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मंगलवार, 27 जनवरी 2026

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी संगठन, संस्थान  या प्रतिष्ठान के  साधन या उपादान चाहे  कितने भी सक्षम हों, यदि उनका दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, निस्वार्थ भाव से, उसको  संभालने के लिए  सही व्यक्ति  का चयन और नियुक्ति, सही  समय पर करता है, तभी  इसे असली नेतृत्व  कहा जा सकता है ! पर अक्सर  देखा गया है कि नेतृत्वकर्ता  या संचालक अपने  मोह, पूर्वाग्रहों, भावनाओं, द्वेष  या अहम के वशीभूत हो कर अपने सबसे काबिल सहायक, कार्यकर्त्ता को  नजर-अंदाज  कर संगठन के हित पर, अपनी  पसंद  को वरीयता दे देता है और  जब तक  इस चूक की कीमत समझ आती है, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ! सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है !

रणक्षेत्र 

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था ! जहां कल तक सैनिकों की हुंकार, शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां मृत्यु अपने भयावह सन्नाटे के साथ मौजूद थी ! दिव्यास्त्रों की आग और ताप से कोसों दूर तक के लता-पादप-वृक्ष भस्म हो चुके थे। उनसे उठे धुएं ने आकाश को कालिमा से ढक चारों ओर अंधकार कायम कर दिया था ! मांसभक्षी जानवरों ने क्षत-विक्षत लाशों को लोथड़ों में तब्दील कर दिया था ! टूटे हुए रथ, घोड़े-हाथियों के शव दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे ! सड़ती लाशों और रक्त से सनी मिट्टी के साथ मिल कर हवा ने पूरे वातावरण को विषाक्त और दुर्गंधमय बना दिया था ! ऐसे में अपने पतियों, पुत्रों, भाइयों के शवों को ढूंढने रणभूमि में पहुंचीं महिलाओं के मर्मभेदी विलाप से रह-रह कर आकाश कांप उठता था ! 

विभीषिका 
इन्हीं के बीच घायलावस्था में अपनी टूटी हुई जंघाओं के साथ, तन और मन  की मर्मांतक पीड़ा सहता, कुरु वंश का  अभिमानी युवराज दुर्योधन अकेला  पड़ा हुआ था ! उसकी  सांसें तो उखड़ रही थीं, लेकिन ह्रदय में पराजय  की आग और अपने साथ  हुए छल  का आक्रोश उसे मरने नहीं दे रहा था !  तभी वहां  श्री कृष्ण का आगमन हुआ। दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही उन पर आरोप जड़ दिए कि सिर्फ तुम्हारे छल ने मुझे हराया है ! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते ! श्री कृष्ण के चेहरे पर दया और करुणा व्याप्त थी ! 

प्रभु 

उन्होंने दुर्योधन के पास आ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, तुम अभी भी सिर्फ पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपनी ओर से हुए कपट और अन्याय की तरफ तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा ! जैसा तुमने किया उसी का फल तुम्हें मिला ! पर बात इतनी सी नहीं है ! युद्ध की शुरुआत से ही तुम गलतियां करते आ रहे हो ! तुम हारे अपनी गलत नीतियों से, अपने गलत चयनों से, अपने गलत निर्णयों की वजह से ! तुमने यदि युद्ध की शुरुआत में सोच-विचार कर निष्पक्ष भाव से निर्णय लिया होता तो यह युद्ध एक दिन में ही खत्म हो इतिहास बदल सकता था ! 

करुणा 
प्रभु के स्पर्श से पीड़ामुक्त हुए दुर्योधन ने चकित हो पूछा, गोविन्द मैंने ऐसी कौन सी चूक की ?  

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

अश्वथामा 
गुरु द्रोण के पुत्र, शिव अंशावतार अश्वत्थामा ! जिसको तुम्हारी भावनाओं और मित्रता के मोह ने अनदेखा कर दिया था ! श्री कृष्ण ने उसकी रणनीतिक भूलों को याद दिलाते हुए कहा, सबसे पहले तुमने भीष्म पितामह को बनाया, जो अजेय थे पर पांडवों से स्नेह रखते थे ! वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे। उनके बाद तुमने गुरु द्रोण को बागडोर सौंप दी, जिनका मोह अर्जुन के साथ था ! उनके जाने के पश्चात तुमने मित्र मोह में कर्ण का चुनाव किया, जबकि तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था, जिसका क्रोध अपने पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था वह साक्षात काल बन चुका था ! उसके बाद भी तुमने उसे अनदेखा कर शल्य को कमान सौंप दी ! तुम यह भी नहीं सोच पाए कि जिन लोगों को तुम नेतृत्व सौंप रहे हो, वे सब नश्वर थे जबकि अश्वस्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था !

युद्ध 

दुर्योधन निश्चल हो पड़ा था, पर उसके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे ! काम-क्रोध-द्वेष-मोह-लिप्सा सब तिरोहित हो चुके थे ! एक-एक कर उसे अपनी गलतियां साफ दिखाई पड़ने लगी थीं ! भाइयों से द्वेष ना कर उनका का हिस्सा उन्हें दे देता तो लाखों-करोड़ों लोगों की जान बच जाती ! प्रकृति का विनाश ना होता ! द्रोपदी का सम्मान करने की बजाय उसका अपमान किया ! जब प्रभु खुद उसके पास आए थे तो उसने उनकी शरण की बजाए उनकी सेना मांग ली थी ! जरासंध, जयद्रथ जैसों का विनाश भी सही-गलत की पहचान नहीं करवा पाया ! 

दुर्योधन की आँखें जैसे अतीत में झांक रहीं थीं ! अब उसे याद आ रही थी अश्वस्थामा की शक्ति जो हजारों योद्धाओं से एक साथ लड़ सकता था ! जिसे अपने पिता के अलावा परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से भी युद्ध कौशल का ज्ञान प्राप्त था ! उसके पास अर्जुन से भी घातक दिव्यास्त्र थे ! फिर उसे याद आई वह काली रात, जब उसने अंत समय में अश्वस्थामा को सेना नायक बनाया था और उसने कुछ ही समय में पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, पाण्डवपुत्रों के साथ-साथ उनकी बची हुई समस्त सेना का भी नाश कर दिया था !  

पर अब क्या हो सकता था, सिवा पछताने के और उसके लिए भी समय कहां था ! पर उसके साथ ही यह भी ध्रुव सत्य है कि होता वही है जो प्रभु चाहते हैं ! इसलिए जो होना है वह तो हो कर ही रहेगा और वह जो करेगा अच्छा ही करेगा, यह विश्वास बना रहना चाहिए ! दुर्योधन तो चला गया ! कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता, जो महाभारत ग्रंथ में उल्लेखित ना हो ! पर फिर भी यदि हम उससे कोई सबक नहीं सीखते, तो फिर दुर्योधन की तरह पछताने के सिवा कोई चारा भी नहीं बचता ! 

@चित्र व संदर्भ हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏 

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

एक था भाई, नाम था, शकुनि

शकुनी ने जो कुछ भी किया, वह सब खुद के लिए नहीं किया बल्कि सारे बुरे कर्म, षड्यंत्र, छल, कपट अपनी बहन के साथ हुए अन्याय और अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किया ! पर विडंबना यह रही कि जिस बहन के लिए उसने जमाने से, युगों-युगों की बदनामी, नफ़रत, कुत्सा, घृणा मोल ली, उसी बहन ने युद्धोपरांत अपने पुत्रों की मृत्यु का जिम्मेदार ठहराते हुए उसे श्राप दे डाला, वह भी ऐसा श्राप जो आज भी फलीभूत है............!

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आज तक देवता हो या इंसान, समय से ना हीं कोई पार पा सका, ना हीं उसे कोई समझ पाया ! इसके चक्र में कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी करवट ले लेती हैं कि अच्छा-भला इंसान भी हैवान निरूपित कर दिया जाता है ! जिससे कभी देश-समाज की रक्षा की अपेक्षा होती है, वही अपने लोगों की मृत्यु का सबब बन जाता है ! हजारों साल पहले शायद ऐसा ही हुआ गांधार के राजकुमार शकुनि के साथ ! जिसे द्वापर में हुए महाभारत युद्ध के भीषण नरसंहार का मुख्य कारण मान, हजारों वर्षों बाद, आज भी द्वापर के सबसे बड़े खलनायक के रूप में जाना जाता है !  

शकुनि 
उन दिनों गांधार, आज के अफगानिस्तान का कंधार क्षेत्र, के राजा थे सुबल और उनकी पत्नी का नाम सुदर्मा था ! उनके सौ बेटे और एक बेटी गांधारी थी ! शकुनि उन सब में सबसे छोटे थे, सौवां पुत्र होने के कारण उनका नामकरण सौबाला के रूप में किया गया था ! बचपन से ही उनकी भगवान शिव में गहरी आस्था थी ! वे बहुत ही कुशाग्र, बुद्धिमान और मेधावी थे ! इसी कारण वे अपने पिता को सर्वाधिक प्रिय थे ! मान्यता है कि शकुनि के पासे उनके पिता की रीढ़ की हड्डी से बने थे ! पिता के स्नेह के कारण सदा शकुनि के मनोरूप ही परिणाम आता था ! उनके एक और नाम शकुनि का अर्थ भले ही षड्यंत्रकारी के रूप में लिया जाता हो, पर इसका एक अर्थ नभचर भी होता है, पर समय की गति, शकुनि कुटिलता का पर्याय बन कर रह गया ! पर शुरू में शकुनि बुरे ख्यालों या कुटिल नीतियों वाले व्यक्ति नहीं थे ! वे अपने परिवार और खास कर अपनी बहन गांधारी से अत्यधिक स्नेह रखते थे ! 

धृतराष्ट्र-गांधारी 
सब ठीक-ठाक ही चल रहा था ! पर समय कहां और कब एक सा रहा है ! गांधारी सुंदर, सुशील, कार्यनिपुण, विदुषी व आज्ञाकारी महिला थीं ! इसके अलावा उन्हें सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त था ! इन्हीं गुणों के कारण भीष्म पितामह ने सोचा कि वह धृतराष्ट्र की अच्छी तरह से देखभाल करते हुए जीवन भर उसका साथ देगी, और उनके सौ पुत्र धृतराष्ट्र का संबल बनेंगे, इसीलिए उन्होंने एक तरह से जबरन यह विवाह करवाया ! जब भीष्म पितामह गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से करने का प्रस्ताव लेकर गांधार आए तो शकुनि नहीं चाहते थे कि उनकी बहन की शादी नेत्रहीन धृतराष्ट्र से हो और वे एक अंधे युग में धकेल दी जाएं ! लेकिन भीष्म के विरोध की क्षमता गांधार में नहीं थी, सो मजबूरीवश शकुनि को धृतराष्ट्र से अपनी बहन का विवाह करवाना पड़ा ! पर दवाब और मजबूरी के चलते इस बेमेल विवाह को वे जन्म भर स्वीकार नहीं कर पाए ! कुरु वंश के प्रति उनके मन में नफ़रत और विद्वेष ने गहरी जगह बना ली थी ! विवाहोपरांत ही शकुनि ने इस अपमान का बदला लेने के लिए कुरु वंश के समूल नाश का प्रण ले लिया था ! !उनका एकमात्र उद्देश्य भीष्म पितामह के पूरे परिवार को नष्ट करना था। उसी क्षण से उन्होंने कुरुवंश की जड़ को खोदना शुरू कर दिया और उसे कुरुक्षेत्र के महारण में उतार दिया !  

शकुनि के पासे 
पौराणिक कथा के अनुसार ज्योतिषियों और विद्वानों का मत था कि गांधारी का पहला विवाह बेहद अशुभ परिणाम लाएगा ! इसीलिए उनका पहला विवाह एक बकरे के साथ कर दिया गया था, जिसकी बाद में बलि दे दी गई ! जिससे बाद में उनका जीवन सुरक्षित और निरापद रहे ! धृतराष्ट्र को इस घटना के बारे में उनकी शादी के बहुत बाद पता चला और अपने को गांधारी का दूसरा पति मान वे अत्यंत क्रोधित हो गए और सजा के रूप में, उन्होंने राजा सुबल को परिवार सहित कारागार में डाल दिया ! इतना ही नहीं उनमें से प्रत्येक को प्रतिदिन खाने के लिए सिर्फ एक मुट्ठी चावल दिया जाता था, जिससे भूख के कारण उन सब की मृत्यु हो जाए ! अंत को सामने देख राजा सुबल और उनका समस्त परिवार अपना सारा भोजन सबसे छोटे शकुनि को देने लगे, जिससे वह उनकी मौत का बदला लेने के लिए जीवित रह सके ! यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह बदला लेना हमेशा याद रखेगा, उनके पिता ने उनका एक पैर तोड़ उसे स्थायी रूप से लंगड़ा बना दिया ! अंतिम सांस लेने से पहले सुबल ने धृतराष्ट्र से शकुनि को मुक्त करने की विनती की तथा वादा किया कि उनका बेटा, बदले में, हमेशा धृतराष्ट्र के बेटों की देखभाल और रक्षा करेगा। उस समय तक धृतराष्ट्र सौ पुत्र और एक पुत्री के पिता बन चुके थे ! उन्हें अपने श्वसुर पर दया आ गई और उन्होंने  शकुनि को रिहा कर अपने पास ही नहीं रखा बल्कि उनकी बुद्धिमत्ता देख अपना सलाहकार भी बना लिया ! धीरे-धीरे शकुनि ने  दुर्योधन को वश में कर पूरे हस्तिनापुर को अपने कब्जे में ले लिया ! उनका प्रभाव इतना ज्यादा था कि विदुषी गांधारी सब समझते हुए भी विवश हो कर रह गई थी ! शायद समय की भी यही मंशा थी ! 

फिर जो हुआ उसे तो सारा संसार जानता है ! पर शकुनी ने जो कुछ भी किया, वह सब खुद के लिए नहीं किया, बल्कि सारे बुरे कर्म, षड्यंत्र, छल, कपट अपनी बहन के साथ हुए अन्याय और अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किया ! पर समय ने फिर भी उसके साथ न्याय नहीं किया ! यह विडंबना ही रही कि जिस बहन के लिए उसने जमाने से युगों-युगों की बदनामी, नफ़रत, कुत्सा, घृणा मोल ली, उसी बहन ने युद्धोपरांत अपने कुल के नाश का जिम्मेदार ठहराते हुए उसे श्राप दे डाला कि मेरे 100 पुत्रों को मरवाने वाले गांधार नरेश तुम्‍हारे राज्‍य में भी कभी शांति नहीं रहेगी ! वह हमेशा युद्धों में ही उलझा रहेगा ! तुम्हारी प्रजा कभी चैन की सांस नहीं ले पाएगी ! लोगों को मानना है कि गांधारी के उसी श्राप के चलते आज भी अफगानिस्तान में शान्ति स्थापित नहीं हो पा रही है !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 22 जनवरी 2023

अश्वत्थामा हतो.......! जैसा वाकया पहले भी एक बार घटित हो चुका था

श्रीकृष्ण जी ने युद्ध भूमि में यह खबर फैला दी कि घायलावस्था के कारण हंस की मृत्यु हो गई है ! यह सुनते ही डिम्भक हताश-निराश हो गया और हंस के विछोह के चलते उसने यमुना जी में समाधि ले ली ! उधर डिम्भक की मौत की खबर सुनते ही हंस ने भी अपने प्राण त्याग दिए ! इन दोनों के जाने से जरासंध की सेना को काफी क्षति पहुंची पर युद्ध रुका नहीं, उसने 18 बार मथुरा पर आक्रमण किया........!


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अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा ! महाभारत युद्ध की इस बहुचर्चित घटना की तरह का एक वाकया इसके बहुत पहले भी एक बार घटित हो चुका था ! संयोग से उसके केंद्र में भी श्रीकृष्ण ही थे ! बात उस समय की है जब श्रीकृष्ण के हाथों कंस वध हुआ था ! इस बात से क्रोधित हो कंस के ससुर व मित्र जरासंध ने प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर हमला कर दिया था ! जरासंध की सेना में दो अपार शक्तिशाली सेनानायक हंस और डिम्भक थे ! उस समय दुनिया भर में किसी के लिए भी उनसे पार पाना बहुत ही मुश्किल था ! श्रीकृष्ण जी के अनुसार उन दोनों की सहायता से जरासंध तीनों लोक का सामना कर सकता था। हंस और डिम्भक का आपस में हद से ज्यादा लगाव था ! दोनों दो जिस्म, एक जान थे ! एक-दूसरे के बिना उनका जीवित रहना नामुमकिन सा था ! यह बात सभी को ज्ञात थी !


इधर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पर जरासंध के बार-बार के आक्रमण से परेशान हो गए ! हंस और डिम्भक के रहते उसे परास्त करना संभव नहीं था ! एक दिन युद्ध के दौरान हंस नामक एक राजा की मौत हो जाती है ! उसी समय श्रीकृष्ण जी को एक युक्ति सूझी ! वे हंस-डिम्भक के आपसी लगाव से भलीभांति परिचित थे ! उन्होंने उसी समय युद्ध भूमि में यह खबर फैला दी कि घायलावस्था के कारण हंस की मृत्यु हो गई है ! यह सुनते ही डिम्भक हताश-निराश हो गया और हंस के विछोह के चलते उसने यमुना जी में समाधि ले ली ! उधर डिम्भक की मौत की खबर सुनते ही हंस ने भी अपने प्राण त्याग दिए ! इन दोनों के जाने से जरासंध की सेना को काफी क्षति पहुंची पर युद्ध रुका नहीं ! उसने 18 बार मथुरा पर आक्रमण किया था !


महाभारत में 18 की संख्या का एक अलग ही महत्व है !स महाग्रंथ में 18 अध्याय हैं ! श्रीकृष्ण जी ने 18 दिन तक अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, उसके भी 18 ही अध्याय हैं।  युद्ध भी पूरे 18 दिन तक चला। इसमें दोनों पक्षों की सेना का योग भी 18 अक्षोहिणी था ! एक अक्षोहिणी सेना में शामिल रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों का योग भी 18 ही बनता है ! इसके अलावा इस महासंग्राम के सूत्रधार भी 18 ही थे ! और सबसे बड़े आश्चर्य की बात कि युद्ध के पश्चात जीवित बचे योद्धाओं की संख्या भी 18 ही थी ! इसमें क्या रहस्य था कहा नहीं जा सकता ! इसी तरह जरासंध ने भी मथुरा पर 18 बार ही हमले किए थे, जिनमें पहले का नेतृत्व हंस और डिम्भक ने किया था ! इन्हीं हमलों के चलते मथुरा वासियों की रक्षा, सुरक्षा और शांति के लिए प्रभु ने सैंकड़ों मील दूर जा कर द्वारका में अपनी राजधानी बसाई थी !


हंस और डिम्भक की गहरी मित्रता पर काफी कुछ लिखा कहा गया है ! कोई इसे ले कर कुछ कहता है तो कोई इस रिश्ते को कुछ और नाम दे देता है ! कोई कुछ अलग रंग दे देता है तो कोई किसी और ही दिशा में ले जाता है ! पर चाहे कुछ भी लिखा-कहा जाए एक बात तो निर्विवाद है कि उन दोनों की दोस्ती एक मिसाल तो थी ही !

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

श्रीराम वंशज बृहदबल ने कौरवों का साथ क्यों दिया

आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने, अधर्म पक्ष होते हुए भी, कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! ऐसी क्या मजबूरी या परिस्थिति थी कि युद्ध के सबसे निंदनीय, अनैतिक, अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा,,,,,,,,,,,!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे हिन्दू धर्म के मुख्यतम दो महान ग्रंथों में से एक महाभारत ! एक महान, अनुपम, धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक व दार्शनिक काव्य ग्रंथ ! जो विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ है ! जिसे आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय प्रेणना स्रोत माना जाता है ! इसी ग्रंथ में श्रीराम जी के बाद श्रीविष्णु जी के, विश्वप्रसिद्ध, जन-जन में लोकप्रिय, जन-नायक, सर्वगुणसम्पन्न, आठवें परमावतार श्रीकृष्ण जी की कथा भी आती है ! जिन्होंने धर्म की रक्षा हेतु उस समय पांडवों का साथ दिया था ! 
सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है
भारतवर्ष के प्राचीन काल की इस ऐतिहासिक कथा के द्रोणपर्व में कथा के एक महत्वपूर्ण पात्र वीर अभिमन्यु का जिक्र आता है जिन्हें चक्रव्यूह में घेर कर कौरवों द्वारा छल पूर्वक मार डाला गया था ! उस समय युद्ध में कौरव सेना प्रमुख जयद्रथ, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन, कर्ण, दु:शासनअश्वस्थामा जैसे सात महारथियों के अलावा, दुर्योधन, दू:शासन व शल्य के पुत्र, कर्ण के भाईयों सहित और भी बहुत से योद्धा मौजूद थे ! जिनमें से अधिकतर अभिमन्यु के हाथों मारे गए !

चक्रव्यूह 
उन्हीं कौरव-पक्षीय योद्धाओं में से एक था वृहद्वल या बृहदबल ! जिसको अभिमन्यु के तीक्ष्ण तीरों से वीर गति प्राप्त हुई थी ! आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने अधर्म पक्ष होते हुए भी कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! कोई तो कारण होगा जो विष्णुवतार श्रीराम जैसे मर्यादा पुरषोत्तम, धर्म-रक्षक, न्यायप्रिय, प्रजापालक, आदर्श शासक का वंशज होते हुए भी उसे कौरवों का साथ देना पड़ा ! इतना ही नहीं युद्ध के सबसे निंदनीय अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा ! उस समय ऐसा होने के लिए क्या परिस्थितियां थीं या क्या मजबूरियां थीं, यह पूर्णतया तो नहीं पता किया जा सकता, पर इतिहास खंगालने पर जो कुछ सामने आता है, उसी को कारण माना जा सकता है !  
महाभारत काल में तक आते-आते कोसल प्रदेश पांच भागों में विभक्त हो चुका था ! उस समय मध्य कोसल पर राम वंशज बृहदबल का शासन था, जिसकी राजधानी अयोध्या थी ! राजसूय यज्ञ की विजय यात्रा में भीम ने उसको पराजित किया था ! इस हार का क्षोभ भी पांडवों के विरुद्ध जाने का कारण हो सकता है ! तिस पर कुछ समय पश्चात कर्ण ने अपनी दिग्विजय प्रयाण के दौरान मध्य कोसल को अपने आधीन कर लिया था ! हो सकता है यह आधीनता भी एक कारण रहा हो, बृहद्बल को मजबूरीवश कौरवों का साथ देने का ! तीसरा कारण, जैसा कि ग्रंथों से पता चलता है कि पौराणिक काल में सेनानायक द्वारा योद्धाओं को उनकी योग्यता के अनुसार ही पद प्रदान किए जाते थे ! सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है ! जो भी हो युद्ध के तेहरवें दिन पद्मव्यूह द्वार पर अभिमन्यु से भीषण युद्ध के दौरान उसको वीर गति प्राप्त हुई थी ! 

गुरुवार, 4 मार्च 2021

द्रोणाचार्य, एक पहलू ऐसा भी

प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने गुरु द्रोण को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आज के हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

हमारे ग्रंथों में वर्णित कई ऐसे पात्र हैं जिनके जीवन चरित्र के बारे में अनायास कई जिज्ञासाएं उठ खड़ी होती हैं ! जैसे महाभारत के महान योद्धा, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, युद्धविद्या में निष्णात, अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ, परशुराम शिष्य, कुरुवंश गुरु आचार्य द्रोण ! जिनको भगवान् कृष्ण भी प्रणाम करते थे ! पर इतने गुणी, सक्षम, ज्ञानी, और पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें शुरू में अभावों का सामना करते रहना पड़ा था ! कथाओं के अनुसार उनके जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघर्षमय, कठिन व अभावपूर्ण रहा था ! देखा जाए तो जितना कठिन उनका जीवन रहा उतना ही जटिल उनका चरित्र भी था। 

हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते

ऐसा माना जाता है कि द्रोण का जन्म, आज के उत्तरांचल की राजधानी देहरादून, जिसका उल्लेख महाभारत में द्रोणनगरी जिसे देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहा जाता रहा है, में हुआ था। इस इलाके में फैले मंदिरों और उपलब्ध मूर्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है। इनके पिता महर्षि भारद्वाज तथा माता अप्सरा घृतार्ची थीं। परिस्थियोंवश इनकी उत्पत्ति द्रोणी (यज्ञकलश) में हुई थी, इसलिए इनका नाम द्रोण पड़ा। इनका बचपन, लालन-पालन अपने पिता ऋषि भारद्वाज के आश्रम में ही हुआ। वहीं इन्होंने हर विद्या में निपुणता प्राप्त की। समयानुसार इनका विवाह आचार्य कृपाचार्य की बहन कृपि से सम्पन्न हुआ। 

इन सारे विवरणों को जान कर जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि एक ऐसा इंसान जो महान ऋषि भारद्वाज का पुत्र हो, आचार्य कृपाचार्य जिसके रिश्तेदार हों ! जो खुद इतना ज्ञानी, गुणी, विद्वान और पराक्रमी हो ! क्यों उसे शुरू में इतने अभाव में जीवनयापन करना पडा कि वह एक गाय तक पालने में असमर्थ था ! क्यों गरीबी के कारण उसे अपने मित्र द्वारा अपमानित होना पड़ा ! क्यों काम की तलाश में दर-दर भटकना पड़ा ! क्यों उसको अपनी योग्यता के अनुरूप यश नहीं मिल पाया ! क्यों बदनामियों ने उसका दामन थामे रखा !  

यदि गहराई से ग्रंथों की कथाओं-उपकथाओं का अध्ययन किया जाए तो एकाध जगह आचार्य द्रोण और गुरु शुक्राचार्य की आपसी मित्रता का जिक्र मिलता है। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य से अंतरंगता के कारण इन्हें देवताओं का कोपभाजन बन सुख-समृद्धि से वंचित रहने पर मजबूर होना पड़ा हो और इसी कारण तिरस्कृत होने तक की नौबत आन पड़ी हो ! एक क्षीण सा कारण और भी संभव हो सकता है ! जैसा कि महाभारत में उनका जो चरित्र उभर कर आता है वह एक ऐसे इंसान का है जो सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार की फ़िक्र करता है ! खासकर अपने बेटे की, जिसके सामने उसके लिए बाकी सारी बातें गौण हो जाती हैं। हो सकता है उनकी इसी मानसिकता के चलते हर कोई उनसे दूरी बना कर रखता हो। भीष्म पितामह को भी यह बात पता थी ! इसीलिए उन्होंने कुरु कुमारों की शिक्षा की जिम्मेदारी देते हुए उनसे वादा लिया था कि वे सिर्फ कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे। जाने अनजाने यह बात भी आगे चल कर उनकी बदनामी का एक कारण बन गई।  

गुरु द्रोणाराचार्य ने यह कभी नहीं कहा कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का प्रण लिया है। ऐसा होता तो वे सूत पुत्र कर्ण को भी अपना शिष्य ना बनाते। कुरुवंश से जुड़ने के पहले ऐसी किसी बात का कोई कारण भी नहीं बनता ! भीष्म पितामह को वचन देने के पहले यदि एकलव्य उनसे मिला होता तो उसे अपना शिष्य बनाने में उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं होती। क्योंकि एकलव्य कोई साधनहीन या निर्धन परिवार का सदस्य नहीं था। वह प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा  निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चंदेरी आदि बड़े राज्यों के समकक्ष थी। लेकिन एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने, अपने गुरु को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आजके हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी। लोकमान्यता के अनुसार इन्द्रप्रस्त का राजा बनने पर युधिष्ठिर ने यह गांव अपने गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया था। उनके नाम पर ही इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा, जो कालांतर में बदलकर गुड़गांव हो गया।

रही अर्जुन से अति लगाव की बात, तो हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते ! इन सब बातों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि महान होने के बावजूद उनमें इंसानी कमजोरियों की बहुतायद थी। परिवार के प्रति मोह था ! पुत्र प्रेम सर्वोपरि था ! अहम की भावना गहरी थी। क्षमा भाव की कमी थी ! इन्हीं सब वजहों से उन्हें वह आदर-सम्मान-ख्याति नहीं मिल पाई जो पितामह भीष्म को मिली ! उलटे, झूठे-सच्चे लांझनों से सदा उन्हें दो-चार होते रहना पड़ा।   

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