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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

असली चेहरा सामने आया, फितरत को भी सामने लाया

दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों, किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेशानुसार हरकतें करते हैं....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वि देशी ताकतों द्वारा भारत में अपनी कठपुतलियों की असलियत को अब तक ढक-छुपा कर उनकी आड़ में खुद को सत्ता में सुपर पॉवर बनाए रखने का जो षड्यंत्र सालों से किया जाता रहा था, वह खुल कर सामने आ गया है ! आज के माहौल में उन्हें भी यह बात समझ में आ गई है कि अब भारत में इन प्यादों के बल पर अपने मनोनुकूल सरकार बनाना कतई मुमकिन नहीं है ! तो अब खुला खेल फर्रुखाबादी ! 
प्यादे 
पि छले दसेक वर्षों से कुछ तथाकथित राजनितिक लोग सनातन विरोधी, हिंदू विरोधी, धर्म विरोधी ब्यान पर ब्यान दिए जा रहे हैं, कोई कहता है हिन्दू धर्म ग्रंथ जला दो ! कोई देवी-देवताओं को काल्पनिक बताता है ! कोई लोकप्रिय त्योहारों को खतरनाक बता लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्टा करता है ! कोई किसी उत्सव पर सवाल खड़े करने की हिमाकत कर देता है ! कोई देवी-देवताओं के बारे में अभद्र टिप्पणियां कर देता है! कोई अपने पर्वों पर होने वाले खर्च को धन की बर्बादी बता, विदेशी धर्मों से सीख लेने की बात करता है ! वह भी तब जब देश की बहुसंख्यक आबादी सनातन की आस्था से जुड़ी हुई है ! यह सब अकारण नहीं हो रहा, सब सोची-समझी साजिशों के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है !
बकैती 

आम इंसान को यह सब वर्षों से सत्ता से दूर विपक्षी दलों की छटपटाहट या आक्रोश लग सकता है ! पर सच्चाई किसी और ही दिशा-दशा की ओर इशारा करती है ! आज के देश के माहौल को देखते हुए कोई भी व्यक्ति जो राजनीती से जुड़ा हो और उसे जरा सी भी राजनितिक समझ होगी तो वह कभी भी ऐसे ब्यान दे कर अपने कैरियर को खत्म नहीं करना चाहेगा ! दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेश के अनुसार ही हरकतें करते हैं ! 
बिसाती मोहरे 
ऐसा नहीं है कि शतरंज की बिसात बिछा उस पर सिर्फ प्यादों की परेड करवा दी जाती हो ! अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए पूरा ताम-झाम किया जाता है ! अकूत धनराशि खर्च की जाती है ! तरह-तरह के आख्यान-व्याख्यानों का जाल बिछाया जाता है ! प्रचार-प्रसार हेतु सोशल मीडिया का उपयोग-दुरूपयोग किया जाता है ! हर ऐसी शह जो इंसान के ईमान को डगमगा दे उसका उपयोग किया जाता है ! जिस किसी व्यक्ति का जरा सा भी रसूख या पहुँच होती है उसे खरीद कर अपनी दुरभिसंधि का सदस्य बना लिया जाता है ! पैसे का लालच दे कुछ भी बुलवा-लिखवा लिया जाता है ! पैसे को ही सर्वशक्तिमान बना दिया गया है !
सोशल मिडिया 
खरीदफरोख्त 
धन की शक्ति अपरंपार है ! दुनिया का कोई भी कोना उससे सुरक्षित नहीं है ! उसी के बल पर झूठ को सच की शेरवानी पहनवा, सजा-संवार कर उसकी बारात निकाल दी जाती है ! यह तो जग जाहिर है कि जब तक सच अपनी चप्पलें पहनता है, झूठ दुनिया के दस चक्कर लगा आता है और ऐसे लोग तो अपने धन-बल पर झूठ के लिए रॉकेट तक उपलब्ध करवा देते हैं ! लोग बहकावे में आ जाते हैं ! उधर विडंबना यह है कि सच को अपना सच बताने के लिए भी धन की शरण लेनी पड़ती है ! पर समय ने बदलना शुरू कर दिया है !

सच्चाई 
इसी सब के बीच अचानक देश की आजादी से भी पहले से रचा जा रहा, पर अब तक दबा-ढका, एक ऐसा कुचक्र सामने आया है जिससे सभी अचंभित से हो गए हैं ! कोई खुद पाक-साफ रह कर, वर्षों से किसी को किसी और के विरुद्ध बरगला कर, किसी और से मतभेद करवा कर, किसी और  मुद्दे को भड़का कर लोगों को भ्रमित कर, उनका ध्यान कहीं और भटकवा कर, अपना उल्लू सीधा करता रहा ! उसका तरीका इतना प्रेममय,  दोस्ताना,  सौहार्दपूर्ण और स्नेहयुक्त था कि लोग  उसके इरादों  को कभी  भांप ही नहीं पाए ! परंतु वक्त सब का हिसाब करता और रखता है, उसका भी हुआ और उसके क्रियाकलापों की नग्नता सामने आ ही गई और जब आ ही गई तो वह भी खुल कर अब तक छुपे अपने गुर्गों, गणों के साथ सामने आ गया ! उसका नतीजा सबके सामने है और अब हमारी बारी है कि हमें किससे कैसे निपटना है !  
वन्देमातरम।। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 2 जून 2024

Deepfake, चरम नकली

अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

समय के साथ-साथ विज्ञान प्रकृति के रहस्यमयी परदे के पीछे से तरह-तरह की अनोखी चीजें हमारे सामने लाता रहा है, यह क्रम जारी है और सदा जारी रहेगा ! कुछ दिनों पहले तक नकली वीडियो, ऑडियो, तस्वीरें वगैरह काफी प्रसारित- प्रचारित होते रहे थे ! वहीं अब एक नई विधा Deep Fake, जिसके लिए अभी हिंदी का उपयुक्त शब्द ईजाद नहीं हुआ है, सामने आई है ! यह एक प्रकार की वीडियो या इमेज है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे से बदल दिया जाता है। डीपफेक वीडियो बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद ली जाती है। डीपफेक वीडियो और ऑडियो दोनों रूपों में हो सकता है ! इस उच्च कोटी की संपादित तकनीकी की खासियत यह है कि इसमें नकली और असली में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल होता है ! पर आज का यह लेख इस विधा से संबंधित एक दूसरी बात को सामने लाने के लिए है !  

हमारे प्राचीन ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले आठ सिद्धियों, नौ निधियों तथा दस गौण सिद्धियों के बारे में विस्तार से बताया गया है ! उन्हीं गौण सिद्धियों में परकायाप्रवेशनम् तथा कामरूपम्: नाम की दो सिद्धियां भी हैं !  परकायाप्रवेशनम् की सहायता से जहां किसी भी शरीर में प्रवेश किया जा सकता है। वहीं कामरूपम: सिद्धि को सिद्ध कर साधक अपनी इच्छा अनुसार कोई भी रूप धारण कर सकता है। देखा जाए तो ये आज की डीपफेक तकनीक के बहुत ही परिष्कृत और बेहद उच्च स्तरीय संस्करण हैं ! आज का डीपफेक जहां अभी तक सिर्फ यंत्रों में आभासी स्तर तक ही सिमित है, वहीं इन सिद्धियों का प्रयोग और उपयोग रामायण-महाभारत के अलावा अन्य ग्रंथों के अनुसार सुर-असुर, देवता, राक्षस, गंधर्व इत्यादि के द्वारा, वास्तविक रूप में, अच्छा-बुरा लाभ उठाने या गुप्तचरी करने की कोशिश में किए जाने का उल्लेख मिलता है ! 

गौतम ऋषि के वेश में छल करता इंद्र 
अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण ही तो था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था ! कितना और कहां तक गिनाया जाए........! 

साधू वेश में हनुमान जी का राम मिलाप 
हमारे ग्रंथों में वर्णित ज्ञान के सामने आज का विज्ञान नवजात शिशु रूप में ही है ! जो अभी तक उस समय के मुकाबले ऐसी इक्का-दुक्का उपलब्धियां ही हासिल कर पाया है ! इसके बावजूद दिक्कत हमारे साथ ही है ! हम खुद ही अपने गौरवान्वित इतिहास पर विश्वास नहीं करते ! ग्रंथों में लिखी बातों को वामपंथ विचारधारा के षड्यंत्र के तहत कपोल कल्पना मात्र मान उसको दरकिनार तो करते ही हैं, वक्त बेवक्त उसका मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आते ! गलती पूर्णतया हमारी भी नहीं है, पीढ़ी दर पीढ़ी जो बताए-पढ़ाए के नाम पर थोपा गया, उस पर विश्वास तो करना ही था ! खैर अब समय आ गया है कि हम वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराएं ! पुरानी कथा-कहानियों में वर्णित बातों को वैज्ञानिक आधार दे समझाएं ! गौरवान्वित महसूस करवाएं !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

खेला आरंभ, मानुष दंग

बंगाल में आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनकी इजाजत बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

शारदीय नवरात्र आते ही बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम मच जाती है ! एक से एक बढ़ कर सुंदर-भव्य पंडाल एक दूसरे से होड़ लेने लगते हैं ! हर पंडाल में वाद्य-यंत्रों द्वारा मधुर शास्त्रीय संगीत की मधुर धवनि की गूँज ही सुनाई पड़ती है !  250 से भी ज्यादा वर्षों से चले आ रहे इस आयोजन का सदा से ही यह मकसद रहा है कि पंडालों के निर्माण में भव्यता, नवीनता, कलात्मकता के साथ ही दिव्यता, पवित्रता और भक्तिभाव का भी भरपूर समावेश हो। भले ही सामयिक घटनाओं का आभास दिया जाता रहा है, पर उनको कभी भी पूजा स्थल के पावन परिवेश पर हावी नहीं होने दिया जाता था ! पर अब वर्षों से से चली आ रही परम्पराओं,आस्थाओं व संस्कृति से छेड़-छाड़ शुरू हो चुकी है !

                                         

आज बंगाल में एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है ! 



हमारी आदत में शुमार है कि हम किसी भी गलत काम की शुरुआत पर कभी भी ध्यान नहीं देते ! उसे पनपते, फलते-फूलते तब तक देखते रहते हैं जब तक घाव नासूर नहीं बन जाता ! सैकड़ों बार इस आदत ने हमें सबक सिखाया है, पर हम हैं कि मानते ही नहीं ! इसका मुख्य कारण शायद यह है कि ऐसी हरकतों की शुरुआत छटे हुए चंट लोगों द्वारा बहुत ही मामूली और छोटे पैमाने पर की जाती है ! हम किसी पचड़े में ना पड़ने की अपनी मानसिकता के कारण उसे हर बार नजरंदाज कर देते हैं ! कुछ ऐसा ही इस बार बंगाल के पंडाल निर्माण में हुआ है ! तुच्छ व ओछी राजनीती ने इस माध्यम द्वारा बहुत धीरे से, लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर, घुस-पैठ करते हुए इन पूजास्थलों को भी अपना समरांगण बनाने का षड्यंत्र शुरू कर दिया है ! इस बार के कुछ पंडाल इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जो भक्तिभाव की जगह जुगुप्सा उत्पन्न करते दिखते हैं।

आज कुछ लोग जैसे माथे पर तिलक-रोली लगा अपनी नुमाइश करते घूम रहे हैं ! वैसे ही अपने ''खेला'' में एक ट्विस्ट ला, ममता ने अपनी बहुसंख्यक विरोधी छवि को संभालने के साथ-साथ पुराने रवैये को भी साधे रखने के लिए सार्वजनिक पूजा पंडालों को माध्यम बनाया है ! आज एकाधिक पंडालों में ममता को दुर्गा माता के समदृश दिखलाया जा रहा है। अब यह तो उनसे पूछे बगैर तो हो ही नहीं सकता ! सो चापलूसों, मौका और मतलब परस्त पिच्छलगुओं ने बिना इसकी परवाह किए कि आम धर्मपरायण इंसान की आस्था पर क्या असर पड़ेगा, एक विवादित शख्शियत को भगवान बना दिया ! इसके अलावा कुछ ऐसे पंडाल भी हैं जो ओछी राजनीती की अधोगति का शिकार हो पूजा स्थल से कूड़ा स्थल बन गए हैं ! कहीं जूतों की नुमाइश हो रही है ! कहीं खून-खराबे को दर्शाया जा रहा है ! कहीं किसानों के तथाकथित आंदोलन को प्रचार का माध्यम बनाया गया है ! यानी कि राजनीति अपने शिव के बारातियों के साथ पूरे उफान पर है !  

वैसे ''कुछेकों'' को सिर्फ भगवान की लाठी ही ठीक कर सकती है ! इनकी आँखों पर चढ़ी गुमान की पट्टी इन्हें उन दसियों स्वंयभू भगवानों का हश्र नहीं देखने देती जो अर्श से गिर, जेल के फर्श पर पड़े, किसी तरह अपने दिन काट रहे हैं ! इन्हें तो उस महिला का इतिहास भी याद नहीं जिसने अपने गुरु और आराध्य से भी बड़ी अपनी मूर्तियां गढ़वा कर अपने को दुनिया से अलग दिखाने की कोशिश की थी ! इसलिए समय फिलहाल भले ही अपना हो, पर हर इंसान को अपनी औकात कभी नहीं भूलनी चाहिए ! समय का तो ऐसा है कि उसने अवतारों तक को नहीं छोड़ा ! वह तो कभी खुद का भी नहीं हुआ ! सो भाई खेलो जरूर पर बिना फाउल करे ! क्योंकि अम्पायर भले ही चूक जाए पर अवाम रूपी तीसरा अम्पायर सदा अपनी आँखें खुली रखता है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

गुरुवार, 6 मई 2021

समय निकाल कर सोचिएगा जरूर, यह आज भी सामयिक है

कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे !सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, छद्म इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

हमारे देश पर सदियों से बाहरी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के लिए हमले होते रहे हैं। उनके आतंक का हमारे वीर, देशभक्त रणबांकुरों ने माकूल जवाब भी दिया है ! पर विडंबना यह भी रही कि वे सब विभिन्न कारणों से कभी भी एकजुट होकर दुश्मन को चुन्नौती नहीं दे पाए ! ऐसे एक-दो नहीं हजारों योद्धा हुए हैं जिनके नाम सुन कर ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। परन्तु विभिन्न षड्यंत्रों के तहत, देसी-विदेशी आकाओं द्वारा पोषित, हमारे छद्म, तथाकथित इतिहासकारों ने अपने आकाओं के झूठे-सच्चे किस्सों की खातिर उन वीरों को गुमनामी के कोहरे के पीछे धकेल कर रख दिया। परन्तु उनके शौर्य, जज्बे, देश के प्रति आत्मोसर्ग को जनमानस की यादों से कभी नहीं हटा पाए।

फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे ! सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा ! जी हाँ ! उस जैसा राणा ना कभी हुआ और अब तो क्या ही होगा ! 

कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया........!

राणा संग्राम सिंह यानी राणा सांगा ! मेवाड़ की धरती जिन्हें जन्म दे कर धन्य हो गई। वे मेवाड़ के सबसे महान शासक थे। उनके राजकाल में मेवाड़ ने आशातीत सफलताएं, शक्ति, समृद्धि और ऊंचाइयां प्राप्त की थीं। उनका साम्राज्य उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में भरतपुर से लेकर पश्चिम में सिंधु तक फैला हुआ था। राणा सांगा पहले और अंतिम भारतीय शासक थे, जो तक़रीबन तमाम राजपूत राजाओं को अपने नेतृत्व में शामिल करने में सफल रहे थे ताकि विदेशी लुटेरों को देश के बाहर खदेड़ दिया जा सके ! उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, शौर्य ही कुछ ऐसा था कि तमाम आपसी भेदभावों के बावजूद तमाम राजा उनके राजनितिक और सैन्य कौशल के कायल थे। उस समय उनके सामने था काबुल से आया एक आक्रांता, बाबर ! उसने भी अपने संस्मरण बाबरनामा में उन्हें उस समय का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है। 

आखिर वह दिन भी आ ही गया ! खानवा में बाबर की सेना के सामने राणा सांगा की सेना आ डटी, जो तक़रीबन अपने विपक्षी से दुगनी थी ! पर उनके पास ना हीं अच्छे घोड़े थे और ना हीं तोपें ! जबकि बाबर की असली ताकत थी उसका तोपखाना ! जिसका कोई जवाब राणा के पास नहीं था।  पता नहीं इस ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया था ! जबकि इसका उपयोग और शक्ति साल भर पहले ही पानीपत के मैदान में बाबर-लोधी युद्ध में सिद्ध हो चुकी थी। क्यों युद्ध में वर्षों से चले आ रहे पारंपरिक तरीके ही अपनाए गए ! क्यों नहीं दुनिया में अपनाई जा रही युद्ध नीतियों को अपनाने में रूचि दिखाई गई ! अस्त्रों-शस्त्रों के आधुनिकरण और उनमें आ रहे बदलावों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ! सैनिकों को देश के लिए निछावर होना जरूर सिखाया गया पर ना उन्हें अच्छे घोड़े उपलब्ध करवाए गए और ना हीं उच्च-कोटि के हथियार ! 

16 मार्च 1527 सुबह नौ बजे भयानक युद्ध शुरू हुआ जो बीस घंटों तक चला। पर वीर, साहसी, पराक्रमी व अच्छे योद्धा होने के बावजूद राजपूत बाबर के तोपखाने का सामना नहीं कर सके ! मुगलों की विजय हुई ! बुरी तरह घायल और बेहोश राणा को उनके सहयोगी उन्हें युद्धक्षेत्र से दूर सुरक्षित जगह पर ले गए ! होश आने पर वे बहुत हताश और निराश हुए। उन्होंने अपने आप को किले में बंद कर लिया। कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया जिसके कारण राणा का 30 जनवरी 1528 को निधन हो गया !  

हमारा इतिहास तरह-तरह के यदि, लेकिन और परंतुओं से भरा पड़ा है। दुर्भाग्य का साया ज्यादातर हम हीं पर छाया भी रहा। उस पर छद्म इतिहासकारों के षड्यंत्रों ने सच्चाइयों पर वर्षों पर्दा डाल रखा ! यदि कभी सच को सामने लाने की कोशिश हुई भी तो ऐसे ही लोगों ने तरह-तरह के बखेड़े खड़े  कर दिए ! कुछ समय निकाल कर, सोचिएगा जरूर ! इतिहास भी गवाह है कि देश को डुबोने में बाहरी तूफानों की जगह घर में जमा गंधाते पानी ने ही ज्यादा अहम् भूमिका  निभाई है ! पर हम भी जब तक पानी सर के बिल्कुल ऊपर हो सांस ही बंद नहीं करने लगता, चेतते तो हैं ही नहीं, समय गुजरते ही उस गंधाते पानी को भी भूल उसे जस का तस पड़ा रहने देते हैं, अगली मुसीबत खड़ी करने के लिए  ! 

@संदर्भ - अहा जिंदगी 
फोटो - अंतर्जाल  

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

उन्हें जननी जन्मभूमिश्च....नहीं , वसुधैव कुटुम्बकम् का ख्याल भाया, क्योंकि..

वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए, पर उन्हें ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि जब सारी दुनिया ही हमारा परिवार है, तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रकृति की विकास यात्रा के दौरान जानवर परिष्कृत होते हुए इंसान बन गए ! उनकी सोच में भी फर्क आया ! जहां जानवर सिर्फ अपने लिए जीते हैं वहीं इंसान में इंसानियत जैसी खूबी भी पनप गई। इसी इंसानियत या मानवता के तहत वह अपने साथ-साथ अपने हमजीवों का भी ख्याल रखने लगा। धीरे-धीरे विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग देशों का निर्माण हो गया। पर सब में भाईचारा, सहयोग, स्नेह इत्यादि बना रहे इसलिए हमारे विज्ञ-जनों ने, जो पहले जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी जैसा उपदेश दे चुके थे, एक और ख्याल वसुधैव कुटुम्बकम् को जन्म दे डाला, ताकि समस्त मानव जाति मिल-जुल कर सहयोगी बन एक परिवार की तरह सुख-चैन से रह सके ! 

इंसान आकार-प्रकार में तो जानवरों से बेहतर हो गया था ! पर इस प्रक्रिया के दौरान कायनात कुछ लोगों की बुद्धि और विचारों को नहीं बदल पाई ! ऐसे लोगों को दूसरों से कुछ लेना-देना नहीं था ! उन्हें सिर्फ अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कार्य प्रणाली ही सर्वोत्तम लगती रही ! वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए पर उन्हें वसुधैव कुटुंबकम का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि इतना बड़ा परिवार है तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ! शुरुआत में तो ऐसे लोगों की गिरफ्त में आधी से ज्यादा दुनिया आ गई, पर धीरे-धीरे जैसे ही इस हलाहल का दुष्परिणाम लोगों की समझ में आया तो इसका अंत होना आरंभ हो गया। 

जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है 

सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में ऊँच-नीच नहीं  होनी चाहिए ! सब इंसान बराबर हैं ! हर इंसान का हक़ है कि उसे भरपेट भोजन और छत मिले ! जिसके पास कुछ अतिरिक्त है, उसे सर्वहारा की सहायता करनी चाहिए ! वैसे यह विचार बाहर का था, क्योंकि अपने देश में तो जानवरों की भूख तक का ख्याल रखा जाता रहा है, पर फिर भी चल गया !  युवावस्था में कालेज के जमाने में ऐसे विचार खूब भाते थे। पर समय के साथ असलियत ने सामने आ कर दिलो-दिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया ! 

मुफ्तखोरी ऐसा दीमक है, जो पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाता। ये उस अमर बेल की तरह होती है जिसकी अपनी जड़ नहीं होती ! ये परजीवी पौधा दूसरे पेड़ों पर आश्रित होता है, पर समय के साथ अपने आश्रयदाता का रस चूस-चूस कर उसे ही निष्प्राण कर देता है ! मानव समाज में भी उस पौधे जैसे लोगों के बारे में आम धारणा है कि इनका जमावड़ा जिस संस्थान पर हो जाता है वहां तब तक रहता है जब तक कि उसकी चिमनी से धुंआ निकलना बंद ना हो जाए ! इसका जीता-जगता उदहारण, हमारा कभी सोने के रंग सा चमकता बंगाल आज पीलियाग्रस्त नज़र आने लगा है। इसी  बिमारी का एक नया संस्करण आज दिल्ली को घेरे बैठा है।              

सदा से ही सारा देश चाहता रहा है कि सदियों से पीड़ित किसानों को खुशहाली मिले ! कम से कम उनके हक़ का पैसा उन तक पहुंचे। पर आजादी के दसियों साल बाद तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हो पाई। फिर भी बेकाबू रूप से बढ़ती हुई जन संख्या के लिए उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की ! सबके लिए अन्न मुहैया करवाया, पर उनकी स्थिति जस की तस रही ! अब यदि उनकी हालत को बेहतर करने का भरोसा दिया जा रहा है, तो क्यों नहीं उस को एक बार आजमा लिया जाता ! जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है ! पछताने से तो बेहतर है, एक बार आजमा कर देखना ! इस में कोई हर्ज नहीं है ! क्यों पिछली स्थितियों से चिपके रहना बेहतर लगता है, एक काल्पनिक डर के तहत !  

पर तटस्त अवाम की हार्दिक इच्छा तथा चाहने के बावजूद लगता नहीं कि किसान आंदोलन जल्द ख़त्म होने दिया जाएगा ! क्योंकि अफवाहें सच होती नज़र आ रही हैं ! ख़बरों में है कि भोले-भाले किसानों के हित को पीछे धकेल अब उस पर कोई और ही हावी हो गया है ! कोर्ट द्वारा चार सदस्यों की समिति का गठन होते ही यह कह कर विरोध हो गया कि ये चारों सदस्य कृषि कानून के हिमायती हैं ! चलो ठीक है मान लेते हैं ! पर विरोध करनेवालों में कौन प्रमुख हैं - दर्शन पाल सिंह, जोगेन्दर सिंह ओगराहा, सुरजीत सिंह फुल, सुखदेव सिंह, अजमेर संघ लोखोवाल, बूटा सिंह गिल, निर्भय सिंह कीर्ति, सतनाम सिंह अजनाला, जिन सबका सीपीएम, सीपीआई, माले इत्यादि वामपंथी पार्टियों से गहरे ताल्लुकात हैं। इनके अलावा कविता कुरुगांती, ग्रीन पीस इंडिया से 27 साल का नाता, जिस पर भारत सरकार ने बैन लगाया हुआ है, अक्षय कुमार, मेधा पाटेकर के करीबी, जैसे बीसियों लोगों के अलावा और ''जो'' हैं उनका तो सभी को पता है ! तो हल कौन निकलने देगा !!

फिर भी सबकी दिली तमन्ना है कि जो भी धरने पर बैठे हैं, आवेश में आए हुए लोग-महिलाएं-बच्चे-युवा, हैं तो इंसान ही, हमारे भाई-बंधु ही ! क्यों इतनी विपरीत परिस्थितियों में उन्हें कष्ट सहना पड़ रहा है। क्यों नहीं उनको उनका भला पचास दिनों बाद भी समझाया जा सक रहा है ! यदि बरगलाए ही जा रहे हैं तो क्यों नहीं वैसे लोगों पर शिकंजा कैसा जा रहा ! क्या समझाने वाले बरगलाने वालों से किसी तरह कमतर हैं, जो अपनी बात ठीक से नहीं रख पा रहे ! जो भी हो यह मामला अब सिमटना चाहिए, पर दोषियों को, देश के विरुद्ध षडयंत्र करने वालों को सबक सिखाते हुए ! क्योंकि देश के आगे कुछ नहीं..कोई भी नहीं !!!  

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