा करता नजर आता है कि उसे ईश्वर से संदेश प्राप्त हुआ है कि आगामी क्रिसमस के दिन से भीषण बरसात होगी, जिसके फलस्वरूप भयंकर बाढ़ आएगी, जिसका प्रकोप तीन साल तक रहेगा। धरती का अधिकतम हिस्सा जलमग्न हो जाएगा ! सारे मनुष्य, जीव-जंतु, पेड़-पौधे नष्ट हो जाएंगे ! आगे वह बताता है कि इस विपदा से बचने के लिए उसने आठ विशाल नावें बनाई हैं ! जो लोग इन नावों में आएंगे, दान देंगे, जगह बुक करेंगे, सिर्फ वही बचेंगे, बाकि सब खत्म हो जाएंगे ! डर बेचने का उसका धंधा चल निकला ! वैसे इस शख्स ने खुद को वर्तमान समय का नोआ यानी नूह घोषित कर रखा है, जो आने वाली हर विपदा से अपने अनुयायियों को बचाता रहेगा ! 
विशालकाय नौका 
निर्माणाधीन 

जा हिर है ! मौत से सभी को डर लगता है ! एबो की भविष्यवाणी से डर कर हजारों आस्थावान लोग अपना टीन-टप्पर बेच कर, जान बचाने खातिर उसकी शरण में पहुंच गए ! क्रिसमस भी आया और चला गया ! पर ना कोई बरसात हुई ना हीं बाढ़ दिखी, न दुनिया डूबी, न धरती कांपी, न आसमान फटा ! लोग पूछने लगे, नूह भाई, पानी कहां है ? पैंगबर साहब बोले, मेरी ईश्वर से बात हुई, मैंने उनसे आप लोगों के भले के लिए दुआ की और कहा कि नावें कम पड़ रही हैं, तो उन्होंने मुझे और नावें बनाने का समय देते हुए, फिलहाल बाढ़ को स्थगित कर दिया है ! लोग मान भी गए !   

मौत का खौफ 

इस आदमी के करीब 35000 पिच्छलगु हैं ! ये सदा टाट, बोरा पहने रहता है ! खुद को जमीन से जुड़ा बताता है ! मंहगे फोन को ईश्वर से कांटेक्ट के लिए जरुरी बताता है ! ईश्वर की राह पर चलते हुए इसने खुद को ही कॉन्ट्रैक्टर भी बना लिया, प्रॉफ़ेट भी और टिकट चेकिंग क्लर्क भी, सब कुछ एक साथ ! फिर भी लोग उस पर भरोसा कर रहे हैं ! वे यह नहीं देख पाते कि उन्हें प्रलय का दिन बताने वाला एक लाख डॉलर की नई गाड़ी खरीद रहा है ! जिसे वह उन्हीं के प्रेम की भेंट बताता है ! कोई यह नहीं पूछता कि बाढ़ आ ही क्यों रही थी ? यदि आनी जरुरी थी तो रुक क्यों गई ? हमने जो अपना घर-बार बेच दिया उसका क्या होगा ? वही डर, वही भय, वही आशंका, इन सभी लोगों को चुप रखे हुए है ! छोड़ दिया है सबको अपनी नियति पर !

शौक 
धर एबो के खिलाफ  काफी  कुछ लिखा भी  जा रहा है ! कई धार्मिक  नेताओं ने भी साफ कहा है कि ये बाइबल की कहानी को तोड़-मरोड़कर अपने  फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है ! कानून अपने ही दायरे में कैद है ! उधर पब्लिक है कि  मानती ही नहीं कि उसके साथ  कुछ गलत हुआ है, उसे सिर्फ  अपनी जान बचाने की पड़ी है और इसके लिए वो इंतजार कर रही है बाकि नावों के बनने का !
हश्र 
हा लांकि खबर यह है कि फिलहाल पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया है, पर इससे उसकी ''पूंछ'' और भी बढ़ गई है और उसे अपने पुराने गेट-अप में तरह-तरह के समारोहों में शामिल होने का न्योता मिल रहा है,  जिनमें Sarcodie's Concert भी एक है ! जय हो ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 20 जुलाई 2024

सुखदाई सावन के साथी, कुछ दुखदाई पाहुन

बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रख दिए हैं। मौसम सुहाना होने लगा है। इसकी धुन पर सब अपने में मस्त हैं। पर शरीर साफ सुन पा रहा है, बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की भी पदचाप। इसी आवाज को हम सब को भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिए। क्योंकि बिमार होने के बाद स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर स्वस्थ रह कर इस ऋतु का आनंद लिया जाए.........!!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार गर्मी ने कुछ ज्यादा ही लंबी मेहमाननवाजी  करवा ली। जाने के समय भी बिस्तर बांधने में अच्छा खासा समय ले लिया। वो तो भला हो इंद्र देवता का जिनकी इजाजत से बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रखे। मौसम सुहाना होने लगा। पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली। किसानों की जान में जान आई। कवियों को नई कविताएं सूझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। इसी आवाज को हम सब को भी सुन, संभल जाना चाहिए। स्वस्थ रहते हुए ही स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिए। क्योंकि बिमार होने के बाद स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाए ! 
नभ से अमृत की फुहार 
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेंट्री, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, अपने-अपने ढोल-मंजीरे ले शरीर के द्वार पर दस्तक देने लगते हैं। वैसे तो अधिकांश लोग अपना ख्याल रखना जानते हैं, फिर भी हिदायतें सामने दिखती रहें तो और भी आसानी हो जाती है, क्योंकि उनके प्रयोग से लाभ ही होता है नुक्सान कुछ भी नहीं है ! मेरे एक मित्र मधुसूदन जी वैद्य हैं। वर्षों से बिना किसी अपेक्षा के लोगों का हितचिंतन करते आ रहे हैं। उन्हीं के परामर्श को साझा कर रहा हूँ  :-
सावधानी की अपेक्षा 
* इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। इसलिए रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा सुबह लेने से फायदा रहता है।

* खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।

* इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग कम कर दें।

* इस मौसम में ज्यादातर बीमारियां दूषित जल से ही होती हैं ! तो ऐसे में पानी का उपयोग करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए ! पीने के लिए गुनगुना पानी सर्वोत्तम होता है !

* आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। दूसरे कामों के लिए भंड़ारित किए हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। कुछ ही देर में पानी की गंदगी नीचे बैठ जाएगी और वह उपयोग के लिए सुरक्षित हो जाएगा। 

* नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर स्नान करें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहाएं। बरसात में भीगने से बचें, मजबूरी में शरीर गीला हो ही जाए तो जितनी जल्दी हो उसे सुखाने की जुगत करें।
 
* तुलसी का पौधा अमूमन हर घर में होता ही है। इस की पत्तियां जलजनित रोगों से लड़ने में बहुत सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है। घर में पीने के पानी में इसकी आठ-दस पत्तियां डाल दें, ये बखूबी आपकी हिफाजत करेंगी.  

* खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा या अजवायन पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जाएगी। शरीर को सजग बनाए रखने के लिए घर पर ही हल्का-फुल्का व्यायाम जरूर करते रहें !           

* इस मौसम में अचार, तले हुए व्यंजन, मसालेदार खाद्य पदार्थों का कम से कम उपयोग के साथ-साथ बाहर के खान-पान से भी जहां तक हो सके दूरी बनाए रखनी चाहिए ! साथ ही ज्यादा देर के कटे फल, सलाद और बासी भोजन का उपयोग ना ही करें तो बेहतर है।
उल्लास 
सीधी सी बात है ! पावस के इस सुहाने मौसम के अलावा भी ऋतु कोई भी क्यों ना हो, मौसम कैसा भी क्यों न हो,  यदि हमें उसका आनंद लेना है तो हम स्वस्थ रह कर ही ऐसा कर सकते हैं और खुद को स्वस्थ कौन नहीं रखना चाहता ! वैसे यह कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं है ! बस, जरा सी सावधानी और जरा सा परहेज ही तो अपनाना है !

@फोटो अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 12 जुलाई 2023

आपा खोती प्रकृति

आज हजारों टन मिट्टी, पत्थर, चट्टाने जो पहाड़ों से अलग नीचे बिखरी पड़ी हैं, उन्हें वापस पहाड़ों पर फिर से ले जाया, लगाया तो नहीं जा सकता ! जीवन सुचारु बनाने के लिए वैसे छोड़ा भी नहीं जा सकता ! तो..........!  तो वही होगा जो वर्षों से होता चला आया है ! नदियों के तल ऊँचे होते चले जाएंगे ! फिर नदियाँ उफान पर आएंगी और फिर...!  इसके बावजूद क्या भविष्य में इंसान कोई सबक लेगा ? सुधरेगा ? यक्ष प्रश्न है कि क्या सुधरना उसके अपने बस में रह भी गया है ........?    

कई दिनों के चिंताजनक इंतजार के बाद आज सुबह, वहां फोन सेवा बहाल होने पर, भाई जीवन का हिमाचल से फोन आया ! सभी की सुरक्षा का हाल जान कुछ तसल्ली मिली ! पर हालात बहुत ही सोचनीय बने हुए हैं ! प्रदेश भर में निजी संपत्तियों को बेहिसाब नुकसान हुआ है तथा पूरे प्रदेश में सामान्य जनजीवन प्रभावित है। जो कुछ लोग पानी की आपदा से सुरक्षित हैं, वे अन्य कारणों से असुरक्षित हैं ! पीने के पानी की बेहद तंगी है ! समुद्र जैसा हाल हो गया है कि चारों ओर पानी ही पानी पर पीने को ज़रा सा भी नहीं ! बच्चों को दूध मिलना मुश्किल हो रहा है ! खाने का सामान है तो पकाने की चिंता सामने खड़ी है ! गैस ख़त्म हो जाए तो पकाने का और कोई साधन उपलब्ध नहीं है ! लकड़ियां गीली हैं ! बिजली बंद है ! सूखे उपले मिल नहीं रहे ! कोई बीमार पड़ जाए तो डॉक्टर के पास ले जाना दूभर है ! 

बार-बार चेताने के बावजूद, अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आने वाले मनुष्यों को सबक सिखाने के लिए प्रकृति कितना और कब तक इंतजार करे ! और क्यों करे ! इंसान तो बाज आने से रहा ! पर क्रोधावस्था में रौद्र रूप धारण कर वह निर्दोष पशु-पक्षियों, लता-गुल्मों-पादपों का, यानी अपना भी संहार करती चली जा रही है ! मजबूरी है घुन का पिसना ! पहाड़ों के पेड़ों को अपने घरों को सुंदर और पुख्ता बनाने की ललक ने उनको अपनी जमीन से अलग तो कर दिया पर वही आशियाने तिनकों की तरह पानी के सैलाब में बह गए ! क्या मिला ? इसके बावजूद भविष्य में इंसान कोई सबक लेगा ? सुधरेगा ? पर यक्ष प्रश्न है कि क्या सुधरना उसके अपने बस में रह भी गया है ?  

आज हजारों टन मिट्टी, पत्थर, चट्टाने जो पहाड़ों से अलग नीचे बिखरी पड़ी हैं, उन्हें वापस पहाड़ों पर फिर से ले जाया, लगाया तो नहीं जा सकता ! जीवन सुचारु बनाने के लिए वैसे छोड़ा भी नहीं जा सकता ! तो..........!  तो वही होगा जो वर्षों से होता चला आया है ! सारा का सारा मलबा घाटियों में धकेल दिया जाएगा ! जो समय के साथ नदियों में जा गिरेगा ! नदियों के तल ऊँचे होते चले जाएंगे ! फिर पानी बरसेगा, फिर बर्फ पिघलेगी, फिर नदियाँ उफान पर आएंगी और फिर........!  

पर सारा दोष तो उस लालच को नहीं दिया जा सकता जिसने प्रकृति का दोहन किया ! सुदूर पहाड़ों या दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले भले ही प्रकृति की गोद में रह रहे हों पर उनका रोजमर्रा का जीवन अति कष्टकारी था ! देश के विकास का असर, अन्य संसाधनों-सुविधाओं की पहुँच उन तक ना के बराबर थी ! सेना के आवागमन के लिए सड़कें तो थीं पर पर्याप्त नहीं थीं ! फिर दुर्गम क्षेत्रों में आने-जाने के लिए, सामान पहुंचाने के लिए मार्ग बने ! आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया गया ! सुविधाएं बढ़ीं तो लोग पहुँचने लगे ! भीड़ बढ़ी तो उनके रहने, ठहरने के लिए होटलों की जरुरत पड़ी ! जिसके लिए जगलों को काट कर जगह बनाई गई ! जंगलों के वृक्ष कटे तो उनकी पकड़ के बगैर जमीन भुरभुरी हो गई ! फिर वही चक्र...! बरसात हुई, पहाड़ खिसके, नदी का तल ऊँचा हुआ , बाढ़ आई ! 

फिर वही ''तो''....! इस तो का तो सरल सा उपाय तो था, पर उस पर किसी ने अमल करने की जहमत नहीं उठाई ! कायनात का कायदा है, इस हाथ ले उस हाथ दे ! फिर कुदरत तो कभी भी उतना वापस भी नहीं चाहती, जितना वह लुटाती है ! पर हमारी खुदगर्जी ने यह भुला दिया कि किसी की भलमनसाहत का नाजायज फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए ! क्या फायदा उस ज्ञान का, उस विकास का, जो अपने ही विनाश का कारण बने ! अभी भी यह एक चेतावनी ही है कि सुधर जाओ, नहीं तो...........!

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

सुखदाई सावन के साथी, कुछ दुखदाई पाहुन

सीधी-सच्ची बात या लब्बोलुआब तो यही है कि इस दुनिया में ''हमारा'' रहने का एक ही या एकमात्र स्थान हमारा शरीर ही है ! वह है, तभी हम हैं ! वह है, तभी सारी अनुभूतियां हैं ! वह है, तभी सुख-दुःख, भोग-विलास, प्रेम-प्यार, मोह-ममता, तेरा-मेरा, जमीन-जायदाद, धन-दौलत इन सबका उपयोग व उपभोग संभव है ! यदि शरीर ही नहीं रहे तो फिर हर चीज बेमानी है ! इसलिए सबसे पहले इसे संभालने, स्वस्थ रखने और सदा चलायमान बनाए रखने का उपक्रम और ध्यान होना चाहिए...........!                       

#हिन्दी_ब्लागिंग               

इस बार दिल्ली में गर्मी का मौसम कुछ ज्यादा ही टिक गया ! जाते-जाते भी अपने तेवरों से लोगों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर गया ! हालांकि इसमें हमारे प्रति उसकी नेकनीयती ही थी, क्योंकि इस बार पूरे देश में मानसून जैसे तेवर दिखा रहा है वह बहुत ही खतरनाक, डरावना व भयावना है ! चारों ओर से भीषण दुर्घटनाओं की ख़बरें आ रही हैं ! जान-माल का अत्यधिक नुक्सान हुआ है ! शायद इसीलिए दिल्लीवासियों को बरखा के कहर से बचने के लिए ग्रीष्म कुछ और दिनों के लिए ठहर गया हो ! पर कितने दिन ! प्रोटोकॉल तो मानना ही पड़ता है ! 

आखिरकार देर से ही सही अपने राजा इंद्र देवता की इजाजत से बरखा रानी ने दिल्ली की धरती पर भी अपने कदम रखे। मौसम कुछ सुहाना हुआ ! पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली ! पशु-पक्षियों की जान में जान आई ! कवियों को नयी कविताएं सूझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। बस यहीं से शुरु हो गई बेचारे शरीर की परेशानी। सब अपने में मस्त थे पर मानव शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेन्टरी, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, और ऊपर से कोरोना ! सच्चाई तो कि बरसात की सुहानी रिमझिम सुखदाई तो बहुत है पर उसके साथ ही कई दुखदाई बिन बुलाए मेहमान भी आ  धमकते हैं !


तबियत ऐंड-बैंड होने के पहले ही हम सब को शरीर की इसी आवाज की अवहेलना ना कर स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ बने रहने की प्रक्रिया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाए। इसमें कुछ ज्यादा भी नहीं करना पड़ता, बस थोड़ी सी सावधानी ! थोड़ा सा परहेज ! थोड़ा सा आत्मनियंत्रण ही काफी है । इसमें हमारे पीढ़ियों से चले आ रहे घरेलु नुस्खे सदा खरे उतरते रहे हैं,  जिनके प्रयोग से लाभ ही होता है हानि कुछ भी नहीं  !

यहां वही सारी बातें हैं जो मैं सपरिवार अपने उपयोग में लाता हूँ ! किसी उपदेशक या विशेषज्ञ की हैसियत से नहीं बल्कि अनुभव जनित लाभ से प्रेरित हो यह सब साझा करने का प्रयास किया है 
* इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से पेट को भोजन पचाने में सहायता मिल जाती है। दुआ देता रहेगा !    

* बदलते मौसम और पल-पल बदलते तापमान के कारन सर्दी-खांसी-जुकाम आम बात होती है, इसके लिए एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से बहुत राहत मिलती है। आजकल तो किसी के छींकते-खांसते ही लोगों की भृकुटि टेढ़ी हो जाती है ! उससे भी बचे रहेंगे यदि दिन में एक-दो बार नमक मिले गर्म पानी से गरारे भी कर लिए जाएं !

* पावस ऋतु में वातावरण में जीवाणुओं-कीटाणुओं का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है ! इसलिए दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दिया जाए तो बेहतर रहता है !

* तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है। साथ में मीठी नीम के चार-पांच पर्ण भी ले लिए जाएं तो और भी उत्तम ! वैसे भी चाय वगैरह में तुलसी और-अदरक-दालचीनी का उपयोग करना बहुत फायदेमंद रहता है ! 

* बरसात हो और पकौड़ों की याद ना आए यह तो हो ही नहीं सकता ! पर उन पर दया बनाए रखनी चाहिए, कम मात्रा में सेवन कर ! वैसे भी तले-तलाए व्यंजन शरीर में ''स्लीपर सेल'' के काम को ही अंजाम देते हैं ! कब क्या कर जाएं पता नहीं ! सो उनके क्रिया-कलापों पर विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है।       

* खाना खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। पंद्रह-बीस मिनट के अंदर ही राहत मिल जाती है। वैसे अजवायन भी बहुत मुफीद रहती है !

* इन दिनों बाहर के खाने से बचें, खासकर मैदे से बने और चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग भी ना हीं करें तो बेहतर, खासकर प्याज का !
 
* इन दिनों घरों में आने वाला पानी भी कुछ दूषित सा होता है ! उसके लिए थोड़ी सी नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहाना तो सर्वोत्तम है, पर यह हम सब के वश की बात भी नहीं है, झंझट सा लगता है ! सो नहाने के पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला लेने से भी टारगेट पूरा हो जाता है ! 

* आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ देने से पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है, इसके उपरांत वह पानी हानिरहित हो जाता है। यदि रात को ऐसा कर दिया जाए तो साफ़ होने का इंतजार भी नहीं करना पडेगा ! 


सीधी-सच्ची बात या लब्बोलुआब तो यही है कि इस दुनिया में ''हमारा'' रहने का एक ही या एकमात्र स्थान हमारा शरीर ही है ! वह है, तभी हम हैं ! वह है, तभी सारी अनुभूतियां हैं ! वह है, तभी सुख-दुःख, भोग-विलास, प्रेम-प्यार, मोह-ममता, तेरा-मेरा, जमीन-जायदाद, धन-दौलत इन सबका उपयोग व उपभोग संभव है ! यदि शरीर ही नहीं तो फिर हर चीज बेमानी है ! इसलिए सबसे पहले इसे संभालने, स्वस्थ रखने और सदा चलायमान बनाए रखने का उपक्रम और ध्यान होना चाहिए। खासकर हर बदलते मौसम में इस पर कुछ अतरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है ! पर विडंबना है कि हम इसी का ध्यान नहीं रखते ! चौबीस घंटों में इसे आधा-पौना घंटा देने का समय भी हमारे पास नहीं होता ! 

यहां वही सारी बातें हैं जो मैं सपरिवार अपने उपयोग में लाता हूँ ! किसी उपदेशक, ज्ञानी या विशेषज्ञ की हैसियत से नहीं बल्कि अनुभव जनित लाभ से प्रेरित हो यह सब साझा करने का प्रयास किया है। वैसे भी यदि इस शरीर को एक घंटा और इसके बनाने वाले को आधे घंटे का समय भी दे दिया जाए तो शायद नब्बे प्रतिशत बीमारियां तो हमारे पास फटकें भी नहीं ! पर हम तभी चेतते है जब कोई बिमारी हमें घेरती है या फिर कोई मुसीबत ! तभी हमें अपना और भगवान का ध्यान आता है ! यदि सुख में ही ध्यान कर लें तो दुःख आए ही नहीं !  

@सभी चित्र अंतर्जाल के  सौजन्य से   

गुरुवार, 24 जून 2021

बूँदों की सरगम और मानसून के साज पर राग पावस

नन्ही - नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच सतरंगी  पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत - रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण - कण का मन - मयूर नाचने - गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है ! उसी महारानी का अद्भुत श्रृंगार  'मानसून' कहलाता है ! इसके क्रियान्वयन के लिए उन ख़ास हवाओं जरुरत पड़ती है, जो हिंद व अरब महासागर से उठ, हमारे देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं ! उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है।  ऐसा न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

इस बार देश में भले ही पिछले सालों जैसी झुलसा देने वाली उतनी लंबी गर्मी न पडी हो, देश के अधिकांश भागों में मानसून ने भी कुछ पहले ही दस्तक दे दी थी। पर दिल्ली समेत कुछ इलाकों में गर्मी ने विदा होने के पहले जून के अंतिम सप्ताह में अपना असली रूप कुछ न कुछ दिखाया जरूर है। हालांकि उसका रौद्र रूप अपने चरम पर नहीं रहा, नाही उतनी पानी की किल्लत हुई पर एक बार तो उसने अपनी उपस्थिति जाहिर कर ही दी। समयानुसार प्रकृति ने फिर करवट बदली है ! कुछ देर से ही सही सकून देने वाली पावस ऋतु के कदमों में बंधी पायल की सुमधुर रिम-झिम ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। धीरे-धीरे सारा देश इस मधुर ध्वनि के आगोश में खो जाने वाला है। इस बार कुछ देर से ही सही पर आकाश से बरसने वाली इस अमृत रूपी बरसात से जल्द ही सिर्फ हमारा देश ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तृप्त और खुशहाल होने वाले हैं। जून से सितंबर तक होने वाली इस बरसात को जो हवाएं, हिंद और अरब महासागर से उठ, अपने देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। मानसून नाम अरबी भाषा के ''मावसिम'' शब्द से आया है।

                                  

इन दिनों की राह तो जैसे सारी कायनात देख रही होती है ! मौसम का यह खुशनुमा बदलाव समस्त चराचर को अभिभूत कर रख देता है। आकाश में जहां सिर्फ आग उगलते सूर्य का राज होता था वहीं अब जल से भरे कारे-कजरारे मेघों का आधिपत्य हो जाता है। उनसे झरती नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच जब सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ होगा जो इसके प्रेम-पाश से बच सका हो। 


भारत में इसका आगाज तक़रीबन एक जून से हो जाता है, पर इसकी आहट मई के अंतिम हफ्ते से ही सुनाई देने लग जाती है। हमारा मौसम विभाग देश भर के विभिन्न भागों से तापमान, हवा के रुख, बर्फ़बारी, वायुमंडल के दवाब इत्यादि आंकड़ों को ध्यान में रख कई तथ्यों का अध्ययन कर आने वाले मौसम की भविष्यवाणी करता है। पर आंकड़ों में जरा सी चूक आकलन में काफी हेर-फेर ला देती है ! फिर भी इस विभाग की उपयोगिता और उसकी कर्मठता पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। सवाल तो खड़े होने चाहिए हम पर ! जिनकी  गलतियों का खामियाजा भुगत कर पर्यावरण दूषित हो रहा है ! ''ग्लोबल वार्मिंग'' बढ़ रही है ! यह डर की बात तो है ही और ऐसा लग भी रहा है कि मानसून, जो सदियों से भारत पर सहृदय, दयाल और मेहरबान रहता आया है, वह आने वाले वक्त में अपना समय और दिशा बदल सकता है। उससे हमारे विशाल कृषि प्रधान देश को कितनी समस्याओं का सामना करना पडेगा उसका अंदाज लगाना भी मुश्किल है ! ऐसा न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए !    
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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