समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है..............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इंसान के लिए जो बात या घटना अप्रत्याशित, असंभावित या आकस्मिक होती है वही बात जगत रचयिता के विधि लेखन का पूर्वनियोजित हिस्सा होती है ! हमारी पृथ्वी की गोलाई की तरह ही यहां पर घटने वाली हर बातें, विषय, घटनाएं, वाकये सब सुनियोजित हो किसी ना किसी तरह, गोल-गोल एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इंसान जिस घटना पर अवाक रह जाता है वह वर्षों पहले नियंता द्वारा रची जा चुकी होती है !
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अब नरकासुर की ही बात लें, जिसे ब्रह्मा जी द्वारा वरदान मिला हुआ था कि उसका अंत उसकी माँ के ही हाथों होगा ! अब अपने बच्चे को कौन माँ मार सकती है ! इसी से निश्चिंत हो नरकासुर यानी भौमासुर ने सत्ता और ताकत के नशे में चूर हो, सभी राजाओं और देवताओं को तो पराजित किया ही, इंद्र को हरा कर अमरावती पर भी अपना कब्जा कर लिया। उसने देवताओं की माता अदिती की बालियां चुराने और 16000 राजकुमारियों का अपहरण करने तक की धृष्टता कर डाली ! उस समय वह प्राग्ज्योतिष यानी कामरूप नगर का राजा था ! इस जगह ब्रह्मा जी ने नक्षत्रों का निर्माण किया था, इसीलिए यह प्राक् (प्राचीन या पूर्व) और ज्योतिष (नक्षत्र) कहलाती थी, जो आज असम के गुवाहाटी के नाम से जानी जाती है।
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कथा लेखक को तो अपनी कहानी का हर पहलू ज्ञात होता है पर पढ़ने-सुनने वाले को उसके उतार-चढ़ाव का कुछ भी अंदाजा नहीं होता ! जब नरकासुर को उसकी तपस्या के एवज में वरदान दिया गया था, तभी साथ ही उसके अंत की भी व्यवस्था कर दी गई थी ! पर कथानक इतना सीधा-सपाट नहीं था ! पेच ओ खम से भरा हुआ था ! कई तरह के उतार-चढ़ाव थे ! तरह-तरह की विषम परिस्थितियों का समावेश था। कथा में माँ-बेटे के संघर्ष के द्वारा इंसान को समझाने की कोशिश है कि पृथ्वी ही हमारी माता है ! वही हमारा पोषण करती है ! हमें जीवनयापन में सहयोग करती है ! इसलिए हमें उस पर अपना अधिकार या स्वामित्व नहीं जताना चाहिए ! बल्कि उसके आदर-सम्मान के साथ ही उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी मानवता की ही बनती है !
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नरकासुर कोई मामूली या साधारण राक्षस नहीं था। वह श्री विष्णु और भू देवी का पुत्र था। पुराणों में विवरण है कि एक बार राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी देवी का अपहरण कर उन्हें समुद्र तल में ले जा कर कैद कर लिया था। तब विष्णु जी ने वराह का अवतार ले उनका उद्धार किया था ! सागर तल से ऊपर आने के दौरान उन दोनों के संयोग से भौमासुर का जन्म हुआ था ! देवी ने तभी से विष्णु जी को अपना पति मान लिया था ! समय के साथ पृथ्वी देवी के एक अवतार ने सत्यभामा के रूप में राजा सत्राजित के घर जन्म लिया। स्यमंतक मणि को ले कर काफी जद्दोजहद हुई ! इसी के लिए श्री कृष्ण को जामवंत जी की बेटी जामवंती से विवाह भी करना पड़ा ! पर अंततोगत्वा उनका विवाह सत्यभामा से भी हुआ, जो होना ही था !
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इधर जब नरकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जा उनसे नराकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ! चूँकि नरकासुर को अपनी माँ के हाथों ही मरना था, इसलिए प्रभु ने अपनी पत्नी सत्यभामा को भी, जो पृथ्वी का अवतार थीं, युद्ध में साथ ले लिया ! समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है !
उत्तर भारत में नरक चतुर्दशी को "छोटी दिवाली" के रूप में मनाया जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में नरक चतुर्दशी, दीपावली पर्व का मुख्य त्योहार है। पर जहां उत्तर भारतीय अवाम, सीता जी के साथ श्री राम की वापसी का जश्न मनाता है, वहीं दक्षिण भारतीय नागरिक नरकासुर वध के उपलक्ष्य में उत्सव मनाते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और मनाने की शैली एक होने के बावजूद दिन अलग-अलग होते हैं !
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श्रीकृष्ण जी ने कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी ! उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए, आतिशबाजी की, खुशियां मनाईं ! तभी से नरक चतुर्दशी पर दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।
8 टिप्पणियां:
शुभकामनाएँ
जो बात या घटना अप्रत्याशित,
असंभावित या आकस्मिक होती है
वही बात जगत रचयिता के विधि लेखन का
पूर्वनियोजित हिस्सा होती है !
शानदार अंक
आभार
सादर
सुन्दर
यशोदा जी
बहुत बहुत धन्यवाद व आभार
सुशील जी
हार्दिक आभार
छोटी दीपावली की कहानी बताता रोचक आलेख।
विकास जी
अनेकानेक धन्यवाद
अद्भुत और अनोखी जानकारी
बहुत बहुत धन्यवाद, कदम जी
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