pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: श्रीकृष्ण
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रविवार, 22 जनवरी 2023

अश्वत्थामा हतो.......! जैसा वाकया पहले भी एक बार घटित हो चुका था

श्रीकृष्ण जी ने युद्ध भूमि में यह खबर फैला दी कि घायलावस्था के कारण हंस की मृत्यु हो गई है ! यह सुनते ही डिम्भक हताश-निराश हो गया और हंस के विछोह के चलते उसने यमुना जी में समाधि ले ली ! उधर डिम्भक की मौत की खबर सुनते ही हंस ने भी अपने प्राण त्याग दिए ! इन दोनों के जाने से जरासंध की सेना को काफी क्षति पहुंची पर युद्ध रुका नहीं, उसने 18 बार मथुरा पर आक्रमण किया........!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा ! महाभारत युद्ध की इस बहुचर्चित घटना की तरह का एक वाकया इसके बहुत पहले भी एक बार घटित हो चुका था ! संयोग से उसके केंद्र में भी श्रीकृष्ण ही थे ! बात उस समय की है जब श्रीकृष्ण के हाथों कंस वध हुआ था ! इस बात से क्रोधित हो कंस के ससुर व मित्र जरासंध ने प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर हमला कर दिया था ! जरासंध की सेना में दो अपार शक्तिशाली सेनानायक हंस और डिम्भक थे ! उस समय दुनिया भर में किसी के लिए भी उनसे पार पाना बहुत ही मुश्किल था ! श्रीकृष्ण जी के अनुसार उन दोनों की सहायता से जरासंध तीनों लोक का सामना कर सकता था। हंस और डिम्भक का आपस में हद से ज्यादा लगाव था ! दोनों दो जिस्म, एक जान थे ! एक-दूसरे के बिना उनका जीवित रहना नामुमकिन सा था ! यह बात सभी को ज्ञात थी !


इधर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पर जरासंध के बार-बार के आक्रमण से परेशान हो गए ! हंस और डिम्भक के रहते उसे परास्त करना संभव नहीं था ! एक दिन युद्ध के दौरान हंस नामक एक राजा की मौत हो जाती है ! उसी समय श्रीकृष्ण जी को एक युक्ति सूझी ! वे हंस-डिम्भक के आपसी लगाव से भलीभांति परिचित थे ! उन्होंने उसी समय युद्ध भूमि में यह खबर फैला दी कि घायलावस्था के कारण हंस की मृत्यु हो गई है ! यह सुनते ही डिम्भक हताश-निराश हो गया और हंस के विछोह के चलते उसने यमुना जी में समाधि ले ली ! उधर डिम्भक की मौत की खबर सुनते ही हंस ने भी अपने प्राण त्याग दिए ! इन दोनों के जाने से जरासंध की सेना को काफी क्षति पहुंची पर युद्ध रुका नहीं ! उसने 18 बार मथुरा पर आक्रमण किया था !


महाभारत में 18 की संख्या का एक अलग ही महत्व है !स महाग्रंथ में 18 अध्याय हैं ! श्रीकृष्ण जी ने 18 दिन तक अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, उसके भी 18 ही अध्याय हैं।  युद्ध भी पूरे 18 दिन तक चला। इसमें दोनों पक्षों की सेना का योग भी 18 अक्षोहिणी था ! एक अक्षोहिणी सेना में शामिल रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों का योग भी 18 ही बनता है ! इसके अलावा इस महासंग्राम के सूत्रधार भी 18 ही थे ! और सबसे बड़े आश्चर्य की बात कि युद्ध के पश्चात जीवित बचे योद्धाओं की संख्या भी 18 ही थी ! इसमें क्या रहस्य था कहा नहीं जा सकता ! इसी तरह जरासंध ने भी मथुरा पर 18 बार ही हमले किए थे, जिनमें पहले का नेतृत्व हंस और डिम्भक ने किया था ! इन्हीं हमलों के चलते मथुरा वासियों की रक्षा, सुरक्षा और शांति के लिए प्रभु ने सैंकड़ों मील दूर जा कर द्वारका में अपनी राजधानी बसाई थी !


हंस और डिम्भक की गहरी मित्रता पर काफी कुछ लिखा कहा गया है ! कोई इसे ले कर कुछ कहता है तो कोई इस रिश्ते को कुछ और नाम दे देता है ! कोई कुछ अलग रंग दे देता है तो कोई किसी और ही दिशा में ले जाता है ! पर चाहे कुछ भी लिखा-कहा जाए एक बात तो निर्विवाद है कि उन दोनों की दोस्ती एक मिसाल तो थी ही !

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

नरक चतुर्दशी, नरकासुर वध

समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

इंसान के लिए जो बात या घटना अप्रत्याशित, असंभावित या आकस्मिक होती है वही बात जगत रचयिता के विधि लेखन का पूर्वनियोजित हिस्सा होती है ! हमारी पृथ्वी की गोलाई की तरह ही यहां पर घटने वाली हर बातें, विषय, घटनाएं, वाकये सब सुनियोजित हो किसी ना किसी तरह, गोल-गोल एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इंसान जिस घटना पर अवाक रह जाता है वह वर्षों पहले नियंता द्वारा रची जा चुकी होती है !

अब नरकासुर की ही बात लें, जिसे ब्रह्मा जी द्वारा वरदान मिला हुआ था कि उसका अंत उसकी माँ के ही हाथों होगा ! अब अपने बच्चे को कौन माँ मार सकती है ! इसी से निश्चिंत हो नरकासुर यानी भौमासुर ने सत्ता और ताकत के नशे में चूर हो, सभी राजाओं और देवताओं को तो पराजित किया ही, इंद्र को हरा कर अमरावती पर भी अपना कब्जा कर लिया। उसने देवताओं की माता अदिती की बालियां चुराने और 16000 राजकुमारियों का अपहरण करने तक की धृष्टता कर डाली ! उस समय वह प्राग्ज्योतिष यानी कामरूप नगर का राजा था ! इस जगह ब्रह्मा जी ने नक्षत्रों का निर्माण किया था, इसीलिए यह प्राक् (प्राचीन या पूर्व) और ज्योतिष (नक्षत्र) कहलाती थी, जो आज असम के गुवाहाटी के नाम से जानी जाती है। 

कथा लेखक को तो अपनी कहानी का हर पहलू ज्ञात होता है पर पढ़ने-सुनने वाले को उसके उतार-चढ़ाव का कुछ भी अंदाजा नहीं होता ! जब नरकासुर को उसकी तपस्या के एवज में वरदान दिया गया था, तभी साथ ही उसके अंत की भी व्यवस्था कर दी गई थी ! पर कथानक इतना सीधा-सपाट नहीं था ! पेच ओ खम से भरा हुआ था ! कई तरह के उतार-चढ़ाव थे ! तरह-तरह की विषम परिस्थितियों का समावेश था। कथा में माँ-बेटे के संघर्ष के द्वारा इंसान को समझाने की कोशिश है कि पृथ्वी ही हमारी माता है ! वही हमारा पोषण करती है ! हमें जीवनयापन में सहयोग करती है ! इसलिए हमें उस पर अपना अधिकार या स्वामित्व नहीं जताना चाहिए ! बल्कि उसके आदर-सम्मान के साथ ही उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी मानवता की ही बनती है !     

नरकासुर कोई मामूली या साधारण राक्षस नहीं था। वह श्री विष्णु और भू देवी का पुत्र था। पुराणों में विवरण है कि एक बार राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी देवी का अपहरण कर उन्हें समुद्र तल में ले जा कर कैद कर लिया था। तब विष्णु जी ने वराह का अवतार ले उनका उद्धार किया था ! सागर तल से ऊपर आने के दौरान उन दोनों के संयोग से भौमासुर का जन्म हुआ था ! देवी ने तभी से विष्णु जी को अपना पति मान लिया था ! समय के साथ पृथ्वी देवी के एक अवतार ने सत्यभामा के रूप में राजा सत्राजित के घर जन्म लिया। स्यमंतक मणि को ले कर काफी जद्दोजहद हुई ! इसी के लिए श्री कृष्ण को जामवंत जी की बेटी जामवंती से विवाह भी करना पड़ा ! पर अंततोगत्वा उनका विवाह सत्यभामा से भी हुआ, जो होना ही था !

इधर जब नरकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जा उनसे नराकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ! चूँकि नरकासुर को अपनी माँ के हाथों ही मरना था, इसलिए प्रभु ने अपनी पत्नी सत्यभामा को भी, जो पृथ्वी का अवतार थीं, युद्ध में साथ ले लिया ! समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है !
उत्तर भारत में नरक चतुर्दशी को "छोटी दिवाली" के रूप में मनाया जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में नरक चतुर्दशी, दीपावली पर्व का मुख्य त्योहार है। पर जहां उत्तर भारतीय अवाम, सीता जी के साथ श्री राम की वापसी का जश्न मनाता है, वहीं दक्षिण भारतीय नागरिक नरकासुर वध के उपलक्ष्य में उत्सव मनाते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और मनाने की  शैली एक होने के बावजूद दिन अलग-अलग होते हैं !

श्रीकृष्ण जी ने कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी ! उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए, आतिशबाजी की, खुशियां मनाईं ! तभी से नरक चतुर्दशी पर दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा। 

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