pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: उपचार
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बुधवार, 20 सितंबर 2023

घुटने में अभी भी हेड़ेक है

अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई, कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था, तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था इसमें पूरी सच्चाई निहित थी........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बात कुछ दिनों पहले की है ! दोपहर करीब दो बजे का समय था ! रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं ! सो उनका आनंद लेने के लिए पैदल ही ऑफिस से घर की ओर निकल पड़ा ! यही बात इंद्रदेव को पसंद नहीं आई कि एक अदना सा इंसान उनसे डरने की बजाय खुश हो रहा है ! बस, फिर क्या था ! उन्होंने उसी समय अपने सारे शॉवरों का मुंह एक साथ पूरी तरह खोल दिया। अचानक आए इस बदलाव ने मुझे अपनी औकात भुलवा मुझसे सौ मीटर की दौड़ लगवा दी ! उस समय तो कुछ महसूस नहीं हुआ, पर रात गहराते ही घुटने में दर्द ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी !  जिसने मेरे नजरंदाजी रवैये के कारण अगले कुछ दिनों का अवकाश लेने पर मजबूर कर दिया ! पर इलाज करने और मर्ज बढ़ने के मुहावरे को मद्दे नजर रख, मैंने किसी ''डागदर बाबू'' को अपनी जेब की तलाशी नहीं लेने दी ! जुम्मा-जुम्मा करते 12-13 दिन हो गये पर दर्द महाशय घुटने के पेचो-ख़म में ऐसे उलझे कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे थे ! 
अब जैसा कि रिवाज है, तरह-तरह की नसीहतें, हिदायतें तथा उपचार मुफ्त में मिलने शुरू हो गए ! अधिकाँश सलाहें तो दोनों कानों में आवागमन की सुविधा पा हवा से जा मिले, पर कुछ अपने-आप को सिद्ध करने के लिए, दिमाग के आस-पास तंबू लगा बैठ गए ! सर्व-सुलभ उपायों को आजमाया भी गया ! ''फिलिप्स'' की लाल बत्ती का सेक भी दिया गया ! अपने नामों से मशहूर मलहमें भी खूब पोती गईं ! सेंधा नमक की सूखी-गीली गरमाहट को भी आजमाया गया,पर हासिल शून्य बटे सन्नाटा ही रहा ! फिर आए बाबा रामदेव अपनी ''पीड़ांतक" ले कर, उससे कुछ राहत भी मिली, हो सकता है कि शायद अब तक दर्द भी एक जगह बैठे-बैठे ऊब गया हो ! वैसे उसे और भी घुटने-कोहनियां देखनी होती हैं ! खाली-पीली मेरे यहां जमे रह कर उसकी दाल-रोटी भी तो नहीं चलने वाली, सो अब पूर्णतया तो नहीं पर काफी कुछ आराम है। 
अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था, इसके पीछे पूरी सच्चाई निहित थी !सवाल उठता है, कैसे ? तो जनाब, इन 12-13 दिनों में बहुत कोशिश की ! बहुतेरा ध्यान लगाया ! हर संभव-असंभव उपाय कर देख लिया पर एक अक्षर भी लिखा ना जा सका। जिसका साफ़ मतलब था कि यह सब करने का जिसका जिम्मा है वह तो हालते-नासाज को लिए घुटने में बैठा था  १ इस हालत में वह अपनी चोट संभालता कि मेरे अक्षरों पर ध्यान देता ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि कभी, किसी के घुटने में दिमाग का जिक्र आए तो उसे हलके में मत लें ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

सुखदाई सावन के साथी, कुछ दुखदाई पाहुन

सीधी-सच्ची बात या लब्बोलुआब तो यही है कि इस दुनिया में ''हमारा'' रहने का एक ही या एकमात्र स्थान हमारा शरीर ही है ! वह है, तभी हम हैं ! वह है, तभी सारी अनुभूतियां हैं ! वह है, तभी सुख-दुःख, भोग-विलास, प्रेम-प्यार, मोह-ममता, तेरा-मेरा, जमीन-जायदाद, धन-दौलत इन सबका उपयोग व उपभोग संभव है ! यदि शरीर ही नहीं रहे तो फिर हर चीज बेमानी है ! इसलिए सबसे पहले इसे संभालने, स्वस्थ रखने और सदा चलायमान बनाए रखने का उपक्रम और ध्यान होना चाहिए...........!                       

#हिन्दी_ब्लागिंग               

इस बार दिल्ली में गर्मी का मौसम कुछ ज्यादा ही टिक गया ! जाते-जाते भी अपने तेवरों से लोगों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर गया ! हालांकि इसमें हमारे प्रति उसकी नेकनीयती ही थी, क्योंकि इस बार पूरे देश में मानसून जैसे तेवर दिखा रहा है वह बहुत ही खतरनाक, डरावना व भयावना है ! चारों ओर से भीषण दुर्घटनाओं की ख़बरें आ रही हैं ! जान-माल का अत्यधिक नुक्सान हुआ है ! शायद इसीलिए दिल्लीवासियों को बरखा के कहर से बचने के लिए ग्रीष्म कुछ और दिनों के लिए ठहर गया हो ! पर कितने दिन ! प्रोटोकॉल तो मानना ही पड़ता है ! 

आखिरकार देर से ही सही अपने राजा इंद्र देवता की इजाजत से बरखा रानी ने दिल्ली की धरती पर भी अपने कदम रखे। मौसम कुछ सुहाना हुआ ! पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली ! पशु-पक्षियों की जान में जान आई ! कवियों को नयी कविताएं सूझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। बस यहीं से शुरु हो गई बेचारे शरीर की परेशानी। सब अपने में मस्त थे पर मानव शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेन्टरी, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, और ऊपर से कोरोना ! सच्चाई तो कि बरसात की सुहानी रिमझिम सुखदाई तो बहुत है पर उसके साथ ही कई दुखदाई बिन बुलाए मेहमान भी आ  धमकते हैं !


तबियत ऐंड-बैंड होने के पहले ही हम सब को शरीर की इसी आवाज की अवहेलना ना कर स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ बने रहने की प्रक्रिया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाए। इसमें कुछ ज्यादा भी नहीं करना पड़ता, बस थोड़ी सी सावधानी ! थोड़ा सा परहेज ! थोड़ा सा आत्मनियंत्रण ही काफी है । इसमें हमारे पीढ़ियों से चले आ रहे घरेलु नुस्खे सदा खरे उतरते रहे हैं,  जिनके प्रयोग से लाभ ही होता है हानि कुछ भी नहीं  !

यहां वही सारी बातें हैं जो मैं सपरिवार अपने उपयोग में लाता हूँ ! किसी उपदेशक या विशेषज्ञ की हैसियत से नहीं बल्कि अनुभव जनित लाभ से प्रेरित हो यह सब साझा करने का प्रयास किया है 
* इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से पेट को भोजन पचाने में सहायता मिल जाती है। दुआ देता रहेगा !    

* बदलते मौसम और पल-पल बदलते तापमान के कारन सर्दी-खांसी-जुकाम आम बात होती है, इसके लिए एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से बहुत राहत मिलती है। आजकल तो किसी के छींकते-खांसते ही लोगों की भृकुटि टेढ़ी हो जाती है ! उससे भी बचे रहेंगे यदि दिन में एक-दो बार नमक मिले गर्म पानी से गरारे भी कर लिए जाएं !

* पावस ऋतु में वातावरण में जीवाणुओं-कीटाणुओं का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है ! इसलिए दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दिया जाए तो बेहतर रहता है !

* तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है। साथ में मीठी नीम के चार-पांच पर्ण भी ले लिए जाएं तो और भी उत्तम ! वैसे भी चाय वगैरह में तुलसी और-अदरक-दालचीनी का उपयोग करना बहुत फायदेमंद रहता है ! 

* बरसात हो और पकौड़ों की याद ना आए यह तो हो ही नहीं सकता ! पर उन पर दया बनाए रखनी चाहिए, कम मात्रा में सेवन कर ! वैसे भी तले-तलाए व्यंजन शरीर में ''स्लीपर सेल'' के काम को ही अंजाम देते हैं ! कब क्या कर जाएं पता नहीं ! सो उनके क्रिया-कलापों पर विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है।       

* खाना खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। पंद्रह-बीस मिनट के अंदर ही राहत मिल जाती है। वैसे अजवायन भी बहुत मुफीद रहती है !

* इन दिनों बाहर के खाने से बचें, खासकर मैदे से बने और चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग भी ना हीं करें तो बेहतर, खासकर प्याज का !
 
* इन दिनों घरों में आने वाला पानी भी कुछ दूषित सा होता है ! उसके लिए थोड़ी सी नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहाना तो सर्वोत्तम है, पर यह हम सब के वश की बात भी नहीं है, झंझट सा लगता है ! सो नहाने के पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला लेने से भी टारगेट पूरा हो जाता है ! 

* आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ देने से पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है, इसके उपरांत वह पानी हानिरहित हो जाता है। यदि रात को ऐसा कर दिया जाए तो साफ़ होने का इंतजार भी नहीं करना पडेगा ! 


सीधी-सच्ची बात या लब्बोलुआब तो यही है कि इस दुनिया में ''हमारा'' रहने का एक ही या एकमात्र स्थान हमारा शरीर ही है ! वह है, तभी हम हैं ! वह है, तभी सारी अनुभूतियां हैं ! वह है, तभी सुख-दुःख, भोग-विलास, प्रेम-प्यार, मोह-ममता, तेरा-मेरा, जमीन-जायदाद, धन-दौलत इन सबका उपयोग व उपभोग संभव है ! यदि शरीर ही नहीं तो फिर हर चीज बेमानी है ! इसलिए सबसे पहले इसे संभालने, स्वस्थ रखने और सदा चलायमान बनाए रखने का उपक्रम और ध्यान होना चाहिए। खासकर हर बदलते मौसम में इस पर कुछ अतरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है ! पर विडंबना है कि हम इसी का ध्यान नहीं रखते ! चौबीस घंटों में इसे आधा-पौना घंटा देने का समय भी हमारे पास नहीं होता ! 

यहां वही सारी बातें हैं जो मैं सपरिवार अपने उपयोग में लाता हूँ ! किसी उपदेशक, ज्ञानी या विशेषज्ञ की हैसियत से नहीं बल्कि अनुभव जनित लाभ से प्रेरित हो यह सब साझा करने का प्रयास किया है। वैसे भी यदि इस शरीर को एक घंटा और इसके बनाने वाले को आधे घंटे का समय भी दे दिया जाए तो शायद नब्बे प्रतिशत बीमारियां तो हमारे पास फटकें भी नहीं ! पर हम तभी चेतते है जब कोई बिमारी हमें घेरती है या फिर कोई मुसीबत ! तभी हमें अपना और भगवान का ध्यान आता है ! यदि सुख में ही ध्यान कर लें तो दुःख आए ही नहीं !  

@सभी चित्र अंतर्जाल के  सौजन्य से   

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