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मंगलवार, 27 जनवरी 2026

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी संगठन, संस्थान  या प्रतिष्ठान के  साधन या उपादान चाहे  कितने भी सक्षम हों, यदि उनका दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, निस्वार्थ भाव से, उसको  संभालने के लिए  सही व्यक्ति  का चयन और नियुक्ति, सही  समय पर करता है, तभी  इसे असली नेतृत्व  कहा जा सकता है ! पर अक्सर  देखा गया है कि नेतृत्वकर्ता  या संचालक अपने  मोह, पूर्वाग्रहों, भावनाओं, द्वेष  या अहम के वशीभूत हो कर अपने सबसे काबिल सहायक, कार्यकर्त्ता को  नजर-अंदाज  कर संगठन के हित पर, अपनी  पसंद  को वरीयता दे देता है और  जब तक  इस चूक की कीमत समझ आती है, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ! सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है !

रणक्षेत्र 

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था ! जहां कल तक सैनिकों की हुंकार, शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां मृत्यु अपने भयावह सन्नाटे के साथ मौजूद थी ! दिव्यास्त्रों की आग और ताप से कोसों दूर तक के लता-पादप-वृक्ष भस्म हो चुके थे। उनसे उठे धुएं ने आकाश को कालिमा से ढक चारों ओर अंधकार कायम कर दिया था ! मांसभक्षी जानवरों ने क्षत-विक्षत लाशों को लोथड़ों में तब्दील कर दिया था ! टूटे हुए रथ, घोड़े-हाथियों के शव दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे ! सड़ती लाशों और रक्त से सनी मिट्टी के साथ मिल कर हवा ने पूरे वातावरण को विषाक्त और दुर्गंधमय बना दिया था ! ऐसे में अपने पतियों, पुत्रों, भाइयों के शवों को ढूंढने रणभूमि में पहुंचीं महिलाओं के मर्मभेदी विलाप से रह-रह कर आकाश कांप उठता था ! 

विभीषिका 
इन्हीं के बीच घायलावस्था में अपनी टूटी हुई जंघाओं के साथ, तन और मन  की मर्मांतक पीड़ा सहता, कुरु वंश का  अभिमानी युवराज दुर्योधन अकेला  पड़ा हुआ था ! उसकी  सांसें तो उखड़ रही थीं, लेकिन ह्रदय में पराजय  की आग और अपने साथ  हुए छल  का आक्रोश उसे मरने नहीं दे रहा था !  तभी वहां  श्री कृष्ण का आगमन हुआ। दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही उन पर आरोप जड़ दिए कि सिर्फ तुम्हारे छल ने मुझे हराया है ! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते ! श्री कृष्ण के चेहरे पर दया और करुणा व्याप्त थी ! 

प्रभु 

उन्होंने दुर्योधन के पास आ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, तुम अभी भी सिर्फ पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपनी ओर से हुए कपट और अन्याय की तरफ तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा ! जैसा तुमने किया उसी का फल तुम्हें मिला ! पर बात इतनी सी नहीं है ! युद्ध की शुरुआत से ही तुम गलतियां करते आ रहे हो ! तुम हारे अपनी गलत नीतियों से, अपने गलत चयनों से, अपने गलत निर्णयों की वजह से ! तुमने यदि युद्ध की शुरुआत में सोच-विचार कर निष्पक्ष भाव से निर्णय लिया होता तो यह युद्ध एक दिन में ही खत्म हो इतिहास बदल सकता था ! 

करुणा 
प्रभु के स्पर्श से पीड़ामुक्त हुए दुर्योधन ने चकित हो पूछा, गोविन्द मैंने ऐसी कौन सी चूक की ?  

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

अश्वथामा 
गुरु द्रोण के पुत्र, शिव अंशावतार अश्वत्थामा ! जिसको तुम्हारी भावनाओं और मित्रता के मोह ने अनदेखा कर दिया था ! श्री कृष्ण ने उसकी रणनीतिक भूलों को याद दिलाते हुए कहा, सबसे पहले तुमने भीष्म पितामह को बनाया, जो अजेय थे पर पांडवों से स्नेह रखते थे ! वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे। उनके बाद तुमने गुरु द्रोण को बागडोर सौंप दी, जिनका मोह अर्जुन के साथ था ! उनके जाने के पश्चात तुमने मित्र मोह में कर्ण का चुनाव किया, जबकि तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था, जिसका क्रोध अपने पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था वह साक्षात काल बन चुका था ! उसके बाद भी तुमने उसे अनदेखा कर शल्य को कमान सौंप दी ! तुम यह भी नहीं सोच पाए कि जिन लोगों को तुम नेतृत्व सौंप रहे हो, वे सब नश्वर थे जबकि अश्वस्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था !

युद्ध 

दुर्योधन निश्चल हो पड़ा था, पर उसके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे ! काम-क्रोध-द्वेष-मोह-लिप्सा सब तिरोहित हो चुके थे ! एक-एक कर उसे अपनी गलतियां साफ दिखाई पड़ने लगी थीं ! भाइयों से द्वेष ना कर उनका का हिस्सा उन्हें दे देता तो लाखों-करोड़ों लोगों की जान बच जाती ! प्रकृति का विनाश ना होता ! द्रोपदी का सम्मान करने की बजाय उसका अपमान किया ! जब प्रभु खुद उसके पास आए थे तो उसने उनकी शरण की बजाए उनकी सेना मांग ली थी ! जरासंध, जयद्रथ जैसों का विनाश भी सही-गलत की पहचान नहीं करवा पाया ! 

दुर्योधन की आँखें जैसे अतीत में झांक रहीं थीं ! अब उसे याद आ रही थी अश्वस्थामा की शक्ति जो हजारों योद्धाओं से एक साथ लड़ सकता था ! जिसे अपने पिता के अलावा परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से भी युद्ध कौशल का ज्ञान प्राप्त था ! उसके पास अर्जुन से भी घातक दिव्यास्त्र थे ! फिर उसे याद आई वह काली रात, जब उसने अंत समय में अश्वस्थामा को सेना नायक बनाया था और उसने कुछ ही समय में पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, पाण्डवपुत्रों के साथ-साथ उनकी बची हुई समस्त सेना का भी नाश कर दिया था !  

पर अब क्या हो सकता था, सिवा पछताने के और उसके लिए भी समय कहां था ! पर उसके साथ ही यह भी ध्रुव सत्य है कि होता वही है जो प्रभु चाहते हैं ! इसलिए जो होना है वह तो हो कर ही रहेगा और वह जो करेगा अच्छा ही करेगा, यह विश्वास बना रहना चाहिए ! दुर्योधन तो चला गया ! कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता, जो महाभारत ग्रंथ में उल्लेखित ना हो ! पर फिर भी यदि हम उससे कोई सबक नहीं सीखते, तो फिर दुर्योधन की तरह पछताने के सिवा कोई चारा भी नहीं बचता ! 

@चित्र व संदर्भ हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏 

रविवार, 2 जून 2024

Deepfake, चरम नकली

अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

समय के साथ-साथ विज्ञान प्रकृति के रहस्यमयी परदे के पीछे से तरह-तरह की अनोखी चीजें हमारे सामने लाता रहा है, यह क्रम जारी है और सदा जारी रहेगा ! कुछ दिनों पहले तक नकली वीडियो, ऑडियो, तस्वीरें वगैरह काफी प्रसारित- प्रचारित होते रहे थे ! वहीं अब एक नई विधा Deep Fake, जिसके लिए अभी हिंदी का उपयुक्त शब्द ईजाद नहीं हुआ है, सामने आई है ! यह एक प्रकार की वीडियो या इमेज है जिसमें किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे से बदल दिया जाता है। डीपफेक वीडियो बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद ली जाती है। डीपफेक वीडियो और ऑडियो दोनों रूपों में हो सकता है ! इस उच्च कोटी की संपादित तकनीकी की खासियत यह है कि इसमें नकली और असली में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल होता है ! पर आज का यह लेख इस विधा से संबंधित एक दूसरी बात को सामने लाने के लिए है !  

हमारे प्राचीन ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले आठ सिद्धियों, नौ निधियों तथा दस गौण सिद्धियों के बारे में विस्तार से बताया गया है ! उन्हीं गौण सिद्धियों में परकायाप्रवेशनम् तथा कामरूपम्: नाम की दो सिद्धियां भी हैं !  परकायाप्रवेशनम् की सहायता से जहां किसी भी शरीर में प्रवेश किया जा सकता है। वहीं कामरूपम: सिद्धि को सिद्ध कर साधक अपनी इच्छा अनुसार कोई भी रूप धारण कर सकता है। देखा जाए तो ये आज की डीपफेक तकनीक के बहुत ही परिष्कृत और बेहद उच्च स्तरीय संस्करण हैं ! आज का डीपफेक जहां अभी तक सिर्फ यंत्रों में आभासी स्तर तक ही सिमित है, वहीं इन सिद्धियों का प्रयोग और उपयोग रामायण-महाभारत के अलावा अन्य ग्रंथों के अनुसार सुर-असुर, देवता, राक्षस, गंधर्व इत्यादि के द्वारा, वास्तविक रूप में, अच्छा-बुरा लाभ उठाने या गुप्तचरी करने की कोशिश में किए जाने का उल्लेख मिलता है ! 

गौतम ऋषि के वेश में छल करता इंद्र 
अधिकांश लोगों को ग्रंथों में वर्णित देवराज इंद्र की उस ओछी हरकत का ज्ञान होगा, जब उसने ऋषि गौतम का रूप धर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ दुर्व्यवहार किया था ! वह कामरूप सिद्धि थी जो डीपफेक का बेहद उच्च कोटि का संस्करण ही तो था ! हनुमान जी ने भी श्री राम के पहले दर्शन साधू वेश में किए थे ! सीता हरण, शूर्पणखा कांड, मारीच का स्वर्ण हिरण रूप, रावण के गुप्तचर शुक का वानर रूप सब डीपफेक के उच्च कोटि के संस्करणों के ही तो उदाहरण हैं ! महिषासुर ने तो साक्षात भैंसे का रूप ही धारण कर लिया था ! कितना और कहां तक गिनाया जाए........! 

साधू वेश में हनुमान जी का राम मिलाप 
हमारे ग्रंथों में वर्णित ज्ञान के सामने आज का विज्ञान नवजात शिशु रूप में ही है ! जो अभी तक उस समय के मुकाबले ऐसी इक्का-दुक्का उपलब्धियां ही हासिल कर पाया है ! इसके बावजूद दिक्कत हमारे साथ ही है ! हम खुद ही अपने गौरवान्वित इतिहास पर विश्वास नहीं करते ! ग्रंथों में लिखी बातों को वामपंथ विचारधारा के षड्यंत्र के तहत कपोल कल्पना मात्र मान उसको दरकिनार तो करते ही हैं, वक्त बेवक्त उसका मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आते ! गलती पूर्णतया हमारी भी नहीं है, पीढ़ी दर पीढ़ी जो बताए-पढ़ाए के नाम पर थोपा गया, उस पर विश्वास तो करना ही था ! खैर अब समय आ गया है कि हम वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को सच्चाई से अवगत कराएं ! पुरानी कथा-कहानियों में वर्णित बातों को वैज्ञानिक आधार दे समझाएं ! गौरवान्वित महसूस करवाएं !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

हमारा वैदिक गणित

आश्चर्य के साथ खेद भी होता है कि हमने अपने ऋषि-मुनियों द्वारा रचित, अपनी इस अनमोल, अति उपयोगी, बहुमूल्य धरोहर का अब तक अपने पाठ्यकर्मों में उपयोग कर अपनी पीढ़ियों को लाभान्वित क्यों नहीं किया ! क्यों अभी भी हम विदेशियों द्वारा थोपे गए पाठ्यक्रमो को ढोए जा रहे हैं ! किनके अहम्, गलत सोच या विचारों ने हमें उत्कृष्टता अपनाने से रोक रखा है ! आज जरुरत है, इस ग्रंथ जैसे अनेक ग्रंथों को अवैज्ञानिक मानने वाले, किसी और विचारधारा से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवियों को परे धकेल, उनसे किनारा कर, बिना किसी सोच या गुरेज के अपने सनातन ज्ञान को अपना कर अपने देश के भविष्य को और बेहतर बनाने की............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

यह तो लंबे समय से ज्ञात है कि भारतीय गणित की समृद्धि शून्य की खोज से भी आगे तक फैली हुई है। उसी समृद्ध खजाने की एक कड़ी है वैदिक गणित, एक अद्भुत, चमत्कारी एवं क्रान्तिकारी ग्रन्थ ! जिसमें अथर्ववेद के परिशिष्ट के एक हिस्से में उल्लेखित 16 सूत्र तथा 13 उपसूत्रों के सहारे शीघ्र गणना करने की अद्भुत व नितांत अलग सी विधियां बहुत ही सरल ढंग से सिखाई गई हैं ! इस ग्रंथ की यह विशेषता है कि यह किसी भी व्यक्ति की सरल और जटिल दोनों प्रकार की गणितीय समस्याओं को तेजी से सुलझाने में मदद करता है। यह कठिन अवधारणाओं को याद रखने के बोझ को भी कम करता है। 

वैदिक गणित की रचना का श्रेय स्वामी भारती कृष्णतीर्थ को जाता है ! उनका जन्म 14 मार्च 1884 को तिन्निवेलि, तमिलनाडु के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि कृष्ण तीर्थ ने बी.ए.और एम.ए. की परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे। केवल बीस वर्ष की आयु में सन् 1904 में उन्होंने अमेरिकन कॉलेज ऑफ साइंस रोचेस्टर, न्यूयार्क के बम्बई केन्द्र से इतिहास, संस्कृत, दर्शन, अंग्रेजी, गणित और विज्ञान जैसे विषयों में एक साथ सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण कर सभी को आश्चर्य में डाल दिया था। अपने प्रिय विषय वैदिक गणित को वे व्यावहारिक विद्या के रूप में प्रस्तुत करते थे। ज्ञान, आयु और अनुभव की प्रौढ़ता प्राप्त कर लेने के बाद 35 वर्ष की आयु में शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी त्रिविक्रम तीर्थ महाराज ने 4 जुलाई सन् 1919 को उन्हें काशी में सन्यास की दीक्षा दी और नाम दिया स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ। 

आज का समय तीव्र प्रतिस्पर्द्धा का है ! जिसमें सफल होने के लिए समय एक बहुत बड़ा कारक है ! किसी भी स्पर्द्धा में सफल होने के लिए गति एवं सटीकता की सबसे ज्यादा जरुरत होती है। वैदिक गणित के सूत्रों और नियमों का अभ्यास किसी भी स्पर्धा व परीक्षा में बहुत ही सहायक होता है ! इसका प्रत्यक्ष अनुभव, इस विधा से जुड़े देश-विदेश के विद्वानों को हो रहा है। वैदिक गणित की विधियाँ एक ओर जहाँ गणित शिक्षण को सरल एवं रोचक बनाती हैं, वहीं दूसरी ओर नवीन शोध की ओर प्रेरित भी करती हैं। गणित के क्षेत्र में स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने 2 फरवरी 1960 में बम्बई में महासमाधि ले ली थी ! वैदिक गणित ग्रंथ का प्रकाशन, स्वामी जी के देहावसान के पश्चात् 1965 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया ! जो आज विश्व प्रसिद्ध है। 

आश्चर्य के साथ खेद भी होता है कि हमने अपने ऋषि-मुनियों द्वारा रचित, अपनी इस अनमोल, अति उपयोगी, बहुमूल्य धरोहर का अब तक अपने पाठ्यकर्मों में उपयोग कर अपनी पीढ़ियों को लाभान्वित क्यों नहीं किया ! क्यों अभी भी हम विदेशियों द्वारा थोपे गए पाठ्यक्रमो को ढोए जा रहे हैं ! किनके अहम्, गलत सोच या विचारों ने हमें उत्कृष्टता अपनाने से रोक रखा है ! अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है, जरुरत है, स्वामी तीर्थ के आलोचकों और इस ग्रंथ जैसे अनेक ग्रंथों को अवैज्ञानिक मानने वाले, किसी और विचारधारा से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवियों को परे धकेल, उनसे किनारा कर, बिना किसी सोच या गुरेज के अपने सनातन ज्ञान को अपना कर अपने देश के भविष्य को और बेहतर बनाने की !

बुजुर्गों से अक्सर पहाड़ों (Tables) के बारे में सुनने को मिलता था कि उनको याद रखने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती थी ! सीधे-सादे पहाड़ों की तो बात अलग, उसके पहले ''सवा'' और ''ड़ेढ'' के पहाड़ों को भी रटना पड़ता था ! आज के गैजट्स से सुसज्जित पीढ़ी तो शायद उसकी कल्पना भी नहीं कर सकती ! उस समय देश के कर्णधारों ने यदि वैदिक ग्रंथों की अहमियत समझ ली होती तो शायद हम वर्तमान समय से शायद और भी आगे होते !

ग्रंथ मेंउल्लेखित विधियों की एक झलक -

यदि कोई कहे कि 38 का पहाड़ा सुनाओ तो एक बार तो दिमाग झटका खा ही जाएगा ! तुरंत कैलकुलेटर की खोज शुरू हो जाएगी ! पर इस गणित की सहायता से किन्हीं भी दो अंकों का टेबल तुरंत जाना जा सकता है, उदाहणार्थ  :-  

"38" का पहाड़ा 

इसके लिए पहले 3 का टेबल लिख लें, फिर उसके साथ बगल में 8 का टेबल लिख लें 

03      0 8     (3+0)        38

06      1 6     (6+1)        76

09      2 4     (9+2)     114

12      3 2    (12+3)    152

15      4 0    (15+4)    190

18      4 8    (18+4)    228

21      5 6    (21+5)    266

24      6 4    (24+6)    304

27      7 2    (27+7)    342

30      8 0    (30+8)    380

उसी तरह ''87'' का पहाड़ा 

08     0 7   (08+0)       87

16     1 4   (16+1)     174

24     2 1   (24+2)     261

32     2 8   (32+2)     348

40     3 5    (40+3)    435

48     4 2   (48+4)     522

56     4 9   (56+4)     609

64     5 6   (64+5)     696

72     6 3   (72+6)     783

80     7 0   (80+7)     870

उतना ही आसान ''92'' का 

  09        02      (09+0)        92

 18         04      (18+0)      184

  27        06      (27+0)      276

  36        08      (36+0)     368

  45       10       (45+1)     460

  54       12       (54+1)     552

  63       14       (63+1)     644

  72       16       (72+1)    736

  81       18      (81+1)     828

  90       20      (90+2)     920

है ना आसान ! कितनी सहजता से इसी तरह 10 से 99 तक का टेबल  आसानी से बनाया जा सकता है ! ऐसी ही विशेष विधियों का संकलन है इस वैदिक गणित में ! यह है हमारा ज्ञान, विज्ञान, हमारी मेधा, हमारा अनुसंधान ! हमारा देश सदा से बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रहा है ! सदियों से विद्या के अकल्पनीय खजाने से भरपूर रही है हमारी धरा ! यूं ही विश्व गुरु कहलाने का हक हमें नहीं मिल गया था ! पता नहीं क्यों कुछ लोगों को अपने देश की बड़ाई, उसका गौरव, उसका मान, रास नहीं आता..........!

@साभार वैदिक गणित

मंगलवार, 28 मार्च 2023

एक नहीं थे, असुर, राक्षस, दैत्य और दानव

विद्वानों का यह भी मानना है कि हो सकता है कि राक्षस जंगलों के रक्षक रहे हों और मानवों द्वारा वनों को जलाने, अतिक्रमण करने, चरागाह और आश्रम बनाने पर उनका विरोध किया हो और दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए हों ! क्योंकि उनका मिल-जुल कर रहने का भी उल्लेख मिलता है ! यह भी देखने में आता है कि दैत्य, दानव और राक्षसों के कुल में आपसी विवाह तो होते ही थे, साथ ही इनके कुल की कन्याओं ने मानवों से भी विवाह किया था ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारे ग्रंथों में अक्सर चार नाम सामने आते रहते हैं, असुर, राक्षस, दैत्य और दानव ! हम लोग इनको एक दूसरे का एकरूप मानने की भूल कर बैठते हैं और पर्यायवाची की तरह उपयोग में ले आते हैं ! जबकि ये सब अलग-अलग हैं ! वैसे ये व्यक्तियों के नाम ना हो कर जातियों की पहचान बताते हैं ! शायद समय समय पर इन तीनों जातियों के देवताओं से युद्ध करने के कारण इन्हें एक ही समझ, इनकी सामान्य धर्मविरोधी जाति के रूप में छवि बन गई हो ! पर इनमें आपस में काफी अंतर और असमानता है ! 

ऋषि कश्यप 

राक्षस, असुर, दैत्य और दानव, जिन्हें अंग्रेजी में डीमन  शब्द में लपेट दिया गया है ! इन जातियों का हमारे ग्रंथों में विस्तार से विवरण मिलता है ! ये कश्यप ऋषि और उनकी विभिन्न पत्नियों से उत्पन्न संतानें थीं ! दैत्यों की माता दिति, दानवों की माता दनु और‌ राक्षसों की माता सुरसा थीं ! 

असुर, यह एक तरह से प्रतीकात्मक शब्द है ! वे, जो सुर यानी देवता नहीं थे, इसमें विभिन्न जातियों का समावेश हो सकता है ! इसका एक अर्थ यह भी है कि जो सूर्य के बिना रहते हों यानी धरती के नीचे, पाताल में ! ये स्वर्गवासी देवताओं के शत्रु थे ! इनकी मनुष्यों से कोई दुश्मनी नहीं थी, पर जो भी सुरों का सहायक होता था वह इनका शत्रु माना जाता था ! जहाँ तक 'असुर' शब्द का सवाल है इसका प्रयोग विशेष रूप से दैत्यों के लिए और सामान्य रूप से उक्त तीनों देव विरोधी जातियों के लिए होता है। 

रावण 

राक्षस, इन्हें जाति ना कह कर एक पंथ कहा जा सकता है ! कश्यप-सुरसा की वंशावली में रावण ने रक्ष प्रथा या रक्ष पंथ की स्थापना की थी। इस पंथ के अनुयायी, गरीब, कमजोर, विकास के पीछे रह गए लोगों को अपने साथ रखते और अपना विरोध करने वालों का संहार कर देते थे ! रक्ष पंथ को मानने वाले राक्षस कहलाते थे। रामायण और महाभारत ग्रंथों में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के राक्षस योद्धाओं का विवरण है ! वे शक्तिशाली योद्धा, विशेषज्ञ, जादूगर, आकार और रूप प्रवर्तक तथा भ्रम फैलाने की कला के जानकर बताए गए हैं ! महाभारत काल तक आते-आते यह वंश लगभग खत्म हो गया, क्योंकि घटोत्कच के बाद किसी प्रमुख नाम का उल्लेख नहीं मिलता !

प्रह्लाद 

दैत्य :- ये महर्षि कश्यप और दिति की आसुरी प्रवृत्ति की संतानें थीं ! पर इन्हें मान-सम्मान भी बहुत मिला ! इनमें हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बहुत प्रसिद्ध हुए थे ! इनका अपने सौतेले भाइयों से अक्सर युद्ध होता रहता था ! हिरण्याक्ष का पुत्र कालनेमि था, जिसने द्वापर युग तक श्रीहरि के सभी अवतारों से प्रतिशोध लेने की चेष्टा की और हर बार उनके हाथों मारा गया। बड़े भाई हिरण्यकशिपु के सबसे छोटे पुत्र प्रह्लाद थे, जो महान विष्णु भक्त हुए। उनके पौत्र बलि को सबसे बड़े दानी और प्रतापी राजा के रूप में ख्याति प्राप्त है ! इनके पुत्र बाणासुर की पुत्री उषा का विवाह श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ हुआ था !

राजा बलि 

दानव :- ऋषि कश्यप और दनु के वंशज दानव कहे जाते हैं। ये दैत्यों और आदित्यों के छोटे भाई थे !  ये दैत्य और राक्षसों की भांति उतने सुसंस्कृत नही होते थे। दनु के चौंतीस पुत्रों के नाम महाभारत में गिनाए गए हैं ! जिनमें विप्रचित्ति सबसे बड़ा था। इनमें वृषपर्वा नाम के दानवराज का नाम भी आया है जो ययाति की पत्नी शर्मिष्ठा के पिता थे। महाभारत में इनका नाम प्रमुखता से आता है। मय दानव को तो सभी जानते हैं जो असुरों के शिल्पी थे। इन्ही की पुत्री मंदोदरी रावण की पत्नी थी। इसी कुल में जन्मा विद्युतजिव्ह रावण की बहन शूर्पणखा का पति था !

मयासुर को पांडवों के लिए भवन निर्माण का निर्देश देते श्रीकृष्ण  

इस प्रकार देखा जाए तो यह जातियां भी विश्व का एक अंग ही थीं ! जिन्हें जाने-अनजाने-परस्थितिवश अच्छाई या बुराई मिली ! मानव समेत उनका मिल-जुल कर रहने का भी उल्लेख मिलता है ! जब तक कि अपने अहम् नियम, कायदे या सिद्धांत के कारण आपसी मतभेद ना पैदा हो गए हों ! विद्वानों का यह भी मानना है कि हो सकता है कि राक्षस जंगलों के रक्षक रहे हों और मानवों द्वारा वनों को जलाने, अतिक्रमण करने, चरागाह और आश्रम बनाने पर उनका विरोध किया हो और दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए हों ! क्योंकि यह भी देखने में आता है कि दैत्य, दानव और राक्षसों के कुल में आपसी विवाह तो होते ही थे, साथ ही इनके कुल की कन्याओं ने मानवों से भी विवाह किया था !  

@ चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, साभार 

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