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| बिसाती मोहरे |
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| सच्चाई |
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
समय के साथ-साथ विज्ञान प्रकृति के रहस्यमयी परदे के पीछे से तरह-तरह की अनोखी चीजें हमारे सामने लाता रहा है, यह क्रम जारी है और सदा जारी रहेगा ! कुछ दिनों पहले तक नकली वीडियो, ऑडियो, तस्वीरें वगैरह काफी प्रसारित- प्रचारित होते रहे थे ! वहीं अब एक नई विधा Deep Fake, जिसके लिए अभी हिंदी का उपयुक्त शब्द ईजाद नहीं हुआ है, सामने आई है ! यह एक प्रकार की वीडियो या इमेज है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे से बदल दिया जाता है। डीपफेक वीडियो बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद ली जाती है। डीपफेक वीडियो और ऑडियो दोनों रूपों में हो सकता है ! इस उच्च कोटी की संपादित तकनीकी की खासियत यह है कि इसमें नकली और असली में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल होता है ! पर आज का यह लेख इस विधा से संबंधित एक दूसरी बात को सामने लाने के लिए है !
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| गौतम ऋषि के वेश में छल करता इंद्र |
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| साधू वेश में हनुमान जी का राम मिलाप |
बंगाल में आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनकी इजाजत बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ...............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
शारदीय नवरात्र आते ही बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम मच जाती है ! एक से एक बढ़ कर सुंदर-भव्य पंडाल एक दूसरे से होड़ लेने लगते हैं ! हर पंडाल में वाद्य-यंत्रों द्वारा मधुर शास्त्रीय संगीत की मधुर धवनि की गूँज ही सुनाई पड़ती है ! 250 से भी ज्यादा वर्षों से चले आ रहे इस आयोजन का सदा से ही यह मकसद रहा है कि पंडालों के निर्माण में भव्यता, नवीनता, कलात्मकता के साथ ही दिव्यता, पवित्रता और भक्तिभाव का भी भरपूर समावेश हो। भले ही सामयिक घटनाओं का आभास दिया जाता रहा है, पर उनको कभी भी पूजा स्थल के पावन परिवेश पर हावी नहीं होने दिया जाता था ! पर अब वर्षों से से चली आ रही परम्पराओं,आस्थाओं व संस्कृति से छेड़-छाड़ शुरू हो चुकी है !
आज बंगाल में एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है !
हमारी आदत में शुमार है कि हम किसी भी गलत काम की शुरुआत पर कभी भी ध्यान नहीं देते ! उसे पनपते, फलते-फूलते तब तक देखते रहते हैं जब तक घाव नासूर नहीं बन जाता ! सैकड़ों बार इस आदत ने हमें सबक सिखाया है, पर हम हैं कि मानते ही नहीं ! इसका मुख्य कारण शायद यह है कि ऐसी हरकतों की शुरुआत छटे हुए चंट लोगों द्वारा बहुत ही मामूली और छोटे पैमाने पर की जाती है ! हम किसी पचड़े में ना पड़ने की अपनी मानसिकता के कारण उसे हर बार नजरंदाज कर देते हैं ! कुछ ऐसा ही इस बार बंगाल के पंडाल निर्माण में हुआ है ! तुच्छ व ओछी राजनीती ने इस माध्यम द्वारा बहुत धीरे से, लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर, घुस-पैठ करते हुए इन पूजास्थलों को भी अपना समरांगण बनाने का षड्यंत्र शुरू कर दिया है ! इस बार के कुछ पंडाल इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो भक्तिभाव की जगह जुगुप्सा उत्पन्न करते दिखते हैं।
आज कुछ लोग जैसे माथे पर तिलक-रोली लगा अपनी नुमाइश करते घूम रहे हैं ! वैसे ही अपने ''खेला'' में एक ट्विस्ट ला, ममता ने अपनी बहुसंख्यक विरोधी छवि को संभालने के साथ-साथ पुराने रवैये को भी साधे रखने के लिए सार्वजनिक पूजा पंडालों को माध्यम बनाया है ! आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है !
वैसे ''कुछेकों'' को सिर्फ भगवान की लाठी ही ठीक कर सकती है ! इनकी आँखों पर चढ़ी गुमान की पट्टी इन्हें उन दसियों स्वंयभू भगवानों का हश्र नहीं देखने देती जो अर्श से गिर, जेल के फर्श पर पड़े, किसी तरह अपने दिन काट रहे हैं ! इन्हें तो उस महिला का इतिहास भी याद नहीं जिसने अपने गुरु और आराध्य से भी बड़ी अपनी मूर्तियां गढ़वा कर अपने को दुनिया से अलग दिखाने की कोशिश की थी ! इसलिए समय फिलहाल भले ही अपना हो, पर हर इंसान को अपनी औकात कभी नहीं भूलनी चाहिए ! समय का तो ऐसा है कि उसने अवतारों तक को नहीं छोड़ा ! वह तो कभी खुद का भी नहीं हुआ ! सो भाई खेलो जरूर पर बिना फाउल करे ! क्योंकि अम्पायर भले ही चूक जाए पर अवाम रूपी तीसरा अम्पायर सदा अपनी आँखें खुली रखता है !
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
हमारे देश पर सदियों से बाहरी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के लिए हमले होते रहे हैं। उनके आतंक का हमारे वीर, देशभक्त रणबांकुरों ने माकूल जवाब भी दिया है ! पर विडंबना यह भी रही कि वे सब विभिन्न कारणों से कभी भी एकजुट होकर दुश्मन को चुन्नौती नहीं दे पाए ! ऐसे एक-दो नहीं हजारों योद्धा हुए हैं जिनके नाम सुन कर ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। परन्तु विभिन्न षड्यंत्रों के तहत, देसी-विदेशी आकाओं द्वारा पोषित, हमारे छद्म, तथाकथित इतिहासकारों ने अपने आकाओं के झूठे-सच्चे किस्सों की खातिर उन वीरों को गुमनामी के कोहरे के पीछे धकेल कर रख दिया। परन्तु उनके शौर्य, जज्बे, देश के प्रति आत्मोसर्ग को जनमानस की यादों से कभी नहीं हटा पाए।
फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे ! सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा ! जी हाँ ! उस जैसा राणा ना कभी हुआ और अब तो क्या ही होगा !
कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया........!
वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए, पर उन्हें ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि जब सारी दुनिया ही हमारा परिवार है, तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
प्रकृति की विकास यात्रा के दौरान जानवर परिष्कृत होते हुए इंसान बन गए ! उनकी सोच में भी फर्क आया ! जहां जानवर सिर्फ अपने लिए जीते हैं वहीं इंसान में इंसानियत जैसी खूबी भी पनप गई। इसी इंसानियत या मानवता के तहत वह अपने साथ-साथ अपने हमजीवों का भी ख्याल रखने लगा। धीरे-धीरे विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग देशों का निर्माण हो गया। पर सब में भाईचारा, सहयोग, स्नेह इत्यादि बना रहे इसलिए हमारे विज्ञ-जनों ने, जो पहले जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी जैसा उपदेश दे चुके थे, एक और ख्याल वसुधैव कुटुम्बकम् को जन्म दे डाला, ताकि समस्त मानव जाति मिल-जुल कर सहयोगी बन एक परिवार की तरह सुख-चैन से रह सके !
इंसान आकार-प्रकार में तो जानवरों से बेहतर हो गया था ! पर इस प्रक्रिया के दौरान कायनात कुछ लोगों की बुद्धि और विचारों को नहीं बदल पाई ! ऐसे लोगों को दूसरों से कुछ लेना-देना नहीं था ! उन्हें सिर्फ अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कार्य प्रणाली ही सर्वोत्तम लगती रही ! वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए पर उन्हें वसुधैव कुटुंबकम का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि इतना बड़ा परिवार है तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ! शुरुआत में तो ऐसे लोगों की गिरफ्त में आधी से ज्यादा दुनिया आ गई, पर धीरे-धीरे जैसे ही इस हलाहल का दुष्परिणाम लोगों की समझ में आया तो इसका अंत होना आरंभ हो गया।
जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है
सदा से ही सारा देश चाहता रहा है कि सदियों से पीड़ित किसानों को खुशहाली मिले ! कम से कम उनके हक़ का पैसा उन तक पहुंचे। पर आजादी के दसियों साल बाद तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हो पाई। फिर भी बेकाबू रूप से बढ़ती हुई जन संख्या के लिए उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की ! सबके लिए अन्न मुहैया करवाया, पर उनकी स्थिति जस की तस रही ! अब यदि उनकी हालत को बेहतर करने का भरोसा दिया जा रहा है, तो क्यों नहीं उस को एक बार आजमा लिया जाता ! जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है ! पछताने से तो बेहतर है, एक बार आजमा कर देखना ! इस में कोई हर्ज नहीं है ! क्यों पिछली स्थितियों से चिपके रहना बेहतर लगता है, एक काल्पनिक डर के तहत !
पर तटस्त अवाम की हार्दिक इच्छा तथा चाहने के बावजूद लगता नहीं कि किसान आंदोलन जल्द ख़त्म होने दिया जाएगा ! क्योंकि अफवाहें सच होती नज़र आ रही हैं ! ख़बरों में है कि भोले-भाले किसानों के हित को पीछे धकेल अब उस पर कोई और ही हावी हो गया है ! कोर्ट द्वारा चार सदस्यों की समिति का गठन होते ही यह कह कर विरोध हो गया कि ये चारों सदस्य कृषि कानून के हिमायती हैं ! चलो ठीक है मान लेते हैं ! पर विरोध करनेवालों में कौन प्रमुख हैं - दर्शन पाल सिंह, जोगेन्दर सिंह ओगराहा, सुरजीत सिंह फुल, सुखदेव सिंह, अजमेर संघ लोखोवाल, बूटा सिंह गिल, निर्भय सिंह कीर्ति, सतनाम सिंह अजनाला, जिन सबका सीपीएम, सीपीआई, माले इत्यादि वामपंथी पार्टियों से गहरे ताल्लुकात हैं। इनके अलावा कविता कुरुगांती, ग्रीन पीस इंडिया से 27 साल का नाता, जिस पर भारत सरकार ने बैन लगाया हुआ है, अक्षय कुमार, मेधा पाटेकर के करीबी, जैसे बीसियों लोगों के अलावा और ''जो'' हैं उनका तो सभी को पता है ! तो हल कौन निकलने देगा !!
फिर भी सबकी दिली तमन्ना है कि जो भी धरने पर बैठे हैं, आवेश में आए हुए लोग-महिलाएं-बच्चे-युवा, हैं तो इंसान ही, हमारे भाई-बंधु ही ! क्यों इतनी विपरीत परिस्थितियों में उन्हें कष्ट सहना पड़ रहा है। क्यों नहीं उनको उनका भला पचास दिनों बाद भी समझाया जा सक रहा है ! यदि बरगलाए ही जा रहे हैं तो क्यों नहीं वैसे लोगों पर शिकंजा कैसा जा रहा ! क्या समझाने वाले बरगलाने वालों से किसी तरह कमतर हैं, जो अपनी बात ठीक से नहीं रख पा रहे ! जो भी हो यह मामला अब सिमटना चाहिए, पर दोषियों को, देश के विरुद्ध षडयंत्र करने वालों को सबक सिखाते हुए ! क्योंकि देश के आगे कुछ नहीं..कोई भी नहीं !!!
अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...