मंगलवार, 27 जनवरी 2026

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी संगठन, संस्थान  या प्रतिष्ठान के  साधन या उपादान चाहे  कितने भी सक्षम हों, यदि उनका दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, निस्वार्थ भाव से, उसको  संभालने के लिए  सही व्यक्ति  का चयन और नियुक्ति, सही  समय पर करता है, तभी  इसे असली नेतृत्व  कहा जा सकता है ! पर अक्सर  देखा गया है कि नेतृत्वकर्ता  या संचालक अपने  मोह, पूर्वाग्रहों, भावनाओं, द्वेष  या अहम के वशीभूत हो कर अपने सबसे काबिल सहायक, कार्यकर्त्ता को  नजर-अंदाज  कर संगठन के हित पर, अपनी  पसंद  को वरीयता दे देता है और  जब तक  इस चूक की कीमत समझ आती है, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ! सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है !

रणक्षेत्र 

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था ! जहां कल तक सैनिकों की हुंकार, शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां मृत्यु अपने भयावह सन्नाटे के साथ मौजूद थी ! दिव्यास्त्रों की आग और ताप से कोसों दूर तक के लता-पादप-वृक्ष भस्म हो चुके थे। उनसे उठे धुएं ने आकाश को कालिमा से ढक चारों ओर अंधकार कायम कर दिया था ! मांसभक्षी जानवरों ने क्षत-विक्षत लाशों को लोथड़ों में तब्दील कर दिया था ! टूटे हुए रथ, घोड़े-हाथियों के शव दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे ! सड़ती लाशों और रक्त से सनी मिट्टी के साथ मिल कर हवा ने पूरे वातावरण को विषाक्त और दुर्गंधमय बना दिया था ! ऐसे में अपने पतियों, पुत्रों, भाइयों के शवों को ढूंढने रणभूमि में पहुंचीं महिलाओं के मर्मभेदी विलाप से रह-रह कर आकाश कांप उठता था ! 

विभीषिका 
इन्हीं के बीच घायलावस्था में अपनी टूटी हुई जंघाओं के साथ, तन और मन  की मर्मांतक पीड़ा सहता, कुरु वंश का  अभिमानी युवराज दुर्योधन अकेला  पड़ा हुआ था ! उसकी  सांसें तो उखड़ रही थीं, लेकिन ह्रदय में पराजय  की आग और अपने साथ  हुए छल  का आक्रोश उसे मरने नहीं दे रहा था !  तभी वहां  श्री कृष्ण का आगमन हुआ। दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही उन पर आरोप जड़ दिए कि सिर्फ तुम्हारे छल ने मुझे हराया है ! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते ! श्री कृष्ण के चेहरे पर दया और करुणा व्याप्त थी ! 

प्रभु 

उन्होंने दुर्योधन के पास आ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, तुम अभी भी सिर्फ पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपनी ओर से हुए कपट और अन्याय की तरफ तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा ! जैसा तुमने किया उसी का फल तुम्हें मिला ! पर बात इतनी सी नहीं है ! युद्ध की शुरुआत से ही तुम गलतियां करते आ रहे हो ! तुम हारे अपनी गलत नीतियों से, अपने गलत चयनों से, अपने गलत निर्णयों की वजह से ! तुमने यदि युद्ध की शुरुआत में सोच-विचार कर निष्पक्ष भाव से निर्णय लिया होता तो यह युद्ध एक दिन में ही खत्म हो इतिहास बदल सकता था ! 

करुणा 
प्रभु के स्पर्श से पीड़ामुक्त हुए दुर्योधन ने चकित हो पूछा, गोविन्द मैंने ऐसी कौन सी चूक की ?  

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

अश्वथामा 
गुरु द्रोण के पुत्र, शिव अंशावतार अश्वत्थामा ! जिसको तुम्हारी भावनाओं और मित्रता के मोह ने अनदेखा कर दिया था ! श्री कृष्ण ने उसकी रणनीतिक भूलों को याद दिलाते हुए कहा, सबसे पहले तुमने भीष्म पितामह को बनाया, जो अजेय थे पर पांडवों से स्नेह रखते थे ! वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे। उनके बाद तुमने गुरु द्रोण को बागडोर सौंप दी, जिनका मोह अर्जुन के साथ था ! उनके जाने के पश्चात तुमने मित्र मोह में कर्ण का चुनाव किया, जबकि तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था, जिसका क्रोध अपने पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था वह साक्षात काल बन चुका था ! उसके बाद भी तुमने उसे अनदेखा कर शल्य को कमान सौंप दी ! तुम यह भी नहीं सोच पाए कि जिन लोगों को तुम नेतृत्व सौंप रहे हो, वे सब नश्वर थे जबकि अश्वस्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था !

युद्ध 

दुर्योधन निश्चल हो पड़ा था, पर उसके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे ! काम-क्रोध-द्वेष-मोह-लिप्सा सब तिरोहित हो चुके थे ! एक-एक कर उसे अपनी गलतियां साफ दिखाई पड़ने लगी थीं ! भाइयों से द्वेष ना कर उनका का हिस्सा उन्हें दे देता तो लाखों-करोड़ों लोगों की जान बच जाती ! प्रकृति का विनाश ना होता ! द्रोपदी का सम्मान करने की बजाय उसका अपमान किया ! जब प्रभु खुद उसके पास आए थे तो उसने उनकी शरण की बजाए उनकी सेना मांग ली थी ! जरासंध, जयद्रथ जैसों का विनाश भी सही-गलत की पहचान नहीं करवा पाया ! 

दुर्योधन की आँखें जैसे अतीत में झांक रहीं थीं ! अब उसे याद आ रही थी अश्वस्थामा की शक्ति जो हजारों योद्धाओं से एक साथ लड़ सकता था ! जिसे अपने पिता के अलावा परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से भी युद्ध कौशल का ज्ञान प्राप्त था ! उसके पास अर्जुन से भी घातक दिव्यास्त्र थे ! फिर उसे याद आई वह काली रात, जब उसने अंत समय में अश्वस्थामा को सेना नायक बनाया था और उसने कुछ ही समय में पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, पाण्डवपुत्रों के साथ-साथ उनकी बची हुई समस्त सेना का भी नाश कर दिया था !  

पर अब क्या हो सकता था, सिवा पछताने के और उसके लिए भी समय कहां था ! दुर्योधन तो चला गया ! कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता, जो महाभारत ग्रंथ में उल्लेखित ना हो ! पर फिर भी यदि हम उससे कोई सबक नहीं सीखते, तो फिर दुर्योधन की तरह पछताने के सिवा कोई चारा नहीं बचता ! 

@चित्र व संदर्भ हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏 

कोई टिप्पणी नहीं:

विशिष्ट पोस्ट

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस ...